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Wednesday, November 23, 2016

इसे कहते है पत्रकारिता.................

आजाद सिपाही समाचार पत्र को दिल से सलाम...
जिसने यहां के बड़े-बड़े अखबारों और चैनलों की चूलें हिला दी...
जिसने एक ताकतवर नेता वर्तमान में विरोधी दल के नेता हेमंत की नींव हिला दी...
आखिर आज के अखबार में क्या है? आजाद सिपाही ने क्या कर डाला? कि हमें यह लिखना पड़ गया...
आजाद सिपाही ने प्रथम पृष्ठ पर एक लीड स्टोरी छापी है कि
“हितैषी बन कर आये थे हेमंत सोरेन, कर दिया बर्बाद – राजू उरांव”
“रुपये 10 करोड़ की जमीन ले ली मात्र रुपये 20 लाख में”
“करोड़ों की जमीन के मालिक राजू उरांव का परिवार दाने दाने को मोहताज”
“सदमें में राजू उरांव, जमीन पर सोये-सोये देखते रहते हैं आलीशान बिल्डिंग को”
“झारखण्ड आंदोलन के सिपाही थे राजू के दादा”
ऐसे है – झारखण्ड आंदोलन से उभरे नेता, दिशोम गुरु शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन। शिबू सोरेन वहीं है, जिन्होंने रिश्वत लेकर, कभी नरसिम्हाराव की सरकार बचायी थी। आज उनके बेटे अपने ही आंदोलनकारियों की जमीन पर नजर गड़ाये है, और उनकी जमीन को कौड़ियों के भाव खरीद कर, अपने सपनों को पूरा करते है और दूसरों के सपनों को इस प्रकार रौंद डालते है कि वह व्यक्ति या उसका परिवार कभी ठीक से खड़ा ही न हो सकें।
हम आपको बता दें कि इस कार्य में यहां के बड़े-बड़े माफिया पत्रकार भी शामिल है, जो ऐसे नेताओं का महिमामंडन करते और इसके बदले में उनसे उपकृत होते है। ऐसा नहीं कि इस घटना की जानकारी राज्य के स्वयं को प्रतिष्ठित कहनेवाले बड़े-बड़े मीडिया हाउसों को नहीं थी, उन्हें सब जानकारी थी, पर इन्होंने छापने का साहस नहीं किया, क्योंकि उन्हें इनसे उपकृत जो होना था।
फिलहाल राज्य में सीएनटी-एसपीटी की राजनीति चल रही है, इस राजनीति में मीडिया हाउस के लोग भी शामिल है, जो दूल्हों के भी चाची है और दूल्हिनियों के भी चाची है, पर मौके की तलाश में है कि किस तरफ ऊंट बैठे, ताकि अपनी सुविधानुसार जिस तरफ भी ऊंट बैठे, उस तरफ झक-झूमर गाने के लिए वे बैठ जाये, पर इसके उलट आजाद सिपाही ने बताया कि आखिर कौन लोग है, जो आदिवासियों के सपनों को तोड़ रहे हैं? वे कौन लोग है, जो सीएनटी-एसपीटी में हो रहे संशोधन के खिलाफ आग उगलते है, पर अपने ही भाइयों की जमीन को कौड़ियों के भाव हथिया लेते है? आज आजाद सिपाही ने ये आइना दिखाया है। ऐसा नहीं कि सीएनटी-एसपीटी पर कोई पहला संशोधन होने जा रहा था, ऐसा अब तक 26 बार हो चुका, स्वयं एक-दो बार तो शिबू सोरेन की उपस्थिति में बिहार विधानसभा में संशोधन हुआ, पर उस वक्त न तो इनके बयान आते थे, और न ही आंदोलन की धमकी सुनाई पड़ती, पर आजकल तो इनका ऐसा आंदोलन चल रहा था, जैसे लग रहा था कि इन्होंने झारखण्ड को बंधक बना लिया हो...पर जनता आज सब जान चुकी है।
मैं दावे के साथ कहता हूं कि राज्य में जितने भी चैनल है, वे सब अब पेड न्यूज के अंतर्गत समाचार प्रसारित करते है, यहीं हाल अखबारों का है, किसी को जनसरोकार से मतलब नहीं। सभी झकझूमर गाते है...जब जैसा, तब तैसा।
मेरा मानना है कि पेट के लिए अगर कोई झकझूमर गाता है तो जायज है, पर पेट से नीचे के लिए झकझूमर गाता है तो सर्वथा अनुचित है। कई अखबारों के प्रधान संपादकों से लेकर सामान्य संपादकों तक को देखता हूं कि किसी भी चिरकूट टाइप के नेता की फोन आयी नहीं कि वे झकझूमर गाने लगते है, जिस राज्य में ऐसे-ऐसे संपादक होंगे, उस राज्य की क्या हालत होगी? समझा जा सकता है...
मैं तो एक – दो चैनलों के संवाददाताओं को देख रहा हूं कि वे आइएएस-आइपीएस अधिकारियों और चिरकूट टाइप के नेताओं के आगे झकझूमर गाते है और जनसरोकार से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान ही नहीं देते, इसका मूल कारण है कि वे अपने मालिकों और संपादकों को ये संकल्प कर चूके होते है कि वे झारखण्ड से एक साल में दो करोड़ से पांच करोड़ का विज्ञापन दिलायेंगे, और इसके लिए वे स्वयं को पत्रकार से दलाल बनने में ज्यादा रुचि दिखा रहे है, जब ये दलाल बनेंगे तो फिर हेमंत जैसे नेताओं के चरित्रों का उजागर कैसे करेंगे? आप समझ सकते है...
एक बार फिर आजाद सिपाही, आपको दिल से सलाम, आपने सही मायनों में आज बेहतर पत्रकारिता का उदाहरण पेश किया और एक व्यक्ति की गंदी सोच और गंदी हरकतों को जनता के बीच उजागर किया। हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि वह व्यक्ति आज विधानसभा में एक शब्द भी नहीं बोल पाया होगा...और न वह मीडिया बोल पायी होगी, जो इनके आगे झकझूमर गाने को बेकरार होते है...

Thursday, August 11, 2016

संभ्रांत पत्रकार बनकर झारखण्ड को लूटने का सुनहला अवसर हाथ से जाने न दें..........

संभ्रांत पत्रकार बनकर झारखण्ड को लूटने का सुनहला अवसर हाथ से जाने न दें...
कंबल ओढ़कर, घी पीने का सुनहला अवसर झारखण्ड में...
अगर आप किसी न्यूज एजेंसी से जुड़े है, या अन्य मीडिया हाउस से, तो फिर आपकी बल्ले-बल्ले है, यानी दोनों हाथों में लड्डू...
ये आपके हाथों में है...
बस आपको इतना ही करना है...
एक संस्थान खोलिए, या कोई न्यूज पोर्टल खोल लीजिये...
और उसमें अपने पिता को चेयरमेन बना दीजिये...
अपनी पत्नी को संपादक बना दीजिये...
अगर आपका बेटा है तो उससे आप अपने ही पोर्टल पर बेमतलब का कमेंट्स डलवाया कीजिये या कभी – कभी उससे रिपोर्टर्स का काम ले लीजिये ताकि जब बड़ा हो तो उसे आराम से संवाददाता या पत्रकार बनाया जा सके...
कमेंटस दिलवाने में आप अपने मित्रों और परिवारों की भी मदद ले सकते हैं...
और खुद मुख्य संपादक बन जाइये और विज्ञापन प्रबंधक का काम शुरू कर दीजिये...
जैसे ही आप ऐसा करेंगे, विभिन्न दलों के नेता, मंत्री और अधिकारी से आप मुंहमांगी राशि विज्ञापन के रूप में वसूलना शुरू कर देंगे...
यहीं नहीं, अनैतिक कार्यों और इन हरकतों को अपनाते ही आप जल्दी धन-कूबेर बन जायेंगे, वह भी प्रतिष्ठा के साथ...
आपको सहयोग करने के लिए झारखण्ड के श्रम विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, उद्योग विभाग के लोग सदैव आपके साथ है, यहीं नहीं स्वास्थ्य, खेल, पर्यटन आदि विभाग भी आपको इस अनैतिक कार्य में सहयोग देने के लिए तैयार है...
यहीं नहीं झारखण्ड में स्थित सीएमपीडीआई, सीसीएल या प्रमुख भारतीय कंपनियां जैसे- सेल, गेल या कई सासंद मौजूद है ही...
हां एक बात और...
अपने संस्थान या न्यूज पोर्टल के नाम पर समय – समय पर एक स्मारिका निकलवाइये और पूरे स्मारिका में अपने बेटे, अपनी पत्नी और अपने पिता का फोटो भर दीजिये और नैतिकता पर भाषण देने के लिए आजकल गर्दिश में चल रहे किसी भी नेता को बुला लीजिये...फिर क्या सम्मान और पैसे दोनों एक साथ...
यहीं सत्य है,
अगर किसी कारण से ईमानदारी का कीड़ा, आपको काटे हुए है, तो समझ लीजिए, कहीं के न रहियेगा आप, यहां तक कि आप ही से लोग इस बात का प्रमाण मागेंगे कि आप पत्रकार है, इसके क्या प्रमाण है...तो फिर देर किस बात की...
बेशर्मी जिन्दाबाद, लंठई जिन्दाबाद...
नैतिकता का लबादा ओढ़िये और सारे अनैतिक हरकतें अपनाइये...
अनैतिकता के रास्ते, पत्रकारिता के वास्ते...

Wednesday, May 18, 2016

हम ऐसी पत्रकारिता की कड़ी भर्त्सना करते हैं.......

