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Thursday, March 30, 2017

इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है.........

वह होली मनाता है...
वह दीपावली मनाता है...
वह रक्षाबंधन पर्व मनाता है...
वह दुर्गापूजा, रामनवमी, जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि का पर्व मनाता है...
वह भारत में स्थित तीर्थस्थानों का परिभ्रमण करता है...
वह गौ को पूजता है...
वह नदियों को पूजता है...
वह पहाड़ों को पूजता है...
वह पेड़ों को पूजता है...
इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है...
भारत में रह रहे ऐसे बहुसंख्यक हिन्दु समुदाय को – बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों का दल जाहिल और मूर्ख समझता है, इसलिए हिन्दू विरोधी आलेखों एवं समाचार प्रसारण ही इनका मुख्य केन्द्र बिन्दु बनता जा रहा है। ये लोग अन्य धर्मों में व्याप्त अँधविश्वास एवं रुढ़िवाद को अपने यहां चर्चा का केन्द्र बिन्दू नहीं बनाते। उसका मुख्य कारण है -  भारतीयों और हिन्दूओं को पूरे विश्व के सामने आले दर्जें का मूर्ख और जाहिल बताना... ...साथ ही वे ये भी जानते है कि अगर वे हिन्दूओं को छोड़कर अन्य धर्मों के खिलाफ कुछ लिखेंगे या चलायेंगे तो उनकी दुकान बंद होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी, चूंकि हिन्दू सहिष्णु होते है और हिन्दूओं के अंदर ही एक वर्ग ऐसा भी होता है, जो गाली देने से लेकर स्वयं गाली सुनने में भी आनन्द की प्राप्ति करता है, ये चैनल और अखबारवालों ने ऐसे लोगों के संरक्षण में अपना काम करना शुरु कर दिया है।
इन दिनों जब से भाजपा का देश में प्रादुर्भाव हुआ और विभिन्न राज्यों में भाजपा एक सशक्त दल के रुप में उभरी, तब से लेकर आज तक इनके पेट में दर्द इस प्रकार बढ़ा है कि पागलों की तरह ये अकबका रहे है, नाना प्रकार की झूठी-अतार्किक कार्टूनों-समाचारों-फिल्मों का निर्माण कर एक दूसरे के यहां छापने- दिखाने का दौर इनके यहां चल पड़ा है। आजकल तो ये इतने गुस्से में है कि वे भारतीय मतदाताओं को भी उलटा-सीधा बोल रहे है, उन्हें सांप्रदायिक बता रहे है...
भारतीय मतदाताओं को सांप्रदायिकता की तराजू में तौलनेवाले, पैसा और पद को ही एकमात्र अपना जीवन का अंग समझनेवाले इन मूर्खों का दल फिलहाल भारत के सम्मान के साथ खेल रहा है। ये लोग परिचर्चा का विषय कुछ अलग भी रखेंगे, फिर भी ये ले-देकर हिन्दू-भाजपा पर ही आ खड़ें होंगे। जिससे भारतीय जनता में इनके खिलाफ नाराजगी का बोध साफ दिखाई पड़ रहा है, शायद यहीं कारण है कि इनकी घटियास्तर की मनोवृत्ति से आजिज होकर भारत के मतदाता भी जोर-शोर से भाजपा के पक्ष में खड़े हो रहे हैं...
स्थिति ऐसी है कि अब तो जनता भी इनके खिलाफ लोहा ले रही है, पर बेशर्मों को शर्म नहीं। याद करिये नवरात्र का समय भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अमरीका दौरा। एक पत्रकार राजदीप सरदेसाई, अमेरिका में कैसे भारतीयों के खिलाफ अनाप-शनाप बक रहा था, जिससे गुस्से में आकर वहां के अमेरिकन भारतीय मूल के नागरिकों ने मिलकर उसे उसी समय छट्ठी रात का दूध याद दिला दिया। पत्रकारिता का मतलब या आपके पास अवैध ढंग से पैसे आ गये तो इसका मतलब ये नहीं कि आप भारतीयों को गाली दें, आप उन्हें नीच दिखाये, आप नैतिक मूल्यों को जीवन में प्रतिष्ठित करनेवाले भारत के गर्भ से निकली महाकाव्यों-ग्रंथों को गालियों से सीचें। एक बात जान लीजिये, ऐसे भी अब पहलेवाली बात नहीं रही, कि आप जो बोलेंगे और जनता आपके साथ हो लेगी, जनता आप सब को जवाब दे रही है, पर आप सुधरने का नाम नही ले रहे, वो कहते है न कि रस्सी जल गया पर बल नहीं गया...
आप अपना काम करते रहिये, भारतीयों का दल अपनी गति से चलेगा, भारत अपनी गति से चलेगा... क्योंकि भारतीय जानते है कि उन्हें करना क्या है? आपके विधवा प्रलाप का कोई असर इन भारतीयों पर पड़ने नहीं जा रहा...  अब आप स्वयं आकलन करिये कि जाहिल कौन है? जिन्हें आप जाहिल बता रहे है वे या स्वयं आप, समझे बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों...

Tuesday, March 21, 2017

उत्तर प्रदेश की जनता का अपमान बर्दाश्तयोग्य नहींं...........

