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Friday, May 26, 2017

सचिन, सचिन................

सचिन, सचिन.....
26 मई, आज पूरे देश में विश्व के महानतम बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर को समर्पित एक फिल्म रिलीज हुई है, फिल्म का नाम है – सचिन ए बिलियन ड्रीम्स।
हमारे विचार से हर परिवार को यह फिल्म अपने बच्चों के साथ देखने चाहिए, क्योंकि बहुत दिनों के बाद ऐसी फिल्मे देखने को मिलती है, जिससे बच्चों को एक नई दिशा मिलती है।
फिल्म में क्या है? और फिल्म में क्या नहीं है? वो हर चीजे हैं, जो आप सचिन के बारे में जानना चाहते है।
जरा देखिये, सचिन तेंदुलकर ने क्या कहा, अपने पिता के बारे में, सचिन का कहना है कि उनके पिता ने कहा था कि जो तुम बनना चाहते हो, बनो, पर उससे ज्यादा जरुरी है कि तुम एक अच्छे इंसान बनो।
सचिन तेंदुलकर के शब्दों में, जब वे फील्ड में राष्ट्र गान गा रहे होते है, तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है, गर्व महसूस होता है, रोंगटे खड़े हो जाते है, पर मैंने सिनेमा हाल में देखा कि जब फिल्म प्रारंभ होने के पूर्व राष्ट्र गान प्रारंभ हुआ तो कई लोग ऐसे भी थे, जो खड़े तक नहीं हुए, क्यों खड़े नहीं हुए?, मैं इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहता, क्योंकि कुछ लोग जन्मजात लंठ होते है, उन्हें आप सुधार नहीं सकते।
देशभक्ति सीखना हो, तो सचिन तेंदुलकर से सीखिये...
इंसानियत सीखनी है, तो सचिन तेंदुलकर से सीखिये...
एक स्पोर्टसमैन कैसा होना चाहिए, तो उसका सबसे सुंदर उदाहरण है – सचिन तेंदुलकर।
खेल के प्रति ईमानदारी देखनी है, तो उसके सबसे सुंदर उदाहरण – सचिन तेंदुलकर।
देश में एकता और अखंडता के पर्याय है – सचिन तेंदुलकर।
पर अफसोस, यह फिल्म राज्य सरकार द्वारा करमुक्त नहीं हुई है। भाई करमुक्त करने का क्या पैमाना है? ये राज्य सरकार ही जाने।
पर मेरा मानना है कि राज्य सरकार को यह फिल्म बिना किसी हाय तौबा के करमुक्त कर देना चाहिए, ताकि लोग यह फिल्म आराम से देख सके, यहीं नहीं इस फिल्म को हर स्कूल व कॉलेज में दिखाया जाना चाहिए ताकि युवा समझ सकें कि देश उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है।
एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे सचिन अपनी ईमानदारी, खेल के प्रति निष्ठा, तथा देशभक्ति के कारण पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गये। वे भारत रत्न से सम्मानित हुए।
इस देश को कपिलदेव और धौनी के नेतृत्व में विश्व कप मिला। दोनो बेहतर इंसान है, पर इसमें कोई दो मत नहीं कि सचिन इन दोनों से भी बेहतर है।
सचिन तेंदुलकर को भारतीयों से बहुत प्यार मिला है, पर सच्चाई ये भी है कि कई बार इन्हें अपमान भी झेलने पड़े, उसके बावजूद एक अच्छे इंसान के रुप में सचिन ने जो प्रतिष्ठा पाई है, उसकी प्रशंसा करनी होगी।
बधाई, फिल्म निर्माताओं, फिल्म में शामिल कलाकारों आपने बहुत ही ईमानदारी से सचिन की छवि, भारतीय जनमानस में पेश की। मराठी और अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी रुपान्तरण बहुत ही बेहतरीन ढंग से किया। सचिन की पाकिस्तान यात्रा और अब्दुल कादिर की बॉलिंग विश्लेषण खराब करना, आस्ट्रेलिया को बुलाकर खेलने की साहस करना और भारत को प्रतिष्ठित करना, उस वक्त जब भारत फार्म में नहीं था, ये फैसला सिर्फ सचिन ही ले सकते है, दूसरा कोई नहीं। पिता के निधन का समाचार सुनने के बाद भी विचलित न होते हुए देश के लिए, देश की ओर से क्रिकेट खेलने का फैसला लेना, सचमुच प्रशंसनीय ढंग से उसका फिल्मांकण कर, आप सब ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभाई। एक बार फिर आप सब को बधाई।

Wednesday, May 3, 2017

मर जवान, मर किसान...........

कभी इसी देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक नारा दिया था – जय जवान, जय किसान। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने वैज्ञानिकों की कर्मठता को देखा तो उस नारे में दो शब्द और जोड़े और फिर हुआ – जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, पर आज देश की क्या स्थिति है? न जवान की जय हो रही है, न किसान की जय हो रही है और न ही विज्ञान की जय हो रही है, तब जय किसकी हो रही है...
जाहिर है...
• नेताओं की, उनकी पत्नियों की और उनके बेवकूफ औलादों की।
• उद्योगपतियों की, उनके उदयोगों की तथा उनके नाजायज संपत्तियों की।
• आईएएस व आईपीएस अधिकारियों की, जो जब तक जिंदा रहे, मस्ती से नौकरी किये और फिर बाद में नेताओं के तलवे चाटकर नेतागिरी में पिल पड़े है।
• नीच पत्रकारों के समूहों की, जो अपना जमीर बेचकर इन तीनों की आरती उतारने में लगा है।
आखिर ये कब तक चलेगा?, जाहिर है जब तक देश का युवा, गरीब, चरित्रवानों का समूह इन्हें लूटने का मौका देगा।
जरा स्थिति देखिये...
देश की गरीब जनता की औलादें, कभी आतंकियों के हाथों सरहद पर, तो कभी देश के अंदर नरपिशाचरुपी नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं, और सरकार का काम क्या रह गया है? बस कड़ी निंदा करने की, क्योंकि इनके पास ताकत ही नहीं, ताकत आयेगी भी कहां से, इस देश का नेता तो अपनी बेवकूफ औलादों और अपनी पत्नी तथा प्रेमिकाओं के आगे कुछ जानता ही नहीं।
आखिर देश का जवान क्यों शहीद हो रहा है? उसका कारण जानिये...
• क्योंकि देश के लिए मर-मिटनेवालों में कोई नेता, कोई अधिकारी या कोई उद्योगपतियों का बेटा या बेटी शामिल नहीं होता। इन सभी का मानना है कि उनके औलादों का जन्म केवल मस्ती करने के लिए पैदा हुआ हैं।
• जिन गरीबों के बच्चे जवान बनते है, उन्हें मरने के लिए उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया जाता है, न तो उन्हें बेहतर खाना दिया जाता है, न बेहतर पोशाक और न ही आतंकियों और नरपिशाच रुपी नक्सलियों से लड़ने के लिए बेहतर हथियार उपलब्ध कराये जाते है। ये नेता इतने बेहूदे और कमीने होते है कि देश की रक्षा के लिए खरीदे जानेवाले हथियारों की खरीद में भी कमीशन खाते है।
• नरपिशाचरुपी नक्सलियों और आतंकियों के बचाव के लिए मानवाधिकार के नाम पर साम्यवादियों का दल देश के जवानों को ही कटघरें में खड़ा कर देता है।
जिस देश में बेईमान नेता, बेईमान अधिकारी, बेईमान पूंजीपति और बेईमान-लालची किस्म के पत्रकार होते है, उस देश में देश की रक्षा करनेवाला जवान तिल-तिल मरता हैं।
मैं कहता हूं कि ऐ देश में रहनेवालों गरीबों, वंचितों, भूख से मरनेवालों, क्या देश की सुरक्षा के लिए तुमने ही ठेका ले रखा है? 
मत भेजो, अपने बच्चों को, देश की रक्षा के लिए,  छोड़ दो तुम भी देश को अपने हाल पर, और तुम भी उसी प्रकार जिओ, जैसे तुम्हारा मन करता है, क्यों देश के लिए अपनी औलादों को शहीद करवा रहे हो?
अरे देश के सारे नेता एक ही है, चाहे वह मोदी हो या मनमोहन। सभी एक थैले के चट्टे-बट्टे है, जरा पूछो मोदी से, कि कल जैसे मनमोहन को इसी बात के लिए वह कटघऱे में खड़ा करता था, आज उसकी घिग्घी क्यों बंध गयी है?
पूछो, देश के रक्षा मंत्री अरुण जेटली से कि क्या उसे केवल धन इकट्ठे करने के सिवा, देश की रक्षा कैसे की जाती है? उसको पता है?
कमाल है, देश का रक्षा मंत्रालय प्रभार पर चल रहा है, प्रधानमंत्री मोदी के पास कोई ऐसा आदमी नहीं, जो रक्षा मंत्रालय को संभाल सकें?
देखो, इन नेताओं को अपने लिए पेंशन और हर प्रकार की सुविधा की व्यवस्था कर लिया और आपके बच्चे, जो अर्द्धसैनिक बलों में कार्य कर रहे है, उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया, यहां तक की उसकी पेंशन तक समाप्त कर दी, इन देश के गद्दारों ने। देश को नामर्द बना कर खड़ा कर दिया है, इनलोगों ने।
इसलिए, हम उन सारे लोगों से अपील करते है, खासकर उनसे...
• जो माता-पिता सुलेसन से चमड़े साटकर अपने बच्चों को जवान करते है...
• जो माता-पिता सफाईकर्मी का कार्य करते है...
• जो माता-पिता अट्टालिकाओं में स्वयं को शोषण का शिकार बनाते हुए, अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहे है...
• जो पंडित दो पैसों के लिए, अपने जजमानों के यहां शंख फूंक रहे है।
• जो गली-कुची में छोटी-छोटी दुकानें खोलकर अपनी जिंदगी जी रहे है...
यानी वे सारे लोग, जो किसी भी जाति के क्यों न हो, पर गरीबी से जिनका नाता है, वे अब अपने बच्चों को सिर्फ मरने के लिए सेना या अर्द्धसैनिक बलों में न भेजे, क्योंकि वर्तमान सरकार हो, या पूर्व की सरकार या कोई भी आनेवाले समय में आनेवाली सरकार हो, सभी ने आपके बच्चों को मारने की तैयारी कर रखी है, ऐसे में, आप अपने बच्चों को अपने साथ रखे, भले गरीब रहेगा, पर कम से कम आंखों के सामने तो रहेगा, किसी नेता, किसी अधिकारी या किसी उदयोगपति के शोषण का शिकार तो नहीं बनेगा, नहीं तो सबसे पहले नेता, अधिकारी और उदयोगपतियों के घर की औलादे भी देश के लिए जवान गंवाने के लिए तैयार रहे, क्या देश की सुरक्षा के लिए जान गंवाने का ठेका, यहां के गरीबों ने ही केवल ले रखा है?

Thursday, March 30, 2017

इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है.........

वह होली मनाता है...
वह दीपावली मनाता है...
वह रक्षाबंधन पर्व मनाता है...
वह दुर्गापूजा, रामनवमी, जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि का पर्व मनाता है...
वह भारत में स्थित तीर्थस्थानों का परिभ्रमण करता है...
वह गौ को पूजता है...
वह नदियों को पूजता है...
वह पहाड़ों को पूजता है...
वह पेड़ों को पूजता है...
इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है...
भारत में रह रहे ऐसे बहुसंख्यक हिन्दु समुदाय को – बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों का दल जाहिल और मूर्ख समझता है, इसलिए हिन्दू विरोधी आलेखों एवं समाचार प्रसारण ही इनका मुख्य केन्द्र बिन्दु बनता जा रहा है। ये लोग अन्य धर्मों में व्याप्त अँधविश्वास एवं रुढ़िवाद को अपने यहां चर्चा का केन्द्र बिन्दू नहीं बनाते। उसका मुख्य कारण है -  भारतीयों और हिन्दूओं को पूरे विश्व के सामने आले दर्जें का मूर्ख और जाहिल बताना... ...साथ ही वे ये भी जानते है कि अगर वे हिन्दूओं को छोड़कर अन्य धर्मों के खिलाफ कुछ लिखेंगे या चलायेंगे तो उनकी दुकान बंद होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी, चूंकि हिन्दू सहिष्णु होते है और हिन्दूओं के अंदर ही एक वर्ग ऐसा भी होता है, जो गाली देने से लेकर स्वयं गाली सुनने में भी आनन्द की प्राप्ति करता है, ये चैनल और अखबारवालों ने ऐसे लोगों के संरक्षण में अपना काम करना शुरु कर दिया है।
इन दिनों जब से भाजपा का देश में प्रादुर्भाव हुआ और विभिन्न राज्यों में भाजपा एक सशक्त दल के रुप में उभरी, तब से लेकर आज तक इनके पेट में दर्द इस प्रकार बढ़ा है कि पागलों की तरह ये अकबका रहे है, नाना प्रकार की झूठी-अतार्किक कार्टूनों-समाचारों-फिल्मों का निर्माण कर एक दूसरे के यहां छापने- दिखाने का दौर इनके यहां चल पड़ा है। आजकल तो ये इतने गुस्से में है कि वे भारतीय मतदाताओं को भी उलटा-सीधा बोल रहे है, उन्हें सांप्रदायिक बता रहे है...
भारतीय मतदाताओं को सांप्रदायिकता की तराजू में तौलनेवाले, पैसा और पद को ही एकमात्र अपना जीवन का अंग समझनेवाले इन मूर्खों का दल फिलहाल भारत के सम्मान के साथ खेल रहा है। ये लोग परिचर्चा का विषय कुछ अलग भी रखेंगे, फिर भी ये ले-देकर हिन्दू-भाजपा पर ही आ खड़ें होंगे। जिससे भारतीय जनता में इनके खिलाफ नाराजगी का बोध साफ दिखाई पड़ रहा है, शायद यहीं कारण है कि इनकी घटियास्तर की मनोवृत्ति से आजिज होकर भारत के मतदाता भी जोर-शोर से भाजपा के पक्ष में खड़े हो रहे हैं...
स्थिति ऐसी है कि अब तो जनता भी इनके खिलाफ लोहा ले रही है, पर बेशर्मों को शर्म नहीं। याद करिये नवरात्र का समय भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अमरीका दौरा। एक पत्रकार राजदीप सरदेसाई, अमेरिका में कैसे भारतीयों के खिलाफ अनाप-शनाप बक रहा था, जिससे गुस्से में आकर वहां के अमेरिकन भारतीय मूल के नागरिकों ने मिलकर उसे उसी समय छट्ठी रात का दूध याद दिला दिया। पत्रकारिता का मतलब या आपके पास अवैध ढंग से पैसे आ गये तो इसका मतलब ये नहीं कि आप भारतीयों को गाली दें, आप उन्हें नीच दिखाये, आप नैतिक मूल्यों को जीवन में प्रतिष्ठित करनेवाले भारत के गर्भ से निकली महाकाव्यों-ग्रंथों को गालियों से सीचें। एक बात जान लीजिये, ऐसे भी अब पहलेवाली बात नहीं रही, कि आप जो बोलेंगे और जनता आपके साथ हो लेगी, जनता आप सब को जवाब दे रही है, पर आप सुधरने का नाम नही ले रहे, वो कहते है न कि रस्सी जल गया पर बल नहीं गया...
आप अपना काम करते रहिये, भारतीयों का दल अपनी गति से चलेगा, भारत अपनी गति से चलेगा... क्योंकि भारतीय जानते है कि उन्हें करना क्या है? आपके विधवा प्रलाप का कोई असर इन भारतीयों पर पड़ने नहीं जा रहा...  अब आप स्वयं आकलन करिये कि जाहिल कौन है? जिन्हें आप जाहिल बता रहे है वे या स्वयं आप, समझे बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों...

