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Monday, March 20, 2017

प्यारे बच्चों.....................

प्यारे बच्चों,
आओ, आज मैं तुम्हें बताता हूं कि हमारे पूर्वज कैसे अभावों में भी शानदार ढंग से जीवन व्यतीत करते हुए अपने जीवन को समाज और देश के लिए उत्सर्ग कर देते थे। मैं कहूंगा कि तुम एक बात गिरह पार लो – तुम अपने जीवन में जितना आवश्यकताओं को सीमित करोगे, तुम उतना ही आनन्द प्राप्त करोगे और इसके विपरीत जितना तुम अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाओगे, तुम उतना ही दुख के सागर में डूबते चले जाओगे। कौन व्यक्ति कहां से धन ला रहा है? और कैसे वह अपनी आवश्यकताओं को पूर्ति कर रहा है? – ऐसी सोच सामान्य बुद्धिवाले लोग रखते है, पर जो असामान्य है, वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते। वे तो इस ओर ध्यान देते है कि उन्होंने अपने जीवन में ईमानदारी को वहन किया है या नहीं, जैसे ही उन्हें पता लगता है कि उनके पास आया धन बेईमानी से उन तक पहुंचा है, वे विचलित हो जाते है और उसका वे उपयोग करना भी पाप समझते है, ठीक इसके विपरीत अधम लोगों की प्रवृत्ति कैसी होती है? हमें लगता है तुम्हें बताने की जरुरत नहीं।
कहा भी गया है...
अधमा: धनम् इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा: मानम् इच्छन्ति, मानो हि महतां धनम्।।
अर्थात् जो दुष्ट होते हैं, उन्हें सिर्फ धन की इच्छा होती हैं, जो मध्यमवर्गीय है अर्थात जो न संत है, न अधम है, वे मध्यम मार्ग अपनाते है, उन्हें धन और मान दोनों की आवश्यकता होती है, पर जो संत प्रवृत्ति के लोग है, उनके जीवन में धन की इच्छा कभी नहीं रहती, उनके लिए तो सम्मान से बड़ा कोई धन है ही नहीं।
तुम जहां हो, वहां तुम्हें ये तीन प्रकार के लोग बराबर मिलेंगे, अब तुम्हें ये सोचना है कि तुम किस प्रकार के लोगों का वरण करो? या तुम्हारे मित्र या सखा किस प्रकार के लोग हो? ये निर्णय करने का अधिकार, मैं तुमलोगों पर छोड़ता हूं, मेरा स्वभाव क्या है? ये तुम जानते ही हो।
कुछ लोग कहते है कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती है, पर मैं कहता हूं कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती ही नहीं, और जितनी आवश्यकता होती है, उसका प्रबंध ईश्वर स्वयं कर देता है, ठीक उसी प्रकार जैसे...
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम
दास मलूका कह गये, सब के दाता राम
हमें लगता है कि तुम इस दोहे का अर्थ समझ गये होंगे।
मैं स्वयं 50 वें वर्ष में हूं और जो मैंने तुम्हारे दादा-दादी और अपने गुरुजनों तथा भारत के महान आध्यात्मिक संतों के बताये मार्गों का अनुसरण किया है, उससे साफ पता चलता है कि जीवन में धन उतना महत्वपूर्ण नहीं।
ऐसे भी धन से आप खाट या पलंग खरीद सकते है, पर नींद नहीं। धन से आप स्वादिष्ट व्यजंनों को खरीद सकते है, पर उसका रसास्वादन कर पायेंगे, इसका जवाब खरीदनेवाले के पास भी नहीं होता। आखिर ऐसा क्यों? इस पर चिन्तन की आवश्यकता है।
कुछ लोगों से मैं पूछता हूं कि महात्मा गांधी का घर कहां है? तो वे बताते है कि उनका घर गुजरात के पोरबंदर में हैं, पर उन्हें नहीं मालूम कि जिसे वे महात्मा गांधी का घर बता रहे है, गांधी ने वो घर बनाया ही नहीं, वो तो उनका पैतृक आवास है, गांधी को समय कहां मिला कि वे अपना घर बनायें।
मेरे प्यारे बच्चों,
याद रखों, जो दूसरे का घर बनाता है, वह अपना घर नहीं बना पाता, वो तो दूसरों के घर में ही आनन्द ढूंढ लेता है, तुम इसी बात को सरदार पटेल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, संत रविदासजी, गुरु नानक, स्वामी विवेकानन्द जी की जीवनी से भी जान सकते हो।
आजकल लोगों को मैं देखता हूं कि वे अपने आस-पास रहनेवाले मित्रों व पड़ोसियों के जीवन शैली को देखते हुए, स्वयं की जीवन शैली को प्रभावित करना प्रारंभ कर देते है, यह भी दुख का कारण है।
