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Monday, March 20, 2017

प्यारे बच्चों.....................

प्यारे बच्चों,
आओ, आज मैं तुम्हें बताता हूं कि हमारे पूर्वज कैसे अभावों में भी शानदार ढंग से जीवन व्यतीत करते हुए अपने जीवन को समाज और देश के लिए उत्सर्ग कर देते थे। मैं कहूंगा कि तुम एक बात गिरह पार लो – तुम अपने जीवन में जितना आवश्यकताओं को सीमित करोगे, तुम उतना ही आनन्द प्राप्त करोगे और इसके विपरीत जितना तुम अपनी आवश्यकताओं को बढ़ाओगे, तुम उतना ही दुख के सागर में डूबते चले जाओगे। कौन व्यक्ति कहां से धन ला रहा है? और कैसे वह अपनी आवश्यकताओं को पूर्ति कर रहा है? – ऐसी सोच सामान्य बुद्धिवाले लोग रखते है, पर जो असामान्य है, वे इन बातों पर ध्यान ही नहीं देते। वे तो इस ओर ध्यान देते है कि उन्होंने अपने जीवन में ईमानदारी को वहन किया है या नहीं, जैसे ही उन्हें पता लगता है कि उनके पास आया धन बेईमानी से उन तक पहुंचा है, वे विचलित हो जाते है और उसका वे उपयोग करना भी पाप समझते है, ठीक इसके विपरीत अधम लोगों की प्रवृत्ति कैसी होती है? हमें लगता है तुम्हें बताने की जरुरत नहीं।
कहा भी गया है...
अधमा: धनम् इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमाः।
उत्तमा: मानम् इच्छन्ति, मानो हि महतां धनम्।।
अर्थात् जो दुष्ट होते हैं, उन्हें सिर्फ धन की इच्छा होती हैं, जो मध्यमवर्गीय है अर्थात जो न संत है, न अधम है, वे मध्यम मार्ग अपनाते है, उन्हें धन और मान दोनों की आवश्यकता होती है, पर जो संत प्रवृत्ति के लोग है, उनके जीवन में धन की इच्छा कभी नहीं रहती, उनके लिए तो सम्मान से बड़ा कोई धन है ही नहीं।
तुम जहां हो, वहां तुम्हें ये तीन प्रकार के लोग बराबर मिलेंगे, अब तुम्हें ये सोचना है कि तुम किस प्रकार के लोगों का वरण करो? या तुम्हारे मित्र या सखा किस प्रकार के लोग हो? ये निर्णय करने का अधिकार, मैं तुमलोगों पर छोड़ता हूं, मेरा स्वभाव क्या है? ये तुम जानते ही हो।
कुछ लोग कहते है कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती है, पर मैं कहता हूं कि जीने के लिए धन की आवश्यकता होती ही नहीं, और जितनी आवश्यकता होती है, उसका प्रबंध ईश्वर स्वयं कर देता है, ठीक उसी प्रकार जैसे...
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम
दास मलूका कह गये, सब के दाता राम
हमें लगता है कि तुम इस दोहे का अर्थ समझ गये होंगे।
मैं स्वयं 50 वें वर्ष में हूं और जो मैंने तुम्हारे दादा-दादी और अपने गुरुजनों तथा भारत के महान आध्यात्मिक संतों के बताये मार्गों का अनुसरण किया है, उससे साफ पता चलता है कि जीवन में धन उतना महत्वपूर्ण नहीं।
ऐसे भी धन से आप खाट या पलंग खरीद सकते है, पर नींद नहीं। धन से आप स्वादिष्ट व्यजंनों को खरीद सकते है, पर उसका रसास्वादन कर पायेंगे, इसका जवाब खरीदनेवाले के पास भी नहीं होता। आखिर ऐसा क्यों? इस पर चिन्तन की आवश्यकता है।
कुछ लोगों से मैं पूछता हूं कि महात्मा गांधी का घर कहां है? तो वे बताते है कि उनका घर गुजरात के पोरबंदर में हैं, पर उन्हें नहीं मालूम कि जिसे वे महात्मा गांधी का घर बता रहे है, गांधी ने वो घर बनाया ही नहीं, वो तो उनका पैतृक आवास है, गांधी को समय कहां मिला कि वे अपना घर बनायें।
मेरे प्यारे बच्चों,
याद रखों, जो दूसरे का घर बनाता है, वह अपना घर नहीं बना पाता, वो तो दूसरों के घर में ही आनन्द ढूंढ लेता है, तुम इसी बात को सरदार पटेल, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, संत रविदासजी, गुरु नानक, स्वामी विवेकानन्द जी की जीवनी से भी जान सकते हो।
आजकल लोगों को मैं देखता हूं कि वे अपने आस-पास रहनेवाले मित्रों व पड़ोसियों के जीवन शैली को देखते हुए, स्वयं की जीवन शैली को प्रभावित करना प्रारंभ कर देते है, यह भी दुख का कारण है।
भाई मान लिया कि किसी के घर में फ्रिज है, तो कोई जरुरी नहीं कि मेरे घर में भी फ्रिज होने चाहिए, गर आवश्यकता है तो खरीदिये पर लोगों को दिखाने के लिए कि मेरे पास भी फ्रिज है, ये गलत है और ये दुख का कारण है...