Monday, March 20, 2017

प्यारे बच्चों.....................

प्यारे बच्चों,
आओ, आज मैं तुम्हें बताता हूं कि हमारे पूर्वज कैसे अभावों में भी शानदार ढंग से जीवन व्यतीत करते हुए अपने जीवन को समाज और देश के लिए उत्सर्ग कर देते थे। मैं कहूंगा कि तुम एक बात गिरह पार लो – तुम अपने जीवन में जितना आवश्यकताओं को सीमित करोगे, तुम उतना ही आनन्द प्राप्त करोगे और इसके विपरीत जितना तुम अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाओगे, तुम उतना ही दुख के सागर में डूबते चले जाओगे। कौन व्यक्ति कहां से धन ला रहा है? और कैसे वह अपनी आवश्यकताओं को पूर्ति कर रहा है? – ऐसी सोच सामान्य बुद्धिवाले लोग रखते है, पर जो असामान्य है, वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते। वे तो इस ओर ध्यान देते है कि उन्होंने अपने जीवन में ईमानदारी को वहन किया है या नहीं, जैसे ही उन्हें पता लगता है कि उनके पास आया धन बेईमानी से उन तक पहुंचा है, वे विचलित हो जाते है और उसका वे उपयोग करना भी पाप समझते है, ठीक इसके विपरीत अधम लोगों की प्रवृत्ति कैसी होती है? हमें लगता है तुम्हें बताने की जरुरत नहीं।
कहा भी गया है...
अधमा: धनम् इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा: मानम् इच्छन्ति, मानो हि महतां धनम्।।
अर्थात् जो दुष्ट होते हैं, उन्हें सिर्फ धन की इच्छा होती हैं, जो मध्यमवर्गीय है अर्थात जो न संत है, न अधम है, वे मध्यम मार्ग अपनाते है, उन्हें धन और मान दोनों की आवश्यकता होती है, पर जो संत प्रवृत्ति के लोग है, उनके जीवन में धन की इच्छा कभी नहीं रहती, उनके लिए तो सम्मान से बड़ा कोई धन है ही नहीं।
तुम जहां हो, वहां तुम्हें ये तीन प्रकार के लोग बराबर मिलेंगे, अब तुम्हें ये सोचना है कि तुम किस प्रकार के लोगों का वरण करो? या तुम्हारे मित्र या सखा किस प्रकार के लोग हो? ये निर्णय करने का अधिकार, मैं तुमलोगों पर छोड़ता हूं, मेरा स्वभाव क्या है? ये तुम जानते ही हो।
कुछ लोग कहते है कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती है, पर मैं कहता हूं कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती ही नहीं, और जितनी आवश्यकता होती है, उसका प्रबंध ईश्वर स्वयं कर देता है, ठीक उसी प्रकार जैसे...
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम
दास मलूका कह गये, सब के दाता राम
हमें लगता है कि तुम इस दोहे का अर्थ समझ गये होंगे।
मैं स्वयं 50 वें वर्ष में हूं और जो मैंने तुम्हारे दादा-दादी और अपने गुरुजनों तथा भारत के महान आध्यात्मिक संतों के बताये मार्गों का अनुसरण किया है, उससे साफ पता चलता है कि जीवन में धन उतना महत्वपूर्ण नहीं।
ऐसे भी धन से आप खाट या पलंग खरीद सकते है, पर नींद नहीं। धन से आप स्वादिष्ट व्यजंनों को खरीद सकते है, पर उसका रसास्वादन कर पायेंगे, इसका जवाब खरीदनेवाले के पास भी नहीं होता। आखिर ऐसा क्यों? इस पर चिन्तन की आवश्यकता है।
कुछ लोगों से मैं पूछता हूं कि महात्मा गांधी का घर कहां है? तो वे बताते है कि उनका घर गुजरात के पोरबंदर में हैं, पर उन्हें नहीं मालूम कि जिसे वे महात्मा गांधी का घर बता रहे है, गांधी ने वो घर बनाया ही नहीं, वो तो उनका पैतृक आवास है, गांधी को समय कहां मिला कि वे अपना घर बनायें।
मेरे प्यारे बच्चों,
याद रखों, जो दूसरे का घर बनाता है, वह अपना घर नहीं बना पाता, वो तो दूसरों के घर में ही आनन्द ढूंढ लेता है, तुम इसी बात को सरदार पटेल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, संत रविदासजी, गुरु नानक, स्वामी विवेकानन्द जी की जीवनी से भी जान सकते हो।
आजकल लोगों को मैं देखता हूं कि वे अपने आस-पास रहनेवाले मित्रों व पड़ोसियों के जीवन शैली को देखते हुए, स्वयं की जीवन शैली को प्रभावित करना प्रारंभ कर देते है, यह भी दुख का कारण है।
भाई मान लिया कि किसी के घर में फ्रिज है, तो कोई जरुरी नहीं कि मेरे घर में भी फ्रिज होने चाहिए, गर आवश्यकता है तो खरीदिये पर लोगों को दिखाने के लिए कि मेरे पास भी फ्रिज है, ये गलत है और ये दुख का कारण है...
जरा मुझे ही देख लो, मैंने तो अपने जिंदगी में फ्रिज खरीदी ही नहीं, और न मैं खरीदूंगा, क्योंकि मुझे ये आवश्यक नहीं लगता, आखिर क्यों, मुझे आवश्यक नहीं लगा, जरा ध्यान दो...
फ्रिज करता क्या है?
फ्रिज में सब्जियों को रख देने से सब्जियां ताजी रहती है, मैं कहता हूं कि मैं इतनी सब्जी खरीदू ही क्यों?  जिसके लिए मुझे भंडारण करनी पड़े, रोज बाजार जाउंगा और ताजी सब्जियां लाउँगा।
फ्रिज में पानी ठंडा रहता है, पर मैं दावे के साथ कहता हूं कि इस पानी से प्यास नहीं बुझती, जबकि घड़ा में पानी भी ठंडा और इससे प्यास भी बुझती है।
फ्रिज में पकाये भोजन के शेषांश को सुरक्षित रखा जा सकता हैं, मैं कहता हूं कि मैं इतना भोजन बनाऊं ही क्यों, जिसके लिए हमें सुरक्षित रखने के लिए फ्रिज की आवश्यकता पड़ जाये।
फ्रिज में आइसक्रीम बन जाती है, भाई हम कोई रईस की औलाद तो है नहीं कि हम रोज दस किलो दूध लाये और आइसक्रीम बनाते जाये, हम तो आइसक्रीम खाने के लिए किसी दुकान पर गये और आइसक्रीम खरीदी, खा लिये।
ऐसे भी फ्रिज रखेंगे, 24घंटे बिजली की खपत अलग और बेवजह का बिजली बिल का भुगतान करने का झंझट अलग।
यहीं नहीं, इसके अलावा फ्रिज से पर्यावरण को भी नुकसान, क्लोरोफ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन और ओजोन में छिद्र को बढ़ावा।
यानी कुल मिलाकर हमें नहीं लगता कि हम भारतीयों के लिए ये फ्रिज जरुरी है, पर देखता हूं कि लोग धड़ल्ले से इन फ्रिजों को अपने घर के रसोईघर में रसोईप्रवेश करा रहे है, और मैंने आज तक नहीं लिया।
सच्चाई जानते हो।
कुछ लोगों को देखता हूं कि जब अपने बेटे-बेटियों की शादी करेंगे तो अंधाधुंध खर्च करेंगे, जैसे लगता हो कि वे कितने धन्ना सेठ है, पर हम बता देते है कि ऐसी खर्च से वे अपने बेटे-बेटियों की खुशियां नहीं खरीदते, बल्कि वे स्वयं का नुकसान करते है, समाज और देश का नुकसान करते है, क्योंकि इसी देखा-देखी में लोग अपने घर के सुख को नष्ट कर डालते है। जो धन्ना सेठ है, जिनको ईश्वर ने धन दिया है, उन्हें भी चाहिए कि वे सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखे, पर वे ऐसा करेंगे, हमें नहीं लगता।
अगर ईश्वर ने किसी को धन दिया है तो उन्हें उक्त धन को, उन बेटियों की शादी में खर्च करना चाहिए, जिनकी शादियां धन के अभाव में नहीं हो रही। मैं दावे के साथ कहता हूं कि ऐसा करने से जो उन्हें आनन्द प्राप्त होगा, वह स्वयं की शादी में भी उन्हें नहीं आयी होगी।
कहा भी गया है...
संत प्रवृत्ति के लोगों के पास जो धन आता है, वह लोगों के आनन्द पर खर्च होता है और जब यहीं धन दूष्टों के पास पहुंचता है तो वह लोगों के आनन्द को हर लेता है...
संत प्रवृत्ति के लोगों की संख्या आज भी बहुतायत है, बस उन्हें परखने की जरुरत है...
मैं यह क्यों लिख रहा हूं, तुम सब, ये सब लिखने का मतलब समझ गये होगे...
बस करना यहीं है कि कभी भी अपने मेहनत के पैसे को उन जगहों पर जाया नहीं करना है, जो जरुरी न हो। जहां जरुरी है, वहां उन पैसों को खर्च करिये और जहां जरुरी नहीं है, वहां कुछ भी हो जाय, खर्च नहीं करना है, सदैव समाज और देश के लिए पैसे खर्च होने चाहिए।
भामा शाह को देखो, उनके पास खूब धन था, और उन्होंने अपना सारा धन महाराणा प्रताप के चरणों में रख दिया...
महाराजा रघु के दरबार में छोटा सा कौत्स जाता है, और महाराज रघु, कौत्स के पास अपना सारा धन रख देते है, और कौत्स उतना ही लेता है, जितनी की उसे आवश्यकता है। ये प्रमाण बताने के लिए काफी है कि भारत क्या है? और हमें क्या करना चाहिए...
खुब खुश रहो।
तुम्हारा पिता
कृष्ण बिहारी मिश्र

Wednesday, March 8, 2017

आज अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस है..............

