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Friday, April 21, 2017

लीजिये, अब दीजिये जवाब मुख्यमंत्री रघुवर दास जी.......

ये तो होना ही था, मुख्यमंत्री रघुवर दास के बयान ने बवाल कर दिया है। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के कई नेता ही नहीं, बल्कि भाजपा को सहयोग कर रही आजसू पार्टी ने भी मुख्यमंत्री रघुवर दास के उस बयान की कड़ी आलोचना की है, जिसमें उन्होंने नेता विरोधी दल को डकैत व लूटेरा बताया था, तथा शिबू सोरेन पर कड़ी टिप्पणी की थी।
झामुमो के वरिष्ठ नेता स्टीफन मरांडी ने ठीक ही कहा है कि अगर बाप बुड्ढा हो जाय तो क्या उसे गड्ढे में फेंक देना चाहिए, मुख्यमंत्री रघुवर दास जवाब दें।
झामुमो के ही वरिष्ठ नेता चंपई सोरेन ने भाजपा के नेताओं और विधायकों से पूछा है कि वे कब तक ऐसे मुख्यमंत्री रघुवर दास को ढोते रहेंगे, जो कभी अपने मतलब के लिए स्वयं को शिबू सोरेन का असली बेटा बताता है, कभी उनके पांव छूता है और कभी उन्हें उखाड़ फेंकने की बात कहता है।
झामुमो नेताओं ने यह भी कहा है कि अगर विधानसभा में सीएम ने इस वक्तव्य को लेकर माफी नहीं मांगी तो वे 27 को सदन चलने नहीं देंगे। इधर आजसू के प्रवक्ता देवशरण भगत ने तो मुख्यमंत्री रघुवर दास से ही पूछ डाला कि अगर हेमंत लूटेरे हैं तो सरकार उन पर कार्रवाई क्यों नहीं करती?
पूरे मामले पर सरकार की घिग्घी बंध गई है, भाजपा नेताओं को न बोलते बन रहा है और न ही सरकार में शामिल लोग ही कुछ बोल पा रहे है, सचमुच मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपनी ही भाषा से पार्टी और सरकार दोनों को असमंजस में डाल दिया है, आगे – आगे देखिये क्या होता है?  हमें नहीं लगता कि झामुमो इस मुद्दे को फिलहाल छोड़ना चाहेगा, वह भी तब, जब लिट्टीपाड़ा उप चुनाव में जनता ने ताल ठोक कर झामुमो प्रत्याशी साइमन मरांडी के सिर पर जीत का सेहरा बांधा है।
मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, हो गया बंटाधार, भाजपा और सरकार का। आप विकास का राग अलापते रहिये, आपने तो कार्यकर्ताओं को भी कहीं का नहीं छोड़ा, वे फिलहाल रक्षात्मक मोड में चले गये है, आक्रामक होंगे तो उन्हें ही दिक्कत होगी, क्योंकि रहना है उन्हें, उन्हीं के साथ, जिनके बारे में आप कुछ ज्यादा ही उतावले होकर बयान दे रहे हैं...

Saturday, February 11, 2017

लो कर लो बात, अब अपना रघुवर दारू बेचेगा.......

