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Sunday, March 5, 2017

प्यारे बच्चों..................

प्यारे बच्चों,
बहुत दिन हो गये, तुमलोगों से विस्तार से बातचीत किये हुए। सोचा था होली आ रही है, तुम लोग होली की छुट्टी में आओगे, पर इस बार होली में तुम लोग नहीं आ रहे, इसके कारण इस बार की होली भी फीकी रह जायेगी। हमें आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि तुम जिस सीमा पर तैनात हो, बड़ी ही ईमानदारी पूर्वक भारत माता की सेवा कर रहे होगे। इधर एक दुख भरा समाचार भी है, तुम्हारी बुआ का दो दिन पूर्व ही देहांत हो चुका है, उनका श्राद्धकर्म भी दस दिन बाद है, पर चिन्ता मत करना। हमलोग यहां है। मैं जानता हूं कि इस वेला में भी तुम्हारा यहां नहीं रहना, हृदय को विदीर्ण करता होगा, फिर भी हमारा सुझाव होगा, कि ऐसे मौके पर भगवान श्रीकृष्ण के मुख से निकली श्रीमद्भगवदगीता काफी महत्वपूर्ण हो जाती है, तुम इस अवसर पर श्रीकृष्ण के कर्मयोग को याद करते हुए, आगे निकल पड़ो।
दुख आते है, मनुष्य को सबल बनाने के लिए, न कि दुर्बल बनाने के लिए...
याद करो अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को, जिनके जीवन में कभी सुख आया ही नहीं, केवल दुख ही दुख था, पर अंत में वे अमरीका के राष्ट्रपति बने और वे बेहतर राष्ट्रपति साबित हुए। जब भी समय मिले, एक अच्छी पुस्तक पढ़ो और उससे कुछ सीखो। भगवान राम को देखो, राजा के बेटे थे, पर उनका जीवन संघर्ष से भरा रहा, और इन्हीं संकटों से जुझते हुए, वे भगवान और मर्यादा पुरुषोत्तम की श्रेणी में आ गये।
तुमलोगों से इन दिनों बात ठीक ढंग से नहीं हो रही, इसलिए मैंने फेसबुक का सहारा लिया है। आशा है, पढ़कर तुम मेरी भावनाओं को समझोगे। अब आओ कुछ काम की बात करें। आज तुम्हें संत की परिभाषा बताता हूं, जो हमने भारतीय वाड.मय से सीखा है।
संत क्या है?  स+अन्त = जो समस्याओं का अन्त करें, वह संत। जो समस्या को बढ़ा दे, वह संत हो ही नहीं सकता। संत वैरागी होता है, संत भोगी नहीं होता, जो संत भोगी हो गया, वह संत कभी हो ही नहीं सकता। संत अलंकृत नहीं होता, बल्कि वह दूसरों को अलंकृत करता है। वह शासन या राजा के द्वारा किसी पुरस्कार का भूखा नहीं होता, वह तो गोस्वामी तुलसीदास की तरह होता है, जैसे एक बार अकबर के दरबार से गोस्वामी तुलसीदास को बुलाहट हुई, और गोस्वामी तुलसीदास ने पत्रवाहक को यह कहकर अकबर के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया कि मोसो कहां सीकरी सो काम। ऐसे होते है संत।
संत दुकान नहीं खोलता, संत कैटवाक नहीं करता या अध्यात्म की आड़ में व्यवसाय या स्वयं का उद्योग खड़ा नहीं करता, वो तो चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करता है, जिससे समाज में प्रेम की ऐसी गंगा बहे, जिसके प्रवाह में आकर सभी परमात्मा के एकाकार भाव में समाहित हो जाये।
हमारे देश में कबीर, तुलसी, रविदास, मीराबाई, सूरदास, रसखान, रहीम, नानक, ज्ञानेश्वर, स्वामी योगानन्द, स्वामी विवेकानन्द आदि ऐसे संतों की महान परंपराएं है, जिन्होंने देश व समाज को दिया, पर देश और समाज से लिया कुछ भी नहीं।
जरा मीराबाई को देखो, सभी उन्हें कृष्ण भक्त कहते है, पर मैं तो उन्हें कृष्ण की दीवानी कहता हूं, क्योंकि मीराबाई के गुरु थे संत रविदास, और उस वक्त जब भारत में जातियता कूट-कूट कर भरी थी, ऐसे माहौल में देखों, संत परंपरा। मीराबाई, संत रविदास जी को अपना गुरू मानती है, संत रविदासजी राम नाम की रट बराबर लगाया करते, उन्होंने मीरा को राम मंत्र दे डाला और लो मीराबाई राम मंत्र लेते ही, राममय हो गयी और कह डाला...
पायोजी मैने राम रतन धन पायो
वस्तू अमोलक दीयो जी मेरे सदगुरु, किरपा कर अपनायो
पायोजी मैने राम रतन धन पायो...
ऐसे होते है संत...
कबीर निराकार को माननेवाले, तुलसी साकार को माननेवाले, दोनों राम को भजते है, दोनो एक ही रामानन्दाचार्य संप्रदाय से पर किसी में भेदभाव नहीं...
जरा देखो कबीर राम को कैसे भज रहे है...
कस्तूरी कुंडलि बसे, मृग ढूढ़ै बन माहि।
ऐसे घटि-घटि राम है, दुनिया दीखै नाहि।।
कमाल है, और तुलसी को देखिये...