उत्तर प्रदेश की जनता का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं हैं...
जी हां, उत्तर प्रदेश की जनता का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं है, चाहे वह देशी मीडिया हो या विदेशी मीडिया। जब से उत्तर प्रदेश की जनता ने भाजपा को जनादेश दिया है, तथाकथित स्वयं को सेक्युलर कहनेवाले लोग और मीडिया उत्तर प्रदेश की जनता को अपमानित करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। वर्षों पहले यहीं जनता बसपा को सत्ता सौंपी, फिर समाजवादी पार्टी को सत्ता सौंपी तो यह सांप्रदायिक नहीं थी, और जैसे ही भाजपा को सत्ता सौंपी तो ये सांप्रदायिकता की जीत हो गयी। कमाल तो यह भी है कि ट्रम्प को माथे पर चढ़ाकर घुमानेवाली अमरीकी जनता के खिलाफ, विदेशी मीडिया के सुर नहीं सुनने को मिलते पर भारत की बात हो तो देखिये, स्वयं भारतीय कहलानेवाले लोग भी विदेशी मीडिया के सुर में सुर मिलाते हुए भारतीय लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते है। इन दिनों देशी - विदेशी मीडिया में उत्तर प्रदेश छाया हुआ है। उन मीडिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खुब आलोचना हो रही है, जबकि उन्हें मालूम होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा सांप्रदायिक क्यों न हो? उसे भारतीय संविधान के अंतर्गत ही भारतीय जनता की सेवा करनी है, ऐसा नही कि वह अपने मन से जो चाहे, जो कर देगा, जैसा कि विदेशों में देखने को मिलता है।
आज अमरीका में भारतीयों की क्या स्थिति है? वहां चून-चून कर भारतीय मारे जा रहे है, आखिर क्यों? ये भारतीय अमरीकियों के शिकार क्यों हो रहे है, जाहिर सी बात है कि इस्लाम के नाम पर, इन भारतीयों को शिकार बनाया जा रहा है, जबकि मरनेवाले भारतीयों में कोई भी इस्लाम को माननेवाला नहीं था।
ये तो वहीं बात हो गयी, चलनी दूसे सुप के जिन्हें बहत्तर छेद। सारी दुनिया अभी सर्वाधिक किसी से डरी हुई है तो वह है इस्लाम, जबकि मैं स्वयं जानता हूं कि इस्लाम एक शांतिप्रिय धर्म है, पर हो क्या रहा है, इस्लाम माननेवालों में कुछ लोगों के अंदर ऐसी कट्टरता आ गयी है कि उन्हें लगता है कि उनके धर्म से बड़ा दूसरा कोई धर्म ही नहीं, इसलिये इस्लाम के आगे किसी अन्य धर्म को रहने की आवश्यकता ही नहीं और इसी कट्टरता की आड़ में खून-खराबा का वह दौड़ चल पड़ा है कि जिससे मानवता ही कांप उठी है।
मैं भारत में ही देख रहा हूं कि इस्लाम माननेवालों में से कुछ मुट्ठी भर लोग भारत में भाजपा के लिए खाद – बीज का काम करते है, ये कौन है?  किसे नहीं पता।आप भारत में रहकर एक धर्म में फल-फूल रही सांप्रदायिकता को बढ़ावा दोगे और दूसरे धर्म को गाली दोगे तो यह नहीं चलेगा। मैं पूछता हूं कि
क. ओवैसी बंधुओं को किसने बढ़ावा दिया? जो धमकी देता है कि नरेन्द्र मोदी को हैदराबाद में घुसने नहीं देंगे, और जब हैदराबाद में नरेन्द्र मोदी घुसे तो उनकी सारी हेकड़ी निकल गयी। आपको याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के पूर्व नरेन्द्र मोदी हैदराबाद पहुंचे, जहां लोगों ने टिकट खरीदकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण सुना। यहीं नहीं इसी ओवैसी बंधुओं ने भगवान राम और हिन्दुओं के प्रति ऐसी-ऐसी नफरत फैलानेवाली बाते एक सभा में कहीं और उस सभा में मौजूद लोगों ने तालियां बजा-बजाकर उसका उत्साहवर्द्धन किया। क्या कोई बता सकता है कि इसकी निंदा किसने-किसने की?
ख. उत्तर प्रदेश के ही सहारनपुर का एक कांग्रेसी मुस्लिम नेता नरेन्द्र मोदी को कुट्टी-कुट्टी काटकर फेंक देने की बात करता है, कोई बता सकता है कि इसकी निंदा किसने-किसने की?
ग.  हाल ही में बिहार के एक मुस्लिम मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चित्र को जूते से पीटवाता है, वह भी अपने सामने। क्या कोई बता सकता है कि इसकी निंदा किसने-किसने की?
घ. ममता बनर्जी शासित बंगाल के हावड़ा में क्या हुआ? जिस स्कूल में पिछले 70 सालों से सरस्वती पूजा मनाई जा रही थी, वहां इस्लामिक गुंडों के कहने पर सरकार ने सरस्वती पूजा पर रोक लगा दी, हिन्दू छात्राओं पर बंगाल पुलिस ने बल प्रयोग किया।
ऐसे कई प्रमाण है, जो समाज को विघटन के कगार पर ले जा रहे है...
जरा देखिये, ओवैसी को, जो कहता है कि वंदे मातरम हम नहीं बोलेंगे, भारत माता की जय नहीं बोलेंगे, क्योंकि यह संविधान में नहीं लिखा है। उस मूर्ख को कौन बताये कि हर बात संविधान में नहीं लिखी जाती, चूंकि गलत बोलने से आदमी लोकप्रिय हो जाता है, वह ऐसी हरकते कर रहा है...
जरा देखिये इसी मुसलमानों में जावेद अख्तर साहब है, जिन्होंने ओवैसी की तीखी आलोचना ही नहीं की, बल्कि संसद में कड़े शब्दों में उसका प्रतिकार किया। ये होता है – मुसलमान।
यहीं नहीं, मैंने प्रख्यात मुस्लिम नेता मदनी साहब के साक्षात्कार को भी देखा है, जिन्होंने पाकिस्तानी पत्रकार का मुंह ही बंद कर दिया, वह भी यह कहकर, कि वे जाकर सबसे पहले अपने देश में देखकर आये कि वहां अल्पसंख्यकों के क्या हाल है? भारत में मुसलमान उनसे बेहतर स्थिति में है, पर हमारी स्थिति क्या है?
यहां के पत्रकारों और मीडिया के हालात क्या है? ऐसे लोगों को यह मीडिया सम्मान नहीं देती और न ही ऐसे लोगों के बयान को अपने अखबारों और चैनलों में जगह देते है, पर जैसे ही जाहिलों के जमात की ओर से जाहिलों वाली बात आ गयी, तो देखिये इनकी रंगत...
मैं तो दावे के साथ कहता हूं कि इस देश में सर्वाधिक नुकसान गर किसी ने पहुंचाया है तो वह हैं...
क. बीबीसी – इसमें ज्यादातर पत्रकार भारत विरोधी है, जिनकी भारत विरोध से सुबह होती है और भारत विरोध पर ही इनकी रात खत्म होती है।
ख. एनडीटीवी एवं एबीपी न्यूज – एनडीटीवी एवं एबीपी न्यूज को भारत विरोधी बयान के लिए ही जाना जाता है, भारत विरोधी और वामपंथियों की पैरवीकार के रुप में यह चैनल सर्वाधिक लोकप्रिय है, इसके संवाददाताओं की भाषा बेहद घटियास्तर की होती है, ये अपने विरोधियों के लिए गाली का भी प्रयोग करते है, पर इसी में एक एनडीटीवी लखनऊ के कमाल खान भी है, जिनकी भाषा और शब्द और पत्रकारिता की जितनी प्रशंसा की जाय कम है।
रही बात विदेशी मीडिया कि जैसे न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, द न्यूज, रायटर्स, गार्जियन की, तो ये केवल यह बताये कि इसने कभी भी भारत की सकारात्मक तस्वीर दुनिया में पेश की है, उत्तर होगा – नहीं। ये तो हमेशा से ही भारत की गलत छवि प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते है। इन जगहों पर काम करनेवाले भारतीय पत्रकारों को उच्चे वेतनमान पर इसलिये रखा जाता है कि ये पैसे के लालच में भारत विरोधी आलेख प्रस्तुत करें।
हाल ही में चीन की सरकारी मीडिया के माध्यम से एक भारतीय ने चीनी सामानों के विरोध पर एक आलेख प्रस्तुत किया, जिसमें भारतीयों के देशभक्ति पर ही सवाल उठा दिये गये। अब आप इसी से समझ लीजिये कि ऐसा देश और विदेश में क्यों हो रहा है? उसका मूल कारण है कि बहुत दिनों के बाद कोई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रुप में आया है, जो सवर्ण नहीं है, पिछड़ा है, जिसने सभी देशद्रोहियों के नाक में दम कर रखा है, उनका जीना दुश्वार कर दिया है, ऐसे में ये लोग करेंगें क्या? बस दिन रात नरेन्द्र मोदी का विरोध और अब योगी का विरोध...
आप करते रहिये विरोध, भारत की जनता, अपना मताधिकार का प्रयोग करना जानती है, जो गलत करेगा, दंडित करेगी, और जो बेहतर करेगा उसे मौका देगी। आपलोग क्यों विधवाओं की तरह अपना छाती पीट रहे है...