झारखण्ड के शराबियों के लिए खुशखबरी, 
अब उन्हें फिक्र करने की जरुरत नहीं, सरकार स्वयं शराब बेचेगी और झारखण्ड पुलिस शराब बेचवाने में मदद करेगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने मुख्यमंत्री रघुवर दास से सीख लेनी चाहिए। बिहार के मुख्यमंत्री है – नीतीश कुमार। उन्होंने 2016 में बिहार में शराबबंदी का ऐसा बीजारोपण किया कि पूरे देश में वे हीरो के रूप में उभरे। शराबबंदी के मुद्दे पर बिहार की महिलाएं तो उन्हें अपनी दुआओं से पाट दिया है। कुछ मामलों में तो, मैं नीतीश का घुर विरोधी हूं, पर शराबबंदी के मामले में, मैं नीतीश के साथ हूं। नीतीश की एक खासियत है कि वे राजनीति करना बहुत अच्छे ढंग से जानते है, तभी तो लालू और मोदी दोनों को समय-समय पर वे डोज देते रहते है। लालू की हिम्मत नहीं कि नीतीश से समर्थन वापस ले लें और मोदी की हिम्मत नहीं कि अब वे नीतीश को ठिकाने लगा दें... ऐसे भी 2016 में भारत में दो ही नेता कमाल दिखाये, एक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिन्होंने नोटबंदी कर देश को भ्रष्टाचारमुक्त करने का एक बड़ा फैसला लिया, जिसकी तारीफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी की, तो दूसरी ओर बिहार में शराबबंदी का ऐलान कर नीतीश कुमार ने बिहार को शराबमुक्त करने का जनोपयोगी फैसला लिया।
पर झारखण्ड को देखिये... यहां के मुख्यमंत्री को देखिये। हाल ही में कैबिनेट में जब शराब का मुद्दा उठा, तो जनाब रघुवर दास ने कहा कि राज्य में शराब सरकार बेचेगी। लीजिये फिर क्या था, रघुवर दास की यह सोच राज्य में चर्चा का विषय बन गया। हम अच्छी तरह से जानते है कि राज्य की कोई भी सरकार, अगर शराबबंदी का ऐलान करती है, तो शायद ही कोई दल होगा, जो इस फैसले का समर्थन नहीं करेगा। झामुमो तो इस मुददे पर सबसे पहले समर्थन करेगी, क्योंकि मैं शिबू सोरेन को अच्छी तरह जानता हूं कि वे शराबबंदी पर क्या सोचते है... स्वयं रघुवर मंत्रिमंडल में शामिल कई मंत्री ऐसे है, जो इस मुददे पर रघुवर दास के इस सोच का विरोध कर रहे है, जैसे राज्य के नगर विकास मंत्री सी पी सिंह ने साफ कह दिया कि सरकार शराब बेचे, ठीक नहीं है, राज्य में शराबबंदी लागू क्यों नहीं कर देते... राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय तो इस मुद्दे पर एक कदम और आगे बढ़ जाते है और कहते है कि शराबबंदी ही क्यों? पूर्णतः नशाबंदी पर सरकार अमल करें... पर हमारे मुख्यमंत्री तो ऐसे है, जिनकी सोच को कोई चुनौती दे ही नहीं सकता, क्योंकि वे इस मंत्र पर विश्वास रखते है कि एकोअहम् द्वितियो नास्ति।
इधर मुख्यमंत्री रघुवर दास से हरी झंडी मिली और लीजिये मुख्य सचिव ने भी इस पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। मुख्य सचिव ने अधिकारयों को खुदरा शराब दुकान तलाशने का निर्देश दे दिया। उत्पाद अधिकारियों के अलावा इस काम में अंचलाधिकारियों और थाना प्रभारियों की मदद भी ली जा रही है। राज्य सरकार के इस फैसले को जमीन पर उतारने के लिए, इससे संबंधित निर्देश पत्र को सभी जिलों को भेजा जा चुका है और इस संबंध में तीन दिनों में रिपोर्ट भी मांगी गयी है, यानी इस मुद्दे पर युद्धस्तर पर काम शुरू हो गया। निर्देश यह भी है कि अधिकारी पूर्व में चल रहे शराब दुकानों के मालिकों से संपर्क स्थापित करें और उन्हें अपनी दुकान किराये पर देने के लिए लिखित सहमति लें। अब जरा सोचिये, कितना अच्छा लगेगा कि जब अधिकारी शराब बेंचेंगे, पुलिस उनकी मदद करेंगी तो राज्य में कितना सुंदर माहौल बनेगा। शराबियों का दल, मुख्यमंत्री रघुवर दास के इस सोच पर अभी से ही बलिहारी है, और रघुवर दास की इस दूरगामी सोच की जय-जयकार करने में अभी से ही लग गये है...
बदलता झारखण्ड
विकास की ओर उन्मुख झारखण्ड

Friday, June 17, 2016

जैसा नजरिया, वैसा विकास...