नाना भांति राम अवतारा।
रामायण सत कोटि अपारा।।
तो तुम्हे इसी प्रकार से अपने जीवन को ले चलना है। संत बनने के लिए गेरुआ वस्त्र या सफेद वस्त्र धारण करने या दाढ़ी-मूंछ बढ़ाने की आवश्यकता नहीं। बस अपने चरित्र की शुद्धता और ईश्वर पर अटूट विश्वास पर ध्यान देने की आवश्यकता है, फिर क्या? तुम्हारा जीवन धन्य। संत रविदास जी बराबर जूते – चप्पल मरम्मत किया करते, वे अपनी कठौती में ही चमड़ों को धोया करते, पर सच्चाई ये भी है कि उस गंदे जल में भी गंगा उसी पवित्रता से वास करती, जैसा कि अध्यात्मिक रुप से पुष्ट मानव के हृदय में। उन्हीं का कथन था – मन चंगा तो कठौती में गंगा।
तुम अपने कर्म से स्वयं को जीतने का प्रयास करो, चरित्र पर ध्यान दो, संस्कार से पुष्ट हो, ये मत देखों की तुम्हें क्या प्राप्त हो रहा है?, हां इतना जरुर ध्यान रखना कि तुमने देश को क्या दिया है?
अंत में,
हम इस बार होली नहीं मनायेंगे, पर इतना जरुर है कि जब भी तुम घर आओगे, होली उसी दिन मनायेंगे। खुब खुश रहो, देश के सभी महान संतों को प्रणम्य करते हुए, जीवन को आगे बढ़ाओ।
क्योंकि
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
राम भक्ति जहं सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
ऐसे भी तुलसी ने श्रीरामचरितमानस में, जब शबरी ने श्रीराम से नवधा भक्ति सुनने की बात कहीं तो भगवान श्रीराम ने शबरी को प्रथम भक्ति के रुप में क्या कहा?  जरा तुम स्वयं देखो...
भगवान राम ने कहा...
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
यानी प्रथम भगति जो है वह संतों की संगति है, पर संत कैसा हो? इसका चयन तुम्हें स्वयं करना होगा... ...अगर संत कबीर है, संत स्वामी विवेकानन्द है, तो जीवन नैया बेड़ा पार और अगर संत कालनेमि है, तो समझ लो जीवन अंधकारमय है। फिलहाल भारतवर्ष में कालनेमियों की संख्या बढ़ रही है, फिर भी इनके बीच भी कई संत है, जो देश और समाज को नई दिशा दे रहे है, तुम उन संतों को स्वयं खोजों और अपना मार्ग प्रशस्त करो। ठीक उसी प्रकार जैसे स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस को और स्वामी दयानन्द ने नेत्रहीन स्वामी विरजानन्द सरस्वती को खोजा, और ज्यादा क्या लिखूं, ईश्वर तुम्हारे साथ है... ...हमेशा प्रसन्न रहो।
तुम्हारा पिता
कृष्ण बिहारी मिश्र

Friday, January 6, 2017

सभी को मेरा प्रणाम स्वीकार हो..........

4 जनवरी 2017 को मैंने फेसबुक पर अपना स्टेटस डाला -
“आज मेरा सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में अंतिम दिन है...सभी को मेरा प्रणाम स्वीकार हो...”
जिसे हमारे फेसबुक के मित्रों ने जिनकी संख्या 251 है, अब तक लाइक किया है, इनमें आठ दुखी है, जबकि दो परमानन्दित है, कई लोगों ने अपने कमेंट्स में हमसे इस संबंध में सवाल पूछे है, कई ने अपनी भावनाओं को नाना प्रकार से हमारे समक्ष रखा है। कुछ लोगों ने हमारे मोबाइल पर हमसे पूछ डाला कि आखिर ऐसा क्यूं?, आज भी कुछ लोग हमसे मिलने आये, कि आखिर क्यूं?, हमें लगता कि हमें सभी के प्रश्नों का जवाब दे देना चाहिए, इसलिए सर्वप्रथम हम उन सभी महानुभावों का हृदय से आभार प्रकट करते है, जिन्होंने हमसे सवाल किये...
और अब सवाल का जवाब...
उत्तर दीर्घउत्तरीय है, इसलिए ध्यान से पढ़े...
ऐसे तो हमें कोई बांध कर नहीं रख सकता, सिवाय ईश्वर के...
मैं ईश्वर का गुलाम हूं, वो मुझे जहां चाहे, वहां रखे...
ऐसे भी मैं इस दुनिया में उसी के द्वारा भेजा गया हूं, इसलिए हमारा ख्याल उसे ही रखना होगा...
मैं उससे झगड़ भी नहीं सकता कि वो हमें ऐसा क्यों बनाया कि मैं ज्यादा दिनों तक कहीं टिकता ही नहीं...
अगर मैं कहीं ज्यादा टिका हूं, तो वह है ईटीवी जहां करीब पौने नौ साल कार्य किये, वह भी गुंजन सिन्हा जैसे लोगों के कारण, हालांकि उनसे भी हमारी जबर्दस्त मुठभेड़ उस दौरान हुई, और मुठभेड़ कराने में वे लोग उस दिन ज्यादा सक्रिय थे, जिन्हें हमें रांची में दीखने में बहुत ज्यादा कष्ट होता था, हालांकि इसका लाभ उन्होंने उठाया...
इसके पूर्व दैनिक जागरण में धनबाद व मोतिहारी में भी योगदान दिया था, दैनिक जागरण में मात्र डेढ़ साल रहा, वहां हमें पत्रकारिता का गूढ़ रहस्य देखने को मिला, सारी पत्रकारिता संबंधी भ्रांतियां और तथाकथित मूल्य पहली बार वहीं धूल-धूसरित दीखे...