आज अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस है...
उन महिलाओं को नमन, जो निर्धन और अभावों में रहते हुए भी अपने बच्चों, परिवार, समाज और देश को एक नई दिशा दी...
उन महिलाओं को नमन, जो खेतों-खलिहानों में, विभिन्न प्रकार के निर्माणों में अपना श्रमदान कर अपने परिवार और बच्चों का भरण पोषण कर रही है और अपने दिव्य संस्कारों से उनका मार्गदर्शन कर रही है...
उन महिलाओं को नमन, जो स्वयं भूखी रहकर अपने परिवार और समाज को ये लखने नहीं देती कि वो कई दिनों से भूखी है...
उन महिलाओं को नमन, जो लाख विरोधों के बीच सत्य को सत्य कहने से नहीं झिझकती, जैसे सुभद्रा कुमारी चौहान, जो डंके की चोट पर ग्वालियर नरेश के खिलाफ यह कहकर बिगुल फूंकती है कि –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिंया ने छोड़ी रजधानी थी।
खुब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।।
उन महिलाओं को नमन जिन्होंने बच्चों में संस्कार जगाने और उनमें छुपे वात्सल्य को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कमर कसती है, जैसे सुभद्रा कुमारी चौहान को देखिये –
यह कदम्ब का पेड़ अगर मां होता जमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे – धीरे।।
उन महिलाओं को नमन जो परतंत्रता की बेड़ियों से भारत को मुक्त कराने के लिए, पूर्ण स्वतंत्रता के लिए, सशक्त भारत के निर्माण के लिए अपना कलम खोलती है, जैसे सुभद्रा कुमारी चौहान को देखिये, जो कहती है –
वीरों का कैसा हो वसन्त,
आ रही हिमाचल से पुकार,
है उदधि गरजता बार-बार.
प्राची पश्चिम भू नभ अपार,
सब पूछ रहे हैं
दिग-दिगन्त,
वीरों का कैसा हो वसन्त।
जब भी 8 मार्च आता है, महिलाओं के सम्मान देने के नाम पर नाना प्रकार के कार्यक्रम आयोजित होते है, ये कार्यक्रम वे लोग आयोजित करते है, जो सहीं मायनों में महिलाओं को सम्मान देते ही नहीं, इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजन करनेवालों की संख्या बहुतायत है, पर जिनके लिए महिलाएं आज भी सर्वोपरि है, या सम्मान की पात्र है, उनके लिए 8 मार्च कोई मायने नहीं रखता। भारत में आज भी 90 प्रतिशत महिलाएं जो खेतों-खलिहानों या शहरों में मजदूरी का कार्य करती है, जरा उनसे पूछिये कि अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस कब मनाया जाता है या इसका अभिप्राय क्या है? तो पता चलेगा कि उनका इस प्रकार के कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं और न ही वे इस प्रकार के कार्यक्रम को बारे में जानना या समझना चाहती है, पर नारीत्व के भाव को वो जितना समझती है, शायद ही कोई समझेगा।
रांची जैसे शहर में लड़कियों और महिलाओं की क्या स्थिति है? किसे नहीं पता। लड़कियां यौन शोषण-दुष्कर्म की शिकार हो रही है और पुलिस उन दुष्कर्मियों और यौन-शोषणकर्ताओं को संरक्षण दे रही है, ये किसके इशारे पर हो रहा है, किसे नहीं पता। छोटी – छोटी बच्चियां जो कस्तूरबा बालिका में पढ़ती है और उनके साथ ऐसी हरकतें हो रही है कि हम उसे यहां लिख नहीं सकते। लड़कियां मुख्यमंत्री का द्वार खटखटाती है, पर ये मुख्यमंत्री है, जो उनकी सुनते ही नहीं, तो ऐसे में इस प्रकार के आयोजन बेमानी सिद्ध होते है।
लड़कियों और महिलाओं का सम्मान दिल से होना चाहिए पर मैं यहां देख रहा हूं कि लोग इनका सम्मान दिमाग से करने लगे है, कि इस प्रकार के आयोजन से उन्हें क्या फायदा मिलेगा? जहां इस प्रकार की मानसिकता लोगों की है, वहां महिलाओं का सम्मान हमेशा खतरे में रहेगा।
हमारे देश में रक्षाबंधन का एक त्यौहार होता है, जिस त्यौहार में महिलाएँ पुरुषों को रक्षा सूत्र बांधती है, जिससे पुरुष का यत्र-तत्र-सर्वत्र रक्षा होता रहता है। उस रक्षा सूत्र में महिलाओं के द्वारा आशीर्वाद इस प्रकार से सिंचित होता है कि वह पुरुष का रक्षा कवच का काम करता है, तो जहां ऐसी परंपरा व संस्कृति का वास हो, उस देश में आज महिलाओं की ऐसी स्थिति क्यों? उसका मूल कारण है कि हमने महिलाओं को सम्मान देने में दिमाग का इस्तेमाल किया। आज स्थिति है कि घर का ही पुरुष अपने ही घर की महिलाओं को महिला नहीं समझ रहा, आज स्थिति ऐसी है कि महिलाएं घर में ही सुरक्षित नहीं। ऐसा कौन है – जिसनें हमारी ये स्थिति कर दी। उसका सरल उत्तर है – हमारे देश व समाज में भोगवादी संस्कृति के विष का फैलना, ये विष इस कदर फैल रहा है, जिसका परिणाम अब प्रत्येक दिन दिखाई देने लगा है। जरुरत है, वक्त को पहचानने और स्वयं को संभालने की, नहीं तो स्थिति ऐसी होगी कि आप अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस तो मनायेंगे पर सही मायनों में वहां महिला दिखाई ही नहीं पड़ेंगी।
एक बार पुनः उन महिलाओं को बधाई, जो आज के आडम्बरों से दूर, अपने बच्चों और परिवारों के लिए खेतों-खलिहानों और शहरों की भीड़ में अपना वजूद ढूंढने के लिए निकल पड़ी हैं।

Saturday, January 7, 2017

भला हाथी भी कहीं उड़ता है.......

ये हाथी कभी नहीं उड़ेगा, चाहे धौनी जितना भी उड़ाने का प्रचार क्यों न कर लें... धौनी चाहे जिस भी मिट्टी के बने हो, पर हमारा हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की महक के रुप में जाना जानेवाला झारखण्ड अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं जानता और न ही ऐसे सपने देखता है, जो सपने कभी पूरे ही न हो...
झारखण्ड बढ़ेगा, अवश्य बढ़ेगा पर पंखों वाला हाथी से नहीं, बल्कि झारखण्ड के करोड़ों मेहनतकश-मजदूरों और उनके मजबूत इरादों और बुलंद हौसलों से... न कि परछाइयों के शहरों में रहनेवालों से...
धौनी कल क्रिकेट खेलते थे, बाद में विज्ञापनों से खेलने लगे, एक मोटरसाइकिल का प्रचार करते थे, कहते थे मैं तो दूध पीता हूं, ये तो कुछ भी नहीं पीता, फिर भी दौड़ता रहता है... बाद में हमारे धौनी दारु का भी प्रचार करने लगे, उस दारु का, जिसका प्रचार आज तक क्रिकेट के भगवान माने जानेवाले भारत रत्न सचिन तेंदुलकर ने नहीं किया...
ऐसे धौनी को राज्य सरकार ने मोमेंटम झारखण्ड का ब्रांड एंबेसडर बनाया है, इसका फायदा राज्य सरकार को कितना मिलेगा, ये तो वक्त बतायेगा, पर राज्य को नुकसान होना तय है... हम तो एक ही बात जानते है, कि गांधी ने ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना की थी... बार-बार गांधी की बात करनेवाली सरकार, उनके 150 वीं जयंती पर स्वच्छता अभियान की बात करनेवाली सरकार, उनके मूल वक्तव्य ग्राम स्वराज्य से भटक रही है और जिन विदेशियों को गांधी ने देश से बाहर किया, उन विदेशियों को पुनः भारत में लाने का हर प्रकार का नौटंकी कर रही है... जिसमें केन्द्र से लेकर राज्य सरकार भी शामिल है... संघ जिसकी राजनीतिक इकाई भाजपा है, वह भी इस हथकंडे से तौबा करती है, और ग्राम स्वराज्य-स्वदेशी की परिकल्पना को साकार करने की बात करती है, पर इन सबसे दूर, राज्य और केन्द्र सरकार ने पूंजी निवेश के नये तरीके ईजाद कर स्थिति ऐसी कर दी है जैसे लगता है कि बिना पूंजी निवेश के राज्य व देश आगे बढ़ ही नहीं सकता...
क्या ऐसे हालात में आप धौनी के इस अपील को स्वीकार करेंगे कि - " ये हाथी उड़ेगा, और झारखण्ड इंडिया का नंबर वन इंवेस्टमेंट डेस्टिनेशन बनेगा। अब सवाल ये है क्या आप हमारे साथ होंगे?" मैं तो भाई, साफ-साफ कह देता हूं कि धौनी के इस बयान के साथ मैं तो नहीं हूं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि हाथी उड़ता नहीं है...

Wednesday, December 28, 2016

मेरे प्यारे बच्चों...........

मेरे प्यारे बच्चों,
तुम लोगों से मोबाइल पर बातचीत हो जाती है, तो आनन्द आ जाता है। मैं जानता हूं कि तुम विपरीत परिस्थितियों में सीमा पर तैनात हो, फिर भी हमें हंसाने और खुश रखने के लिए हंसकर-मुस्कुराकर बातें करते हो। हम जानते और महसूस करते है कि आनेवाले समय में देश की जो स्थिति है, वो बेहतर नहीं होने जा रही है, क्योंकि इस देश के 98 प्रतिशत नेता अपने देश से प्यार नहीं करते, वे तो जिनकी बातें कर राजनीति करते है, उन्हें भी धोखा देते है और सिर्फ अपनी पत्नी और प्रेमिकाओं के प्यार में डूबे होते है। ऐसे में, देश का क्या हाल होगा?, हमें समझना होगा। हम अपने प्यारे देश को इन चिरकूट नेताओं और उनके घटियास्तर के बेटे-बेटियों और उनकी पत्नियों और प्रेमिकाओं के हवाले नहीं छोड़ सकते।
मैं जानता हूं कि तुमलोग छुट्टियों के लिए संघर्ष करते हो, पर छुट्टियां नहीं मिलती, गर छुट्टियां मिलती भी है तो समय पर नहीं मिलती। कहने को सरकारें बहुत कुछ कहती है और चिरकूट टाइप के नेता कहा करते है कि सीमा पर कार्य कर रहे जवानों के लिए हम बहुत कुछ कर रहे है, पर सच्चाई हमसे नहीं छुपी है, फिर भी तुमलोग अपने देश के प्रति और अपने कार्य के प्रति ईमानदार हो, ये देखकर हमें गर्व होता है।
तुम तो जानते हो और देखे भी होगे कि यहां के लोग भी महान है, वे शहीद हो गये जवानों के बेजान शरीरों पर फूल और मालाएँ डालने के लिए भीड़ इकट्ठी कर लेते है, पर जीवित जवानों (जो सीमा पर से लौटकर अपने घर-परिवार से मिलने आ रहे होते है) उन्हें अपनी सीटों पर बैठने तक को नहीं कहते और न ही बैठने देते है, सीट रहने पर भी कई लोगों को पैर-पसार कर अनारक्षित सीटों पर हमने सोते देखा है। मैंने अपनी इन्हीं आंखों से देखा है कि कई जवान ट्रेनों में जैसे-तैसे नीचे सोकर-बैठकर पशुओं की तरह अपने घर-परिवार से मिलने जाते है। ये सूरत कभी बदलनेवाली नहीं, चाहे सरकार किसी की भी आ जाय, ये तो चरित्र और संस्कार से जुड़ा मसला है, जिसकी दवा किसी के पास नहीं।
मैं तो तुम्हें कल भी कहता था, आज भी कह रहा हूं...
योग का अर्थ है – आत्मा का परमात्मा से मिलन।
योग 4 प्रकार का होता है – कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और हठयोग।
दुनिया का सबसे बड़ा योग कर्मयोग है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की प्रधानता और उसके गूढ़ रहस्य के बारे में बताया है। समय मिले तो श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ लेना। गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्रीरामचरितमानस में लिखा है...
कर्म प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करहिं तस फल चाखा।।
हम जो भी आज है, वो कर्म के कारण है, आगे हम जो बनेंगे, उसमें भी कर्म की ही प्रधानता रहेगी, आज जो तुम्हें मिला है, या जो तुम्हें प्राप्त हो रहा है, उसमें तुम कहीं नहीं हो, वो सब ईश्वर कर रहा है और करा रहा है...
बस तुम्हें करना क्या है? कि स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर, कर्म करते जाना है, फल की चिंता नहीं करनी है...फल तो तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। इसके लिए उदाहरण कई है, पर मैं अपना उदाहरण तुम्हारे समक्ष रखता हूं, क्योंकि तुम मेरे बेटे हो, तुमने हमें नजदीक से देखा है, मैं तुम्हारे सामने हूं, मेरा कर्म तुम्हारे सामने है, मैं आज कहा हूं, कल कहां था, और कल कहां रहूंगा, उसका सूक्ष्म विवेचना कर लो।
एक बात और...
हम इस दुनिया में क्यों आये है?
इसे भी जानो...
क्या हम आइएएस, आइपीएस, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, अधिकारी-कर्मचारी, चिकित्सक आदि बनने आये है? उत्तर होगा – नहीं।
तो हम दुनिया में आये है किसलिये...
क्या हम भोजन करने, मल-मूत्र परित्याग करने, बच्चे पैदा करने आये है?
अगर हम ऐसा करने आये है तो ऐसा तो पशु भी करते है।
ऐसे हालात में हम पशु से कैसे भिन्न हुए?
हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम पशु नहीं, मनुष्य है और मनुष्य का जन्म प्रारब्ध, प्रार्थना और प्रयास के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। वर्तमान में प्रारब्ध पर तुम्हारा अधिकार नहीं। आज का कर्म, कल प्रारब्ध में बदल सकता है, तुम्हारा वर्तमान में अधिकार सिर्फ प्रार्थना और प्रयास पर है, प्रतिदिन प्रार्थना करो और जो काम मिले, उसमें ईमानदारी बरतते हुए कार्य करो। मैं जानता हूं कि तुम अपने कार्यों में ईमानदारी बरतते हो, सेवा कार्य में कोई भी ढिलाई तुम बर्दाश्त नहीं करते, फिर भी पिता हूं, बताना चाहता हूं, जब तक जीवित रहूंगा, बताता रहूंगा। पिता का यह धर्म भी है। प्रार्थना के विषय में महात्मा गांधी का उल्लेख मैं करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि मैने ऐसी कोई प्रार्थना नहीं कि, जिस प्रार्थना को ईश्वर ने सुना नहीं हो। कमाल है महात्मा गांधी किस प्रकार की प्रार्थना करते थे कि ईश्वर ने उनकी सारी प्रार्थना को सुना। ये चिंतन का विषय है। आखिर महात्मा गांधी ने क्या कर लिया था? कि ईश्वर उनकी हर बातों को मान लेते थे। उसका सुन्दर उदाहरण है। महात्मा गांधी का सत्य से जुड़ाव। जिस दिन उन्होंने स्वयं को सत्य से जोड़ लिया, वे असाधारण हो गये। सत्य क्या है? इसका सुंदर विश्लेषण तैत्तरीयोपनिषद् में है, पर मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि सत्य ही ईश्वर है। ईश्वर को खोजना, बहुत आसान है, जब तुम सत्य पर होते हो तो जान लो कि ईश्वर के सन्निकट होते हो।
मैं जिस अवस्था में हूं, वहां तुम विश्वास नहीं करोगे, प्रतिदिन ईश्वर से मुलाकात होती है, मैं उन्हें महसूस करता हूं, मेरा सारा कार्य आसान होता चला जा रहा है। इसलिए मैं तुम सब को आशीर्वाद प्रदान कर रहा हूं, मस्ती में रहो, देश की सेवा करो, आनन्दित रहो, आनन्द न तो सरकार देती है और न अधिकारी। आनन्द तो सिर्फ ईश्वर देता है। वो कहीं भी किसी रूप में दे सकता है। मैने तो कई लोगों को भौतिक सुखों में घिरे रहने के बावजूद बिलखते देखा है, और कई को भौतिक सुखों के अभाव में भी परम आनन्द की प्राप्ति में स्वयं को आनन्दित होते हुए देखा है...
सच पूछो, तो तुमसब हमारे लिए ईश्वर का वरदान हो...
आनन्द लूटो, परम आनन्द की ओर बढ़ो...
जो हमने सिखाया है, उस मार्ग पर अडिग रहना...
मत झूकना, असत्य के आगे...
सत्य पर रहना, देश तुम्हारा, हम तुम्हारे, डर किस बात की...
वेद कहता है...
ऐ मन तू मत डर, जैसे सूर्य और चंद्र नहीं डरा करते...
ऐ मन तू मत डर, जैसे दिन और रात नहीं डरा करते...
आज कुछ ज्यादा लिख दिया हूं...वार्ता के क्रम में...
क्या करें? तुमलोग पास में रहते हो...तो खूब बाते होती है, और जब दूर हो तो फेसबुक में ही आराम से लिख देता हूं...पढ़ लो, और हमें आनन्द दे दो...
अरे अब तो मुस्कुराओं, दांत दिखाओ, देखो मैं पास में ही खड़ा हूं और तुम्हें देख रहा हूं...