जरा मुझे ही देख लो, मैंने तो अपने जिंदगी में फ्रिज खरीदी ही नहीं, और न मैं खरीदूंगा, क्योंकि मुझे ये आवश्यक नहीं लगता, आखिर क्यों, मुझे आवश्यक नहीं लगा, जरा ध्यान दो...
फ्रिज करता क्या है?
फ्रिज में सब्जियों को रख देने से सब्जियां ताजी रहती है, मैं कहता हूं कि मैं इतनी सब्जी खरीदू ही क्यों?  जिसके लिए मुझे भंडारण करनी पड़े, रोज बाजार जाउंगा और ताजी सब्जियां लाउँगा।
फ्रिज में पानी ठंडा रहता है, पर मैं दावे के साथ कहता हूं कि इस पानी से प्यास नहीं बुझती, जबकि घड़ा में पानी भी ठंडा और इससे प्यास भी बुझती है।
फ्रिज में पकाये भोजन के शेषांश को सुरक्षित रखा जा सकता हैं, मैं कहता हूं कि मैं इतना भोजन बनाऊं ही क्यों, जिसके लिए हमें सुरक्षित रखने के लिए फ्रिज की आवश्यकता पड़ जाये।
फ्रिज में आइसक्रीम बन जाती है, भाई हम कोई रईस की औलाद तो है नहीं कि हम रोज दस किलो दूध लाये और आइसक्रीम बनाते जाये, हम तो आइसक्रीम खाने के लिए किसी दुकान पर गये और आइसक्रीम खरीदी, खा लिये।
ऐसे भी फ्रिज रखेंगे, 24घंटे बिजली की खपत अलग और बेवजह का बिजली बिल का भुगतान करने का झंझट अलग।
यहीं नहीं, इसके अलावा फ्रिज से पर्यावरण को भी नुकसान, क्लोरोफ्लोरो कार्बन का उत्सर्जन और ओजोन में छिद्र को बढ़ावा।
यानी कुल मिलाकर हमें नहीं लगता कि हम भारतीयों के लिए ये फ्रिज जरुरी है, पर देखता हूं कि लोग धड़ल्ले से इन फ्रिजों को अपने घर के रसोईघर में रसोईप्रवेश करा रहे है, और मैंने आज तक नहीं लिया।
सच्चाई जानते हो।
कुछ लोगों को देखता हूं कि जब अपने बेटे-बेटियों की शादी करेंगे तो अंधाधुंध खर्च करेंगे, जैसे लगता हो कि वे कितने धन्ना सेठ है, पर हम बता देते है कि ऐसी खर्च से वे अपने बेटे-बेटियों की खुशियां नहीं खरीदते, बल्कि वे स्वयं का नुकसान करते है, समाज और देश का नुकसान करते है, क्योंकि इसी देखा-देखी में लोग अपने घर के सुख को नष्ट कर डालते है। जो धन्ना सेठ है, जिनको ईश्वर ने धन दिया है, उन्हें भी चाहिए कि वे सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखे, पर वे ऐसा करेंगे, हमें नहीं लगता।
अगर ईश्वर ने किसी को धन दिया है तो उन्हें उक्त धन को, उन बेटियों की शादी में खर्च करना चाहिए, जिनकी शादियां धन के अभाव में नहीं हो रही। मैं दावे के साथ कहता हूं कि ऐसा करने से जो उन्हें आनन्द प्राप्त होगा, वह स्वयं की शादी में भी उन्हें नहीं आयी होगी।
कहा भी गया है...