भाई मान लिया कि किसी के घर में फ्रिज है, तो कोई जरुरी नहीं कि मेरे घर में भी फ्रिज होने चाहिए, गर आवश्यकता है तो खरीदिये पर लोगों को दिखाने के लिए कि मेरे पास भी फ्रिज है, ये गलत है और ये दुख का कारण है...
जरा मुझे ही देख लो, मैंने तो अपने जिंदगी में फ्रिज खरीदी ही नहीं, और न मैं खरीदूंगा, क्योंकि मुझे ये आवश्यक नहीं लगता, आखिर क्यों, मुझे आवश्यक नहीं लगा, जरा ध्यान दो...
फ्रिज करता क्या है?
फ्रिज में सब्जियों को रख देने से सब्जियां ताजी रहती है, मैं कहता हूं कि मैं इतनी सब्जी खरीदू ही क्यों?  जिसके लिए मुझे भंडारण करनी पड़े, रोज बाजार जाउंगा और ताजी सब्जियां लाउँगा।
फ्रिज में पानी ठंडा रहता है, पर मैं दावे के साथ कहता हूं कि इस पानी से प्यास नहीं बुझती, जबकि घड़ा में पानी भी ठंडा और इससे प्यास भी बुझती है।
फ्रिज में पकाये भोजन के शेषांश को सुरक्षित रखा जा सकता हैं, मैं कहता हूं कि मैं इतना भोजन बनाऊं ही क्यों, जिसके लिए हमें सुरक्षित रखने के लिए फ्रिज की आवश्यकता पड़ जाये।
फ्रिज में आइसक्रीम बन जाती है, भाई हम कोई रईस की औलाद तो है नहीं कि हम रोज दस किलो दूध लाये और आइसक्रीम बनाते जाये, हम तो आइसक्रीम खाने के लिए किसी दुकान पर गये और आइसक्रीम खरीदी, खा लिये।
ऐसे भी फ्रिज रखेंगे, 24घंटे बिजली की खपत अलग और बेवजह का बिजली बिल का भुगतान करने का झंझट अलग।
यहीं नहीं, इसके अलावा फ्रिज से पर्यावरण को भी नुकसान, क्लोरोफ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन और ओजोन में छिद्र को बढ़ावा।
यानी कुल मिलाकर हमें नहीं लगता कि हम भारतीयों के लिए ये फ्रिज जरुरी है, पर देखता हूं कि लोग धड़ल्ले से इन फ्रिजों को अपने घर के रसोईघर में रसोईप्रवेश करा रहे है, और मैंने आज तक नहीं लिया।
सच्चाई जानते हो।
कुछ लोगों को देखता हूं कि जब अपने बेटे-बेटियों की शादी करेंगे तो अंधाधुंध खर्च करेंगे, जैसे लगता हो कि वे कितने धन्ना सेठ है, पर हम बता देते है कि ऐसी खर्च से वे अपने बेटे-बेटियों की खुशियां नहीं खरीदते, बल्कि वे स्वयं का नुकसान करते है, समाज और देश का नुकसान करते है, क्योंकि इसी देखा-देखी में लोग अपने घर के सुख को नष्ट कर डालते है। जो धन्ना सेठ है, जिनको ईश्वर ने धन दिया है, उन्हें भी चाहिए कि वे सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखे, पर वे ऐसा करेंगे, हमें नहीं लगता।
अगर ईश्वर ने किसी को धन दिया है तो उन्हें उक्त धन को, उन बेटियों की शादी में खर्च करना चाहिए, जिनकी शादियां धन के अभाव में नहीं हो रही। मैं दावे के साथ कहता हूं कि ऐसा करने से जो उन्हें आनन्द प्राप्त होगा, वह स्वयं की शादी में भी उन्हें नहीं आयी होगी।
कहा भी गया है...
संत प्रवृत्ति के लोगों के पास जो धन आता है, वह लोगों के आनन्द पर खर्च होता है और जब यहीं धन दूष्टों के पास पहुंचता है तो वह लोगों के आनन्द को हर लेता है...
संत प्रवृत्ति के लोगों की संख्या आज भी बहुतायत है, बस उन्हें परखने की जरुरत है...
मैं यह क्यों लिख रहा हूं, तुम सब, ये सब लिखने का मतलब समझ गये होगे...
बस करना यहीं है कि कभी भी अपने मेहनत के पैसे को उन जगहों पर जाया नहीं करना है, जो जरुरी न हो। जहां जरुरी है, वहां उन पैसों को खर्च करिये और जहां जरुरी नहीं है, वहां कुछ भी हो जाय, खर्च नहीं करना है, सदैव समाज और देश के लिए पैसे खर्च होने चाहिए।
भामा शाह को देखो, उनके पास खूब धन था, और उन्होंने अपना सारा धन महाराणा प्रताप के चरणों में रख दिया...
महाराजा रघु के दरबार में छोटा सा कौत्स जाता है, और महाराज रघु, कौत्स के पास अपना सारा धन रख देते है, और कौत्स उतना ही लेता है, जितनी की उसे आवश्यकता है। ये प्रमाण बताने के लिए काफी है कि भारत क्या है? और हमें क्या करना चाहिए...
खुब खुश रहो।
तुम्हारा पिता
कृष्ण बिहारी मिश्र