Tuesday, November 22, 2016

सचमुच देश बदल रहा है.................

सचमुच देश बदल रहा है...
जो अंधे है, वे देख रहे है...
जो बहरे है, वे सुन रहे है...
जो गूंगे है, वे बोल रहे है...
जो लंगड़े है, वे दौड़ रहे है...
जिनके पास कल तक पैसे नहीं थे...
वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए बैंकों की लाइन को कम नहीं होने दे रहे...
जिनके घर में कल तक शादी नहीं थी, वे शादी का कार्ड छपवा रहे है...
जो कल तक तत्काल टिकट के लिए लाइन में लगा करते थे, वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए दिमाग लगाकर पैसे बटोर रहे है...
जो कल तक खड़े नहीं हो रहे थे, वे घंटो बैंक की लाइन में, एटीएम की लाइन में खड़े होकर मुस्कुरा रहे है...
जो कल तक बीमार ही नहीॆं होते थे, आज वे बीमार भी पड़ रहे है...
भारत में इन दिनों चाहे मौत की वजह कुछ भी क्यों न हो, पर सब आजकल नोटबंदी से ही मर रहे है...
एनडीटीवी, आजतक के चैनलों के संवाददाताओं की फौज को उनके मनपसंद बाइट नहीं मिल रहे, उलटे जनता ही उन्हें निशाने पर ले रही है...
नीतीश नोटबंदी के साथ, तो लालू को मोदी की यह आइडिया फर्जिकल स्ट्राइक लग रही है...
बेइमान आईएएस और आईपीएस की टोलियों के चेहरे मुरझा रहे है...
कुछ तो एक-दो दिन की छुट्टियां लेकर, रूपयों को ठिकाने में लगे है...
दो हजारिये से नीचे बात नहीं करनेवाले डाक्टरों का दल, एक अखबार को बुलवाकर, अपना बयान छपवा रहे है...
कल तक लाल बहादुर शास्त्री के एक इशारे पर, एक बयान पर एक दिन का उपवास करनेवाली भारत की जनता में से आज कुछ देश के वर्तमान प्रधानमंत्री को एक दिन भी देने को तैयार नहीं है...
सीमा पर सैनिक मरें, पर हम देश के भीतर भी अच्छे कार्यों के लिए किसी को एक मौका देने को तैयार नहीं है...
कल तक एक दूसरे को आपस में ही देखनेवाले नेताओं का दल, वर्तमान में एक ही सुर में मोदी के खिलाफ झकझूमर गा रहे है...
सचमुच देश बदल रहा है...

