हम तो पीके का मतलब पहले रांची से प्रकाशित होनेवाला एक समाचार पत्र प्रभात खबर ही समझते थे, हमें क्या मालूम कि आगे चलकर इस पर फिल्म भी आ जायेगी, पर सच्चाई हैं, फिल्म तो आ गयी – कुछ लोग इसे बेहतरीन फिल्म मान रहे हैं, तो कुछ लोग विरोध कर रहे हैं। दोनों के अपने – अपने तर्क हैं और दोनों के तर्क को झूठलाया भी नहीं जा सकता, पर इन दोनों को नहीं मालूम कि तीसरे ने जो ये फिल्म बनायी हैं, या इस फिल्म में काम किया हैं, उनका मूल मकसद येन केन प्रकारेण पैसा बनाना हैं, इसके सिवा और कुछ करना नहीं, न तो ये धार्मिक हैं और न ही धर्म से लेना – देना या धर्म के रहस्यों को जाननेवाले। इधर समर्थन – विरोध के क्रम में ये फिल्म अब तक 200 करोड़ रुपये तक की बिजनेस कर चुकी हैं यानी पैसों के आधार पर देखे तो फिल्म हिट। याद रहें, पहले पैसे नहीं तय करती थी कि फिल्में हिट हुई या नहीं, पूर्व में कौन सी फिल्म किस या कितने हालों में ज्यादा महीनों या वर्षों तक टिकी रही – ये पैमाना होता था। पर सच पूछिये तो आजकल 200 करोड़ रुपये कमानेवाली फिल्म हो या पांच करोड़ की फिल्म, कोई अब इन्हें पूछता नहीं, एक बार देख लिया – और लिखो-फेंकों कलम की तरह अपने जेहन से उतार दिया। सामान्य व्यक्ति तो आजकल सिनेमा हाल में जाता ही नहीं, वो तो टीवी से ही चिपककर अपना मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन कर लेता हैं। खैर पूर्व में जब आज से पच्चीस साल पहले रांची से मेरा नाता जुड़ा तो मैं कभी प्रभात खबर का फैन हुआ करता था, पर अब मेरा सारा अनुराग उस अखबार के प्रति जो था, वो काफुर हो गया हैं। अब तो मैं अपने घर में ये अखबार आने ही नहीं देता, क्योंकि मुझे ऐसे आंदोलन की जरुरत नहीं, जो अखबार वाले लाते हो।
और अब हम बात कर रहे हैं, फिल्म पीके की। जो विरोध कर रहे हैं, उनसे सवाल। क्या आपने फिल्म देखी हैं, गर फिल्म देखी हैं तो जरा ध्यान दीजिये, फिल्म शुरु होते ही, लालकृष्ण आडवाणी, प्रतिभा आडवाणी, अमिताभ बच्चन, राजस्थान पत्रिका, भाषा, आर्ट आफ लिविंग के रविशंकर के नाम आदि पढ़ने को मिलेंगे। मतलब समझिये, ऐसे एक नहीं अनेक लोगों के नाम आपको पढ़ने को मिलेंगे, जो या तो भाजपाई हैं या भाजपा का समर्थन करते हैं, इनकी केन्द्र बिन्दु या तो भाजपा हैं या संघ। जिससे ये ओतप्रोत रहते हैं। और जो विरोध कर रहे हैं मूलतः हिन्दूवादी संगठन हैं, जो किसी न किसी प्रकार से भाजपा से जूड़े होते हैं, मेरा सवाल हैं कि ये भाजपाई सीधे आडवाणी के घर जाकर, उनसे सीधे सवाल क्यों नहीं पूछ लेते कि भाई हम फिल्म का विरोध कर रहे हैं, आप समर्थन क्यों कर रहे हें। या यहीं सवाल श्री श्री रविशंकर से क्यूं नहीं पूछ लेते। यानी एक तरफ विरोध और दूसरी तरफ भाजपाईयों द्वारा ही इस फिल्म का समर्थन और प्रशंसा, कुछ बात हजम नहीं हो रही।
फिल्मवालों ने भी गजब फिल्म बनायी हैं जरा देखिये एक डायलाग जिसमें आमिर खान बोलता हैं कि कुछ लोग बोलते हैं गाय की पूजा करो और कुछ लोग कहते हैं कि गाय का बलिदान कर दो और इसी फिल्म में एक सामान्य व्यक्ति से डायलाग बुलवाया जाता हैं, जिसमें कहता हैं कि गाय को खाना खिलाने से हमें नौकरी मिलेगी तो क्या गाय हमारी डिग्री लेकर संस्थानों में जायेगी और पता नहीं क्या – क्या। यानी बेसिरपैर के डायलाग बोलकर, जनता को भरमाने का काम जरुर किया गया, साथ ही हिंदू धर्म के अंदर व्याप्त अंधविश्वास और पाखंड की आलोचना की गयी। मेरा मानना हैं कि दुनिया का कौन ऐसा धर्म हैं, जो किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया गया और उसमें पाखंड नहीं। हमें आश्चर्य हो रहा हैं कि पूर्व में इन सब का विरोध वामपंथी किया करते थे, पर अब विरोध और समर्थन दोनों का काम भाजपाईयों ने उठा लिया हैं और रही बात अखबारों की तो उनकों पैसे फेंकिये और पूरा पेज ले लिजिये, दूसरे दिन देखिये आपकी फिल्म की तारीफ का कैसा पूल बांधते हैं, यानी हर्रे लगे, न फिटकरी और रंग चोखा।
यानी फिल्म बनानेवालों ने हर प्रकार से खुद को बचाने का प्रबंध भी कर लिया, थोड़े पैसे के टूकड़े अखबार व चैनलों को फेकां और उन टूकड़ों पर अखबार और चैनलों के लोगों ने खुब मुंह मारीं, बदले में फिल्म का गुणगान किया, फिल्म हो गयी हिट, देश व समाज और धर्म जाये तेल लाने, इसे हमें क्या। हमको जिनको गरियाना था, गरिया दिया...............इसे ही तो फिल्म वालों की राजनीति कहते हैं।
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Wednesday, December 31, 2014
Monday, January 31, 2011
मैला से मैला साफ करने की कोशिश...!