30 दिसम्बर 2015
स्थान – सूचना भवन, रांची।
कार्यक्रम – मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’।
एक शिकायत है - लातेहार के बालूमाथ में उत्क्रमित मध्य विद्यालय बरहनियां खांड़ में कार्यरत पारा शिक्षक रमेश पांडेय हमेशा अनुपस्थित रहते है। ये प्रखण्ड स्तर पर दैनिक जागरण के पत्रकार भी है। पत्रकार होने के कारण दबंगई भी दिखाते है, जिनके डर से कोई बोलता नहीं। इनके घर में दो पहिया वाहन है, आर्थिक रुप से संपन्न है। इसके बावजूद बीपीएल की सूची में भी दर्ज है। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जिला के उपायुक्त को जांच का आदेश दिया। जांच में आरोप सही पाया गया और रमेश पांडेय को पारा शिक्षक के पद से निलंबित कर दिया गया।
1 फरवरी 2016
स्थान – सूचना भवन, रांची।
कार्यक्रम – मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’।
आनन्द कुमार की शिकायत थी कि चतरा का उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय टिलरा हेट-आहर पिछले एक साल से बंद है, जिसमें लगभग 50 विद्यार्थी अध्ययनरत थे, विद्यालय के बंद रहने से सारे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो गयी। विद्यालय के प्रधानाध्यापक मालिक बाबू ग्राम टिलरा के जन-वितरण प्रणाली के डीलर और प्रखण्ड स्तर पर एक प्रेस समूह में बतौर संवाददाता कार्य करते है, यहीं नहीं जनाब ठेकेदारी भी करते है। इन्होंने एक और कमाल किया है विद्यालय के भवन निर्माण के लिए वर्ष 2008 में 8 लाख रुपये आये थे, उसे बिना कार्य संपन्न कराये ही निकाल लिया।
जैसे ही मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’ में यह मामला आया, मुख्यमंत्री ने संबंधित जिला शिक्षा अधीक्षक को मामले की जांच करने और इस पर त्वरित कार्रवाई करने का आदेश दिया। पूरे मामले की जांच हुई। आरोप सही पाया गया। मालिक बाबू की सेवा समाप्त कर दी गयी और इनके खिलाफ मयूरहंद थाने में प्राथमिकी भी दर्ज करा दी।
18 मई 2016
रांची से प्रकाशित सारे अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर खबर छापी है कि ताजा टीवी के पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह उर्फ इंद्रदेव यादव की हत्या उग्रवादी संगठन टीपीसी ने करायी है, मामला लेवी से जुड़ा है। चतरा एसपी के बयान से बताया गया है कि पत्रकार इंद्रदेव यादव राजपुर थाना क्षेत्र में डीवीसी के तहत 33 हजार पोल लगाने का ठेका लिया था। वह तीन साल से काम कर रहा था। उग्रवादी संगठन टीपीसी ने सात लाख रुपये लेवी की मांग की। लेवी नहीं देने पर पत्रकार की हत्या 12 मई को 9.30 बजे रात्रि में कर दी गयी।
कुछ अन्य घटनाएं...
जब मैं ईटीवी धनबाद में कार्यरत था, तब उस समय भी दो हृदय विदारक घटनाएं घटी थी, जब एक पत्रकार से ठेकेदार बने व्यक्ति की हत्या कर दी गयी थी और दूसरा मैथन के हिन्दुस्तान संवाददाता पर जानलेवा हमला हुआ था। जिसने जानलेवा हमला किया था, वह हमला का जो कारण बताया था, वह बड़ा ही शर्मनाक था। यहीं नहीं 31 दिसम्बर 2006 को तो धनबाद के ही गांधी सेवा सदन में धनबाद के तथाकथित पत्रकारों का समूह मुर्गा तक कटवा दिया था, शराब की बोतले तक खोल दी थी, सिगरेट तक फूंक डाले गये थे जबकि सबको पता है कि गांधी से संबंधित किसी भी सदन में इस प्रकार की हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाता, फिर भी पत्रकारों ने ऐसी हरकत की। मैंने पत्रकारों के इस हरकतों को अपने ईटीवी पर दिखाया, नतीजा यह हुआ कि धनबाद के सारे मीडिया हाउस में बैठे शीर्षस्थ महानुभावों ने संयुक्त रुप से मेरे खिलाफ मोर्चा खोला और मेरे खिलाफ अनाप – शनाप एक अखबार में छपवाने लगे, उन्हें लगा कि मैं इससे डर जाउंगा, मैंने उनका मुकाबला किया और अपनी उपस्थिति शानदार ढंग से दर्ज करायी।
ये दृष्टांत है – आज के पत्रकारों के। मैं यह नहीं कहता कि झारखण्ड या अन्य जगहों के सारे पत्रकार ऐसे ही है, पर हां, इतना जरूर कहूंगा कि इनकी संख्या बहुतायत है और इनकी हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कुछ लोगों को तो मैं देख रहा हूं, जिनसे ये आशा की जा सकती है कि वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आदर्श स्थापित करेंगे, जिसे देखकर आनेवाली पीढ़ी सीख लेंगी, वे मर्यादा को तोड़ने में ज्यादा रूचि दिखा रहे है। कोई राजनीतिज्ञों की भक्ति में ऐसे लग गया कि उसे राज्यसभा पहुंचने में परम आनन्द की प्राप्ति हो रही है, कोई सूचना आयुक्त बनकर स्वयं को धन्य कर चुका है, कोई बाडीगार्ड लेकर घूम रहा है और शान बघार रहा है, कोई कुकृत्यों से धन इकट्ठा कर रहा है, कोई अपनी पत्नी के नाम पर पोर्टल चला रहा है और नाना प्रकार से धन जुटाने के लिए वह सारी हरकतें कर रहा है, जिसे पत्रकारिता इजाजत नहीं देती। आश्चर्य इस बात की भी है कि ऐसे लोग ही उन लोगों को प्रवचन दे रहे है, जिन्होंने अपनी जिंदगी में खासकर पत्रकारिता के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया है। कमाल है, जो पग-पग पर पत्रकारिता को अपनी जागीर बनाकर, स्वयं के जमीर को बेच डाला, वे पुरस्कृत हो रहे है, और जो किसी के आगे सर नहीं झुकाया, वे उसे कोस रहे है, यह कहकर कि अरे वो गधा है, वो क्या जाने की पत्रकारिता क्या है?
कुछ लोग तो यह भी कहेंगे कि पत्रकार क्या करे बेचारा। उसे तो अखबार वाले और इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले कुछ भी नहीं देते। मैं कहता हूं कि अगर कुछ नहीं देते तो इसका मतलब कि तुम जहां रहते हो, उसका हक छीन लोगे, उस पर दबंगई दिखाओगे। अगर अखबार वाले और इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले तुम्हें कुछ नहीं देते, तो तुम उनके यहां काम क्यों कर रहे हो, आखिर क्या वजह है कि तुम बिना पैसे के काम करने को तैयार हो, और उनकी सेवा को भी तैयार हो। मैं बताता हूं कि आखिर ऐसा तुम क्यों करते हो। वह हैं – झूठी इज्जत और पत्रकारिता की झूठी धौंस का तिलिस्म, जो तुम्हें इनके प्रति खींचता है और तुम जब तक जिंदा रहते हो, इस झूठी शान में अपनी जिंदगी गंवा देते हो, साथ ही अपने परिवार को और आनेवाले पीढ़ी को बर्बाद कर देते हो।
कमाल है, आजकल झारखण्ड में कुकुरमुत्ते की तरह पत्रकारों के हित के लिए लड़नेवाले संगठन भी खड़े हो गये है, जिन्हें कल तक कोई नहीं जानता था, आज लाखों-करोड़ों में खेलने लगे है। रांची, धनबाद, जमशेदपुर, गिरिडीह ही नहीं बल्कि दिल्ली में भी भाषण दे रहे है, किताबे छपवा रहे हैं, मंत्रियों और नेताओं को बुलाकर स्वयं महिमामंडित हो रहे हैं और चिरकूट टाइप के लोग उन्हें वाह-वाह करके आनन्दित हो रहे है। मैं कहता हूं कि अगर यहीं हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं कि जनता इन्हें पटक-पटक कर मारेगी...
कमाल है, आजकल मैं यह भी देख रहा हूं कि ये संगठन सरकार से पत्रकारों के लिए सुविधा मांग रहे हैं, पर जहां ये काम कर रहे होते है, वहां पर उन्हें इज्जत बचाने के लिए कुछ रोटी का प्रबंध हो जाये, कुछ पैसे मिल जाये, वहां आंदोलन करने और कराने में इनकी नानी मर जाती है, क्योंकि वे जानते है कि जैसे ही उन संस्थानों में ये आंदोलन करने जायेंगे, वहां पहले से ही रखे बाउंसर इनका ऐसा इलाज करेंगे कि इनकी सारी नेतागिरी ही तेल लेने चली जायेगी...
अंत में – जो चरित्रवान पत्रकार है, उन्हें कहीं कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत तो उन्हें है, जो नेताओं की चरणवंदना या अधिकारियों की चाटुकारिता करते है, तभी तो इसी रांची के एटीआई में एक कार्यक्रम में एक अधिकारी ने कह डाला था कि आप पत्रकारों और माननीय मुख्यमंत्री के बीच में तो पति-पत्नी का संबंध होता है, पर किसी पत्रकार ने इसकी आलोचना तक नहीं की थी, सभी मन ही मन आनन्दित हो रहे थे, अंत में किसने इस पर प्रतिकार किया, किसने इसकी आलोचना की, वहां जो पत्रकार होंगे, उन्हें जरुर पता होगा। हमें लगता है कि इस पर अब ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं।

Monday, January 11, 2016

जब भी “हिन्दुस्तान” और “दैनिक जागरण” अखबार......

जब भी “हिन्दुस्तान” और “दैनिक जागरण” अखबार देखता हूं, तो हृदय पुलकित हो जाता है, साथ ही इस अखबार के दिल्ली से लेकर रांची तक के संपादकों को हृदय से आभार व्यक्त करने का दिल करता है...
क्योंकि एकमात्र यहीं दोनों अखबार है, जो युवाओं के लिए प्रेरणापुंज हैं...
युवाओं के लिंग कैसे बढ़े?, उनके लिंग में कैसे जोश आये?, इस पर नाना प्रकार के विज्ञापन ये दोनों अखबार प्रत्येक दिन प्रकाशित करते हैं...
जापानी तेल से लेकर लिंगवर्द्ध यंत्र तक के विज्ञापन इनके पास है...बस इनके अखबार पढ़िये और अपने लिंग में आज ही जोश भरिये या लिंग इतना बड़ा कर लीजिये कि आपको देखकर कोई कहे, वाह क्या इनका लिंग है?
ज्यादा जानकारी के लीजिए आज का ही “दैनिक जागरण” का पृष्ठ संख्या 10 वर्गीकृत और पृष्ठ संख्या 15 पर नजर दौड़ाइये और “हिन्दुस्तान” का वर्गीकृत पृष्ठ संख्या 8 और पृष्ठ संख्या 15 देख लीजिये...गर आपकी सेक्स संबंधी सारी समस्याओँ का समाधान नहीं हो गया तो फिर कहियेगा...हां जब सेक्स संबंधी सारी समस्याएं समाप्त हो जाये तो एक धन्यवाद संबंधित पोस्टकार्ड इन संपादकों को जरुर भेजिये...ताकि वे इस प्रकार का विज्ञापन और दूगुने उत्साह से छाप कर अपने कोषागार को और समृद्ध कर सकें और युवाओं का सही मार्गदर्शन कर सकें...और जिनका इस विज्ञापन से भला नहीं हुआ या जिन्हें लगता है कि इससे समाज व देश को खतरा है, उनका रांची से प्रकाशित होनेवाले सभी अखबारों से कुछ सवाल...
क. आप हमें ये बताएं कि इस प्रकार के विज्ञापन से आप समाज को क्या दे रहे हैं?
ख. क्या आपका सामाजिक दायित्व नहीं बनता?
ग. क्या आप समाज व देश से बड़े हैं?
घ. क्या आपको कोई पैसे देगा और उसके लालच में आप सामाजिक मर्यादा को तार – तार कर देंगे?
ङ. क्या आपको मालूम नहीं कि जब सबेरा होता है तो ये अखबार नन्हें- मुन्नों के हाथों में भी पहुंचते हैं? ऐसे में आप बताएं कि उनके मन पर इस प्रकार के विज्ञापन कैसा प्रभाव डालता होगा?
च. आपसे नम्र निवेदन, शर्म करिये और ऐसे विज्ञापनों से खुद को अलग करिये...क्योंकि ये मत भूलिये कि ये अखबार आपके बच्चों के हाथों में भी होता है। ये समाज व देश आपका भी हैं, इसका नमक खाया है तो इसका कर्ज अदा करिये?
पत्रकारिता देश हित में
लालच में पत्रकारिता नहीं...
देश हमारा, हम देश के
ये नारा कभी भूले नहीं...

Sunday, May 10, 2015

काश, गब्बर झारखंड आता और यहां के 10 पत्रकारों को भी अगवा करता........



काश, गब्बर झारखंड आता और यहां के 10 पत्रकारों को भी अगवा करता और अपना एक मैसेज पत्रकारों के लिए भी छोड़ देता......। पूरे देश में अक्षय कुमार की एक नई फिल्म गब्बर इज़ बैककी धूम है। फिल्म हैं भी सटीक और दिल पर राज करनेवाली, इसलिए फिल्म को देखने के लिए विभिन्न सिनेमा हॉलों व मल्टीप्लेक्सों में भीड़ जूट रही हैं। फिल्म के डायलॉग भी जानदार है। एक डायलॉग – इस कॉलेज में पुलिस एलाऊ (ALLOW) नहीं हैं, काश हमें ये डायलॉग भी सुनने को मिलता कि इस संस्थान में या इस घर में पत्रकारों का आना निषेध हैं। हमें लगता हैं कि आज नहीं तो कल ये सुनने को अवश्य मिलेगा। बस थोड़ा इंतजार कीजिये।
आखिर मैं पत्रकारों को अगवा करने की बात गब्बर से क्यों किया उसका मूल कारण हैं. सिर्फ ऐसा नहीं है जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है कि डॉक्टर और उनका मेडिकल संस्थान, पुलिसकर्मी व नेता या नगर निगमकर्मी, जिला का कलक्टर अथवा रियल ईस्टेट (REAL ESTATE) का मालिक ही भ्रष्ट होता है। हमें तो इनसें ज्यादा भ्रष्ट झारखंड के पत्रकार नजर आते हैं। जो जितने बड़े पद पर बैठा हैं, वो उतना ही बड़ा भ्रष्ट हैं।
जरा नजर डालिये............।  यहां के पत्रकारों/ अखबारों/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मालिक व संपादकों की टोली क्या कर रही हैं।
क.        इनका पहला काम मुख्यमंत्रियों अथवा वरीय प्रशासनिक अधिकारियों को ब्लैकमेल करना अथवा चाटुकारिता कर राज्य के खनिज संसाधनों पर कब्जा जमाना हैं।
ख.       विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा सरकार के मनोबल को तोड़ना और उनसे मुंहमांगी विज्ञापन प्राप्त करना है।
ग.         विभिन्न प्रकार के चिरकुट टाइप पंडे पुजारियों की नई पौध को सृजन करना और उनसे मुंहमांगी रकम वसूलना, साथ ही उन्हें अपने अखबारों में जगह देना/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा उन्हें अपने संस्थानों में पैसे लेकर एक स्लॉट बेचना और इनके द्वारा समस्त जनता को दिग्भ्रमित करना है।
घ.         साथ ही राज्यसभा के लिए खुद को प्रोजेक्ट करना-कराना, मुख्यमंत्री का प्रेस एडवाइजर बनना, राजनीतिक सलाहकार बनना, सूचना आयुक्त बनना, विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों को यत्र – तत्र, मालदार जगहों/विभागों में स्थानांतरण करना-कराना प्रमुख है।
ङ.           यहीं नहीं सरकारी एवार्ड/गैर सरकारी एवार्ड/कभी-कभी खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए खुद ही एवार्ड लेने के लिए कार्यक्रम आयोजित करना-कराना भी शामिल है।
च.         अपने परिवार के सदस्यों/बेटे-बेटियों को सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में नियोजित करने के लिए अनैतिक तरीका अपनाना और सरकार में शामिल मंत्रियों का अपने अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से यशोगान गाना भी प्रमुख है।
छ.        यहां के 90% पत्रकार हैलमेट नहीं पहनते और ना ही गाड़ियों के वैध कागजात लेकर चलते हैं। ये तो उलटे ही यातायात नियमों को तोड़कर यातायात पुलिस को देख लेने की बात करते है।
ज.        विजुयल लेने के लिए तोड़-फोड़ करना-कराना और फिर खुद को महिमामंडित कराने का काम भी यहां के पत्रकारों का अति पवित्र कार्य बना हुआ हैं।
झ.       विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन कराना और अनैतिक तरीके से पैसे इकट्ठे करना। उनलोगों से पैसे लेना, जिन्होंने राज्य की जनता से ठगी की और फिर उन ठगों का अखबारों और चैनलों में महिमामंडित करना.....
मतलब स्पष्ट हैं अक्षय भाई, झारखंड के इन पत्रकारों की कारगुजारियां आप तक नहीं पहुंची थी क्या.....या आप यहां के नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की तरह, यहां के पत्रकारों से डर गये। हालांकि हम जानते हैं, आपको सॉरी से नफरत हैं, जब सॉरी से नफरत हैं तो आप इनसे डरेंगे क्या? आप गब्बर बन गये। बहुत ही सुंदर रुप, गब्बर का लेकर आये हैं। शोले के अमजद खान वाले गब्बर का तो आपने वाट लगा दी और शैतान गब्बर को भगवान गब्बर बना दिया। ये चारित्रिक उत्थान का विषय है। आपने संवाद भी बोला हैं कि यहां से ठीक पचास-पचास कोस........ नहीं तो गब्बर आ जायेगालेकिन हमें नहीं लगता कि यहां आपका डर पत्रकारों में हैं। हां मजा तो तब आ जायेगा, जब यहां के 10 भ्रष्ट पत्रकारों की सूची में पहला नंबर किसका होगा....उसके नाम के लिए काश एक अधिसूचना आपकी ओर से जारी हो जाती..............। सचमुच गब्बर भाई आप कहां हो......। झारखंड में आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा............GABBAR IS BACK.