Wednesday, November 16, 2016

मोदी जी, मत झूकिये, इन निर्लज्जों के सामने...........

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, इन निर्लज्जों के आगे मत झूकिये, नोटबंदी जारी रखिये, भारत काला धन नामक कैंसर से स्वयं को मुक्त करना चाहता है और जब तक इस पर कड़े निर्णय नहीं लिये जायेंगे, देश इस भयानक रोग से मुक्त नहीं हो सकता। कमाल है, कल तक जो नेता भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ आंदोलन करते थे, आज आप के द्वारा काला धन के खिलाफ लिये गये निर्णय को ही कटघरे में रख रहे है और काला धन को संरक्षित करने के लिए आंदोलन पर उतारु है। एक नेता जो स्वयं को समाजवादी कहता है, उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री है, काला धन को आर्थिक मंदी से लड़नेवाला हथियार बता रहा है। राहुल गांधी की तो बात ही निराली है, वो क्या बोलता है?, क्या सोचता है?, उसे खुद मालूम नहीं। कल तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आपके द्वारा लिये गये निर्णय को साहसिक बता रहे थे, आज उनके दल आपके खिलाफ विपक्षी दलों के सुर में सुर मिला रहे है। वामपंथी पार्टियों का तो चरित्र ही रहा है कि भाजपा के खिलाफ हर बात पर आंदोलन कर देना, चाहे उसके लिए उसकी पार्टी की हवा ही क्यों न निकल जाये? इधर एक चीज और देखने को मिल रही है। कुछ चैनल और कुछ अखबार इस मुद्दे पर दो भागों में विभक्त हो गये। जीटीवी, एबीपी, इंडिया टीवी को आपके द्वारा चलाया जा रहा यह अभियान देश हित में लग रहा है, पर आजतक और एनडीटीवी जो शुरू से ही आपके विरोधी रहे है, इस अभियान के खिलाफ आग उगलने शुरु कर दिये है।
पर आम जनता की क्या राय है, वो भी देखिये आज तक का सईद अंसारी नोटबंदी पर सोमवार की रात लाइभ समाचार दिखा रहा था, समाचार में वो दिखा रहा था कि जनता को नोटबंदी के बाद से कितनी परेशानी उठानी पड़ रही है, और इसी खरखाई में वह जनता की ओर माइक लगा कर जनता से पूछ डाला, आप इस परेशानी पर क्या कहेंगे?, जनता ने कह डाला – हम मोदी के साथ है, जनता मोदी-मोदी कहकर चिल्लाने लगी, फिर क्या था?, सईद अँसारी और आजतक के होश ही उड़ गये। इसमें कोई दो मत नहीं कि आम जनता को इस नोटबंदी अभियान से परेशानी हुई है, पर जनता इतनी मूर्ख भी नहीं कि इसके अंदर की बात को नहीं जानती और न समझती हो। जनता नरेन्द्र मोदी के साथ है, क्योंकि जनता जानती है कि काला धन ने देश को कितना नुकसान पहुंचाया है? कैसे ये आतंकवादियों और नक्सलियों को मदद पहुंचा रहा है?, कैसे आंतकी कश्मीर के पत्थरबाजों तक ये काला धन पहुंचाते थे?, नकली नोटों के माध्यम से। कैसे जमाखोंरों और भ्रष्ट अधिकारियों का दल काला धन के माध्यम से देश और विदेश में अपना कारोबार फैला रखा था? हमारा मानना है कि देश को आत्मनिर्भर और सम्मान के साथ जीना है तो इस पर अंकुश लगाना ही होगा।
जरा बेशर्म नेताओं को देखिये...एक नेता कहता है कि काला धन पर अंकुश लगना चाहिए, पर समय गलत चूना गया। मैं पूछता हूं कि काला धन पर अंकुश कब लगे?, इसके लिए किसी पंडित के पास जाकर सुदिन देखना था क्या? क्या इससे काला धन रखनेवाले लोग सतर्क नहीं हो जाते? देश में जब भी काला धन पर अंकुश लगाने का निर्णय लिया जाता, समस्याएं आती, और समस्याओं से लड़ने के लिए हमें कुछ त्याग करना होगा, देश हित में। सिर्फ खाने-पीने, सुतने और बेवजह की तिरंगे लहराने को देशभक्ति नहीं कहते।
मैं तो देख रहा हूं कि काला धन पर अंकुश लगाने के निर्णय से राजनीतिज्ञों, व्यापारियों, पत्रकारों, इंजीनियरों, डाक्टरों, आइएएस, आइपीएस, सरकारी बाबूओं और उन सारे दो नंबरियों के नींद उड़ चुके है, वे पैसों को ठिकाने लगाने के लिए नये – नये तरकीब ढूंढ रहे है। जो मजदूर कल तक सब्जी के बोरे ढोते थे, जो सामान ढोते थे, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी तबाह हुआ करती थी, जो तत्काल टिकट की बुकिंग करने के लिए रात से ही लाइन लगाने के लिए रेलवे टिकट बुकिंग काउंटर पर लगे रहते थे, उनसे रुपये बदलवाने का काम लिया जा रहा है, ये लोग बेवजह की एटीएम पर भीड़ लगा रहे है, जिनके कारण 30 प्रतिशत जरुरतमंदों को परेशानी उठानी पड़ रही है, हालांकि इन परेशानियों के बावजूद जनता मोदी की तारीफ करते नहीं थकती।
कल की ही बात है, रात में मैं एबीपी न्यूज देख रहा था, उस न्यूज में साफ दिखलाया जा रहा था कि जो लोग रात में ही एटीएम के पास पूरे परिवार के साथ खटिया और कंबल के साथ आ धमके है, वे सारे के सारे वहीं लोग है, जो काला धन को सफेद बनाने के लिए काला धन रखनेवालों की मदद कर रहे है। इनका एक ही मकसद है, काला धन रखनेवालों से मुंहमांगी रकम लो, और उनके काला धन को सफेद कर दो। हालांकि इन पर नकेल कसने के लिए केन्द्र सरकार ने स्याही लगाने का प्रबंध इनके हाथों में किया है। मैं चाहता हूं कि ऐसे लोगों को सीसीटीवी खंगाल कर, जेल में बंद भी करना चाहिए, ताकि काला धन रखनेवालों की मदद करनेवालों की नानी – दादी याद हो जाये।
हमारे देश में हर अच्छे काम करने पर उसका विरोध करना एक फैशन हो चला है। याद करिये, जब राजीव गांधी ने सरकारी कार्यालयों में कम्प्यूटर का प्रवेश कराया था, तो यहां की तत्कालीन वामपंथी और विपक्षी पार्टियों ने इसकी कितनी आलोचना की थी, इस निर्णय के खिलाफ कितना बड़ा आंदोलन चलाया था, पर आज सच्चाई क्या है?, सब के सामने है, इस कम्प्यूटर ने हमारी जिंदगी बहुत ही आसां कर दी है। ठीक इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी द्वारा लिया गया, यह निर्णय देश को मजबूती देने के लिए है। बस हमें मजबूती प्रदान करनी है, इस निर्णय की।
सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर का नरेन्द्र मोदी द्वारा लिये गये निर्णय की प्रशंसा करते हुए यह कहना कि जब हमारे फौजी, देश के जवान, विपरीत परिस्थितियों में, अपनी जान पर खेलकर देश की हिफाजत कर रहे है तो क्या हम देश के लिए इतना भी नहीं कर सकते?, आखिर दो – चार घंटे लाइन में लग गये तो क्या हो गया?, कौन सा पहाड़ टूट गया?
इस एटीएम पर लगी लाइन पर जो लोग सवालिया निशान उठा रहे है, उनसे हमारा भी सवाल है, कि आखिर हाल ही में फोकट के जियो सिम लेने के लिए लोगों ने डेढ़ किलोमीटर की लंबी लाइऩ नहीं लगाई है क्या? फिल्मों के टिकट पाने के लिए लोग लंबी लाइन नहीं लगाते क्या? और लंबी लाइन लग भी गयी तो क्या हो गया? अरे देश तुम्हारा है, देश के लिए कुछ तो करो भाई...

