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Friday, August 5, 2016

ले लोट्टा...................

ले लोट्टा, इ त नीतीशवा के दारू कानून के हव्वे निकल गइल भइया...
अरे जादा दिन के बात नइखे, बिहार विधानमंडल में हमार बबुआ नीतीश दारू कानून पेश कइले...
उनकर बुतरूवन बिधयकवन सब खूब दांत निपोरत रहे...
उनकर लटकन पत्तरकार लोग तो झूम झूम के नीतीशायन गावत रहे...
ताड़ी पिये के रिकार्ड तोड़ले लालू भगवान तो नीतीशवा के अपन भक्त बना दिहले,
और कहिले कि कोई यादव और कुरमी भाई अब दारू ना पीहे...
और जो दारू पीहे, तो जइहे काम से...
लेकिन इ का होयल भइया
न दारू कानून पास होते देरी
आउर न उ कानून में छेद होते देरी...
आजे एगो अखबार पटना डेडलाइन से समाचार छपले बा...
समाचार के शीर्षक बा...
पकड़े गये व्यापारियों के ब्लड सैंपल में अल्कोहल नहीं मिला...
इ समाचार में लिखल बा कि
बिहार में शराबबंदी के बाद पटना पुलिस ने होटल पनास से सात व्यापारियों को शराब पीने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा था। फांरेसिक साइंस लेबोरेट्री ने सभी व्यापारियों को क्लीन चीट दे दी।
वाह रे भाई, वाह...
एकरा कहल जाला, कानून तू केतनो बना ल, चलइहे धरती लोक के प्राणिये न...

आउर इ धरतीलोक के प्राणी केतना महान, केतना चरित्रवान होखेला
उ तो लालू भगवान और उनकर बड़ भगत बबुआ नीतीश से ज्यादा कौन जनिहे...
अरे जो दल बदल में माहिर ह,
अरे जो पशु चारा खाए में माहिर ह
और जो काल्हे पशु चारा खाएवाला घोटालेबाज कह कह के, अपना चेहरा चमकवले
और फिर जाके बाद में, ओकरे गोदी में बैठके
आपन दाढ़ी टोवे लगले
उ केतनो कानून बना दी
ओकरा से का होई
हाल ही में एगो केजरिया, खूब ईमानदारी के ढोल पीटले
और आज ओकर सारा ईमानदारी, एक-एक कर काठ के कड़ाही जइसन भो - काटा हो जाता
तो समझ जाइ, कि नीतीशवा के इ दारू कानून के का होई
आज ओकर पहला अध्याय, सामने दिखाई पड़ गइल...
मजा ली बबुआ नीतीश के दारू कानून के...
बबुआ नीतीश के कोई नजर ना लगावे भाई
बड़ काम के हमर बबुआ नीतीश बाड़े...

Friday, June 17, 2016

जैसा नजरिया, वैसा विकास...

मैं यादव हूं...मुझे लालू-मुलायम में विकास दीखता है...
मैं कुर्मी हूं, मुझे नीतीश में विकास दीखता हैं...
मैं वामपंथी हूं हरदम सीमा पर चीन लतियाता हैं मुझे, फिर भी चीन की स्तुति करने और उसके यहां की बनी सामान खरीदने में मुझे विकास दीखता है...
मैं वामपंथी हूं सिंगूर और नंदीग्राम और फिलहाल कन्नूर में दर्जनों निहत्थे को मौत के घाट उतार देता हूं, उसमें विकास दीखता हैं...
पर और कहीं भी विकास नहीं दीखता...
क्या करुं आदत से लाचार हूं...
हमारे पूर्वज अंग्रेजों के जूते और मुगलों के जूते खाते रहे हैं, इसलिए हमें भी आजकल उनके जूते खाने के लिए बदन कुलकुलाता है इसलिए विकास दीखेगा कैसे...
मैं आज भी जहां हूं चूहों की तरह भारत को कुतर रहा हूं...
विकास दीखेगा कैसे...
विकास तो लालू जी ने दिया कभी अपने जोरु को सीएम बनाकर तो कभी अपने बेटे को डिप्टी सीएम बनाकर, कभी अपनी बेटी को राज्यसभा में पहुंचाकर...
विकास तो हमारे झामुमो नेता दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने किया,अपनी आदत के अनुसार सबसे छोटे बेटे को भी नेतागिरी की जन्मघूंटी पिलाकर राज्यसभा बेचने की युगत लगा दी...
विकास तो सोनिया ने किया है, जो अपने बेटे राहुल, दामाद राबर्ट और बेटी प्रियंका से आगे सोच ही नहीं रही...
विकास तो मुलायम ने किया, जिसने अपने पूरे खानदान को लोकसभा, राज्यसभा विधानसभा और पूरे यूपी में अपनी जाति के लोगों को हर जगह भर कर रख दिया...
विकास तो नीतीश ने किया, नीतीशभक्ति में लीन एक पत्रकार को राज्यसभा में पहुंचाकर...
विकास तो वृंदा और प्रकाश करायेंगे जिन्होंने कई वर्षों तक बंगाल को ऐसा रौंदा कि पिछले पांच वर्षों से बंगाल की जनता इनकी पार्टी को लतिया रही है, पर शर्म नहीं आ रहा...
विकास तो अरविन्द केजरीवाल करायेंगे, जो हमेशा भ्रष्टाचार के खिलाफ ही बोला करते थे और आज जिनके 21 विधायक भ्रष्टाचार का रिकार्ड तोड़ते हुए हुतूतू कर रहे है,
भाई बुरा मत मानियेगा हम भी आपके साथ हैं, जब हल्ला करियेगा कि विकास नहीं हो रहा तो हम भी आपके साथ सुर में सुर मिलायेंगे, और जैसा आपका झंडा होगा, थाम लेंगे, फिलहाल अभी आप हमारा लाल, पीला, हरा और भैस के रंगवाला काला सलाम भी स्वीकार करिये...

Wednesday, December 2, 2015

अरे वाह नीतीश भाई......

अरे वाह नीतीश भाई...
बहुत बढ़िया सरकार चला रहे है...
इसी तरह आप सरकार चलाते रहे, तो बिहार सचमुच बहुत आगे निकल जायेगा...
कल पता चला कि आपको सहयोग दे रहा, आपका बड़ा भाई लालू प्रसाद अपनी पत्नी रावड़ी देवी को विधानमंडल दल का नेता बना दिया है और अपने दोनों बेटों को तो पहले ही मंत्रियों की श्रेणी में लाकर खड़ा दिया, जिसकी अवहेलना करने की आप में ताकत ही नहीं थी...
आज पता चला कि अभी तो आपकी सरकार बने दो हफ्ते भी नहीं हुए और अपराधियों ने अब तक पूरे बिहार में आधे दर्जन बैंक लूट लिए...
कल कटिहार में बंगाल से आये एक मक्का व्यापारी को लूट लिया...
शायद ये लूट का क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक आपके जीते हुए विधायक और मंत्रियों का समूह सामाजिक न्याय नहीं ला देता और इसके तहत अपनी गरीबी नहीं समाप्त कर लेता...
यहीं नहीं अपराधियों ने तो जमुई से भगवान महावीर की अतिप्राचीन और बेशकीमती मूर्ति भी लूट ली...
और
बधाई इसके लिए भी आपके एक विधायक के समर्थकों ने तो भागलपुर के जिला मुख्यालय में तैनात डीएसपी को ही गंगा में फेंक देने की कोशिश की
और राजद के एक विधायक ने तो एक पुलिसकर्मी को ही ठिकाने लगाने की बात कर दी...
बस अब क्या...
सामाजिक न्याय आ गया...
प्रभात खबर के प्रधान संपादक और जदयू के सांसद हरिवंश का सपना साकार हो गया...

Saturday, November 14, 2015

बाबा रामदेव का टूटता तिलिस्म............