Tuesday, October 28, 2014

जरा सोचिये, क्या इन बेईमानों से झारखंड को बचाना आपका फर्ज नहीं...........................

झारखंड में चुनाव की घोषणा क्या हुई........आईपीएस अधिकारियों, पत्रकारों, बिस्तर की तरह दल बदलनेवाले नेताओँ, अधिकारियों की बन आई हैं। सभी की पहली पसंद भाजपा हो गयी हैं। शायद उन्हें मालूम हैं कि भाजपा में जाने का मतलब श्योर शॉट - विधायक बन जाना हैं। भाजपा वाले भी खुश हैं - उनके दल के प्रति लोगों की सोच बदल रही हैं, माहौल बन रहा हैं, तो क्या गलत हैं। भाजपा के अंदर जो नेता व कार्यकर्ता जो मुंह पिजाये थे कि इस बार मोदी लहर में, उनका विधायक बनना तय था, बेचारे मुंह लटका लिये हैं, क्योंकि बाहर के जो नेता हैं, पहले से अपनी सीट बुक करवा चुके हैं, चूंकि विधायक हैं, इसलिए टिकट की दावेदारी तो प्रथम उन्हीे का बनता हैं। कल तक जो मुक्त कंठ से भाजपा को गरियाते थे, वे आज भाजपा नेताओं के साथ गलबहियां डाले हुए हैं, इधर भाजपा कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी फौज खिसयाई हुई हैं, पर क्या करें, अनुशासन का डंडा, उनको गुस्साने भी नहीं दे रहा। बहुत सारे भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं के बेटे और बेटियां, ये बोलने से नहीं चूंक रहे, अपने सगे संबंधियों को कि कल तक आप भाजपा का झंडा व डंडा ढोते थे, आपको क्या मिला। जब मेवा खाने का मौका आया, तो दूसरा दल से आया नेता और पुलिस अधिकारी विधायक बनने जा रहा हैं। आपको  क्या मिला - बाबाजी का ठुल्लू। बेचारे भाजपा नेता व कार्यकर्ता क्या बताये कि उनका भी इस मु्द्दे पर जी कसमसा रहा हैं, पर क्या करें।
इधर मीडिया के बंधु भी सदाचार के किस्से सुनाने लगे हैं। बड़े बड़े अखबार और चैनल के मालिक और तथाकथित पत्रकार चरित्र की बात कह रहे हैं। झारखंड प्रेम और उसकी दिशा पर आलेख लिख और दिखा रहे हैं। ये वो लोग हैं, जो पत्रकारिता की आड़ में सूचना आयुक्त, राज्यसभा सांसद और पता नहीं क्या- क्या बन चुके हैं और बनने का सपना देखते हैं। ये वे लोग हैं, जो बिल्डरों के अवैध धंधों को सहारा देते हैं, और ये बिल्डर इन पत्रकारों और अखबारों की आड़ में आम जनता के सपनों को लूट रहे हैं। कमाल हैं, झारखंड की जनता को लूटने के लिए और झारखंड को बर्बाद करने के लिए एक बार फिर नेता, पत्रकार, पुलिस अधिकारी और प्रशानिक उच्चाधिकारी मिल बैठ गये हैं, सभी विधायक बनने और बनाने की तिकड़म में व्यस्त हैं। इनके तिकड़मों को जो जानते हैं, उन लोगों ने भी इनका जवाब देने का मन बनाया हैं, जो वोट बेचते हैं और वोट बिकवाने तथा खरीदने का कारोबार करते हैं। सभी ने अपना दुकान खोल दिया हैं। गली मोहल्लों में नुक्कड़ सभा करने, ओटा पर बैठकी लगाने, वोटरस्लिप बांटने, पार्टी का झंडा लगाने, प्रति व्यक्ति वोटर की कीमत भी लग चुकी हैं, बस लीजिये और दीजिये का काम बाकी हैं।
दूसरी ओर ऐसे लोग हैं, जो इस प्रकार की हरकतों को देख, किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। फिर चुनाव आया हैं। कह तो सभी रहे हैं कि झारखंड बनाना हैं, पर क्या ऐसे में झारखंड बनेगा। जहां का मीडिया बिका हुआ हो, जहां के नेता दलबदलू हो, जहां के पुलिस पदाधिकारी जो आज विधायक बनने को आतुर हैं और जिनका सेवा के दौरान रिकार्ड खराब रहा हो, क्या ऐसे लोग झारखंड का निर्माण करेंगे। सवाल ये हैं....
इसलिए झारखंड की जनता से सादर अनुरोध......
कृपया आप किसी लहर में नहीं बहें.........
दल के साथ -साथ जिन्हें आप वोट देने जा रहे हैं, उनके बारे में पूरा रिपोर्ट कार्ड देखें.....
हो सकें तो जब तक आप मतदान नहीं कर लेते हैं, अखबार पढ़ना पूरी तरह बंद कर दें या चैनल देखना पूरी तरह बंद कर दें, क्योंकि ये आपके मन मस्तिष्क को प्रभावित करेंगे, क्योंकि ये विभिन्न दलों से पैसे लेकर वो सारे हथकंडे अपनाते हैं, जिससे वे खुद भी बच जाते हैं और कानून को धोखा देते हुए, आपको भी प्रभावित कर डालते हैं, गर ज्यादा जरुरी हो तो चैनल को सिर्फ नौटंकी के रुप में देखे, जिसका मतलब सिर्फ मनोरंजन होता हैं, ज्ञान बांटना नहीं..........
ये मौका बार बार नहीं मिलेगा....पांच साल के बाद मिलता हैं, झारखंड बनाने का जिम्मा केवल नेताओं का नहीं, आपका भी हैं, जरा सोचिये आप अपनी आनेवाली पीढ़ी को क्या देंगे, किसके हाथों में झारखंड सौपेंगे...बेईमानों के हाथों में या ईमानदारों के हाथों में....
मौका हैं, सही व्यक्ति को, देश हित में राज्य हित में, सदन में पहुंचाये...........

Sunday, April 28, 2013

फील्ड में जाकर क्रिकेट अंपायर को अपने पक्ष में फैसले देने के लिए धमकी देना गुंडागर्दी कहलाता है - विजय पाठक जी......

रांची जिला  क्रिकेट एसोसिएशन के तत्वावधान में शशिकांत पाठक मेमोरियल मीडिया कप क्रिकेट चल रहा हैं, जिसमें मीडिया में शामिल विभिन्न चैनल व अखबार के लोग एक दूसरे से भीड़ रहे हैं और क्रिकेट की शालीनता व एकसूत्र में बंधने की परंपरा को आत्मसात कर रहे हैं, पर इसी क्रिकेट में, मीडिया में ही कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में हार पसंद नहीं हैं, वे इसके लिए अंपायर को भला - बुरा कहने से नहीं चुकते। उनका मानना हैं कि वे सिर्फ और सिर्फ जीतने के लिए ही बने हैं, भला कोई उन्हें हरा दे, ये उन्हें मंजूर नहीं। आखिर जब ऐसी सोच किसी के मन में बन जाये, तो समझ लीजिये वो कितना नीचे तक गिर सकता हैं। हम आपको बता दें कि मुझे कभी भी खेल में दिलचस्पी नहीं रही, कभी - कभार क्रिकेट जब टीवी पर देखता हूं तो थोड़ा समय काट लेता हूं पर क्रिकेट या अन्य खेल मेरा जायका बदल दें, ऐसा नहीं हैं। हम बात कर रहे हैं रांची में चल रहे रांची जिला  क्रिकेट एसोसिएशन के तत्वावधान में शशिकांत पाठक मेमोरियल मीडिया कप क्रिकेट की। आज का मैच प्रभात खबर और कशिश चैनल के बीच था। मैच रांची के सेटेलाइट कालोनी स्थित मैदान में चल रहा था। पहले खेलते हुए कशिश की टीम 79 रन बनाकर ऑल आउट हो गयी थी। इसके बाद प्रभात खबर की टीम बैटिंग के लिए उतरी। ये क्या 38 रन में ही प्रभात खबर टीम के चार विकेट उखड़ गये। फिर क्या था, प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक, सीधे फील्ड पहुंचे और उलझ गये - अंपायर से। लगे भला बुरा उसे कहने। बेचारे को ऐसा धमकियाया, कि अंपायर के लगे हाथ -पांव फूलने, और अँपायर के धमकाने का असर ऐसा हुआ कि प्रभात खबर जो हार के कगार पर थी, पांच विकेट से जीत गयी।
मैं पूछता हूं कि क्या प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक को फील्ड में जाकर अंपायर को धमकी देना उचित था। जो संपादक मैच के अंपायर को धमकी देकर अपने पक्ष में मैच करवा लें, उसे क्या कहेंगे - क्रिकेटर या गुंडा। क्या ऐसे लोग संपादक बनने के लायक हैं। जब ऐसे लोग के मन पहले से ही ये बात घर कर गयी हो, कि उन्हें हर हाल में मैच जीतना हैं, तो फिर इस प्रकार के आयोजन का क्या मतलब। सीधे वाकओवर खुद से लेकर, कप पर कब्जा क्यूं नहीं जमा लेते। जरुरत क्या हैं - जोर आजमाइश की। बाजार में तो बहुत सारे कप और ट्राफी बिकते हैं, खरीद लीजिये, जो मन चाहे, खुदवा लीजिये और लोगों को दिखाइये कि हम बहुत बड़े खिलाड़ी हैं। आज जैसी हरकत, विजय पाठक ने सेटेलाइट मैदान में की हैं, उससे हर क्रिकेटर का सर शर्म से झूक जाता हैं। मैं स्व. शशिकांत पाठक जी को अच्छी तरह जानता हूं कि वो क्या थे। मैं तो कहूंगा कि जो मैच उनके नाम पर हो रहा हैं, उनके नाम को इस मीडिया कप से हटा लेना चाहिए, क्योंकि उनकी आत्मा भी विजय पाठक की इस हरकत से, शर्मसार हो गयी होगी, क्योंकि क्रिकेट हर हाल में खेल -भावना के तहत प्यार और भाईचारगी सीखाता हैं - न कि गुंडागर्दी।
एक बात और, कुछ लोगों को लगता हैं कि वो जो कुछ कर लेंगे, उसमें जनता की भागीदारी रहेगी, जनता उनके साथ रहेगी, तो ये उनकी बड़ी भूल है, अब जनता बहुत अच्छी तरह से इन रंगे सियारों को देख रही हैं। समय आने दीजिये, अपना निर्णय सुनायेगी। शीर्ष से अर्श पर पहुंचते देर नहीं लगेगी। इसलिए अभी भी वक्त हैं, गुंडागर्दी की जगह, ईमानदारी से कदम बढ़ाइये। मैं बार - बार कह रहा हूं कि लिखने से अच्छा हैं कि कर के दिखाइये, पर यहां तो रोज देवदर्शन अखबार में कराये जाते हैं, पर सच्चाई में इन संपादकों की हरकतें कुछ और ही होती हैं, जैसा कि आज सेटेलाइट मैदान में मैंने एक संपादक की हरकतों को देखा, जो एक अंपायर को धमकिया रहा था।

Tuesday, March 26, 2013

आजसू की महिला पंचायत यानी पैसा फेंको, तमाशा देखो......