Sunday, February 21, 2016

एनडीटीवी ने अपना नकाब उतारा.........

भारतीय संस्कृति में एक वाक्य बार-बार सुनने को मिलता है...
जो होता है, अच्छे के लिए होता है...
जेएनयू की घटना ने भी बहुत सारे लोगों के चेहरे पर से नकाब उठा दिया है...
नकाब उठने के बाद, क्या होता है...आप सभी जानते है , फिर सामने वाले से शर्म और हया सब खत्म...
एनडीटीवी ने स्पष्ट कर दिया कि वह विशुद्ध रुप से वामपंथी है...न तो उसे कांग्रेस से मतलब है और न ही भाजपा या उसके अन्य आनुषांगिक संगठन से...
उसने यह भी दावा ठोक दिया कि जो वामपंथ से टकरायेगा तो फिर एनडीटीवी भी उसे नहीं छोड़ पायेगा...
ऐसे तो सारा बुद्धिजीवी वर्ग जानता था कि ये चैनल वामपंथी चैनल है, पर सामान्य जनता नहीं जानती थी, आज सामान्य जनता जान गयी है...
वो अगर सारे चैनलों की सूची बनायी है कि कौन चैनल किस पार्टी का भोंपू है,तो एनडीटीवी के लिए भी उसने सूची दर्ज कर ली कि ये विशुद्ध वामपंथी चैनल है...
इसका भी मकसद कश्मीर को पाकिस्तान के हाथों सौंप देना, अमरीका को साम्राज्यवादी बताना और चीन को अपना दोस्त बताना, हिन्दूओं को गाली देने का तो उसकी पुरानी आदत है, जरा देखिये एनडीटीवी के संपादक ने क्या शिगुफा छोड़ा है, जिस शिगुफे को आजकल वामपंथी नेता छाती से लगाकर फेसबुक पर शेयर किये जा रहे है...वो है...
एनडीटीवी इंडिया के संपादक ऑनिंद्यो चक्रवर्ती के मुताबिक यह जेएनयू बनाम जनेऊ की लड़ाई है...ये महापंडित ऑनिंद्यो चक्रवर्ती, तोगड़िया टाइप भाषण तो लिख दिया पर उसे पता हैं कि गांव में रहनेवाले उन लाखों गरीबों पर क्या गुजरेगी...जब उसके इस भाषण टाइप का इस्तेमाल करना वामपंथी गुंडे शुरु कर देंगे...
जैसा कि केरल के कन्नूर जिले में हुआ वामपंथी गुंडों ने सुजीत की हत्या उसके माता-पिता के सामने ही निर्ममता से कर दी...
ऐसे हम आपको बता दें कि एनडीटीवी के भी कई संवाददाता और कैमरामैन कोई दुध के धुले नहीं, बल्कि ये भी एक नंबर के बदमाश है...और इसकी जानकारी प्राप्त करनी हो तो हमसे संपर्क करें...हम आपको प्रमाण के साथ बतायेंगे...

Monday, December 14, 2015

गुड़ खाये पर गुलगुल्ले से परहेज...........