Tuesday, February 14, 2017

महात्मा गांधी ने कहा था..........

महात्मा गांधी ने कहा था –
जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानि क्या उससे उन करोड़ो लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा? जिनके पेट भूखे है और आत्मा अतृप्त है तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम समाप्त हो रहा है।
हम महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता मानते है, पर कोई बता सकता है कि हम महात्मा गांधी की बातों का कितना अनुसरण करते है?  संघ जिसकी राजनीतिक इकाई भाजपा है, क्या कोई बता सकता है कि संघ की विचारधाराओं को कितने स्वयंसेवक जो अभी राजनीतिक जीवन जी रहे है, उसका अनुसरण कर रहे है?  अगर जवाब है – ऐसा नहीं, तो फिर क्या आवश्यकता है? संघ को और महात्मा गांधी को ढोने की।
निरंतर स्वदेशी की बात करनेवाला संघ और उसके ईमानदार स्वयंसेवकों के हालत पस्त है, और ये हालत पस्त किसी और ने नहीं, बल्कि उन्हीं की राजनीतिक इकाई भाजपा ने कर दी है। कांग्रेस और उसके आनुषांगिक संगठनों ने तो महात्मा गांधी के स्वदेशी और ग्राम स्वराज्य को कब का आग लगा दिया था, तभी तो देश की हालत यह है कि आजादी के बाद से लेकर आज तक कभी भी भारत आर्थिक रूप से मजबूत ही न हो सका। ऐसे भी हमारे देश में आजादी के बाद एक-दो नेताओं को छोड़कर, कोई ऐसा नेता नहीं पैदा लिया, जिसने देश की आर्थिक समृद्धि के लिए ईमानदारी से प्रयास किया हो और विपक्ष ने ईमानदारी से ऐसे कार्य के लिए समर्थन किया। दोनों ओर यानी सत्तापक्ष और विपक्ष में शामिल नेताओं और एक नंबर के मूर्ख अधिकारियों के दल ने देश की ऐसी शक्ल बिगाड़ी कि यह देश कभी खड़ा ही नहीं हो सका और न अब लगता है कि यह खड़ा हो पायेगा।
जरा सोचिये जो चीन, संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारा खुलकर विरोध करता है, जो चीन हाफिज सईद का समर्थन करता है, जो चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोकता है, उससे यह कहना कि वह मेरे देश में पूंजी निवेश करें और चीन ईमानदारी से पूंजी निवेश कर भारत को आर्थिक रूप से मजबूत करने का दावा करें, ये माननेवाली बात है। यह तो वहीं बात हुई कि बिल्ली को कहा जाय कि तुम दुध की रखवाली करो। कितने शर्म की बात है, कि हम आज भी अपने शत्रु से अपनी आर्थिक समृद्धि की कामना करते है।
अभी ज्य़ादा दिनों की बात नहीं, 2016 की दिवाली, याद करें। रांची से प्रकाशित एक अखबार ने स्थानीय कुम्हारों के दर्द बयां किये थे, बताया था कि दिवाली के पर्व से असली दिवाली का आनन्द हमारा पड़ोसी चीन उठा रहा है, हम उसे मजबूत कर रहे है, और वहीं चीन आर्थिक रूप से समृद्ध होकर भारत की तबाही का मंसूबा रखता है। इसी दौरान चीन के इस दोहरे मापदंड पर झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का बयान भी सुनने और पढ़ने को मिला कि लोग चीन का सामान न खरीदकर भारतीय सामान खरीदें और देश को आर्थिक रूप से मजबूत करें। एक भाजपा समर्थक तथाकथित संत रामदेव है, जो हर समय देश के विभिन्न चैनलों पर स्वयं द्वारा निर्मित सामग्रियों का प्रचार करते है, यह कहकर कि भारत को आर्थिक गुलामी से मुक्त करायें पर सच्चाई क्या है?
इन भाजपाइयों के दोहरे मापदंड, स्वयंसेवक के नाम पर संघ को धोखा देनेवाले इन नेताओं की जादूगरी, बाजीगरी, कलाकारी और देश व राज्य के साथ धोखाधड़ी देखिये।  उसका सुंदर नमूना है – मोमेंटम झारखण्ड। मूर्खों ने हाथी तक उड़ा दिया है। हाथी जो काले रंग का होता है, उसे लाल रंग का बना दिया है। यहीं नहीं उसके कान नीले रंग के बना दिये गये, उसे हरे पंख लगाकर उड़ा दिया गया और इस तमाशे रुपी हाथी के निर्माण मे सरकार के तीस लाख रुपये खर्च हो गये, यानी यहां बेवकूफों को भी पैसे देकर उसका सम्मान बढ़ाया जा रहा है। भाजपा कार्यकर्ता और संघ के स्वयंसेवकों को मूर्ख समझकर उन्हें उनकी औकात बतायी जा रही है, जबकि कनफूंकवों के इशारे पर बाहर से आये बेवकूफों पर करोड़ों खर्च किये जा रहे है, वह भी विज्ञापन के नाम पर, चेहरा चमकाने के नाम पर।
जिन अधिकारियों को जेल में रहना चाहिए, उनका मनोबल बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि सत्ता में बैठे लोगों को मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर जो बेतहाशा राशि खर्च की जा रही है, उसको कमीशन के रूप में चूंकि ऐसे ही लोग उक्त राशि को उन तक पहुंचा सकते है, इसलिए उनकी सेवा विशेष रूप से ली जा रही है।
मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर उन सड़कों को पुनः निर्माण कराया गया है, जिनकी निर्माण की कोई आवश्यकता ही नहीं थी, वे पूर्व से ही इस स्थिति में थे, कि उसके निर्माण की कोई आवश्यकता ही नहीं थी, जबकि आज भी पूरे झारखण्ड की कई सड़कें ऐसी है, जिस पर यात्रा करना मौत को दावत देने के बराबर है, उस पर सरकार का ध्यान ही नहीं है। रांची के मुख्यमार्गों के विद्युत खंभो को सफेद रंग से पोता गया है, और उस पर चीन से मंगायी गयी विद्युतीय लत्तरों को लपेट दिया गया है ताकि रात में इससे रांची का सौंदर्य़ निखरें। सड़कों के दोनों किनारों के फुटपाथों को इस प्रकार जल्दबाजी में बना दिये गये कि आनेवाले समय में इस फुटपाथ पर लगे पेड़ जल्द ही दम तोड़ देंगे। सरकार और सरकार के अधिकारी मोमेंटम झारखण्ड को सफल बनाने में इस प्रकार लग गये है, जैसे लगता है, कि साक्षात भगवान झारखण्ड की धऱती पर अवतरित हो रहे हो। हद तो तब हो गयी कि पूरे रांची में मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर निषेधाज्ञा लागू कर दी गयी है, यानी आप अपने परिवार के साथ ठीक से दो दिन चल भी नहीं सकते, यानी जिनको रोजगार देने की बात कर, मोमेंटम झारखण्ड का आयोजन की बात करते है, उन्हें ही औकात दिखा रहे है। स्थिति यह है कि पूरे राज्य में विकास कार्य ठप है। पिछले दो महीनों से किसी भी आफिस में काम नहीं हो रहा। सभी जगह के अधिकारी और कर्मचारी मोमेंटम झारखण्ड ही रट रहे है, जैसे लगता है कि मोमेंटम झारखण्ड नहीं रटा तो उनकी जिंदगी ही प्रभावित हो जायेगी, यानी मानकर चलिए कि हाथी उड़ाने के चक्कर में राज्य की जनता कहीं की न रही और अधिकारियों और कनफूंकवों के तो जैसे दोनों हाथों में नहीं, बल्कि पूरा शरीर ही घी के लड्डू के कनस्तर में।

Monday, August 1, 2016

प्रतिभा सम्मान की आड़ में अखबारों का चलता व्यवसाय...