योगगुरु के नाम से विख्यात, बाबा रामदेव आज देश के सुप्रसिद्ध उद्योगपतियों में से एक है...। अरबों के व्यवसाय, पूरे विश्व में चल रहे उनके दवा व खाद्यान्नों के व्यापार ने विश्व के बाजारों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है...यहीं नहीं बाबा रामदेव जो कल तक योग के ब्रांड थे, आज अपने प्रतिष्ठान से उत्पादित वस्तुओं का स्वयं को ही ब्रांड के रुप में प्रस्तुत कर विज्ञापन करते हुए भी नजर आ रहे है...आज इनके पास पैसों की कमी नहीं, पैसे इनके आगे – पीछे नाचती है...।
कल तक कांग्रेस के आंखों में खटकनेवाले बाबा, आज भी कांग्रेस के आंखों में बुरी तरह खटकते है...। कांग्रेस व कांग्रेस के लोग तो इन्हें फूंटी आंख नहीं समाते और न रामदेव व रामदेव के लोगों को कांग्रेस व कांग्रेस के लोग फूंटी आंख समाते है...। दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी है। बस मौका मिलना चाहिए, दोनों एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी में एक दूसरे से बीस निकलने की कोशिश में लग जाते है। रामदेव की जितनी कांग्रेस से खुन्नस है, ठीक उसके उलट भाजपा से प्रेम...। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कट्टर प्रशसंक बाबा भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं में खासा लोकप्रिय है। कमाल यह भी है कि बाबा यादव समुदाय से आते है, ज्यादातर यादव खासकर बिहार व उत्तरप्रदेश में भाजपा को पसंद नहीं करते, वे तो लालू और मुलायम को ही अपना सब कुछ मानते है, पर रामदेव का यादव होकर भी लालू व मुलायम को रास नहीं आना ज्यादातर लोगों के समझ से परे है...
हाल ही में रांची के किशोरी चौक पर एक बैनर देखा, जिसमें यादव महासभा ने रामदेव को यादव समुदाय का बताते हुए, गौरवान्वित महसूस किया था, जबकि अपने देश में कोई भी संत चाहे उसकी जाति जन्म से कुछ भी हो, वह सर्वग्राह्य बन जाता है, क्योंकि उसका जीवन सब के लिए हो जाता है, ठीक जैसे गंगा किसी से भेदभाव नहीं करती, उसी प्रकार संत किसी से भेदभाव नहीं करते...। पर रामदेव संत हैं या यादव या उदयोगपति, इसको लेकर अब चर्चा चल पड़ी है। इतिहास खंगाले तो पता चलेगा कि देश में आज तक किसी संत ने दुकान नहीं खोली, न व्यवसाय का पल्लू पकड़कर, विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाते हुए राजनीति में दखलंदाजी की। हां, इतना जरुर किया कि जो उनके पुश्तैनी कार्य थे, उस पुश्तैनी कार्य में लगते हुए, भगवान को प्राप्त करने के मार्ग को चुन लिया। राजनीति में दक्ष और भारत स्वामिमान ट्रस्ट बनाकर, अपने चहेतों में लोकप्रिय रामदेव को शायद मालूम नहीं कि जब अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास को अपने राजमहल में बुलाने की जुर्रत की, तब गोस्वामी तुलसीदास ने स्पष्ट रुप से कहा था – मोसो कहां सीकरी सो काम अर्थात् मुझे फतेहपुर सीकरी से क्या काम... पर यहां ठीक इसके उलट है, रामदेव को राजनीतिज्ञों के बीच रहना, उठना-बैठना, राजधानी में रहनेवाले मुख्यमंत्रियों से वार्ता करना उनका आनन्द का विषय होता है।
रामदेव का रांची आना – जाना बराबर लगा रहता है। यहां के कई व्यवसायी बाबा के परम भक्त है। भाजपा की सरकार होने के कारण इनकी भक्ति का पैमाना और छलकता है। पिछले तीन नवम्बर को बाबा पुनः रांची पधारे, खुब जमकर प्रचार- प्रसार किया गया। उनके कार्यक्रम में भाग लेने के लिए शुल्क तय किये गये। ये शुल्क इंट्री कार्ड पर रखे गये थे, जिसके लिए कई व्यवसायिक केन्द्रों को कार्ड बेचने के लिए चुना गया था, पर सच्चाई ये है कि वे कार्ड इक्के दुक्के ही बिके, बाकी धरे के धरे रह गये...। रामदेव के एक दिन आने के पूर्व शोभायात्रा भी निकाली गयी, पर वह शोभा यात्रा भी बेकार साबित हुई...। बाबा 2 नवम्बर को जब सायं समय रांची हवाई अड्डे पर आये, तब वहां उनके स्वागत में भी कोई खास भीड़ दिखाई नहीं पड़ी, इतने लोग पहुंचे थे, जिन्हें हाथों से गिना जा सकता था...। जो लोग रामदेव को जानते है, वे ये भी जानते है कि पहले रामदेव का स्वागत कैसे किया जाता था? और कैसे उनके लिए जन-ज्वार उमड़ पड़ता था?
आपको ज्ञात हो, रांची से प्रकाशित एक अखबार तो बाबा रामदेव के पीछे ऐसा उमड़ता था, जैसे लगता हो, कि वे भगवान हो...। यहीं नहीं इस अखबार ने तो इनकी स्तुति भी गायी थी। उन्हें अपने यहां एक दिन का संपादक भी बना डाला था...। अखबार की आवभगत से खुश बाबा उस अखबार के पक्ष में कशीदे भी पढ़े थे। अर्जुन मुंडा के शासनकाल में आये बाबा ने ऐलान किया था कि आनेवाले पांच वर्षों में भारत विश्वगुरु बन जायेगा। प्रभात खबर ने प्रमुखता से इस खबर को प्रथम पृष्ठ पर छापा था...। पांच से ज्यादा साल बीत गये, पता नहीं भारत विश्वगुरु बना या नहीं, पर बाबा सुप्रसिद्ध उद्योगपति जरुर बन गये...उनका कारोबार विश्वस्तर तक जरुर पहुंच गया...वे संत से सुप्रसिद्ध उदयोगपति का तमगा जरुर ले लिये, यानी रामदेव पहले संत हुए, जो उद्योगपति भी है, राजनीतिज्ञ भी है, संत भी है, गुरु भी है...यानी बहुमुखी प्रतिभा के धनी...। कलयुग का प्रभाव कहिये...या और कुछ...पर सच्चाई तो यही हैं...
इन हालातों में हमारी नजर बाबा रामदेव के कार्यक्रम पर थी...अचानक 2 नवम्बर को मेरे मोबाइल पर मैसेज आया कि आप रामदेव के कार्यक्रम में सपरिवार शामिल हो, इंट्री फ्री है...। हमें समझ में नही आया...मुझे योग में दिलचस्पी नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाया जा रहा, निमंत्रण क्यों दिया जा रहा...। इसके पूर्व तो हमें संवाददाता सम्मेलन में भी नहीं बुलाया जाता था...अचानक आस-पास बैठे लोगों के पास भी इस प्रकार मैसेज आने लगे...। मुझे समझते देर नहीं लगी कि बाबा को बहुत बड़ा झटका लगनेवाला है...। लोगों की बाबा में दिलचस्पी घटने लगी है...। इंट्री कार्ड नहीं बिका है...। जब इंट्री कार्ड ही नहीं बिका और लोगों की दिलचस्पी घट रही तो फिर सुबह साढ़े सात बजे 3 नवम्बर को भीड़ कहां से आयेगी... तो नुस्खा निकाला गया, सभी को मोबाइल मैसेज करिये...बाबा से मिलिये...। सच्चाई ये है कि उसके बाद भी बाबा रामदेव को वो माइलेज नहीं मिला, जो माइलेज कभी मिला करता था...।
आज से ठीक छह-सात साल पहले एक बाइट लेने के लिए संवाददाताओं को तेल निकल जाते थे, पर आज बाबा टीवी वालों को ढूंढ रहे थे, पर टीवी वाले नजर नहीं आ रहे थे। लाइफ रांची निकालनेवाले के लिए तो बाबा एक आयटम थे, आयटम के रुप में उसने जगह दी और बाबा ने उसकी प्रशंसा कर दी...और लाइफ रांची वालों ने उसका भी न्यूज बना दिया...यानी जीव विज्ञान आपने पढ़ा होगा...तो आपने सहजीविता जरुर पढ़ा होगा... जिसमें दो जीव एक दूसरे पर आश्रित रहकर साथ – साथ जीवन जीते है और उससे किसी को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता...। इसी सहजीविता के आधार पर प्रभात खबर और रामदेव ने पिछले दिनों अपनी भूमिका निभायी।
इसी दरम्यान बाबा के मन में छुपा हुआ – भयंकर दर्द से भी मेरा आमना –सामना हुआ। बाबा रामदेव ने रांची में दर्दे बयां किया कि उन्हें नोबल पुरस्कार इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि वे काली चमड़ी वाले है, नोबेल पुरस्कार गोरी चमड़ीवालों को दिया जाता है...यानी भारत स्वाभिमान की बात करनेवाले, भारत माता की जय बोलनेवाले, भारत-भारती की जमकर दुहाई देनेवाले विदेशी पुरस्कार नोबेल के लिए कितने लालायित है...वो पता चल गया...ऐसे संत है...बाबा रामदेव...। ऐसी है, इनकी भारत भक्ति...। हमारे देश में बहुत सारे संत है, संत होंगे भी पर किसी ने ऐसी पीड़ा व्यक्त नहीं की, जो रामदेव ने कर दी...यानी हमारे देश के संत-परंपरा का अपमान...
अरे रामदेव जी संत जो होता है, वो किसी पुरस्कार का भूखा नहीं होता...
धन का भूखा नहीं होता...
वो दुकान नहीं खोलता...
वो मार्गदर्शन करता है...
वो करता नहीं, कराता है, और बदले में स्वयं के लिए कुछ नहीं कर पाता...
बाद में तो वो गर्व से यहीं कहता है...जो कबीर ने कभी कहा था...
सुना देता हूं...
यहीं चादर सुर-नर-मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैली कीनी चदरिया...
दास कबीर जतन से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया...

