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Saturday, February 4, 2017

नेता जी के लिए विधानसभा..........

नेता जी के लिए विधानसभा...
वकीलों के लिए हाईकोर्ट...
पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब...
और आम जनता के लिए...
बाबा जी का ठुल्लू...
एक साल हो गये पहाड़ी मंदिर से तिरंगा गायब है...
बड़ी ताम-झाम से साहेब ने यहां तिरंगा फहराया था...
रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को रांची बुलाया था...
आम जनता को सपने दिखाया था...
आज वहां खंभा तो दिखता है, पर तिरंगा गायब है...
आज देखिये...
इसी रास्ते से साहेब का काफिला निकलता है...
पर समय नहीं कि वो तिरंगा को पुनः वहां लहरा दें...
आम जनता को एक बार फिर वहीं खुशी दिला दें...
खूब हल्ला करते है...
खेल विश्वविद्यालय देंगे...
सीसीएल से एमओयू किये है...
दो साल हो गये...
एमओयू पड़ा है...
खेल विश्वविद्यालय के लिए सब कुछ है...
ढांचा भी है, पर इनके निर्णयों और निश्चयों से ये गायब है...
एंटी करप्शन ब्यूरो बनाये है...
ये ब्यूरो ऐसा है कि...
उसे थर्ड और फोर्थ ग्रेड के कर्मचारी ही घूसखोर दिखते है...
पर ए ग्रेड और बी ग्रेड के अधिकारियों को पकड़ने में...
इसको दादी और नानी याद आ जाती है...
शायद इसे लगता है कि यहां के सारे आइएएस-आइपीएस...
दूध के धूले है...
कमाल है, बलात्कारियों का दल...
पूरे झारखण्ड में खुला घूमता है...
वो मां-बहनों की इज्जत से खेलता है...
मां-बहनों की हत्या भी कर डालता है...
पर,
अपनी पुलिस उन दुष्कर्मियों को पकड़ने में असफल रहती है...
सरकार ने इन्हें बड़े-बड़े वाहन दिये है...
ये बिना नंबर के इस वाहन पर चढ़कर खूब ऐश करते है...
पर सच्चाई ये है कि अपराधियों से ये नैन-मटका करते है...
विधि-व्यवस्था का ये हाल है...
कि बड़े – बड़े शैक्षिक संस्थानों में भी अपराधिक घटनाएं घटती है...
पर नेता और उनके दलाल...
उन शैक्षिक संस्थाओं को बचाने में ही ज्यादा समय लगाते है...
आम जनता मरने को विवश है...
किसानों-मजदूरों के लिए बड़े-बड़े दावे है...
किसान अपनी मेहनत से कमाये फसल को...
सड़कों पर फेंकने को मजबूर है...
पर मजाल है कि सरकार और उनके नुमाइंदे...
किसानों के आंसू पोछने के लिए उनके घरों तक पहुंच जाये...
पूंजीपतियों को बुलाने और झारखण्ड लूटवाने को पूरा कुनबा तैयार हैं...
जनता बेहाल है, सरकार और सरकार के नुमाइंदे मालामाल है...
इस बार हाथी उड़वाने के लिए सीएम मचल रहे है...
मचल तो आइएएस और आइपीएस भी रहे है...
यहीं मौका है...
मिलकर लूटने का पर्व जल्द ही आनेवाला है...
इन अंधेरों को पत्रकार नहीं देख पाते है...
क्योंकि उनके आका को ये राजनीतिबाज...
पहले ही खरीद चूके है...
मेडिकल हब बनाने का शोर...
हर रोज सुनाई देता है...
पर रांची में ही बने अस्पताल सदर...
कब खुलेंगे...
इसका जवाब किसी के पास नहीं है...
हरमू के सौंदर्य नाम पर खूब ढिंढोरा पीटा...
वो हरमू जो कल नदी थी...
आज नाली रुप धर लिया...
आग लगे ऐसे सौंदर्यीकरण को...
जो नदी को नाली बना दें...
नेता-अधिकारी-ठेकेदार का पेट बहुत बढ़ा दें...
जन-वन योजना, डोभा योजना...
सब बनते अखबारों में...
यहां पेड़ भी जगमग करते...
सिर्फ-सिर्फ अखबारों में...
ढूंढते रह जाओगे, मोबाइल...
नहीं मिलेगा सड़कों पे...
अपना पैसा जेब निकालो
खा लो, तुम हर हालों में...
झूठ-झूठ ही, झूठ-झूठ अब...
हर जगह दिखाई देता है...
क्या तिलिस्म है...
इस सरकार का...
वाह-वाह सब करता है...
असली मजा तो इन नेताओं की...
खूब कटती है मस्ती में...
मर गई जनता, मरती जनता...
हर हाल मरेगी, झारखण्ड में...

Saturday, December 31, 2016

नेकी कर दुनिया को दिखा............

