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Sunday, March 5, 2017

प्यारे बच्चों..................

प्यारे बच्चों,
बहुत दिन हो गये, तुमलोगों से विस्तार से बातचीत किये हुए। सोचा था होली आ रही है, तुम लोग होली की छुट्टी में आओगे, पर इस बार होली में तुम लोग नहीं आ रहे, इसके कारण इस बार की होली भी फीकी रह जायेगी। हमें आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि तुम जिस सीमा पर तैनात हो, बड़ी ही ईमानदारी पूर्वक भारत माता की सेवा कर रहे होगे। इधर एक दुख भरा समाचार भी है, तुम्हारी बुआ का दो दिन पूर्व ही देहांत हो चुका है, उनका श्राद्धकर्म भी दस दिन बाद है, पर चिन्ता मत करना। हमलोग यहां है। मैं जानता हूं कि इस वेला में भी तुम्हारा यहां नहीं रहना, हृदय को विदीर्ण करता होगा, फिर भी हमारा सुझाव होगा, कि ऐसे मौके पर भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली श्रीमद्भगवदगीता काफी महत्वपूर्ण हो जाती है, तुम इस अवसर पर श्रीकृष्ण के कर्मयोग को याद करते हुए, आगे निकल पड़ो।
दुख आते है, मनुष्य को सबल बनाने के लिए, न कि दुर्बल बनाने के लिए...
याद करो अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को, जिनके जीवन में कभी सुख आया ही नहीं, केवल दुख ही दुख था, पर अंत में वे अमरीका के राष्ट्रपति बने और वे बेहतर राष्ट्रपति साबित हुए। जब भी समय मिले, एक अच्छी पुस्तक पढ़ो और उससे कुछ सीखो। भगवान राम को देखो, राजा के बेटे थे, पर उनका जीवन संघर्ष से भरा रहा, और इन्हीं संकटों से जुझते हुए, वे भगवान और मर्यादा पुरुषोत्तम की श्रेणी में आ गये।
तुमलोगों से इन दिनों बात ठीक ढंग से नहीं हो रही, इसलिए मैंने फेसबुक का सहारा लिया है। आशा है, पढ़कर तुम मेरी भावनाओं को समझोगे। अब आओ कुछ काम की बात करें। आज तुम्हें संत की परिभाषा बताता हूं, जो हमने भारतीय वाड.मय से सीखा है।
संत क्या है?  स+अन्त = जो समस्याओं का अन्त करें, वह संत। जो समस्या को बढ़ा दे, वह संत हो ही नहीं सकता। संत वैरागी होता है, संत भोगी नहीं होता, जो संत भोगी हो गया, वह संत कभी हो ही नहीं सकता। संत अलंकृत नहीं होता, बल्कि वह दूसरों को अलंकृत करता है। वह शासन या राजा के द्वारा किसी पुरस्कार का भूखा नहीं होता, वह तो गोस्वामी तुलसीदास की तरह होता है, जैसे एक बार अकबर के दरबार से गोस्वामी तुलसीदास को बुलाहट हुई, और गोस्वामी तुलसीदास ने पत्रवाहक को यह कहकर अकबर के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया कि मोसो कहां सीकरी सो काम। ऐसे होते है संत।
संत दुकान नहीं खोलता, संत कैटवाक नहीं करता या अध्यात्म की आड़ में व्यवसाय या स्वयं का उद्योग खड़ा नहीं करता, वो तो चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करता है, जिससे समाज में प्रेम की ऐसी गंगा बहे, जिसके प्रवाह में आकर सभी परमात्मा के एकाकार भाव में समाहित हो जाये।
हमारे देश में कबीर, तुलसी, रविदास, मीराबाई, सूरदास, रसखान, रहीम, नानक, ज्ञानेश्वर, स्वामी योगानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि ऐसे संतों की महान परंपराएं है, जिन्होंने देश व समाज को दिया, पर देश और समाज से लिया कुछ भी नहीं।