मैं यादव हूं...मुझे लालू-मुलायम में विकास दीखता है...
मैं कुर्मी हूं, मुझे नीतीश में विकास दीखता हैं...
मैं वामपंथी हूं हरदम सीमा पर चीन लतियाता हैं मुझे, फिर भी चीन की स्तुति करने और उसके यहां की बनी सामान खरीदने में मुझे विकास दीखता है...
मैं वामपंथी हूं सिंगूर और नंदीग्राम और फिलहाल कन्नूर में दर्जनों निहत्थे को मौत के घाट उतार देता हूं, उसमें विकास दीखता हैं...
पर और कहीं भी विकास नहीं दीखता...
क्या करुं आदत से लाचार हूं...
हमारे पूर्वज अंग्रेजों के जूते और मुगलों के जूते खाते रहे हैं, इसलिए हमें भी आजकल उनके जूते खाने के लिए बदन कुलकुलाता है इसलिए विकास दीखेगा कैसे...
मैं आज भी जहां हूं चूहों की तरह भारत को कुतर रहा हूं...
विकास दीखेगा कैसे...
विकास तो लालू जी ने दिया कभी अपने जोरु को सीएम बनाकर तो कभी अपने बेटे को डिप्टी सीएम बनाकर, कभी अपनी बेटी को राज्यसभा में पहुंचाकर...
विकास तो हमारे झामुमो नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने किया,अपनी आदत के अनुसार सबसे छोटे बेटे को भी नेतागिरी की जन्मघूंटी पिलाकर राज्यसभा बेचने की युगत लगा दी...
विकास तो सोनिया ने किया है, जो अपने बेटे राहुल, दामाद राबर्ट और बेटी प्रियंका से आगे सोच ही नहीं रही...
विकास तो मुलायम ने किया, जिसने अपने पूरे खानदान को लोकसभा, राज्यसभा विधानसभा और पूरे यूपी में अपनी जाति के लोगों को हर जगह भर कर रख दिया...
विकास तो नीतीश ने किया, नीतीशभक्ति में लीन एक पत्रकार को राज्यसभा में पहुंचाकर...
विकास तो वृंदा और प्रकाश करायेंगे जिन्होंने कई वर्षों तक बंगाल को ऐसा रौंदा कि पिछले पांच वर्षों से बंगाल की जनता इनकी पार्टी को लतिया रही है, पर शर्म नहीं आ रहा...
विकास तो अरविन्द केजरीवाल करायेंगे, जो हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ ही बोला करते थे और आज जिनके 21 विधायक भ्रष्टाचार का रिकार्ड तोड़ते हुए हुतूतू कर रहे है,
भाई बुरा मत मानियेगा हम भी आपके साथ हैं, जब हल्ला करियेगा कि विकास नहीं हो रहा तो हम भी आपके साथ सुर में सुर मिलायेंगे, और जैसा आपका झंडा होगा, थाम लेंगे, फिलहाल अभी आप हमारा लाल, पीला, हरा और भैस के रंगवाला काला सलाम भी स्वीकार करिये...

Saturday, March 12, 2016

वो तीर-धनुष उठायेंगे और हम घर छोड़कर भाग खड़े होंगे............