पहले हमने पढ़ा था, सुना था, मेरे घर के बुढ़े-बुजूर्ग बताया करते थे...
नेकी कर दरिया में डाल...
इस लोकोक्ति के आधार पर वे कई कहानियां सुनाया करते थे, कहानियां सुनाने के क्रम में यह भी कहा करते थे, कि ईश्वर को आत्मप्रशंसा पसंद नहीं है, पर दुनिया इतनी तेजी से बदली कि अगर स्वयं की आत्मप्रशंसा न करें तो दुनिया जानेगी भी नहीं और न रोजी-रोटी ही मिलेगी...न धंधा चलेगा।
इसलिए अब नई लोकोक्ति पेश है...
नेकी कर दुनिया को दिखा...
जब से निजीकरण और प्राइवेटाइजेशन का जमाना आया, मनुष्य संसाधन के रूप में नजर आया, बायोडाटा की मांग होने लगी, इस बायोडाटा में कैंडिडेट जमकर अपनी प्रशंसा करने लगा, ऐसी प्रशंसा जिसका सत्य से कोई नाता ही न हो, चूंकि दुनिया को दिखाना है, अपनी काबिलियत और शोहरत दिखाना है, तो ऐसा करना ही पड़ेगा...
यहीं नहीं फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सअप ने तो नेकी कर दुनिया को दिखा कि प्रवृत्ति को ऐसा आगे बढ़ाया, जैसे लगा कि किसी ने आग में भर चम्मच घी दे दिया हो...आग और तेज होने लगी...
हमारे कई मित्र ऐसे है कि इसका खूब जमकर सहारा लेने लगे है...
पहले तो चिरकूट नेताओं, फिल्मी नायक-नायिकाओं, बकरों-खरहों-चूहों-कुत्तों, चिलगोजों-चिरकूटों के साथ अपना फोटो खिंचवाकर, सेल्फी लेकर फोटो डाला करते थे, अब तो ये और भी इससे आगे निकल चूके है, अब वे पोस्टर बनवाते है, बैनर बनवाते है और ऐसी-ऐसी हरकते करते है कि हरकते शब्द ही शरमां जाये।
उदाहरण अनेक है...
पहला उदाहरण देखिये, एक सज्जन है, नाम लिखूंगा तो भड़क जायेंगे, उन्हें भड़काना भी नहीं है, सत्ता के करीब है, सत्ता में शामिल बड़े-बड़े लोग उन्हें धन-धान्य से परिपूर्ण कर रहे है। उन्होंने एक बैनर बनवाया और लगे कंबल बांटने। जब ये कंबल बांट रहे थे, तो कुछ लोगों ने उन्हें धर्मपरायण और धार्मिक व उदार व्यक्ति का खिताब दे डाला, ये खिताब दे भी क्यूं नहीं भाई, जिसका जो चेहरा दिखेगा, वहीं तो कहेगा। झट से उनके मातहत काम कर रहे एक कर्मचारी ने तीन-चार सेल्फी ली और झट से फेसबुक पर दे मारा, लगे हाथों लाइक और कमेंट्स और शेयरों की होड़ लग गयी, चूंकि बॉस नाराज न हो, इसका ख्याल रखना था, कुछ लोगों ने वाह-वाह तक कर डाला।
ऐसे मैं बता दूं कि हमने 9 साल पहले कंबल लिया था, एक कंबल तो 16 साल पुराना है, पर अंतिम बार जो 9 साल पहले कंबल खरीदा था, उसके बाद से कंबल खरीदा नहीं हूं। ऐसे भी कंबल चार –पांच महीने ही ओढ़े जाते है, वह भी जाड़े में, पर इधर देख रहा हूं कि कंबल लेनेवाले और देनेवाले दोनों की संख्या बढ़ी है, पता नहीं ये कंबल लेनेवाले कैसे कंबल ओढ़ते है, कि इनकी कंबल एक साल भी नहीं टिक पाती और दूसरे कंबल देनेवाले पता नहीं, इसमें कौन सा धर्म देखते है कि कंबल बांट चलते है, शायद शनि ग्रह शांत करने और स्वयं को उदार-दयालु दिखाने का दूसरा आसान रास्ता इसके सिवा कोई दूसरा नहीं।
नेकी कर दुनिया को दिखा का दूसरा उदाहरण देखिये...
छः-सात महीने पहले की बात है, एक बार एक कार्यक्रम में मुझे शरीक होने का मौका मिला। जनाब जो बहुत ही दयालु किस्म के आदमी स्वयं को घोषित करा चुके थे, उन्होंने उक्त कार्यक्रम में अपने एक ड्राइवर को गाड़ी की चाबी देते हुए ये ऐलान किया कि वे अपने ड्राइवर को आज गाड़ी सौप रहे हैं। मैं बहुत प्रसन्न हुआ, खड़ा होकर ताली बजाने लगा, बहुत अभिभूत हुआ कि जनाब लाखों की गाड़ी अपने ड्राइवर को दे दी, पर पता चला कि वो नई गाड़ी नहीं दे रहे, बल्कि वर्तमान में जो ड्राइवर, उनकी पुरानी गाड़ी चला रहा है, वह भी सड़ी हुई पुरानी गाड़ी, उसी को देने का ऐलान किया है। मैं आश्चर्य में पड़ गया, दुनिया में कैसे-कैसे लोग है?, पर सच्चाई यह है कि वह सड़ी हुई पुरानी गाड़ी भी उस ड्राइवर को अब तक नहीं मिली है, यानी हद हो गयी, नेकी के रास्ते में स्वयं को दिखाने का ये धोखे का प्रचलन हमें अंदर से हिलाकर रख दिया...
और अब आगे देखिये, आजकल देश में बहुत सारी सरकारें है, पंचायत से लेकर राज्य और फिर केन्द्र में, सरकार ही सरकार है, जो कहती है कि वे नेकी का काम करती है, इनलोंगों ने अपनी नेकी का काम का प्रचार-प्रसार करने के लिए अनेक चिलगोजों-चिरकूट टाइप कंपनियों को करोड़ों में हायर किया है, पहले इनका काम राज्य में कार्यरत मशीनरियां किया करती थी, पर इन सरकारों का इन मशीनरियों पर विश्वास ही नहीं रहा, शायद सरकारों को लगता है कि उनके पास जो लोग है, वे सारे निकम्मे है, इसलिए वे अब अपनी नेकी के काम का प्रचार-प्रसार, दिखावा आदि के लिए चिलगोजों-चिरकूट कंपनियों को ये काम दे रखा है, जो इनका बेवजह प्रचार-प्रसार, अपने चिलगोजों-चिरकूटों टाइप के दिमागों से किया करती है, आश्चर्य इस बात की है, इन चिलगोजों-चिरकूट कंपनियों को कुछ नहीं आता, केवल ये गलथेथरी और तूकबंदी किया करती है, पर स्वयं को शूट-बूट-टाई से अंलकृत रखती है, जिससे सरकार में कार्यरत बहुत सारे तथाकथित अक्लमंदों को लगता है कि दुनिया की सारी बुद्धिमानी ऐसे ही लोगों में भरी-पड़ी है...
यानी नेकी कर दुनिया को दिखा की प्रवृत्ति ने घर,परिवार,समाज, देश और विश्व तक को नहीं छोड़ा है। सभी इस प्रवृत्ति में सराबोर है, इससे मुक्ति का रास्ता फिलहाल नहीं दिखता, क्योंकि इसका प्रभाव भी गजब है। हाल देखिये, जो कल तक बाबा थे, अब वणिक हो चुके है। जो संत थे आज जेल की शोभा बढ़ा रहे है। जो नेता थे वे कोर्ट से चुनाव लड़ने के लिए वंचित करार दिये जा चुके है। यानी खोल कर लिख दिया भाई, समझते रहिये...

Wednesday, December 28, 2016

मेरे प्यारे बच्चों...........

मेरे प्यारे बच्चों,
तुम लोगों से मोबाइल पर बातचीत हो जाती है, तो आनन्द आ जाता है। मैं जानता हूं कि तुम विपरीत परिस्थितियों में सीमा पर तैनात हो, फिर भी हमें हंसाने और खुश रखने के लिए हंसकर-मुस्कुराकर बातें करते हो। हम जानते और महसूस करते है कि आनेवाले समय में देश की जो स्थिति है, वो बेहतर नहीं होने जा रही है, क्योंकि इस देश के 98 प्रतिशत नेता अपने देश से प्यार नहीं करते, वे तो जिनकी बातें कर राजनीति करते है, उन्हें भी धोखा देते है और सिर्फ अपनी पत्नी और प्रेमिकाओं के प्यार में डूबे होते है। ऐसे में, देश का क्या हाल होगा?, हमें समझना होगा। हम अपने प्यारे देश को इन चिरकूट नेताओं और उनके घटियास्तर के बेटे-बेटियों और उनकी पत्नियों और प्रेमिकाओं के हवाले नहीं छोड़ सकते।
मैं जानता हूं कि तुमलोग छुट्टियों के लिए संघर्ष करते हो, पर छुट्टियां नहीं मिलती, गर छुट्टियां मिलती भी है तो समय पर नहीं मिलती। कहने को सरकारें बहुत कुछ कहती है और चिरकूट टाइप के नेता कहा करते है कि सीमा पर कार्य कर रहे जवानों के लिए हम बहुत कुछ कर रहे है, पर सच्चाई हमसे नहीं छुपी है, फिर भी तुमलोग अपने देश के प्रति और अपने कार्य के प्रति ईमानदार हो, ये देखकर हमें गर्व होता है।
तुम तो जानते हो और देखे भी होगे कि यहां के लोग भी महान है, वे शहीद हो गये जवानों के बेजान शरीरों पर फूल और मालाएँ डालने के लिए भीड़ इकट्ठी कर लेते है, पर जीवित जवानों (जो सीमा पर से लौटकर अपने घर-परिवार से मिलने आ रहे होते है) उन्हें अपनी सीटों पर बैठने तक को नहीं कहते और न ही बैठने देते है, सीट रहने पर भी कई लोगों को पैर-पसार कर अनारक्षित सीटों पर हमने सोते देखा है। मैंने अपनी इन्हीं आंखों से देखा है कि कई जवान ट्रेनों में जैसे-तैसे नीचे सोकर-बैठकर पशुओं की तरह अपने घर-परिवार से मिलने जाते है। ये सूरत कभी बदलनेवाली नहीं, चाहे सरकार किसी की भी आ जाय, ये तो चरित्र और संस्कार से जुड़ा मसला है, जिसकी दवा किसी के पास नहीं।
मैं तो तुम्हें कल भी कहता था, आज भी कह रहा हूं...
योग का अर्थ है – आत्मा का परमात्मा से मिलन।
योग 4 प्रकार का होता है – कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और हठयोग।
दुनिया का सबसे बड़ा योग कर्मयोग है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की प्रधानता और उसके गूढ़ रहस्य के बारे में बताया है। समय मिले तो श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ लेना। गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्रीरामचरितमानस में लिखा है...
कर्म प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करहिं तस फल चाखा।।
हम जो भी आज है, वो कर्म के कारण है, आगे हम जो बनेंगे, उसमें भी कर्म की ही प्रधानता रहेगी, आज जो तुम्हें मिला है, या जो तुम्हें प्राप्त हो रहा है, उसमें तुम कहीं नहीं हो, वो सब ईश्वर कर रहा है और करा रहा है...
बस तुम्हें करना क्या है? कि स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर, कर्म करते जाना है, फल की चिंता नहीं करनी है...फल तो तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। इसके लिए उदाहरण कई है, पर मैं अपना उदाहरण तुम्हारे समक्ष रखता हूं, क्योंकि तुम मेरे बेटे हो, तुमने हमें नजदीक से देखा है, मैं तुम्हारे सामने हूं, मेरा कर्म तुम्हारे सामने है, मैं आज कहा हूं, कल कहां था, और कल कहां रहूंगा, उसका सूक्ष्म विवेचना कर लो।
एक बात और...
हम इस दुनिया में क्यों आये है?
इसे भी जानो...
क्या हम आइएएस, आइपीएस, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, अधिकारी-कर्मचारी, चिकित्सक आदि बनने आये है? उत्तर होगा – नहीं।
तो हम दुनिया में आये है किसलिये...
क्या हम भोजन करने, मल-मूत्र परित्याग करने, बच्चे पैदा करने आये है?
अगर हम ऐसा करने आये है तो ऐसा तो पशु भी करते है।
ऐसे हालात में हम पशु से कैसे भिन्न हुए?
हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम पशु नहीं, मनुष्य है और मनुष्य का जन्म प्रारब्ध, प्रार्थना और प्रयास के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। वर्तमान में प्रारब्ध पर तुम्हारा अधिकार नहीं। आज का कर्म, कल प्रारब्ध में बदल सकता है, तुम्हारा वर्तमान में अधिकार सिर्फ प्रार्थना और प्रयास पर है, प्रतिदिन प्रार्थना करो और जो काम मिले, उसमें ईमानदारी बरतते हुए कार्य करो। मैं जानता हूं कि तुम अपने कार्यों में ईमानदारी बरतते हो, सेवा कार्य में कोई भी ढिलाई तुम बर्दाश्त नहीं करते, फिर भी पिता हूं, बताना चाहता हूं, जब तक जीवित रहूंगा, बताता रहूंगा। पिता का यह धर्म भी है। प्रार्थना के विषय में महात्मा गांधी का उल्लेख मैं करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि मैने ऐसी कोई प्रार्थना नहीं कि, जिस प्रार्थना को ईश्वर ने सुना नहीं हो। कमाल है महात्मा गांधी किस प्रकार की प्रार्थना करते थे कि ईश्वर ने उनकी सारी प्रार्थना को सुना। ये चिंतन का विषय है। आखिर महात्मा गांधी ने क्या कर लिया था? कि ईश्वर उनकी हर बातों को मान लेते थे। उसका सुन्दर उदाहरण है। महात्मा गांधी का सत्य से जुड़ाव। जिस दिन उन्होंने स्वयं को सत्य से जोड़ लिया, वे असाधारण हो गये। सत्य क्या है? इसका सुंदर विश्लेषण तैत्तरीयोपनिषद् में है, पर मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि सत्य ही ईश्वर है। ईश्वर को खोजना, बहुत आसान है, जब तुम सत्य पर होते हो तो जान लो कि ईश्वर के सन्निकट होते हो।
मैं जिस अवस्था में हूं, वहां तुम विश्वास नहीं करोगे, प्रतिदिन ईश्वर से मुलाकात होती है, मैं उन्हें महसूस करता हूं, मेरा सारा कार्य आसान होता चला जा रहा है। इसलिए मैं तुम सब को आशीर्वाद प्रदान कर रहा हूं, मस्ती में रहो, देश की सेवा करो, आनन्दित रहो, आनन्द न तो सरकार देती है और न अधिकारी। आनन्द तो सिर्फ ईश्वर देता है। वो कहीं भी किसी रूप में दे सकता है। मैने तो कई लोगों को भौतिक सुखों में घिरे रहने के बावजूद बिलखते देखा है, और कई को भौतिक सुखों के अभाव में भी परम आनन्द की प्राप्ति में स्वयं को आनन्दित होते हुए देखा है...
सच पूछो, तो तुमसब हमारे लिए ईश्वर का वरदान हो...
आनन्द लूटो, परम आनन्द की ओर बढ़ो...
जो हमने सिखाया है, उस मार्ग पर अडिग रहना...
मत झूकना, असत्य के आगे...
सत्य पर रहना, देश तुम्हारा, हम तुम्हारे, डर किस बात की...
वेद कहता है...
ऐ मन तू मत डर, जैसे सूर्य और चंद्र नहीं डरा करते...
ऐ मन तू मत डर, जैसे दिन और रात नहीं डरा करते...
आज कुछ ज्यादा लिख दिया हूं...वार्ता के क्रम में...
क्या करें? तुमलोग पास में रहते हो...तो खूब बाते होती है, और जब दूर हो तो फेसबुक में ही आराम से लिख देता हूं...पढ़ लो, और हमें आनन्द दे दो...
अरे अब तो मुस्कुराओं, दांत दिखाओ, देखो मैं पास में ही खड़ा हूं और तुम्हें देख रहा हूं...