Wednesday, November 11, 2015

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...
जो बिहार चुनाव परिणाम का सही विश्लेषण न कर सकें...
• जीत कर भी हार गये नीतीश...
(संदर्भ – बिहार चुनाव परिणाम)
आइये हम आपको एक कहानी सुनाते है। दो बिल्लियां थी। उन्हें कहीं से एक रोटी मिली। एक रोटी के टूकड़े में अधिक हिस्से पाने को, वे आपस में लड़ पड़ी। दो बिल्लियों को आपस में लड़ता देख, कहीं से आए वानर ने कहां कि लाओ इस रोटी को, हम तुम दोनों के बीच में बराबर – बराबर बांट दें, फिर क्या था? बिल्लियों ने हामी भर दी और वह चालाक वानर इन दोनों बिल्लियों को मूर्ख बनाकर सारा रोटी हजम कर गया.........
बिहार चुनाव परिणाम के संदर्भ में बचपन में सुनी इस कहानी में, आप दो बिल्लियों में एक को जदयू और दूसरे को भाजपा के रुप में रख सकते है। हालांकि बहुत सारे लोगों को ये कहानी बिहार संदर्भ चुनाव में गले से नहीं उतरेगी। उतरना भी नहीं चाहिए, क्योंकि बहुत सारी ऐसी कहानियां है, जो गले में तब उतरती है, जब कोई घटना का बहुत बुरा अंजाम सामने आता है...क्योंकि कहानियां समझ में आ जाये और उस अनुरुप हम कार्य करें, ऐसा होता भी नहीं......
बिहार के चुनाव परिणाम बताते है कि नीतीश की लालू भक्ति की वजह से लालू यादव एक बार फिर किंग मेकर बने है और नीतीश स्वयं फिसड्डी। नीतीश जानते थे कि लालू कृपा बिना इस बार वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, इसलिए उन्होंने अपने सारे अहं का त्याग कर लालू कृपा पाने के लिए वे लालू के चरणों में लोट गये...हुआ वहीं, यादवों के नेता लालू ने, कुर्मियों के नेता नीतीश को गले लगाया और कहा कि तुम चिंता क्यों करते हो?, हम यादव नेता, तुम कुर्मी के नेता और बचा मुसलमान...तो मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु कौन है, तो वह हैं भाजपा....। मुसलमानों का नारा क्या होता है?...बस वहीं वोट उसी को जायेगा, जो भाजपा को हरायेगा....और जब हमारा कंबिनेशन बनेगा तो वो जायेगा कहां...उसका वोट इधर ही आयेगा....और हुआ वहीं....यादव, मुस्लिम और कुर्मी तीनों मिल गये और भाजपा धराशायी..........
सच्चाई यहीं है... इसमें कोई अरंतु-परंतु नहीं, ये अलग बात है कि नीतीश-लालू भक्ति और इन दिनों मोदी से परेशान मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग इस परिणाम के बाद लंबा-चौड़ा संपादकीय दिये जा रहा है...
हम आपको एक और कहानी सुनाते है.........
बिहार के एक मुख्यमंत्री थे – कर्पूरी ठाकुर। वो बराबर कहा करते थे। आप कितना भी विकास कर लो, बिहार में विकास के नाम पर वोट थोड़े ही पड़ता है। यहां तो सिर्फ कंबिनेशन चलता है...ये कंबिनेशन हमेशा से रहता है, ये अलग बात है कि इसका फायदा कोई – कोई, कभी – कभी उठाता है और कोई हमेशा उठाता रहता है....
नीतीश ने कम दिमाग नहीं लगाया था...वो मीडिया के महत्व को भी जानता था। इसलिए उसने प्रभात खबर के प्रधान संपादक पर डोरे डाले, पता चला कि ये तो राज्य सभा भेजने में ही गदगद हो जायेंगे, उसे राज्य सभा भेज दिया। फिर देखा कि एनडीटीवी को भी उपकृत करना चाहिए, पता चला कि रवीश का भाई चुनाव लड़ना चाहता है, नीतीश ने बहुत बड़ा त्याग किया। निरंतर जदयू की सीट रहनेवाली गोविंदगंज की सीट रवीश के भाई को थमा दी, कांग्रेस के टिकट पर रवीश का भाई लड़ा, ये अलग बात है कि वह चुनाव हार गया, पर कशिश चैनल के मालिक ने तो बेनीपुर में जदयू के टिकट पर आखिरकार झंडा बुलंद कर ही दिया। यानी नीतीश ने राजनीति के साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई और वो चीजें पाई, जिसको लेकर वो ज्यादा सक्रिय था.....
पर नीतीश को भी मालूम है कि सरकार तो उसकी बनी पर उसके क्या परिणाम निकले....कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। याद करिये, चुनाव परिणाम के बाद का नीतीश, लालू और अशोक का संयुक्त प्रेस काँफ्रेस। जो शारीरिक विज्ञान को जानते है, उन्हें ज्यादा दिमाग लगानी नहीं पड़ेगी, जो बयानों की तकनीक को जानते है, उन्हें भी ज्यादा दिमाग लगाना नहीं पड़ेगा। नीतीश ने चुनाव परिणाम की बारीकियां समझी और उसी के अनुसार बयान दिया, ज्यादा आक्रामकता नहीं दिखाई, चेहरे पर भी जीत का भाव नहीं दिखा, एक संशय जरुर दिखा...जबकि इसके विपरीत लालू गदगद, वो सारी बाते लालू ने कहीं, जो उनके स्वभाव में है, इस प्रेस कांफ्रेस में भी, उन्होंने उनलोगों को चेता ही दिया कि जो वोट उन्हें नहीं दिये, वे संभल जाये... यानी इशारा किस ओर था, इशारों को समझने वाले जान गये है...
अब दूसरी बात..........
नीतीश से कुछ सवाल, जो उनके भक्त पत्रकार उनसे नहीं पूछ सकते या उनसे अनुप्राणित मीडिया का वर्ग, या उनके जाति के पत्रकार नहीं पूछ सकते.....
क्या नीतीश-लालू बता सकते है, कि जब उनका गठबंधन इतना ही लोकप्रिय था और जब कुर्मी, यादव और मुस्लिमों का इतना बड़ा गठजोड़ था तो फिर वे कुर्मी, यादव और मुसलमान बहुल राजधानी पटना के पटनासिटी, कुम्हरार, दीघा, बांकीपुर और दानापुर की सीट पर बुरी तरह से क्यों हार गये?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब उनका शासन बहुत ही लोकप्रिय था तब उनकी सीटे लालू से भी कम क्यों आयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब चुनाव परिणाम आ रहा था तो राजधानी पटना के व्यवसायियों और अन्य प्रबुद्ध वर्गों में भय क्यों व्याप्त हो रहा था?
क्या नीतीश बता सकते है कि उनके स्पीकर और अन्य मंत्रियों की करारी हार कैसे हो गयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि इतनी बड़ी जीत के बाद भी, उन्हीं के द्वारा आयोजित प्रेस कांफ्रेस में उनके चेहरे का रंग उतरा हुआ क्यों था?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने इस चुनाव में प्रधानमंत्री के खिलाफ निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग नहीं किया?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने मीडिया जगत के लालची पत्रकारों और लालची मालिकों को खुश करने के लिए वे सारे हथकंडे नहीं अपनाए, जो भाजपा ने अपनाए थे?
ये सारे सवाल सिर्फ नीतीश से पूछना चाहिए, क्योंकि वे सुशासन बाबू है, लालू से तो पूछने का सवाल ही नहीं है...क्योंकि वे खुद ही बता चुके है, इस चुनाव में कि वे क्या है?
नीतीश जी, ये याद रखिये.....जब कोई जीतता है तो उसके जीत का कारण कोई नहीं पूछता, हां जो हारता है, उसके हार के कारण गिनाएं जाते है.....
मैं जानता हूं कि बहुत सारे अखबार और मीडिया हाउस में भी जातिवादी पत्रकारों और लालची पत्रकारों का समूह पैदा हुआ है, जो कभी कांग्रेस, तो कभी भाजपा और आज आपका गुणानवाद कर रहा है, पर इससे नुकसान किसका हो रहा है। आप ये जानकर भी अनजान है....नुकसान उन बेवकूफों का हो रहा है, जो नहीं जानते कि पिछले पच्चीस और अब आज से तीस सालों तक वे अभी सड़कों, बिजली और पानी पर ही अटके हैं जबकि अन्य राज्य इन सबसे कहीं बहुत दूर निकल चुके है.....
ये बेवकूफ बन रहे लोग नहीं जानते कि उनके बच्चे विकसित होते कई राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रह रहे हैं और उनकी औकात सिर्फ कुली, पोछा लगानेवाले से ज्यादा कुछ भी नहीं...
आप में जितना अहं हैं, हमें नहीं लगता कि केन्द्र और राज्य के बीच कोई मधुर संबंध रहेगा और आप बिहार को इन परिस्थितियों में जबकि राजद आपसे बीस है, कोई राज्यहित में स्वतंत्र रुप से निर्णय ले लेंगे.....
• नीतीश भक्ति और प्रभात खबर...........
सभी जानते है कि जैसे ही बिहार चुनाव की घोषणा हुई, दिल खोलकर प्रभात खबर ने लालू यादव, नीतीश कुमार, सोनिया गांधी और उनके लाडले राहुल की भक्ति में स्वयं को अनुप्राणित करना शुरु कर दिया....ऐसा होना भी चाहिए था क्योंकि नीतीश कुमार ने बिना एक पैसे प्रभात खबर से लिये, इसके प्रधान संपादक को राज्य सभा में पहुंचा दिया था....
प्रभात खबर की भूमिका देखिये, उसकी महागठबंधन भक्ति देखिए........
उसके लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं, बस 9 नवम्बर का अखबार कहीं से उठा लीजिये और सबसे पहले प्रथम पृष्ठ पर नजर दौड़ाइये...उसने भाजपा के हार के कारण गिनाएं है, लिखा है...भाजपा के हार के प्रमुख कारण, निम्नलिखित है....
• आरक्षण पर संघ प्रमुख भागवत का बयान
• नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाना
• गोमांस को लेकर अनावश्यक बयानबाजी
• लालू को शैतान कह कर हमला करना
• नीतीश पर बिना तथ्यों के हमला करना
• प्याज, दाल की कीमतों में भारी वृद्धि
• नीतीश के मुकाबले राज्य में एनडीए के पास कोई दमदार चेहरा का न होना
• नीतीश सरकार के कामकाज के प्रति लोगों की सकारात्मक राय
यानी हार के 8 कारणों में नीतीश व लालू की भक्ति में पांच कारण जोड़ दिये गये....
यहीं नहीं प्रथम पृष्ठ पर लिख दिया लालू प्रसाद के बेटों तेज प्रताप व तेजस्वी को छोड़ कर सभी नेतापुत्रों को मिली हार, जबकि खुद पृष्ठ संख्या 13 पर शिवानंद तिवारी के बेटे को भी जीत दिखलाता है, सच्चाई क्या है? प्रभात खबर ही बेहतर बता सकता है....
इस अखबार में नीतीश के प्रशसंकों के कई आलेख भी छपे है...
पृष्ठ संख्या 13 पर प्रंजॉय गुहा ठकुराता के आलेख है – सांप्रदायिकता की राजनीति की पराजय। सवाल - ठकुराता से। 2005 व 2010 में जब नीतीश भाजपा का बांह पकड़कर सत्ता में आये थे तो उस वक्त क्या सांप्रदायिकता की राजनीति की जय हुई थी?
पृष्ठ 14 पर संपादकीय में तो नीतीश भक्ति के सिवा कुछ भी नहीं, अभिमत में रविभूषण जो वामपंथी पत्रकार है, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी है, इनके कलम से मैंने आज तक भाजपा व संघ की प्रशंसा में दो शब्द नहीं देखे तो आज कैसे देख पाउंगा...हां पत्रकार को कभी भी किसी का सदा के लिए विरोधी या सदा के लिए प्रेमी नहीं होना चाहिए...पत्रकार को तटस्थ होना चाहिए.......
पृष्ठ संख्या 15 तो भगवान नीतीश को समर्पित है...हल्की दाढ़ीवाले बाबा नीतीश का बहुत बड़ा फोटो और उनका चरित्र वर्णन है...ये आम तौर पर होता है, जब कोई सत्ता में आता है तो उसके लिए एक विशेष पेज होता है...इस पर हमें कोई टिप्पणी नहीं करनी है.......
पृष्ठ संख्या 18 पर चरणवार भाजपा की हार का मनगढंत विश्लेषण और अजय कुमार व एमएन कर्ण का संपादकीय आधारित आलेख है, जिसमें नीतीश व लालू को भगवान का दर्जा दे दिया गया है।
और अंतिम पृष्ठ पर भाजपा व संघ का दुश्मन व जब तक जीवित रहेगा दुश्मन बना रहेगा...नाम बता देता हूं, उर्मिलेश का आलेख है। ये वहीं उर्मिलेश है, जिसे चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू में सामाजिक न्याय नजर आता है और नीतीश में शासन के सर्वगुण संपन्न होने के गुण...ये पत्रकार जहां भी भाजपा का विरोध हुआ देखता है, पुलकित हो जाता है, और जहां अपनी जाति के लोगों को जीत देखता हैं, प्रसन्न होकर उसकी स्तुति करता है....इन दिनों प्रभात खबर का चहेता बना हुआ है... इसके आलेख है........
यानी गर आप नीतीश के कट्टर समर्थक है, भाजपा का विरोध करना जानते है, तो हरिवंश को पकड़िये, प्रभात खबर से जूड़िये और कल तक खलनायक थे, तो नायक बन जाइये.........
अपनी बात.......
नीतीश के जीत के कारण...
एकमात्र जीत का कारण – जातिवादी लहर को फैलाना, लोगों को उनकी जाति का हवाला देना, यादववाद, कुर्मीवाद और अंत में मुस्लिमों के अंदर ये बात फैलाना कि भाजपा आई तो उनकी खैर नहीं........
भाजपा के हार के कारण.....
• जातिवाद लहर के आगे संप्रदायवाद की हवा निकल जाना।
• बेवजह असहिष्णुता का बवंडर विपक्षियों द्वारा अपने शुभचितकों, लेखकों, फिल्मकारों साहित्यकारों द्वारा खड़ा करना, ताकि मोदी सरकार को अल्पसंख्यक विरोधी और हिंदूवादी बताया जाय।
• भाजपा के कई नेताओं द्वारा विषवमन करना।
• भाजपा के अंदर शत्रुघ्न सिन्हा जैसे जयचंदों का बराबर अपनी ही पार्टी के खिलाफ विषवमन करना और नीतीश व लालू का प्रशंसा करना।
• भाजपा के एक नेता साक्षी महराज द्वारा दूसरे चरण के बाद भाजपा की हार स्वीकार करनेवाले बयान को जारी करना।
• एकमात्र मोदी के भाषण पर ही ध्यान टिका कर, अन्य चुनाव प्रचारों व सशक्त जनसमर्थन जुटाने पर ध्यान का न होना।
• सामान्य वर्ग द्वारा बढ़ती महंगाई के खिलाफ गुस्सा।
• प्रधानमंत्री द्वारा पूर्व में दिये गये बयान कि काला धन वापस लायेंगे, पर अभी तक उस पर कोई प्रगति का न होना, जबकि कोई भी सरकार आये, ये इतना जल्द संभव भी नहीं, पर आम जनता को लगा कि सरकार अपने इस वायदे को पूरा करने में सफल नहीं रही।
• मीडिया के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा नीतीश को खुलकर समर्थन करना और उसे बिहार की जनता के बीच एक महान शख्सियत के रुप में पेश करना, जैसे ये दीने इलाही अकबर हो।
• नीतीश द्वारा अनुप्राणित अखबार जैसे प्रभात खबर और कुछ चैनलों द्वारा खुलकर नीतीश भक्ति में डूब जाना।
चुनाव परिणाम के प्रभाव............
• अब नीतीश कुमार गर चाह लें कि वे स्वतंत्र रुप से बिहार के लिए कोई निर्णय कर लें, ये अब संभव नहीं है, उन्हें हर बात के लिए लालू की शरण में जाना होगा और लालू वहीं करेंगे, जो उनके हित में होगा।
• लालू सर्मथकों का स्थानीय प्रशासन पर बोलबाला रहेगा, गुंडों की जमात स्थानीय शासन पर हावी रहेगी और व्यापार में बिहार पिछड़ता चला जायेगा।
• ऐसे ही बिहार की नकारात्मक छवि पूरे देश में है, अब इसकी छवि और पुष्ट होगी, कोई भी उदयोग जगत का व्यक्ति यहां उद्योग लगाने से हिचकेगा, जो अब बचा भी होगा तो यहां से दूसरे जगहों पर वो सिफ्ट करेगा।
• ऐसे ही अहंकार में डूबे नीतीश को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नहीं बनती, ऐसे में विकास को लेकर बिहार में संशय की स्थिति बनी रहेगी।
• पन्द्रह साल लालू-रावड़ी और दस साल नीतीश और अब फिर लालू-नीतीश मतलब एक बार फिर रोजगार की तलाश में जाने को मजबूर बेरोजगार युवकों की फौज बिहार को छोड़ अन्य राज्यों में जाने को मजबूर होगी।
• एक बार फिर बिहार के ये युवा महाराष्ट्र, असम, कर्णाटक आदि राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रहने को विवश होंगे और समय-समय पर जलील होंगे, पिटाई खायेंगे...क्या नीतीश व लालू बता सकते है कि महाराष्ट्र व गुजरात से कितने युवा बिहार में रोजगार के लिए आते है।
• एक बार फिर बिहार के लोग अच्छी स्वास्थ्य सेवा के लिए बिहार से दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होंगे।
• एक ओर जहां आंध्र प्रदेश अपनी नई राजधानी अमरावती को बसाने के लिए ठोस प्रयास कर रहा होगा, तो बिहार की जनता अपनी जातिवाद पहचान के लिए संघर्ष करती नजर आयेगी।
• एक साल में झारखंड व्यापार सुगमता सूचकांक में भारत के प्रमुख विकसित राज्यों में तीसरा स्थान बना लिया और तेजी से बढ़ते राज्यों में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया और बिहार सबसे नीचे रहने के लिए स्थान बनाने को व्याकुल रहेगा।
• प्रभात खबर के प्रधान संपादक एक बार फिर राज्यसभा में जाने के लिए नीतीश कुमार की द्यादृष्टि पाने के लिए लालायित रहेंगे और सामान्य जनता इस बात के लिए व्याकुल रहेगी कि उसके घर से निकली बेटियां सही सलामत घर लौटेंगी भी या नहीं।
कौन कहता है कि बिहार में विकास व सुशासन की जीत है, मैं कहता हूं कि ये पूर्णतः जातिवाद की जीत है...जैसे सांप्रदायिकता बुरी है, वैसे ही जातीयता बुरी है, पर कुछ पत्रकार, कुछ बुद्धिजीवी जातीयता का तो समर्थन करते है, पर सांप्रदायिकता की आलोचना...ठीक उसी प्रकार जैसे पाकिस्तान भारत प्रायोजित आतंकवाद का तो समर्थन करता है, पर अन्य जगहों पर होनेवाले आतंकवाद की कड़ी भर्त्सना करता है...ये दोगली सोच बिहार को बर्बाद कर डालेगी...पता नहीं, बिहार की जनता को अक्ल कब आयेगी?
हमें लगता है कि एक दिन अक्ल जरुर आयेगी...पर तब तक बहुत देर हो चुका होगा...और कुछ लोग गाने गायेंगे...सब कुछ लूटा के होश में आए तो क्या किया....