क. जब ढोंगी बाबाओं के विज्ञापनों को अपने अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित करनेवाला...
ख. जब ढोंगी बाबाओं को अपने यहां बुलाकर उसे महिमामंडित करनेवाला...
ग. जब सेक्स से संबंधी उलुलजुलूल विज्ञापन प्रकाशित करनेवाला...
घ. जब वशीकरण के नाम पर तमाम तरह के अंधविश्वास को आगे बढ़ाने से संबंधित विज्ञापन प्रकाशित करनेवाला...
ङ. जब नेताओं के चरणवंदना कर स्वयं को उपकृत करनेवाला...
च. जब बिल्डरों से आर्थिक मदद लेकर नाना प्रकार के कुकृत्यों को जन्मदेनेवाला...
प्रतिभा सम्मान का आयोजन करने लगे तो समझो दाल में काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। इन दिनों जिसे देखों, प्रतिभा सम्मान आयोजित कर रहा है, और आश्चर्य इस बात की है कि ऐसे आयोजनों में लोग अपने पूरे परिवार के साथ इस प्रकार भाग ले रहे है, जैसे लग रहा हो कि उनके बच्चों को भारत रत्न की उपाधि मिल रही हो। सच्चाई यह है कि इन अखबारों के द्वारा इस प्रकार का आयोजन इसलिए किया जाता है ताकि इसकी आड़ में अखबारों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण हो सकें। आप देखेंगे कि इस प्रकार के आयोजन में बड़ी संख्या में प्रायोजक भाग लेते हैं। उसका मूल कारण, बड़े-बड़े अखबारों को अपनी ओर आकर्षित करना है, ताकि उनके द्वारा भविष्य में जब उनकी गलतियां उजागर हो, तो ये अखबार अपनी ओर से मुंह बंद रखे, और ये होता भी है।
प्रतिभा सम्मान समारोह में सहजीविता के आधार पर प्रायोजक, आयोजक और सम्मानप्राप्तकर्ता सभी आनन्दित रहते है, और नुकसान उठाना पड़ता है, समाज को, राज्य को और देश को। नुकसान इसलिए कि, इस प्रकार के आयोजन से न तो बच्चों को लाभ होता है और न उन परिवारों को, जो इसका लाभ उठा रहे होते हैं। अरे इन बच्चों की प्रतिभा का सम्मान उसी दिन हो गया, जब बच्चे मैट्रिक अथवा इंटर की परीक्षा में प्रथम, द्वितीय या तृतीय आ गये।
प्रतिभा का सम्मान, अगर अखबार करने लगे तो फिर वे बच्चे जो इन अखबारों से कभी उपकृत ही नहीं हुए, वे बैठकर आलू छीलेंगे क्या?
अखबार का काम – सिर्फ नैतिकता के आधार पर समाचारों को प्रकाशित करना है, अगर अखबार यहीं काम ईमानदारी से करने लगे तो फिर प्रतिभा सम्मान समारोह की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, पर यहां हो क्या रहा है, जिन्हें जो काम करना है, वे उस काम को छोड़कर, वो सारी काम कर रहे है, जो उन्हें नहीं करना है।
एक महत्वपूर्ण बात, सम्मान को लेकर ही...
आइये महात्मा गांधी से जुड़ी एक कहानी सुनाता हूं। महात्मा गांधी का मूल नाम मोहनदास था, पर मोहनदास कौन है, आज किसी से पूछे, तो कोई नहीं बतायेगा, पर महात्मा गांधी बोले तो सभी बता देंगे कि महात्मा गांधी कौन है या महात्मा गांधी कौन थे...
क्या आप जानते है कि महात्मा गांधी को महात्मा की उपाधि किसने दी थी...
इसका सही उत्तर है – रवीन्द्र नाथ ठाकुर।
क्या आप जानते है कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि किसने दी थी...
इसका सही उत्तर है – सुभाष चंद्र बोस।
यानी सम्मान देनेवाला कौन है, उसकी नीयत क्या है, उसका समाज में क्या भूमिका है, यह भी देखी जाती है, ये नहीं कि किसी ने दे दिया और हमने ले लिया। जहां इस प्रकार की हरकतें चलती हो, उसे पूर्णतः व्यवसाय कहते है, न कि प्रतिभा सम्मान...
जरा कोई बता सकता है क्या कि रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने जब गांधी को महात्मा से नवाजा था या जब सुभाष चंद्र बोस ने गांधी को राष्ट्रपिता कहा था तब इस सम्मान समारोह के प्रायोजक कौन-कौन थे... और इस सम्मान समारोह में ताली पीटने के लिए गांधी के परिवार से कौन – कौन लोग मौजूद थे...
मेरे भाइयों,
अपने बच्चों को इस प्रकार के प्रतिभा सम्मान समारोह से दूर रखो...
उनमें सही मायनों में गांधी, रवीन्द्र और सुभाष जैसा चरित्र डालों...
पढ़ने का मतलब क्या होता है...
पढ़ने का मतलब प्रतिभा सम्मान समारोह में जाकर पीतल के टूकड़ें बंटोरना नहीं होता...
पढ़ने का मतलब, सिर्फ और सिर्फ चरित्र और संस्कार को अपनाना होता है...
झूठी सम्मान के पीछे या उसे प्राप्त करने के लिए बौराना नहीं होता...
अरे सम्मान तो मिलेगा ही, वो तो आपको दौड़कर, आपका हक दिलाकर रहेगा...
पर पहले कुछ करके तो दिखाओ...
अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है, सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दो, और कुछ नहीं...
वह भी कैसे...
केवल प्रबल प्रयास और अथक प्रयास से ज्ञान अर्जित नहीं किया जा सकता...
जरा अपने पूर्वजों की बताई मार्ग का अनुसरण करो...
जानो, ईश्वर किसकी मदद करता है...
उद्यमं, साहसं, धैर्यं, बुद्धि, शक्तिं, पराक्रमं।
षडते यत्र वर्तन्ते, तत्र देव सहाय्यं कृतः।।
जानो,
अभिवादनशीलस्य नित्यंवृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्यवर्दधन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।।
मेरे कहने का मतलब क्या...
एक दृष्टांत तुम्हारे सामने है...
बहुत लोग इंजीनियरिंग और डाक्टरी की पढाई कर रहे है, कुछ लोग कामयाब हो जाते है और कुछ कामयाब नहीं होते, जो कामयाब हो गये उसकी भी क्या गारंटी की वे इंसान ही होंगे और जो कामयाब नहीं हुए, उसकी भी क्या गारंटी की वे इंसान ही होंगे...
अगर तुमने शुरूआत ही गलत कर दी, तो मानकर चलो की अंत भी गलत ही होगा...
क्योंकि जिस घर की नींव ही गलत है, उस गलत नींव पर अच्छे मकान नहीं तैयार होते...
ठीक उसी प्रकार प्रतिभा सम्मान में उपकृत होनेवाले बंधु या परिवार इस प्रकार के सम्मान प्राप्त कर, सोचते है कि वे आगे निकल जायेंगे, तो हमें नहीं लगता कि वे आगे निकल पायेंगे, क्योंकि जो प्रतिभा सम्मान दे रहे है, उनका तो स्वयं ही आधार नहीं है, वे तो इस आड़ में स्वयं को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जा रहे है, वो आपको समृद्धि या सम्मान क्या दिला पायेंगे...
ऐसे आप स्वयं समझदार है, समझते रहिये...

Sunday, May 13, 2012

देश तरक्की कर रहा हैं, हम इँडियन किसी से कम नहीं...............................