संत प्रवृत्ति के लोगों के पास जो धन आता है, वह लोगों के आनन्द पर खर्च होता है और जब यहीं धन दूष्टों के पास पहुंचता है तो वह लोगों के आनन्द को हर लेता है...
संत प्रवृत्ति के लोगों की संख्या आज भी बहुतायत है, बस उन्हें परखने की जरुरत है...
मैं यह क्यों लिख रहा हूं, तुम सब, ये सब लिखने का मतलब समझ गये होगे...
बस करना यहीं है कि कभी भी अपने मेहनत के पैसे को उन जगहों पर जाया नहीं करना है, जो जरुरी न हो। जहां जरुरी है, वहां उन पैसों को खर्च करिये और जहां जरुरी नहीं है, वहां कुछ भी हो जाय, खर्च नहीं करना है, सदैव समाज और देश के लिए पैसे खर्च होने चाहिए।
भामा शाह को देखो, उनके पास खूब धन था, और उन्होंने अपना सारा धन महाराणा प्रताप के चरणों में रख दिया...
महाराजा रघु के दरबार में छोटा सा कौत्स जाता है, और महाराज रघु, कौत्स के पास अपना सारा धन रख देते है, और कौत्स उतना ही लेता है, जितनी की उसे आवश्यकता है। ये प्रमाण बताने के लिए काफी है कि भारत क्या है? और हमें क्या करना चाहिए...
खुब खुश रहो।
तुम्हारा पिता
कृष्ण बिहारी मिश्र

Sunday, March 5, 2017

प्यारे बच्चों..................

प्यारे बच्चों,
बहुत दिन हो गये, तुमलोगों से विस्तार से बातचीत किये हुए। सोचा था होली आ रही है, तुम लोग होली की छुट्टी में आओगे, पर इस बार होली में तुम लोग नहीं आ रहे, इसके कारण इस बार की होली भी फीकी रह जायेगी। हमें आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि तुम जिस सीमा पर तैनात हो, बड़ी ही ईमानदारी पूर्वक भारत माता की सेवा कर रहे होगे। इधर एक दुख भरा समाचार भी है, तुम्हारी बुआ का दो दिन पूर्व ही देहांत हो चुका है, उनका श्राद्धकर्म भी दस दिन बाद है, पर चिन्ता मत करना। हमलोग यहां है। मैं जानता हूं कि इस वेला में भी तुम्हारा यहां नहीं रहना, हृदय को विदीर्ण करता होगा, फिर भी हमारा सुझाव होगा, कि ऐसे मौके पर भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली श्रीमद्भगवदगीता काफी महत्वपूर्ण हो जाती है, तुम इस अवसर पर श्रीकृष्ण के कर्मयोग को याद करते हुए, आगे निकल पड़ो।
दुख आते है, मनुष्य को सबल बनाने के लिए, न कि दुर्बल बनाने के लिए...