Thursday, November 5, 2015

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........
बिना ब्राह्मणों को गाली दिये, लालू का भोजन पचता भी नहीं.......
लालू यादव दुनिया के पहले नेता नहीं जो ब्राह्मणों को गाली देता है, ऐसे कई नेता है जो ब्राह्मणों को गाली देना शान समझते है, इससे उन्हें वोटों में बढ़ोत्तरी होती है और उनके दल का प्रचार – प्रसार भी हो जाता है। कंस की परंपरा को वर्तमान युग में भी ले चलने की उनकी सोच बहुत ही निराली है। स्थिति ऐसी है कि एक समय उनके घोर विरोधी माने जानेवाले अखबार के प्रधान संपादक भी, अपने अखबार में उनके दिव्य फोटो छापने से अब परहेज नहीं करते, क्योंकि उनके प्रिय नेता नीतीश कुमार के बड़े भाई के नाम से आजकल लालू यादव विख्यात हो रहे है.......अपने प्रिय नीतीश को वे भला निराश कैसे कर सकते है...। कुछ लोग कहते है कि शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे ब्राह्मण लालू की पार्टी में है, तो भाई मेरे रावण को भी कुछ लोग ब्राह्मण कहा करते है, तो ऐसे में क्या हम शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे लोगों को इसलिए हम ब्राह्मण मान लें कि उसने ब्राह्मण कुल में जन्म ले लिया। जो लालू यादव जैसे ब्राह्मण द्रोही की शरण में बैठकर, उसके भ्रष्टवाणियों को सुने, जो पशुओं के चारा खा जानेवाले भ्रष्ट नेताओं की आरती उतारे वह किसी जिंदगी में ब्राह्मण नहीं हो सकता....। उसके हाथ से तो जल ग्रहण करना या अपने बच्चों पर आशीर्वाद के रुप में पुष्प-अक्षत छिड़कवाना भी महापाप है....जो भी ब्राह्मण लालू यादव अथवा उसकी पार्टी या उसके समर्थकों का गुणगान करता है, वह महापातक है, उसे तो नर्क में भी जगह नहीं मिले....जो गोमांस का समर्थन करे, वह गोपालक कैसे हो सकता है, वह गोसंहारक है..........
सही मायनों में अभी लालू यादव को ब्राह्मण से भेंट ही नहीं हुआ है, जिस दिन भेंट हो जायेगा, उन्हें पता चल जायेगा, कि ब्राह्मण क्या होता है?, वे मनोज झा और शिवानंद तिवारी जैसे ब्राह्मण, जो उनकी चरणवंदना करते है, वे समझ लेते है कि बस अब ब्राह्मणों की यहीं औकात है...अरे लालू जी, जिस दिन ब्राह्मण अपने तेज को पहचान लिया तो फिर आप कहां रहोगे, आपको पता ही नहीं चलेगा...
हां एक बात और, आपको आपके किये का फल ब्याज समेत ईश्वर दे रहा है, फिर भी आपको शर्म नहीं...शर्म आयेगी भी कैसे, शर्मवालों को न शर्म होता है...आप तो विशुद्ध रुप से बेशर्म है....बोलने की तो आपको तमीज है नहीं और न ही आप बोलने की तमीज सीखेंगे, क्योंकि आप नमूने जो ठहरें, हमें तो लगा था कि बिहार की सत्ता से दस साल बेदखल होने के बाद आपको बुद्धि आ गयी होगी, पर आप तो वहीं है, न सुधरे थे, न सुधरे है, न सुधरेंगे........
खुब गाली दीजिये ब्राह्मणों को, हो सके तो सारे चैनलों पर संतों की तरह प्रातः का एक बुलेटिन बुक करवा लीजिये, और जी भरकर ब्राह्मणों को गाली दीजिये, क्योंकि जब तक आप ब्राह्मणों को गाली नहीं दीजियेगा, तब तक आपका और आपके दल का उद्धार कैसे होगा.....वोट कैसे मिलेगा, आप धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील कैसे कहलाइयेगा....हां आप ही के एक दल में एक नेता है, शायद उसका नाम रघुवंश प्रसाद सिंह है। उससे ज्ञान भी अर्जन करिये, वो बतायेगा कि गोमांस कब और कैसे खाया जाता है?, कौन- कौन ऋषि गोमांस खाकर भगवान को प्राप्त कर लेते थे? इससे एक नये समाज का जन्म होगा। सुबाहुवाद और मारीचवाद बिहार के कण-कण में फैलेगा, तब परिकल्पना कीजिये....अपना बिहार कितना सुंदर दीखेगा....जब सब बिहारी भाईयों के हाथों में गोमांस होगा....और जोरदार नारा लगायेंगे, नारा इस प्रकार होगा.....
गोमांस हम खायेंगे,
लालू के संग जायेंगे....
धन्य – धन्य बिहार प्रदेश,
जहां मिले गोमांस अनेक....
यादव-मुस्लिम भाई-भाई
गोमांस से करो कमाई....
भाईचारा तभी आयेगा,
जब गोमांस सब खायेगा....
शाकाहारी मुर्दाबाद,
मासांहारी जिन्दाबाद.....
शाक-सब्जी नहीं खायेंगे
केवल गोमांस घर लायेंगे.....
रोज सबेरे, एक ही काम
ब्राह्मणों का, कर दो काम तमाम....
और लालू जी आपके लिए एक और काम की बात....सारे बिहार के लोगों को बता दीजिये कि कैसे कश्मीर से सारे कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया और आज वहां केवल मुस्लिमों की आबादी शान से रह रही है....इसलिए बिहार में भी ब्राह्मणों को हटाने के लिए नीतीश कुमार के साथ एक व्यापक आंदोलन चलाईये ताकि बिहार से ब्राह्मणों का सदा के लिए सफाया हो जाय और आप माई समीकरण के तहत जब तक जिंदा रहे राज करें.....फिर आपके बेटे-बेटियां राज करें....कालांतराल के बाद जब मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ जाये तो फिर आप के खानदान के लोग सदा के लिए उन्हें सत्ता सौंप दें....बाद में आपकी आनेवाली पीढ़ी खुद भी यह कहकर धर्मांतरण कर लें कि उन्हें लोकतंत्र में गहरी आस्था है..........

Thursday, October 29, 2015

अरविंद, लालू, ममता और नीतीश को मिलकर गोकशी दल बनाना चाहिए, तभी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सधेगी...........

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी, बीफ खाने व खिलाने को आमदा राजद नेता लालू प्रसाद यादव और उनके गो भक्षण को व्याकुल राजपूत कुलभूषण रघुवंश प्रसाद सिंह को मिलकर गोकशी दल बना लेना चाहिए।
इसके अनेक फायदे हैं.........
1. आरएसएस व भाजपा, साथ ही भारत की उन बहुसंख्यक आबादी को बार-बार चिढ़ाने का मौका मिलेगा, जो गोमांस से परहेज करते है।
2. बहुसंख्यक जमात के दिलों को भले ही ठेस लगे, वो बोल नहीं सके, पर खुद को अल्पसंख्यक कहलाने में गौरव महसूस करनेवाले मुस्लिमों व ईसाईयों का वोट सदा के लिए उन्हीं का होकर रह जायेगा।
3. किसी को बुरा लगे तो लगे, जैसे बकरे कटते हैं, मुर्गियां कटती हैं, ठीक उसी प्रकार हर मुहल्ले में गोकशी केन्द्र बनना चाहिए ताकि लोग आराम से गो मांस खाकर स्वयं को सुबाहु व मारीच समझ सके, इससे देश में लाल-क्रांति हो जायेगी। गो की जनसंख्या का नियंत्रण भी हो जायेगा और वैज्ञानिक हल भी।
4. अंग्रेजों के फूट डालो शासन करो की नीति का फायदा, आजादी के बाद भी गोहत्या के द्वारा ही सिर्फ उठाया जा सकता है, ये देश के सभी राजनीतिक दलों को बता देना चाहिए, ताकि गोकशी दलों में आपसी भाईचारा बनी रहे।
5. गो हत्या के संबंध में सुबाहु-मारीच ने जो कहा था, ऐसे विद्वानों की वाणी को जन-जन तक पहुंचाना चाहिए, ताकि महर्षि कण्व, कणाद की यह भूमि सुबाहु व मारीच जैसे लोगो के कारण जानी जाये, इससे फायदा यह होगा कि ब्राह्मणवाद भी खत्म होगा और सुबाहुवाद-मारीचवाद की नयी परंपरा जागृत होगी, इससे देश में सही रुप से समाजवाद आयेगा।
6. रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे राजद नेताओं को जयचंद व मानसिंह जैसे महान शख्सियतों के पद चिह्नों पर चलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने विदेशी आक्रांताओं व लूटेरों के साथ एक बेहतर संबंध बनाए। महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान तो मूर्ख थे, इसलिए हमारा रघुवंश प्रसाद सिंह को सुझाव होगा, कि गांव – गांव में जयचंद व मानसिंह स्मारक समिति बनाकर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द उत्सव मनाते हुए जनजागृति चलाए और इस आयोजन में गोमांस अवश्य खिलवाएं, ताकि सुबाहू – मारीच के सपने पूरे हो सके, ताकि महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की आत्माएं सिसककर रोती रहे और मानसिंह व जयचंद की आत्माएं गौरवान्वित महसूस करें। लक्ष्य एक ही रखे - देश भाड़ में जाय, संस्कृति भाड़ में जाये, पर सुबाहु व मारीच के सपनों का भारत हम जरुर बनायेंगे और आनेवाले पीढ़ी को बताएंगे कि तुम राम और कृष्ण के वंशज नहीं, बल्कि तुम सुबाहु व मारीच की संतान हो, तुम्हें अकबर और मुहम्मद गोरी जैसे लोगों के लिए जीना है, जैसे ही देश में कोई ब्राह्मण जाति का टीका लगाये हुए व्यक्ति या गाय मिले, उसका सर कलम कर दो, क्योंकि उसे जीने का अधिकार ही नहीं, जीने का अधिकार सिर्फ रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे कुलभुषणों का हैं...........
7. हर सप्ताह एक बैनर लगाकर, जैसा कि आजकल फैशन चल गया है, गोकशी दलों में शामिल लोगों को गोमांस खाओ आंदोलन चलाना चाहिए, ताकि देश से सारी गाये ही समाप्त हो जाय, क्योंकि बच्चों को दूध-मक्खन-घी नहीं बल्कि मांस यत्र-तत्र-सर्वत्र उपलब्ध होना ही चाहिए।
8. गोकशी दलों को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि गर किसी मां के छाती से दूध न निकले तो डाक्टरों द्वारा प्रचारित व प्रसारित कि बच्चों को गाय का दूध पिलाये, ऐसे डाक्टरों को दंडित कर दिया जाय। ये सुनिश्चित किया जाय कि भारत में जो भी बच्चे पैदा होंगे, वे सुबाहु व मारीच की तरह गाय का दूध के बदले गाय का रक्त और फिर बड़ा होते ही गोमांस खायेंगे। इससे देश बहुत ही तरक्की करेगा............
9. जो भी व्यक्ति या दल या संस्थान गोरक्षा अभियान चलाए, उसे तत्काल फांसी पर लटकाने का भी प्रबंध होना चाहिए, क्योंकि ये माना जाये कि गोरक्षा अभियान चलाने वाले देश के सबसे बड़े शत्रु है और ये खाने की स्वतंत्रता का हनन करते है।
10. गोकशी दलों को विभिन्न मीडिया चैनलों के माध्यम से भी गोहत्या कराने को प्रेरित करना चाहिए, ताकि मीडिया में शामिल उनके भाई-बंधु-बहनें भी अनुप्राणित हो सके। मीडिया में शामिल सभी पत्रकारों और मीडिया के मालिकों को किसने कितनी गो हत्याएं की या करवायी, उस पर एक प्रतियोगिता भी रखनी चाहिए, ताकि लोग सारे काम – धाम छोड़कर गोहत्या प्रतियोगिता में शामिल होकर, देश का मान बढ़ा सके.......
11. गोकशी दलों को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जो लोग गोमांस खा रहे है, वे अपने गर्दन में एक आईकार्ड जरुर रखे, जिसमें लिखा हो, हमें गर्व है कि हम गोमांस खाये हैं, ताकि दूसरे लोग समझ ले कि सामनेवाला व्यक्ति प्रगतिशील और वह निहायत मूर्ख है।
12. गोमांस खाने के बाद गर किसी को मनुष्य के मांस खाने की आदत हो जाये, तो इसकी भी विशेष व्यवस्था करने के लिए गोकशी दल को तैयार रहना चाहिए क्योंकि खाने की स्वतंत्रता तो हर हाल में एक सामान्य व्यक्ति को होना ही चाहिए।
क्यों कैसी रहीं............
जनहित में जारी.........
खासकर बिहार के दाढ़ीवाले बाबा रघुवंश को सादर समर्पित...........