इसके पूर्व अनुमंडलीय संवाददाता के रूप में थोड़े दिन प्रभात खबर, हिन्दुस्तान, आर्यावर्त, आज और इसके पूर्व आकाशवाणी पटना में आकस्मिक उद्घोषक के रुप में भी योगदान दिया...
इधर ईटीवी छोड़ने के बाद मौर्य टीवी से जुड़ा, जहां मात्र पांच महीने ही रहा, जहां पत्रकारिता जगत के महान विभूतियों की लीलाएं देखी। बाद में न्यूज 11, कशिश, जीटीवी, न्यूज इंडिया से भी जूड़ा और यहां भी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सका।
शायद यहीं कारण रहा कि धनबाद के एक अनन्य मित्र हरि प्रकाश लाटा जी ने लिखा कि “हम सोच रहे थे इस बार तो आपका रिकार्ड टूटेगा। आप यहां टिकेंगे। आपके पैरों के एड़ी के आसपास कोई तिल है क्या? जरा देखिएगा तो। हमारी शुभकामनाएँ। वैसे भी ईश्वर की तो असीम कृपा है आप पर !”
जो लोग मुझे जानते है, सो जानते है, कुछ लोग जो हमें जानने का दिखावा भी करते है, और जब उनके म्यानों में नहीं फिट बैठता हूं तो फिर वो अपने ढंग से हमें एवार्ड दे देते है, मुझे इसकी परवाह भी नहीं होती, क्योंकि मैं जो भी कुछ बोलता हूं, करता हूं...डंके की चोट पर बोलता हूं व करता हूं...
क्योंकि मुझे न तो कल सुख की लालसा थी और न आज ही है...
मुझे अपने ईश्वर पर पूरा भरोसा है, वो मुझे हर अवस्था में जो मुझे चाहिए, इतनी व्यस्तताओं के बावजूद हम तक पहुंचा देता है...
और अब बात आइपीआरडी की...
19 जून 2015 को मैं घर पर बैठा था कि आइपीआरडी के निदेशक अवधेश कुमार पांडेय जी का फोन आया, कि एक किताब तैयार करनी है, राज्य सरकार के लिए। उसमें मैं सहयोग करूं। अवधेश कुमार पांडेय जी हमको पटना से जानते थे, जब मैं वहां अनुमंडलीय संवाददाता के रूप में कार्य करता था। चूंकि मैं घर पर बैठा था, आइपीआरडी आकर उनसे मिला। किताब तैयार हो गयी। इसी बीच उन्हें एक व्यक्ति की तलाश थी, कि जो सरकार के विज्ञापनों और सरकार के कई क्रियाकलापों को जन-जन तक पहुंचाने में संचार के विभिन्न आयामों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें। उसमें मैंने ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाई, पर जैसे-जैसे दिन बीतते गये, मैं कई लोगों को खटकने लगा। कई लोगों ने हमारी झूठी शिकायत मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके आस-पास रहनेवाले महानुभावों को विभिन्न तरीकों से पहुंचाई। उन्होंने हमारे ब्लॉग और फेसबुक में सरकार के विरूद्ध लिखी गई बातों का हवाला दिया। इनमें मुख्य भूमिका आईपीआरडी के असंतुष्ट अधिकारियों की भी थी, जो काम तो कुछ नहीं किया करते पर शिकायत का पुलिंदा लेकर मुख्यमंत्री आवासीय सचिवालय में कार्यरत सीएम के खास लोगों तक जरूर पहुंचाते।
जिसके कारण मुझे 5 जनवरी 2016 को मुख्यमंत्री सचिवालय तलब किया गया। जहां मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी, कि मैं अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता। इसी बीच मैं काम करता रहा, लोगों ने अपनी आदतें नहीं छोड़ी, वे अपना काम करते रहे, और मैं ईमानदारी से जो काम मिलता करता रहा।
आज मुझे गर्व है कि यहां मात्र डेढ़ साल में, ईश्वर ने मुझसे वह काम कराया, जिसका मुझे विश्वास ही नहीं था। ईश्वर ने हमसे बहुत ही शानदार कार्य कराये है, जो झारखण्ड के लिए मील का पत्थर साबित हो रही है... वो क्या है? इसके बारे में मैं कुछ भी लिखना, यहां नहीं चाहता, ये तो वक्त बतायेगा?
इसके लिए मैं आभारी हूं, निदेशक – अवधेश कुमार पांडेय जी का, जिन्होंने मुझसे इतना बढ़िया काम करा लिया।
अंततः चूंकि मुझे अवधेश कुमार पांडेय ने ही आइपीआरडी के लिए नियुक्त किया था। राज्य सरकार ने उनकी जगह अब राजीव लोचन बख्शी को नया निदेशक नियुक्त किया है, ऐसे में मुझे अब यहां रहना उचित नहीं लगता, क्योंकि मुझे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने तो रखा नहीं और नहीं उनके मातहत किसी ने मुझे आईपीआरडी के लिए नियुक्त किया है और नहीं कोई मेरे पास कोई ऐसा पत्र है, जिसके आधार पर मैं ये कह सकूं कि मैं आईपीआरडी का सदस्य हूं। इसलिये नीति कहती है कि अब मुझे यहां नहीं रहना चाहिए, और न ही रहूंगा। अब मैं पूर्णतः स्वतंत्र हूं।
अब मैं खुलकर लिखूंगा, जनहित में लिखूंगा...
किसी की परवाह नहीं...