24 मार्च को झारखंड के मोराबादी मैदान में आजसू ने महिला पंचायत बुलाई। इस महिला पंचायत को आर्गेनाइज करने में आजसू ने करोड़ो रुपये फूंक डाले। कुछ को एक दिन की मजदूरी का लालच देकर, कुछ को ये सपने दिखाकर कि उन्हें विधानसभा का टिकट दिया जायेगा, आजसू ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। लाखों तो नहीं पर हजारों की संख्या में महिलाएं, इस महिला पंचायत में दिखी। कहीं पत्रकार नाराज न हो, अखबार व मीडिया नाराज न हो, इसके लिए जमकर इन पर भी धन लूटाये गये। महिला पंचायत के एक दिन पहले व बाद में भी अखबारों को मुंहमांगी रकम अदा की गयी। इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी विज्ञापन दिये गये ताकि वे अपनी बात न रखकर, आजसू और सुदेश की जय जयकार के लिए ही मुंह खोले। हुआ भी ठीक ऐसा ही। भला रुपये लेकर, कोई गद्दारी कैसे कर सकता हैं। इसलिए जमकर सभी ने जय जयकार की। हालांकि इसका कितना फायदा मिलेगा, फिलहाल कुछ कहां नहीं जा सकता।
हुआ ऐसा हैं कि मीडिया के कुछ धुरंधरों ने आजसू और सुदेश को सब्जबाग दिखाये हैं ये कहकर की आनेवाले समय में जब कभी विधानसभा चुनाव होंगे तो आजसू की सीटें बढ़ सकती हैं। फिर क्या, इस सब्जबाग को जमीन पर उतारने के लिए आजसू ने कमर कस ली और हो गये शुरु। हर जिले में एक पंचायत बुलायी गयी। आजसू के नेताओं व कार्यकर्ताओं को कह दिया गया कि वे जमकर पैसे बटोरे और पंचायत पर खर्च करें, मीडिया के कबूतरों पर भी पैसे खर्च करें, गर वो एक शराब की बोतले मांगते हैं तो उन्हें दो नहीं बल्कि शराब से नहला दिया जाय, खूब पैसे दिये जाये उन्हें ताकि वे सोते - जागते, सिर्फ और सिर्फ आजसू और सुदेश के ही गुण गायें। आजसू के इस कार्यप्रणाली का फायदा भी मिला हैं, जब पैसों के बल पर, उसने हटिया सीट जीत ली। अब तो सुनने में ये भी आ रहा हैं कि एक मीडियाकर्मी को आजसू ने चुनाव लडा़ने की ठानी हैं, और इस एवज में उक्त मीडियाकर्मी ने एक रिपोर्टर को आजसू के साथ लगा दिया हैं कि वो जमकर उक्त रिपोर्टर को जैसे पाये, वैसे यूज करें। खूब जमकर आजसू के विजूयल, टिकटैक और समाचार भी दिखाये जा रहे हैं।
कमाल हैं, जो पार्टी भ्रष्ट आचरण अपनाकर सत्ता हासिल करने की ठानी हो, उससे सदाचार की बातें करना, क्या मूर्खता को सिद्ध करने के बराबर नहीं। हमें तो इस पार्टी के नाम से ही हंसी आती हैं, नाम हैं - आजसू यानी आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, पर सच्चाई ये हैं कि इसके जितने भी विधायक हैं वे स्टूडेंट्स हैं ही नहीं, विशुद्ध राजनीतिबाज हैं, जो हमेशा सत्ता से चिपककर, सत्ता की राशि, अपने हित में डकार जाते हैं, ये वहीं पार्टी हैं जो बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन और मधु कोड़ा के साथ भी सत्तासुख भोगी। ये सत्ता के बिना एक पल रह ही नहीं सकती, और ये झारखंड को महान बनाने की बात करती हैं। हां भाई आजकल ऐसे ही लोग तो देश व समाज का निर्माण करते हैं, क्योंकि आजकल इनकी संख्या बहुतायत हैं और लोकतंत्र में वहीं आगे बढ़ता हैं, जिनकी संख्या सर्वाधिक हैं. तो चलो भ्रष्ट आचरण अपनाकर, खूब पैसे लूटाकर, आम जनता को दिग्भ्रमित करें और वोट लेकर, सत्ता का परम सुख प्राप्त करें, क्योंकि जब मीडिया सत्ता में आने के पहले ही, उनकी आरती उतार रही हैं तो सत्ता आने के बाद तो उनके आगे साष्टांग दंडवत् करेगी।

Saturday, January 19, 2013

रांची में एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का आगाज, ये साली क्रिकेट पास जो न कराये.................

ये साली क्रिकेट पास जो न कराये........। आम जनता, मीडियाकर्मियों और माननीय विधायकों को पता नहीं क्या - क्या बना दिया, इस क्रिकेट पास और टिकट ने। गर आम जनता की बात करें तो, इस क्रिकेट पास के लिए के लिए तो नहीं, बल्कि क्रिकेटरों की एक झलक पाने के लिए, यहां की जनता पुलिस की मार तक खा चुकी, यहीं नहीं अपना पैंट तक उतरवा चुकी हैं, जबकि क्रिकेट की एक झलक पाने के लिए, एक अदद क्रिकेट के लिए, महंगाई तक को चुनौती दे डाली हैं, रांची की जनता ने। गर आप रांची आये तो देख सकते हैं, क्रिकेट की दीवानी यहां की जनता को, जो इस महंगाई में क्रिकेट मैच देखने के लिए बीस- बीस हजार रुपये में, टिकट ब्लैक में खरीदकर, क्रिकेट को इंज्वाय किया हैं। ये तो रही जनता और अब बात करते हैं मीडिया की। 
बात -बात में राजनीतिज्ञों और कारपोरेट जगत पर बरसनेवाली यहां की मीडिया और उनमें कार्यरत पत्रकारों और छायाकारों को भी कम नहीं झेलना पड़ा हैं। टिकट और पास पाने के लिए, जेएससीए द्वारा धकियाएं गये ये लोग, जेएससीए के आलाधिकारियों की वंदना और  विशेष पूजा करने से भी बाज नहीं आये। एक अखबार ने तो जेएससीए के एक आलाधिकारी की चरणवंदना में एक सप्लीमेंट ही निकाल दिया और उसमें एक पेज विशेष रुप से उक्त आलाधिकारी को समर्पित कर दिया। जिसके एवज में उक्त आलाधिकारी ने उक्त अखबार पर विशेष कृपा भी बरसायी। इसी तरह एक और अखबार, जो अपने को कारपोरेट जगत का सबसे बड़ा अखबार मानता हैं,  आज के दिन उसने जेएससीए के एक आलाधिकारी का बयान छापकर, अपनी मौन आराधना और वंदना उक्त आलाधिकारी के प्रति जगजाहिर कर दी हैं। पर जिन अखबारों व मीडिया को पास व टिकट नहीं मिले, उन्होंने जमकर, जेएससीए पर बरसना शुरु कर दिया। यहीं नहीं, खोद - खोदकर ऐसे ऐसे समाचार छापे गये, जिससे उक्त आलाधिकारी के चेहरे पर हवांइयां उड़ी होगी, इसकी संभावना कम ही दिखती हैं, क्योंकि फिलहाल, उस व्यक्ति के सितारे बुलंद हैं, और जब सितारे बुलंद होते हैं तो आप कुछ भी कर लें। उसे कुछ भी नहीं होता। लेकिन ये सितारे बराबर बुलंद रहेंगे, इसकी संभावना कम ही रहती हैं, क्योंकि रावण और कंस के सितारे भी इसी तरह कभी बुलंद हुआ करते थे, पर जब सितारें उनके गर्दिश में पड़े तो वे भी कहीं के नहीं रहे। 
आज एक अखबार ने लिखा हैं झारखंड में चार हजार करोड़ से अधिक के घोटाले के मास्टरमाइंड संजय चौधरी का पासपोर्ट आइपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी की सिफारिश पर ही बना था। इन्होंने ही 2004 में रांची पासपोर्ट कार्यालय को चिट्ठी लिखी थी। दिल्ली की सीबीआई टीम की जांच में इसका खुलासा हुआ हैं। इसी अखबार ने ये भी प्रकाशित किया हैं कि गुरुजी ने क्रिकेट स्टेडियम की नींव रखी थी पर स्टेडियम के उद्घघाटन में उक्त अधिकारी ने शिबू सोरेन को पूछना तक उचित नहीं समझा।  अखबार ने ये भी लिखा हैं कि स्टेडियम का उद्घाटन अधिकारियों का आयोजन बनकर रह गया। साथ ही स्पोर्टस पेज पर दो आईपीएस की लड़ाई में धूल धूसरित हुआ - कीनन स्टेडियम जैसे आलेख छापकर, अमिताभ चौधरी की बैंड बजा दी हैं। इस अखबार ने जो भी लिखा हैं, उसकी दाद देनी होगी, कि उसने ऐसा कर के एक ऐसे व्यक्ति को चुनौती दे डाली हैं, जिसका ख्वाब बहुत ही उंचा हैं, जो अब राजनीति में भी उतरकर, अपना लोहा मनवाने को उत्सुक हैं, पर जैसे खेल में कामयाब हुआ, वैसे राजनीति में भी कामयाब हो जायेगा, इसकी संभावना कम दिखती हैं, क्योंकि राजनीति में उससे ज्यादा की घटिया सोच रखनेवाले लोग पहले से ही विद्यमान हैं।
किसकी क्या सोच हैं, वह कितनी दूर जा सकता हैं, उससे देश व समाज का कितना भला होगा। उसका अंदाजा लगाना बहुत ही आसान हैं। बिहार में हमारी मां बहनें, चावल पका या नहीं, इसका अंदाजा, तसले पर उबल रहे चावल के एक दो कण को अंगूलियों पर रखकर, उसे मसल कर, पता लगा लेती हैं। ठीक उसी प्रकार जेएससीए कैसे-कैसे लोगों के हाथों में हैं, वह तो जेएससीए के आलाधिकारियों के आचरण से पता लग जाता हैं, उसके गतिविधियों से पता लग जाता हैं। जरा जेएससीए की कारगुजारियां देखिये ------------
1. यहां के जेएससीए के आलाधिकारियों ने पैसे लेकर, उद्घाटन समारोह के सीधा प्रसारण एक चैनल के हाथों बेच दिया। नतीजा लोग, उद्घाटन समारोह को ठीक से नहीं देख पाये। विजूयल इतना घटिया आ रहा था कि जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं।
2. उद्घाटन समारोह में राज्य के सभी आइपीएस व आइएएस आलाधिकारियों व उनके परिवारों को आमंत्रित किया गया था, जो बचे उसमे गर्वनर और कार्यवाहक मुख्यमंत्री के परिवारों ने कब्जा जमाया। आम जनता इस पूरे उद्घाटन समारोह से दूर रही। वो जनता, जिसकी दुहाई, उद्घाटन समारोह के अंदर भाषण करनेवाले महानुभाव बारंबार दे रहे थे।
3. जेएससीए के एक आलाधिकारी ने अपने घर में क्रिकेटरों को बुलाया। इसकी महक पत्रकारों को लगी। पत्रकार जब उक्त आलाधिकारी के घर गये। तब वहां पहुंचे पत्रकारों और छायाकारों को धकियाने में लग गये, वहां कार्यरत पुलिस अधिकारी। ये इशारा भी मिला था, जेएससीए के आलाधिकारियों द्वारा कि - पत्रकारों को सबक सिखाओ।
4. जेएससीए के एक आलाधिकारी ने आनेवाले समय में लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर नजर ऱखकर, जमकर अपने चहेतों को क्रिकेट पास रेवड़िय़ों की तरह बांटी, और माननीय विधायकों और अन्य सम्मानित लोगों को ठेंगा दिखा दिया।
5. हद तो तब हो गयी, जब उक्त आलाधिकारी ने एक अखबार में ये बयान दे दिया कि उसने उनलोगों को पास दे दिया हैं, जो सम्मानित हैं। यानी जिन लोगों को उसने पास दिलवाया, वे सम्मानित हैं और जिन्हें नहीं दिलवाया वो अपमानित। अर्थात सम्मान देने और लेने का उसने दुकान खोल लिया हैं क्या।
बात ये हैं कि हर व्यक्ति की अपनी महत्वाकांक्षा होती हैं। महत्वाकांक्षा होनी भी चाहिए, पर किसी को नीचे गिराने की अंदर भावना पालना, ठीक नहीं, क्योंकि ये ही एक भावना, किसी भी व्यक्ति, संस्थान व समाज को नीचे ले जाने के लिए काफी होती हैं। फिर भी बहुत सारी गड़बड़ियों और संभावनाओं के बीच रांची में एकदिवसीय क्रिकेट नजर आया। इसकी हमें भी खुशी हैं।

Friday, April 13, 2012

वाह री मीडिया.......................