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के बड़बोले नेता हेमंत सोरेन पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमो राज ठाकरे का गहरा प्रभाव है, जैसे राज ठाकरे समय – समय पर गैर मराठियों को उनकी औकात बताने के लिए नाना प्रकार के चिरकूटई टाइप के बयान देते रहते है, जिनके बयान आते ही, मनसे कार्यकर्ता गैर-मराठियों के खिलाफ मार-धाड़ करने के लिए निकल पड़ते है, ठीक उसी प्रकार हेमंत का बयान आज रांची से निकलनेवाले कमोवेश सभी अखबारों में पढ़ने को मिले। चूंकि हमारे देश के चिरकूट टाइप के बहुत सारे नेताओं को ये गलतफहमी हो गयी है, कि इस प्रकार के बयान देने से लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी हो जाती है, इसलिए वे इस प्रकार का बयान देते रहते है।
अपने डेढ़ साल के मुख्यमंत्रित्व काल में हेमंत सोरेन ने इस प्रकार का बयान देने से खुद को बचा रखा था, शायद इस दौरान उन्हें दिव्य ज्ञान हासिल हो गया था कि मुख्यमंत्री पद पर रहकर ऐसा बयान नहीं दिया जाता। पर आज क्या हो गया...। हम आपको बता दें कि हेमंत को दिमाग देनेवाले बहुत सारे ऐसे लोग है, जिन्हें राजनीति की एबीसीडी नहीं आती...पर वो कहते है न, कभी – कभी मूर्खों और गधों की बातें भी दैवकृपा से सिद्ध हो जाती है...जिस के प्रभाव में आकर नेताओं का एक वर्ग, उन गधों और मूर्खों को दिव्य पुरुष मानकर, उसकी हर बातें इस प्रकार स्वीकार करता है, जैसे लगता है कि भगवान के श्रीमुख से निकली वाणी हो...
हेमंत को मालूम होना चाहिए कि इस प्रकार का बयान उनके भविष्य की राजनीति पर सदा के लिए प्रश्न चिह्न लगा देगा...हेमंत को जो लोग ओवैसी या राज ठाकरे बनने की सलाह दे रहे है...उन्हें नहीं पता कि वे आग से खेल रहे हैं...क्योंकि ये घटियास्तर की सलाह और चिरकूटई टाइप का बयान झारखण्ड को कहीं का नहीं छोड़ेगा...
झारखण्ड के लिए खुशी की बात है, कि इन दिनों पूरे देश में झारखण्ड की एक बेहतर तस्वीर गयी है...और ये झामुमो या हेमंत के चलते नहीं गयी...ये गयी है दीपिका और धौनी जैसे खिलाड़ियों की वजह से...अंशुता और सुमराई जैसे खिलाड़ियों की वजह से...। इनकी पार्टी ने तो झारखण्ड की वो दुर्गति कराई है कि सारा देश जानता है...। शायद हेमंत को पता नहीं कि झारखण्ड की जनता अभी तक भूली नहीं है कि इनकी पार्टी के नेताओं ने किस प्रकार रिश्वत लेकर नरसिंहा राव की सरकार बचाई थी...। जनता ये भी नहीं भूली है कि किस – किस को उनके लोगों ने पैसे लेकर राज्यसभा में पहुंचाया और बाद में वहीं व्यक्ति इनकी पार्टी और झारखण्ड को ठेंगा दिखाया...यानी ये तो वहीं बात हुई जो झारखण्ड को लूटवाया वो खुद को झारखण्ड का हितैषी बता रहा है...ये व्यक्ति जब सरकार में था, सत्ता में था तो डोमिसाइल समस्या हल नहीं किया...डोमिसाइल की फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और जैसे ही भाजपा की सत्ता आयी, इसे डोमिसाइल पर प्रवचन करने की बात याद आ गयी...पता नहीं कैसे – कैसे नेता झारखण्ड में आ गये है जो अपनी ही माटी के दुश्मन बन गये....इनकी हरकत देख कर कौए और गीध तक शरमा जाय...।

Monday, July 1, 2013

झारखंड की जनता की छाती पर मूंग दलने को मचलते झामुमो और कांग्रेस के पत्नीभक्त नेता...................................