मैं 45 का हो गया हूं, और मेरा मानना हैं कि जो इन वर्षों में मैंने देखा। देखकर यहीं महसूस कर रहा हूं कि देश वाकई तरक्की कर रहा है। कई प्रमाण हैं मेरे पास, इसे साबित करने के लिए। ये अलग बात हैं कि आप मेरे इन सबूतों पर विश्वास करें या न करें, पर इतना जरुर कहना चाहता हूं कि आकाशवाणी पटना में जब मैं आकस्मिक उद्घषोक के रुप में कार्य करता था, तब उसके मुख्यद्वार पर महात्मा गांधी के कथन उद्धृत थे, जिसे मैं बराबर पढ़ा करता था -- वो ये था गांधी के शब्दों में कि - "मैं चाहता हूं कि मेरे घर की खिड़कियां और दरवाजे सदा के लिए खुले रहे ताकि दूसरे स्थानों की आबोहवा व उनकी संस्कृति बेरोक टोक आया जाया करें, पर मैं ये नहीं चाहूंगा कि उनके इस संस्कृति के आने जाने के कारण, अपने ही देश की संस्कृति को खतरा उत्पन्न हो जाय।" ये कथन गांधी के थे, आज गांधी जीवित नहीं हैं और न उनको याद करनेवाले जीवित हैं। हाड़-मांस के पुतलों की यहां संख्या इतनी हो गयी हैं कि इसकी संख्या एक अरब को पार कर गयी हैं। जो लोग गांधी को ढोते हैं, उन कांग्रंसियों को भी अब गांधी और गांधी के राम से एलर्जी हो गयी हैं, क्योंकि वो जानती हैं कि न तो गांधी और न गांधी के राम, उन्हें वोट दिला सकते हैं। ऐसे में गांधी के इस कथन से उन्हें क्या लेना देना। ये आलेख लिखने के बक्त एक और शख्स की अनायास याद आ गयी। नाम हैं उसका मैकाले। जिसने भारतीय शिक्षा पद्धति की नींव रखी और जिसने डेढ़ सौ वर्ष पहले कहा था, उसे खुद भारतीयों ने चरितार्थ किया। आज तो भारत के गलियों में बच्चा - बच्चा एक डायलाग बोलता हैं। उसके बोल हैं --- टम टमा टम टम, टमाटर खाये हम। अंग्रेज का बच्चा क्या जाने, अंग्रेजी जाने हम। ये बोल बताते हैं कि देश कितनी तरक्की किया हैं। इस देश में अंग्रेजी दिवस नहीं मनाया जाता, पर इस देश में अंग्रेजी बोलना व पढ़ना शान समझी जाती हैं। इस देश में हिंदी दिवस मनाया जाता हैं, पर हिंदी पढ़ने, लिखने व बोलने में मंत्री से लेकर संतरी तक को झिझक और शर्म महसूस होती हैं, स्थिति ऐसी हैं कि अब हिंदी के इस देश में शुद्ध हिंदी बोलनेवालों की संख्या विलुप्त होती जा रही हैं। भारत का एक राज्य नागालैंड की तो भाषा ही अंग्रेजी हो गयी हैं। आईये हम आपको बता देते हैं कि मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में क्या कहा था --- LORD MACAULAY ADDRESS TO THE BRITISH PARLIAMENT, 2 FEBRUARY, 1835 "I have travelled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.
" मैकाले ने कहा था -- कि मैंने भारत के कोने कोने की यात्रा की, लेकिन इस यात्रा के दौरान मुझे न तो कोई भिखारी दिखा और न ही चोर। इस देश में मैने उच्च नैतिक मूल्यों और आदर्शों को देखा। जो वहां के निवासियों में कूट कूट कर भरा था। ऐसे देश को हम तभी जीत पायेंगे जब उसकी रीढ़ मानी जानेवाली आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत में बदलाव करेंगे। इसलिए मैं इस बात का सुझाव देता हूं कि उस देश की पुरानी और प्राचीन शिक्षा पद्धति को बदलने की कोशिश की जाये। उनकी संस्कृति में परिवर्तन कर हम उनको जीत सकते हैं। इसलिए हमारी कोशिश विदेशी और अंग्रेजी को बढ़ावा देने की हैं। ताकि उनको लगे, कि ये सब उनकी संस्कृति से बेहतर हैं। इन कदमों के उठाये जाने के बाद ही हमारा उस देश पर पूरा प्रभुत्व हो सकता हैं, अन्यथा नहीं।"
कमाल हैं आज हम दावे के साथ कह सकते हैं कि जिस मैकाले ने ब्रिटिश सत्ता के भारत में काबिज रहने तक अपनी परिकल्पनाओं को साकार होते हुए नहीं देखा, आज वो साकार ही नहीं, बल्कि पूरा देश अंग्रेजी और अंग्रेजमय हो जाना चाहता हैं। भारत और भारतीयता तो कहीं दिखती नहीं, सिर्फ इंडिया दिखता हैं। आनेवाले समय में आर्यावर्त, जंबूद्वीप, भरतखंड, हिंदुस्तान की तरह लोग भारत कहना भूल जायेंगे और अंग्रेजों का नाम दिया इंडिया ही देश का असली नाम माना जायेगा। उदाहरणस्वरुप देश के विभिन्न राष्ट्रीय अथवा प्रादेशिक निजी चैनलों के नाम देखिये -- ज्यादातर इंडिया व इंडिया के केन्द्र में हैं, भारत और हिंद तो दीखता ही नहीं। मेरा एक मित्र अमरीका में रहता हैं, उसकी पत्नी अमरीकन मूल की हैं। एक बार उनसे बातचीत हुई थी -- वो भारत को बहुत प्यार करती हैं। कहती है कि उनकी दादी कहा करती थी कि इंडियन बहुत अच्छे होते हैं, वे एक ही पत्नी पर अपना पूरा जीवन समाप्त कर देते हैं, पर अमरीका व पश्चिम देशों में तो लड़कियों की शादी ना हुई, तलाक का सिलसिला शुरु हो जाता हैं। इसलिए वो शादी एक भारतीय से की और उसे खुशी हैं कि वो भारतीय पति आज भी उससे उतना ही प्यार करता हैं, जितना की पन्द्रह - सोलह साल पहले किया करता था। बच्चे भी दो हैं और सब खुशी से रह रहे हैं कोई दिक्कत नहीं। पर क्या -- सचमुच भारत में ऐसा हैं, या केवल अब ये गलतफहमी लोग पाल रहे हैं..............................। आप इसे स्वीकार करिये, भारत, आज इंडिया हैं। वो इंडिया जो न तो पूरी तरह अंग्रेज बन सका और न ही पूरी तरह भारतीय। बीच में यहां की अरबों आबादी पेंडूलम की तरह लटक रही हैं। पूर्व में जिस किसी देश पर आक्रमण होता था तो उस आक्रमण में अपनी संस्कृति को थोपने की आदत कुछ ज्यादा ही दिखती थी। भारत में जितने भी विदेशी आक्रमणकारी आये, उनके मूल में धर्म प्रचार और यहां की शैक्षिक संस्थाओं व संस्कृतियों को मटियामेट करना और अपने को मजबूत स्थिति में रखना ही मूल मकसद हुआ करता था। नालंदा के अवशेष खंडहर और सोमनाथ मंदिर को लूटा जाना - इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। कल के भारत और आज की इंडिया ने् कई आक्रमणकारियों व विदेशी शासकों को अपनी मिट्टी पर राज करते देखा हैं पर भारतीयों के दिलों पर राज करना इनके बूते के बाहर थी तभी मैकाले ने अपनी व्यथा ब्रिटिश संसद में रखी थी, पर आज की क्या स्थिति हैं, क्या आज कोई विदेशी यहां आकर, अपनी व्यथा, अपने देश में कर सकता हैं। उत्तर होगा -- नहीं। क्योंकि आज वो देख रहा हैं कि जो उसके यहां होता हैं वो ही इंडिया में हो रहा हैं तो किसका भारत और कैसा भारत। ये तो इंडिया हैं इंडिया। आज पूरा इंडिया अपना नया साल पहली जनवरी को मनाता हैं, उसे पता ही नहीं कि भारतीय संविधान ने उसके लिए एक अपना संवत् चुना हैं जिसे शक संवत् कहा जाता हैं और इसके भारतीय महीने जनवरी फरवरी से अलग हैं। प्रगति का सबसे पहला सोपान तो यहीं हैं कि आज कोई भी भारतीय को अपना पहला महीना, अपना पहला संवत तक याद नहीं। भारत सरकार कहती हैं कि राष्ट्रीय खेल हॉकी हैं पर सच्चाई ये हैं कि किसी भी भारतीय से आप पूछे हांकी के बारे में, तो वो हॉकी का एबीसीडी भी नहीं बता पायेगा और जब क्रिकेट की बात करें तो लीजिए, आपको उस पर एक थीसिस लिख देगा। ये बाते बता रही हैं कि देश कितनी तेजी से प्रगति कर रहा हैं, प्रगति ऐसी कि देश की सरकार चाह भी लें कि वो कुछ नया करेगी, यहां की जनता, उससे भी आगे बढ़कर, तेजी दिखा देगी। प्रगति के कुछ उदाहरण देखिये, खासकर आजादी के बाद ..........................

