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Sunday, August 18, 2013

सावधान - पत्रकारों, अधिकारियों, नेताओं और बिल्डरों के नापाक गठजोड़ झारखंड को निगलने पर लगे हैं..........


आजकल जिसे देखों, एक चैनल खोल रहा हैं। शुरु में तो चैनल खोलने के इस अभियान को वो अपना शौक करार देता हैं, पर सच्चाई ये हैं कि वो इस चैनल की आड़ में स्वयं के द्वारा पूर्व में चलाये जा रहे नापाक हरकतों की रक्षा का काम लेता हैं। वो अपनी हर बेइमानी और गंदी हरकतों को छुपाने का कार्य, या उसे सहारा देने का कार्य चैनल में कार्य कर रहे पत्रकारों से ही करवाता हैं और स्वयं को दुनिया की नजर में जगद्गुरु शकंराचार्य की श्रेणी में ला खड़ा करता हैं। ऐसे लोगों को बचाने का काम राज्य के नेता, दूसरे अखबारों में काम करनेवाले संपादक, विभिन्न प्रशासनिक अधिकारी बखूबी करते हैं और इसके एवज में वे चैनल चलानेवालों से अनुप्राणित भी होते हैं। इसके कई उदाहरण भी हैं, गर इसकी सीबीआई जांच अथवा ईमानदारी से निगरानी जांच हो जाये तो ये सभी जेल के अंदर भी होंगे, पर होना क्या हैं, इस राज्य में कुछ भी नहीं होता.........।
एक बात और फिलहाल संजीवनी बिल्डकॉन प्रकरण पर सीबीआई जांच चल रही हैं। मैं पूछता हूं कि सीबीआई जांच संजीवनी बिल्डकॉन पर ही क्यों, इसका दायरा और बढ़ना क्यूं नहीं चाहिए। क्या राज्य सरकार व सीबीआई इस बात का रहस्योद्घाटन होने का इंतजार कर रही हैं कि अब और कौन बिल्डर, नेता अथवा प्रशासनिक अधिकारी जनता के सपनों को तोड़कर, माल इकट्ठा कर चुकी हैं। खैर, जिन्हें जो करना हैं वो करें। अब हम आपको बताते हैं कि कैसे पत्रकारों, अधिकारियों, नेताओं और बिल्डरों के नापाक गठजोड़ झारखंड को निगलने पर लगे हैं..........
ये उस समय की बात हैं जब मैं न्यूज 11 में कार्य कर रहा था। उसी समय कशिश से मुझे बुलाहट हुई। चैनल हेड गंगेश गुंजन और बिल्डर सुनील चैौधऱी ने मुझे कशिश से जोड़ा और मैं अपना कार्य करने लगा। इसी दौरान चैनल का मालिक बिल्डर सुनील चौधरी आफिस में आता और खूब शेखी बघारता, कहता वो अपनी शौक के लिए चैनल खोला हैं, फिर बार - बार लोगों को ये भरोसा दिलाता कि चैनल से संबंधित जो भी कार्य अथवा शिकायत हो, वो इसके लिए चैनल हेड गंगेश गुंजन से संपर्क करें और बाद में अपनी ही इस बात से मुकर जाता और अपने अन्य मातहतों से गंगेश गुंजन को ही सबकी नजरों से गिराने का कार्य करता। मैं इन बातों को अच्छी तरह जानता था यहीं कारण हैं कि उसके द्वारा दिये गये भोज या अन्य कार्यक्रमों में, मैं शामिल नहीं होता। ये वहीं बिल्डर हैं जो हमारे सामने कहा था, उस वक्त गुंजन जी भी मौजूद थे - कि हम क्या करें विजय भास्कर एडिटर इन चीफ हैं, पर कुछ काम नहीं करते हैं और मुफ्त में वेतन ले जाते हैं। ये वहीं बिल्डर था - जब उसकी हालत खराब थी तब तत्कालीन भूमि सुधार एवं राजस्व मंत्री मथुरा महतो के पास गया था और शेखी बघारी थी कि हमारे यहां इमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों की फौज हैं, जब मथुरा महतो ने हमे देखकर कुछ बाते की थी। पर आज देखिये..........इस बिल्डर के सुर बदल गये हैं। कहा जाता हैं कि समय देखकर, बाते करना धूर्तों के लक्षण हैं। ऐसे में कोई धूर्त व्यक्ति इस प्रकार की हरकतें करता हैं तो ये समयानुकूल भी हैं, क्योंकि उससे अच्छाई की आशा करना भी मूर्खता हैं।
अब सर्वप्रथम इन दिनों जो कशिश में चल रहा हैं, उसकी बात...................