देखते है, अब ईश्वर, मुझे कहां ले जाता है...
जहां भी ले जायेगा, मुझे उसकी हर आज्ञा मंजूर है, क्योंकि मैं आज जो भी हूं उसी की कृपा से तो हूं...

Wednesday, December 28, 2016

मेरे प्यारे बच्चों...........

मेरे प्यारे बच्चों,
तुम लोगों से मोबाइल पर बातचीत हो जाती है, तो आनन्द आ जाता है। मैं जानता हूं कि तुम विपरीत परिस्थितियों में सीमा पर तैनात हो, फिर भी हमें हंसाने और खुश रखने के लिए हंसकर-मुस्कुराकर बातें करते हो। हम जानते और महसूस करते है कि आनेवाले समय में देश की जो स्थिति है, वो बेहतर नहीं होने जा रही है, क्योंकि इस देश के 98 प्रतिशत नेता अपने देश से प्यार नहीं करते, वे तो जिनकी बातें कर राजनीति करते है, उन्हें भी धोखा देते है और सिर्फ अपनी पत्नी और प्रेमिकाओं के प्यार में डूबे होते है। ऐसे में, देश का क्या हाल होगा?, हमें समझना होगा। हम अपने प्यारे देश को इन चिरकूट नेताओं और उनके घटियास्तर के बेटे-बेटियों और उनकी पत्नियों और प्रेमिकाओं के हवाले नहीं छोड़ सकते।
मैं जानता हूं कि तुमलोग छुट्टियों के लिए संघर्ष करते हो, पर छुट्टियां नहीं मिलती, गर छुट्टियां मिलती भी है तो समय पर नहीं मिलती। कहने को सरकारें बहुत कुछ कहती है और चिरकूट टाइप के नेता कहा करते है कि सीमा पर कार्य कर रहे जवानों के लिए हम बहुत कुछ कर रहे है, पर सच्चाई हमसे नहीं छुपी है, फिर भी तुमलोग अपने देश के प्रति और अपने कार्य के प्रति ईमानदार हो, ये देखकर हमें गर्व होता है।
तुम तो जानते हो और देखे भी होगे कि यहां के लोग भी महान है, वे शहीद हो गये जवानों के बेजान शरीरों पर फूल और मालाएँ डालने के लिए भीड़ इकट्ठी कर लेते है, पर जीवित जवानों (जो सीमा पर से लौटकर अपने घर-परिवार से मिलने आ रहे होते है) उन्हें अपनी सीटों पर बैठने तक को नहीं कहते और न ही बैठने देते है, सीट रहने पर भी कई लोगों को पैर-पसार कर अनारक्षित सीटों पर हमने सोते देखा है। मैंने अपनी इन्हीं आंखों से देखा है कि कई जवान ट्रेनों में जैसे-तैसे नीचे सोकर-बैठकर पशुओं की तरह अपने घर-परिवार से मिलने जाते है। ये सूरत कभी बदलनेवाली नहीं, चाहे सरकार किसी की भी आ जाय, ये तो चरित्र और संस्कार से जुड़ा मसला है, जिसकी दवा किसी के पास नहीं।
मैं तो तुम्हें कल भी कहता था, आज भी कह रहा हूं...
योग का अर्थ है – आत्मा का परमात्मा से मिलन।
योग 4 प्रकार का होता है – कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और हठयोग।
दुनिया का सबसे बड़ा योग कर्मयोग है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की प्रधानता और उसके गूढ़ रहस्य के बारे में बताया है। समय मिले तो श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ लेना। गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्रीरामचरितमानस में लिखा है...
कर्म प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करहिं तस फल चाखा।।
हम जो भी आज है, वो कर्म के कारण है, आगे हम जो बनेंगे, उसमें भी कर्म की ही प्रधानता रहेगी, आज जो तुम्हें मिला है, या जो तुम्हें प्राप्त हो रहा है, उसमें तुम कहीं नहीं हो, वो सब ईश्वर कर रहा है और करा रहा है...
बस तुम्हें करना क्या है? कि स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर, कर्म करते जाना है, फल की चिंता नहीं करनी है...फल तो तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। इसके लिए उदाहरण कई है, पर मैं अपना उदाहरण तुम्हारे समक्ष रखता हूं, क्योंकि तुम मेरे बेटे हो, तुमने हमें नजदीक से देखा है, मैं तुम्हारे सामने हूं, मेरा कर्म तुम्हारे सामने है, मैं आज कहा हूं, कल कहां था, और कल कहां रहूंगा, उसका सूक्ष्म विवेचना कर लो।
एक बात और...
हम इस दुनिया में क्यों आये है?
इसे भी जानो...
क्या हम आइएएस, आइपीएस, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, अधिकारी-कर्मचारी, चिकित्सक आदि बनने आये है? उत्तर होगा – नहीं।
तो हम दुनिया में आये है किसलिये...
क्या हम भोजन करने, मल-मूत्र परित्याग करने, बच्चे पैदा करने आये है?
अगर हम ऐसा करने आये है तो ऐसा तो पशु भी करते है।
ऐसे हालात में हम पशु से कैसे भिन्न हुए?
हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम पशु नहीं, मनुष्य है और मनुष्य का जन्म प्रारब्ध, प्रार्थना और प्रयास के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। वर्तमान में प्रारब्ध पर तुम्हारा अधिकार नहीं। आज का कर्म, कल प्रारब्ध में बदल सकता है, तुम्हारा वर्तमान में अधिकार सिर्फ प्रार्थना और प्रयास पर है, प्रतिदिन प्रार्थना करो और जो काम मिले, उसमें ईमानदारी बरतते हुए कार्य करो। मैं जानता हूं कि तुम अपने कार्यों में ईमानदारी बरतते हो, सेवा कार्य में कोई भी ढिलाई तुम बर्दाश्त नहीं करते, फिर भी पिता हूं, बताना चाहता हूं, जब तक जीवित रहूंगा, बताता रहूंगा। पिता का यह धर्म भी है। प्रार्थना के विषय में महात्मा गांधी का उल्लेख मैं करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि मैने ऐसी कोई प्रार्थना नहीं कि, जिस प्रार्थना को ईश्वर ने सुना नहीं हो। कमाल है महात्मा गांधी किस प्रकार की प्रार्थना करते थे कि ईश्वर ने उनकी सारी प्रार्थना को सुना। ये चिंतन का विषय है। आखिर महात्मा गांधी ने क्या कर लिया था? कि ईश्वर उनकी हर बातों को मान लेते थे। उसका सुन्दर उदाहरण है। महात्मा गांधी का सत्य से जुड़ाव। जिस दिन उन्होंने स्वयं को सत्य से जोड़ लिया, वे असाधारण हो गये। सत्य क्या है? इसका सुंदर विश्लेषण तैत्तरीयोपनिषद् में है, पर मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि सत्य ही ईश्वर है। ईश्वर को खोजना, बहुत आसान है, जब तुम सत्य पर होते हो तो जान लो कि ईश्वर के सन्निकट होते हो।
मैं जिस अवस्था में हूं, वहां तुम विश्वास नहीं करोगे, प्रतिदिन ईश्वर से मुलाकात होती है, मैं उन्हें महसूस करता हूं, मेरा सारा कार्य आसान होता चला जा रहा है। इसलिए मैं तुम सब को आशीर्वाद प्रदान कर रहा हूं, मस्ती में रहो, देश की सेवा करो, आनन्दित रहो, आनन्द न तो सरकार देती है और न अधिकारी। आनन्द तो सिर्फ ईश्वर देता है। वो कहीं भी किसी रूप में दे सकता है। मैने तो कई लोगों को भौतिक सुखों में घिरे रहने के बावजूद बिलखते देखा है, और कई को भौतिक सुखों के अभाव में भी परम आनन्द की प्राप्ति में स्वयं को आनन्दित होते हुए देखा है...
सच पूछो, तो तुमसब हमारे लिए ईश्वर का वरदान हो...
आनन्द लूटो, परम आनन्द की ओर बढ़ो...
जो हमने सिखाया है, उस मार्ग पर अडिग रहना...
मत झूकना, असत्य के आगे...
सत्य पर रहना, देश तुम्हारा, हम तुम्हारे, डर किस बात की...
वेद कहता है...
ऐ मन तू मत डर, जैसे सूर्य और चंद्र नहीं डरा करते...
ऐ मन तू मत डर, जैसे दिन और रात नहीं डरा करते...
आज कुछ ज्यादा लिख दिया हूं...वार्ता के क्रम में...
क्या करें? तुमलोग पास में रहते हो...तो खूब बाते होती है, और जब दूर हो तो फेसबुक में ही आराम से लिख देता हूं...पढ़ लो, और हमें आनन्द दे दो...
अरे अब तो मुस्कुराओं, दांत दिखाओ, देखो मैं पास में ही खड़ा हूं और तुम्हें देख रहा हूं...

Monday, November 11, 2013

आप चिंता मत करिये, अगले साल हम दस दिन पहले से भीख लेने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लेंगे..............

हमारे देश में कैसे चरित्रहीनता के छोटे से पौधे ने बरगद का पेड़ का रुप धारण कर लिया हैं, उसकी बानगी मैंने इस बार छठव्रत में देखी। आम तौर पर ज्यादातर लोग छठव्रत के दौरान, उदारता दिखाते हैं। इस उदारता के दौरान आपको अजीबोगरीब हरकतें देखने को मिलेंगी। जिस व्यक्ति ने अपनी जिंदगी में कंजूसी के विश्व रिकार्ड बनाये हैं, वह भी छठ व्रत के दौरान, इस प्रकार की उदारता दिखाता हैं कि जैसे वो व्यक्ति अपनी उदारता के लिए भी विश्वरिकार्ड बनाने के लिए उतावला हो। मेरा बचपन पटना के एक छोटे से मुहल्ले सुलतानपुर में बीता हैं। वहां मैंने बचपन में देखा हैं कि जिसके घर मैं कद्दू होता, वो छठ आने के एक महीने पहले से ही कद्दू के पौधे पर ध्यान देता और जैसे ही नहाय खा का दिन होता, वो अपने यहां पैदा हुए कद्दू को बड़े ही सहेज कर, उन घरों तक कद्दू को मुफ्त में इस प्रकार पहुंचाता, जैसे वो भी इस