30 जनवरी को महात्मा गांधी के शहादत दिवस पर पूरे देश में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आह्वान पर हजारों लोग, सड़कों पर उतरे। सभाएं की, भ्रष्टाचार से अंत अंत तक लड़ने का संकल्प लिया, भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की बात कहीं। भारत के कई राज्यों की राजधानियों और अन्य महानगरों से निकलनेवाले समाचार पत्रों ने भी, इस कार्यक्रम का भरपूर कवरेज किया और दिया। हालांकि प्रथम दृष्ट्या, इसमें वामपंथ की भी थोड़ी बू आयी, पर जिससे देश बनता हैं, वह कोई भी पंथ हो, हमें ग्राह्य हैं। पर क्या, सचमुच, देश में क्रांति हो गयी, लोग जग गये, अब कभी भ्रष्टाचार यहां देखने को नहीं मिलेगा, सरकार इस आंदोलन से घबरा गयी, सरकार में शामिल लोगों ने भी इस आंदोलन के बयार को भांप कर, अब भ्रष्ट न होने की कमर कस ली। कम से कम हमें तो नहीं लगता और साथ ही देश के करोड़ों लोगों को भी नहीं लगता, क्योंकि अपने देश में इस प्रकार के आंदोलन व प्रदर्शन होते रहते हैं, कैसे होते है, और क्यूं होते हैं, ये भी सबको मालूम हैं।
कमाल हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन हुआ, उसमें वे लोग नेतृत्व कर रहे थे, जो आउट ऑफ डेटेड हैं, जिन्होंने जिंदगी का आधा से ज्यादा मजा ले लिया हैं, और अब उनके पास, आज के डेट में सिवाय उनके अपने नाम चमकाने और अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में आने के सिवा कुछ भी नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा हैं, जो कभी खत्म नहीं होगा, और इसमें न तो हड़े लगती हैं और न फिटकिरी, रंग भी चोखा हो जाता हैं, सामान्य जनता की नजरों में ये नायक और नायिका के रुप में आ चुके होते हैं और फिर क्या. फिर चुनाव, चुनाव में पार्टी बनाकर लडेंगे, टिकट देंगे और टिकट लेंगे, और फिर अपनी सल्तनत, यानी भ्रष्टाचार खत्म करने के बजाय, खुद भ्रष्टाचार का हिमायती बन जाना। अब तक हुआ क्या हैं, यहीं तो हुआ हैं। आज जो सत्ता में हैं, या जो सत्ता में नहीं हैं, उन्होंने किसके खिलाफ मोर्चा खोलकर सत्ता हासिल की हैं। वो तो भ्रष्टाचार ही तो हैं।
अब जरा देखिये कौन – कौन लोग, कल के कार्यक्रम में शामिल थे।
स्वामी अग्निवेश, योग गुरु रामदेव, श्रीश्री रविशंकर की संस्था। जरा इन महानुभावों से पूछिये कि आपकी संस्था को पैसे कहां से मिलते हैं, और पैसे देनेवाले कौन हैं। क्या सभी ईमानदार हैं, और ईमानदारी से पैसे कमाकर, उनकी संस्था को पैसे पहुंचाये हैं क्या। क्या इनलोगों ने ईमानदारी से देश की जनता को बताया हैं कि उनके पास कितने पैसे हैं और कहां से आये, किसने दिये हैं। हैं इनमें हिम्मत कि वे देश की जनता के सामने अपनी आय को सार्वजनिक कर सकें। यानी दूसरों से पूछेंगे कि उनके पास पैसे कहां से आये पर अपनी आमदनी और उसके स्रोत नहीं बतायेंगे। यानी खुद मैले और मैला पोछने, उसे साफ करने की बात कहेंगे।
सबसे पहले इन महानुभावों से पूछिये कि भ्रष्टाचार का मतलब भी जानते हैं क्या।
भ्रष्टाचार का अर्थ हैं – आचरण से भ्रष्ट हो जाना। जब आचरण ही भ्रष्ट होगा, तो फिर बचा क्या रह जायेगा।