1. आजादी के पूर्व तक यहां के लोग मां को मैया अथवा मां कहकर पुकारते थे, पर आज वो ही मां मम्मी से होते हुए माम तक पहुंच गयी हैं, वो ही हाल पिताजी जो बाबुजी कहलाया करते थे अब पापा होते हुए, डैडी से डेड हो चुके हैं।

2. पहले घर में जब किसी का जन्मोत्सव मनाया जाता था, तो घर में सत्यनारायण की पूजा हुआ करती थी, गर ये भी नहीं हुआ तो जिसका जन्मदिन होता था, वो मंदिर जरुर जाता, तिलक जरुर लगाता और घर आकर घर में बने विशेष पकवानों का मजा लेता, घर में सभी लोग उसकी बलइयां लेते, बड़े बुजुर्ग आशीर्वाद देकर, उसे धन्य धन्य कर देते, पर अब यहां ऐसा नहीं दिखता। अब तो हर घर में केक आते हैं, मोमबत्तियां आती हैं, मोमबत्तियां जलाकर उसे फूंका जाता हैं और ताली बजाकर हैप्पी बर्थ डे टू यू का प्रचलन शुरु हो गया। सचमुच अंग्रेज नहीं होते तो ये बेचारे इंडियन अपने बच्चों का जन्मदिन भी नहीं मना पाते. मैं तो इसके लिए अंग्रेजों को बधाई दूंगा कि उन्होंने इँडियन को जन्मदिन मनाना सिखाया।

3. पहले ज्यादा भारतीय धोती पहना करते थे और माथे पर टोपी, जबकि महिला साड़िय़ों का उपभोग करती थी, पर अंग्रेजों ने भारतीयों को कपड़ा पहनाना सिखाया, आज सभी भारतीय धोती की जगह फुलपैंट पहनते हैं, जिससे उनके पांव जाड़ों के दिनों में ठंड से बच जाती हैं तथा टोपी से जो उनका लुक खराब लगता था, अब टोपी छोड़ देने से उनका लुक स्मार्ट हो गया हैं. अब तो महिलाएं साड़ियां नहीं पहनना चाहती, क्योंकि साड़ी में वो सैक्सी नहीं दिखती, टॉप जीन्स में सैक्सी दिखती हैं, इसलिए उन्हें ये पहनावा ज्यादा रुचिकर लग रहा हैं। ऐसे भी आज की महिलाओं और पुरुषों को सैक्सी दिखना, कुछ ज्यादा ही भा रहा हैं।

4. अब भारतीयों के घरों में रोटी - सब्जी या दाल चावल नहीं दिखाई देता। अब तो इसके जगह पर पिज्जा, चाउमिन, बल्गर और पता नहीं क्या क्या भोज्य पदार्थ दिखाई देने लगे हैं।

5. अब शादियों की सालगिरह भी, अंग्रेज के बच्चों के बर्थडे की तरह मनायी जाने लगी हैं। शादी का सालगिरह मनाने का प्रचलन इतना बढ़ा हैं कि होटलों व रेस्तराओं की बल्ले बल्ले हो गयी हैं। जिनकी शादी का सालगिरह होता हैं वे पति पत्नी अपने पूर्व के प्रेमी व प्रेमिकाओं को इस अवसर पर बुलाना नहीं भूलते ताकि वे अपने प्यार के उन पलों को सबके सामने शेयर कर सके। ऐसा कहना और सुनना आजकल शान समझा जाता हैं क्योंकि किसका पति कितना हैंडसम और किसकी पत्नी पहले कितनी सेक्सी थी, वो सबसे ज्यादा उसके चाहनेवालों की संख्या पर निर्भर करती हैं और ये संख्या दिखाने का सबसे सुंदर मौका होता हैं। शादी का सालगिरह मनाना। धन्य हैं अंग्रेज, जिन्होंने भारतीयों को शादी की सालगिरह का महत्व समझाया।