जरा मीराबाई को देखो, सभी उन्हें कृष्ण भक्त कहते है, पर मैं तो उन्हें कृष्ण की दीवानी कहता हूं, क्योंकि मीराबाई के गुरु थे संत रविदास, और उस वक्त जब भारत में जातियता कूट-कूट कर भरी थी, ऐसे माहौल में देखों, संत परंपरा। मीराबाई, संत रविदास जी को अपना गुरू मानती है, संत रविदासजी राम नाम की रट बराबर लगाया करते, उन्होंने मीरा को राम मंत्र दे डाला और लो मीराबाई राम मंत्र लेते ही, राममय हो गयी और कह डाला...
पायोजी मैने राम रतन धन पायो
वस्तू अमोलक दीयो जी मेरे सदगुरु, किरपा कर अपनायो
पायोजी मैने राम रतन धन पायो...
ऐसे होते है संत...
कबीर निराकार को माननेवाले, तुलसी साकार को माननेवाले, दोनों राम को भजते है, दोनो एक ही रामानन्दाचार्य संप्रदाय से पर किसी में भेदभाव नहीं...
जरा देखो कबीर राम को कैसे भज रहे है...
कस्तूरी कुंडलि बसे, मृग ढूढ़ै बन माहि।
ऐसे घटि-घटि राम है, दुनिया दीखै नाहि।।
कमाल है, और तुलसी को देखिये...
नाना भांति राम अवतारा।
रामायण सत कोटि अपारा।।
तो तुम्हे इसी प्रकार से अपने जीवन को ले चलना है। संत बनने के लिए गेरुआ वस्त्र या सफेद वस्त्र धारण करने या दाढ़ी-मूंछ बढ़ाने की आवश्यकता नहीं। बस अपने चरित्र की शुद्धता और ईश्वर पर अटूट विश्वास पर ध्यान देने की आवश्यकता है, फिर क्या? तुम्हारा जीवन धन्य। संत रविदास जी बराबर जूते – चप्पल मरम्मत किया करते, वे अपनी कठौती में ही चमड़ों को धोया करते, पर सच्चाई ये भी है कि उस गंदे जल में भी गंगा उसी पवित्रता से वास करती, जैसा कि अध्यात्मिक रुप से पुष्ट मानव के हृदय में। उन्हीं का कथन था – मन चंगा तो कठौती में गंगा।
तुम अपने कर्म से स्वयं को जीतने का प्रयास करो, चरित्र पर ध्यान दो, संस्कार से पुष्ट हो, ये मत देखों की तुम्हें क्या प्राप्त हो रहा है?, हां इतना जरुर ध्यान रखना कि तुमने देश को क्या दिया है?
अंत में,
हम इस बार होली नहीं मनायेंगे, पर इतना जरुर है कि जब भी तुम घर आओगे, होली उसी दिन मनायेंगे। खुब खुश रहो, देश के सभी महान संतों को प्रणम्य करते हुए, जीवन को आगे बढ़ाओ।
क्योंकि
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
राम भक्ति जहं सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
ऐसे भी तुलसी ने श्रीरामचरितमानस में, जब शबरी ने श्रीराम से नवधा भक्ति सुनने की बात कहीं तो भगवान श्रीराम ने शबरी को प्रथम भक्ति के रुप में क्या कहा?  जरा तुम स्वयं देखो...
भगवान राम ने कहा...
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
यानी प्रथम भगति जो है वह संतों की संगति है, पर संत कैसा हो? इसका चयन तुम्हें स्वयं करना होगा... ...अगर संत कबीर है, संत स्वामी विवेकानन्द है, तो जीवन नैया बेड़ा पार और अगर संत कालनेमि है, तो समझ लो जीवन अंधकारमय है। फिलहाल भारतवर्ष में कालनेमियों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी इनके बीच भी कई संत है, जो देश और समाज को नई दिशा दे रहे है, तुम उन संतों को स्वयं खोजों और अपना मार्ग प्रशस्त करो। ठीक उसी प्रकार जैसे स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस को और स्वामी दयानन्द ने नेत्रहीन स्वामी विरजानन्द सरस्वती को खोजा, और ज्यादा क्या लिखूं, ईश्वर तुम्हारे साथ है... ...हमेशा प्रसन्न रहो।
तुम्हारा पिता
कृष्ण बिहारी मिश्र

Sunday, November 3, 2013

जो राम को पा गया, जो राम में समा गया, उसी ने दिवाली मनाया.......................