झारखंड के कांग्रेस-झामुमो से जूड़े नेताओं-विधायकों की पत्नियां, बेटे-बेटियां, दामाद और उनके लटके - झटके दुखी है। जब से भाजपा-झामुमो-आजसू की खिचड़ी सरकार झारखंड में गिरी, तब से इनके हाल बेहाल हैं, क्योंकि इनके नेता बार-बार कहा करते थे, कि झामुमो आज भाजपा से नाता तोड़े और लीजिये कल झामुमो और कांग्रेस की सरकार बन कर तैयार, पर ये क्या राष्ट्रपति शासन के छह महीने बीतने को आये पर अभी तक झामुमो-कांग्रेस की राज्य में सरकार नहीं बनी। बेचारे हेमंत के हाड़ में हल्दी नहीं लगी, बेचारे मुख्यमंत्री नहीं बने, क्योंकि उनकी दिली तमन्ना हैं कि एक - दो महीने के लिए ही सही कम से कम मुख्यमंत्री की सूची में उऩका नाम तो अब लिख ही दिया जाना चाहिए, पर सफलता नही मिल रही, लेकिन कांग्रेस के पूर्व झारखंड प्रभारी शकील अहमद ने उनके अरमानों पर बड़ा ध्यान दिया और उनकी बाते अपने अन्नदाता राहुल तक पहुंचा दी, साथ ही ये भी बता दिया कि गर कांग्रेस ने हेमंत के हाड़ में हल्दी लगवा दी तो देर सबेर इसका फायदा कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव में अवश्य मिलेगा। जैसे ही शकील के सरकार बनाने की हवा देने के बाद कांग्रेस - झामुमो के नेताओँ व विधायकों को मिली, बेचारे खुशी से पगला गये। इनकी पत्नियां, बेटे-बेटियां-दामाद खुशी से पागल हो गये। फिर सरकार बनेगी, दोनों हाथों में लड्डू होंगे, जैसे पूर्व की सरकार में शामिल मंत्रियों, विधायकों की पत्नियां, बेटे-बेटियां और दामाद विदेश यात्रा का आनन्द लेते थे, अब वे भी 18 महीनों में सारा कसर निकाल लेंगे। उन्होंने कोई पाप किया हैं क्या। उन्हें भी विदेश यात्रा और दुनिया का सारा सुख लेने का अधिकार हैं, जनता ने उन्हें मौका दिया हैं, इसका फायदा क्यों न उठाये। और लीजिये इन्हीं सारी तिकड़मों के लिए सरकार बनाने का दौर चलना शुरु हो गया हैं। हां एक बात और हम तो ये लिखना भी भूल रहे हैं, पर अब याद आ गया हैं, लिख देता हूं। यहां का मीडिया जगत भी चाहता हैं कि राष्ट्रपति शासन के बजाय जनता के प्रतिनिधियों का शासन हो, क्योंकि वो जानता हैं कि यहां के जनप्रतिनिधियों को अपनी अंगूलियों पर नचाकर, यहां के प्रशासनिक अधिकारियों से अपने हित में वो काम कराया जा सकता हैं, जो फिलहाल राष्ट्रपति शासन में होता नहीं दीखता, चाहे वो विज्ञापन से संबंधित ही मामला क्यूं न हो। राष्ट्रपति शासन में विज्ञापन मीडिया को उतने नहीं मिलते, जितना की अर्जुन मुंडा के शासनकाल मे अथवा कांग्रेस -झामुमो के शासनकाल में संभव है, और गर किसी कारण से विज्ञापन नहीं मिला तो फिर अपना ब्लैकमेलिंग का धंधा हैं ही। इसलिए यहां का मीडिया जगत भी दिलोजां से चाहता हैं कि यहां सरकार बने, चाहे वो पांच दिन के लिए ही क्यूं न हो।