Tuesday, December 13, 2016

नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार...

जी हां, नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार है। संपादक से लेकर पत्रकारिता जगत में चपरासी तक कार्य करनेवालों का जीना मुहाल हो गया है। अपने आकाओं, राजनीतिज्ञों, आइएएस, आइपीएस, थानेदारों, सरकारी जन वितरण प्रणाली दुकानों से कमीशन लेनेवालों के घर में कमीशन के पैसे नहीं पहुंच रहे है। जिसके कारण इनके चेहरों से लाली समाप्त हो गयी, चूंकि डायरेक्ट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने अखबारों के माध्यम से ये गाली नहीं दे सकते, इसलिए इन्होंने इनडायरेक्ट माध्यम को चूना है। वे अपने विशेष पृष्ठों पर ऐसे-ऐसे लोगों को दिखा रहे है, जिनका इस नोटबंदी से कोई लेना – देना नहीं और न ही उनके कारोबार पर कोई असर ही पड़ रहा है, क्योंकि मैं भी भारत के रांची में ही रहता हूं और कोई टाटा-बिड़ला या अडानी-अंबानी के परिवार का सदस्य नहीं हूं, जैसे सामान्य लोग जीते है, उसी तरह मैं भी जीता हूं। मेन रोड स्थित फुटपाथ की दुकान हो या अपर बाजार की कपड़े की दुकान या पंडितजी से पतरा दिखाना हो, या नाई से बाल ही क्यूं न कटवाना हो, या जूता-पालिस ही क्यूं न कराना हो। एक वाक्य में कहें तो जूता सिलाई से लेकर चंडी पाठ तक इसी मेन रोड में होता है, कहीं हाहाकार नहीं हैं, लेकिन कुछ लोगों यानी पत्रकारों को पेट में भयंकर दर्द हो रहा है कि भाई नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी करके उनके पेट पर लात मारा है, क्योंकि कमीशन बंद हो चुकी है, जो इन्हें कमीशन देते थे, रुपयों में, जब उनकी सिट्ठी-पिट्ठी गुम हो गयी है, तो बेचारे को प्रतिदिन का पांच सौ और एक हजरियां कौन देगा...
जब इनके विशेष पृष्ठों से नरेन्द्र मोदी को गरियाने का काम समाप्त हो जाता है, तो वे फेसबुक का सहारा लेते हैं, और जी-भरकर नरेन्द्र मोदी को गरियाते है, तरह-तरह के नरेन्द्र पाठ करते है। एक सज्जन जो एनजीओ भी चलाते है, कभी संपादक भी रहा करते थे, वे नरेन्द्र मोदी को गरियाते – गरियाते अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी सुनाने लगते है। एक तो अखबार नहीं आंदोलन – पंचायती वाले बाबा दांत निपोरते हुए फोटो प्रोफाइल रखे हुए है, वे तो सुबह उठते और रात में सोने के पहले जब तक फेसबुक पर नरेन्द्र मोदी को गरिया नहीं ले, उनका खाना ही नहीं पचता। इसी अखबार में युवा पत्रकारों की भी टोली है, जो नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी अभियान को समर्थन करनेवालों को भक्त कहकर गरियाते है, जबकि वे स्वयं चिरकुटानंद के सहोदर भाई है।
हम भी अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अनुरोध करेंगे कि इन कमीशन खानेवाले पत्रकारों और उन्हें गरियानेवाले इन पत्रकाररूपी बहुरूपियों पर वे थोड़ी कृपा करें, ताकि उनका कमीशन का धंधा बेरोकटोक चलता रहे, लेकिन फिर बात यहीं आती है कि नरेन्द्र मोदी रहे धाकड़ बैट्समैन हमें नहीं लगता कि उन्होंने जो नोटबंदी का शतक बनाने का जो बीड़ा उठाया है, उससे वे पीछे हटेंगे।
इसलिए कमीशन खानेवाले पत्रकारों और एनजीओ चलानेवाले महानुभावों से सादर अनुरोध है कि वे फिलहाल बाजार और आम जनता की ऐसी छवि प्रस्तुत न करें, बल्कि अपना चेहरा जो कमीशन के नहीं मिलने कारण बर्बाद होता दीख रहा है, उसे दिखाने की कोशिश करें, ताकि लोगों को पता चलें कि इस कमीशन के धंधे में कितने संपादक और कितने पत्रकार अब तक मालामाल हो गये...

Tuesday, November 22, 2016

सचमुच देश बदल रहा है.................

सचमुच देश बदल रहा है...
जो अंधे है, वे देख रहे है...
जो बहरे है, वे सुन रहे है...
जो गूंगे है, वे बोल रहे है...
जो लंगड़े है, वे दौड़ रहे है...
जिनके पास कल तक पैसे नहीं थे...
वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए बैंकों की लाइन को कम नहीं होने दे रहे...
जिनके घर में कल तक शादी नहीं थी, वे शादी का कार्ड छपवा रहे है...
जो कल तक तत्काल टिकट के लिए लाइन में लगा करते थे, वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए दिमाग लगाकर पैसे बटोर रहे है...
जो कल तक खड़े नहीं हो रहे थे, वे घंटो बैंक की लाइन में, एटीएम की लाइन में खड़े होकर मुस्कुरा रहे है...
जो कल तक बीमार ही नहीॆं होते थे, आज वे बीमार भी पड़ रहे है...
भारत में इन दिनों चाहे मौत की वजह कुछ भी क्यों न हो, पर सब आजकल नोटबंदी से ही मर रहे है...
एनडीटीवी, आजतक के चैनलों के संवाददाताओं की फौज को उनके मनपसंद बाइट नहीं मिल रहे, उलटे जनता ही उन्हें निशाने पर ले रही है...
नीतीश नोटबंदी के साथ, तो लालू को मोदी की यह आइडिया फर्जिकल स्ट्राइक लग रही है...
बेइमान आईएएस और आईपीएस की टोलियों के चेहरे मुरझा रहे है...
कुछ तो एक-दो दिन की छुट्टियां लेकर, रूपयों को ठिकाने में लगे है...
दो हजारिये से नीचे बात नहीं करनेवाले डाक्टरों का दल, एक अखबार को बुलवाकर, अपना बयान छपवा रहे है...
कल तक लाल बहादुर शास्त्री के एक इशारे पर, एक बयान पर एक दिन का उपवास करनेवाली भारत की जनता में से आज कुछ देश के वर्तमान प्रधानमंत्री को एक दिन भी देने को तैयार नहीं है...
सीमा पर सैनिक मरें, पर हम देश के भीतर भी अच्छे कार्यों के लिए किसी को एक मौका देने को तैयार नहीं है...
कल तक एक दूसरे को आपस में ही देखनेवाले नेताओं का दल, वर्तमान में एक ही सुर में मोदी के खिलाफ झकझूमर गा रहे है...
सचमुच देश बदल रहा है...

Monday, November 21, 2016

वनवासी के नाम पर.............

ईसाई मिशनरियों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत "वनवासी" शब्द पर अपनी आपत्ति दर्ज क्या करा दी? कुछ लोग वनवासी शब्द से ही चिढ़ने लगे, जबकि सच्चाई यह है कि मिशनरियों के धर्मांतरण और अनुसूचित जन जातियों के मूल धर्म से अलग करने की उनकी हरकतों की आलोचना और प्रतिकार स्वयं उसी समय के अनेक आदिवासी महापुरुषों ने किया। भगवान बिरसा मुंडा का प्रमाण सबके सामने है, पर इन दिनों देख रहा हूं कि मिशनरियों ने एक बार फिर वनवासी के नाम पर वो गंदी हरकत शुरु की है, जिससे समाज में एक बार फिर विष घुल रहा है...आखिर मिशनरियां ये विष क्यों घोल रही है, हमें लगता है कि यहां बताना जरुरी है।
इन दिनों आदिवासियों का एक बहुत बड़ा वर्ग मिशनरियों के धर्मांतरण के कुचक्र से लोहा ले रहा है और अपने बंधुओं को सरना धर्म में लौटने की मुहिम चला रखी है, जिससे उनके धर्मांतरण की मुहिम की हवा निकल गयी है, इसलिए वे बेतुके शब्दों के माध्यम से विष-बेली बो रहे है,ताकि समाज में नफरत की वो बुनियाद तैयार हो, जिससे मिशनरियां अपनी रोटी सेंक सकें। हमें अच्छी तरह पता है कि इसके लिए खाद - बीज कहां से उन्हें उपलब्ध हो रहा है...
और अब बात उनसे जो वनवासी शब्द पर आपत्ति दर्ज करा रहे है?
जब हम वनों में रहेंगे, तो हम भी वनवासी कहलायेंगे, इसमें दिक्कत क्या है...सिर्फ आदिवासी ही वनवासी के पर्याय नहीं है, अगर कोई ये सोचता है, तो कृपया अपने दिमाग से इस विकार को निकाल दें...सिर्फ आदिवासी को जो लोग सिर्फ वनवासी कहते है, वे मूरख ही होंगे...राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और अपनी पत्नी के साथ 14 वर्षों तक वनों में रहे, वनवासी कहलाये। पांडव वनों में रहे, वनवासी कहलाये...एक समय था पूरा भारत वनों से ढंका था, सभी वनवासी कहलाये...आज भी जिसे हम चंपारण कहते हैं, वह चंपा और अरण्य शब्द से ही बना है, आरा अरण्य का ही अपभ्रंश है, आज भी दारुकावन, दंडकारण्य आदि कई नाम है, जो वन और वहां के वाशिदों का प्रतिनिधित्व करते है... जो आदिवासी ये सोचते है कि वनवासी सिर्फ उन्हीं के लिए बना है, तो माफ करें...मुझे भी वनवासी कहलाने में उतना ही गर्व महसूस होगा, जितना की नगरवासी या भारतवासी कहलाने में...ये तो कुछ घटियास्तर के बुद्धिजीवियों की दिमाग में उपजी घटियास्तर की मानसिक दिवालियापन है, कि इस सुंदर शब्द में भी अलगाववाद और कुत्सितविचारों का बीजारोपण कर दिये है...ईश्वर उन्हें सदबुद्धि दें ताकि वे शब्दों का सही अर्थ निकाल सकें....

Friday, November 18, 2016

हेमंत का बयान यानी हर साख पर उल्लू........

हमारे देश में एक से एक नमूने नेता है, जो अपने पप्पू टाइप सलाहकारों के इशारों पर नाचते और बयान देते है। इस नाचने और बयान देने में कभी – कभी सफलता हाथ लग जाती है तो ये नेता बौरा जाते है और कह डालते है कि अरे वाह क्या तूने हमें सलाह दिया है... हमारी तो बल्ले – बल्ले हो गयी। ये नमूने नेता ये भी नहीं सोचते कि उनका ये बयान दोयम दर्जें से भी नीचे का है। बयान देने में ये नमूने नेता ये भी नहीं देखते कि इससे सामाजिक ढांचा बिखरेगा, वे ऐसी – ऐसी हरकते करते है कि क्या कहा जाय? हम इसके लिए कोई एक दल को दोषी नहीं ठहरा सकते, इसमें सभी दोषी है।
जरा देखिये एक उदाहरण। झामुमो के नेता व वर्तमान में विरोधी दल के नेता हेमन्त सोरेन ने क्या कह दिया? हेमन्त सोरेन का विधानसभा में बयान है कि एटीएम से पैसे निकालने के दौरान मरनेवालों को सरकार शहीद का दर्जा दे। विधानसभा में इस बयान को स्पष्ट रूप से रखने के बाद, तो हमें लगता है कि हेमन्त को एक और बयान देना चाहिए कि भारत में जितने भी घूसखोर नेता है, जिन्होंने देशहित में घूस खाकर केन्द्र की सरकार बचाई, उसे भारत रत्न मिलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने स्वयं को घूस की दांव पर बिठाकर नरसिम्हाराव की सरकार बचाई। ऐसे नेताओं को भी भारत रत्न मिलना चाहिए जो अपने बेटे, बेटियों, पत्नियों और बहूओं को सांसद, विधायक बनाने के लिए मरे रहते है।
पता नहीं, हमारे देश के नेताओं को क्या हो गया है? वे चिरकूट टाइप का बयान क्यों दे देते है?, क्या उन्हें थोड़ा सा भी दिमाग नहीं? क्या एटीएम की लाइन में लगना और सीमा पर लाइन लगाकर देश की रक्षा करना दोनों एक ही बात हो सकती है, आखिर ये नेता दोनों अलग – अलग बातों को एक ही तराजू पर क्यों तौल रहे है? नेता विरोधी दल हेमन्त के बयान ने साफ कर दिया कि झारखण्ड के नेताओं की सोच किस स्तर का है? जब नेताओं की सोच दोयम दर्जें की होगी तो ये अपने राज्य को किस दिशा में ले जायेंगे?, ये भी जगजाहिर है, यानी मान लीजिये कि हर साख पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?