जो राम को पा गया,
जो राम में समा गया,
उसी ने दिवाली मनाया,
किसी अन्य को आज तक मैंने दिवाली मनाते देखा ही नहीं। दिवाली क्या हैं, आनन्द को महसूस करने, आनन्द में खो जाने का एक विशिष्ट पर्व। पर लोग इस विशिष्ट पर्व में भी आनन्द से विमुख हो जाय, तो ऐसे लोगों को क्या कहेंगे। शायद ऐसे ही लोगों के बारे में कबीर ने कहा –
पानी बिच मीन पियासी,
मोहि सुन सुन आवै हांसी।
घर में वस्तु नजर नहीं आवत,
बन बन फिरत उदासी।
आत्मज्ञान बिना जग झूठा,
क्या मथुरा, क्या कासी।
कबीर ने साफ कह दिया कि जिस परम आनन्द को प्राप्त करने के लिए, लोग इधर से उधर भटक रहे हैं, वो तो घर में ही हैं, पर लोग परम आनन्द को प्राप्त करने के लिए जीवन भर वो सब करते हैं, जिसे करने की कोई जरुरत नहीं, जरुरत हैं आत्मज्ञान की ओर ध्यान देने की, क्योंकि आत्मज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य स्वयं को प्रकाशित कर लेता हैं, फिर मनाते रहिए, आप प्रत्येक दिन दिवाली, कौन रोक रहा हैं आपको।
कहा भी गया हैं ------
सदा दिवाली संत की,
आठों प्रहर आनन्द,
अकलमता कोई उपजा,
मिले इँद्र को रंक
अर्थात् संतों को जब आत्मसुख प्राप्त करना होता हैं, या स्वयं को प्रकाशित करना रहता हैं, परम आनन्द को प्राप्त करना होता हैं तो बस अपने हृदय में झांक लेते हैं, और सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं, पर देवताओं के राजा होने के बाद भी इँद्र को वो सुख प्राप्त नहीं होता, जो संतों को सहज ही प्राप्त होता है।
जरा मीरा को देखिये, जब मीरा को उनके गुरुदेव से रामरुपी धन प्राप्त हो जाता है, तो वह कितना परम आनन्दित हो जाती हैं। वो कैसे स्वयं को धन्य करते हुए, अतिप्रसन्न होकर, गाने लगती हैं, वो भी आत्मसुख प्राप्त करते हुए...............
पायोजी मैने रामरतन धन पायो,
वस्तु अमोलक दी मेरे सद्गुरु कृपा कर अपनायो,
खर्च न खूटे, चोर न लूटे, दिन-दिन बढत सवायो,
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, हरषि हरषि यश गायो,
सत की नाव खेवटिया सद्गुरु, भवसागर तर आयो
पायो जी मैंने रामरतन धन पायो,
कमाल हैं, गुरु से मिला भी तो क्या। राम रुपी धन। सोना-चांदी, हीरा-जवाहरात नहीं। आखिर रामरुपी धन ही मीराबाई को क्यों मिला, क्योंकि मीरा को परम आनन्द चाहिए थी, और परम आनन्द राम में ही समाया हैं, भौतिक सुख अथवा भौतिक संसाधनों में नहीं। मीरा का गर्व देखिये – ये ऐसा धन हैं, जो खर्च ही नहीं होता, खर्च करने की सोचे तो दिन –दिन बढ़ता जाता हैं. अंततः मीरा ये भी कहती हैं कि सत्य रुपी नाव को सिर्फ एक अच्छा गुरु, नेक गुरु, स्वार्थ और धन के प्रति लालच न रखनेवाला गुरु ही भवसागर पार करा सकता हैं, राम से साक्षात्कार करा सकता हैं, इसलिए मुझसा धन्य कौन है।
भारतीय वांग्मय कहता हैं
अधमाः धनम् इच्छन्ति
धनम् मानम् च मध्यमाः।
उत्तमाः मानम् इच्छन्ति
मानो हि महतां धनम्।।
अर्थात् जो दुष्ट होते हैं, वे सिर्फ धन की कामना करते हैं, जो मध्यमवर्गीय होते है वे धन और मान दोनों की कामना करते हैं पर जो सर्वोतम लोग हैं, वे कभी धन की कामना नहीं करते, वे तो सिर्फ सम्मान को ही सर्वोतम धन मानते हैं। इसलिए अपने देश में धन को उतना मह्त्व दिया ही नही गया। पर लोग दिवाली को धन से जोड़कर देखते हैं, दिवाली धन की कामना का पर्व नहीं, बल्कि परम आनन्द को प्राप्त करने का पर्व हैं। जरा सोचिये, एक छोटा सा मोहनदास, महात्मा कैसे बन गया, क्या धन की लालच के कारण, अथवा देश के लिए सर्वस्व का त्याग, और राम के प्रति उसकी अटूट श्रद्धा ने उसे दिव्यता प्रदान कर दी। भला दीपक जलायेंगे तो घर प्रकाशित होगा, पर मन को प्रकाशित करने के लिए आपने कुछ सोचा हैं। आप कैसे प्रकाशित होंगे, इसकी परिकल्पना की हैं, गर नहीं तो सोचिये। ये प्रकाश पर्व, प्रतिवर्ष आकर आपको ऐहसास कराता हैं, पर आप ऐहसास करने की जरुरत नहीं समझते। बस दिवाली आई, गणेश-लक्ष्मी की पूजा की, पटाखे छोड़े, विदेशी वस्तुओं से घर को सजा दिया और दिवाली हो गयी। ऐसा तो हम बरसों से करते आये हैं, फिर भी हमें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, और बगल का पड़ोसी चीन, हमसे आगे निकल गया। आखिर ऐसा क्यूं हुआ। आखिर आप चेतेंगे कब, जब सब कुछ हाथ से निकल जायेगा तब, हमारी प्राचीन संतों व ऋषियों की विशिष्ट परंपरा आपसे कुछ कहती हैं, कहती हैं कि आप इस मूलमंत्र के भाव को समझिये। तोता जैसा रटिये नहीं, चलिये। सदियों से भारत के कण – कण में ये मंत्र गूंजता आया हैं, वो आपसे कहता हैं कि अपने मन में ये भाव लाइये और फिर दीपावली मनाइये तभी इस पर्व की सार्थकता को आप समझ पायेंगे, तभी भारत विशिष्ट हो पायेगा, अन्यथा नहीं।
असतो मा सदगमय
तमसो मा ज्योर्तिगमय
मृत्योर्मां अमृतंगमय