इधर कशिश में कर्मचारी हटाओ अभियान चल रहा हैं। ये कर्मचारी हटाने का काम शुरु हुआ हैं। 8 जुलाई 2013 से और ये जो शुरु हुआ अभी रुकने का नाम नहीं ले रहा। किसी को टर्मिनेट किया जा रहा हैं तो किसी से जबर्दस्ती इस्तीफे लिये जा रहे हैं, इसी दरम्यान टर्मिनेट अथवा इस्तीफे लेनेवाले का जाति मैथिल ब्राह्मण निकल जा रहा हैं तो उससे ये कहा जा रहा है कि गलती से आपको ऐसा कहा गया आप काम करते रहेंगे। हम आपको बता दें कि बिल्डर मैथिल ब्राह्मण हैं और मैथिल ब्राह्मणों व उससे जूड़े इस जाति के अधिकारियों को वो उपकृत करता रहता हैं साथ ही इन्ही अधिकारियों से वो समय समय पर उपकृत भी होता रहता हैं। हम आपको बता दे कि झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष अमिताभ चौधरी भी मैथिल ब्राह्मण हैं और इस बिल्डर ने जेएससीए की जमीन पर फाइभ स्टार होटल बनाने का काम भी लेने का मन बनाया हैं, जिसकी स्वीकृति अमिताभ चौधरी ने दे दी हैं, पर कई लोगों के इस पर प्रश्नचिह्न लगा दिये जाने से इस पूरे मामले पर ब्रेक लगता दीख रहा हैं, फिर भी पिछले दरवाजे से मैथिल ब्राह्मण अमिताभ चौधरी ने सुनील को जेएससीए के कार्य में फायदा दिलाने का भरोसा दिलाया हैं। दुसरी ओर बिल्डर सुनील चौधरी ने इसके लिए अमिताभ चौधरी का एक बहुत बड़ा काम किया हैं। सुनील ने अपने मातहत काम करनेवाले नये - नये एडीटर दिलीप श्रीवास्तव नीलू से एक पत्र लिखवाया हैं जो पत्र अमिताभ चौधरी चाहते थे, जिसके आधार पर वे जेएससीए से जूड़े सदस्य सुनील सिंह को हटा सकें, पर वे हटा पायेंगे या नहीं ये तो वक्त बतायेगा, पर पत्र को देखकर साफ लगता हैं कि दिलीप श्रीवास्तव नीलू ने पत्रकारिता के नियम और कानून को ही ताक पर रख दिया और सिर्फ अपने मालिक बिल्डर सुनील चौधरी के आदेश के तहत वो काम कर दिया जिसकी इजाजत पत्रकारिता नहीं देता। धिक्कार हैं ऐसे लोगों पर जो पत्रकारिता की धज्जियां उड़ा रहे हैं और वो भी सिर्फ दो पैसों के लिए। यहीं नहीं बिल्डर सुनील चौधरी ने ही केवल झूठी शान और फाइव स्टार होटल बनवाने की आड़ में एकाएक पांच लोगो को अपने चैनल से बाहर का रास्ता दिखाया - ये थे गंगेश गुंजन, कृष्ण बिहारी मिश्र, शैलेन्द्र कुमार, नेहा पांडेय और प्रशांत कुमार। गंगेश गुंजन की गलतियां ये थी कि वो बिल्डर के नापाक इरादों के आगे नहीं झूके, यानी जो काम दिलीप श्रीवास्तव नीलू ने किया वो काम गंगेश गुंजन करने को तैयार नहीं थे। कृष्ण बिहारी मिश्र को इसलिए हटाया गया क्योंकि 11 अप्रैल को प्रभात खबर के संपादक एवं मैथिल ब्राह्मण विजय पाठक को कृष्ण बिहारी मिश्र ने सूचना भवन में औकात बतायी थी और विजय पाठक ने उसी दिन कृष्ण बिहारी मिश्र के चैनल से  हटाने का अनुरोध अपने आका मैथिल ब्राह्मण सुनील चौधरी से की थी। उसी दिन तय हो गया था कि कृष्ण बिहारी मिश्र को हटाना तय हैं पर इंतजार किया जा रहा था उस