याद करो अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को, जिनके जीवन में कभी सुख आया ही नहीं, केवल दुख ही दुख था, पर अंत में वे अमरीका के राष्ट्रपति बने और वे बेहतर राष्ट्रपति साबित हुए। जब भी समय मिले, एक अच्छी पुस्तक पढ़ो और उससे कुछ सीखो। भगवान राम को देखो, राजा के बेटे थे, पर उनका जीवन संघर्ष से भरा रहा, और इन्हीं संकटों से जुझते हुए, वे भगवान और मर्यादा पुरुषोत्तम की श्रेणी में आ गये।
तुमलोगों से इन दिनों बात ठीक ढंग से नहीं हो रही, इसलिए मैंने फेसबुक का सहारा लिया है। आशा है, पढ़कर तुम मेरी भावनाओं को समझोगे। अब आओ कुछ काम की बात करें। आज तुम्हें संत की परिभाषा बताता हूं, जो हमने भारतीय वाड.मय से सीखा है।
संत क्या है?  स+अन्त = जो समस्याओं का अन्त करें, वह संत। जो समस्या को बढ़ा दे, वह संत हो ही नहीं सकता। संत वैरागी होता है, संत भोगी नहीं होता, जो संत भोगी हो गया, वह संत कभी हो ही नहीं सकता। संत अलंकृत नहीं होता, बल्कि वह दूसरों को अलंकृत करता है। वह शासन या राजा के द्वारा किसी पुरस्कार का भूखा नहीं होता, वह तो गोस्वामी तुलसीदास की तरह होता है, जैसे एक बार अकबर के दरबार से गोस्वामी तुलसीदास को बुलाहट हुई, और गोस्वामी तुलसीदास ने पत्रवाहक को यह कहकर अकबर के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया कि मोसो कहां सीकरी सो काम। ऐसे होते है संत।
संत दुकान नहीं खोलता, संत कैटवाक नहीं करता या अध्यात्म की आड़ में व्यवसाय या स्वयं का उद्योग खड़ा नहीं करता, वो तो चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करता है, जिससे समाज में प्रेम की ऐसी गंगा बहे, जिसके प्रवाह में आकर सभी परमात्मा के एकाकार भाव में समाहित हो जाये।
हमारे देश में कबीर, तुलसी, रविदास, मीराबाई, सूरदास, रसखान, रहीम, नानक, ज्ञानेश्वर, स्वामी योगानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि ऐसे संतों की महान परंपराएं है, जिन्होंने देश व समाज को दिया, पर देश और समाज से लिया कुछ भी नहीं।
जरा मीराबाई को देखो, सभी उन्हें कृष्ण भक्त कहते है, पर मैं तो उन्हें कृष्ण की दीवानी कहता हूं, क्योंकि मीराबाई के गुरु थे संत रविदास, और उस वक्त जब भारत में जातियता कूट-कूट कर भरी थी, ऐसे माहौल में देखों, संत परंपरा। मीराबाई, संत रविदास जी को अपना गुरू मानती है, संत रविदासजी राम नाम की रट बराबर लगाया करते, उन्होंने मीरा को राम मंत्र दे डाला और लो मीराबाई राम मंत्र लेते ही, राममय हो गयी और कह डाला...
पायोजी मैने राम रतन धन पायो
वस्तू अमोलक दीयो जी मेरे सदगुरु, किरपा कर अपनायो
पायोजी मैने राम रतन धन पायो...
ऐसे होते है संत...
कबीर निराकार को माननेवाले, तुलसी साकार को माननेवाले, दोनों राम को भजते है, दोनो एक ही रामानन्दाचार्य संप्रदाय से पर किसी में भेदभाव नहीं...
जरा देखो कबीर राम को कैसे भज रहे है...
कस्तूरी कुंडलि बसे, मृग ढूढ़ै बन माहि।
ऐसे घटि-घटि राम है, दुनिया दीखै नाहि।।
कमाल है, और तुलसी को देखिये...
नाना भांति राम अवतारा।
रामायण सत कोटि अपारा।।
तो तुम्हे इसी प्रकार से अपने जीवन को ले चलना है। संत बनने के लिए गेरुआ वस्त्र या सफेद वस्त्र धारण करने या दाढ़ी-मूंछ बढ़ाने की आवश्यकता नहीं। बस अपने चरित्र की शुद्धता और ईश्वर पर अटूट विश्वास पर ध्यान देने की आवश्यकता है, फिर क्या? तुम्हारा जीवन धन्य। संत रविदास जी बराबर जूते – चप्पल मरम्मत किया करते, वे अपनी कठौती में ही चमड़ों को धोया करते, पर सच्चाई ये भी है कि उस गंदे जल में भी गंगा उसी पवित्रता से वास करती, जैसा कि अध्यात्मिक रुप से पुष्ट मानव के हृदय में। उन्हीं का कथन था – मन चंगा तो कठौती में गंगा।
तुम अपने कर्म से स्वयं को जीतने का प्रयास करो, चरित्र पर ध्यान दो, संस्कार से पुष्ट हो, ये मत देखों की तुम्हें क्या प्राप्त हो रहा है?, हां इतना जरुर ध्यान रखना कि तुमने देश को क्या दिया है?