Tuesday, September 1, 2015

वाह-वाह, बिहार का नेता है.................

ये बिहार का नेता है
वाह-वाह, बिहार का नेता है
लालटेन तीर हाथ पकड़
सबका अपमान कर जाता है
वाह-वाह.............
जो पशुचारा खा जाता है
पत्नी को सीएम बनाता है
जो जातिवाद फैलाता है
संकीर्णता रास रचाता है
महिला को धौंस दिखाता है
जो बिहार बंटवाता है
वाह-वाह..........
जनता को नित दिन ठगता है
चश्मबाग दिखलाता है
कल तक हाथ में कमल दिखा
आज लालेटन पकड़ाता है
जहां चाणक्य ने जन्म लिया
जो चंद्रगुप्त प्रधान किया
वहा कंस बन करके नेता
खुद को कृष्ण बोलवाता है
वाह-वाह.................
जो कसमें बहुत ही खाता हैं
कहता बिजली दिलवाता है
पांच साल अब बीत गया
फिर भी वह नही शरमाता है
वाह वाह...................
खुद ही अनीति कर जाता हैं
पर नीतीश कुमार कहलाता है
बार-बार भीख मांग मांग
सब के आगे नच जाता है
वाह वाह...............
पटना में गंदगी करा दिया
पूरे बिहार को शरमा दिया
कभी केजरी, कभी मुल्लू
कभी सोनिया को, ठुमक दिखाता है
वाह वाह..................

Monday, July 1, 2013

झारखंड की जनता की छाती पर मूंग दलने को मचलते झामुमो और कांग्रेस के पत्नीभक्त नेता...................................