वक्त का कि कब वो दिन आये और वो दिन आ गया। जब गंगेश गुंजन ने बिल्डर सुनील चौधरी को ये कह दिया कि वे डमी एडीटर नहीं हैं कि जो चाहे वो उनसे करा ले। फिर क्या था गुस्से से तमतमाया मैथिल ब्राहमण सुनील चौधरी, अपने अन्य मैथिल ब्राह्मणों अमिताभ चौधरी और संपादक विजय पाठक से राय ली और इन्हीं के कहने पर 7 और 8 जुलाई को अपना चैनल बंद कर दिया। आफिस में ताले लटका दिये। साथ ही वहां कार्य कर रहे सभी कर्मचारियों को 8 जुलाई को अपने केडीएल ( कशिश डेवलपर्स लिमिटेड ) में बुलाया और भाषण दिया कि जो लोग यहां कांम कर रहे हैं, और जो इस सभा में मौजूद हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर निकाला नहीं जायेगा, सभी काम करेंगे, वे बहुत ही दयालु हैं, किसी को डरने की जरुरत नहीं, पर जरा देखिये आज की स्थिति क्या हैं। अब तक 20 लोगों से भी ज्यादा लोगों को टर्मिनेशन के नाम पर तो किसी से जबर्दस्ती इस्तीफे ले लिये गये। हमें तो कशिश में कार्य कर रहे कई लोगों पर दया आती हैं, क्योंकि उनकी स्थिति वैसी ही हैं, जैसे एक कसाई के यहां कई बकरें और बकरियों का झूंड  बंधा होता हैं और कसाई एक - एक कर उन बकरें-बकरियों को समय - समय पर काटता चला जाता हैं। यहां काम कर रहे किसी भी कर्मचारी को कब बाहर का रास्ता दिखा दिया जाय। कुछ कहा नहीं जा सकता। फिर भी ये कर्मचारी बेचारे बनकर अपना काम करते जा रहे हैं ये सोचकर कि, उनकी नौकरी सुरक्षित रहेंगी। 
यहां काम कर रहे उच्चस्तर पर ऐसे -ऐसे भयंकरानंद हैं कि मैं अपने ब्लाग पर लिख नहीं सकता। उनकी रासलीला न्यूज 11 से लेकर कशिश तक गूंजी हैं। फिलहाल वहां कार्यरत दिलीप श्रीवास्तव नीलू भी उनकी रासलीला के बार में जानते हैं कि कैसे न्यूज 11 में कार्यरत एक युवा ने कशिश की ईट से ईंट बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उस भयंकरानंद को भी पता है कि जब वो युवा उसकी रासलीला पर अपनी भृकुटि तानी थी तो कौन उसे बचाया था, पर किया ही क्या जा सकता हैं। आज भयंकरानंद, दिलीप श्रीवास्तव नीलू के साथ मिलकर कशिश को उच्चस्तर पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। भला चरित्रहीन व्यक्ति भी देश और समाज अथवा चैनल को नयी दिशा दिया हैं। ये तो गर्त में ले जाने के लिए पैदा लिये हैं।
यहीं पर कार्य कर रहा एक दूसरा भयंकरानंद हैं जो गंगेश गुंजन जी के घर जाकर उनकी गणेश परिक्रमा करता रहता था पर जैसे ही उसे सुनील की याद आयी, फिलहाल सुनील चौधरी की परिक्रमा करने में लगा हैं, पर मै जानता हूं कि वो कब तक सुनील चौधरी की परिक्रमा करेगा। इसे तो आज गंगेश गुंजन की हरी झंडी मिली ये सब कुछ छोड़कर गंगेश जी के चरणोदक पीने घर पर आ जायेगा।

Saturday, January 19, 2013

रांची में एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का आगाज, ये साली क्रिकेट पास जो न कराये.................