गुड़ खाये पर गुलगुल्ले से परहेज...
वे गुड़ खुब खाते हैं...
पर गुलगुल्ले से परहेज करते हैं...
खुद के अखबारों में अपना नाम नहीं छपवाते हैं...
नाम क्या पद भी नहीं दिलवाते हैं...
शायद खुद को इससे चरित्रवान शो करते हैं...
पर कभी – कभी...
खुद के ही अखबारों से निकलनेवाले किताबों में...
एडिटर इन चीफ बन धूम मचाते हैं...
टीवी में अपनी सुविधानुसार कभी नेता...
तो कभी पत्रकार बन जाते हैं...
राज्य सरकार की दूरभाष – निर्देशिका में...
अखबार के प्रधान के रुप में दीख जाते हैं...
खुद को जेपी व चंद्रशेखर के चेले के रुप में...
दिखलाने का खुब यत्न करते हैं...
अरे क्या कहूं...
आजकल जनाब...
गुड़ खुब खाते हैं...
पर गुलगुल्ले से परहेज करते हैं...

Wednesday, November 25, 2015

आमिर का डर और एनडीटीवी का विधवा प्रलाप...

कल जब मैंने टीवी खोला...
तो टीवी खोलते ही आमिर भक्त, कांग्रेस भक्त और वामपंथ के रास्ते देश को आगे बढ़ाने की बात कहनेवाले चैनल एनडीटीवी पर नजर पड़ी, जहां अशोक पंडित, एंकर अभिज्ञान प्रकाश के ज्ञान की धज्जियां उड़ा रहे थे और अभिज्ञान अपने अधकचरे ज्ञान से खुद को बचाने का असफल प्रयास कर रहा था...
इन दिनों आमिर के उपर टीवी में खुब बहस चल रही है...टीवी का एक तबका आमिर के पक्ष में आ गया तो दूसरा तबका उसके विरोध में...
आमिर के पक्ष में आ गया एनडीटीवी मोदी के विरोध में जमकर अपनी वाणी का सही इस्तेमाल कर रहा है...बिहार के चुनाव में मोदी की हार से प्रसन्न एनडीटीवी ऐसा मौका कभी नहीं छोड़ना चाहता, जिसमें मोदी की बखिया उधेड़ने की बात हो... पर कभी – कभी उलटी दांव भी चल जाती है, जैसा कि कल अशोक पंडित ने एनडीटीवी की अपने वाक्यांशों से वो कर डाली, जो सपने में भी अभिज्ञान ने नहीं सोचा होगा...
और अब बात आमिर की...
आमिर से पूछिये...कि बेटा कभी पाकिस्तान या बांगलादेश गये हो, जहां हिन्दूओं की बेटियों को प्रतिदिन जलालत झेलनी पड़ती है, क्योंकि वे हिंदू है, गर नहीं तो कम से कम वहां की अखबारें तो पढ़ लो, जहां का मुस्लिम समुदाय वहां की हिन्दु बेटियों का अपहरण करता है, फिर उसकी इज्जत लूटता है और फिर उसका धर्मांतरण कराता है और फिर इस्लाम जिंदाबाद का नारा बुलंद करता है...दूसरी बात क्या आमिर बता सकता है कि पाकिस्तान और बांगलादेश में हिंदूओँ की संख्या लगातार घटती क्यों चली गयी, क्या वहां के सारे हिंदू पुरुष नपुंसक थे क्या?
और आजादी के बाद भारत में रह रहे सारे मुसलमान असली मर्द थे क्या? कि वे लगातार अपनी जनसंख्या बढ़ाते चले गये, स्थिति तो ऐसी है कि कालांतराल में भारत में ही हिंदू अल्पसंख्यक हो जायेंगे, कई राज्यों में जैसे जम्मू-कश्मीर या नार्थ-ईस्ट इलाकों में तो हिन्दूओं की हालत दोयम दर्जें की हो गयी है...।
तीसरी बात मैंने इसके पहले जब आमिर की फिल्म पीके आयी थी तो कुछ लिखा था, जो इस फेसबुक में मौजूद है, सभी पढ़े...और पूछे आमिर से कि बेटा क्या जिस धर्म से तुम आते हो?, उसमें सब कुछ क्या सही है? , गर सब कुछ सही नहीं है तो उसके अंदर जो दकियानूसी चीजें है, उस पर तुम्हारी हिम्मत है कि फिल्म बना दो...वो कहेगा, कि नहीं...क्योंकि वो जानता है कि फिर क्या होगा? ...मैं कहता हूं कि जब पहले सहिष्णुता की बात करते हो, तो तुम अपने धर्म में इसे दिखाओ...और तुम्हारी सहिष्णुता उस वक्त कहां चली जाती है, जब धर्म के नाम पर तुम्हारे लोग पूरे विश्व में आंतक मचा रहे होते है, जिससे पूरी दुनिया ही त्रस्त हो गयी...
तुम बोलते हो कि भारत से कहीं और चले जाये...तो तुम्हे रोका किसने है, तुम्हारे पास इतने पैसे है कि तुम पैसे के बल पर कहीं भी चले जाओगे और तुम्हें शरण भी मिल जायेगी, पर हम कहां जायेंगे, बेईमान...मुझे तो यहीं रहना है...क्योंकि तुम्हारे जैसा मैं गद्दार नहीं, कि जिस देश में खाया, कमाया और जब उड़ने की बारी आयी तो देश को गाली देकर चल दिये...
तुम्हारे ही जैसा एक और आदमी था, नाम था – मकबूल फिदा हुसैन, वह हमेशा हिन्दू देवी – देवताओं की अश्लील चित्र बनाता था, पर कभी इस्लाम पर उसका ऐसा चित्र नहीं आया, क्योंकि वह जानता था कि असहिष्णु कौन है...इसलिए वो जी भर कर हिन्दू देवी-देवताओं की गालियां दी और फिर मुस्लिम देश की ओर चल दिया...ठीक उसी प्रकार की हरकत तुमने कर दी...जी भरकर पीके फिल्म में हिन्दू देवी – देवताओं की गाली दी, और अब पूरे देश के हिन्दूओं के गालों पर असहिष्णु का तमाचा जड़ कर विदेश जाने की बात कर दी...।