अंत में,
हम इस बार होली नहीं मनायेंगे, पर इतना जरुर है कि जब भी तुम घर आओगे, होली उसी दिन मनायेंगे। खुब खुश रहो, देश के सभी महान संतों को प्रणम्य करते हुए, जीवन को आगे बढ़ाओ।
क्योंकि
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
राम भक्ति जहं सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
ऐसे भी तुलसी ने श्रीरामचरितमानस में, जब शबरी ने श्रीराम से नवधा भक्ति सुनने की बात कहीं तो भगवान श्रीराम ने शबरी को प्रथम भक्ति के रुप में क्या कहा?  जरा तुम स्वयं देखो...
भगवान राम ने कहा...
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
यानी प्रथम भगति जो है वह संतों की संगति है, पर संत कैसा हो? इसका चयन तुम्हें स्वयं करना होगा... ...अगर संत कबीर है, संत स्वामी विवेकानन्द है, तो जीवन नैया बेड़ा पार और अगर संत कालनेमि है, तो समझ लो जीवन अंधकारमय है। फिलहाल भारतवर्ष में कालनेमियों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी इनके बीच भी कई संत है, जो देश और समाज को नई दिशा दे रहे है, तुम उन संतों को स्वयं खोजों और अपना मार्ग प्रशस्त करो। ठीक उसी प्रकार जैसे स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस को और स्वामी दयानन्द ने नेत्रहीन स्वामी विरजानन्द सरस्वती को खोजा, और ज्यादा क्या लिखूं, ईश्वर तुम्हारे साथ है... ...हमेशा प्रसन्न रहो।
तुम्हारा पिता
कृष्ण बिहारी मिश्र

Monday, December 30, 2013

हे रामचंद्र कह गये सिया से.............

21वीं सदीं चल रही हैं। माना जाता हैं कि 21वीं सदी भारत की हैं। इस सदी में भारत अपने शीर्ष पर होगा। कभी – कभी अच्छी खबरें अखबारों में पढ़ता हूं अथवा टीवी चैनलों के माध्यम से सुनता हूं तो लगता हैं कि सचमुच देश उसी ओर बढ़ रहा हैं, पर जब कभी ऐसी खबरों पर नजर जाती हैं, जिससे देश रसातल में जा रहा होता हैं तो हमें ही क्या, कई भारतीयों को निराशा हाथ लगती हैं कि क्या ऐसे में भारत आगे बढ़ेगा, या यूं ही ख्बाब, ख्बाब ही रह जायेंगे। इन दिनों भारतीय चैनलों और अखबारों में एक से एक बाबाओं और संतों की पोल खुल रही हैं। ऐसे लोगों की पोल खुलनी भी चाहिए। ताकि पता चल सकें कि इन ढोंगियों ने देश का कितना नुकसान किया हैं और वे अपनी लीलाओं से देश को किस प्रकार गर्त में ले जा रहे हैं, पर क्या इसका असर भारत की सामान्य जनता पर पड़ता हैं, या फिर वे वहीं करते हैं, जो उन्हें करना होता हैं। झूठी मन की शांति के लिए, वे ढोंगियों के आगे सर झूकाते हैं और स्वयं के साथ – साथ देश को भी गर्त में ले जाते हैं। हाल ही में एक फिल्म आयी ‘ओह माई गॉड” हमें लगा कि इस फिल्म का असर दीखेगा, पर फिल्म आयी और चली गयी। जैसे एक सामान्य बच्चा, स्कूल शिक्षक या अपने से बड़ों की अच्छी बातों को एक कान से सुनता है और दुसरी कान से निकाल देता हैं, वहीं बात यहां आमजन के साथ देखने को मिली। इस फिल्म में सभी धर्माचार्यों और पांखंडियों की पोल खोलकर रख दी गयी थी, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यूं न हो, पर मजाल हैं कि हमारे देश के लोगों के कानों पर जूं रेंगी हो। शायद हमारे देश के लोगों के उपर सन् 1970 में बनी फिल्म गोपी का वो सुपरहिट गीत कुछ ज्यादा ही सर चढ़ कर बोल रहा हैं, जिसमें दिलीप कुमार पर्दे पर गा रहे होते हैं। गीत के बोल थे..................
सुनो सिया, कलयुग में काला धन और काले मन होंगे, काले मन होंगे।
चोर, उचक्के नगर सेठ और प्रभु भ्रक्त निर्धन होंगे, निर्धन होंगे।
जो होगा, लोभी और भोगी – 2
वो जोगी कहलायेगा
हंस चुगेगा, दाना तुनका, कौवा मोती खायेगा,
हे रामचंद्र कह गये सिया से...................