Thursday, October 15, 2015

क्या बिहार में महागठबंधन से चुनाव लड़ रहे एनडीटीवी के रवीश कुमार के भाई चुनाव जीत पायेंगे...........

रांची से एक अखबार प्रकाशित होता है – खबर मंत्र। उसने 14 अक्टूबर को अपनी अभिव्यक्ति पृष्ठ पर एनडीटीवी के एक पत्रकार रवीश कुमार का उसके ब्लॉग से साभार आलेख छापा है। ये वहीं रवीश कुमार है, जो टीवी पर बहुत ही सुंदर अभिनय करने के कारण, इलेक्ट्रानिक मीडिया में जगह बनानेवाले नये – नये पत्रकारों का चहेता बना हुआ है। वह बहुत ही अच्छी – अच्छी बातें करता है, भाजपा को खूब गरियाता है, पर नीतीश का नाम जुबां पर आते ही नीतीश भक्ति में स्वयं को अनुप्राणित कर लेता है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी उसने बिहार का दौरा किया था, और उसी वक्त एक उसका आलेख प्रभात खबर में पढ़ने को मिला था, उस आलेख को पढ़ने पर मुझे साफ लगा था कि यह व्यक्ति नीतीश भक्ति में बहुत ही कन्फ्यूज्ड है, उसे जनता का नब्ज पहचानने नहीं आता। उसने उस वक्त आलेख में लिखा था कि बिहार में लोकसभा चुनाव का जो परिणाम आयेगा वह अप्रत्याशित होगा, जो भाजपा के खिलाफ रहेगा, पर हुआ ठीक इसके उलटा। भाजपा के लहर में बिहार से उसके भगवान नीतीश का ही सफाया हो गया।
फिलहाल नीतीश, लालू और राहुल की तिकड़ी से बने महालंठबंधन को जीताने के लिए अंदर ही अंदर वह सक्रिय है। खबर मंत्र में कल के छपे आलेख से फिर इसकी कलाकारी दीख रही है। बहुत कम ही लोगों को पता है कि रवीश कुमार का भाई ब्रजेश पांडे गोविंदगंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। सूत्र बताते है कि जहां से रवीश का भाई चुनाव लड़ रहा है, वहां ब्रजेश पांडे आज तक कभी गया ही नहीं, फिर भी वह जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि रवीश के नीतीश भक्ति का ही कमाल है कि गोविंदगंज से मीना द्विवेदी, जो जदयू के टिकट पर लगातार दो बार चुनाव जीतती आयी थी, उस मीना द्विवेदी को नीतीश ने इस बार नहीं उतारा और ये सीट अपने भक्त रवीश को खुश करने लिए रवीश के भाई ब्रजेश को दिलवा दिया और आज ब्रजेश कांग्रेस के टिकट पर अपना किस्मत आजमा रहा है। यानी पत्रकारिता में भी, भाई – भतीजावाद शुरु और पत्रकारिता के आड़ में अब नेतागिरी भी, हालांकि हम आपको बता दें कि रवीश के भाई ब्रजेश की जीतने की उम्मीद न के बराबर है। रवीश अकेले नहीं, बहुत ऐसे पत्रकार है, जिन्हें नीतीश में भगवान नजर आता है, आनन्द नजर आता है, इसलिए नीतीश की गलतियां उसे दिखाई नहीं देती, पर जो रवीश करते है, वैसा कोई नहीं करता, यानी हाथी के दांत दिखाने को कुछ और खाने को कुछ...। हम आपको बता दें कि इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीडिया को अपने चरणों में नतमस्तक कराने के लिए अनेक कार्य किये है, जैसे प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को राज्यसभा भेजा। बिल्डर और कशिश चैनल के मालिक सुनील चौधरी को बेनीपुर से विधानसभा का टिकट देकर उसे बिहार विधानसभा में भेजने के लिए लगा है। यहीं नहीं ऐसे कई उदाहरण है, जो बताने के लिए काफी है कि नीतीश ने मीडिया को अपने चरण छूने को कैसे विवश किया है, पर मीडिया के लोग है, जो लालच में आकर, वह सब कर रहे जो आज का नेता करता है........यानी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबने की ललक......क्योंकि उसे भी वह सब कुछ चाहिए, जो नेता के पास होता है......ये नीतीश भक्ति का ही कमाल है कि महागठबंधन के एक नेता लालू प्रसाद की अतरी में मंगलवार को सभा थी, और उस सभा से भीड़ ही गायब थी, पर गया से ही प्रकाशित प्रभात खबर में लालू प्रसाद से संबंधित यह समाचार पूर्णतः गायब है....साथ ही कई चैनलों ने इसे दिखाया ही नहीं, आखिर ये नीतीश भक्ति नहीं तो और क्या है.........

Tuesday, August 4, 2015

बिहार में पत्नी युग की शुरुआत......

आज अखबारों में पढ़ा। बोकरादी बाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा अपनी पत्नी पूनम सिन्हा को जदयू का टिकट दिलाने के लिए बेचैन है। ऐसे भी उनके प्रिय कुशासन बाबू यानी नीतीश कुमार, जब बोकरादी बाबू के लिए कुछ भी करने को तैयार हो... तो ऐसे में पूनम सिन्हा को जदयू की टिकट मिलने में दिक्कत नहीं होगी...यानी कल तक लोकनायक जयप्रकाश को अपना जगतगुरु शंकराचार्य बतानेवाले, संपूर्ण क्रांति में अपना सिद्धांत ढूंढनेवाले, इंदिरा गांधी को परिवारवाद के नाम पर कोसनेवाले, जंगलराज के अधिष्ठापक लालू यादव के पदचिह्नों पर चल दिये हैं, जैसे लालू ने अपनी पत्नी को सीएम बनाया। बोकरादी बाबू को सीएम बनाने की औकात नहीं, तो कम से कम अपनी पत्नी को विधायक ही बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं तो क्या गलत हैं। बिहार पुराण में तो लिखा ही हैं - सर्वे गुणाः भार्ययामाश्रयन्ति अर्थात् सारे गुण पत्नी का आश्रय लेते हैं, इसलिए जो व्यक्ति पत्नी के चरणचिह्नों पर बलिहारी होते हुए पत्नी के लिए ही जीता और पत्नी के लिए ही मर जाता हैं, वहीं व्यक्ति असली में नेता, असली में अभिनेता और असली में महान नागरिक हैं....भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाखां -ये सारे के सारे महान देशभक्त..निरामूर्ख थे, असली देशभक्त तो अपने बोकरादी बाबू है...इसलिए बिहार के सारे युवाओँ को बोकरादी बाबू से प्रेरणा लेते हुए, देश के लिए जीना छोड़कर, सिर्फ और सिर्फ अपनी पत्नी के लिए जीने का संकल्प लेना चाहिए, क्योंकि पत्नी हैं तो जीवन हैं, पत्नी हैं तो आनन्द हैं और पत्नी हैं तो सारे तीर्थ है.........
ऐसे भी बोकरादी बाबू के कभी दोस्त रहे, सुपरस्टार दिवंगत अभिनेता राजेश खन्ना ने फिल्म "सौतन" में अपनी पत्नी को मनाने के लिए एक गाना गाया था, उसके बोल थे.....
सासु तीरथ, ससुरा तीरथ, तीरथ साला-साली है
अरे दुनिया के सब तीरथ झूठे चारो धाम घरवाली है......
जब चारो धाम घरवाली ही हैं तो फिर बोकरादी बाबू, अपनी पत्नी के लिए इतना कर रहे हैं तो गलत क्या हैं। अब जहां से बोकरादी बाबू की पत्नी लडे़गी, वहां की जनता क्या निर्णय लेती हैं, मेरा ध्यान उसी ओर होगा...चलिए बिहार में पत्नी युग की शुरुआत करने के लिए महान नेता लालू और बोकरादी बाबू दोनों को मेरी ओर से ढेर सारी शुभकामनाएँ....साथ ही कुशासन बाबू को भी मेरी ओर से बधाई, क्योेंकि लालू के बाद पत्नी युग को बढ़ावा देने के लिए इन्होंने भी तो कमर कस ली....

Monday, July 27, 2015

यानी बिहारी बाबू बन गये बोकरादी बाबू.........

अब तो नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं लेकिन हम आपको बता दें कि जब से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बात चली थी, तभी से बिहार का एक भाजपा नेता व फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को बोकरादी की बीमारी लग गयी, बेचारा पगला गया। उसे नीतीश और लालू में खुदा नजर आने लगा। कारण बिहार के लोग भी जानते हैं और हम भी, गर कोई नहीं जानता हैं, तो वह भी जान ले, चूंकि शत्रुघ्न सिन्हा की जिंदगी में गर कोई उसका सबसे बड़ा शत्रु हैं तो वह हैं अमिताभ बच्चन। अमिताभ बच्चन और नरेन्द्र मोदी के बीच किस प्रकार की दोस्ती चल रही हैं, वह सभी जानते है। कैसे नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए और डीडी किसान चैनल को प्रमोट करने के लिए अमिताभ बच्चन को स्थान दिया। ऐसे में भला शत्रुघ्न सिन्हा को बोकरादी की बीमारी का बढ़ जाना स्वाभाविक हैं, इसलिए वह नरेन्द्र मोदी को थोड़ा डोज देना चाहता हैं, पर वो नहीं जानता कि नरेन्द्र मोदी एक ऐसे शख्स का नाम हैं कि वह शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई लोगों की बोकरादी छुड़ा चुका हैं, ऐसे अभी जिस शत्रुघ्न सिन्हा को नीतीश व लालू में खुदा नजर आ रहा हैं, उन दोनों को नरेन्द्र मोदी जो हैं, बोकरादी छुड़ा चुका हैं तो फिर शत्रुघ्न सिन्हा किस खेत का मूली है....शत्रुघ्न सिन्हा, बिहार के लिए क्या किया हैं, सभी जानते हैं। जब फिल्म स्टार था, जब उसकी चलती थी तो बोला था कि वो बिहार के लोगों के लिए कुछ करना चाहता हैं, कैंसर हास्पिटल खोलने की बात करता था, पर सच्चाई ये हैं कि इसने बिहार के लोगों को सपना तो दिखाया, पर उसने सपने पूरे नहीं किये। हां बिहार के लोगों को समय - समय पर धोखा देकर, वह कई बार सांसद जरुर बन गया। जरा इस बोका बिहारी से पूछिये कि वह सांसद रहते हुए, बिहार के लिए क्या किया...पता चलेगा कुछ नहीं, फिलहाल अमिताभ बच्चन को मिल रही इज्जत से वह पागलपन का शिकार हो गया हैं, इसलिए कभी वो याकूब मेनन जैसे आतंकी के पक्ष में तो कभी नीतीश व लालू के पक्ष में अनाप-शनाप बयान दिये जा रहा है, और जिस थाली में खा रहा हैं, उसी में छेद कर रहा हैं। ये हैं बिहारी बाबू का असली चेहरा...यानी बिहारी बाबू बन गये बोकरादी बाबू.........