कल तक निर्मल बाबा को इसी मीडिया ने सर आंखों पर बिठाया और आज यहीं मीडिया उनकी खिल्ली उड़ाने में लग गयी। खिल्ली ऐसे उड़ा रही हैं, जैसे लगता हैं कि इस मीडिया को निर्मल बाबा की तरह ब्रह्मज्ञान अथवा परमज्ञान प्राप्त हो गया हो। निर्मलबाबा के बारे में जिनको थोड़ी सी भी जानकारी हैं वे बेझिझक कहते हैं कि निर्मल बाबा मीडिया की नाजायज देन हैं। इसी मीडिया ने अपने सिर्फ चंद रुपयों की लालच के खातिर अपना स्लॉट बेचा और बाबा थोड़े ही दिन में सात समंदर पार पहुंच गये। लोकप्रियता ऐसी की, आज ये मीडिया लाख उसकी आलोचना कर दें, धज्जियां उड़ा दें, पर निर्मल बाबा के भक्तों पर उसका कोई असर नहीं दीख रहा। अब तो निर्मल बाबा के भक्त इन्हें ही देख लेने की योजना बना रहे हैं, कुछ तो अदालत तक की देख लेने की बात कह रहे हैं। ये कैसी विडम्बना हैं............................
हम आपको बता दें कि जिस देश में, अकर्मण्यवादियों, बाह्यडबंरों पर रिझनेवालों तथा चमत्कार को माननेवालों की जनसंख्या रहती हैं, वहां निर्मलबाबा, रामदेवबाबा और न जाने कितने झोलझाल बाबाओं की सियासत चल पड़ती हैं, जिसके कारण पूरा देश बर्बादी के कगार पर आ खड़ा होता हैं। कल यानी गुरुवार देर रात तक एक राष्ट्रीय चैनल ने अपने आपको निर्मल बाबा से अलग करने की बेवकूफी भरी हरकत की। उसने भी निर्मल बाबा की तरह उटपुटांग हरकते अपने चैनल के माध्यम से करने की कोशिश की, पर खुद ये नहीं बताया कि.....................
क. आखिर वो 12 मई से निर्मल बाबा के इस विज्ञापन को बंद करने का क्यों ऐलान किया, तत्काल प्रभाव से उसने ये विज्ञापन क्यों नहीं बंद किया।
ख. जिस निर्मल बाबा की हरकतों को वो दिखाया करता था, उसे आज वो विज्ञापन कह रहा हैं, उसे ये परमज्ञान पहले क्यों नहीं प्राप्त हुआ।
ग. आखिर उसके इस निर्मल बाबा के हरकतों के प्रसारण करने से जो लाखों जनता की बुद्धि भ्रष्ट हुई, उसके लिए वह अपनी जिम्मेवारी क्यों नहीं लेता।
घ. आखिर उसकी इन हरकतों से जो आनेवाली पीढ़ी प्रभावित हुई, मूर्खता और अकर्मण्यता की शिकार हुई, उसके लिए वो पूरे देश से क्षमा क्यों नहीं मांगता।
ड. इस चैनल ने कल इतनी बड़ी बड़ी गलतियां और झूठ बोले, जिसे देख कर कोई भी सभ्य समाज का बुद्धिजीवी खुद शर्मसार हो जायेगा, और कहेगा कि ये भी टीआरपी का ही चक्कर हैं, यानी येन केन प्रकारेण, चाहे निर्मल बाबा से पैसे लेकर, उसकी बातें चैनल में प्रसारित करों अथवा उसकी आलोचना, टीआरपी तो आ ही रही हैं, क्योकि व्यवसाय में मुनाफा तब भी होगा और रही बात जनता की, तो उसने ठेका थोड़े ही ले रखा है। भाड़ में जाये, जनता हम अपनी दुकान चालू रखे और दुकान में तो गड़बड़ियां चलती ही हैं, उदाहरणस्वरुप जब आप एक किलो सरसो तेल के बदले नौ सौ ग्राम तेल पैक कर दे।
इधर रांची में भी सभी प्रिंट मीडिया को परमज्ञान प्राप्त हो गया हैं। दिये जा रहे हैं -- निर्मल बाबा के खिलाफ, पर रामदेवबाबा के खिलाफ लिखने में इन्हें सांप सूंघ जाता हैं। हालांकि दोनों का काम वहीं हैं। एक बेतुकी बातें करके पैसे ऐंठ रहा हैं तो दूसरा सपने दिखाकर पैसे ऐठ रहा हैं और खुद शून्य से शिखर पर पहुंच चुका हैं। आजकल निर्मल बाबा पर लिखनेवालों की बाढ़ भी आ गयी हैं। हम तो इंदर सिंह नामधारी को बधाई देंगे कि वे अपने साले को बधाई दें कि उनके कारण, उनका नाम भी आज चर्चाओं में हैं। साले के नाम व कारनामों से विख्यात होनेवाले शायद ये पहले राजनीतिज्ञ होंगे। जो बिना पैसे दिये ही, सभी चैनलों और अखबारों में धूम मचा रहे हैं। इंदर सिंह नामधारी को भी याद होगा कि यहीं अखबार वाले जब वे चुनाव लड़ रहे थे, तो उनसे पैसे के लिए देह छिल दिये थे, कि गर वे पैसे नहीं देंगे विज्ञापन के लिए, तो उनका निगेटिव प्रचार होगा। पैसे देंगे तो बस उनकी जय जयकार होगी और इससे वे चुनावी वैतरणी लोकसभा की पार कर जायेंगे। ये अलग बात हैं कि उस दिन प्रिंट मीडिया की इस ब्लैकमेलिंग के शिकार, वे बन पाये थे या नहीं। ये नामधारी ही बेहतर बता सकते हैं, पर फिर भी, आज वे बिना पैसों के सुर्खियां बटोर रहे हैं। मैं तो उन्हें दिल से बधाई देता हैं। आज रांची के सारे अखबार कोई पहले तो कोई बाद में निर्मल बाबा के खिलाफ लिखे जा रहा हैं, पर उन अखबारों से पूछिये कि रामदेव के बारे में क्या ख्याल हैं------------------------------
जरा रांची के अखबारों से पूछिये -----------------
क. कल तक योग के नाम कपालभांति करानेवाले बाबा रामदेव, योग के बाद चूर्ण, चटनी और च्यवनप्राश और अब किराना का दुकान नहीं खोल रखा हैं। क्या संत का काम किराना दुकान खोलना हैं। क्या देश में रामदेव को छोड़कर कोई पूर्व के ऐसे संत हैं जिसने किराना का दुकान खोल कर टाटा और अंबानी के कगार पर आ खड़ा हुआ हो। संत तो कबीर थे कहां करते थे -- मन लागा मेरा यार फकीरी में। संत तो गांधी थे, जिन्हें जैसे ही भारत की वस्तुस्थिति का ज्ञान हुआ, लंगोटी धारण कर ली, मृत्युपर्यंत लंगोटी धारण किये रहे, धन से कोई लगाव नहीं था। संत तो धनबाद के ए के राय हैं, जो तीन - तीन बार विधायक और तीन - तीन बार सांसद रहे, पर कभी भी वेतन तो दूर पेंशन तक नहीं लिया।
ख. क्या ये सही नहीं हैं कि रामदेव ने रांची में आज से छह - सात साल पहले ऐलान किया था कि भारत आगामी पांच सालों में महाशक्ति बन जायेगा। एक अखबार ने इसे सुर्खियां बनाया था, वो भी प्रथम पृष्ठ पर। क्या भारत महाशक्ति बन गया। नहीं बना तो ऐसी वाणी संत के हो ही नहीं सकते। क्योंकि संत जो बोलता हैं, वहीं होता हैं। मन, वचन और कर्म से संत एक होते हैं।
ग. देश में रामदेव ऐसे पहले संत हैं, जो पुलिस के डर से लड़कियों/ स्त्रियों की पोशाक पहनकर भाग निकले। यानी देश में इन्होंने संतों को कायरों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया। पर यहां के अखबार रामदेव की पोल नहीं खोलते..................। शायद उन्हें रामदेव में देश का भविष्य दिखाई पड़ता हैं।
ऐसे तो देश में कई ऐसे संत हैं, जो खुद को संत कहते हैं पर उनके बयान और हरकत देखिये तो साफ लगता हैं कि संत का लबादा ओढ़े ये पक्के व्यापारी हैं। जो टाटा, अंबानी और मित्तल जैसे कई व्यवासायिक घरानों को भी मात देने में आगे हैं।
एक संत हैं -- आसाराम बापू भारत में रहते हैं और सामान्य जन को भरी सभा में गाली दे देते हैं और खुद को आध्यात्मिक संत कहलाने में गर्व महसूस करते हैं।
एक संत हैं - श्रीश्री रविशंकर भारत में ही रहते हैं और उन्हें सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चे नक्सली हो गये प्रतीत होते हैं। पर देश व मेरे प्रदेश की मीडिया को इसकी जानकारी होते हुए भी इनके खिलाफ बोलने व लिखने में परहेज होता हैं। शायद उन्हें पता हैं कि चूहे और बिल्ली की कहानी। और अंत में उस कहानी का सारांश कि आखिर बिल्ली की गले में घंटी कौन बांधे...................।

Sunday, March 25, 2012

मीडिया से देश को खतरा -------------------------


ये बात जो लोग मीडिया में हैं। उन्हें अटपटा सा लगे, या वो मानने को तैयार न हो, पर सच्चाई यहीं हैं कि आज मीडिया से देश को खतरा उत्पन्न हो गया हैं, ऐसे में जरुरी हैं कि सरकार मीडिया पर लगाम लगाये, उन्हें नियंत्रित करें अथवा कुछ ऐसे उपाय ढूढें ताकि देश व समाज को मीडिया की खतरों से बचाया जाये। मीडिया से देश व समाज को कैसे खतरा उत्पन्न हो गया हैं। उसका एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। जिस पर मीडिया के लोगों को ही खुद आत्ममंथन करने की जरुरत हैं।ज्वलंत उदाहरण -- आज ज्यादातर राष्ट्रीय चैनल, अपनी महत्वाकांक्षा को पाने के लिए, एकमात्र लक्ष्य रुपये कमाने के लिए आधे घंटे का या रुपये पर जितना मन चाहे, उतने घंटे का स्लॉट बेच दे रहे हैं और इन स्लॉटों में क्या होता हैं। आप खुद देखिये। एक ठग आता हैं। अपने को बाबा कहता हैं। और ठग विद्या द्वारा पूरे देश में अपना जादू चलाकर, खुद को प्रतिष्ठित कर लेता हैं। यानी कल तक जिस व्यक्ति को कोई नहीं जानता हैं,वो व्यक्ति पल भर में ही, पूरे देश में इस प्रकार अपनी धर्मसत्ता स्थापित कर लेता हैं कि, इन राष्ट्रीय चैनलों को मुंहमांगी रकम देकर, वो बाबा अपनी जयजयकार करवाता हैं। फिलहाल देश में दो बाबाओं ने ऐसी कमाल दिखायी हैं कि एक बाबा तो बनिये की दुकान से लेकर, चैनल और दवाओं की दुकान तक खोल दी हैं, जबकि दुसरा बाबा अपना थर्ड आई खोलकर, पल भर में अनारक्षित रेलवे टिकट को कन्फर्म तक करा देता हैं, यहीं नहीं खानेवाले बिस्कुट का कारोबार करने वाले व्यक्ति को वो सोने का बिस्कुट का कारोबार तक करनेवाला बनाने का दावा कर देता हैं, यहीं नहीं इस बाबा ने तो हद कर दी हैं.........हर प्रश्न का उटपुटांग जवाब देकर, स्वयं को प्रतिष्ठित कर देता हैं। ऐसे में इन बाबाओं को देख, गोस्वामी तुलसीदास की वो पंक्ति याद आ जाती हैं, वो पंक्ति जो श्रीरामचरितमानस में लिखा हैं -- पंडित वो हि सो गाल बजावा। यानी कलयुग में जो जितना गाल बजायेगा, वो उतना बड़ा ज्ञानी कहलायेगा। एक नहीं कई चैनल हैं -- जो इस प्रकार के गोरखधंधे में शामिल हैं, पर सरकार इन पर कार्रवाई नहीं करती। कमाल हैं इन बाबाओं ने इन चैनलों की टीआरपी भी बढ़ा दी हैं, यानी एक पंथ दो काज। पहला की बाबा से रुपये भी मिल गये और टीआरपी भी मिल गयी। जबकि ये चैनल, रजिस्ट्रेशन कराने के समय़ सिर्फ न्यूज चलाने की बात करते हैं, पर न्यूज के नाम पर ये क्या कर रहे हैं, सभी को पता हैं। आज देश के विभिन्न गांवों और शहरों में देश के महान संत -- कबीर, नानक, रविदास, नामदेव, तुकाराम, तुलसीदास, मीराबाई, नरसीमेहता, सुरदास, रसखान आदि के चित्र नहीं बिकते या इन्हें जाननेवाले लोगों की संख्या नगण्य हैं, पर टीवी वाले ठग बाबा के फोटो खूलेआम बिक रहे हैं, उन्हें लोग जानते हैं। हमारे देश में जितने भी संत हुए, उन्होंने देश को सिर्फ दिया, क्योंकि संत केवल देता हैं, वो देश से लेता नहीं। ठीक उसी प्रकार जैसे गंगा बहती रहती हैं, वो हमेशा उपकार करती हैं, चाहे लोग उसमें मैला बहाये अथवा उससे खुद को तृप्त करने का कार्य करें। ऐसे होते हैं संत। पर आज के संत को देखिये, बाबाओं को देखिये। ये बाबा टेंट - मार्चेंट के कारोबारियों से शादी में लगनेवाले एक कुर्सी पर बैठता हैं, तीन तसिया का जो खेल होता हैं, ठीक उसी प्रकार दस - बीस लोगों को जूगार करता हैं। जो बाबा के ट्रिक के अनुसार सवाल करता हैं और बाबा भी उसी प्रकार ट्रिक के अनुसार जवाब देता हैं, और इसी ट्रिक के जाल में, टीवी देख रहा, आम आदमी फंस जाता हैं, और अपनी जिंदगी के, मेहनत के सारे पैसे, इन ठगों पर लूटा देता हैं, वह भी जयजयकार कर। मैं जहां रहता हूं, वहां एक महिला रहती हैं, वो अपने माता - पिता को कभी सम्मान नहीं देती और न ही पति को सम्मान करती हैं, पर जरा देखिये इन्हें, जैसे ही सुबह होता हैं, ये टीवी खोलकर, उक्त ठग को देखने के लिए, सुनने के लिए दोनों हाथ जोड़कर बैठ जाती हैं। ये तो आजकल टीवी वाले इस ठग की प्रचार प्रसार भी कर रही हैं। एक दिन मेरी पत्नी ने कहा कि टीवी वाले थर्डआई वाले बाबा ने कहा है कि घर में शिवलिंग नहीं रखना चाहिए, जिसे सुनकर सभी टीवी देखनेवाले लोगों ने अपने घर के शिवलिंग मंदिर में रख दिये। मैंने अपनी पत्नी से पूछा - तुम्हारा क्या विचार हैं। उनका कहना था कि जब एकलव्य, द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर, स्वंय को प्रतिष्ठित करा लेता हैं, तो भला मैं, इस एकलव्य की गुणग्राही बातों को त्याग, एक ठग की बात पर क्यूं जाउं। मेरा हृदय प्रसन्न हो गया। चलों कोई तो हैं, जो इन ठगों से खुद को अलग कर रहा हैं, पर ऐसे लोगों की संख्या कितनी हैं। सवाल तो ये हैं......................।यहीं नहीं एक दक्षिण के चैनल से बाबा आते हैं, शनि के नाम पर खूब डराते हैं। पहले वे दिल्ली के राष्ट्रीय चैनलों पर आकर आम जनता को खूब डरा चुके हैं, पर हमारे घर के बच्चे, इनसे नहीं डरते। जैसे ही चैनल पर आते हैं। हमारे बच्चे, हमें बुलायेंगे, बाबा आ गये, देखिये- सुनिये और हंसते हंसते लोट पोट हो जाईये। सचमुच में, ये बाबा के हाव - भाव, फिल्मों में काम करनेवाले हास्य कलाकार, जगदीप, असरानी, धूमल व राजेन्द्रनाथ जैसे लगते हैं, और बात भी वहीं। यानी पूरे देश में आजकल टीवी चैनलों का एक ही कार्यक्रम बन गया हैं। देश व समाज भाड़ में जाये, पैसे कैसे कमाये जाये। ये ध्यान में रखकर स्लॉट बेचो, और अपने देश में धर्म कुछ ज्यादा ही बिकता हैं, और गर हिंन्दु हैं तो कहना ही नहीं, क्योंकि अन्य धर्मों में बाबाओं की उतनी पूछ नहीं, पर हिन्दुओं में बाबाओं की फौज हैं, किसी को पकड़ लो, पैसे ले लो, पूरे देश में बिकवाने का जिम्मा ले लो और शुरु हो जाओ। अभी तो थर्ड आई वाले बाबा खूब दिखाई पड़ रहे हैं, कल फोर्थ आई और फाइव तथा सिक्स आई वाले बाबा भी दिखाई पड़ जाये। तो इसे अतिश्योक्ति न समझेंगे। यहीं नहीं, आजतक हमें ये समझ में नहीं आया कि ये बाबाओं की फौज, शादी करा देती हैं, रेलवे टिकट कन्फर्म करा देती हैं, रोजगार दिला देती हैं, पर एक साधारण आदमी को प्रधानमंत्री क्यों नही बना देती। पूरे देश में जो गरीबी हैं, उसे फूंकमार कर दूर क्यों नहीं कर देती, देश में अशिक्षा जो फैली हैं, उसे फूंकमारकर दूर क्यों नहीं कर देती, या देश में जो भ्रष्टाचार पनपा हैं, उसे दूर क्यों नहीं करती और जब सारे समस्याओं का हल इन बाबाओं के पास हैं और टीवी वाले जो दिखाते हैं, वे टीवी वाले और बाबा इस समस्यारुपी शब्द को ही फूंकमार सदा क लिए क्यों नहीं मिटा देती। और जब ये ऐसा नहीं कर सकते तो समझ लीजिये कि पूरी दाल काली हैं। इसका मतलब हैं कि मीडिया, देश के लिए खतरा बन चुकी हैं और इन खतरों से देश की युवाओं को, दो दो हाथ करने के लिए तैयार रहनी चाहिए।आज से कोई बीस साल पहले, कोई जर्नलिज्म की डिग्री लेने के लिए हाय तौबा नहीं मचती थी, पर आज देश के युवा मीडिया में जाने को कुछ ज्यादा ही आतुर हैं। टीवी के ग्लैमर ने इन्हें मीडिया की ओर ज्यादा झूकाया हैं और जहां ग्लैमर होता हैं, वहां गंदगी होती ही हैं, क्योंकि ये देश व समाज की रक्षा के लिए आये ही नहीं, ये तो आये हैं - ग्लैमर के लिए। तो ग्लैमर आयेगा कहां से। पैसों से। और पैसे आयेंगे कहां से। इन्हीं ठगों से, जिन्हें हम आजकल टीवी वाले बाबा के नाम से जानते हैं। अब तो हम ईश्वर से यहीं प्रार्थना करेंगे, कि हे ईश्वर, अपने देश व समाज को, आसन्न मीडिया के खतरों से बचाओं, नहीं तो देश बनने से रहा। चीन और पाकिस्तान को क्या जरुरत हैं - भारत पर हमले की। भारत को खोखला करने के लिए यहां की मीडिया और ठग बाबाओं की गाढ़ी दोस्ती काफी हैं, इस देश को धूल में मिलाने के लिए, देश के मानमर्दन के लिए।