महाव्रत के दौरान थोड़ा सा पुण्य का भागीदार बन जाये। इसी प्रकार सूप बनानेवाले दलितों का समूह, वहीं भाव लेता जो जरुरी हो, न कि छठ के बहाने सूप से अधिक कमाई करने की उसकी मंशा होती। चूंकि वो जानता था कि छठव्रत के दौरान लोग, मोल जोल नहीं करते, जो मुंह से निकल गया, दे देते। क्या वो दिन थे, सेवा भाव के। हर गली-मुहल्ले सेवा भाव से ओत-प्रोत होते। जिसका आटे का मिल होता, वो तो खरना के दिन सुबह से ही अपने मिल को साफ सफाई करके तैयार रखता और छठव्रती अपना आटा मुफ्त पीसा लिया करते, कोई पैसा देने की बात भी करता, तो मिल वाला यह कहकर पैसा लेने से इनकार करता कि यहीं बहाने छठि मइया हमारी सेवा स्वीकार कर रही हैं, यहीं क्या कम हैं। पर अब ऐसी बात नहीं दिखती। सभी मुनाफा कमाने में लगे हैं, क्योंकि अब उन्हें लगता है कि छठ साल में एक बार आनेवाला पर्व हैं, चलो कमालो, नहीं तो फिर ऐसा मौका बार बार नहीं मिलेगा। भला कद्दू, सूप, दौरा, केला, गुड़ और गेहूं आदि के लिए लोग इस प्रकार की मार्केंटिग हमेशा थोड़े ही किया करते हैं, प्रोफेशनल बन जाओ, अपने जमीर को थोड़े दिनों के लिए मिटा दो और शुद्ध मुनाफा कमाने के लिए मुनाफाखोर बन जाओ।
चलिए छोड़िये, कहा भी जाता हैं कि जीने के दो मार्ग हैं एक सत्य का रास्ता और दूसरा असत्य का। जब से सृष्टि बनी है, तभी से ये मार्ग जीवंत हैं, जो लोग सत्य का मार्ग चूनते हैं, उन्हें भी आनन्द मिलता हैं और जो असत्यमार्ग पर चलते हैं, उन्हे भी आनन्द मिलता हैं, अब कौन किस प्रकार का आनन्द लेता हैं, वो जाने। ठीक छठ में भी वो चीजें सामने दिखाई पड़ रही हैं, किसी को छठव्रतियों की सेवा में आनन्द प्राप्त होता हैं तो किसी को छठव्रतियों के सेवा के नाम पर उनसे पूरा सेवाकर वसूलने में आनन्द प्राप्त होता हैं।
इधर मैं कई वर्षों से रांची के चुटिया में रहता हूं। वहां मैंने इस बार अजीबोगरीब चीजें दिखी। चुटिया थाने के ठीक सामने एक दवा की दुकान हैं। संभवतः वो दुकान विक्की सिंह की हैं। जब से इलेक्ट्रानिक मीडिया से मेरा नाता टूटा हैं, तब से मैं थोड़ी देर के लिए वहां से गुजरने के क्रम में विक्की सिंह के दुकान में बैठ जाया करता हूं। इसी बीच छठव्रत आया, पता चला कि विक्की सिंह, हिन्दुस्तानी क्लब चलाते हैं, जिसमें कई युवा शामिल हैं। इस हिन्दुस्तानी क्लब के अध्यक्ष खुद विक्की सिंह हैं। एक सायं जब मैं दुकान पर बैठा था, तो कुछ लोग आये, और विक्की सिंह को कहा कि मेरा नाम लिख लीजिये। विक्की सिंह उठे और उन लोगों का नाम लिख लिये। मैंने विक्की सिंह से पूछा कि विक्की, आप बताये ये नाम लिखाने का क्या चक्कर हैं। विक्की सिंह ने बताया कि पिछले चार सालों से वे छठव्रत के खरना के दिन, उनलोगों के बीच छठव्रत की सामग्री( जैसे – सूप, साड़ी, नारियल, फल, दूध, ईख इत्यादि) बांटते हैं, जो छठव्रत करने में असमर्थ हैं। हमें ये सुनकर अच्छा लगा कि चलों आज के युवा भी इस प्रकार के कार्यों में निस्वार्थ भाव से लगे हैं। मैंने दूसरे सवाल पूछे कि कितने लोगों को आप बांटते हैं और ये पैसा कहां से आता हैं। विक्की ने बताया कि वे पिछले चार सालों से बांटते आ रहे हैं, शुरुआत 36 लोगों से हुई थी, इस बार 95 लोगों को देना हैं। जिसमें सूप उन्हीं के क्लब के रमेश शर्मा और दूध का इंतजाम मुन्ना सिंह कर देते हैं, बाकी सारी व्यवस्था उनकी यानी विक्की की हैं। सुनकर बहुत आनन्दित हुआ, देर रात हो चली थी, मैं घर पहुंचा। बहुत ही आत्मविभोर हुआ, कि छठव्रत का अर्थ ही सेवा भाव हैं, और ये युवा गर ऐसा करते हैं तो सचमुच वे प्रभु के बहुत ही निकट हैं, उसे और कुछ करने की क्या जरुरत हैं। उसके दुकान और आंगन में तो ऐसे ही सूर्यनारायण और छठि मइया खेलती होंगी। उसे कही जाने की कोई जरुरत ही नहीं। इसी सोच में दूसरे दिन हम फिर विक्की की दुकान पर पहुंचे, पता चला कि अब रजिस्ट्रेशन का काम पूरा हो चला हैं। रजिस्ट्रेशन का मतलब, जिन्हें छठव्रत की सामग्री देनी होती हैं, हिन्दुस्तानी क्लब के लोग, उसकी पूर्व में ही सूची बना लेते हैं, ताकि वितरण के दिन, कोई