अगर इस गीत को ध्यान पूर्वक देखे तो साफ पता चलेगा कि इस गीत के एक – एक बोल आज सही हो रहे है। तथाकथित संतों की हरकते तो साफ बता रही हैं कि वे इस गीत को अक्षरशः सिद्ध करने में ऐड़ी चोटी एक किये हुए हैं। कौन तथाकथित संत कितना धन इक्टठा कर रहा हैं, इसकी अँधी दौड़ चल रही हैं, वे एक दूसरे को पटखनी देने में लगे हैं और यहां की जनता, अँधभक्ति और झूठी सुख शांति के लिए, इनके धनलोलुपता को और बढा रही हैं। कोई तथाकथित संत कृपा लूटा रहा हैं, तो कोई सपने में सोना का खान ढूंढ रहा हैं तो कोई स्वयं गुरु बन कर अपने चेलों को ये कह रहा हैं कि हमारे लिए तुम धरना प्रदर्शन करों ताकि हम जेल से छूट जाये, कोई व्यभिचार में फंस रहा हैं तो कोई मुक्तकंठ से अपने व्यापार को आगे बढ़ाने में लगा हैं। भला संतों का यहीं काम हैं क्या।
तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस को देखिए, अरण्यकांड में श्रीराम और नारद संवाद हैं। जिसमें नारदजी को श्रीराम कहते हैं कि संतो के लक्षण क्या हैं, कैसे आप संत को पहचानेंगे, संत की परिभाषा क्या हैं, किस प्रकार का संत उन्हें अत्यधिक प्रिय हैं, इस मर्म को तुलसीदास ने बड़े ही सरल चौपाई में लिख डाला हैं, बस थोड़ा सा दिमाग लगाईये, आपको भावार्थ समझने में देर नहीं लगेगी, साथ ही अपने मन में सोचिये कि क्या इनमें से एक भी भाव अथवा लक्षण भारत के इन तथाकथित संतों में दिखाई पड़ते हैं।
षट विकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुं देह न गेह।।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहि कुमारग पाऊ।।
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।
जो आजकल टीवी चैनलों पर हर सुबह शाम दीख जाते हैं, या जिनको लेकर हाय तौबा मचायी जा रही हैं, या जिन संतों ने बेड़ागर्क कर रखा हैं, इनमें से ज्यादा संत तो टीवी ब्रांड हैं, जिन्हें समय समय पर टीवी चैनलों ने इन्हें अपने फायदे के लिए जनता के समक्ष रखा हैं, और बाद में जब इन तथाकथित संतों की निकल पड़ी तो इन्होंने टीवी चैनलों को आंख दिखाना शुरु कर दिया, और फिर जब बात बन गयी तो लीजिए, कुछेक संत फिर से टीवी पर दिखाई पड़ने लगे, जिनकी कभी चैनलों ने खिचाई की थी। गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का एक प्रसंग। हनुमान सीता की खोज में लंका पहुंच गये। अचानक उन्हें एक घर से राम – राम की संकीर्तन सुनाई पड़ती हैं। वे आश्चर्य में पड़ते हैं कि लंका में तो निशिचर रहते हैं, यहां सज्जनों का निवास कैसे। पता लगाने के लिए, हनुमान अपना वेष बदलते हैं। पता लगता हैं कि ये तो राम भक्त विभीषण का निवास स्थान हैं। जैसे ही विभीषण की रामभक्ति देखते हैं। हनुमान अपने मूलस्वरुप में आ जाते हैं और अचानक विभीषण जी के मुख से ये बाते निकल पड़ती हैं कि
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहि नहिं संता।।
हे हनुमान जी अब हमें पक्का भरोसा हो गया कि बिना ईश्वरीय कृपा के संत नहीं मिलते। आज हमारे उपर ईश्वरीय कृपा हो गयी। अब जरा बताईये। हनुमान जी की तुलना, बिभीषण संत से कर रहे हैं। क्या हनुमान जी के संत होने पर किसी को संदेह हो सकता हैं। उत्तर होगा – कदापि नहीं। क्योंकि संतों के सारे गुण, सारे लक्षण हनुमानजी में भरें पड़े हैं। संत कैसा होना चाहिए, इसका सुंदर उदाहरण तो हनुमान जी हैं, पर आज के संतों को देख लीजिए। उनमें हनुमानजी का एक भी गुण अथवा लक्षण दिखाई