Tuesday, February 21, 2012

वो करें तो साला कैरेक्टर ढीला हैं.............


कुछ दिन पहले, रांची से प्रकाशित एक तथाकथित अपने आपको देशभक्त, समाज को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत कहनेवाले एक अखबार के संपादक ने मुखपृष्ठ पर संपादकीय लिखा। वो संपादकीय केन्द्रित था -- कर्नाटक विधानसभा में अश्लील फिल्म देख रहे मंत्रियों तथा देश में फैल रहे भ्रष्टाचार और चरित्रहीनता पर। इस संपादकीय को देख ऐसा लगता हैं, जैसे कि संपादकीय लिखनेवाले व्यक्ति ने देश और समाज को अपने विचारों और लेखों तथा कार्यों से देश व समाज को नयी दिशा दी हैं। जबकि सच्चाई क्या हैं, जो भी व्यक्ति उक्त अखबार और उसके वेबसाईट को देखेगा तो शर्मसार हो जायेगा, साथ ही उसकी संपादकीय और बगुला भगत वाली कृत्यों से स्वयं को ठगा महसूस करेगा। जरा उसके संपादकीय को देखिये और उसके संस्थानों के कृत्यों को देखिये। आप समझ जायेंगे। मैं क्या कहना चाहता हूं। कमाल हैं। आप अखबारों में लिखते क्यों हो, उत्तर होगा - पढ़ने के लिए और वेबसाईट पर जो भी कुछ डालते हो, वो किसलिये। उत्तर हैं देखने और समझने के लिए। सबसे पहले इसी अखबार को देखिए। इसकी एक वेबसाईट हैं। जब आप इस वेवसाईट को खोलेंगे, तो इतनी गंदी- गंदी अश्लील चित्र मिलेंगी जो अश्लील फिल्मों को मात दें देगी। इस वेबसाईट में विभिन्न फिल्मों से जूड़ी अश्लील फिल्मों के कटिंग व्यापक रुप सें मिलेंगे। कई समाचार भी मिलेंगे जो सेक्स और सिर्फ सेक्स से ही जूड़ी रहती हैं। कई विदेशी मॉडलों और अभिनेत्रियों की नग्न तस्वीरे बहुतायत मिलेंगी। सेक्स और अश्लील समाचारों की तो ऐसी कड़िया इसमें हैं, कि पूछिये मत। यानी जो खुद गंदगी में भटकते हैं, उन्हें चिंता खाये जा रही हैं, देश और समाज की। पतित होते राजनीतिज्ञों और अधिकारियों की। सच्चाई ये हैं कि देश में जितने भी अखबार व मीडिया हाउस है, उसमें हाथों में लेकर गिनने के लिए एक ही दो लोग बचे हैं. जिन्हें हम चरित्रवान कह सकते हैं। सच्चाई ये हैं कि इन अखबारों और मीडिया हाउस की संपूर्णता से तकनीकी जांच करा ली जाये तो पता चलेगा कि राजनीतिज्ञों व अधिकारियों से ज्यादा अश्लील फिल्म और अश्लील खबरों को पढ़ने के शौकीन यहीं लोग हैं, जो अखबारों और मीडिया से जूड़े हैं। यानी चलनी दूसे सूप के जिन्हें बहत्तर छेद, ये करे तो रासलीला और दूसरा करें तो करेक्टर ढीला..............। पूरे देश के मीडिया हाउस में यहीं सब चल रहा हैं। देश में चरित्रवान पत्रकार, इस प्रकार से विलुप्त हो गये, जैसे देश के अभयारण्यों से चीता......। याद करिये एक समय था, जब चरित्रवान पत्रकारों की एक पौध हुआ करती थी, जब वे लिखते थे, तो इसका प्रभाव भी दिखता था। सरकार पर भी और जनता पर भी। आज देखिये ये घटियास्तर के लोग लिखते हैं पर उसका प्रभाव न के बराबर पड़ता हैं। क्यों, इस पर मंथन इन्हें खुद करना चाहिए। यहीं नहीं मैं कहता हूं कि देश में जितनें भी मीडिया हाउस हैं और जिनकी वेबसाईट हैं, सभी का एकमात्र काम यहीं रह गया हैं। भारतीय और विदेशी महिलाओं के अर्द्धनग्न तस्वीरें लोड करना और सेक्स से संबंधी समाचारों को प्रमुखता देना। ऐसे में कर्नाटक विधानसभा में मंत्रियों पर टिप्पणी करनेवाले या संपादकीय लिखनेवालों को क्या ये अधिकार हैं, कि उनके उपर कटाक्ष करें। अच्छा ये होता कि ये खुद अपना घर साफ सुथरा रखे ताकि उनके और उनके कार्यों से लोगों को सीख मिलती, ये क्या कि खुद करें तो रासलीला और दूसरा करें तो करेक्टर ढीला। ऐसे मैं एक बात में कह देना चाहता हूं कि देश में कहीं भी चरित्रहीनता की बातें आती हैं, उससे हर भारतीयों की सर शर्म से झूक जाती हैं, कारण कुछ भी हो, चाहे वो पत्रकार के कुकृत्य हो या राजनीतिज्ञों के कुकृत्य........................

Sunday, April 10, 2011

अन्ना, मीडिया और गांधी….!

जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी भी सदाचार अपनाया ही नहीं, उन्हें भ्रष्टाचार की चिंता सताती जा रही हैं। उन्हें देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और उससे प्रभावित होते विकास की तीव्र चिंता हैं। ये वे लोग हैं जो लाखों-करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों – खरबों में खेलते हैं। जिनकी दिन की शुरुआत ही भ्रष्टाचार और दिन की समाप्ति भ्रष्टाचार पर ही खत्म हो जाती हैं। इन्होंने आजकल गांधी नाम जप शुरु कर दिया हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे देश के गांवों – मुहल्लों में हरे राम संकीर्तन चल रहा होता हैं। आज से ठीक पांच दिन पहले अन्ना हजारे ने एक प्लान के तहत दिल्ली में लोकपाल विधेयक और भ्रष्टाचार मुद्दे पर आमरण – अनशन क्या शुरु किया। पूरे देश में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इनकी तुलना गांधी से कर दी। पूरे देश में गांधी और गांधीवाद तथा बाकी बचे तो अन्ना हजारे छाये रहे, लेकिन ये अन्ना खेतों और खलिहानों में नहीं, बल्कि सिर्फ अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही थे, इधर लगातार अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छाये रहने के कारण केन्द्र सरकार सकते में आ गयी, अंततः आनन फानन में अन्ना की सारी बातें केन्द्र द्वारा मान ली गयी । हालांकि जानकार ये भी कहते हैं कि केन्द्र सरकार और उसके समर्थकों ने एक कूटनीति के तहत इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कराये और ठीक एकदिवसीय वर्ल्ड कप के बाद इसे शुरु कराया और आईपीएल शुरु होने के पूर्व ही इस कार्यक्रम को समाप्त करने की योजना को मुर्त रुप दे दिया, क्योंकि ये जानते थे कि मीडिया की भी अपनी मजबूरियां हैं, और इसे आईपीएल शुरु होने के बाद, बड़ा मुद्दा मीडिया नहीं बना सकती। इसलिए देश में बड़े घरानों के सौजन्य से चल रहे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम कर रहे लाखों का मासिक वेतन उठानेवालों ने अन्ना हजारे के आमरण अनशन को हाईलाईट करना शुरु कर दिया और अन्ना हजारे की तुलना गांधी और उसके कार्यक्रमों की तुलना गांधीवाद से शुरु कर दी, साथ ही देश में एक तरह से ऐलान करा दिया कि अन्ना हजारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ दूसरी क्रांति शुरु कर दी हैं, लोगों को इनका साथ देने के लिए बिना विज्ञापन राशि लिए, विज्ञापन शुरु कर दी कि लोग समर्थन करे, इस महापुरुष का। जो बूढ़ा होते हुए भी, युवाओं जैसा काम कर रहा है। ये हल्ला और प्रोपेगंडा करनेवाले वे तथाकथित देश के मूर्धन्य पत्रकार थे, जो अपने मुफ्स्सिल संवाददाताओं के अरमानों का गला घोंटकर, उन्हें औने पौने पैसे देकर, खुद लाखों का वेतन उठाते हैं, और ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं। जो अपने अखबारों के प्रचार प्रसार में अरबों खर्च कर देते हैं ये कहकर कि अब घर में आपकी बीबी की नहीं, आपकी चलेगी मर्जी यानी नारी की स्वतंत्रता का हनन करने में भी, जिन्हें शर्म नहीं आती। वे लोग भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए संपादकीय तक लिख डाले थे। जो देश के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार इस प्रकार की हरकतें कर रहे थे, उनकी सोच और उनकी गिरगिट की तरह रंग बदलने की प्रवृति देख, हमें पूर्व के आंदोलन और उसकी वर्तमान अवस्था पर शर्म महसूस हो रही थी। जरा देखिये, अन्ना के आंदोलन का, आज अऩ्ना ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया पर उसके बदले में क्या उसने पाया। सिविल सोसाईटी की ओर से खुद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य बन गये हैं। जो ड्राफ्टिंग कमेटी बनी हैं, उसके अध्यक्ष शांति भूषण हैं तो बेटे प्रशांत भूषण सदस्य है। इस मुद्दे पर जब किसी ने अऩ्ना से सवाल किया तो अन्ना का कहना था कि दोनों ईमानदार थे, इसलिए उन्हें रखा गया। क्या देश में इन्हीं बाप बेटों में इनको सबसे ज्यादा ईमानदारी दिखी और देश के 121 करोंड़ों में कोई ईमानदार नहीं था। अरे जिसकी बुनियाद ही इतनी छिछोरी हो, तो वो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेगा। अरे गांधी के नाम को बेचकर अपनी दुकान चलानेवालो, जरा सोचों क्या गांधी ने अपने आंदोलन की कभी कीमत वसूली, जैसा कि अन्ना ने वसूला। खूद सदस्य बनकर। क्या गांधी ने कभी भी अपने जीवन में कोई पद पाया। गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के नाम पर इतना नौटंकी क्यों। जो लोग आंदोलन को मूर्तरुप दे रहे थे, जरा पूछिये कि उनकी पृष्ठभूमि क्या रही हैं, जो स्वामी अग्निवेश खुद नक्सलियों के साथ और उसके आंदोलन को प्रत्य़क्ष समर्थन देता हैं, क्या वो स्वामी हो सकता हैं। जो लोग कश्मीर के विघटनकारियों को समर्थन देने में अपनी शान समझते हैं, क्या वे भ्रष्टाचार के खिलाफ और गांधीवाद के समर्थन में कभी भी आगे आ सकते हैं गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के साथ इतनी बड़ी सौदेबाजी क्यों। मैं उनलोगों से पूछना चाहता हूं जिन्होंने इस नौटंकी को गांधीवाद कह डाला। क्या वे बता सकते हैं कि जिस प्रकार गांधी ने भारत में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका, क्या इस प्रकार की नौटंकी से अब देश में भ्रष्टाचार का खात्मा हो गया या हो जायेगा। अरे जिस देश में पढ़ाई के नाम पर क्लर्क बनाने और पैसे कमाने की मशीन बनाने की ट्रेनिंग शुरु हो गयी हो, वहां अब भगत सिंह और चंद्रशेखर कहां से पैदा होंगे, और जब ये पैदा ही नहीं होंगे तो फिर भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा। इतनी छोटी बात आंदोलनकरनेवाले लोगों को समझ में नहीं आती। गर नहीं समझ में आती तो वे जाने, पर यहां की जनता जानती हैं। इसीलिए देश के अन्य भागों में अन्ना के इस तथाकथित आंदोलन मे वे लोग शरीक हुए, जो किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, जिन्होंने मां भारती को पग-पग पर अपमानित करने का संकल्प कर रखा हैं। खेतों-खलिहानों अथवा विभिन्न कल कारखानों में काम करनेवाले या प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही काम करनेवाले उन पत्रकारों ने इस आंदोलन से अपनी दूरी बना ली थी, जो सच में बिना किसी शोर-शराबे के देश को नयी दिशा देने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं, जो देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए, कानून बनाने की बात नहीं, बल्कि खुद कानून बनने की कोशिश कर रहे हैं।

Thursday, March 31, 2011

बिहार, मीडिया और बारबालाएं….!

होली बीते कुछ ही दिन बीते हैं, लेकिन होली के दिन और उसके पहले अथवा होली के बाद, जो मीडिया में होली को केन्द्रित बारबालाओं के उपर बिहार से संबंधित समाचार आये। वो चौकानेवाले तो नहीं, पर चिंतन करनेलायक जरुर थे। ज्यादातर मीडिया ने खुलकर दिखायें कि बिहार में होली की संस्कृति को कैसे तारतार कर यहां के अधिकारी बार बालाओं के डांस का आनन्द ले रहे हैं। किसी ने आधे घंटे तो किसी ने इस पर एक घंटे का विशेष चला दिया तो किसी ने अपने फोन नंबर प्रसारित कर दिये कि दर्शक इस पर अपना विचार दे दे। ये वे लोग थे, जो बंद कमरों में वीडियो चलाकर, एडल्ट फिल्में देखने अथवा विभिन्न वेवसाईटों पर एडल्ट साईट देखने पर शर्म महसूस नहीं करते अथवा मुन्नी बदनाम हुई या शीला की जवानी फिल्मों पर डांस करने से ग़ुरेज नहीं करते और ही मुन्नी बदनाम हुई अथवा शीला की जवानी जैसे गाने इन्हें अश्लील लगती हैं, पर जैसे ही कोई लड़कियां अथवा बार बालाएं इन्हीं गीतों पर चौक चौराहों पर डांस कर रही होती हैं तो इन्हें उसमें अश्लीलता, बिहार की संस्कृति पर चोट जैसी चीजें दिखाई पड़ने लगती हैं। कमाल हैबात वहीं हुई, चलनी दूसे सूप के, जिन्हें बहत्तर छेद। यहीं नहीं बिहार के किसी किसी इलाकें में तो कई अधिकारियों ने बिहार दिवस और होली का एकसाथ आनन्द लिया, इन्होंने देखा कि जब बिहार दिवस मनाना ही हैं, नाचगाना करना ही हैं, पैसा सरकारी खर्च होना ही हैं तो फिर क्यूं बहती गंगा में हाथ धो लिया जाय, इसलिए कई लोगों ने अपने कार्यालय में ही बारबालाओं को बुलाकर गीत संगीत का आनन्द लिया, उन पत्रकारों को भी बुलाएं जिनकी इसमें गहरी रुचि हैं, इन पत्रकारों ने भी जमकर रुचि ली और ठुमके लगाये पर ठुमके लगाने के बाद जैसे ही उन्हें पत्रकारिता की याद आयी तो इसे अपने चैनलों तक भेज दिया ताकि इसके आधार पर कुछ कमायी भी हो जाये। इधर डेस्क पर बैठे लोगों ने देखा कि ये तो समाचार हैं, बिकनेवाला आयटम हैं, तो उन्होंने बिहार की संस्कृति और अश्लीलता पर दिखाकर लगे व्याख्यान देने, जिन्हें अश्लील साईट और अश्लील फिल्में देखने का शुरु से ही शौक रहा हैं।
ऐसे तो हमारे देश में इस प्रकार के गीत और संगीत अथवा नृत्य कोई पहली बार नहीं हुए हैं, हमेशा से चलते रहे हैं, जिनकी जो पसंद हैं, उसमें रुचि लेकर वे डूवकी लगाते हैं, पर इन बारबालाओं के माध्यम से पूरे देश के घरों में चुपके से दिखाने का कुकर्म और प्रयास किसने किया ये तो भारत के और बिहार के इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करनेवाले मान्यवर ही बेहतर बता सकते हैं, पर किया क्या जाये। का पर करहू शृंगार, पुरुष मोर आन्हर।
आश्चर्य इस बात की हैकि क्या मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी में अश्लीलता नहीं हैं, फिल्म खलनायक में चोली के पीछे क्या हैं, क्या ये अश्लील नहीं हैं। होता तो ये हैं कि सदियों से लोग अश्लीलता को अपनी अपनी आंखों से नापते और देखते हैं और उसके बाद व्याख्यान देते हैँ और इसके बाद शुरु होता हैं एक दूसरे को नीचा दिखाने का आरोप प्रत्यारोप। हालांकि इसका असर कुछ होता नहीं हैं। भले ही जहां बार बालाओं के डांस हुए, बिहार सरकार ने उन अधिकारियों पर गाज भी गिराये पर क्या इस प्रकार के गाज गिराने से उन अधिकारियों के चरित्र सुधर जायेंगे।
हुआ तो ये हें कि पूरे देश के गांव शहरों के कुएं और तालाब, नदियों और सागरों में भांग पड़ गयी हैं। सभी इसमें से एक लोटा जल निकालकर स्वयं को तृप्त कर रहे हैं, ऐसे में अश्लीलता पर कोई टिप्पणी करें तो हमें आश्चर्य लगता हैं. भाई, जब महर्षि विश्वामित्र, मेनका के आगे झूक सकते हैं, जब महर्षि पराशर, सत्यवती के रुप लावण्य को देख मोहित हो सकते है तो ये बार बालाएं किस मर्ज की दवा हैं। ये तो सामान्य लोगों को अपने रुप सौंदर्य और लटकोंझटकों से सिर्फ उनके दिलों को मरहम लगा रही होती हैं। अरे याद करियेभोजपुरी गायक बलेसर को, जो कहते हैं -- काशी में माजा, काबा में माजा, ही माजा बरसाने में, अरे तीन बजे आके जगइहे पतरकी सुतल रहब खरियानी में....................
इसी से पता लग जाता हैं कि सामान्य लोगों की पहली पसंद और आखिरी पसंद क्या हैं। कोई भी व्यक्ति आनन्द की खोज में हैं, पर वो आनन्द उसे कहां मिल रहा हैं, किस रुप में मिल रहा हैं, जिसे वो प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है, उसे वो लेकर रहेगा, चाहे आप झूठी व्याख्यान देकर स्वयं को स्वामी इलेक्ट्रानिकानंद अथवा प्रिंटानंद की उपाधि से विभूषित होने का मन में ख्याल ही क्यूं रखे.

Friday, November 12, 2010

एहि सूर्य ..........

( छठ पर विशेष )
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्तया गृहाण अर्घ्यं दिवाकर।।

जब से सृष्टि बनी तभी से मनुष्य ने प्रकृति द्वारा प्रदत्त हर वस्तूओं को जानने की कोशिश की, और अपने अपने ढंग से परिभाषा गढ़नी शुरु की। जब जब कार्तिकशुक्ल रविषष्ठी व्रत आता हैं, जिसे सामान्य जन छठ व्रत कहते हैं, अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छठव्रत से संबंधित मनगढ़ंत बातें छपनी और दिखानी शुरु हो जाती हैं, ऐसी ऐसी बातें, जिनका छठ से कोई लेना देना नहीं होता, और इस कारण से आनेवाली नयी पीढ़ी, इस छठ के आध्यात्मिक पक्ष से विमुख होती जा रही हैं, लेकिन जब इन्हीं से संबंधित उन समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों से ये पूछे कि आखिर उनके पास जो वे लिख रहे हैं या दिखा रहे हैं, उसके क्या शास्त्रीय आधार है, तो वे तुरंत ये कहकर पल्ले झाड़ लेंगे कि इससे संपादक का कोई लेना देना नहीं, पर क्या संपादक को ये अधिकार हैं कि वे अपनी दकियानूसी विचारधाराओं और अविश्वसनीय आलेखों और प्रवचनों से आम लोगों की बुद्धि को प्रभावित कर दें। खैर, जो इन्हें करना था, कर चुके हैं, पर आम जनता को ये जानना अवश्य चाहिए कि आखिर ये छठ व्रत क्या हैं और इसके वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार क्या हैं.....
सर्वप्रथम वैज्ञानिक पक्ष.......
सूर्य क्या है........?