6. अब तो मेरे देश में विवाहित महिलाएं सिंदुर नहीं लगाती। सिंदुर लगाना, पुरातनपंथी होने का नमूना माना जाता हैं। शादी के बाद सिंदुर न लगाकर विधवाओं की तरह रहना अब शान समझा जा रहा हैं। प्रगतिशील महिलाओं की माने तो सिंदुर लगाकर महिलाएं खुद को विवाहित होने का सबूत देती हैं ऐसा पुरुष क्यों नहीं करते. भाई इनकी बातों में दम हैं। ऐसा पुरुषों के लिए कुछ न कुछ जरुर होना चाहिए, पर हमको इससे क्या मतलब, हम तो प्रगति की बात कर रहे हैं, आजकल हमारे देश की महिला व पुरुष बिना विवाह के ही आपस में पति - पत्नी की तरह रह रहे हैं और उन्हें सामाजिक मान्यता भी मिल रही हैं। गर इस दौरान इनके द्वारा बच्चे पैदा हो जाते हैं तो बच्चे को अधिकार भी हैं कि वे इन्हें अपना मम्मी या डैडी माने अथवा नहीं, या वे उन्हें माने जहां इनके इन मम्मी डैडियों ने इन्हें अपने चैन का नासूर समझकर किसी अनाथालय को दे दिया और उसके बदले में नोटों के बंडल अनाथालयों को भेज दिये।

7. पूर्व में भारतीयों को खाना खाना नहीं आता था, अंग्रेजों ने इन्हें खाना खाने के तरीके सिखाये। पहले भारतीय अपना भोजन, अपने हाथों से खाया करते थे, पर अंग्र ये छुरी और कांटों का प्रयोग कर रहे हैं, ये प्रगति का सबसे सुंदर उदाहरण हैं। आज भारत के सभी होटलों व रेस्तरों में कांटा और छुरी की भरमार हैं। कांटा और छुरी के फायदे भी अनेक हैं, जब खाना खाने के दौरान बक-झक हुई किसी से, तो आप कांटा छुरी का बेहतर इस्तेमाल भी कर सकते हैं, गर आपके पास कोई दुसरा हथियार नहीं हो।

8. पहले जो सिनेमा बनते थे वो भारतीय मूल्यों को रेखांकित करते थे। फिल्मों में भाई - बहन, मां - बाप, पति - पत्नी, भाई - भाई, घर-परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य का बोध छुपा करता था, पर अब ऐसा देखने को नहीं मिलता, अब इन सारे रिश्तों की जगह केवल लड़के - लड़कियों के प्रेम व सेक्स ने ले ली हैं, ऐसे भी जरुरी हैं कि प्रेम व सेक्स कैसे किये जाये, क्योंकि इसके बिना लेडिज और जेन्टलमैन का किरदार ठीक नहीं बन पड़ता। यहीं कारण हैं कि आज नेताओं से लेकर अन्य लोगों के जुबां पर भाईयों और बहनों की जगह लेडिज एंड जेन्टलमैन ने ले लिया हैं।

9. हमारे देश में शिक्षा में भी आमूल चुल परिवर्तन हुए हैं। धर्म - निरपेक्षता की आड़ में केन्द्र व राज्य सरकारों ने रामायण और महाभारत जैसे भारतीय महाकाव्यों की धज्जियां उड़ा दी हैं। इनका मानना हैं कि इससे देश में सांप्रदायिकता बढ़ती हैं. इसलिए ऐसी - ऐसी चीजें पढ़ाई जा रही हैं, जिससे बच्चा केवल पैसे जमा करने की मशीन बनकर देश व समाज को अपने हाथों से बर्बाद कर सकें, और इनकी बानगी देखने को भी मिल रही हैं। आईएएस और आईपीएस की फौजों ने महानगरों में अपने लिये राजसी ठाठ-बाट के सामान इकट्ठे करने में लगे हैं, देश और समाज इनके ठेंगे पर हैं, ये जमकर भारतीयों के पैसे का सही इस्तेमाल कर रहे हैं। स्थल अध्ययन के नाम पर विदेश यात्रा करते हैं और अपनी पत्नियों के साथ, कभी - कभी ठेके पर पत्नी लेकर रंगरेलियां मनाते पकड़े जा रहे हैं, यहीं हाल हमारे प्रबुद्ध नेताओं का हैं, ये भी इसी प्रकार का कार्य कर रहे हैं।

10. देश में नेताओं की फौज इक्ट्ठी हो गयी हैं। चाहे समाजवादी हो, या दक्षिणपंथी या वामपंथी. सभी का एक ही स्वर -- मिले सुर मेरा तुम्हारा और सुर बने हमारा हैं। कल तक नहीं चलेगा परिवार का राज अलापने वाले, अपने बहु-बेटियों और बेटे दामादों को टिकट बांट कर धन्य धन्य हो रहे हैं।

11. कल तक नेता सरकारी अस्पतालों में अपना इलाज कराते थे, अब वे सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना अपनी बेईज्जती समझते हैं, इसलिए ये फाइव स्टार वाली सुविधावाली अस्पतालों में इलाज कराकर, इसके पैसे भी आम जनता से वसूलकर, भरते हैं, ये कहकर कि वे जनप्रतिनिधि हैं और आम जनता आज भी खैराती अस्पतालों में इलाज कर सीधे स्वर्गगमन कर रही हैं।

12. 15 अगस्त 1947 में जो भारत का मानचित्र था, वो अब सिकुडता नजर आ रहा हैं। चीन 1962 में भारत का एक बड़ा हिस्सा कब्जे में कर रखा हैं, जबकि अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम पर उसकी नजर टेढी हैं सो अलग। यहीं नहीं आज भी चीन के विमान और उसके सैनिक अरुणाचल प्रदेश के कई भागों को धीरे - धीरे अपने में मिलाते जा रहे हैं। इससे बड़ी देश के प्रगति का सूचक और क्या हो सकता हैं।

13. देश की संसद और राज्य की विधानसभाओं में स्पेशल कैंटीन चलती हैं, जो यहां के नेताओं और उनके चमचो को बहुत ही सस्ते दरों पर खाद्यान्न मुहैया कराती हैं, जबकि आम जनता आज भी मंहगाई से त्रस्त हैं।

14. देश के नेताओं व राजनीतिज्ञों ने शिक्षा की दो धाराएं निकाली हैं। यहां की जनता के लिए घिसी पिटी विश्वविद्यालयीय शिक्षा दे रखी हैं, जबकि अपने खानदान के बच्चों के लिए विदेश में शिक्षा दिलाने की योजना चला रखी हैं, आज भी देश के सभी बडे़ नेताओं व बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के बेटे उच्च शिक्षा के लिए भारत की बजाय विदेश की शरण लेते हैं।