झारखंड के कांग्रेस-झामुमो से जूड़े नेताओं-विधायकों की पत्नियां, बेटे-बेटियां, दामाद और उनके लटके - झटके दुखी है। जब से भाजपा-झामुमो-आजसू की खिचड़ी सरकार झारखंड में गिरी, तब से इनके हाल बेहाल हैं, क्योंकि इनके नेता बार-बार कहा करते थे, कि झामुमो आज भाजपा से नाता तोड़े और लीजिये कल झामुमो और कांग्रेस की सरकार बन कर तैयार, पर ये क्या राष्ट्रपति शासन के छह महीने बीतने को आये पर अभी तक झामुमो-कांग्रेस की राज्य में सरकार नहीं बनी। बेचारे हेमंत के हाड़ में हल्दी नहीं लगी, बेचारे मुख्यमंत्री नहीं बने, क्योंकि उनकी दिली तमन्ना हैं कि एक - दो महीने के लिए ही सही कम से कम मुख्यमंत्री की सूची में उऩका नाम तो अब लिख ही दिया जाना चाहिए, पर सफलता नही मिल रही, लेकिन कांग्रेस के पूर्व झारखंड प्रभारी शकील अहमद ने उनके अरमानों पर बड़ा ध्यान दिया और उनकी बाते अपने अन्नदाता राहुल तक पहुंचा दी, साथ ही ये भी बता दिया कि गर कांग्रेस ने हेमंत के हाड़ में हल्दी लगवा दी तो देर सबेर इसका फायदा कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव में अवश्य मिलेगा। जैसे ही शकील के सरकार बनाने की हवा देने के बाद कांग्रेस - झामुमो के नेताओँ व विधायकों को मिली, बेचारे खुशी से पगला गये। इनकी पत्नियां, बेटे-बेटियां-दामाद खुशी से पागल हो गये। फिर सरकार बनेगी, दोनों हाथों में लड्डू होंगे, जैसे पूर्व की सरकार में शामिल मंत्रियों, विधायकों की पत्नियां, बेटे-बेटियां और दामाद विदेश यात्रा का आनन्द लेते थे, अब वे भी 18 महीनों में सारा कसर निकाल लेंगे। उन्होंने कोई पाप किया हैं क्या। उन्हें भी विदेश यात्रा और दुनिया का सारा सुख लेने का अधिकार हैं, जनता ने उन्हें मौका दिया हैं, इसका फायदा क्यों न उठाये। और लीजिये इन्हीं सारी तिकड़मों के लिए सरकार बनाने का दौर चलना शुरु हो गया हैं। हां एक बात और हम तो ये लिखना भी भूल रहे हैं, पर अब याद आ गया हैं, लिख देता हूं। यहां का मीडिया जगत भी चाहता हैं कि राष्ट्रपति शासन के बजाय जनता के प्रतिनिधियों का शासन हो, क्योंकि वो जानता हैं कि यहां के जनप्रतिनिधियों को अपनी अंगूलियों पर नचाकर, यहां के प्रशासनिक अधिकारियों से अपने हित में वो काम कराया जा सकता हैं, जो फिलहाल राष्ट्रपति शासन में होता नहीं दीखता, चाहे वो विज्ञापन से संबंधित ही मामला क्यूं न हो। राष्ट्रपति शासन में विज्ञापन मीडिया को उतने नहीं मिलते, जितना की अर्जुन मुंडा के शासनकाल मे अथवा कांग्रेस -झामुमो के शासनकाल में संभव है, और गर किसी कारण से विज्ञापन नहीं मिला तो फिर अपना ब्लैकमेलिंग का धंधा हैं ही। इसलिए यहां का मीडिया जगत भी दिलोजां से चाहता हैं कि यहां सरकार बने, चाहे वो पांच दिन के लिए ही क्यूं न हो।
इस सरकार बनाने में, जनहित और राज्यहित की बात खूब हो रही हैं, पर जरा सोचिये ये जनहित और राज्यहित की बात करनेवालों का चरित्र क्या हैं। सबसे पहले बात कांग्रेस की - यहां काँग्रेस के नेता राजेन्द्र प्रसाद सिंह हैं जो अर्जुन मुंडा के शासन काल में नेता प्रतिपक्ष थे। इनके गुट ने बी के हरिप्रसाद, प्रभारी, झारखंड कांग्रेस के रांची आगमन पर क्या गुंडागर्दी दिखायी ये बताने की जरुरत नहीं। इन्हीं के बेटे हैं - अनूप सिंह जो प्रदेश में एक बड़े पद पर हैं और अपने ही विधायक मन्नान मल्लिक को वो सबक सिखाया कि पूछिये मत। आज भी रांची कोतवाली थाना में इनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हैं, जरा सोचिये ऐसे ऐसे लोग सत्ता में होंगे तो राज्य और जनता का कितना हित होगा। अब जरा झामुमो की बात कर ले। इनके सुप्रीमो है- दिशोम गुरु शिबू सोरेन। ये हमेशा गर्त में जा रहे कांग्रेस को संभालते हैं। पहली बार रिश्वत लेकर नरसिंहा राव की सरकार बचानेवाले शिबू सोरेन की महिमा निराली हैं। इन्हीं की बहू सीता सोरेन हैं, जो सीबीआई के शिकंजे में हैं, जिन्होंने वोट बेचने की अपनी पार्टी की परंपरा का खूब निर्वहण किया और उन पैसों से क्या किया। झारखंड की जनता को मालूम हैं। ऐसे तो इनके सारे विधायक वोट बेचने की परंपरा में पीएचडी हासिल कर ली हैं। इसी पार्टी की कृपा से कई राज्यसभा के सांसद बन गये और कई झारखंड को चारागाह समझ कर यदा कदा झारखंड का परिभ्रमण करते रहते हैं। 
सवाल उठता हैं कि जिस प्रांत के नेताओं का चरित्र इस प्रकार का हो। वहां सरकार बने अथवा न बने क्या फर्क पड़ता हैं। आखिर जनहित और राजहित में सरकार बनाने की बात करनेवाले ये जनता को इतना बेवकूफ क्यों समझते हैं, कि जैसे जनता जानती ही नहीं। अरे जनता यहां की सब जानती हैं तभी तो ऐसे लोगों को अपना नेता चूनती हैं ताकि वो विधानसभा पहुंचकर उनकी छाती पर मूंग दल सकें, और इधर कई महीनों से जनता की छाती पर मूंग नहीं दली गयी, इससे जनता भी परेशान हैं। भला एक व्यक्ति को जनता की छाती पर मूंग दलने का अधिकार जनता ने तो नहीं दिया, इसलिए यहां के सभी विधायकों और मंत्रियों को अधिकार हैं कि वे झारखंड की जनता के छाती पर मूंग दलकर, अपनी पत्नियों, बेटे-बेटियों और दामाद-बहूंओं के लिए सात पुश्तों तक पूंजी जमा कर लें, ताकि इनके मरने के बाद, इनकी आत्मा को कोई मलाल न हो, कि वे झारखंड में जन्म लिये पर झारखंड को मुहम्मद गोरी और गजनी की तरह लूट न सके।

Friday, February 1, 2013

बेचारा मुर्गा, बयानवीर नेता और कोयलांचल के ज्ञानवान पत्रकार..........................

कोयलांचल में पिछले हफ्ते एक बात थोड़े समय के लिए चर्चा में रही। वो बात थी -- भाजपाईयों द्वारा गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाने की । एक चैनल जो दक्षिण भारत के एक शहर से हिन्दी क्षेत्रों में संचालित हैं, उसने इस समाचार को गणतंत्र दिवस के दिन प्रसारित किया था। फिर क्या था -- यहां के बयानवीर नेताओं के इस पर बयान आने शुरु हुए। उन नेताओं के इस बयान को देख और पढ़कर हमें बड़ी निराशा हुई। निराशा इस बात को लेकर हुई कि यहां के नेता जिन्हे ये पता नहीं कि मांसाहार कब मना हैं और कब मना नहीं हैं वे देश और समाज को क्या दिशा देंगे। ये तो मुर्गा और मछली से उपर अब तक उठ ही नहीं पाये हैं। वे बिना सिरपैर के बयान देने शुरु कर दिये थे। जिस चैनल ने उक्त न्यूज को प्रसारित किया था, वो तो अपने समाचार को महिमामंडित करने के लिए इसका फौलोअप भी शुरु कर दिया था।
जब भी कोई समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित किया जाता हैं तो उस समाचार की वस्तुस्थिति का आकलन किया जाता हैं, तब प्रसारित या प्रकाशित किया जाता हैं, पर यहां तो कुछ और ही हो रहा था। हद तो भाजपा के नेताओं की थी, वे इस प्रकार के बयान दे रहे थे, जैसे लग रहा हो, कि उन्होंने बहुत बड़ा पाप कर दिया हो। धनबाद के भाजपा सांसद पी एन सिंह का बयान था कि उन्होंने मांस उस दिन नहीं खाया था, वे तो अपना टिफीन लेकर चलते हैं, शाकाहार भोजन ग्रहण किया था। भाजपा जिलाध्यक्ष हरि प्रकाश लाटा भी इस पूरे प्रकरण पर काउंटर करने के बजाय, स्वयं को बचाते नजर आये, जैसे लग रहा था कि गर उन्होंने इस पर बयान दिया कि उन्होंने या भाजपाईयों ने उस दिन मुर्गा खाया था, तो इज्जत चली जायेगी, यहीं हाल भाजपा के राज सिन्हा का था, जिनका बयान था कि पूर्णमासी होने के कारण, उन्होंने मुर्गा को हाथ तक नहीं लगाया। अरे भाई हाथ लगा भी देते तो क्या हो जाता। गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाना या खिलाना पाप थोड़े ही हैं, या कानून का, अथवा संविधान का उल्लंघन थोड़े ही हैं, गर आपको बुद्धि नहीं हैं, आप मीडिया के अनुसार चलते हैं तो इसमें संविधान और कानून क्या कर सकता हैं, आप हमेशा मूर्ख बनते रहिये और वो बनाते रहेंगे।
ये तो रही भाजपा और अब विपक्षी नेताओं के बयान देखिये। झारखंड विकास मोर्चा के जिलाध्यक्ष ज्ञान रंजन सिन्हा का बयान आ गया कि भाजपाईयों को बापू की प्रतिमा के समक्ष जाकर, उपवास करना चाहिए, प्रायश्चित करना चाहिए, सांसद पर मुकदमा करना चाहिए। अरे भाई भाजपाईयों को क्यों प्रायश्चित करना चाहिए। क्या उन्होंने गुनाह कर दिया, पहले गुनाह तो बताओं, गणतंत्र दिवस के दिन मांस खाना गुनाह तो हैं नहीं, फिर मुकदमा कैसा। लगे हाथों बयानवीर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष मन्नान मल्लिक भी आपसे बाहर हो गये। इनके बयान देखिये -- इन्होंने तो सब पर कानूनी कार्रवाई करने की बात कह दी, पर कानूनी कार्रवाई करेगा कौन, कैसे करेगा। ये हमें आज तक समझ में नहीं आया। सिर्फ गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाने से, कानूनी कार्रवाई हो जायेगी, तब तो बहुत लोगों को जेल में जाना पडे़गा।
हमें गुजारिश हैं, बयानवीर नेताओं से कि कोई बयान देने के पहले वे दस बार सोंचे कि वे जो बयान देने जा रहे हैं, उस बयान का कोई अर्थ भी हैं या यूं ही अनर्गल बयान दे रहे हैं, वो भी अखबार में नाम नामक कहानी के प्रमुख पात्र गुरदास की तरह, जो अखबार में नाम छपाने के लिए उटपुटांग हरकतें कर दे रहा था। साथ ही यहां के पत्रकारों से भी, कि वे समाचार प्रसारित व प्रकाशित करने के पहले वे भी दस बार सोचे कि क्या गलत हैं क्या सही। बेवजह गलत खबरें दिखाकर, उसे प्रसारित कर, बेवजह किसी बात को तिल का ताड़ न बनाये और न ही उन बेवजह बातों को महिमामंडित करें, क्योंकि इससे अतंतः मीडिया की छवि आमजनमानस में खराब होती हैं। अंततः गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाना कोई अपराध नहीं हैं और न ही कानून की अवहेलना। ये बात मीडिया और नेताओं को भलीभांति जान लेना चाहिए।

Sunday, December 30, 2012

काला शनिवार.............................