ये साली क्रिकेट पास जो न कराये........। आम जनता, मीडियाकर्मियों और माननीय विधायकों को पता नहीं क्या - क्या बना दिया, इस क्रिकेट पास और टिकट ने। गर आम जनता की बात करें तो, इस क्रिकेट पास के लिए के लिए तो नहीं, बल्कि क्रिकेटरों की एक झलक पाने के लिए, यहां की जनता पुलिस की मार तक खा चुकी, यहीं नहीं अपना पैंट तक उतरवा चुकी हैं, जबकि क्रिकेट की एक झलक पाने के लिए, एक अदद क्रिकेट के लिए, महंगाई तक को चुनौती दे डाली हैं, रांची की जनता ने। गर आप रांची आये तो देख सकते हैं, क्रिकेट की दीवानी यहां की जनता को, जो इस महंगाई में क्रिकेट मैच देखने के लिए बीस- बीस हजार रुपये में, टिकट ब्लैक में खरीदकर, क्रिकेट को इंज्वाय किया हैं। ये तो रही जनता और अब बात करते हैं मीडिया की। 
बात -बात में राजनीतिज्ञों और कारपोरेट जगत पर बरसनेवाली यहां की मीडिया और उनमें कार्यरत पत्रकारों और छायाकारों को भी कम नहीं झेलना पड़ा हैं। टिकट और पास पाने के लिए, जेएससीए द्वारा धकियाएं गये ये लोग, जेएससीए के आलाधिकारियों की वंदना और  विशेष पूजा करने से भी बाज नहीं आये। एक अखबार ने तो जेएससीए के एक आलाधिकारी की चरणवंदना में एक सप्लीमेंट ही निकाल दिया और उसमें एक पेज विशेष रुप से उक्त आलाधिकारी को समर्पित कर दिया। जिसके एवज में उक्त आलाधिकारी ने उक्त अखबार पर विशेष कृपा भी बरसायी। इसी तरह एक और अखबार, जो अपने को कारपोरेट जगत का सबसे बड़ा अखबार मानता हैं,  आज के दिन उसने जेएससीए के एक आलाधिकारी का बयान छापकर, अपनी मौन आराधना और वंदना उक्त आलाधिकारी के प्रति जगजाहिर कर दी हैं। पर जिन अखबारों व मीडिया को पास व टिकट नहीं मिले, उन्होंने जमकर, जेएससीए पर बरसना शुरु कर दिया। यहीं नहीं, खोद - खोदकर ऐसे ऐसे समाचार छापे गये, जिससे उक्त आलाधिकारी के चेहरे पर हवांइयां उड़ी होगी, इसकी संभावना कम ही दिखती हैं, क्योंकि फिलहाल, उस व्यक्ति के सितारे बुलंद हैं, और जब सितारे बुलंद होते हैं तो आप कुछ भी कर लें। उसे कुछ भी नहीं होता। लेकिन ये सितारे बराबर बुलंद रहेंगे, इसकी संभावना कम ही रहती हैं, क्योंकि रावण और कंस के सितारे भी इसी तरह कभी बुलंद हुआ करते थे, पर जब सितारें उनके गर्दिश में पड़े तो वे भी कहीं के नहीं रहे। 
आज एक अखबार ने लिखा हैं झारखंड में चार हजार करोड़ से अधिक के घोटाले के मास्टरमाइंड संजय चौधरी का पासपोर्ट आइपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी की सिफारिश पर ही बना था। इन्होंने ही 2004 में रांची पासपोर्ट कार्यालय को चिट्ठी लिखी थी। दिल्ली की सीबीआई टीम की जांच में इसका खुलासा हुआ हैं। इसी अखबार ने ये भी प्रकाशित किया हैं कि गुरुजी ने क्रिकेट स्टेडियम की नींव रखी थी पर स्टेडियम के उद्घघाटन में उक्त अधिकारी ने शिबू सोरेन को पूछना तक उचित नहीं समझा।  