Wednesday, November 16, 2016

मोदी जी, मत झूकिये, इन निर्लज्जों के सामने...........

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, इन निर्लज्जों के आगे मत झूकिये, नोटबंदी जारी रखिये, भारत काला धन नामक कैंसर से स्वयं को मुक्त करना चाहता है और जब तक इस पर कड़े निर्णय नहीं लिये जायेंगे, देश इस भयानक रोग से मुक्त नहीं हो सकता। कमाल है, कल तक जो नेता भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ आंदोलन करते थे, आज आप के द्वारा काला धन के खिलाफ लिये गये निर्णय को ही कटघरे में रख रहे है और काला धन को संरक्षित करने के लिए आंदोलन पर उतारु है। एक नेता जो स्वयं को समाजवादी कहता है, उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री है, काला धन को आर्थिक मंदी से लड़नेवाला हथियार बता रहा है। राहुल गांधी की तो बात ही निराली है, वो क्या बोलता है?, क्या सोचता है?, उसे खुद मालूम नहीं। कल तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आपके द्वारा लिये गये निर्णय को साहसिक बता रहे थे, आज उनके दल आपके खिलाफ विपक्षी दलों के सुर में सुर मिला रहे है। वामपंथी पार्टियों का तो चरित्र ही रहा है कि भाजपा के खिलाफ हर बात पर आंदोलन कर देना, चाहे उसके लिए उसकी पार्टी की हवा ही क्यों न निकल जाये? इधर एक चीज और देखने को मिल रही है। कुछ चैनल और कुछ अखबार इस मुद्दे पर दो भागों में विभक्त हो गये। जीटीवी, एबीपी, इंडिया टीवी को आपके द्वारा चलाया जा रहा यह अभियान देश हित में लग रहा है, पर आजतक और एनडीटीवी जो शुरू से ही आपके विरोधी रहे है, इस अभियान के खिलाफ आग उगलने शुरु कर दिये है।
पर आम जनता की क्या राय है, वो भी देखिये आज तक का सईद अंसारी नोटबंदी पर सोमवार की रात लाइभ समाचार दिखा रहा था, समाचार में वो दिखा रहा था कि जनता को नोटबंदी के बाद से कितनी परेशानी उठानी पड़ रही है, और इसी खरखाई में वह जनता की ओर माइक लगा कर जनता से पूछ डाला, आप इस परेशानी पर क्या कहेंगे?, जनता ने कह डाला – हम मोदी के साथ है, जनता मोदी-मोदी कहकर चिल्लाने लगी, फिर क्या था?, सईद अँसारी और आजतक के होश ही उड़ गये। इसमें कोई दो मत नहीं कि आम जनता को इस नोटबंदी अभियान से परेशानी हुई है, पर जनता इतनी मूर्ख भी नहीं कि इसके अंदर की बात को नहीं जानती और न समझती हो। जनता नरेन्द्र मोदी के साथ है, क्योंकि जनता जानती है कि काला धन ने देश को कितना नुकसान पहुंचाया है? कैसे ये आतंकवादियों और नक्सलियों को मदद पहुंचा रहा है?, कैसे आंतकी कश्मीर के पत्थरबाजों तक ये काला धन पहुंचाते थे?, नकली नोटों के माध्यम से। कैसे जमाखोंरों और भ्रष्ट अधिकारियों का दल काला धन के माध्यम से देश और विदेश में अपना कारोबार फैला रखा था? हमारा मानना है कि देश को आत्मनिर्भर और सम्मान के साथ जीना है तो इस पर अंकुश लगाना ही होगा।
जरा बेशर्म नेताओं को देखिये...एक नेता कहता है कि काला धन पर अंकुश लगना चाहिए, पर समय गलत चूना गया। मैं पूछता हूं कि काला धन पर अंकुश कब लगे?, इसके लिए किसी पंडित के पास जाकर सुदिन देखना था क्या? क्या इससे काला धन रखनेवाले लोग सतर्क नहीं हो जाते? देश में जब भी काला धन पर अंकुश लगाने का निर्णय लिया जाता, समस्याएं आती, और समस्याओं से लड़ने के लिए हमें कुछ त्याग करना होगा, देश हित में। सिर्फ खाने-पीने, सुतने और बेवजह की तिरंगे लहराने को देशभक्ति नहीं कहते।
मैं तो देख रहा हूं कि काला धन पर अंकुश लगाने के निर्णय से राजनीतिज्ञों, व्यापारियों, पत्रकारों, इंजीनियरों, डाक्टरों, आइएएस, आइपीएस, सरकारी बाबूओं और उन सारे दो नंबरियों के नींद उड़ चुके है, वे पैसों को ठिकाने लगाने के लिए नये – नये तरकीब ढूंढ रहे है। जो मजदूर कल तक सब्जी के बोरे ढोते थे, जो सामान ढोते थे, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी तबाह हुआ करती थी, जो तत्काल टिकट की बुकिंग करने के लिए रात से ही लाइन लगाने के लिए रेलवे टिकट बुकिंग काउंटर पर लगे रहते थे, उनसे रुपये बदलवाने का काम लिया जा रहा है, ये लोग बेवजह की एटीएम पर भीड़ लगा रहे है, जिनके कारण 30 प्रतिशत जरुरतमंदों को परेशानी उठानी पड़ रही है, हालांकि इन परेशानियों के बावजूद जनता मोदी की तारीफ करते नहीं थकती।
कल की ही बात है, रात में मैं एबीपी न्यूज देख रहा था, उस न्यूज में साफ दिखलाया जा रहा था कि जो लोग रात में ही एटीएम के पास पूरे परिवार के साथ खटिया और कंबल के साथ आ धमके है, वे सारे के सारे वहीं लोग है, जो काला धन को सफेद बनाने के लिए काला धन रखनेवालों की मदद कर रहे है। इनका एक ही मकसद है, काला धन रखनेवालों से मुंहमांगी रकम लो, और उनके काला धन को सफेद कर दो। हालांकि इन पर नकेल कसने के लिए केन्द्र सरकार ने स्याही लगाने का प्रबंध इनके हाथों में किया है। मैं चाहता हूं कि ऐसे लोगों को सीसीटीवी खंगाल कर, जेल में बंद भी करना चाहिए, ताकि काला धन रखनेवालों की मदद करनेवालों की नानी – दादी याद हो जाये।
हमारे देश में हर अच्छे काम करने पर उसका विरोध करना एक फैशन हो चला है। याद करिये, जब राजीव गांधी ने सरकारी कार्यालयों में कम्प्यूटर का प्रवेश कराया था, तो यहां की तत्कालीन वामपंथी और विपक्षी पार्टियों ने इसकी कितनी आलोचना की थी, इस निर्णय के खिलाफ कितना बड़ा आंदोलन चलाया था, पर आज सच्चाई क्या है?, सब के सामने है, इस कम्प्यूटर ने हमारी जिंदगी बहुत ही आसां कर दी है। ठीक इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी द्वारा लिया गया, यह निर्णय देश को मजबूती देने के लिए है। बस हमें मजबूती प्रदान करनी है, इस निर्णय की।
सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर का नरेन्द्र मोदी द्वारा लिये गये निर्णय की प्रशंसा करते हुए यह कहना कि जब हमारे फौजी, देश के जवान, विपरीत परिस्थितियों में, अपनी जान पर खेलकर देश की हिफाजत कर रहे है तो क्या हम देश के लिए इतना भी नहीं कर सकते?, आखिर दो – चार घंटे लाइन में लग गये तो क्या हो गया?, कौन सा पहाड़ टूट गया?
इस एटीएम पर लगी लाइन पर जो लोग सवालिया निशान उठा रहे है, उनसे हमारा भी सवाल है, कि आखिर हाल ही में फोकट के जियो सिम लेने के लिए लोगों ने डेढ़ किलोमीटर की लंबी लाइऩ नहीं लगाई है क्या? फिल्मों के टिकट पाने के लिए लोग लंबी लाइन नहीं लगाते क्या? और लंबी लाइन लग भी गयी तो क्या हो गया? अरे देश तुम्हारा है, देश के लिए कुछ तो करो भाई...

Thursday, November 10, 2016

माफ करिये मोदी जी................

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 व 1000 के नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक क्या चलायी, बाजार से एक, पांच, दस, बीस, पचास और 100 रुपये के नोट ही गायब हो गये। जिन्हें घर में सब्जी या जरुरत की चीजें - राशन खरीदनी है, उनके लिए जीवन - मरण का यक्ष प्रश्न आ गया है। सर्वाधिक चिंता का विषय ग्रामीण इलाकों में है, जहां स्थिति भयावह है। कल तक बैंक और पोस्टआफिस के बाबू मक्खी मारते थे, आज उनकी पौ बारह है। हर कोई उनकी आरती उतार रहा है, शायद ये बाबू भगवान बनकर कुछ मदद करा दें। एक से लेकर 100 रुपये के कुछ भी नोट का दर्शन करा दें, ताकि बनियों की दुकान पर जाकर, वे जरुरत का सामान खरीद सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि कुछ दिन दिक्कते आ सकती है, शायद उनका इशारा इसी ओर था, पर हमें लगता है कि ये दिक्कतें बहुत लम्बी जायेगी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत अन्य मंत्रियों के बयान अखबारों में धमाल मचा रहे हैं। देश की जनता भी प्रसन्न है, मोदी जी ने बहुत अच्छा काम किया है। नक्सलियो से लेकर आतंकवादियों, जमाखोरों तक पर बुलडोजर चला दिया, पर जब वे बाजार जा रहे है और उनसे पूछा जा रहा है कि छोटे नोट है, तो उनके हाथ - पांव फूल जा रहे है। शायद जमाखोरों को भी पता था कि मोदी जी धमाल मचायेगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी धमाल में उन्होंने देश में पड़े सारे छोटे नोटों पर कुंडली मार कर बैठ गये। मोदी जी, कभी-कभी अच्छा काम से भी नुकसान होता है...
हम जानते है कि आपका हृदय साफ है, पर यकीन मानिये हमलोगों का भी हृदय साफ है। बहुतों के घर में शहनाइयां बजनेवाली है...कहीं ऐसा नहीं कि उनके घरों में मातम पसर जाये। बहुत सारी देश की महिलाएँ अपने पति से छुपाकर पैसे रखती है, ताकि आसन्न संकटों का मुकाबला किया जा सकें, यहीं नहीं वे इन पैसों से अपने पति और परिवार का मान भी रखती है, पर आज वो मजबूर होकर घर से पैसे निकाल रही है। आपने कहा था कि आप बाहर के पैसों को भारत ला्येंगे, पर आपने घर से ही उनके पैसे निकाल लिये, जिनके सपने थे। आपने बहुत अच्छा किया है, आपकी सरकार में शामिल सभी मंत्री और नेता और आपकी पार्टी दूध के धूले है, लेकिन हमारा मत है कि देश की बेटियां और मां आपके लोगों से ज्यादा ईमानदार है...उन्हें भी देश प्यारा है...वे भी आतंकियों और नक्सलियों को अपने पैरों के ठोकरों पर रखती है...पर क्या करें। वे आज दुखी है। कहीं ऐसा नहीं कि उनकी आह आपको ले डूबे...इसलिए पहले वो काम करें, जिससे इन गरीबों व महिलाओं के सम्मान पर आंच न आये...बाकी आप जो करें, देश और जनता तो आपके साथ है ही...

Thursday, October 20, 2016

अरे चीन, पगला गया भइया................