शनिवार को सुबह, मैं जैसे ही जगा। एक बुरी खबर, मेरे कानों को सुनाई दी। 16 दिसम्बर को सामूहिक दुष्कर्म की शिकार 23 वर्षीया लड़की अब दुनिया में नहीं रही। सारा देश हतप्रभ था। देश की बहादुर बिटिया चल बसी। उसके साथ हुए अमानुषिक कुकृत्य ने पूरे देश को अंदर से झकझोर दिया था। दिल्ली क्या, दूर गांवों में भी इसकी गूंज सुनाई दी। सभी ने एक स्वर से मांग किया कि दुष्कर्मियों को कठोर से कठोर सजा मिले। संसद में भी इसकी शोर सुनाई दी। सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री जया भादुड़ी तो इस घटना से इतनी मर्माहत हुई कि वो रो पड़ी, पर इसी संसद में कांग्रेस का एक ऐसा भी नेता था, जो संसदीय कार्य मंत्री होते हुए भी इस घटना के समय़, संसद में चल रही बहस के दौरान हंस रहा था। जिसका नाम था -- राजीव शुक्ला। वो स्वयं को पत्रकार भी समय - समय पर कहा करता हैं। ऐसे तो नेता, नेता होता हैं। चाहे वो किसी भी पार्टी का क्यों न हो। बेशर्मी में इसका रिकार्ड तोड़ना सामान्य व्यक्तियों के वश की बात नहीं। हाल ही में कांग्रेस पार्टी का ही एक नेता संजय निरुपम, भाजपा नेत्री स्मृति ईरानी को ठुमके लगानेवाली कह डाला था, वो भी टीवी बहस के दौरान। इसी तरह राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने भी नारियों के खिलाफ घटियास्तर की टिप्पणी कर डाली पर इससे भी आगे निकल गये माकपा नेता अनीसुर्रहमान जिन्होंने प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को लेकर ऐसी टिप्पणी कर डाली, जिसे सभ्य समाज कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता।
सवाल उठता हैं कि जब देश में सामूहिक दुष्कर्म के खिलाफ, स्वतः स्फूर्त आंदोलन प्रारंभ हो जाते हो। उसके बाद भी देश के नेताओं की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता हो। नारियों के खिलाफ उनके बयान घटियास्तर के आते हो। साथ ही उक्त आंदोलन को दबाने के लिए नाना प्रकार के षडयंत्र रचे जाते हो। ऐसे में हम इन नेताओं पर और उनकी पार्टियों से हम ये भरोसा क्यों रखे, कि ये सामूहिक दुष्कर्म की शिकार युवती को मरणोपरांत भी न्याय दिलायेंगे। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ये बयान कि, उनकी भी लड़किया हैं, और इस घटना से वे भी मर्माहत हैं, पर ये मर्माहत होने के बावजूद भी खुद बचने का प्रयास करते हो। उक्त लड़की को सिंगापुर इलाज के नाम पर, इसलिए ट्रांसफर करते हो, कि देश में ये मैसेज जाय कि सरकार, उसे बचाने के लिए हरसंभव प्रयास की हैं। ये जानते हुए भी कि उस लड़की की स्थिति यहां पर ही, इतनी बिगड़ गयी हैं कि उसे बचाया नहीं जा सकता, क्या दिखाता हैं।
जनता मांग कर रही हैं कि त्वरित न्याय के तहत इस दुष्कर्म कांड के आरोपियों को सजा दिलायी जाय, पर सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही। मैं तो कहता हूं कि जिन लोगों ने नारियों को सम्मान नहीं दिया हैं, जिनकी मानसिकता नारियों के प्रति कभी ठीक नहीं रहा, जिन्होंने हमेशा विवादास्पद बयान नारियों के खिलाफ दिया हो, क्या इन्हें ऐसे ही छोड़ देना चाहिए। जिन नेताओं ने नारियों के खिलाफ घटियास्तर का बयान दिया हैं, क्या उन्हें इसलिए छोड़ देना चाहिए कि वे नेता हैं, या उन्हें भी दंडित करना चाहिए।
मेरा मानना हैं कि ये दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि हमारी नारियों के प्रति मानसिकता बदल गयी हैं। गलती खुद करें, और इसके लिए लड़कियों और नारियों के ड्रेस पर इल्जाम लगा दे। कमाल हैं, ऐसे कई कांग्रेसी-भाजपाई नेताओं के हास्यास्पद बयान, मीडिया में भरे पड़े हैं। जो इसके लिए लड़कियों के पोशाक को जिम्मेवार मानते हैं। मेरा मानना हैं कि जब इन नेताओं के मन में ही गंदगी भरी पड़ी हैं, जिसकी वे चर्चा नहीं करते, क्योंकि ये जानते हैं कि जैसे ही वे मन के अंदर, जागृत होनेवाली अपनी गंदी भावनाओं को देखेंगे, तो वे खुद शर्म से गड़ जायेंगे, पर हमें नहीं लगता कि इनकी जमीर इतनी मजबूत हैं कि वे शर्म से खुद मरेंगे, ये तो पैदा ही लिए हैं, हम सामान्य जन को जिंदा मार डालने के लिए। ये तब तक कुकर्म करेंगे, बयान देंगे, जब तक जिंदा रहेंगे, क्योंकि ये जानते हैं कि देश में जो भी हो रहा हैं, उससे वे परे हैं। इसकी आंच भी, उनके घरों तक नहीं पहुंचेगी। इसलिए आम जनता की इज्जत व आबरु जाये भाड़ में, हमें क्या पड़ी हैं। बस घटना घटेंगी। देखने जायेंगे।  घड़ियाली आँसू बहायेंगे। अपने विवेकाधीन कोटे से कुछ रुपये दें देंगे और जनता तो मूर्ख हैं ही, ये छोटी - मोटी घटनाएं थोड़े ही याद रखेंगी, बस पांच साल के लिए फिर से चुनाव के बाद, अपनी सीटे आरक्षित करा लेंगे।

Wednesday, August 24, 2011

झुकती है दुनिया, झुकानेवाला चाहिए------ अन्ना, मीडिया और केन्द्र सरकार !