इस मुददे पर तुम्हारे साथ कांग्रेस और आप के लोग है...ये कितने देश भक्त है...पूरा देश इन्हें जानता है...अभी देश पर जान छिड़कनेवाले दिल्ली की 70 सीटों में से 67 सीटों पर कब्जा जमानेवाले दिल्ली की जनता की फिक्र छोड़ अपने 67 विधायकों को ढाई-ढाई लाख रुपये का मासिक वेतन दिलवाने जा रहे है...और लालू के साथ गले मिलकर भ्रष्टाचार का नया पैतरा कैसे सीखा जाये, इसके लिए लालू को गले लगा रहे है...ऐसे लोग तुम्हारे साथ जरुर होंगे...पर जहां से तुमने कमाना सीखा...हमें खुशी है कि वहां के लोगों ने तुम्हारे उपर थूका है...हो सकता है कि इनकी संख्या तुम्हारी नजरों में कुछ भी नहीं हो...पर आमिर ये जान लो कि देश की आजादी में मुट्ठी भर ही लोग लड़े थे...नहीं तो पूरा देश गर खड़ा हो जाता तो सरकार किस-किसको स्वतंत्रता सेनानी का वेतन देती...स्वतंत्रता सेनानी का वेतन मिलना इस बात का संकेत है कि इस देश में गद्दारों की संख्या सर्वाधिक और देश भक्तों की संख्या का अकाल हमेशा से रहा है...
ऐसे भी, मैं जानता हूं कि तुम क्या हो? ...कल तक कांग्रेस का शासन था...मुंबई-दिल्ली कई राज्यों के प्रमुख शहरों में कत्लेआम हुआ...पूरे देश में सिक्खों का कत्ल राजीव के शासन में हुआ...इंदिरा के मरने के समय... राजीव का बयान आया था कि कोई पेड़ गिरता है तो कंपन होती है, और उसमें कई सिक्ख मारे गये...ये सिक्खों को मारनेवाला कौन था...पूछो अपने कांग्रेसियों से....उस वक्त सहिष्णुता कहां गयी थी...
इधर जब से मोदी आया है...मोदी विरोधियों का एक ही सूत्र रह गया है...मोदी हटाओ, देश की इज्जत चली जाये तो चली जाये, पर मोदी नहीं रहना चाहिए...और एक मोदी है, जो इन सबसे अलग देश की इज्जत और विकास के मुद्दे पर पूरे विश्व में भारत की नई ईमारत तैयार कर रहा है, और जरा इन बेहुदों को देखिये...जो ऐसी जगह रहते है...जहां कोई इनका बाल बांका नहीं कर सकता...पर इन्हें अब भारत में रहना खतरा सा दीख रहा है...इससे बड़ी गद्दारी और क्या हो सकती है? और उससे भी बड़ी गद्दारी तो वे कर रहे है, जो इसके सुर में सुर मिला रहे है...जो इनके सुर में सुर मिला रहे है, वे जान ले कि देश वो नहीं भी रहेंगे तो रहेगा...देश के प्रति ईमानदारी नहीं छोड़े...नहीं तो आनेवाले समय में ये सभी जयचंद ही कहलायेंगे...
आज इस्लाम के नाम पर जो आईएस पूरे विश्व में कोहराम मचा रहा है...उसे पूरी दुनिया देख रही है...रुस, चीन, फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीका, यहां तक कई मुस्लिम देश भी, कितने देश का नाम गिनाये, सभी आईएस के खिलाफ लग गये है...इस्लाम से अनजाने भय से लोग इतने डर गये है कि लोग बुर्का और काले रंग को देखकर कांप जा रहे है...और ये कहते है कि भारत में असहिष्णुता बढ़ी है...
हाल ही में एक अखबार में पढ़ा कि ब्रिटेन में 300 प्रतिशत असहिष्णुता बढ़ी है, फिर भी वहां के किसी भी विरोधी दल के नेता ने, अपने देश और सरकार के प्रति घिनौने शब्द का प्रयोग नहीं किया पर जरा इस देश के नये – नये चपड़गंजूओं को देखिये...दिये जा रहे है...
अरे आमिर पूछो तो राहुल गांधी से कि जहां कलबुर्गी की हत्या हुई...वहां किस पार्टी का शासन है? और पुछो जहां दादरी हुआ वहां किस पार्टी का शासन है?
क्या तुम्हें मालूम नहीं कि लॉ एंड आर्डर राज्य के अंतर्गत आता है...तो फिर जिन्होंने इस घटना को अंजाम दिया...उन्हें जेल में डालने का काम किसका है...यानी काम गलत करे तुम्हारे अब्बा और गाली सुने हम वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हो...गर ये कहावत नहीं सुने हो तो ये कहावत जरुर सुने होंगे कि खेत खाये गदहा और मार खाये जुलाहा...
आमिर तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम मकबूल फिदा हुसैन के बताये मार्ग पर चल रहे हो...
तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम ही सिर्फ असली मुसलमान हो और भारत में रह रहे अन्य मुसलमान, मुसलमान नहीं है...
तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम देश के प्रति वफादार नहीं हो...
और तुमने उनके भी चेहरे से पर्दा उठा दिया जो कहते है कि देश उनके लिए सर्वोपरि है...
और एनडीटीवी वाले तुम भी जान लो, ये जो तुम बार – बार पूछते हो न कि हम देशभक्त है या नहीं, इसका सर्टिफिकेट कौन देगा या कौन बांट रहा है...तो मैं तुम्हें बताता हूं...अभिज्ञान और तुम्हारे आका...
ये सर्टिफिकेट तुम्हारे शरीर के अंदर किसी कोने में आत्मा बैठी है, वो देती है, और ये तब सर्टिफिकेट जारी करती है, जब तुम्हारे पास कुछ नहीं होता...तुम तो लाखों – करोड़ों में खेल रहे हो, तुमको देश की क्या चिंता...
चिंता तो उन्हें है, जो खेतों में हल चलाकर जीते है...जिनके बेटे सीमा पर खड़े है...और तुम, तुम क्या जानो देशभक्ति...बस अपनी बीवी और बेटों के पास जाकर कहना कि बेटा घबराना नहीं...रतलाम सीट से भाजपा हार गयी है...हां हां ये मत बताना कि मणिपुर में भाजपा दो विधानसभा सीटें जीतकर खाता खोल दी हैं, नहीं तो तुम्हारा बीवी – बेटा डर जायेगा...समझे लल्ला...