जब से भारतीयों ने चीन और चीनियों को आर्थिक चोट पहुंचाने का संकल्प लेते हुए, अपने सपने साकार करने की कोशिश प्रारंभ की है, तभी से चीन और चीनियों की बौखलाहट सातवें आसमान पर हैं। वे भारत और भारतीयों के बारे में अनाप-शनाप बक रहे हैं। वे कोई भी ऐसी जगह नहीं छोड़ रहे, जहां वे अपनी हरकतों से भारत को नीचा दिखाने की कोशिश न कर रहे हो। दोस्त का दोस्त अपना दोस्त और दोस्त का दुश्मन अपना दुश्मन की कहावत को सार्थक करते हुए, वे पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर भी प्यार लूटा रहे है। वे हमारी ही बदौलत आर्थिक शक्ति को बढ़ाए है और हमें ही आंख दिखा रहे है। वे समझते है कि जैसे वे गुंडागर्दी करते हुए 1962 में हमारा बड़ा भू-भाग पर कब्जा कर लिया, तिब्बत पर कब्जा कर लिया। वैसे ही वे बार – बार करते रहेंगे और हम चुपचाप इनकी गुंडागर्दी के आगे नतमस्तक हो जायेंगे, पर उन्हें ये पता नहीं कि आज देश में एक नये युवाओं की टोली का जन्म हुआ है। वह अपने देश भारत को महाशक्ति बनाने के लिए वचनबद्ध है। उसके साथ 125 करोड़ की भारतीय आबादी भी साथ है। आज वह जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान के साथ आगे निकल पड़ा है।
चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स का पागलपन देखिये, वह हर दम हमें धौंस दिखाता है। वह समझ लिया है कि जैसे उसने तिब्बत को कब्जे में कर लिया, जैसे वह समय-समय पर अपने पड़ोसी जापान, ताइवान, विएतनाम, फिलीपीन्स को आंखे दिखाता है, उसी तरह भारत को भी आँख दिखायेगा और भारत उसके चरणों में जाकर झूक जायेगा। हम अच्छी तरह जानते है कि चीन को ये सब करने का मौका हमारी पूर्ववर्ती सरकारों ने दिया है, जिस पर अंकुश लगाने का काम वर्तमान सरकार और यहां की वीर युवाओं की टोली ने प्रारंभ किया है। हम चीन को बता देना चाहते है कि वे गीदड़भभकी दिखाना बंद करें और सच्चाई को समझे।
चीन का यह कहना कि भारत के लोग मेहनती नहीं, सिर्फ हल्ला करना जानते है, माल उससे ही खरीदेंगे तो फिर वो बौखलाहट में क्यों है?, वो हमें गाली क्यों दे रहा है?, जब वह सब कुछ जानता है। हम आपको बता देते है कि चीन समझ चुका है कि भारतीयों ने अब ये पूर्णतः समझ लिया है कि बिना चीन को उसकी औकात बताएं भारत का निर्माण हो ही नहीं सकता। तभी तो देश की करोड़ों जनता ने चीन को उसकी औकात बताने के लिए इस दीपावली में संकल्प कर लिया और चीन को उसकी औकात बतानी शुरु कर दी। पूरे भारत में एक प्रकार का चीनी सामानों के बहिष्कार का लहर है, जिस पर सारी जनता एक है।
आखिर चीनी सामानों का बहिष्कार क्यों?
1. चीन का सामान भारतीय सामानों की अपेक्षा घटिया होता है।
2. चीन के सामान से प्रदुषण का खतरा होता है।
3. चीन के खाद्य पदार्थों की विश्वसनीयता नहीं के बराबर होता है, वह किन चीजों से बनाकर भारत या अन्य देशों में भेजता है, उसकी विश्वसनीयता ही नहीं होती।
4. चीन कभी भी विश्वसनीय नहीं रहा।
5. चीन सिर्फ अपनी भलाई में ही मग्न रहता है और अपनी भलाई के लिए वह कुछ भी कर सकता है, जैसे दुसरे देश पर चढ़ाई और उसका मान-मर्दन। जैसे उसने तिब्बत पर चढ़ाई कर उस तिब्बत को सदा के लिए बर्बाद कर दिया। भारत का कई हजार वर्गमील उसने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।
6. चीन पाकिस्तान के उन आतंकी समूहों की सराहना और बचाव करता है, जो भारत में आतंक फैलाता है।
7. चीन पाकिस्तान को हर मोर्चें पर मदद करता है, जिससे भारत को नुकसान पहुंचने की शत प्रतिशत गारंटी रहती है।
8. चीन के सैनिक हमेशा भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं।
चीन के समर्थक – भारत में चीन के भारत विरोधी और उसकी आक्रमणकारी गतिविधियों का समर्थन यहां के वामपंथी खुलकर करते है। वे अमरीकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाते है, पर चीन के साम्राज्यवादी नीतियों को खुलकर समर्थन करते है, कई वामपंथी कार्यालयों में चीनी साम्यवादी नेताओं के चित्र और उन पर लदे फूल मालाएं आप स्वयं जा कर देख सकते है।
चीन अब जान चुका है कि भारत और भारत के लोग जाग चुके है, इसलिए वह अपनी भड़ास अब भारत और भारतीयों को गाली देकर निकाल रहा है। बस भारतीय सिर्फ इतना ही करें, अपने लिये संकल्प को पूरा करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। जहां भी देखे, चीनी सामान उसका बहिष्कार करें। सरकार और यहां के नेता मजबूर हो सकते है, पर हम मजबूर नहीं, चीन को हम औकात बता कर रहेंगे, भारत को आर्थिक महाशक्ति बना कर रहेंगे। हम अपने पैसे से चीन की ताकत नहीं बल्कि चीन की ताकत को मटियामेट करेंगे और अपने जवानों को कहेंगे कि देखों हम तुम्हारे साथ है। डटे रहो सीमा पर। चीन को जवाब दो। हम सब मिलकर भारत की कायाकल्प करेंगे। चीन मुर्दाबाद। उसकी साम्राज्यवादी नीतियां मुर्दाबाद। उसकी भारत विरोधी गतिविधियां मुर्दाबाद। आंतक समर्थक पाकिस्तान समर्थक चीन और चीन की नीतियां मुर्दाबाद। मुर्दाबाद वे अखबार, वे नेता जो भारत में ही रहकर चीन की स्तुति गाते है, मेरा इशारा किस ओर है, आप समझ गये होंगे।

Wednesday, October 5, 2016

लो शुरू हो गया अपनी ढपली अपना राग..............

अरविंद केजरीवाल, अरुण शौरी, दिग्विजय सिंह के बाद संजय निरुपम और पता नहीं और कौन – कौन से लोग आयेंगे। इन सभी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मांग की है कि वे सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो जारी करें। इन्होंने प्रत्यक्ष रुप से ये भी कह डाला कि इस प्रकार के स्ट्राइक पूर्व में भी होते रहे पर किसी ने इस प्रकार से मीडिया के समक्ष इन बातों को नहीं उठाया, पर भाजपा की मोदी सरकार ने पालिटिकल माइलेज के लिए ऐसा किया। हमें पूरा विश्वास था कि कुछ दिनों के बाद इस प्रकार के बयान सुनने को मिलेंगे, इसकी संभावनाएं हमें पहले से थी, क्योंकि विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां देशद्रोहियों की एक परंपरा रही है। उन परंपराओं की ओर जायेंगे तो देखेंगे कि इसकी बहुत बड़ी लिस्ट है, पर मैं ज्यादा तो नहीं, पर कुछ महान देशद्रोहियों का नाम यहां जरुर रखना चाहेंगे। मो. गोरी के समय जयचंद, ब्रिटिश हुकुमत के समय जब महारानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ रही थी, तो सिंधिया परिवार ने लक्ष्मीबाई को मदद न कर, अंग्रेजों की मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसका वर्णन तो सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी किया – यह कहकर कि अंग्रेजों के मित्र सिंधिंया ने छोड़ी रजधानी थी, खुब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी व देश की युवाओं के धड़कन भगत सिंह को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने में सुप्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह के पिता शोभा सिंह का बहुत बड़ा हाथ था। इसलिए जब हाफिज सईद जैसे आतंकियों को सईद जी कहकर संबोधित करनेवाला वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह जब ये कहता है कि सर्जिकल स्ट्राइक जैसी चीज कुछ हुई ही नहीं तो हमें यह आश्चर्य नहीं होता और रही बात संजय निरुपम की तो फिलहाल शिव सेना से कैरियर शुरु करनेवाला अभी सेकुलर राजनीति का प्याज खा रहा है, अरविंद केजरीवाल तो दुनिया के एकमात्र ईमानदार नेता है, इसलिए उनकी ईमानदारी तो इसी में है कि वे प्रधानमंत्री के साथ – साथ भारतीय सेना पर भी अंगूली उठा दें। अरुण शौरी के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो वो बैंटिग की है कि उनका वश चले तो वे जयचंद को भी मात दे दें। ये तो रहा भारतीय पक्ष अब देखते है पाकिस्तान के क्या हाल है... पाकिस्तान भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर इतना घबराया हुआ है कि पाकिस्तानी सेना पिछले दिनों पत्रकारों का एक दल बार्डर के समीप ले गया। उसके इस हरकत पर फ्रांसीसी न्यूज एजेंसी एएफपी ने पाकिस्तान के इस हरकत को एक दुर्लभ कदम करार दिया। पाकिस्तानी मीडिया डॉन और द न्यूज इंटरनेशनल के मुताबिक वहां सर्जिकल स्ट्राइक के कोई निशान नहीं मिले पर एएफपी ने पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल असीम बाजवा का बयान छापा कि जिसमे बाजवा ने कहा कि उनका इलाका मीडिया के लिए खुला है, आप देख सकते है कि यहां शांति है, यहां कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुई, हालांकि एएफपी ने यह भी लिखा बाजवा के दावों की पुष्टि करना संभव नहीं था कि भारतीय सेना ने उन क्षेत्रों में सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की। इधर आतंकी दाउद इब्राहिम का समधी जावेद मियांदाद अपने स्वभावानुरुप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गालियों से नवाजा है। पाकिस्तान के पूर्व वायुसेना प्रमुख रह चुके एयर मार्शल असगर खान ने कहा है कि पाकिस्तान को भारत से कभी कोई खतरा नहीं रहा, सच्चाई यह है कि पाकिस्तान ने ही भारत पर ज्यादा हमले किये। इसी बीच भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इतनी विकट परिस्थितियों में भी मानवीय मूल्यों को तरजीह देकर दोनों देशों में सुर्खियां बटोर ली है, जब उन्होने पाकिस्तानी यूथ डेलिगेशन के साथ मित्रवत् व्यवहार किया। हुआ यह कि एक अक्टूबर को पीस फोरम आगाज दोस्ती की कन्वेनर आलिया हरीर ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से अपनी सुरक्षा को लेकर बात की। सुषमा ने आलिया को सुरक्षित वापसी को लेकर भरोसा दिलाया। सुषमा स्वराज ने इस टीम को हृदय को छू लेनेवाली प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि बेटियों के लिए कोई सरहद नहीं होती। बेटियों का ताल्लुक सबसे होता है।
इसी बीच यूनाइटेड नेशन में रूस के राजदूत और अक्टूबर महीने के लिए सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष ने पाकिस्तान को तगड़ा झटका दिया है। उन्होंने यूनाइटेड नेशन जैसी वैश्विक संस्था में कश्मीर मसले और भारत की सर्जिकल स्ट्राइक का मुद्दा उठानेवाले पाकिस्तान को स्पष्ट तौर पर झिड़की लगायी है और कह दिया कि यह सुरक्षा परिषद भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनावों पर चर्चा नहीं करने जा रहा। संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत विताली चर्किन ने तो मीडिया के द्वारा पूछे गये सवाल पर भी नो कमेंट्स कहकर निकल गये। कुल मिलाकर पूरे विश्व स्तर पर भारत को मिल रही साख और भारतीय सेना को मिल रहे साथ पर अब भारत के कुछ जयचंदों की फौज अंगूलियां उठानी शुरु कर दी है, वह भी क्षुद्रस्वार्थ के लिए। यही भारत की सही इमेज है, जो कभी भी खत्म नहीं हो सकती।
(यह आर्टिकल रांची से प्रकाशित समाचार पत्र आजाद सिपाही में आज के अंक में संपादकीय पृष्ठ 11 पर प्रकाशित है।)

Saturday, October 1, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक ने पाकिस्तानियों के बैंड बजा दिये, पूरा पाकिस्तान सदमें में.................