देता हैं, नहीं तो फिर इस प्रकार की नौटंकी क्यों। हमारे यहां संतों की एक परंपरा रही हैं। विशाल परंपरा। न धन की लालच और न पद की महत्वाकांक्षा। सभी का कल्याण हो, एकमात्र यहीं भाव। उठा लीजिये, गुरुनानक, रविदास, समर्थगुरुरामदास, मीराबाई, सुरदास, रसखान, ज्ञानेश्वर जैसे सैकड़ों, हजारों संतों को। इन संतों ने अपने जीवनकाल में अपने लिए क्या किया और समाज के लिए क्या किया। हम ज्यादा दूर नहीं जाना चाहते। एक सवाल पूछना चाहता हूं। देश में एक राजनीतिक संत हुए – महात्मा गांधी। मोहनदास से महात्मा कैसे हो गये। अपने लिए उन्होंने कितने घर बनाये अथवा स्वयं को महिमामंडित करने के लिए कितने आश्रम खोले। उत्तर होगा – नहीं। तो फिर एक छोटी सी बात लोगों के दिलों में क्यूं नहीं समझ आती।
भारत का ध्येयवाक्य हैं –
सत्यमेव जयते।
भारत का प्राण बसता हैं –
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दुख भागभवेत।।
हमें नही लगता कि इससे अधिक की जानकारी की आवश्यकता हैं। संत चरित्र निर्माण करता हैं। संत व्यक्तित्व निर्माण करता हैं। संत समाज व देश का निर्माण करता हैं। संत समस्याओं का समाधान कर देता हैं। संत खुद ही समस्या नही बन जाता, जो संत समस्या बन जाये, वो खुद एक भयानक रोग के समान हो जाता हैं, जिससे देश और समाज को नुकसान के सिवा कुछ नहीं मिलता। फिलहाल मेरे देश में कुछ संतों को छोड़ दिया जाय तो ज्यादातर इस देश में ऐसे तथाकथित संत हो गये, जो चैनलों व कुछ अखबारों की आड़ में स्वहित देखते हुए, देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं। पर वे भूले नहीं, कि अंततः सत्य की विजय होती हैं, वे कितना भी धूर्त क्यों न बन जाये। देश उन्हें अपने ढंग से सजा अवश्य दे देगा।

Friday, November 9, 2012

मेरे राम को कुछ भी बोलो, मेरे राम को कोई फर्क नहीं पड़ता...........................

मेरे राम को कुछ भी बोलो, मेरे राम को कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही फर्क पड़ता हैं, राम पर विश्वास करनेवालों को, क्योंकि उनके लिए राम तो राम हैं, जिसके बिना उनका जीवन कभी सफल हो ही नहीं सकता और न ही ये दुनिया उनके बिना चल ही सकती हैं। जो राम पर विश्वास करते हैं, उनका विश्वास किसी जेठमलानी के बयान का मोहताज नहीं होता। दुनिया में राम जेठमलानी कोई पहले व्यक्ति नहीं, जिसने राम को बुरा कहा। ऐसे लोगों की संख्या तो बहुतायत में हैं, जिनकी दिन की शुरुआत ही राम की निंदा और रात का समापन राम की निंदा से ही होता हैं। ऐसे भी राम को समाप्त करने का बीड़ा कई बार अनेक राजनीतिक दलों और अन्यान्य धार्मिक व कई सामाजिक संगठनों ने किया हैं, पर राम को क्या फर्क पड़ा। वो तो आज भी वाल्मीकि के श्लोंकों में, मीरा और रविदास के भजन में, कबीर के दोहों में, तुलसी के चौपाईयों में और देश-विदेश के अनन्य कवियों के कंठाग्रों में शोभायमान हैं। राम तो ऐसे हैं कि वे अपने निंदकों और अपने चाहनेवालों पर भी समभाव रखते हैं, नहीं तो वनवास से लौटने के बाद वे कैकयी और मंथरा पर अपना असीम अनुराग नहीं लूटाते। ऐसे भी राम को जानने के लिए, आपको राम जेठमलानी जैसे नेताओं के पास जाना पड़े तो ये आपकी मूर्खता हैं, राम को जानने के लिए आपको वाल्मीकि, मीरा, रविदास, कबीर और तुलसी का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।
जरा रविदास जी को देखिये, क्या कहते हैं...........................