Tuesday, March 1, 2011

भारत क्या है .............................................

सदियों से भारत और भारत के बाहर के लोग भारत और उसकी अमूल्य धरोहर यानी इसकी संस्कृति के बारे में जानने की कोशिश करते रहे हैं। इसी क्रम में कुछ जान पायें और कुछ बिना जाने ही स्वर्ग सिधार गये। जिन्होंने जाना, उन्होंने जीने की कला सीख ली और खुद को धन्य करा दिया और जिन्होंने नहीं जाना, वे आज भी आवागमन में लगे हैं। क्या है भारत, क्यों ये आज भी जीवित है जबकि इसी दरम्यान कई देश जीवित हुए और मृत भी हो गये, पर भारत आज भी साकार खड़ा है। इसकी सीमाएं कालांतराल में फैली, सिकुड़ती गयी, पर इसके अस्तित्व पर कभी संकट नहीं आया और न आ पायेगा। शायद इसीलिए सुप्रसिद्ध शायर इकबाल ने आखिर लिख ही डाला कि ...
यूनान मिस्र रोमां, सब मिट गये जहां से,
अब तक मगर है बाकी, नामो निशां हमारा,
कुछ बात हैं कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा हैं, दुश्मन दौरे जहां हमारा......................

कमाल है, विश्व में कौन ऐसा देश है, जिस पर भारत जितने हमले हुए, और फिर इन हमलों से पार पाकर, वो देश फिर शान से खड़ा हो गया हो। इसका मतलब ही है कि भारत, अन्य देशों से कहीं भिन्न है, ये भोगभूमि नहीं, ये त्यागभूमि है। इसका कण-कण धर्म और देवत्व की परिभाषा कहता हैं, जरुरत हैं इसे समझने की। पर आज इसे समझने की फुरसत किसे है, गर नहीं हैं, तो समय का इंतजार करिये, प्रकृति खुद ऐसी लीलाएं करेगी कि आप को समझना आवश्यक पड़ जायेगा।
विष्णु पुराण कहता है………………………………………..
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रश्चैव दक्षिणम्।
वर्षम् तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।