कल तक भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं था, पर आज भ्रष्टाचार मुद्दा है। भ्रष्टाचार पर संसद के अंदर और संसद के बाहर बहस हो रही हैं। होना भी चाहिए क्योंकि इस भ्रष्टाचार ने भारत की प्रगति और उसके सपनों को प्रभावित किया है, और हमें ये कहने में कोई दिक्कत नहीं हो रही कि इसके लिए गर कोई दोषी है तो वह है – केन्द्र सरकार, और खुलकर बोले तो – कांग्रेस सरकार। इसी सरकार ने भ्रष्टाचार के बीज बोए, जो आज विशाल वटवृक्ष बनकर देश को सुरसा की तरह निगलता जा रहा हैं।आश्चर्य इस बात की हैं कि ये सरकार अपने किये पर पछतावा भी नहीं करती, बल्कि ठीक उसके उलट भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़नेवालों को ही सबक सीखा देती हैं। उदाहरण एक नहीं अनेक हैं। आगे लिखने के पहले मैं एक बार फिर कह देना चाहता हूं कि जो फिलहाल भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे है, या टीवी के माध्यम से जो भीड़ दिखाई पड़ रही हैं, वे सभी दुध के धूले हुए होंगे – ऐसा नहीं हैं, पर जनता के अंदर ही जनार्दन (ईश्वर) हैं इसलिए जनता के खिलाफ बोलना अपराध हैं, साथ ही जो केन्द्र में बैठे नेता ये बयान देते हैं कि संसद सर्वोच्च हैं और जो निर्णय लिये जायेंगे वो संसद के माध्यम से ही निर्णय लिये जायेंगे। तो शायद उन्हें ये पता नहीं कि जो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं, वे संसद की गरिमा पर सवाल न उठाकर वहां बैठे उन भ्रष्ट लोगों के खिलाफ अंगूली उठा रहे हैं, जिन्होंने संसद में शपथ लेने के बाद भी भ्रष्टाचार के रिकार्ड बनाये है।कमाल हैं आम जनता महंगाई से पीस रही हैं। हास्पीटल में उसका समुचित इलाज नहीं हो पा रहा। उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई से वंचित हो रहे हैं। ए ग्रेड की नौकरियों से आम जनता गायब हैं। पर इन नेताओं को देखिये – महंगाई का इनके उपर कोई असर ही नहीं पड़ता, ये गर बीमार पड़े तो इलाज के लिए अमरीका, ब्रिटेन और फिर स्वास्थ्य लाभ के लिए स्विटजरलैंड का दौरा करेंगे। अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए विदेश भेजेंगे और ये बच्चे जब वहां से लौटेंगे तो इन्हें ए ग्रेड की नौकरी थमवायेंगे और जब कुछ नहीं हुआ तो नेता का पद खाली हैं ही। जिंदा रहे तो बहुत सारे चांस हैं, नहीं तो मरने पर बेटे अथवा बेटियों का स्थान सुरक्षित हैं ही। जिस देश में इस प्रकार के सिद्धांत प्रतिपादित होते हो, वहां भ्रष्टाचार नहीं फलेगा फूलेगा तो और क्या फलेगा फूलेगा।मेरा आज भी मानना हैं कि इस देश को गर खतरा हैं तो वह हैं – चरित्रहीनों से। इस देश में चरित्रहीनों की संख्या बढ़ती जा रही हैं, और चरित्रवानों की संख्या घटती जा रही हैं, ठीक उसी तरह जैसे भारत से जंगलों और उसमें रहनेवालों सिहों की संख्या प्रभावित हो रही हैं। जब भी किसी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की, कि सत्ता में बैठे भ्रष्ट दलालों ने, ऐसा ताना बाना बुना कि वह व्यक्ति अपने सम्मान को बचाने के लिए, सदा के लिए अपना मुंह ही बंद कर लिया, पर इस देश में जब भी किसी चरित्रवान ने सत्ता के दलालों को भ्रष्टाचार के खिलाफ चुनौती दी, सत्ता भड़भड़ाकर, उस व्यक्ति के चरणों के आगे नतमस्तक हो गयी। उसका उदाहरण – अन्ना के रुप में सामने हैं।अन्ना क्या है, अन्ना ऐसा क्यूं कर रहे हैं, अन्ना को किसने ऐसा करने को कहा। इन सवालों के जवाब देने में मैं असमर्थ हूं। पर शायद भारत की जनता को लग रहा हैं कि इस व्यक्ति ने जो सवाल उठाये हैं – देशहित में हैं। इसे सत्ता का लोभ भी नहीं। इसलिए इसका समर्थन करना चाहिए। आज बड़ी संख्या में जनता इनके साथ है और जहां जनता होती हैं, जीत उसी की होती हैं, शायद केन्द्र की सरकार को इसका भान नहीं हैं। तभी तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करने की बात करनेवाले अन्ना के आंदोलन को कुचलने का हरसंभव प्रयास करती हैं और जब आंदोलन को कुचलने में नाकाम रहती हैं तो विधवा प्रलाप करती हैं।कमाल हैं एक बूढ़े अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठायी तो कांग्रेस के युवराज राहुल कहा हैं, उनके बयान कहां गये – पता ही नहीं चल रहा। इधर कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी, अन्ना के खिलाफ तुमताम पर उतर आते हैं। इधर कांग्रेस के एक मंत्री सुबोधकांत सहाय, दिग्विजय सिंह की तरह बयान देते हैं कि अन्ना को रांची के पागलखाने में सिफ्ट कर देना चाहिए। शायद कांग्रेस के इन दिग्भ्रमित नेताओं को पता नहीं कि यहां की जनता बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही हैं, उस मौके का, जब इन नेताओं को, यहां के लोग पागलखाने भेजने में मह्त्वपूर्ण भूमिका निभायेंगे।कमाल हैं – अंग्रेज यहां का धन लूट कर, इंग्लैंड ले जाते थे, तो बात समझ में आती थी कि वे विदेशी हैं। अपने देश को वैभवशाली बनाना चाहते हैं। पर भारतीय नेता यहां के धन विदेशों में ले जा रहे हैं, अपना ज्यादातर समय़ विदेशों में व्यतीत कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भारत से प्रेम करते हैं, भारत को वैभवशाली बनाना चाहते हैं, आखिर ये दोहरा चरित्र दिखानेवाले इन भारतीय नेताओं पर यहां की जनता विश्वास कैसे करें। यहीं कारण हैं कि जनता का सरकार पर से विश्वास उठ चुका हैं और भ्रष्टाचार के इस सवाल पर फिलहाल अन्ना के निकट जनता ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रही हैं। पिछले दो दिनों से भारत की जनता उद्वेलित हैं। वो जानना चाहती है कि अन्ना के साथ आखिर केन्द्र सरकार ऐसा सलूक क्यों कर रही हैं। आखिर अन्ना ने क्या गलती कर दी कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जब गिरफ्तार कर लिया गया, गिरफ्तारी के कारण गिना दिये गये तो फिर अचानक रात होते होते उनकी रिहाई की बात कैसे हो गयी। शायद दिल्ली में बैठी कांग्रेस सरकार को आभास हुआ होगा कि जैसे रामदेव के आंदोलन को उन्होंने कुचल दिया। सीबीआई और अन्य एजेंसियों को लगाकर रामदेव के हालत पस्त कर दिये ठीक उसी प्रकार से अन्ना की हवा निकाल देंगे। हालांकि अन्ना के इस आंदोलन की हवा निकालने के लिए, कांग्रेसियों ने अन्ना के चरित्र पर अंगूली ही नहीं बल्कि उनके खिलाफ कई झूठे दस्तावेज भी इंटरनेट पर उपलब्ध कराये, पर वो अपने इरादे में सफल नहीं हो सके। उलटे केन्द्रसरकार ही शर्म से मुंह छुपाने का प्रयास करती रही। रामदेव के आंदोलन की तो भद्द पीटनी ही थी, क्योंकि रामदेव खुद को संत बताते हैं, पर रामदेव संत नहीं बल्कि ये विशुद्ध व्यवसायी हैं और इनका व्यवसाय करोंड़ों – अरबों में हैं और विदेशों में भी फैला हैं और जो कारोबार करता हैं, वह कारोबार धर्म का हो, या चूरन – चटनी का। व्यवसाय, व्यवसाय होता हैं। पूरी तरह से वणिक कर्म होता हैं, जहां झूठ ही झूठ का बोलबाला होता हैं। ऐसे में एक झूठ बोलनेवाला, दूसरे झूठ बोलनेवाले के खिलाफ आंदोलन करेगा या भिड़ेगा तो उसमें जो मजबूत होगा वहीं जीतेगा। और ये अवश्यम्भावी थी कि इसमें जीत कांग्रेस की होनी ही थी, पर अन्ना के साथ ऐसा है ही नहीं। अन्ना के पास न तो बैंक बैलेंस हैं और न कोई पारिवारिक चाहत। ऐसे में जिसके पास केवल सत्य ही सत्य हो, तो भला उसे कोई कैसे हरा सकता हैं। यहीं कारण रहा कि जब – जब अन्ना ने केन्द्र को चुनौती दी। केन्द्र की हालत भीगी बिल्ली जैसी होती रही और ये स्थिति बराबर होती रहेगी, क्योंकि ये देश गांधी का देश हैं, कृष्ण और राम का देश हैं। यहां असत्य जब – जब सत्य से टकराया हैं, हारा है और इस बार भी हारेगा।जनलोकपाल विधेयक लाना ही होगा और पीएम तथा न्यायपालिका को उसके दायरे में लाना ही होगा, क्योंकि ये अन्ना की मांग नहीं, बल्कि आम जनता की मांग हैं। इसलिये सरकार हठधर्मिता छोड़े और जनता की मांग माने, नहीं तो याद रखें जैसे 1974 के आंदोलन का प्रभाव 1977 में दिखा था, 2011 का ये आंदोलन भी रंग दिखाकर रहेगा। इसमें किसी को संदेह नहीं रखना चाहिए।

Thursday, July 14, 2011

नेता पर लेख.............................