अखबार ने ये भी लिखा हैं कि स्टेडियम का उद्घाटन अधिकारियों का आयोजन बनकर रह गया। साथ ही स्पोर्टस पेज पर दो आईपीएस की लड़ाई में धूल धूसरित हुआ - कीनन स्टेडियम जैसे आलेख छापकर, अमिताभ चौधरी की बैंड बजा दी हैं। इस अखबार ने जो भी लिखा हैं, उसकी दाद देनी होगी, कि उसने ऐसा कर के एक ऐसे व्यक्ति को चुनौती दे डाली हैं, जिसका ख्वाब बहुत ही उंचा हैं, जो अब राजनीति में भी उतरकर, अपना लोहा मनवाने को उत्सुक हैं, पर जैसे खेल में कामयाब हुआ, वैसे राजनीति में भी कामयाब हो जायेगा, इसकी संभावना कम दिखती हैं, क्योंकि राजनीति में उससे ज्यादा की घटिया सोच रखनेवाले लोग पहले से ही विद्यमान हैं।
किसकी क्या सोच हैं, वह कितनी दूर जा सकता हैं, उससे देश व समाज का कितना भला होगा। उसका अंदाजा लगाना बहुत ही आसान हैं। बिहार में हमारी मां बहनें, चावल पका या नहीं, इसका अंदाजा, तसले पर उबल रहे चावल के एक दो कण को अंगूलियों पर रखकर, उसे मसल कर, पता लगा लेती हैं। ठीक उसी प्रकार जेएससीए कैसे-कैसे लोगों के हाथों में हैं, वह तो जेएससीए के आलाधिकारियों के आचरण से पता लग जाता हैं, उसके गतिविधियों से पता लग जाता हैं। जरा जेएससीए की कारगुजारियां देखिये ------------
1. यहां के जेएससीए के आलाधिकारियों ने पैसे लेकर, उद्घाटन समारोह के सीधा प्रसारण एक चैनल के हाथों बेच दिया। नतीजा लोग, उद्घाटन समारोह को ठीक से नहीं देख पाये। विजूयल इतना घटिया आ रहा था कि जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं।
2. उद्घाटन समारोह में राज्य के सभी आइपीएस व आइएएस आलाधिकारियों व उनके परिवारों को आमंत्रित किया गया था, जो बचे उसमे गर्वनर और कार्यवाहक मुख्यमंत्री के परिवारों ने कब्जा जमाया। आम जनता इस पूरे उद्घाटन समारोह से दूर रही। वो जनता, जिसकी दुहाई, उद्घाटन समारोह के अंदर भाषण करनेवाले महानुभाव बारंबार दे रहे थे।
3. जेएससीए के एक आलाधिकारी ने अपने घर में क्रिकेटरों को बुलाया। इसकी महक पत्रकारों को लगी। पत्रकार जब उक्त आलाधिकारी के घर गये। तब वहां पहुंचे पत्रकारों और छायाकारों को धकियाने में लग गये, वहां कार्यरत पुलिस अधिकारी। ये इशारा भी मिला था, जेएससीए के आलाधिकारियों द्वारा कि - पत्रकारों को सबक सिखाओ।
4. जेएससीए के एक आलाधिकारी ने आनेवाले समय में लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर नजर ऱखकर, जमकर अपने चहेतों को क्रिकेट पास रेवड़िय़ों की तरह बांटी, और माननीय विधायकों और अन्य सम्मानित लोगों को ठेंगा दिखा दिया।
5. हद तो तब हो गयी, जब उक्त आलाधिकारी ने एक अखबार में ये बयान दे दिया कि उसने उनलोगों को पास दे दिया हैं, जो सम्मानित हैं। यानी जिन लोगों को उसने पास दिलवाया, वे सम्मानित हैं और जिन्हें नहीं दिलवाया वो अपमानित। अर्थात सम्मान देने और लेने का उसने दुकान खोल लिया हैं क्या।
बात ये हैं कि हर व्यक्ति की अपनी महत्वाकांक्षा होती हैं। महत्वाकांक्षा होनी भी चाहिए, पर किसी को नीचे गिराने की अंदर भावना पालना, ठीक नहीं, क्योंकि ये ही एक भावना, किसी भी व्यक्ति, संस्थान व समाज को नीचे ले जाने के लिए काफी होती हैं। फिर भी बहुत सारी गड़बड़ियों और संभावनाओं के बीच रांची में एकदिवसीय क्रिकेट नजर आया। इसकी हमें भी खुशी हैं।