इस सरकार बनाने में, जनहित और राज्यहित की बात खूब हो रही हैं, पर जरा सोचिये ये जनहित और राज्यहित की बात करनेवालों का चरित्र क्या हैं। सबसे पहले बात कांग्रेस की - यहां काँग्रेस के नेता राजेन्द्र प्रसाद सिंह हैं जो अर्जुन मुंडा के शासन काल में नेता प्रतिपक्ष थे। इनके गुट ने बी के हरिप्रसाद, प्रभारी, झारखंड कांग्रेस के रांची आगमन पर क्या गुंडागर्दी दिखायी ये बताने की जरुरत नहीं। इन्हीं के बेटे हैं - अनूप सिंह जो प्रदेश में एक बड़े पद पर हैं और अपने ही विधायक मन्नान मल्लिक को वो सबक सिखाया कि पूछिये मत। आज भी रांची कोतवाली थाना में इनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हैं, जरा सोचिये ऐसे ऐसे लोग सत्ता में होंगे तो राज्य और जनता का कितना हित होगा। अब जरा झामुमो की बात कर ले। इनके सुप्रीमो है- दिशोम गुरु शिबू सोरेन। ये हमेशा गर्त में जा रहे कांग्रेस को संभालते हैं। पहली बार रिश्वत लेकर नरसिंहा राव की सरकार बचानेवाले शिबू सोरेन की महिमा निराली हैं। इन्हीं की बहू सीता सोरेन हैं, जो सीबीआई के शिकंजे में हैं, जिन्होंने वोट बेचने की अपनी पार्टी की परंपरा का खूब निर्वहण किया और उन पैसों से क्या किया। झारखंड की जनता को मालूम हैं। ऐसे तो इनके सारे विधायक वोट बेचने की परंपरा में पीएचडी हासिल कर ली हैं। इसी पार्टी की कृपा से कई राज्यसभा के सांसद बन गये और कई झारखंड को चारागाह समझ कर यदा कदा झारखंड का परिभ्रमण करते रहते हैं। 
सवाल उठता हैं कि जिस प्रांत के नेताओं का चरित्र इस प्रकार का हो। वहां सरकार बने अथवा न बने क्या फर्क पड़ता हैं। आखिर जनहित और राजहित में सरकार बनाने की बात करनेवाले ये जनता को इतना बेवकूफ क्यों समझते हैं, कि जैसे जनता जानती ही नहीं। अरे जनता यहां की सब जानती हैं तभी तो ऐसे लोगों को अपना नेता चूनती हैं ताकि वो विधानसभा पहुंचकर उनकी छाती पर मूंग दल सकें, और इधर कई महीनों से जनता की छाती पर मूंग नहीं दली गयी, इससे जनता भी परेशान हैं। भला एक व्यक्ति को जनता की छाती पर मूंग दलने का अधिकार जनता ने तो नहीं दिया, इसलिए यहां के सभी विधायकों और मंत्रियों को अधिकार हैं कि वे झारखंड की जनता के छाती पर मूंग दलकर, अपनी पत्नियों, बेटे-बेटियों और दामाद-बहूंओं के लिए सात पुश्तों तक पूंजी जमा कर लें, ताकि इनके मरने के बाद, इनकी आत्मा को कोई मलाल न हो, कि वे झारखंड में जन्म लिये पर झारखंड को मुहम्मद गोरी और गजनी की तरह लूट न सके।