नेता एक दोपाया और खतरनाक जंगली जानवर होता है। मनुष्यों की तरह इसके भी दो आंख, दो कान, एक नाक और एक मुंह होते है, पर अपने दिमाग और पेट में रहनेवाले ज्वलनशील विचारों और कीटाणुओं के कारण ये आम आदमी से अलग हो जाता है। ये जानवर पूरे विश्व में अलग – अलग शक्लों में पाया जाता है और सभी जगह की जनता इनसे त्रस्त होती रहती है। ये वोट के चलते अपने देश को भी दांव पर लगा सकता है। इसका आवास संसद, विधानसभा और उनके पार्टी कार्यालय होते है। नेताओं के विचार से ओतप्रोत होकर, इनकी पत्नियां और इनके बेटे और बेटियां भी अनुप्राणित होती है, और देश की सामाजिक संरचना को चूहों और छुछुंदरों की तरह कुतरती रहती है। इनके जीवन का मुख्य उद्देश्य अपने देश की सम्मान को दूसरे देशों के आगे गिरवी रखना, अमरीका, स्विटजरलैंड, इटली तथा वेटिकन सिटी जैसे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के आगे ताता-थैया करना होता हैं और जो इनके खिलाफ बोल रहा होता हैं, उसे सांप्रदायिक और देशद्रोही करार देकर फांसी पर लटका देना ही मुख्य मकसद होता हैं। जो आंतकी इस देश के खिलाफ आग उगलते हैं, ये नेता उनकी आरती उतारनें में अपनी शान समझते हुए, अपने खानदानों और अपने दल के कार्यकर्ताओं को, उसके पक्ष में जय जयकार करने का नारा देने का प्रस्ताव भी रखता हैं।
अपने देश में फिलहाल ऐसे नेताओं की संख्या 90 से 95 प्रतिशत हैं। इन नेताओं के आगे पत्रकारों की टोली भी चल रही होती हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे जंगलों में शेरों के पीछे – पीछे सियारों और गीदड़ों की टोली चल रही होती हैं। जैसे शेर किसी का शिकार कर, अपना भोजन ग्रहण करने के बाद जूठन छोड़ देता हैं, फिर उस जूठन को सियार या गीदड़ खाते हैं, ठीक उसी प्रकार पत्रकारों का दल इन नेताओं के पीछे-पीछे चलकर खुद को अनुप्राणित कर रहा होता हैं। ऐसे दृश्य चुनावों के समय अथवा समय – समय पर बराबर दिखाई पड़ता हैं, पर किसी को इनके खिलाफ बोलने का अधिकार नहीं होता, क्योंकि इनके खिलाफ बोलने पर, इन नेताओं के द्वारा विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने का अधिकार भी मिला होता हैं, जिसका ये नेता बराबर सदुपयोग करता रहता हैं। अब तक लाखों – करोड़ों लोग, इन नेताओं के शिकार बन चुके हैं, और बनने को कुछ तैयार भी हैं, पर फिलहाल इस जानवर से बचने के लिए, न तो डाक्टरों ने किसी टीके का इजाद किया हैं और न ही आनेवाले समय में इनसे मुक्ति मिलने के आसार है।
नेताओं का पेट ----------------
नेताओं का पेट ही इनकी बड़ी विशेषता हैं – आप कोई भी गैरकानूनी काम करें, इसके पेट में आप मुंहमांगी रकम डाल दें, आप मुक्त हो जायेंगे। इनका पेट ऐसा हैं, कि कभी भी इनका भूख शांत नहीं होता, ये डाकघर की डाकपेटी के समान हैं, कि कभी भी इनका पेट भरता नहीं। आप लाख इन पर घोटालों का केस करे, भ्रष्टाचार का आरोप लगायें, इनका बाल बांका नहीं होता, थोड़ी दिन तक तो ये जेल जाता हैं, पर जल्द ही जेल से निकल कर शेखी बघारता हैं। उसका उदाहरण ये हैं कि आजादी के बाद से अब तक किसी नेता को सजा ही नहीं मिली, क्योंकि नेता कभी गलत हो ही नहीं सकता, क्योंकि वो नेता है।
आजादी से लेकर अब तक कई हास्य कवियों ने इन नेताओं पर चुटकियां ली, पर इन नेताओं पर, इसका असर नहीं दिखता, क्योंकि भगवान इन्हें फुर्सत के क्षण में विशेष रुप से बनाया होता हैं, इसलिए नेता को आप कुछ भी नाम दें, वो नेता ही रहता है। आजकल नेता बनने का दौर चल गया हैं, इसलिए इनकी जनसंख्या बढ़ रही हैं। हाल ही में हुए जनगणना के दौराऩ इनकी संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई हैं, इसलिए पार्टियों और नेताओं की संख्या भी बढ़ रही हैं, इन नेताओं पर परिवार नियोजन का भी असर नहीं पड़ रहा हैं, ताकि ये नियंत्रित हो सकें, लेकिन इन्हें नियंत्रित करने के लिए पूरे देश में एक नये तकनीक पर काम चल रहा हैं, जिस दिन वो तकनीक बन गयी, ये नेता भी नियंत्रित हो जायेंगे, ऐसा तकनीक बनाने में लगे, वैज्ञानिकों का दावा हैं।
वैज्ञानिकों का ये भी कहना हैं कि आगामी 2020 तक नेताओं को नियंत्रित करने के टीका का इजाद कर लिया जायेगा, तब तक आप नेताओं के जंगली व्यवहार का शिकार होने से बचने के लिए, खुद ठोस प्रयास करें, फिलहाल एड्स और कैंसर की तरह नेताओं के काट से बचने के लिए कोई दवा बाजार में उपलब्ध नहीं हैं।

निम्नलिखित प्रश्ऩों के उत्तर संक्षेप में दें ----------------------
क. नेता, मनुष्यों से कैसे अलग हो जाता है ?
ख. नेता वोट के चलते क्या – क्या कर सकता हैं ?
ग. नेताओँ के पेट की क्या विशेषताएं हैं ?
घ. वैज्ञानिकों ने क्या दावा किया हैं ?
ङ. पत्रकारों और नेताओं में क्या संबंध हैं, वो इन संबंधों को किस प्रकार निभा रहा होता हैं ?

Wednesday, June 29, 2011

काश! हमारे देश के नेता............

काश! हमारे देश के नेता गरीब होते,
वो दिन भर काम करने के बाद बीस रुपये कमा पाते,
उनके कम से कम एक बच्चे होते,
जिन्हें स्कूल भेजने का सपना होता,
वो कम से कम दिन में एक बार बाजार जाते,
बाजार जाकर, आटा, चावल, दाल और सब्जी लाते,
केवल आटा, चावल, दाल और सब्जी ही लाने में,
उनकी कमर टूट जाती,
तो फिर अखबारौं में हमें लगता हैं कि
आज जैसे विज्ञापन नहीं आते,
कि पाकिस्तान, नेपाल और बांगलादेश से भी कम रेट,
गैस सिलिंडरों के दाम भारत में हैं
मिट्टी तेल और डीजल के लिए आज भी अपनी सरकार सब्सिडी दे रही है,
कमाल ये भी हैं
कि भारत की जनता की कमाई अंकगणितीय ढंग से बढ़ती हैं
पर भारत के नेताओं की
कमाई ज्यामितीय प्रणाली सी बढ़ती हैं
एक नेता पांच साल में,
अपनी कमाई 200 से 1785 प्रतिशत तक बढ़ा लेता हैं,
पर हम आज तक ईमानदारी से,
दो जून रोटी भी ठीक से नहीं खा पाये,
ये कहते हैं कि अपने देश में लोकतंत्र हैं
पर ये लोकतंत्र सिर्फ,
इन्हीं के घरों में दिखता हैं,
इनकी बीवियां करोड़ों में नहाती हैं.
गरीबों की तो चिथड़ों में नजर आती हैं
पता नहीं बापू का लोकतंत्र कहां खो गया।
हम आज भी वहीं हैं,
नेता हमारा बहुत दूर निकल गया।
कोई ढूंढ कर ला दो,
मुझे वो गांधी,
जो लाठी लेकर चलता था,
चिथड़ों में दिखता था
अपना चेहरा उसमें नजर आता था,
हम खुश थे,
क्योंकि वो भी मेरे जैसा था,
पर आज तो अजब गजब हैं
जो नेता हैं,
खुद को गांधीवादी कहता हैं.
खूब टीप टॉप में रहता हैं
चम्मच कांटे से खाता हैं
पता नहीं क्या हैं य़े,
नेता का चक्कर की,
कुछ बनते ही,
बोलेरो से चलता हैं।
काश इस पर भी वे विज्ञापन लाते,
बताते कि उनके जीवन शैली का,
राज क्या हैं,
पर शायद ही ऐसा विज्ञापन दिखेगा,
ये नेता अपने ही लोगों को लहू पीयेगा,
झूठ बोलेगा,
अपने ही देशवासियों के धन से,
अपने परिवार को राजसुख देगा,
मरती रहे जनता अपनी बला से,
हम पैदा हुए हैं, राजभोगने को,
राज भोगेंगे।
दाम बढ़ायेंगे, महंगाई हमने थोड़ी बढाई
अमेरिकी ने कह दिया बढ़ा दी।
बाजार हमसे थोड़े ही नियंत्रित हैं,
इसका तो अंतर्राष्ट्रीय फंडा हैं,
केवल नामके हम मंत्री, प्रधानमंत्री हैं,
असली राजा तो विदेशों में बैठे हैं,
जिनके हम कठपुतली हैं।

Monday, November 29, 2010

स्थानांतरण एक एसपी का ......