15. देश के सभी प्रमुख अखबारों के अपनी वेबसाइट अश्लील चित्रों से भरी पड़ी रहती हैं, आप इन वेबसाइटों को देखकर देश की प्रगति का आइना देख सकते हैं। यहीं नहीं इन अखबारों में सेक्स और लव के चटखारे इतने अटेपटे हैं कि आपको ब्लू फिल्मों की कैसेट देखने की आवश्यकता ही नहीं पडे़गी।

16. जिस देश में कभी नानक, एकनाथ, नामदेव, नरसिह मेहता, तुलसी, कबीर, मीरा की तूती बोलती थी, आज उस देश में कृपा बरसानेवाले बाबाओं की बाढ़ आ गयी हैं. संतों की जगह रामदेव, निर्मलबाबा, आसाराम जैसे ठगों ने ले ली हैं, जो सपने दिखाकर लोगों को मूढ़ बनाने में विशेष रुचि रखते हैं।

17. इस देश में पहले श्रीरामचरितमानस की चौपाईयां घर - घर में गूंजती थी। कहा जाता था -- प्रातःकाल उठि के रघुनाथा, मात-पिता गुरु नावहि माथा। उस देश में अब मदर्स डे, फादर्स डे मनाया जाने लगा हैं, और इसके माध्यम से बताया जाता हैं कि मां और पिता क्या होते हैं।

18. जिस देश में हर महीने कोई न कोई पर्व व त्योहार हुआ करते थे, अब यहां केवल पर्व के नाम पर होली और दीवाली ही दिखाई पड़ती हैं, जबकि एक नया पर्व इस देश में अब दिखाई देने लगा हैं। जो अब हर साल 14 फरवरी को मनाया जाता हैं। इस पर्व को वैलेंन्टाईन डे कहा जाता हैं। इस पर्व के दिन हर लड़का एक लड़की को लेकर या हर लड़की एक लड़के को लेकर या लड़का - लड़का में या लड़की - लड़की से प्रेम करती हैं और इस प्रेम का लब्बो लुआब ये होता हैं कि अश्ललीलता व प्रेम की फुहड़ता चरम पर होती हैं।

19. हमारे देश में हर साल एक न एक घोटाले का पर्दाफाश होता हैं। कई घोटाले जैसे चारा घोटाला, ताबूत घोटाला, टूजी घोटाला इत्यादि। हर घोटाला खासमखास होता हैं। प्रत्यके घोटाले एक दूसरे घोटाले को मुहं चिढ़ा होता हैं कि देखों में तुमसे भी बड़ा हू। इन घोटालो में शामिल नेताओं को सजा भी नहीं होती, ये आराम से कुछ दिन ट्रायल के दौरान जेल में होते हैं, पर अंत में ससम्मान बरी भी हो जाते हैं। ये घोटालेबाज कुछ घटियास्तर के सफेदपोश पत्रकारों के साथ मिलकर नये चैनल खोलकर, अपने संत होने का एक झूठा आचरण भी पेश करते हैं, जिससे सामान्य जनता दिग्भ्रमित होती जाती हैं।

20. देश में रहनेवाले इंडियन जो यहां सरकारी सेवाओं में काम कर रहे होते हैं या जो खेती वाड़ी कर अपना जीवन यापन करते हैं, उनके धन यहां अंकगणितीय प्रणाली से बढ़ रहे हैं, पर नेताओं व आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के धन ज्यामितीय प्रणाली से बढ़ रहे हैं।

21. अब अपने देश में कुछ - कुछ राज्यसभा की सीटे एक तरह से आरक्षित सी हो गयी हैं। जहां एक खानदान के लोग या मीडिया से जूड़े लोग पिछले पच्चीस छब्बीस वर्षों से काबिज हैं और उनका ये कब्जा आजीवन रहेगा। आज नेता का बेटा नेता ही होता हैं और उसे ही देश की बागडोर मिलेगी, ऐसा गुप्त एजेंडा को इस सफाई से यहां पेश किया जाता हैं कि जनता सदा मूर्ख बनी रहती हैं।

22. देश की भाषा, राजभाषा हिन्दी मानी गयी हैं, पर सच्चाई ये हैं कि हिंदी अंग्रेजी की दासी के सिवा कुछ नहीं। लोकसभा से लेकर राज्यसभा, विधानसभा से लेकर विधानपरिषद् तक अंग्रेजी की सल्तनत चलती हैं। हिंदी में संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण देनेवाले अटलबिहारी वाजपेयी भी जब प्रधानमत्री बने तो कई जगहों पर अंग्रेजी में संवाद करना, इन्होंने शान समझा। वो कहा जाता हैं न कि हिंदी गंवारों और जाहिलों की भाषा हैं, जबकि फादर कामिल बुल्के के अनुसार - "संस्कृत महारानी, हिंदी बहुरानी और अंग्रेजी नौकरानी हैं।"

23. देश के संसद के 60 साल हो गये पर सच्चाई ये हैं कि जैसे जैसे संसद अपनी वर्षगांठ मनाता गया, वैसे वैसे ये संसद अपनी गरिमा भी खोता चला गया। केन्द्र की कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचायी। एक बार तो ऐसा हुआ कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने दुबारा अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदो को खरीदने की कोशिश की और वे पैसे साफ देखे गये कि कैसे सदन में रखे गये। पूरा देश देखा इस दृश्य को। जिस चैनल के पास इस दृश्य को दिखाने का जिम्मा था, उसने कांग्रेस के आला नेताओं के हाथों अपनी जमीर बेच दी, अपनी आत्मा बेच दी। यानी यहां के राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार अपनी जमीर बेचने में किसी भी अन्य देश के पत्रकारों से काफी आगे निकल चुके हैं। कितने प्वाइँट लिखूं, जितना भी लिंखूंगा कम ही होगा, बस अब आप इतना जरुर जान लीजिए कि देश काफी प्रगति कर चुका हैं............बस एक दौड़ और लगानी हैं यानी अपने सर्ट और पैंट और छोटे करने हैं...........यकीन मानिये हम अमरीकी और ब्रिटेन को मात दे देंगे। तब और गर्व से कह सकेंगे कि हम इंडियन किसी से कम नहीं.....................................।