जब रामनाम कहि गावैगा
तब भेद अभेद समावैगा
जो सुख हवैं या रस के परसे
सो सुखका कहि गावैगा
जरा रविदास जी की परम शिष्या श्रीकृष्ण की अनन्य भक्तवत्सला मीरा क्या कहती हैं.............
पायोजी मैंने राम रतन धन पायो
वस्तु अमोल दियोजी मेरे सदगुरु, किरपा कर अपनायो, पायोजी मैंने.....
खरच न खूटै, चोर न लूटे, दिन - दिन बढ़त सवायो, पायो मैंने................
कबीर के राम को देखिये.......................
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूढें बन माहि
ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया दिखैं नाहि
और तुलसी का तो जवाब नहीं, उन्होंने तो साफ कह दिया
नाना भांति राम अवतारा।
रामायण सत कोटि अपारा।।
ये महान संतों के उद्गार बताते हैं कि राम क्या हैं। राम को व्यक्ति विशेष मानना, और उन्हें व्यक्ति विशेष मानकर, अपने ढंग से उन पर प्रतिक्रिया दे देना, आपकी मजबूरी हो सकती हैं पर इससे राम को क्या.........। पर जिन्होंने राम को जान लिया, वे अनन्त सुख को प्राप्त कर, अपना और इस राष्ट्र दोनों का भला किया। राम का जीवन ही जीने का आधार हैं, अनन्त व परमसुख प्राप्त करने के लिए, राम को तो जानना ही होगा, पर राम को आप जानेंगे कैसे।
वेद कहता हैं, जीवेद शरदः शतम्। सौ वर्ष तक जियो, पर सौ वर्षों तक कैसे जियोगे। धन कमाने की लालसा तो आपको धनपशु बना दी हैं, और इसी धन में आप सुख प्राप्त करने की जिजीविषा लेकर स्वयं को समाप्त कर लेते हो, और कहते हो कि राम को मैं नहीं मानता, ये तो वहीं बात हुई कि कोई मूर्ख कहें कि मैं सूरज के अस्तित्व को नहीं मानता, मैं दिन व रात के अस्तित्व को नहीं मानता, मैं हवा को भी नहीं मानता। तो इससे सूरज, दिन, रात व हवा को क्या फर्क पड़ता हैं, क्या वो अपना काम करना बंद कर देगी या उक्त व्यक्ति से क्रोधित होकर उसके साथ बुरा बर्ताव करेगी।
मैं तो पहले भी कहा था, आज भी कह रहा हूं कि कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या को होनेवाली दीपावली सिर्फ यहीं संदेश देती हैं कि हे प्रकाश की कामना करनेवाले मनुष्यों, तुम सत्य मार्ग पर चलों। जैसे ही तुम सत्यमार्ग पर चलोगे, राम तुम्हारे साथ होंगे। जब राम तुम्हारे साथ होंगे तो तुम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाओगे और एक मर्यादा पुरुषोत्तम व्यक्ति के लिए, संसार में कोई भी कार्य असंभव नहीं। ऐसे में एक भारतीय के लिए, जिसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं हैं, उस भारतीय और भारत की ऐसी दशा क्यो। सभी भ्रष्टाचार - भ्रष्टाचार चिल्ला रहे हैं, एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं, पर सच यहीं हैं कि सभी किसी न किसी प्रकार से अपने आचरण को भ्रष्ट जरुर किये हुए हैं, ऐसे में सत्यमार्ग पर चलना और स्वयं राम बनना दोनों असंभव है। सच यहीं हैं कि अपने देश से राम बहुत दूर चले गये हैं। जरुरत हैं, उस राम को, चरित्र रुपी राम को अपने अंदर बैठाने की ताकि हम हर दिन दीपावली मना सकें ताकि हम हमेशा स्वयं को प्रकाशित कर सकें। उस वक्त हमें ये बोलने की आवश्यकता ही न पड़े कि हमें असत्य से सत्य की और अंधकार से प्रकाश की ओर या मृत्यु से अमरता की ओर चले, बल्कि हम इसे अपने कर्म द्वारा सत्यापित कर रहे होंगे।