सामान्य सा उत्तर हैं कि सूर्य ग्रह नहीं हैं, यह एक तारा हैं, जो सामान्य तारों की अपेक्षा पृथ्वी के नजदीक हैं और इसी से पृथ्वी प्रकाशित होती हैं और अन्य नौ ग्रह इसके चारों और चक्कर लगाते हैं।
कुछ इस प्रकार भी इसे परिभाषित कर सकते हैं कि सूर्य उच्च तापक्रम वाले अंसख्य पिंडों से बना हैं, इसमें मुख्यतः हाईड्रोजन होती हैं। सूर्य का व्यास पृथ्वी से 109 गुणा बड़ा है, और इसका भार पृथ्वी से 3,30,000 गुणा अधिक है। परंतु सूर्य का घनत्व पृथ्वी की तुलना में केवल एक चौथाई है। वैज्ञानिकों की माने तो करीब 10.5 अरब वर्ष पहले समस्त अंतरिक्ष में फैले गैस के बादल विभिन्न स्थानों पर निकट आये, धीरे-धीरे विभिन्न स्थानों पर वे पास आते गये। गैस के बादलों की ये गेंदे समय के साथ दबती गयीं। और जैसे जैसे उनका तापमान बढ़ता गया, उनमें से हरेक गेंद एक चमकीला सितारा बन गयी। इस प्रकार अंसख्य तारे बने, जिनमें से हमारा सूर्य भी एक था।
वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि करीब 15 अरब वर्ष पहले, एक उंचे तापमान और घनत्व के बड़े धमाके के कारण यह अंतरिक्ष बना, जहां हम आज है। जैसे-जैसे अंतरिक्ष फैला, वैसे-वैसे तापमान ठंडा होने लगा। विभिन्न प्रकार के पदार्थ और विकिरण उत्पन्न होने लगे। जैसे जैसे यह और बड़ा हुआ, गैस के दो प्रकार के बादल बने – एक में गैस का घनत्व अधिक था, दूसरे में गैस का घनत्व कम था। अंत में अतरिक्ष में तैरते गैसे के ये बादल और पदार्थ कुछ स्थानों पर पास आये और अनेक आकाशगंगाएं बनी। इनमें से एक आकाशगंगा में एक अकेला सितारा बहुत तेजी से चमकने लगा। ये चमकता तारा हमारा सूर्य बना और इसके चारों और मंडराते हुए गैस के बादलों ने ही निकट आकर अन्य ग्रहों और पृथ्वी को बनाया। इस प्रकार माना जाता हैं कि सूर्य आज से कोई 460 करोड़ वर्ष पहले बना हुआ होगा।
वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि वर्तमान सूर्य हाईड्रोजन गैस के जलने के कारण लगातार गर्मी और प्रकाश दे रहा है। सूर्य के क्रोड में हाईड्रोजन लगातार जलकर हीलियम में बदलती है। जैसे-जैसे हाईड्रोजन की मात्रा कम होती हैं, सूर्य लगातार कमजोर होता है। बाद में सूर्य में ही हीलियम गैसे जलने लगेगी और सूर्य फैलने लगेगा। सूर्य फैलकर इतना बड़ा हो जायेगा कि वह समीप के बुध और शुक्र जैसे ग्रहों को ही निगल सकता हैं। अंत में सूर्य तेजी से सिकुड़ने लगेगा और श्वेत वामन तारा बन जायेगा। फिर सूर्य अपनी जीवन यात्रा खत्म करेगा और अंतरिक्ष की धूल के रुप में शुन्य में विलीन हो जायेगा। और
अब आध्यात्मिक पक्ष......
भगवान सूर्य को धार्मिक शास्त्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है ----------
भास्कर, दिवाकर, प्रभाकर, रवि, भानु, अंशुमाली, मार्तंड, मरीची, आदित्य, सविता, पतंग, दिनकर, हंस आदि।
भगवान सूर्य के अर्चन के लिए विहित पत्र-पुष्प
भविष्य पुराण बताता हैं कि सूर्य भगवान को यदि एक आक का फूल अर्पन किया जाय, तो सोने की दस अशर्फियां चढ़ाने का फल प्राप्त हो जाता है। भगवान सूर्य को बेला, मालती, काश, माधवी, पाटला, कनेर, जपा, यावन्ति, कुब्जक, कर्णिकार, पीली कटसरैया, चंपा, रोलक, कुंद, काली कटसरैया, बर्बर मल्लिका, अशोक, तिलक, लोध, अरुपा, कमल, मौलसिरी, अगस्तय और पलाश के फूल तथा दूर्वा अतिप्रिय है। भगवान सूर्य को बेलपत्र, शमी का पत्ता, भँगरैया की पत्ती, तमाल का पत्र, तुलसी और काली तुलसी के पत्ते, कमल के पत्ते भी पसंद है। भगवान सूर्य को गुंजा, धतूरा, कांची, अपराजिता, भटकटैया, तगर और अमड़ा न चढ़ाये, क्योंकि वीरमित्रोदय इन वस्तूओं को सूर्य पर न चढ़ाने को कहा है।
धार्मिक पुस्तकों की माने तो भगवान सूर्य की माता का नाम अदिति और पिता का नाम कश्यप है। इसलिए इन्हें आदित्य और कश्यपनंदन के नाम से भी पुकारा जाता हैं। इनकी पत्नी दक्षकन्या रुपा थी। ये सप्तअश्व से युक्त रथ पर आरुढ़ होते हैं और इनके सारथि अरुण है। इनके एक हाथ में चक्र होता है। भविष्य पुराण की मानें तो दक्षकन्या जिनका नाम रुपा था, उनसे भगवान भास्कर का विवाह हुआ और उससे दो संताने हुई, जिनका नाम था यम और यमुना। किन्तु भगवान भास्कर के तेज को रुपा सहन नहीं कर सकी, और छाया के रुप में अपनी ही एक प्रतिमूर्ति बनाकर वह स्वयं तप करने चली गयी। इसी छाया से शनि और ताप्ती की उत्पत्ति हुई। यमुना और ताप्ती आज भी भूलोक में पृथ्वी पर पवित्र नदियों के रुप में प्रत्यक्ष है।
कहा जाता है कि जड़ व चेतन की आत्मा, प्रत्यक्ष भागवत स्वरुप साकार ब्रह्म रुप हैं – भगवान सूर्यदेव।
वेद कहते हैं -----
ऊं आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।। (ऋग्वेद)
ऋग्वेद में तो भगवान भास्कर से संबंधित कई सूक्त आपको मिल जायेंगे। उस ऋग्वेद में जिसे गिनीज बुक ऑफ वलर्ड रिकार्डस नामक पुस्तक मानती हैं कि ये विश्व की सबसे प्राचीन पुस्तक हैं।
यहीं नहीं अथर्ववेद कहता हैं कि ---------------
सूर्यस्तवाधिपतिमृर्त्योरुदायच्छतु रश्मिभिः अर्थात भगवान भास्कर की रश्मियां जीवन प्रदाता, स्वास्थ्य प्रदाता हैं ये अमृततुल्य होती है। ओंकार सूर्य देव की नित्य उपासना व अर्घ्य, पुष्प अर्पण सर्वदा शुभ हैं।
कौन हैं छठि मईया..........?
छठि मईया और कोई नहीं वहीं आदिशक्ति हैं, जिनसे सारी सृष्टि उत्पन्न हुई हैं, वहीं प्रकृति की छठवीं अंश हैं, उन्हें आप षष्टम् कात्यायिनी कहें, अथवा और जो नाम डाल दे। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार देवसेना, जो ब्रह्मा की मानसपुत्री और कार्तिकेय की भार्या है, उन्हें भी षष्ठी देवी के नाम से पुकारते है, क्योंकि कहा गया हैं कि ये ही मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण षष्ठी देवी कहलायी हैं, इन्हीं के प्रसाद से पुत्रहीन व्यक्ति सुयोग्य पुत्र, प्रियाहीनजन प्रिया, दरिद्री धन तथा कर्मशील पुरुष कर्मों के उत्तम फल प्राप्त कर लेते है। ब्रह्मवैवर्तपुराण की मानें तो रविषष्ठी व्रत के दिन, भगवान भास्कर की रश्मियों में देवी षष्ठी का प्रार्दुभाव हो जाता हैं, और जो लोग इस दौरान भगवान भास्कर को अर्घ्य प्रदान कर रहे होते हैं, उन्हें भगवान भास्कर और छठि मईया दोनों की कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
सर्वप्रथम इस व्रत को किसने किया ---------------
भविष्योत्तर पुराण कहता हैं कि इस व्रत को सर्वप्रथम नागकन्या की उपदेश सुनकर सुकन्या ने किया था। वो सुकन्या जो महराज शर्याति की पुत्री थी। कहा जाता हैं सतयुग में राजा शर्याति नामक एक राजा हुए। जब राजा शर्याति अपने सपरिवार और राजकीय लोगों को लेकर जंगल में शिकार करने के लिए निकले। तभी उस जंगल में सुकन्या फूल लाने के लिए निकली। सुकन्या वहां पहुंची, जहां महर्षि च्यवन तपस्यारत थे। महर्षि की तपस्या से ऐसी हालत हो गयी थी कि उनके शरीर में दीमक लग गया था। मुनि के शरीर में दीमक लगा देखकर सुकन्या चिन्तित होकर क्या देखती हैं कि दीमक लगे मिट्टी के टीले के मध्य में दो आंखे, जूगनू की तरह चमक रही हैं। आखिर ये चमकती चीजें क्या हैं, इसे जानने के लिए सुकन्या ने महर्षि के नेत्रों को फोड़ डाला। इससे महर्षि के नेत्रों से खून की धारा निकल पड़ी, महर्षि को असह्य पीड़ा होने लगी और इधर सुकन्या अपने स्थान पर लौट आयी। इधर महर्षि च्यवन के नेत्र, सुकन्या द्वारा फोड़ दिये जाने के कारण राजा शर्याति और उनके परिवार तथा राजकीय अधिकारियों के मलमूत्र बंद हो गये, तीन दिनों तक मल मूत्र बंद हो जाने से सभी व्याकुल हो गये। राजा शर्याति ने इसका कारण अपने पुरोहित से पूछा। पुरोहित ने योग बल के द्वारा राजा शर्याति को सारी कहानी बतायी कि सुकन्या के द्वारा क्या अपराध हुआ है। राजा शर्याति सारा माजरा समझ गये और अपनी पुत्री सुकन्या का विवाह महर्षि च्यवन से कर दिया। इधर सुकन्या अपने पति महर्षि च्यवन की खूब सेवा सुश्रुषा करने लगी। एक दिन जब कार्तिक शुक्ल रविषष्ठी तिथि आयी तब सुकन्या ने जल लेने के लिए एक छोटे तालाब के निकट आयी। वहां उसने देखा कि बहुत सारी नागकन्याएं भगवान भास्कर की पूजा कर रही है। सुकन्या उन नागकन्याओं से इस व्रत के विधान और महात्मय पूछे, उन नागकन्याओं ने सुकन्या को सारी विधान बता दी। जब पुनः कार्तिकशुक्ल रविषष्ठी तिथि आयी तो सुकन्या ने विधिवत् तरीके से भगवान सूर्य नारायण की पूजा अर्चना की और अपने पति च्यवन की नेत्र ज्योति पुनः प्राप्त कर ली। इसके बाद इस व्रत के महात्मय को महर्षि धौम्य के द्वारा द्रौपदी ने सुना और इस व्रत को की। इसी व्रत के प्रभाव से द्रौपदी अपना खोया सारा सुख प्राप्त कर ली। कहा जाता हैं कि आज भी जो इस व्रत को विधि पूर्वक करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल स्वतः प्राप्त हो जाता है।
ऊं नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे।
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरंचिनारायण शंकरात्मने।।

अर्थात् समस्त चराचर के एकमात्र नेत्रस्वरुप, जगत के उत्पति, पालन, नाश के कारणभूत, सत्व, रज, तमरुप, ( ब्रह्मा, विष्णु और महेश ) त्रिगुणात्मस्वरुपवाले सूर्य नारायण को नमस्कार है।
व्रत कैसे करें -------
गर भगवान ने आपको सबकुछ दिया हैं तो कृपया कंजूसी न करें और गर कुछ नहीं दिया तो फिर आपसे उन्हें कुछ नहीं चाहिए, केवल अंजूली भर जल लेकर अर्घ्य दे दें तो आपको सारी मनोवांछित वस्तूएं प्राप्त हो जायेगी। फिर भी चार दिनों के इस व्रत में कुछ लोकाचार हैं. प्रथम दिन यानी कार्तिक शुक्ल रवि चतुर्थी तिथि को आप अपने शरीर को शुद्ध करने का प्रथम प्रयास करें। लहसुनप्याज रहित, सामान्य मौसमी सब्जी बनाये, कद्दु और चने दाल की मिश्रित दाल बनाये, अरवा चावल की भात बना लें और पूर्वाह्न के आसपास, भगवान भास्कर को ये सारी वस्तुएं भोग लगाकर भोजन करें और अन्य को भी प्रसाद स्वरुप दें। दूसरे दिन पंचमी तिथि को सायं काल में मिट्टी की चुल्हें पर आम की लकड़ी से बनी गुड़ मिश्रित अरवाचावल और दूध की बनी खीर बनाये और उसे रोटी के साथ भगवान भास्कर को भोग लगाकर ग्रहण करें और दूसरे को भी प्रसाद स्वरुप बांटे। तीसरे दिन यानी षष्ठी तिथि को किसी तालाब, नदी अथवा कूएं पर अपने सपरिवार सहित अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को सूप में विभिन्न मौसमी फलों नारियल, गुड़ और आटे की बनी ठेकूआ, नैवेद्य स्वरुप अर्घ्य प्रदान करें और फिर यहीं प्रक्रिया चौथे दिन यानी सप्तमी तिथि को उद्याचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देते समय अपनायें और इसी के साथ आपकी पूजा – तपस्या संपन्न हो जाती है।
हालांकि ये बिहार में सर्वाधिक प्रतिष्ठित है। खासकर पटना के गंगा किनारे इस व्रत करने का एक अपना अलग ही आनन्द हैं। छठ व्रत के गीतों में गंगा बार बार आयी है। इस व्रत को डाला छठ या बूढी छठ कहते है। वो इसलिये कि इस व्रत को ज्यादातर पूर्व में बुढ़ी पुरनिया ही किया करती थी, मान्यता ये थी कि वो अपने सारी दायित्वों की पूर्ति कर लेने के बाद, भगवान भास्कर से अपना इहलोक और परलोक सुधारने और अपने परिवार के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नियम धर्म से व्रत रखती थी, पर वर्तमान में ऐसा दौर चला हैं कि अब ये ठेक ही पूरी तरह से मिट गया हैं। हर उम्र के लोग, इस व्रत को कर रहे हैं। ऐसे भी व्रत करनी चाहिए, क्योंकि व्रत करने से आप अंदर से शुद्ध होते हैं, आपके विचार पुष्ट होते हैं, और इसके बाद जो आप काम करते हैं, उससे आपका परिवार, समाज और राष्ट्र सभी उपकृत होते हैं।
जय छठी मईया................................................।