Monday, November 14, 2011

झारखंड निर्माण के 11 वर्ष -------------------

15 नवम्बर 2000 बिहार के कुछ जिलों को मिलाकर एक नया झारखंड प्रांत उदय ले रहा था। झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में बाबू लाल मरांडी ने शपथ ली थी, प्रथम राज्यपाल बनने का सौभाग्य प्रभात कुमार को मिला था, जबकि विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष बनने जा रहे थे - इंदर सिंह नामधारी। नया प्रांत, नये सपनों के साथ जन्म ले रहा था। इसके पूर्व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद के नेता लालू प्रसाद यादव ने ताल ठोक दी थी कि झारखंड उनके लाश पर बनेगा, पर उनके रहते झारखंड बन चुका था। जब झारखंड जन्म ले रहा था, तो वे रांची में भी थे, पर उनका जादू धीरे धीरे इस इलाके में विलुप्त हो रहा था, या हम कह सकते हैं कि उनका सितारा बुलंदियों से नीचे की ओर सरकना शुरु हुआ था जो आज भी सरकता ही जा रहा हैं। लालू और उऩके जैसे कई नेता ये भी कहते थे कि गर झारखंड बन गया तो बिहार में लालू, बालू और आलू ही दिखाई पड़ेंगे। सच्चाई ये भी हैं कि जब तक मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी रहे, लगता था कि ये कथन सच हो जायेगा, पर जैसे ही उनकी तख्ता, उनसे खार खाये जदयू के नेताओं ने पलटी, झारखंड फिर ठीक से खड़ा नहीं हो सका। जबकि इसके विपरीत बिहार नीतीश कुमार के नेतृत्व में प्रगति के शिखर की ओर बढ़ रहा हैं, ऐसा इसलिए लिखना पड़ रहा हैं कि कुछ पत्र पत्रिकाओं ने नीतीश की कार्य कुशलताओं की प्रशंसा की हैं, लेकिन हमसे गर पूछे तो मुझे नीतीश न कल अच्छे लगे थे और न ही आज। ये अहंकारी पुरुष हैं, ये अलग बात हैं कि इनका कुछ काम ठीक दीखता हैं, पर इनके शासनकाल में भी लॉ एंड आर्डर की वहीं स्थिति हैं जो लालू के काल में थी। अरे जो व्यक्ति बिहार के लोकपर्व छठ पर घाटों की स्थिति नहीं सुधार सकता, जिसके शासनकाल में 24 से अधिक घाटों पर व्रत करने पर प्रतिबंध लगा दिये जाते हो, वो गर कहें कि हम विकास की रास्ते पर हैं, तो बड़ा आश्चर्य लगता हैं। फिर भी जब सब कह रहे हैं, ठीक हैं, तो चलों हम भी कह देते हैं, ठीक हैं, ऐसा कहना वैचारिक दृष्टिकोण से नीतीश के आगे आत्मसमर्पण कर देना होगा, फिर भी बिहार झारखंड के मुकाबले अच्छी स्थिति में हैं, ये मानने में हमें गुरेज नहीं।
हमें याद हैं, जब बिहार से झारखंड अलग हो रहा था, तब उस वक्त मैं पटना स्थित दैनिक जागरण कार्यालय में कार्यरत था और मुझे मोतिहारी की जिम्मेदारी सौपी जा रही थी। उस दिन मुझे झारखंड की राजधानी रांची से निकलनेवाली प्रभात खबर समाचार पत्र खूब याद आयी। वो इसलिए कि प्रभात खबर, अपने समाचार पत्र में कुछ पृष्ठ तो झारखंड के नाम से ही निकालता था। उस वक्त जब कई समाचार पत्र जो रांची से ही प्रकाशित होते थे, झारखंड लिखने से ही परहेज करते थे, पर आज झारखंड शब्द को लिखकर गौरवान्वित हो रहे थे। जिस दिन झारखंड बना, उस दिन तो इस समाचार पत्र ने ऐसे विशेषांक निकाले, जो संग्रहणीय़ थे, पर चूंकि मैं रांची में नहीं था, वो संस्करण मुझे मिले नहीं, जो मेरे मित्र व परिजन रांची में थे, उन्हें कहां था कि वो संजो कर रखे, पर देर से आने का कारण रहा या मित्रों की याददाश्त की कमी, वो संजो कर नहीं रख सकें, पर वो विशेषांक आज तक मुझे नहीं मिले, फिर भी जो लेखकों व अन्य पत्रकारों से जो मुझे संस्मरण मिले, वो बताते कि इस समाचार पत्र ने कितनी मेहनत की थी।
झारखंड बनने के बाद, इस प्रांत में विकास के रास्ते खुले थे, जिस बिहार प्रांत में सड़कें कागजों में ही बन जाती थी, यहां सडकें दिखाई देने लगी। पुल पुलियों को ठीक कराया जाने लगा। स्कूलों में कल्याण विभाग सक्रिय दिखा। लड़कियां सायकिलों पर स्कूल जाने लगी थी। आदिवासी बहुल इलाकों में आदिवासियों के कल्याण के लिए कई कार्यक्रम शुरु किये जाने लगे थे। सरकारी स्कूलों मे बिहार पैटर्न को छोड़ सीबीएसई पैटर्न लागू कर दिया गया। बच्चों को मुफ्त में किताबे मिलने लगी। शिक्षा का स्तर सुधार होता दिखा। जहां बिजली दिखाई नहीं पड़ती थी वो बिजली अब यहां दिखाई पड़ने लगी। उद्योग धंधे खुलने शुरु हुए। कई परियोजनाओं को मूर्तरुप दिया जाने लगा। निजी कंपनियों के साथ एमओयू होने लगे, हालांकि इन एमओयू का विरोध भी हुआ। लेकिन बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में उठी डोमिसाईल की आग ने झारखंड की प्रतिष्ठा में वो आग लगायी कि इस आग से आज भी झारखंड झूलस रहा हैं, हालांकि इस डोमिसाईल की आग को मीडिया ने भी हवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक समाचार पत्र और कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इस प्रकार से इस आंदोलन को हवा दी, जैसे लगा की इस आग से कभी झारखंड उबर नहीं पायेगा, पर खुशी इस बात की हैं कि डोमिसाईल की आग, अब वैसी नहीं, फिर भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रुप में ये जिंदा हैं, और इसका भय झारखंड में बाहर से आकर बसे पुराने व नये लोगों में स्पष्ट दीखता हैं।
बिहार और झारखंड अलग - अलग हैं। आज बिहार प्रगति की ओर हैं पर झारखंड प्रगति से कोसो दूर हैं। उसके कारण स्पष्ट हैं। बिहार में एक नेतृत्व और उसकी सोच साफ दिखाई पड़ती हैं, पर यहां नेतृत्व की कमी और उसकी स्पष्टता साफ दिखाई नहीं देती। बाबू लाल मरांडी के समय लगता था कि एक सोच हैं, स्पष्टता हैं, पर उसके बाद सभी में नेतृत्व करने की क्षमता और स्पष्टता का अभाव दिखता हैं। झारखंड निर्माण के बाद, आज तक झारखंड को अपना विधानसभा, अपना सचिवालय नहीं मिला और न इसे बनाने की जरुरत समझी गयी। खेल के क्षेत्र में ये प्रदेश एक मिसाल कायम कर सकता हैं, हम ये भी कह सकते है कि ये स्टेट स्पोर्टस स्टेट बनने की क्षमता रखता हैं, पर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, राष्ट्रीय खेल का समय तो यहां इस प्रकार से बार बार बदले गये कि इस प्रदेश की प्रतिष्ठा दांव पर लगती चली गयी, ऐसे देखा जाय तो खेल में बिहार झारखंड के आगे कहीं टिकता नजर नहीं आता। नया राज्य बनने के बाद राजधानी रांची को जिस प्रकार नये ढंग से बसाने की बात होनी चाहिए थी, उस पर तो आज तक कोई सुनने को तैयार नहीं, आज भी रांची की सभी सड़कों पर सड़क जाम की स्थिति सामान्य सी घटना होती हैं, यहां एक व्यक्ति को एक किलोमीटर की यात्रा संपन्न करने में एक घंटे लग जाते हैं। ये केवल राजधानी की स्थिति नहीं बल्कि झारखंड के सभी नगरों की हैं। विस्थापन, पलायन और गरीबी इस झारखंड की सबसे बड़ी समस्या हैं पर आजतक किसी ने भी इन समस्याओं को झारखंड से त्राण दिलाने की युक्ति नही निकाली।
नक्सल और झारखंड तो जैसे लगता हैं कि एक दूसरे के लिए ही बने हैं और इस नक्सल की समस्याओं को बढा़ने में, खाद और बीज का काम करते हैं यहां के राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी। राजनीतिज्ञ तो विधानसभा में कुछ और सड़कों पर नक्सलियों के लिए कुछ और बयान देते हैं। उसका मूल कारण हैं कि वो जानते हैं कि नक्सलवाद यहां की मिट्टी में किस प्रकार जड़ समा चुका हैं। कुछ तो मानते हैं कि नक्सलवाद की समस्या, यहां से कभी खत्म ही नहीं होगी, पर मैं ऐसा नहीं मानता। गर राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों में इमानदारी के गुण आ जाये, विकास के रास्ते पर कदम बढ़ा दे, नक्सलियों के साथ कठोरता से पेश आये तो ये नक्सली किस चूहे के बिल में होंगे, पता ही नहीं चलेगा। जब पंजाब से आतंकवाद समाप्त हो सकता हैं। असम समस्या को काबू में किया जा सकता हैं, तो ऩक्सलवाद किस चिड़िया का नाम हैं। सच्चाई ये हैं कि नक्सलवाद बढ़ाने में यहां के राजनीतिज्ञों के दोहरे चरित्र ने ही मुख्य भूमिका निभायी हैं। जब विकास के नाम पर लूट होगी, राजनीतिज्ञ दस पुश्तों के लिए, धन इकट्ठा करने में लगायेंगे, तो फिर नक्सलवाद कैसे नहीं बढ़ेगा। यहां भ्रष्टाचार का आलम ये हैं कि यहां एक पूर्व मुख्यमंत्री और उनके शासनकाल के कई मंत्री होटवार जेल में कैदी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं, ये झारखंड के ऐसे बदनूमा दाग हैं, जो फिलहाल कहीं से भी धूलते नजर नहीं आते। जब - जब भ्रष्टाचार की बात आती हैं - झारखंड सूर्खियों में ही रहता हैं, चाहे वो नरसिंहराव सरकार बचाने की बात हो अथवा झारखंड प्रांत बनने के बाद एक से बढ़कर एक किये गये घोटाले की बात ही क्यों न हो।
आज यहां जो सरकार चल रही हैं - गठबंधन की। वो क्या हैं। वो भी भ्रष्टाचार की ही देन हैं। जो एक दूसरे को फूंटी आंख देखना नहीं पसंद करते, वो सरकार चला रहे हैं। क्यूं चला रहे हैं. क्या किसी को पता नहीं। खुद यहां के मुख्यमंत्री दिल्ली और विदेश की यात्राओं की झड़ी लगा दी हैं। बगल में बिहार हैं, वहां के मुख्यमंत्री तो लगता हैं कि इतनी दिल्ली यात्रा भी नहीं की होगी, जितना की यहां के मुख्यमंत्री ने एक साल में विदेश की यात्रा कर ली हैं। इसी से पता लग जाता हैं कि कौन अपने प्रांत के लिए क्या कर रहा हैं। यहीं नहीं जरा इस एक साल में देखिये -- एक ओर बिहार में सेवा का अधिकार लागू हो चुका हैं, वहीं झारखंड में सरकार ने घोषणा तो कर दी पर ये सेवा का अधिकार कब लागू होगा, इसका अभी सगुन ही देखा जा रहा हैं, ऐसे में हमें नहीं लगता कि इस 11 वें साल को पूरा कर लेने के बाद भी झारखंड में कोई नयी चीज देखने को मिलेगी, फिर भी निराशावादी से आशावादी होना अच्छा हैं। आशा करेंगे कि क्रिकेट में जैसे धौनी, सौरभ और अब वरुण ने झारखंड में आशा का संचार पैदा किया हैं। राजनीति व प्रशासनिक क्षेत्र में भी कुछ नये चेहरे दिखेंगे जो झारखंड को नयी बुलंदियों तक पहुंचायेंगे, फिलहाल जो पुराने चेहरे हैं, उनसे आशा करना बेमानी होगी, क्योंकि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता हैं। अतीत तो भ्रष्टाचार में गोता लगाता हुआ दिखा हैं, यहीं कारण हैं कि वर्तमान में कुछ हैं ही नहीं, पर देखे आगे क्या होता हैं..............

Thursday, November 25, 2010

चेते लालू, नहीं तो कहीं के नहीं रहेंगे।

रहस्यमय जनादेश बिहार का....!