अर्थात् हिमालय के दक्षिण और सागर के उत्तर में जो भूखण्ड है वो भारत के नाम से जाना जानेवाला हैं और उसकी संतान भारती कहलाती है।
भा का अर्थ होता है – प्रकाश, प्रभा, कांति, शोभा और रत का अर्थ है – उसमें रम जानेवाला। यानी प्रकाश की ओर सदैव गमन करनेवाले देश का नाम भारत है। कैसा प्रकाश तो उसका सीधा अर्थ है – ज्ञान का प्रकाश। सर्वप्रथम ज्ञानोदय यहीं हुआ, सभ्यता यहीं आयी और फिर इस ज्ञान के प्रकाश के आधार पर सारा विश्व आलोकित हुआ। सारा विश्व भी अब मान चुका है कि विश्व की पहली पुस्तक ऋग्वेद है और इससे ज्यादा वर्तमान में प्रमाणिक आधार दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
भारत और भारत का धर्म………………………………………………..
बार-बार धर्म को लोग, अपने अपने चश्मे से देखते हैं, कोई कहता है – हिन्दू धर्म, इस्लाम धर्म, सिक्ख धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और पता नहीं कितने सारे धर्म आज विश्व में पैदा हो चुके हैं, जो अनगिनत हैं, हम कह सकते हैं कि जितने लोग, उतने धर्म। पर धर्म क्या है, उसका शाश्वत स्वरुप क्या है, उसका आधार क्या है, शायद ही इन धर्मों की वकालत अथवा इस पर गर्व करनेवालों को मालूम हो, पर सही में धर्म की व्याख्या बहुत पहले स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में कर दी थी – ये कहकर कि गर पूरे विश्व से हिन्दू धर्म समाप्त हो जाये और उसके जगह पर इस्लाम धर्म का बोलबाला अथवा ईसाई या अन्य किसी भी प्रकार के धर्मों का बोलबाला हो जाये तो उसके धर्म ध्वज अथवा उसके उपदेशों में क्या लिखा होगा – ये लिखा होगा कि झूठ बोलो, अमर्यादित आचरण करों, सज्जनों को दुख पहुंचाओं, नहीं तो फिर क्या लिखा होगा – यहीं न, कि सच बोलो, अमर्यादित आचरण न करों, सज्जनों को आनन्द पहुंचाओ, यहीं तो धर्म है। भारत तो सदियों से यहीं कहता आया है। यहीं धर्म का मूल स्वरुप हैं, आधार है। ऐसे भी धर्म शब्द की उत्पति ही संस्कृत के धृ धातु से हुई है। धृ का अर्थ है – धारण करना। क्या धारण करना तो सत्य धारयति धर्मः अर्थात् सत्य को धारण करना ही धर्म है। धर्म शाश्वत है यह प्रकृति के अधीन है। प्रकृति स्वयं सत्य आचरण करा लेती है कोई इसके विपरीत चल ही नहीं सकता। गर चलेगा तो प्रकृति उसे दंड देगी, ये पूर्णतः सत्य है। ठीक उसी प्रकार कि गर्मी के दिनों में कोई कंबल नहीं ओढ़ सकता, कंबल तभी ओढ़ेगा जब जाड़े का मौसम आयेगा। ये धर्म का सार है। किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा चलाया गया पंथ या मत – कदापि धर्म का स्वरुप नहीं ले सकता। क्योंकि धर्म उक्त व्यक्ति के पूर्व में नहीं रहने के बावजूद भी था और उक्त व्यक्ति के नहीं रहने पर भी रहेगा। वह मृत नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति के पंथ अथवा मत को माननेवाले पंथी अथवा मतावलंबी हो सकते है। धर्मावलंबी नहीं, धर्मावलंबी तभी होंगे जब वो प्रकृति के अनुरुप चलेंगे, भारत और भारत की वैदिक परंपराएं अथवा उपनिषद् यहीं कहती है, गर आप इसे नकारेंगे तो भला, वेदों अथवा उपनिषदों को क्या होनेवाला है, ठीक उसी प्रकार गर कोई आकाश पर थूकने का प्रयास करें तो क्या होगा, उत्तर उस व्यक्ति को खुद ही पता हैं, इस पर विवेचना की आवश्यकता नहीं।