जनता चाहती हैं, कि वो मेरे पास रहे, मेरे साथ रहे, मेरे हर दुख सुख में साथ दें, क्योंकि वो जब से आयी, तब से धनबाद में वो चीज थम गया, जिसके लिए धनबाद जाना जाता था। आखिर वो कौन हैं – जिसके बारे में धनबाद की जनता ने धनबाद बंद बुला दिया और यहीं नहीं सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने को तैयार हो गयी। स्पष्ट हैं – वो नाम हैं, धनबाद के वर्तमान एसपी सुमन गुप्ता का। वो हैं महिला, पर पुरुषार्थ इतना भरा कि उनके सामने पुरुष की पुरुषार्थ भी फेल। जब वो धनबाद की एसपी बनी थी, तब मैं उस वक्त ईटीवी धनबाद का प्रभारी था। मनौज कौशिक एसपी की विदाई हो गयी थी और सुमन गुप्ता प्रभार ले रही थी। व्यवसायी वर्ग रोज रोज की रंगदारी से तंग था, कोल माफियाओं की तूती बोल रही थी। नेताओं-माफियाओं-भ्रष्टाचार में लिप्त कुछ पुलिसकर्मी और पत्रकारों का गठजोड़ अपने रंग में था। ऐसे में इन पर नकेल कसना और धनबाद को रास्ते पर लाना कोई सामान्य काम नहीं था। ऐसे भी कहा जाता हैं कि जो भी आईपीएस झारखंड आता है, और उसे पैसे कमाने होते हैं तो वो एक बार धनबाद की पोस्टिंग चाहता हैं, इसके लिए वो सत्ता में बैठे नेताओं को मुंहमांगी रकम देने को भी तैयार होता है। यहीं नहीं जब पैसे के बल पर, वो एसपी धनबाद आ जाता हैं, तब अपने मनमुताबिक, वो थाना प्रभारियों को नियुक्त करता हैं, सस्पेंड करने का नाटक करता हैं और जम कर पैसे कमाता हैं। ऐसे एसपी को कुछ करने की भी जरुरत नहीं पड़ती, धनबाद हैं, इसलिए पैसे खुद ब खुद इनके पास पहुंच रहा होता हैं, पर इसके बदले में एक सामान्य जनता को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं। चाल धंसते हैं, सामान्य लोग मरते हैं, व्यवसायियों से रंगदारी मांगी जाती हैं, अपहरण उद्योग चलता हैं, रेलवे से लोहे और कोयले की चोरी नहीं, तस्करी होती हैं और अपना प्रांत व देश लूट रहा होता हैं। इधर, भ्रष्ट एसपी, आराम से सो रहा होता हैं, क्योंकि उसे सोने की कीमत हर महीने, कार्यालय, आवास अथवा मनमुताबिक जगहों पर पहुंचा दी जाती हैं।
सुमन गुप्ता, झारखंड का एक जाना पहचाना नाम हैं, इसलिए नहीं कि वो एसपी हैं, इसलिए कि वो अपने कामों से जनता का दिल जीती हैं, साथ ही दिल जीती हैं, उन पुलिसकर्मियों का जो ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ हैं, और उक्त जनता का, जिसे लटपट से कोई मतलब नहीं, सिर्फ उसे मतलब हैं कि चैन से जीने का। जब मैं ईटीवी धनबाद में था, तभी मैं समझ गया था कि इनकी नेताओं, माफियाओं, धनबाद में रह रहे कुछ भ्रष्टपुलिसकर्मियों और पीतपत्रकारिता में संलिप्त लोगों से नहीं बनेगी, और हुआ भी ऐसा ही। सुनियोजित साजिश के तहत शुरु से ही ऐसा ताना बाना बनाया जाने लगा, जैसे लगता हैं कि इनके आने से धनबाद में अमन चैन ही खत्म हो गया हो। और रही सही कसर निकाल दी, धनबाद में धीरेन्द्र प्रकरण ने, जो नेता ये मुद्दा उछाल रहे हैं, उन्हें धीरेन्द्र से कोई मतलब नहीं। मतलब हैं कि इसी की आड़ में, अपना उल्लू सीधा कर लें। यहीं नहीं रांची में बैठे सत्तासीन लोगों को भी पैसे की चाहत हैं, वे भी चाहते हैं कि धनबाद में अपने ऐसे लोगों को बिठा दें, जो आराम से उनके चौखट तक पैसे पहुंचा दे। ऐसे में जब तक धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता को नहीं हटायेंगे, तो फिर मनचाहा आदमी कैसे बैठेगा। इसलिए उन्होंने तरकीब निकाली कि क्यूं नहीं, विपक्ष के इस हंगामें को आधार बनाकर, अपना उल्लू सीधा कर लिया जाय। हमें याद हैं कि जिस दिन विधानसभा अपना स्थापना दिवस मना रहा था, उस दिन धनबाद के कई पुलिसकर्मियों और पत्रकारों के फोन हमारे पास आये, उनका एक ही प्रश्न था कि धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता का क्या हुआ। आज झाविमो विधायक समरेश सिंह और फूलचंद मंडल ने जो हंगामा किया, उसका कितना असर रहा। और जिस दिन आईपीएस अधिकारियों का तबादला हुआ, उसमें सभी समाचार पत्रों ने सुमन गुप्ता को ही प्रमुखता दे दी, जबकि तबादला सिर्फ सुमन गुप्ता का ही नहीं, औरों का भी हुआ था। ये बातें साबित करती हैं कि एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ महिला, कोलमाफियाओं, सत्ता में बैठे अथवा बाहर में रह रहे राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिसकर्मियों और पीत पत्रकारिता करनेवाले पत्रकारों को किस प्रकार खटक रही हैं।
मैं ये भी नहीं कहता कि सुमन गुप्ता हमेशा धनबाद में ही रहे, ऐसी महिला, हर जगह जानी चाहिए, जिससे एक नये समाज की रचना हो, पर उक्त महिला का स्थानांतरण भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, कोलमाफियाओं, भ्रष्टपुलिसकर्मियों और भ्रष्ट पत्रकारों को खुश करने के लिए हो, तो इससे ज्यादा शर्मनाक दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। धीरेन्द्र सिंह प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, और इसके दोषियों को दंड भी मिलना चाहिए, पर इस प्रकरण को बहाना बनाकर, बिना जनता को विश्वास में लिए, स्थानांतरण करना, सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़ें करता हैं? आखिर सरकार को सोचना चाहिए कि जो लोग रांची से धनबाद अथवा धनबाद से रांची तक ये मामला उठा रहे हैं, वे चाहते क्या हैं, उनका क्या स्वार्थ हैं, पर बिना इन सबकी जांच पड़ताल किये, स्थानांतरण कर देना, बहुत कुछ कह देता हैं। आखिर फुलचंद मंडल, ढुल्लू महतो और समरेश सिंह जैसे विधायक, धनबाद में क्या करते हैं, क्या चाहते हैं, क्या धनबाद की जनता नहीं जानती। कैसे पंचायत चुनाव के दौरान, अर्जुन मुंडा की सरकार ने आनन फानन में, सुमन गुप्ता का स्थानांतरण कर दिया, क्या इस सरकार के क्रियाकलापों को यहां की जनता नहीं जानती। सब जानती हैं, पर जनता करें क्या, यहां तो अंधेर नगरी, चौपट राजा, टके सेर भाजी और टके सेर खाजा वाली कहावत चरितार्थ हो रही हैं।