ये जनादेश बता रही है, कि इस जनादेश में नीतीश की जीत कम एवं लालू, रामविलास और कांग्रेस की करारी हार ज्यादा हैं। गर इस जनादेश के माध्यम से भी लालू, रामविलास और कांग्रेस के राहुल नहीं चेते, तो ये सब आनेवाले समय में कम से कम बिहार में तो समाप्त ही हो जायेंगे। और बिहार से समाप्त होने का मतलब आनेवाले समय में देश की संपूर्ण राजनीति से भी समाप्त हो जाना हैं, ये बातें इन्हें नहीं भूलना चाहिए।
सबसे पहले लालू की बात ----
लालू जी ने जब 1990 में बिहार की पहली बार सत्ता संभाली तो ये सत्ता मिलते ही ऐसे बौराये कि पूछिये मत। अजब गजब के निर्णय, हर किसी को गाली और अपने आगे किसी को नहीं लगाना, मसखरी करना, खुद के लिए लालू चालीसा लिखवाना, अपनी गुणगान कराना इनके रोज का शौक बन गया। मैं, उस लालू की बात कर रहा हूं, जिस लालू के बारे में उस वक्त बिहार की जनता एक भी शब्द नहीं सुनना चाहती थी, और गर किसी ने भूल से भी लालू के बारे में बोला तो उसके बुखार छुड़ा देती थी। यानी इतना शक्तिशाली बिहार का नायक लालू, आज श्रीहीन हैं, आज का लालू सत्ता तो दूर एक एक सीट के लिए तरस रहा है और जनता उसके बारे में कुछ बात करने से भी परहेज करती हैं। शायद उस वक्त सत्ता के मद में लालू प्रसाद श्रीरामचरितमानस की चौपाई वो भूल गये थे कि
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें।।
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहु धन खल इतराई।।
फिर भी लालू अब सुधरेंगे, कल सुधरेंगे, ऐसा मानते हुए यहां की जनता ने एक नहीं तीन – तीन बार सत्ता सौंपा, पर बिहार की जनता को मिला क्या। इस व्यक्ति ने सत्ता प्राप्त कर ऐसा चक्कर चलाया कि इसी चक्कर में, इनका पूरा परिवार और ससुराल सत्ता का सुख भोगा, पन्द्रह वर्षों तक ये बिहार का भाग्य विधाता, अपने परिवार का भाग्य विधाता बनकर, सत्ता का परमसुख लेता रहा और बिहार की जनता गरीबी के बोझ तले, इधर से उधर भटकती रही, इसी दरम्यान देश के कुछ प्रांतों के लोग बिहारियों को हीन नजरों से देखकर उस पर लात घूंसों का बौछार करने से नहीं चूके। कमाल हैं बिहारी दूसरे प्रांतों में लात जूते खा रहे थे और इधर इनका ज्यादा समय पटना के गांधी मैदान में जातीयता रैली करने, और उसकी अध्यक्षता करने में जाता, यहीं नहीं गरीब रैला, लाठी पिलावन रैला, तेल पिलावन रैला, यहीं करके खुद को आनन्दित करने में यह व्यक्ति मजा लेता रहा और लोग अपने आप को कोसते रहते। यहीं नहीं इस व्यक्ति को विदेश जाने का भी मौका मिला तब विदेश में भी उसने अपने हाव भाव से बिहार के लोगों की वो तस्वीर पेश की, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं। कमाल हैं बिहार की राजनीति में आज तक कोई ऐसा व्यक्ति अथवा राजनीतिज्ञ नहीं हुआ, जिसने सत्ता के मद में आकर, अपने परिवार और ससुरालवालों की इतनी आवभगत की हो या मसखरी करते हुए खुद सत्ता में नहीं है, तो अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया हो। क्या इन्हें बिहार की जनता ने इसीलिए सत्ता सौंपी थी।
बिहार को किसी भी कीमत पर नहीं बांटने की बात करनेवाले इस व्यक्ति को जैसे ही बिहार में कम सीटें मिली, इसने बिहार को बांटने का सहर्ष निर्णय ले लिया। कभी इसने कहा कि ये शाकाहारी हो गये, और कभी कहा कि भगवान उनके सपने में आये और कहा कि मांसाहारी हो जा, और वे मांसाहारी हो गये।
इस व्यक्ति के शासनकाल में महिलाएं, रात तो दूर, सायंकाल में घर से निकलना पसंद नहीं करती थी। अपहरण उद्योग तो इनके शासनकाल में ऐसा फैला कि पूछिये मत और भ्रष्टाचार का तो कहना ही नहीं। इस भ्रष्टाचार में तो खुद ऐसे पारंगत हैं कि इन्हें इसकी पाठशाला खोल देनी चाहिए ताकि लोग भ्रष्टाचार का प्रशिक्षण लेकर, देश का सत्यानाश कर सके। ये वो व्यक्ति हैं जो कहता हैं कि वो संपूर्ण क्रांति के आंदोलन का प्रोडक्ट है गर ऐसा व्यक्ति संपूर्ण क्रांति के आंदोलन का प्रोडक्ट हैं तो मुझे उस संपूर्ण क्रांति आंदोलन पर ही शक हो जाता है। पर लोकनायक जयप्रकाश के आंदोलन पर शक मैं सपने में भी नहीं कर सकता, क्योंकि इसी आंदोलन के प्रोडक्ट कई ऐसे लोग मिले हैं, जो सचमुच में संपूर्ण क्रांति के भाव को जन जन तक पहुंचा रहे हैं। याद करिये, लालू प्रसाद को, कभी ये खुद को किंग मेकर कहा करते थे, पर एक मामूली रेल मंत्रालय लेने के लिए ऐसा जिच किये कि सोनिया ने मनमोहन सिंह से कहा कि लालू को रेल वे दे दें ताकि ये रेल से खेल सकें, जैसा कि एक छोटा सा बच्चा अपनी मां से रेलरुपी खिलौने लेने की जिद कर बैठता हैं। क्या एक किंग मेकर, खुद के लिए ऐसा जिच कर सकता हैं और जो ऐसा जिच करता हैं वो कभी किंग मेकर हो सकता हैं। किंग मेकर क्या होता हैं, लालू को कम से कम सोनिया गांधी से सीखना चाहिए, पर इन्हें मसखरी करने से फुर्सत हो तब न, कुछ सीखेंगे। हर बार ये कहना कि उन्होंने गरीबों, मजलूमों को आवाज दी, जैसे लगता है कि गर ये न होते तो कभी गरीबों और मजलूमों को आवाज ही नहीं मिलती। जरा लालू जी जाकर उन गांवों में देखे कि उनके नाम पर, उनकी जाति के लोगों ने किस प्रकार से आंतक मचा कर लोगों को जीना मुहाल कर दिया, कैसे अल्पसंख्यकों की कब्रिस्तान की जमीन तक इनके लोगों ने कब्जा कर लिया है। आज ही एक चैनल ने दिखाया कि एक पटना के रिक्शेवाले ने कैसे अपनी दुख भरी कहानी सुना दी कि लालू के शासनकाल में जब वो रिक्शावाला सुबह से शाम तक रिक्शे खींचता, पैसे कमाता तो उसके पैसे को अपराधी कैसे, घर जाने के क्रम में लूट लिया करते, पर नीतीश के शासन में अब उसके साथ ऐसा नहीं होता। क्या रिक्शावाला का ये बयां, लालू के दिमाग में नहीं घूसता। कि वो क्या कहना चाहता है।
आज जब एनडीए को तीन चौथाई बहुमत मिला है, तो इस बहुमत को भी नहीं पचाना और इस पर ये टिप्पणी करना कि इसमें रहस्य हैं, ये लालू प्रसाद जैसे लोग ही बयान दे सकते हैं, जबकि दूसरे नेता तो ऐसे मौके पर अपने प्रतिद्वंदियों के घर जाकर, उसे अपनी शुभकामना देते है पर लालू प्रसाद से ऐसी परिकल्पना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं।
जरा रामविलास पासवान को देखिये कल तक मुख्यमंत्री मुस्लिम हो, इसकी बात करनेवाला ये शख्स ऐन मौके पर ये बयान ही भूल गया और चल पड़ा अपने परिवार को मजबूत करने के लिए। कल तक कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगानेवाले ये दोनो शख्स खुद ही परिवार के आगे कुछ सोचना भी नहीं चाहता, क्या ऐसे लोगों को बिहार की जनता से वोट मांगने का हक भी हैं, और जब जनता ने अपना फैसला सुना दिया तो उस फैसले पर रहस्य पैदा करनेवाले ये कौन होते हैं। क्या ऐसा कहकर वे जनता का अपमान नहीं कर रहे।
रही बात राहुल की तो उन्हें ये जान लेना चाहिए कि ये उत्तर प्रदेश अथवा महाराष्ट्र नहीं हैं कि उनका जादू चल जायेगा, ये खांटी कर्मयोगियों की भूमि हैं, बिहार हैं, यहां एक्टिंग नहीं चलती, यहां के लोगों को जमीन से जूड़ा हुआ नेता चाहिए, इसलिए पहले वे बिहार के बारे में जानें, तब बिहार में आकर बात करें। कल तक विदेश में अपना सारा समय गंवानेवाले राहुल बिहार को क्या जानेंगे। ऐसे भी कहावत हैं, बांझ का जाने प्रसव का पीड़ा। बिहार और बिहार के लोगों की पीड़ा राहुल क्या जानेंगे। कम समय में जिस प्रकार से उन्होंने बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाही और जो करतब दिखायें, वो तो बिहारवासियों ने जनादेश के माध्यम से उन्हें बता दिया। शायद राहुल समझ लिये थे कि बिहार के लोग लालू जैसे होते हैं, और जैसे लालू को उन्होंने अपने कब्जें में कर लिय़ा, उसी प्रकार बिहार के लोगों के मतों पर भी कब्जा कर लेंगे, तभी तो उन्होंने साधु यादव, पप्पू यादव की पत्नी और आनन्द मोहन की पत्नी को कांग्रेस से टिकट देकर, अपनी बुद्धिमता का परिचय दे दिया और जब जनता की बारी आयी तो जनता ने इनकी सारी बुद्धिमता पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया, ये कहकर कि उन्हें न तो लालू चाहिए और न ही लालू के पदचिन्हों पर चलनेवाले पूर्व के नेता अथवा उनकी पत्नियों से उपकृत होनेवाली पार्टी।
जनता ने पहली बार, ऐसा जनादेश दिया हैं कि लोगों को बिहारी होने पर गर्व महसूस हो रहा हैं। सारे के सारे जातीय समीकरण ही ध्वस्त हो गये। नेताओं की पत्नियां और उनके परिवार के अन्य लोग हार का मुंह देखे हैं। चारों और एक ही बात की चर्चा का, हमें विकास चाहिए, बिहार का स्वाभिमान चाहिए और जो बिहार का स्वाभिमान लौटायेगा, हम उसके साथ होंगे। हम ऐसा नहीं मानते कि नीतीश ने पूरे बिहार में क्रांति ला दी हैं, पर इतना तो जरुर हैं कि नीतीश के शासनकाल में कानून व्यवस्था ठीक हुई हैं, महिलाओं को उनका अधिकार मिला हैं, लड़कियों में कोई भेदभाव नहीं हुआ हैं, चाहे वो कोई हो, माध्यमिक शिक्षा से जूड़ी बालिकाओं को साईकिल थमा दी गयी कि वे इससे जहां जाये, जायें, लेकिन पढ़े। सड़कों और आधारभूत संरचनाओं को ठीक किया। अपराधी चाहे वे किसी भी पार्टी के हो, उन्हें जेल का रास्ता दिखाया। लोगों में विश्वास जगाया कि हां राज्य में कोई शासन हैं, पर पहले के पन्द्रह सालों में कहीं कुछ दिखा ही नहीं। लालू के पन्द्रह सालों में तो अखबारों और मीडिया में लालू और लालू से संबंधित ही चीजें दिखाई पड़ती थी, चाहे वो लालू के जानवर ही क्यूं न हो, पर आज वैसी बातें नहीं दिखाई देती। आज बिहार और बिहार का युवा, कहता हैं कि वो मसखरे के राज्य का नहीं हैं, बल्कि सपने देखनेवाले राज्य का युवा हैं, जो अन्य राज्यों की तरह विकास के पथ पर चल पड़ा हैं। लेकिन नीतीश के लिए भी कुछ बातें, उन्हें भी जवाब देना होगा, ऐसा नहीं कि उनकी गलतियों पर जनता का ध्यान नहीं हैं, उन्होंने किस प्रकार इस चुनाव में मीडिया मैनेजमेंट किया और अपनी गुणगान करायीं, ये भी किसी से छुपा नहीं हैं, उदाहरण अनेक हैं, पर इतना तो तय हैं कि नीतीश के गुनाह, फिलहाल लालू, रामविलास और राहुल के गुनाहों से बहुत ही कम हैं। शायद यहीं कारण हैं कि गुनाहगारों में जो कम गुनाहगार था, जनता ने उसे अपना बहुमत दे दिया कि वो पांच साल तक, एक बेहतर बिहार बनाने की दिशा में काम करें, रही बात भाजपा की, तो वो नीतीश के पीछे पीछे चलते रहे, कुछ न कुछ, उसको इसका लाभ मिलता ही रहेगा। क्योंकि भाजपा, कांग्रेस के पदचिन्हों पर चल रही हैं, गर ये सुधर गयी तो ठीक है, नहीं तो इसका भी कांग्रेस जैसा हाल होना तय है।

Friday, October 29, 2010

बिहार विधानसभा चुनाव में विकास नहीं, जातीयता हावी…।


संदर्भ विधानसभा चुनाव 2010...!