भारत भोगभूमि नहीं, त्यागभूमि है........................................
ज्यादातर लोग आज पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति से अनुप्राणित हो रहे है, उन्हें लगता हैं कि उनका जीवन पश्चिम की तरह सुखों का उपभोग करने के लिए हुआ हैं, इसलिए जमकर प्रकृति का दोहन करों, आनन्द पाओं और दुनिया से विदा हो जाओ, पर भारत के इतिहास को देखें तो यहां वहीं व्यक्ति जीवित रहा, जिसने त्याग को अपनाया, बाकी सभी मृतात्माओं की श्रेणी में आ गये। ये क्रम सदियों से चलता आ रहा है और चलता रहेगा, कोई इसे काटना भी चाहे तो नहीं काट पायेगा। कितने प्रमाण दूं।
जरा गोस्वामीतुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस अथवा वाल्मीकि रामायण का पृष्ठ उल्टे. प्रसंग अयोध्याकांड का है। राजा दशरथ अति प्रसन्न है। वे अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते है। सारी तैयारियां हो चुकी हैं, पर ऐन मौके पर कैकेयी, महाराज दशरथ से दो वर मांगती हैं, जिसमें राम को वनवास और भरत को राज्याभिषेक की मांग शामिल है। दशरथ किंकर्तव्यविमूढ़ है। क्या करें क्या न करें। पर श्रीराम मर्यादा का पालन करते हुए पुरुषार्थ के प्रथम सोपान त्याग को अपनाते हैं, धर्म की रक्षा करते हुए, पिता और रघुकुल की रीति प्रभावित न हो, वे वनगमन को स्वीकार करते हुए, जंगल की ओर निकल पड़ते है। राम चाहते तो आजकल की पीढ़ियों के अनुसार वे अपने पिता दशरथ से कह सकते थे कि पिताजी आपने माता कैकेयी को वर दिया था, मैंने नहीं, रघुकुल के नियमानुसार अयोध्या का राजा ज्येष्ठ पुत्र ही होता है, ऐसे में, मैं ही अयोध्या का असली उत्तराधिकारी हूं और मैं ही राजा बनुंगा। अब आप बताईये, जब श्रीराम इस प्रकार की मांग दशरथ के पास रखते तो वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते। उत्तर होगा – नहीं। तो ये है धर्म और ये है भारत। श्रीराम ने पिता के वचन को साकार करने के लिए, सारे सुखों का त्याग कर दिया, यहीं नहीं इसके बाद सीता और लक्ष्मण ने श्रीराम के लिए, महलों के सुख का परित्याग कर दिया। और अब आगे, श्रीराम के भाई भरत को पता चलता है कि उनकी माता कैकेयी, उनके लिए राज्याभिषेक और श्रीराम के लिए वनगमन की मांग कर दी है, तो वे अपनी माता कैकेयी तक का परित्याग करते हुए, अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम को वन से लौटाने के लिए, जंगल की ओर चल पड़ते है, यहीं नहीं 14 वर्षों तक अयोध्या में रहते हुए, भरत ने सारे सुखों का त्याग कर दिया और वनवासियों की तरह रहे, ये है त्याग की परिभाषा यानी भारत की परिभाषा का सुंदर उदाहरण।
एक और प्रसंग पर ध्यान दें...................................................
प्रसंग श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धाकांड का है
बालि श्रीराम के बाण से घायल है। घायल बालि ने कहा –
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि व्याध की नाई।।
मैं वैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा।।