Monday, June 14, 2010

ओछी राजनीति

विद्रोही
नोज कुमार की फिल्म – बेईमान
उसमें एक गाना था –
ना इज्जत की चिंता, न फिक्र कोई अपमान की, जय बोलो बेईमान की, जय बोलो..............................
ठीक इसी गाने के आधार पर झारखंड के नेता, अपने कुकृत्यों को, अंजाम दे रहे हैं, और ताल ठोक कर झारखंड के दामन को दागदार बना रहे हैं।
भारतीय साहित्यों में कहा गया हैं कि सज्जनों के लक्षण ये हैं कि वे मन, वचन और कर्म इन तीनों से एक होते हैं, पर दुर्जन ठीक इसके विपरीत, यानी मन, वचन और कर्म। इन तीनों से अलग-अलग।
ऐसे में यहां की जनता खुद विचार कर लें कि जिसे वे मत देकर जीताते हैं, जिसे गुरुजी कहते नहीं थकते, उनके चरित्र क्या हैं। वे सज्जन हैं या दुर्जन।
राज्यसभा के चुनाव की चर्चा छोड़ दें तो सबसे पहले शिबू सोरेन के भाषणों पर ध्यान दें।
. नक्सली हमारे भाई बंधु हैं, पर विधानसभा में लिखित तौर पर उन्हें राष्ट्रद्रोही कहने से नहीं चूकते।
. विधानसभा चुनाव के पहले कहा करते थे कि पूरा प्रदेश अकाल से जूझ रहा हैं, वे गर सत्ता में आये, तो वे पूरे प्रदेश को अकाल क्षेत्र घोषित करेंगे, पर पांच महीने के शासन में क्या किया, सभी जानते हैं।
. संसद में महंगाई पर कट मोशन होता हैं, प्रदेश में ये भाजपा के साथ होते हैं, पर संसद में कांग्रेस के पक्ष में वोट करते हैं, बाद में नितिन गडकरी के घर जाकर इस घटना के लिए माफी मांगते हैं कहते हैं कि गलती से ऐसा हो गया, मुझे माफ कर दिया जाये, पर दो महीने भी नहीं बीतते, पत्रकारों के समक्ष ये बयान देते हैं कि उन्होंने ये तो जानबूझ कर किया था, कोई गलती में कटमोशन के दौरान कांग्रेस के पक्ष में वोट नहीं बल्कि पूरे होशहवाश में वोट दिया।
. याद करिये बिहार जहां याज्ञवलक्य, मंडन मिश्र, गौतम बुद्ध, अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, राजेन्द्र बाबू, जय प्रकाश नारायण जैसे महानायकों ने जन्म लिया, वहां लालू प्रसाद जैसे लोगों ने भी जन्म लिया और अपने पन्द्रह वर्षों के शासनकाल में बिहार को कहां लाकर खड़ा कर दिया, बिहार की जनता भूली नहीं हैं, ठीक जिस झारखंड में बिरसामुंडा, सिद्धुकान्हु जैसे वीरों ने जन्म लिया, वहां आज शिबू जैसे लोग भी हैं, जिन्हे झारखंड के आंदोलनकारी होने का सौभाग्य भी मिला हैं, पर सच्चाई ये भी हैं कि इस आंदोलनकारी ने जैसा झारखंड का अहित किया, झारखंड का सम्मान गिरवी रखा, आजतक वैसा किसी ने नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में जब झारखंड का निर्माण हो रहा था तो मुख्यमंत्री बनने के लिए किस प्रकार ये भाजपा नेताओं का गणेश परिक्रमा कर रहे थे, ये किसी से छुपा नहीं हैं। नरसिंहाराव सरकार को बचाने के लिए इनके और इनके पार्टी के नेताओं का कृत्य जगजाहिर हैं। कितना इनका गुणगान करु, इस बार के पांच महीने के शासनकाल में अंतिम डेढ़ महीनों में अपना और झारखंड का केवल बयानबाजी को लेकर कितना बंटाधार किया हैं, वो किसी से छुपा नहीं और ले देकर, अब के डी सिंह को टिकट देने के प्रकरण ने, बची खुची सारी असर ही निकाल दी हैं।
शिबू को अपनी पार्टी के नाम पर पुनर्विचार करनी चाहिए, क्योंकि झारखंड अब बन चुका हैं, ये विकास करते नहीं, इसलिए इनकी पार्टी का बेहतर नाम झारखंड मुद्रामोचन मोर्चा हो जाना चाहिए ताकि देश के पूंजीपतियों और केवल धन के लिए ही जीनेवाले पूंजीपतियों को दूसरे पार्टी के पास जाने की जरुरत ही न पड़े, सीधे इन्हीं से संपर्क करें।
हमें तो संदेह होता हैं शिबू की आज की हरकतों को देखकर कि क्या ऐसा व्यक्ति झारखंड का आंदोलनकारी हो सकता हैं, क्योंकि जो अपने लोगों का दर्द देखेगा, क्या वो ऐसी हरकत करेगा।
क्या झारखंड में अच्छे लोगों की कमी हो गयी हैं, क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा में कार्यकर्ताओं और नेताओं का अभाव हो गया, कि झारखंड में अब नेता ही नहीं रहे, जो दूसरे प्रदेशों से नेताओँ का आयात करा रहे हैं। कम से कम शर्म तो आनी चाहिए, गर शर्म नहीं तो जनता के बीच जाये और पूछे कि वे जो कर रहे हैं, उस कुकृत्य से उन्हें कितना दुख हो रहा हैं, पर ये ऐसा करेंगे, हमें नहीं लगता।
अब कांग्रेस की बात, कांग्रेस भी बतायें कि वो कौन पूंजीपति था, जिसे महाराष्ट्र से बुलाकर यहां राज्यसभा का चुनाव लड़ने के लिए प्लानिंग की जा रही थी, कौन उस पूंजीपति को रांची बुलाया था, पर कांग्रेस भी ऐसे लोगों का पर्दाफाश करेगी और पार्टी से निकालेगी, इसकी संभावना कम दिखती हैं।
अरे नेताओं क्या आपने ये नहीं पढ़ा कि ------------
अधमा: धनम् इच्छन्ति
धनम् मानम् च मध्यमा:।
उतमा: मानम् इच्छन्ति
मानो हि महतां धनम्।।

अर्थात जो दूष्ट हैं वो सिर्फ धन चाहता हैं, जो मध्यमवर्गीय लोग हैं उन्हें धन और मान दोनों की जरुरत हैं, पर जो उच्च कोटि के लोग हैं, उन्हें धन नहीं, सिर्फ सम्मान की आवश्यकता हैं, क्योंकि उनके लिए मान ही सबसे बड़ा और सर्वश्रेष्ठ धन हैं।
पर ये बात झारखंड के बिकाउ विधायकों को समझ में आये तब न।