गड़बड़ी नहीं हो। मैं बहुत ही खुश था। अचानक, कुछ महिलाओं का समूह उनके दुकान पर आ गया। महिलाएं बोली कि उनका नाम भी लिख लिया जाय। दुकान पर बैठे, क्लब के सदस्यों के साथ विक्की ने कहा कि चूंकि जितने लोगों का इस बार देना हैं, उनकी सूची पूरी हो गयी हैं, अब हम देने में असमर्थ हैं, अब हम आपको अगले साल देंगे, पर शर्त यहीं हैं कि जिस दिन हमलोगों तिथि मुकर्रर करते हैं, अपना नाम सूची में दर्ज कराने की, उस तिथि तक आपलोग अपना नाम दर्ज करा दें। इन महिलाओं ने कहा कि आप चिंता मत करिये, अगले साल हम दस दिन पहले से भीख लेने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लेंगे..............। पर इस बार दे दीजिये। ये वो लोग थे, जिन्हें ईश्वर ने गरीब नहीं बनाया, जिनके हाथों व कानों में सोने के गहने साफ बता रहे थे, कि इन्हें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है, पर मुफ्त में छठव्रत करने का एक शायद अपना अलग आनन्द होगा, और मुफ्त में सूप, साड़ी वगैरह मिल जाये तो क्या गलत हैं। हद तो तब हो गयी कि ये महिलाएं, पूर्व विधानसभाध्यक्ष सी पी सिंह से पैरवी भी करवा ली। अब युवा क्या करते। उन्हें इनका नाम दर्ज करना पड़ा। यानी हवन करने में युवाओँ के हाथ जलने का खतरा साफ नजर आ रहा था, पर मुफ्त में छठव्रत के नाम पर बेवजह कष्ट प्रदान करनेवालों को दया नही आ रही थी। कमाल हैं, जिस देश में ऐसे ऐसे लोग हो, जो छठ के नाम पर भी, भीख मांगने की कला पर गर्व करते हो, और ये कहते हो कि हम एक साल बाद भीख मांगने के लिए, पहले से ही रजिस्ट्रेशन करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे तो क्या आपको लगता हैं कि ऐसे लोगों पर भगवान सूर्य नारायण और छठि मइया कृपा लूटायेंगी। जो लोग दूसरे के मुख का आहार छीनने में अपनी शान समझते हो, उस पर ईश्वर की दया कैसे हो सकती हैं। इन युवाओं ने तो उन बेसहारों और गरीबों के लिए कार्यक्रम चलाया, जिनको ईश्वर ने कुछ भी नहीं दिया, पर इन बेसहारों और गरीबों पर लालचियों को दया नहीं आ रही तो क्या कहेंगे। ऐसे हम उन बेसहारों और गरीबों को भी कह देते हैं कि आपको व्रत करने के लिए किसी भी चीज की जरुरत नहीं, बस आप इतना करिये कि किसी भी जलाशय अथवा कूएं पर चल जाइये। जिस दिन पहला अर्घ्य हो, उस दिन भगवान भास्कर के समक्ष दोनों हाथ जोड़कर खड़ा हो जाइये और एक लोटा जल लेकर अर्घ्य दे दीजिए और यहीं कार्य दूसरे दिन करिये। आपका व्रत सफल हो जायेगा और ईश्वर मनोवांछित वर अवश्य देंगे, क्योंकि भगवान केवल भाव देखते हैं, क्या आपको पता नहीं भगवान राम तो भाव में बहकर शबरी के जूठे बेर खा लिये थे तो ऐसे में आपके एक लोटे जल क्यों नहीं भगवान भास्कर, और छठि मइया अर्घ्य स्वरुप ग्रहण करेंगी। धन्य हैं। हिन्दुस्तानी क्लब के वे युवा जो इस मंहगाई में भी छवठ्रतियों की सेवा में स्वयं को समिधा बना डाला। ईश्वर की उन पर कृपा अवश्य हो, ईश्वर से हमारी यहीं प्रार्थना है।

Wednesday, December 12, 2012

12.12.12 का चक्कर..................

12.12.12 को आना ही था, वो आ गया। अब आप इसे कैसे मनाते हैं। कैसे सेलीब्रेट करते हैं। कैसे इस दिन को यादगार बना देते हैं। ये श्रेय ईश्वर ने आपको दिया हैं, पर आप 12.12.12 को सेलीब्रेट करने के चक्कर में ईश्वर को जब चुनौती दे डालते हैं, तो ये ईश्वर को तनिक भी अच्छा नहीं लगता। आज 12.12.12 को सेलीब्रेट करने के चक्कर में लोग यहीं कर रहे हैं। कई ज्योतिषियों ने तो यहां तक कह दिया कि आज के दिन जो बच्चे जन्म लेंगे वे बहुत ही बलशाली व पराक्रमी होंगे, क्योंकि आज के दिन पांच ग्रहों का संयोग मिल रहा हैं। मंगल ग्रह का प्रभाव बच्चों पर पड़ेगा और आज जन्म लेनेवाले बच्चे और दिनों की अपेक्षा कुछ बेहतर स्थिति में होंगे। इस मनगढ़ंत बेफिजूल की बातों व चर्चाओं का प्रभाव यह पड़ा या यूं कहें कि कुछ लोगों को पता नहीं क्या हो गया, वो आज ही के दिन आपरेशन करा बच्चे को जन्म दे रहे हैं और नाम दे रहे हैं कि वे मातृत्व-पितृत्व सुख पाना चाहते हैं। क्या ईश्वरीय सत्ता को चुनौती देते हुए, खुद आपरेशन करा बच्चे को जन्म दिलाकर, मातृत्व-पितृत्व सुख पाना सहीं हैं। 