श्रीराम ने कहा.......................
अनुज बधु भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकई जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

यहां भी धर्म की व्याख्या हो गयी, गर आप चौपाईयों पर ध्यान दें तो भारत और भारत के धर्म की परिभाषा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
ये तो भारत के महाकाव्यों में से एक की बात कही, हो सकता है कि कई मित्र इन उदाहरणों को धार्मिक कथा कहकर, इसे प्रमाण मानने से इनकार कर दें। उनके लिए भी भारत के कई उदाहरण जो समसामयिक है। मेरे पास मौजूद है।
जरा ध्यान दे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का काल खंड महात्मा गांधी, दक्षिण अफ्रीका से भारत आते है, भारत आते ही स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई जारी करने की घोषणा करते है। तभी उनकी मुलाकात गोपाल कृष्ण गोखले से होती है, गोपाल कृष्ण गोखले, उन्हें कहते है कि मिस्टर गांधी ( उस वक्त तक गांधी को महात्मा का खिताब, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने नहीं दिया था) जिस भारत की परिकल्पना वे अभी कर रहे है, वैसा भारत अभी नहीं हैं, स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई को ठीक ढंग से चलाने के लिए पहले, उन्हें यानी महात्मा गांधी को, भारत दर्शन का कार्यक्रम बनाना चाहिए, उसके बाद गांधी जी ने भारत दर्शन का कार्यकम बनाया। उसी दौरान, उन्होंने जो भारत की तस्वीर देखी, उनका हृदय विदीर्ण हो उठा। भारत और भारतीयों की दयनीय दशा देख उन्होंने सारे सुखों का त्याग करने का संकल्प लिया और उसके बाद जो उन्होंने सामान्य जन की वेष भूषा अर्थात् लंगोटी पहनी तो उसे आजीवन धारण किये रहे। फिर उन्होंने सामाजिक सुधार आंदोलन के साथ साथ देश की स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी, और उन्होंने खुद अपने आंखों से भारत की स्वतंत्रता को देखा। इसके बदले में, उन्होंने अपने लिए कुछ भी देश से नहीं मांगा, सिर्फ और सिर्फ देश को दिया। त्याग की ऐसी मिसाल किस देश में मिलती है। इसी त्याग के कारण तो गांधी अपनी मृत्यु के साठ साल बीत जाने के बाद भी, जीवित है। यहीं नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने इनके जन्म दिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी को लीजिए, इन्होंने इंदिरा गांधी के गर्व को चूर चूर कर दिया। संपूर्ण क्रांति की बात की। 1974 के छात्र आंदोलन और उसके बाद उपजे जनता के क्रोधाग्नि का सही नेतृत्व कर, उन्होंने 1977 में जनता पार्टी की सरकार बना दी, चाहते तो प्रधानमंत्री बन सकते थे, पर उन्होंने सत्ता से दूरी बनाये रखी, और कभी सत्ता की कामना ही नहीं की। मर गये, पर सामान्य जन की तरह जीवन जिया, और इसी जीवन के द्वारा, उन्होंने भारत की अमूल्य संस्कृति को बता दिया की, जीना इसी का नाम है।
भारतीय उपनिषद् तो स्पष्ट कहता है कि
नत्वामहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुर्नभवं।
कामये दुखतप्तानां, प्राणिणां आर्तनाशनम्।।