जरा अग्निवेश को देखिये, ये खुद को स्वामी अग्निवेश कहते हैं, पर माओवादियों के घोर हिमायती हैं, ये उनके लिए और उनकी ओर से सरकार से बात करने की भी इच्छा रखते हैं, जब माओवादियों की हत्या होती हैं तो इनका हृदय व्यथित हो जाता हैं, बयान भी दे देते हैं, पर इन्हीं माओवादियों की गोली से आम जनता की मौत होती हैं, सरकारी सेवा में कार्यरत किसी पुलिसकर्मी की मौत हो जाती हैं तो इनके होंठ सील जाते हैं, और ये अपने को संत कहते हैं। यहीं नहीं जो अरुंधती राय कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानती, उसके संग कार्यक्रम करने में इन्हें बड़ा ही आनन्द आता हैं, और ये महात्मा गांधी की शहादत दिवस के दिन नई दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण देते हैं, जिस गांधी ने अंग्रेजों के बंदूक से निकली गोली और भारतीयों के बंदूक से निकली गोली से मरनेवाले लोगों, दोनों को समान बताते हुए अहिंसा को अपनाया। उस गांधी के शहादत दिवस पर दोहरा मापदंड अपनाते हुए भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करना, क्या इन दोहरे चरित्रवालों से देश का भला होगा।
जरा योग गुरु राम देव को देखिये, ये खुद को संत कहते हैं, आज तक देश में ऐसा संत हुआ ही नहीं, जो अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगायी हो, पर ये संत ऐसे हैं, जिन्हें अपनी जान संकट में आने लगी, और लगे बयान देने की, उनकी जान को खतरा हैं, लगे हाथों सरकार ने इनकी जान बचाने के लिए जेड श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करा दी। क्या इस रामदेव को गौतम बुद्घ और अंगूलिमाल की कहानी याद नहीं, जरुर याद होगा, पर इसे गौतम बुद्ध थोड़ी ही बनना हैं, ये तो अंबानी और टाटा को टक्कर देने के लिए पैदा हुए हैं। टक्कर दे रहे हैं और अब तो सत्ता की कुर्सी उन्हें दिखाई देने लगी हैं, जो संत सत्ता की राजनीति करे, भ्रष्ट तरीके से प्राप्त धन को, धर्म के नाम पर प्राप्त कर, अपना आश्रम बनाये, उसे भी अधर्म ही कहा जायेगा और इस प्रकार से प्राप्त धन को भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में रखा जायेगा, इन संतों को मान लेना चाहिए। क्योंकि इस देश में रामदेव से बढ़कर, अनेक संत हुए, जिनके पांव के धूल भी रामदेव नहीं बन पायेंगे, रामदेव को जो बनना था, बन गये, पर याद रखे, वे देश की गरीब और ईमानदार, मेहनतकश किसानों और मजदूरों को धोखा नहीं दे सकते, ये धोखा दे सकते हैं – गलत तरीकों से धन प्राप्त किये, धंधेबाजों, करचोरी करनेवाले पूंजीपतियों को। सामान्य जनता को बाबा रामदेव, श्रीश्रीरविशंकर, और स्वामी अग्निवेश के आंदोलन से क्या मतलब, या रिटायर्ड नौकरशाहों से क्या मतलब। ये रिटायर्ड नौकरशाहों से ही पूछिये कि जब ये नौकरी में थे, तब क्या, इन्होंने ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहण किया, गर नहीं तो आज भ्रष्टाचार के नाम पर घड़ियाली आंसू क्यों.
गर सचमुच में देश में भ्रष्टाचार, से लड़ने के लिए इन्में जज्बा उत्पन्न हो गया हैं। तो कहा जाता हैं कि जब जगे तभी सबेरा। इन सबकों चाहिए कि अपनी पूर्व जिंदगी के किये गये अनैतिक और भ्रष्ट तरीकों को भी सार्वजनिक करें, कि उन्होंने पूर्व में ये ये गलत तरीके अपनाये, भ्रष्टाचार किया, भ्रष्ट आचरण में लिप्त रहे, अब संकल्प लेता हूं कि आगे ऐसा नहीं करुंगा, ये देश की जनता को वचन देता हूं। तब जाकर विश्वास किया जा सकता हैं, पर अचानक ये देशभक्ति का छलावा, से आम जनता को बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता और न ही भ्रष्टाचार पर रोक ही लग सकता हैं, क्योंकि मैले से मैला साफ नहीं होता, बल्कि गंदगी और फैलती हैं।
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