सर्जिकल स्ट्राइक ने पाकिस्तानियों के बैंड बजा दिये, पूरा पाकिस्तान सदमें में
पाकिस्तान की सड़कों पर पिछले दो दिनों से नहीं दीख रहे आतंकी...
भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक को क्या अंजाम दे दिया। पूरा पाकिस्तान ही सदमें में है। पाक अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल आपरेशन के खात्मे के बाद, न तो लश्करे तैय्यबा, न हिजबुल मुजाहिद्दीन और न ही जैशे मोहम्मद के आतंकियों की ओर से इस संबंध में कोई बयान आये है। बात-बात में जमात उत दावा का आतंकी जो भारत के खिलाफ जहर उगलता था, उसकी भी बोलती बंद है। कल तक हर बात में भारत को देख लेनेवाले पाकिस्तान आतंकियों का समूह जो पाकिस्तान की सड़कों पर एक भारी भीड़ लेकर जमा होता था, वो दिखाई नहीं दे रहा। न तो पाकिस्तान के अखबार में उनके बयान नजर आ रहे है और न ही भारत के अखबारों में। चूंकि ये सर्जिकल वार उन आतंकियों के खिलाफ था, जो भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों में लिप्त होते हुए पाकिस्तान की सरजमीं को अपना जन्नत समझते है, ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया ज्यादा जरुरी थी, पर हमें लगता है कि जिस प्रकार से भारतीय सेना ने उड़ी का बदला लिया है। अब वे भी समझ गये होंगे कि वे पाकिस्तान में भी सुरक्षित नहीं है। भारतीय सेना उनका हर जगह, उन्हें सबक सिखाने को अब तैयार है। भारत अब पाकिस्तान के इस गीदड़भभकी से भी डरने को तैयार नहीं कि पाकिस्तान एक न्यूक्लियर पावर है।
आश्चर्य इस बात की है कि पूरे पाकिस्तान के ये हाल है कि उसका प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सेना इन सब के बयान सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर समानता लिये हुए नहीं हैं, जबकि इसके ठीक उलट भारत की ओर से भारत के प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सेना के बयानों में समानता है।
यहीं नहीं पहले पाकिस्तानी नागरिक और अब भारतीय नागरिकता प्राप्त कर चुके अदनान सामी के ट्वीट ने पाकिस्तानियों के नींद उड़ा दिये है। अदनान सामी ने ट्वीट कर भारतीय प्रधानमंत्री और भारतीय सैनिकों को आतंक के खिलाफ कार्रवाई करने पर बधाई दे दी है। पाकिस्तानियों ने अदनान सामी के खिलाफ गालियों का बौछाड़ कर दिया है, स्थिति ऐसी है कि अदनान सामी के इस ट्वीट पर पाकिस्तानियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है।
अगर पाकिस्तान की अखबारों की बात करें, तो उनके भी सुर बदले हुए है, अपने पोर्टलों पर कभी कुछ तो कभी कुछ लिखकर आत्मसंतुष्टि दिखा रहे है, जिसमें डॉन जिसे एक जिम्मेदार अखबार माना जाता है, उसकी ओर से भी गलतियां साफ दिखाई पड़ रही है, जैसे डॉन ने लिख दिया कि पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई में 8 भारतीय सैनिक मारे गये, जबकि इस खबर में कोई सच्चाई नहीं, बाद में उसने संशोधित किया। यानी एक सर्जिकल स्ट्राइक ने पाकिस्तानियों के दिमाग में ऐसे स्ट्राइक किये है कि पूछिये मत।
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री, वहां के सरकार में शामिल अन्य नेता व विपक्ष, यहां तक की मीडिया और सेना तक यह बात मानने को तैयार नहीं कि भारत ने उनसे उड़ी का बदला ले लिया, सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया पर विश्व के अन्य देशों के अखबारों ने सिद्ध कर दिया कि भारतीय सेना ने आक्रामकता दिखाई और पाकिस्तान को बैकफूट पर भेजने में कामयाबी हासिल किये। इसके लिए आप बीबीसी और न्यूयार्क टाइम्स का आधार ले सकते है।
हालांकि ये सवाल पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लोग पूछ रहे है कि अगर उनके अनुसार भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की तो फिर उन्हें बेचैनी क्यूं है। वे इस घटना की गुरुवार से लेकर बार-बार निंदा क्यूं कर रहे है। जब मामला लाइन ऑफ कंट्रोल पर सामान्य घटना से जुड़ा है तो वहां के रक्षा मंत्री और सेना के चेहरे, यहां तक मीडिया में काम कर रहे लोगों के चेहरों पर हवाइयां क्यों उड़ रही। बार –बार परमाणु बम की धौंस कहा गयी। एक गैर-जिम्मेदारानां मुल्क की तरह बयानबाजी करनेवाला देश आज असहाय क्यूं है, ये पाकिस्तान को चिंतन करना चाहिए। क्या वजह है कि आज बांगलादेश, भूटान, अफगानिस्तान, भारत यहां तक ईरान आप से खफा है। एक समय था कि कश्मीर मुद्दे को ही लेकर विश्व के कई देश आपके साथ हो जाया करते थे, पर आपने आतंकियों को ऐसा पाला कि इक्के-दुक्के को छोड़ कोई आपके साथ नहीं।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा केरल में दिया गया बयान आज पूरे विश्व के लिए प्रासंगिक है कि हमें गरीबी, बेरोजगारी के लिए लड़ना है, अपने देश को विकसित करने के लिए काम करना है, पर आप तो नरेन्द्र मोदी को सुनने को ही तैयार नहीं। आज पता नहीं कैसे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने स्वयं के द्वारा बुलाये गये फेडरल कैबिनेट की बैठक में गरीबी और बेरोजगारी से लड़ने की बात कह दी, पर वे ये कहना नहीं भूले कि भारत के इस आक्रामक प्रहार का जवाब देने के लिए उनकी सेना तैयार है। वे आज भी कश्मीर को लेकर अपनी नीति स्पष्ट कर दी, कि हम नहीं सुधरेंगे। हम भी जानते है कि पाकिस्तान कभी नहीं सुधरेगा, क्योंकि पाकिस्तानियों को जो इतिहास पढ़ाये जा रहे है, उस मूल में ही भारत के प्रति नफरत कूट-कूट कर भरा जाता है, ऐसे में आप पाकिस्तान से बेहतर संबंध किसी कालखंड में संभव नहीं। हम आपको बता दें कि अगर कश्मीर समस्या हल भी हो जायेगा तो ये मत भूलिये कि ये देश आपको शांति से रहने देगा, क्योंकि इसकी बुनियाद में ही भारत के प्रति नफरत भर दी गयी है, जबकि इसके विपरीत आप भारत के किसी भी शिक्षा केन्द्र में चल रहे पुस्तकों को टटोलें तो उसमें पाकिस्तान के खिलाफ एक भी शब्द नहीं मिलेगा, जिससे यह पता चलता हो कि भारत ने कभी अपने पड़ोसी के खिलाफ सपने में भी बुरा सोचा हो।
(यह आर्टिकल रांची से प्रकाशित समाचार पत्र आजाद सिपाही में आज के अंक में संपादकीय पृष्ठ 11 पर प्रकाशित हुई है।)

Friday, September 30, 2016

भारतीय सेना पहली बार लाइन ऑफ कंट्रोल के पार..................

मोदी ने किये पाकिस्तानी हुक्मरानों के बोलती बंद, भारतीय सेना पहली बार लाइन ऑफ कंट्रोल के पार
भारतीय जनमानस को बहुत बड़ी राहत देनेवाली खबर, बरसों बाद सुनने को मिली। भारत ने पाकिस्तान की नींद उड़ायी है। बरसो बाद भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर में एक बड़े हमले को अंजाम दिया और सर्जिकल स्ट्राइक को सफलता पूर्वक संपन्न किया है। इस घटना के साथ ही
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरे विश्व को बता दिया कि अब भारत नियोजित आतंक को नहीं सहेगा, बल्कि उसका जवाब भी देगा। याद करिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण का समय, जब उन्होंने सभी पड़ोसियों को आमंत्रित कर अपने पड़ोसियों के साथ बेहतर संबंध बनाने की ओर कदम बढ़ाया था। याद करिये वे कभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के घर भी अचानक पहुंच गये थे, यानी उन्होंने लगातार पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंध स्थापित करने के प्रयास किये, यहां तक कि पठानकोट में हुए हमले पर भी उन्होंने कड़वे घूंट पीये। भारतीय प्रधानमंत्री के इस कड़वे घूंट पीने और बार-बार संयम अपनाने से पाक हुक्मरानों को लगा कि वे भारत के साथ पिछले इंदिरा युग से चले आ रहे प्रॉक्सी वार को मोदी युग में भी कामयाबी दिलाकर रख देंगे, पर उन्हें पता नहीं कि मोदी, तो मोदी है, जहां जाते हैं, अपनी वाकपटुता और कार्यशैली से सभी को अपना मुरीद बना लेते है, ऐसा मुरीद की सामने वाले शत्रुओं के परम मित्र भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिभा के कायल हो जाते है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सहनशीलता पर पाक हुक्मरानों ने तो यहां तक कह दिया कि अगर पाकिस्तान के खिलाफ भारत ने लाइन ऑफ कंट्रोल पार किया तो उसके बम केवल शो पीस के लिए नहीं बना है, यानी हर वक्त धमकी, हर वक्त उन्माद फैलाने की बात, आतंकियों की भी एक जमात बनाना, एक अच्छा आतंकी और दूसरा बुरा आतंकी। हर वक्त भारत को देख लेने की बात, पाकिस्तान की ओर से सुनाई पड़ रही थी। जिसका जवाब पाकिस्तान को देना जरुरी था। इसी बीच उड़ी की घटना और 18 भारतीय जवानों की मौत ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अंदर से हिलाकर रख दिया। जब यह घटना घटी थी तो हम एक-दो दिनों के बाद रांची के खादी बोर्ड के मुख्यालय में पहुंचे थे, जहां खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ, अरुण श्रीवास्तव और कई गण्यमान्य नागरिक उपस्थित थे। मैंने उसी समय कहा था कि उड़ी घटना के बाद, आज जो सोशल साइट्स या भारत के विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर बेवजह हमले हो रहे है, शायद उन्हें पता नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूसरे मिट्टी के बने हुए है। मैंने उसी समय कह दिया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि वे इसका बदला जरुर लेंगे तो इसका मतलब है कि वे बदला जरुर लेंगे और लीजिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बदला ले लिया। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो साफ कह दिया था कि कश्मीर के गीत गानेवाले पाकिस्तान के हुक्मरानों से हमें अब बात नहीं करनी। उन्होंने साफ कहा कि आतंकी कान खोलकर सुन लें, हमारा देश उड़ी हमले के शहीदों की कुर्बानी कभी नहीं भूलेगा। उन्होंने यह भी कहा था कि हमसे हजार साल लड़ने की बात कहनेवाले पाक के हुक्मरानों की चुनौती मैं स्वीकार करता हूं।
ऐसे में हम अपने माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बातों पर कैसे विश्वास नहीं करते। गर्व करिये, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज इतिहास बनाया है, पहली बार 1971 में बनी लाइन ऑफ कंट्रोल को भारतीय सेना ने पार किया, जिसका ऐलान संवाददाता सम्मेलन कर भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल रणवीर सिंह ने किया। उन्होंने बताया कि पैरा कमांडोज हेलिकॉप्टर से एलओसी पहुंचे, फिर पैदल ही पाक के कब्जे वाले कश्मीर में 3 किलोमीटर अंदर घुसकर आतंकियों के 7 कैम्प ध्वस्त कर दिये। इस घटना से पाकिस्तान इतना तिलमिलाया कि उसके प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने इस स्ट्राइक की निंदा कर दी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का बयान था कि यह सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान पर हमला है, उसे कमजोर समझने की कोशिश न समझा जाये।
लेफ्टिनेंट जनरल रणवीर सिंह के अनुसार उन्हें विश्वस्त सूत्रों से सटीक जानकारी मिली थी कि आतंकी एलओसी के साथ लॉन्चपैड्स पर इकट्ठे हुए है। उनका मकसद भारत में घुसपैठ करने आतंकी हमले को अंजाम देना था। भारत ने उन लॉन्चपैड्स पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दिया। इन हमलों के दौरान आंतकियों और उनके समर्थकों को भारी नुकसान हुआ है। कई आतंकियों को मार गिराया गया है। इस घटना की जानकारी पाकिस्तानी सेना को भी दे दी गयी। इधर पाकिस्तान इंटर सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस ने स्वीकार किया कि भारत ने भीमबेर, हॉटस्प्रिंग, केल और लिपा सेक्टर पर हमले किये है। इधर पाकिस्तान सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि इस हमले में उसके दो सैनिक मारे गये और नौ घायल हुए। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के इस बयान को पाकिस्तानी अखबार डान ने प्रमुखता दी है। हमें अपने भारतीय सेना पर गर्व है, हम भारतीयों को गर्व है, ऐसे कमांडोज पर जिन्होंने उड़ी की घटना का बहुत जल्द ही बदला ले लिया। हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उन नीतियों की भी प्रशंसा करते है, जिन नीतियों के कारण आज पाकिस्तान पूरे विश्व में मुंह दिखाने के लायक नहीं। हम प्रशंसा करते है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जिनके कार्यों से आज पूरे विश्व में भारत का मान बढ़ा है, भारत की साख बढ़ी है और विश्व के विभिन्न देशों में रह रहे भारतीय शान से स्वयं को भारतीय कहलाने पर गर्व महसूस कर रहे है।
(यह आर्टिकल आज रांची से प्रकाशित आजाद सिपाही नामक समाचार पत्र में संपादकीय पृष्ठ संख्या 11 पर प्रकाशित हुई है।)

Saturday, June 25, 2016

ये है हमारे नेता, हमारे उद्धारकर्ता, आधुनिक जयचंद.........