गर कोई सच्चा भारतीय है, तो वो न तो राज्य की कामना करेगा, न स्वर्ग की कामना करेगा, वो तो बस यहीं चाहेगा की सारे सुखों का त्याग कर, दुखियों और पीड़ितों के शोक को शमन करने के लिए, इस धरा पर बार बार आता रहे।
कौन सच्चा भारतीय अथवा पुरुषार्थ से भरा प्राणी रहा है, उसकी परीक्षा उसके पूरे जीवनकाल खंड के मूल्याकंण से हो जाती हैं कि उस व्यक्ति में कितना पुरुषार्थ रहा, जैसे चाणक्य ने कहा.
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते।
निर्घषणतापछेदनेताडनैः।।
तथा चतुर्भिः पुरुषं परीक्ष्यते।
त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।

जैसे सोने को चार प्रकार से परखा जाता है, घिसकर, तापकर, छेदकर और पीटकर। ठीक उसी प्रकार किसी पुरुष की पुरुषार्थ की परीक्षा, उसके अंदर त्याग, मर्यादा, गुण और कर्म की परीक्षा लेकर की जाती हैं। जो इसमें खड़ा उतरा वो सच्चा भारतीय और भारत माता का लाल, नहीं तो बस उसी प्रकार आये गये, जैसे इस श्लोक का भावार्थ...............................................
येषां न विद्या, न तपो, न दानं, न ज्ञान शीलं, न गुणो न धर्मः
ते मृत्युलोके भूविभारभूता, मनुष्यरुपेणमृगाश्चरन्ति।।

जो आज विज्ञान पर्यावरण की संकट के बारे में आगाह कर रहा है, उस संकट को लाया किसने खुद विज्ञान ने, और ऐसा होगा, इसके बारे में आगाह तो हमारे मणीषियों ने आज से हजारों वर्ष पहले कह दिया था कि एक दिन ऐसा आयेगा कि विज्ञान के नाम पर ही लोग, अपने जीवन के कालखंड को सदा के लिए बुझा देंगे। कमाल है, आज के जैसी टेक्नॉलॉजी तो, उनके पास थी ही नहीं, फिर भी वे कैसे जान गये। वो इसलिए जान गये, क्योंकि उन्होंने परमज्ञान की प्राप्ति के पीछे ही समय गवायां, व्यर्थ के पचड़े में नहीं पड़े, प्रकृति ने जैसा संदेश दिया, उस अनुरुप आचरण करते गये, खुद को बनाया, भारत को बनाया, भारत की संस्कृति को अनुप्राणित किया, अपने इस आचरण को और बेहतर और आनेवाले पीढ़ियों को संदेश देने के लिए उपनिषद और अनेक ग्रंथ उपलब्ध करा दिये, और इसे धर्म का स्वरुप दिया, कि शायद लोग समझेंगे और गर आप आज नहीं समझ रहे, तो उनमें उनका क्या दोष। फिर भी मैं मानता हूं कि आनेवाला समय भारत का हैं, निराशावादी होना, अज्ञानता का परिचायक होता है, जो ज्ञानवान हैं वे आशावादी होते हैं, परिवर्तन चक्र चलता रहता है। भारत का ध्येय वाक्य है – सत्यमेव जयते। एक दिन सत्य की जीत होगी, धर्म का वर्चस्व बढ़ेगा, प्रकृति सभी को आगोश में लेगी, भारत फिर खिल उठेगा, त्याग की भूमि फिर इठलायेगी, चिंता की कोई आवश्यकता नहीं।
अंत में, कबीर की पंक्ति मुझे याद आ रही है, जो उन्होंने बहुत पहले कहा था.......
मन लागा, मेरा यार फकीरी में,
जो सुख पाउं, राम भजन में
वो सुख नाही, अमीरी में,
भला – बुरा, सब का सुन लीजै,
कर गुजरान, गरीबी में,
मन लागा मेरा यार फकीरी में,
आखिर ये तन, खाक मिलेगा,
कहां फिरत मगरुरी में,
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
साहिब मिले, सबूरी में,
मन लागा मेरा यार, फकीरी में....................................................