कुछ लोग आज ही वैवाहिक जीवन का आनन्द लेने की कामना करते हुए दाम्पत्य सूत्र में बंध रहे हैं। ऐसा करने से उन्हें लगता हैं कि उनका जीवन धन्य हो जायेगा और कुछ लोग अजीबोगरीब हरकतें कर रहे हैं, जिसे देख हमें लगता हैं कि हम पढ़े - लिखे लोगों की दुनिया में हैं, या मूर्खों की दुनिया में। अनपढ़ लोग जब ऐसी हरकतें करते हैं तो समझ में आता हैं कि वे अनपढ़ हैं, पर पढ़े लिखे लोग ऐसी हरकतें करे तो क्या कहेंगे। एक घटना सुनाता हूं, जब आपरेशन से बच्चों का जन्म नहीं होता था, तब ऐसी हालात नहीं थी, जबसे आपरेशन की धंधे ने जोर पकड़ा, ऐसी वाहियात बातों का प्रभाव ज्यादा दिखा। सच्चाई ये हैं कि बच्चे - बच्चे होते हैं। ये ईश्वरीय अनुभूतियां हैं, आप इन्हें ईश्वर पर ही छोड़ दे। उन्हें जब ईश्वर ने मुकर्रर कर दिया हैं, दुनिया में आने को। उन्हें उस दिन ही आने दे, नहीं तो इसका खामियाजा आपको ही भुगतना पड़ेगा और फिर आप जिंदगी भर अपने आपको कोसते रहेंगे कि आपने ऐसा क्यूं किया। एक उदाहरण, जो अपने जीवन में घटा हैं, वो आपके समक्ष रखता हूं। एक व्यक्ति ने एक ज्योतिष के घर जाकर कहा, ज्योतिष महोदय। डाक्टर ने कहां हैं कि आपका बच्चा आपरेशन से होगा, आप जब कहें दो तीन दिन के अंदर आपरेशन कर बच्चे को दुनिया में ले आया जाय। आप ये बताये कि कौन दिन आपरेशन कराना अच्छा रहेगा, ग्रहों की स्थिति किस दिन शुभ और अद्भुत हैं, जिस दिन बच्चे को दुनिया में ले आया जाये, और एक पंथ दो काज हो जाय। ज्योतिष ने सारे पंचांग उलटकर डेट मुकर्रर कर दी। और उक्त डेट को बच्चा दुनिया में आ गया। बच्चा जब दुनिया में आया तो फिर ज्योतिष से पंचांग दिखाने की, कुंडली बनाने की बात हुई। चूंकि जन्म के पहले ही पंचांग दिखा लिया गया था, अब केवल औपचारिकता पूरी की गयी। ज्योतिष ने कहा - अरे जजमान, गजब हो गया। आपका बच्चा होनहार, विद्वान, महापराक्रमी, बलशाली हैं, कोई इसके सामने टिकेगा ही नहीं। एकदम मस्ती में रहेगा। जब तक रहेगा, दोनों हाथों में इसके लड्डू रहेंगे। जजमान खुश। ज्योतिष को मुंहमांगी दक्षिणा देकर विदा किया गया। इधर बच्चे के ननिहाल से भी बच्चे को देखने की जिज्ञासा हुई कि ज्योतिष ने कहा हैं कि बच्चा बहुत ही पराक्रमी होगा, हम भी देखे कि मेरा नाती कैसा हैं, मेरा भांजा कैसा हैं। ननिहाल के नाना - नानी, मामा- मामी सभी व्याकुल। छोटा सा बच्चा, जब चार साल का हुआ, वो अपने ननिहाल पहुंचा। सभी खुश, दिन खुशियों से कट रहे थे। ज्योतिष की बात, कुछ सर चढ़ कर बोल रहा था। सभी ज्योतिष की बातों में फूले नहीं समा रहे थे। अचानक एक घटना घटी, चार साल का बच्चा, आकाश से आती हुई किसी चीज को देखने के लिए दौड़ा, शायद पतंग होगा। उसके पांव, खूले छत से फिसले और वो जमीन पर गिर पड़ा। उसे लोग लेकर फिर अस्पताल की और दौड़े और बच्चा दुनिया में मात्र चार साल ही टिक सका। लोग ज्योतिष को कोसने लगे, कि आपने कहा था - ऐसा होगा, वैसा होगा। लेकिन बच्चा तो चार साल में ही दुनिया से चल बसा। ज्योतिष ने कहा कि जजमान मैने गलत कहां कहा। बच्चे की चार साल की आयु थी और इन चार सालों में मैं वो पूरी तरह मस्ती काटा, मैने तो बच्चे की जन्म कुंडली देखी थी, आपकी नहीं। इसलिए आप देखे की बच्चा चार साल में ही मस्ती काटी की नहीं। बच्चे के माता - पिता के होश उड़ गये। वो ज्योतिष की बातों और उसकी इस सोच से अवाक् हो गये। 
आज जिस प्रकार से बच्चे को जन्म दिलाने  और शादी करने की होड़ 12.12.12 के चक्कर में लगी हैं। हमें लग रहा हैं कि कहीं ऐसा नहीं कि लोग इस 12.12.12 के चक्कर में अपने ही हाथों से आनेवाले भविष्य के सुखद पल का कहीं गला न घोंट दे। हम तो यहीं चाहेंगे कि लोग ईश्वर की सत्ता को चुनौती देने के बजाय, ईश्वर को हाजिर-नाजिर मानकर, ये दिन भी उन्हीं को सौंप, इसका आनन्द लें, तभी हम सच्चे सुख का आनन्द ले पायेंगे, नहीं तो वहीं होगा, जो मैंने एक सच्ची घटना के माध्यम से आपके समक्ष कुछ कहने की बात रखी............