ये आधुनिक जयचंद है, जो भारत की इस असफलता पर अट्टहास कर रहे है...
आइये हम आपको एक कहानी सुनाते है। ये कहानी भारत की ही है। जब पृथ्वी राज चौहान ने संयोगिता के साथ विवाह रचाया तो जयचंद ने इसे अपना अपमान समझा। इस अपमान के बदले में उनसे मुहम्मद गोरी का साथ देने का निश्चय किया। पृथ्वी राज चौहान की हार हुई, मुहम्मद गोरी जीत गया, पर ऐसा नहीं कि जयचंद को उससे फायदा हुआ, हुआ यह कि भारत एक बार फिर विदेशियों के हाथों पराजित हुआ, मानमर्दित हुआ।
दूसरी कहानी सुनिये...
महारानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों को धूल चटा रही थी और ग्वालियर नरेश अंग्रेजों के तलवे चाट रहे थे। ज्यादा जानकारी के लिए भारत की ही सुप्रसिद्ध कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ लीजिये –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
खुब लड़ी मर्दानी वो तो झांसीवाली रानी थी
जब भगत सिंह भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, सोते हुए भारतीयों को जगाने का काम कर रहे थे तो उस वक्त सुप्रसिद्ध दिवगंत पत्रकार खुशवंत सिंह का पिता शोभा सिंह भगत सिंह को फांसी के तख्ते पर पहुंचाने में मुख्य भूमिका निभा रहा था।
ऐसी एक नहीं, अनेक सच्ची कहानियां है, जो बताती है कि हम भारतीय चाहे शांत हो या गुस्से में हो, वहीं काम करते है, जिससे भारत का नुकसान हो जाय, भारत बर्बाद हो जाये...
ये हमारी फितरत है, हम सुधर नहीं सकते। हम सच्चे देशभक्त नहीं, क्योंकि पूरे विश्व में हम एकलौते देश है, जो आजादी की लड़ाई का भी कीमत वसूलते है, स्वतंत्रता सेनानी का वेतन लेकर, अब तो 1974 के जेपी आंदोलन का भी पैसा वसूल रहे है, जैसे लगता है कि आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे...
मैंने कहा न, ये हमारी फितरत है, हम सुधरेंगे ही नहीं...
हम जानते है कि 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया...हमारे हजारों रणबाकुड़ें मार डाले...हजारों वर्ग किलोमीटर भू-भाग को कब्जा कर लिया...पर आज भी हम उसकी आर्थिक समृद्धि के लिए वे सभी सामान खरीदते है, जो हमारे लिए जरूरी है, और वह चीन, हरदम हमारे सीने पर, तो कभी पीठ पर खंजर भोकता है...
हम हैं भारतीय, जो कभी नहीं सुधरेंगे...
आज ही देखिये,
अखबारों में पढ़ा कि भारत एनएसजी का सदस्य नहीं बना, क्यों नहीं बना तो चीन ने उस पर अड़ंगा लगा दिया...क्या भारत को एनएसजी का सदस्य नहीं बनना चाहिए।
हमारा उत्तर होगा – बनना चाहिए,
क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एनएसजी की सदस्यता के लिए जो प्रयास किये, वो गलत था...
एक दूसरे देश का सामान्य नागरिक भी होगा तो वह यहीं कहेगा कि मोदी का यह प्रयास सही था, पर जरा भारत के विभिन्न दलों में रह रहे जयचंदों को देखिए, बहुत खुश है। अनाप-शनाप बयान दिये जा रहे है। मोदी को कोस रहे है।
जरा केजरीवाल के स्टेटमेंट को देखिये – यह मूर्ख क्या कह रहा है – कह रहा है कि पीएम मोदी विदेश नीति के मोर्चे पर फेल रहे है, उन्हें यह बताना होगा कि वे विदेश यात्राओं में क्या करते रहे।
जरा कांग्रेस को देखिये वो कह रही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को और भारत को तमाशा बना दिया। लालू और नीतीश की तो बात ही छोड़ दीजिये, ये तो नमूने है। इनसे देशप्रेम की आशा करना तो अव्वल दर्जे के मूर्ख होने का प्रमाण पत्र स्वीकार करना है।
ये है हमारे नेता, हमारे उद्धारकर्ता, आधुनिक जयचंद।
अब कांग्रेसियों से कुछ सवाल...
कांग्रेसियों तुम्हे पता है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्वकाल में कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में उस वक्त के विपक्ष में रह रहे, जो विपक्ष के नेता भी नहीं थे, अटल बिहारी वाजपेयी ने क्या भूमिका निभाई थी, अगर नहीं पता तो मूर्खों ज्यादा दिन नहीं हुआ, इतिहास पढ़ो...
अरे कमबख्तों, कम से कम देश के मुद्दे पर तो एक हो जाओ...
क्या जयचंद बनने में, ज्यादा जोर लगा रहे हो...
अरे भारतीयों, अब भी चेतो...
अरे सरकार मजबूर है, विपक्ष घटियास्तर का है, पर तुम तो देशभक्त हो...
बहिष्कार करो, चीनी सामानों का...
बहिष्कार करो, चीनी नेताओं का...
बहिष्कार करो, चीनी सोच का, जो वामपंथियों ने भारत में फैला रखा है...
बहिष्कार करो, उन हर नेताओं को जो देश में रहकर विदेशी ताकतों को मजबूत कर रहे है...
उन वीर भारतीयों का हौसला बुलंद करों,
जो विपरीत परिस्थितियों में चीन को नाक में दम कर रखे है...
उन वीर वैज्ञानिकों का हौसला आफजाई करों, जो भारत को शक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे रहे है...
आखिर कब चेतोगे...
तुम्हारे देश के ज्यादातर नेता गद्दार है, ये याद रखो...
ये तुम्हारे बीच, जातिवाद फैलाते है, और इस जातिवाद की आड़ में अपने जोरु, अपने बेटी-बेटे, दामाद-बहु का आंगन क्लियर करते है...
जागो भारतीय जागो, पर तुम जागोगे, इसकी संभावनाएं हमें कम है...
क्योंकि विश्व में एकमात्र भारत ही ऐसा देश है, जो सर्वाधिक गुलामी का दंश झेलने का रिकार्ड अपने पास सुरक्षित रखा है...

Monday, June 6, 2016

भला अनैतिक रूप से अर्जित धन से पोषित बच्चे देश भक्त कैसे होंगे...

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अधिकांश माता –पिता अनैतिक रूप से धन कमाकर, अपने बच्चों का भरण-पोषण करते है, साथ ही ये आशा भी रखते है कि ये बच्चे बड़े होकर, उनकी सेवा करें और देशभक्त हो। भला अनैतिक रूप से धन कमाकर, उस धन से बच्चों का भरण-पोषण होने से बच्चे नैतिकरुप से कैसे मजबूत होंगे, ये मुझे समझ में नहीं आता। ये तो वहीं बात हुई कि पेड़ बो रहे है बबूल के और आशा रख रहे है कि इस बबूल से आम निकलेंगे।
ऐसे भी हमारा देश काफी प्रगति किया है...
जैसे जिन्हें चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करना है, तो वे धन-पशु बनने में सर्वाधिक समय व्यतीत कर रहे हैं, धन-पशु बनने के लिए जितनी भी कलाएं होनी चाहिए, उन सारे कलाओं में पारंगत हो गये, नतीजा स्वयं देखिये कल तक योगगुरु थे, आज व्यवसायी गुरु हो गये। कल तक उनकी एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते थे, आज वे स्वयं को मॉडल के रूप में स्थापित कर रहे है, फिर भी उन्हें वो सम्मान नहीं मिल रहा, जिनकी उन्होंने कभी लालसा रखी थी, वे तो इतने गिर गये है कि उन्हें अब राम और रावण में भी फर्क करना नहीं आ रहा...
इसी प्रकार, मैं देखता हूं कि कई ऐसे मंदिर देश में बने है, जो उद्योगपतियों के नाम पर है...कई ऐसे राजनीतिज्ञों को देखता हूं कि अनैतिक रूप से धन कमाकर, अपनी हैसियत दिन दुनी रात चौगुनी करते जा रहे है, और जब रमजान का महीना आयेगा तो ये अपने घरों में सफेद टोपी पहनकर इफ्तार का ऐसा आयोजन करते है, जैसे लगता है कि इन्होंने जिंदगी में कोई दंगा-फसाद या घृणित कार्य ही न किया हो और उससे भी बड़ा आश्चर्य कि ऐसे घटियास्तर के राजनीतिबाजों के इफ्तार में शामिल होने के लिए तथाकथित बड़े-बड़े मौलानाओं की झूंड भी आ खड़ी होती है।
रांची में एक सज्जन है, बहुत बड़े व्यापारी, मीडिया हाउस चलाते है, धन इतना कमाया है कि पूछिये मत, पर पर्यावरण की धज्जियां उड़ाने में, खनिज संपदा को लूटने में, अपने यहां कार्यरत कर्मचारियों का शोषण करने में, सरकार की कर प्रणालियों को चूना लगाने में, सबसे आगे है।
रांची में एक और सज्जन को मैंने देखा है कि वे बराबर नैतिकता की दूहाई देते थे, कोई ऐसा महीना नहीं होगा, जिस महीने में वे छद्म नाम से नैतिकता संबंधी या स्वयं के नाम पर नैतिकता संबंधी आलेख न छापे हो, उनके इस आलेख से कई लोग भ्रमित होकर, उन्हें महान इंसान समझ रखे थे, पर जैसे ही बिहार के एक राजनीतिज्ञ ने उन्हें राज्यसभा का टिकट देने का ऐलान किया, उनकी सारी पत्रकारिता की नैतिकता की गंगोत्री उस बिहार के राजनीतिज्ञ के चरणों में जाकर लोटने लगी।
मैंने कई आइएएस और आइपीएस अधिकारियों को देखा है, जिन्हें देखकर या उनकी स्क्रिप्ट पढ़कर मैं हैरान हो जाता हूं कि ये आदमी आइएएस या आइपीएस कैसे बन गया, तभी मेरे दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि बेटे ये भारत देश है , यहां भाग्य का भी विधान है, ये भाग्य का बहुत ही मजबूत है, पूर्व जन्म में कुछ बेहतर किया है, इसलिए इस जन्म में आइएएस या आइपीएस बन गया है, इसका राजयोग है, जब तक जिंदा रहेगा, लूटेगा, खायेगा, मर जायेगा, इससे देश-सेवा या समाज-सेवा की परिकल्पना भी करना बेमानी है...
ये कुछ दृष्टांत है...
और अब सवाल कि आखिर ये सब लिखने की आवश्यकता क्यों है...
मैंने इसमें राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, उद्योगपतियों, अधिकारियों और संतो के कुछ दृष्टांत दिये है, जो बताने के लिए काफी है कि हमारा समाज कितना गिर रहा है, यह भी बताने के लिए काफी है, कि जिनके उपर दारोमदार है, देश को आगे बढ़ाने का, वे कितने गिरे हुए है और जब जिनके कंधों पर जिम्मेदारी है, देश को आगे बढ़ाने का और वे अपने बेटे-बेटियों और अपनी पत्नियों के आगे कुछ सोचे ही नहीं तो समझ लो, देश बदल रहा है, और ये आगे नहीं, पीछे जा रहा है। देश या समाज, वहां रह रहे व्यक्तियों के चरित्र व व्यक्तित्व से जाना जाता है, और ये चरित्र या व्यक्तित्व का झलक मिलता है, वहां कार्य कर रहे अधिकारियों, संतों, पत्रकारों, उदयोगपतियों, राजनीतिज्ञों और वहां रह रही आम जनता से, पर यहां सभी ने सारी मर्यादाएं तोड़कर धन-पशु बनने में ही समय ज्यादा लगा दिया है, ऐसे में इन धन-पशुओं से भारत के निर्माण की बात करना मूर्खता है...
एक बात और जान लीजिये...
भारत बहुमंजिलों इमारतवाली भवनों वाली स्थानों का नाम नहीं...
भारत कल-कारखानोंवाली औद्योगिक स्थलियों का नाम नहीं...
भारत महानगरों में डांसबार या बीयरबार वाली सांस्कृतिक केन्द्रों का नाम नहीं...
भारत महानगरों में अधकचरा ज्ञान बिखरनेवाले पत्रकारों की अशिष्ट मंडलियों का नाम नहीं...
भारत घटियास्तर के राजनीतिज्ञों जो अपनी पत्नी, बेटे और बेटियों में अपना सुख-चैन देखते हैं, उसका नाम नहीं...
भारत उन अधिकारियों वाले देश का नाम नहीं, जो जिंदगी भर जोंक की तरह भारत की जनता का खून चूसकर धन इकट्ठा करते हैं...
भारत उन उदयोगपतियों का नाम नहीं, जो अनैतिक रुप से धन कमाते हैं...
भारत तो त्याग का दूसरा नाम है...
भारत तो मर्यादा का दूसरा नाम है...
भारत तो गुणता का दूसरा नाम है...
भारत तो कर्मयोग को ग्रहण करने का दूसरा नाम है...
पर फिलहाल, भारत में अधिकांश लोग, धन-पशु बनने की कला में माहिर होकर, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ धन-पशु बनने के लिए एक – दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं...
जिसमें राजनीतिज्ञों-पत्रकारों-अधिकारियों और सामान्य जन के लोग भी दिल से लगे हुए हैं, यानी कल तक जो भारत जिस चीज के लिए जाना जाता था, आज वहीं चीज यहां ढूंढने को नहीं मिल रही, ये हैं 1947 के बाद हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि...

Sunday, February 21, 2016

एनडीटीवी ने अपना नकाब उतारा.........

भारतीय संस्कृति में एक वाक्य बार-बार सुनने को मिलता है...
जो होता है, अच्छे के लिए होता है...
जेएनयू की घटना ने भी बहुत सारे लोगों के चेहरे पर से नकाब उठा दिया है...
नकाब उठने के बाद, क्या होता है...आप सभी जानते है , फिर सामने वाले से शर्म और हया सब खत्म...
एनडीटीवी ने स्पष्ट कर दिया कि वह विशुद्ध रुप से वामपंथी है...न तो उसे कांग्रेस से मतलब है और न ही भाजपा या उसके अन्य आनुषांगिक संगठन से...
उसने यह भी दावा ठोक दिया कि जो वामपंथ से टकरायेगा तो फिर एनडीटीवी भी उसे नहीं छोड़ पायेगा...
ऐसे तो सारा बुद्धिजीवी वर्ग जानता था कि ये चैनल वामपंथी चैनल है, पर सामान्य जनता नहीं जानती थी, आज सामान्य जनता जान गयी है...
वो अगर सारे चैनलों की सूची बनायी है कि कौन चैनल किस पार्टी का भोंपू है,तो एनडीटीवी के लिए भी उसने सूची दर्ज कर ली कि ये विशुद्ध वामपंथी चैनल है...
इसका भी मकसद कश्मीर को पाकिस्तान के हाथों सौंप देना, अमरीका को साम्राज्यवादी बताना और चीन को अपना दोस्त बताना, हिन्दूओं को गाली देने का तो उसकी पुरानी आदत है, जरा देखिये एनडीटीवी के संपादक ने क्या शिगुफा छोड़ा है, जिस शिगुफे को आजकल वामपंथी नेता छाती से लगाकर फेसबुक पर शेयर किये जा रहे है...वो है...
एनडीटीवी इंडिया के संपादक ऑनिंद्यो चक्रवर्ती के मुताबिक यह जेएनयू बनाम जनेऊ की लड़ाई है...ये महापंडित ऑनिंद्यो चक्रवर्ती, तोगड़िया टाइप भाषण तो लिख दिया पर उसे पता हैं कि गांव में रहनेवाले उन लाखों गरीबों पर क्या गुजरेगी...जब उसके इस भाषण टाइप का इस्तेमाल करना वामपंथी गुंडे शुरु कर देंगे...
जैसा कि केरल के कन्नूर जिले में हुआ वामपंथी गुंडों ने सुजीत की हत्या उसके माता-पिता के सामने ही निर्ममता से कर दी...
ऐसे हम आपको बता दें कि एनडीटीवी के भी कई संवाददाता और कैमरामैन कोई दुध के धुले नहीं, बल्कि ये भी एक नंबर के बदमाश है...और इसकी जानकारी प्राप्त करनी हो तो हमसे संपर्क करें...हम आपको प्रमाण के साथ बतायेंगे...