जैसे जैसे बिहार का चुनाव अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा हैं, वैसे वैसे लालू और नीतीश की सरकार बनानेवालों की दिलों की धड़कन बढ़ती जा रही हैं। हालांकि कमोवेश सभी ने ये माना है कि बिहार में एनडीए यानी नीतीश की सरकार बननी तय है और इसके लिए उन्होंने कई कारण गिनाये है। पटना से प्रकाशित कई समाचार पत्रों तथा दिल्ली से बिहार प्रवास पर गये कई पत्रकारों ने भी इसकी पुष्टि कर दी है। साथ ही कई समाचार चैनलों ने चुनाव विश्लेषन के माध्यम से ये बताने की कोशिश की है कि नीतीश को एक बार फिर बिहार की जनता सिरमौर बनाना चाहती है।
पर अब तक बिहार में तीन चरण के चुनाव संपन्न हो चुके है। और इन क्षेत्रों से जो चुनाव परिणाम आ रहे है वे न तो नीतीश को खुश करनेवाले हैं और न लालू को दुखी करनेवाले है। हां इतना तय है कि कांटे का मुकाबला है। जब पूर्णिया में चुनाव संपन्न हुआ तब हमने वहां के जमीन से जूड़े पत्रकारों से बातचीत की, तब उनका कहना था कि मतदान के पूर्व नीतीश के पक्ष में एक लहर सी देखी गयी थी, ज्यादातर मतदाता विकास को प्राथमिकता देते हुए नीतीश को एक बार फिर सत्ता सौंपने की बात कह रहे थे, पर जैसे ही मतदान का दिन आया, ये मतदाता जातियों और संप्रदायों में विभक्त होते नजर आये, और उन्होंने वोट उसी को दिया, जो उनकी जाति और संप्रदाय को रास आया, यानी यादव और मुस्लिम ने एनडीए को नकार दिया।
यहीं बात रक्सौल के हमारे पत्रकार मित्र ने बतायी। यानी जाति और संप्रदाय से अभी तक बिहार के मतदाता उपर नहीं उठ पाये है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर ठीक ही कहा करते थे, कि भला बिहार में विकास से कहीं वोट मिलते है, वोट मिलने के दूसरे कारण होते है, गर वर्तमान की देखे तो आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू ने अपने प्रदेश में विकास की गंगा बहायी थी। पर आंध्र प्रदेश की जनता ने क्या किया, उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। ऐसे भी लोग कहते है और बताते है कि जो लोग अच्छा काम करते हैं, उनका अंत बड़ा दुखद होता है। जैसे महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश स्वतंत्र हुआ। महात्मा गांधी ने इसकी कीमत भी नहीं वसूली, जबकि कई नेताओं ने आजादी के बाद इसकी कीमत वसूली, पर गांधी को मिला क्या, गोली। इसी प्रकार ईसा मसीह को लोगों ने सूली पर लटका दिया। ऐसे कई प्रमाण मौजूद है। जो बताते है कि सत्य के मार्ग पर चलने पर कठिनाईयां ही कठिनाईयां हैं। गर आप सत्य और सेवा की मार्ग पर चलने का प्रण लिया हैं तो स्वर्ग की कामना ही बंद कर दीजिये, पर इसका मतलब ये भी नहीं की हम अच्छा काम करना बंद कर दे।
बिहार के साथ विडम्बना रही हैं कि जब कभी वहां शक्तिशाली नेता उभरा तो उसने राज्य के समग्र विकास पर ध्यान कम और अपने परिवार को सशक्त बनाने, उसके लिए सात पुश्तों तक किसी चीज की कमी न हो, इसका जुगाड़ बिठाने में ज्यादा ध्यान दिया। यहीं नहीं गांधी और लोकनायक के नाम पर राजनीति करनेवालों ने समय आने पर अपनी पत्नी तक को सत्ता सौंप दिया और अब बेटे को आगे कर वे राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें फिलहाल नीतीश को छोड़, रामविलास और लालू ने बड़ी तेजी से कदम बढ़ायी है। रामविलास जी के तो क्या कहने, ये तो भाजपा को सांप्रदायिक बोलते अघाते नहीं, और कभी भाजपा के ही गोद में बैठ कर सत्ता का सुख भी लिये थे, शायद ये भूल गये है। ये वहीं नेता है जो बिहार चुनाव के पहले राज्य में मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश करने का ड्रामा करते थे, पर आज उपमुख्यमंत्री अपने परिवार से बनाना चाहते हैं। अब बात उठती हैं कि जो व्यक्ति उपमुख्यमंत्री का पद एक मुस्लिम को नहीं दे सकता, वो व्यक्ति राज्य का बागडोर मुस्लिम को कैसे सौंप सकता है। इनके इस ड्रामे से तो लगता हैं कि जब इनकी बहुमत आयेगी, जो कभी संभव नहीं हैं, तो ये खुद ही मुख्यमंत्री बनने के लिए कदम बढ़ा देंगे।
ये हैं हमारे बिहार के कुछ नेताओं का वर्तमान चरित्र, जो बिहार को बुलंदियों तक ले जाने की बात करते है। ये जयप्रकाश आंदोलन के समय संपूर्ण क्रांति की बात करते थे, पर आज अपने परिवारों को सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर ले जाने के लिए क्रांति की बात करते हैं, क्या ऐसे लोगों के सत्ता में आने से बिहार आगे बढ़ पायेगा, निर्णय तो जनता को लेना हैं और जनता ने क्या निर्णय लिया ये तो चुनाव परिणाम आयेगा, तभी पता चलेगा। फिर भी आशा रखनी चाहिए कि आने वाले बचे हुए विधानसभा सीटों की जनता एक बेहतर सरकार बनाने के पक्ष में मतदान कर, बिहार को आगे बढ़ाने में विशेष रुचि दिखायेगी।

Tuesday, October 26, 2010

और जुबान फिसली.......................!

संदर्भ बिहार विधानसभा चुनाव 2010...
बिहार विधानसभा चुनाव का अंतिम चरण जैसे जैसे नजदीक आता जा रहा है। नेताओं की जुबां फिसलती जा रही है। खासकर जदयू के नेता अति उत्साहित है, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि बस विधानसभा चुनाव मात्र औपचारिकता मात्र है। जनता तो पहले से ही दुबारा नीतीश को सत्ता में बैठाने को बेकरार है। पर उन्हें नहीं मालूम कि, सब कुछ ठीक रहने के बावजूद जब भोजन में नमक बेमन से पड़ जाये तो भोजन खानेलायक नहीं रह जाता। इसलिए जदयू और भाजपा को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ज्यादातर चुनावी सर्वेक्षण और पत्रकारों के कलम उन्हीं की जय बोल रहे हैं, पर इसमें सच्चाई क्या हैं ये तो चुनाव परिणाम के बाद ही पता चलेगा।
रही बात जुबान फिसलने की, ये कोई नयी बात नहीं हैं, जब आदमी अतिउत्साहित अथवा अति निराश हो जाता है तो उसके मुख से ऐसी भाषाएं या शब्द निकल ही जाते है जो उनके विरोधियों समेत सज्जनों को अच्छी नहीं लगती। राजद के नेता लालू प्रसाद यादव हो या रावड़ी देवी अथवा फिलहाल दूसरे पार्टी में चले गये इन्हीं के रिश्तेदार, सभी जुबान फिसलने के लिए जाने जाते हैं, कुछ के तो केस जुबान फिसलने के कारण ही अभी न्यायालय की शोभा बढ़ा रहे है। अभी जदयू और एनडीए के बड़े नेता शरद यादव सुर्खियों में है – उन्होंने एक चुनावी सभा में राहुल को गंगा नदी में फेंक देने की बात कह डाली। जबकि रांची में भाजपा नेता हरेन्द्र प्रताप कहते हैं कि यूपीए के नेता जिस प्रकार से एनडीए के खिलाफ विषवमन कर रहे है, ऐसे में कोई भी होगा, उग्र हो ही जायेगा।
सचमुच किसी भी बड़े अथवा छोटे नेता व कार्यकर्ता को इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना लोकतंत्र में गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य ही कहा जायेगा और इस प्रकार की भाषा प्रयोग करनेवाले की कड़ी आलोचना होनी ही चाहिए। पर शरद यादव ने बहुत जल्द ही इस प्रकार के बयान से अपने आपको अलग कर लिया, इसके लिए उन्हें साधुवाद। पर कुछ बात कांग्रेसियों से भी, जो इस मुददे को हवा देते हुए, बात चुनाव आयोग तक ले जाने की बात करते हैं, क्या वे बता सकते हैं कि उन्हीं के राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना राष्ट्रद्रोही संगठन सिमी से कर डाली अथवा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के जो बयान आरएसएस पर आये हैं, उसे क्या कहा जायेगा, क्या आरएसएस के खिलाफ उनके दिये गये बयान गैरजिम्मेदाराना नहीं। खासकर उस आरएसएस पर जिसके बारे में खुद उन्हीं के पार्टी के बड़े दिवंगत नेता प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री और महात्मा गांधी तक प्रशंसा कर चुके है। आगे चलकर बाबा साहेब अम्बेडकर, पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन, लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी आरएसएस के कार्यों की भूरिभूरि प्रशंसा की है। "पूर्व राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन ने तो आरएसएस के बारे में कहा था कि आरएसएस पर मुसलमानों के प्रति हिंसा और घृणा फैलाने के आरोप सर्वथा झूठे हैं। मुसलमानों को आरएसएस से परस्पर प्रेम सहयोग और संगठन की शिक्षा लेनी चाहिए।" क्या राहुल बता सकते हैं कि संघ से घनिष्ठ संबंध और प्रचारक तक रह चुके पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी क्या सिमी से जूड़े है। जिस संगठन के बारे में राहुल ने बचकाना बयान दे डाला और जब इन कांग्रेसी नेताओं के पास आरएसएस के खिलाफ ठोस सबूत है तो फिर ये कर क्या रहे हैं, उनकी सरकार है, जल्द से ठोस निर्णय ले, देश से बड़ा कोई संगठन नहीं होता, पर गैर जिम्मेदाराना वक्तव्य देकर देश की जनता के समक्ष बार बार आरएसएस के खिलाफ बयान देना और उसकी तुलना राष्ट्रद्रोहियों से कर देना, क्या शर्मनाक नहीं।
सच्चाई तो ये हैं कि वर्तमान में किसी भी पार्टी के नेताओं व कार्यकर्ताओं के जुबान पर कंट्रोल नहीं है, जिसे देखिये बक बक कर रहा है, और पतली गली से निकल जा रहा है, बाद में अपनी बयान पर चिंतन भी नहीं करता, कि उसने जो आज भाषण अथवा बयान दिया, वो सही है अथवा गलत। क्या ऐसे में लोकतंत्र मजबूत होगा। क्या इन्हें ये दोहा पढ़ने की जरुरत नहीं --------
बोली एक अमोल है, जो कोई बोले जानी।
हिये तराजू तौलि के तब मुख बाहर आनी।।

सुभाषित तो कहता है --------
वचने किम दरिद्रता ---- अर्थात् बोलने में दरिद्रता कैसी। आखिर ये नेता कब अपनी वाणी पर नियंत्रण रखेंगे।