Monday, October 26, 2015

मीडिया की संकीर्ण मानसिकता...........

कल यानी 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के तहत अपनी विचारधारा भारतीय जनमानस के बीच रखने का प्रयास किया। इस कार्यक्रम को सभी चैनलों ने बारीकी से जनता के समक्ष रखा। प्रधानमंत्री ने इस मन की बात कार्यक्रम के दौरान बहुत ही अच्छी – अच्छी बातें की, गर उस पर सचमुच ध्यान दिया जाय तो मानवता और भारतीयता को बल मिलेगा। अंगदान, ग्रुप बी, सी एवं डी में साक्षात्कार की समाप्ति व सांसदों द्वारा गांवों को गोद लेकर उनके कायाकल्प का कार्य आदि बातों को प्रधानमंत्री ने जोरदार ढंग से उठाया और लगे हाथों प्रधानमंत्री ने स्वच्छता कार्यक्रम को भी जनता के समक्ष रखा।
इस स्वच्छता कार्यक्रम में मीडिया की भूमिका की भी प्रधानमंत्री ने जमकर सराहना की। प्रधानमंत्री ने आजतक, ईटीवी, जीटीवी, एबीपी, एनडीटीवी आदि चैनलों की जमकर प्रशंसा की, पर किसी चैनल ने अपने समाचार में ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने जब मीडिया की सराहना की तो उन्होंने सिर्फ एक चैनल का नाम नहीं लिया, बल्कि बहुतेरे चैनलों का नाम लिया, कुछ अखबारों का भी नाम लिया। सारे चैनलों ने अपने अपने समाचार के बुलेटिन में जब भी स्वच्छता कार्यक्रम के समाचार की बात हुई तो अपनी पीठ खुद थपथपाई, ये कहकर की प्रधानमंत्री मन की बात में उनके चैनल यानी जो चैनल समाचार प्रसारित करता, सिर्फ अपने चैनल का नाम लेकर समाचार का इतिश्री कर लेता। क्या ये संकीर्ण मानसिकता नहीं है?
अच्छा तो ये होता कि सारे चैनल, गांव व देश की सफाई के कार्यक्रम को जमीन पर उतारने की तरह अपने संकुचित मानसिकता की भी सफाई करते और ईमानदारी से लोगों को बताते कि प्रधानमंत्री ने विभिन्न चैनलों का नाम लिया और उन्हें इस बात की बधाई दी, कि वे स्वच्छता कार्यक्रम को महत्व दे रहे है।
मतलब समाज के सामने भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करनेवाले, नेताओं के बोली के बाल का खाल निकालनेवाले कितना एक दूसरे से ईर्ष्या करते है, ये बातें एक बार फिर कल स्पष्ट रुप से उजागर हो गयी। मैं रांची में भी देखता हूं कि कई अखबार बहुत अच्छे – अच्छे कार्यक्रम का आयोजन करते है, पर वह समाचार सिर्फ उसी अखबार में दिखाई पड़ता है, जो करा रहा होता है, क्या ये ईर्ष्या अथवा जलन नहीं है? गर ये ईर्ष्या व जलन है, तो फिर ऐसे लोगों से क्या समाज व देश का भला होगा, या हित होगा? इस प्रश्न को मैं जनता के समक्ष रख रहा हूं, जनता चिन्तन करें......

Thursday, October 15, 2015

क्या बिहार में महागठबंधन से चुनाव लड़ रहे एनडीटीवी के रवीश कुमार के भाई चुनाव जीत पायेंगे...........

रांची से एक अखबार प्रकाशित होता है – खबर मंत्र। उसने 14 अक्टूबर को अपनी अभिव्यक्ति पृष्ठ पर एनडीटीवी के एक पत्रकार रवीश कुमार का उसके ब्लॉग से साभार आलेख छापा है। ये वहीं रवीश कुमार है, जो टीवी पर बहुत ही सुंदर अभिनय करने के कारण, इलेक्ट्रानिक मीडिया में जगह बनानेवाले नये – नये पत्रकारों का चहेता बना हुआ है। वह बहुत ही अच्छी – अच्छी बातें करता है, भाजपा को खूब गरियाता है, पर नीतीश का नाम जुबां पर आते ही नीतीश भक्ति में स्वयं को अनुप्राणित कर लेता है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी उसने बिहार का दौरा किया था, और उसी वक्त एक उसका आलेख प्रभात खबर में पढ़ने को मिला था, उस आलेख को पढ़ने पर मुझे साफ लगा था कि यह व्यक्ति नीतीश भक्ति में बहुत ही कन्फ्यूज्ड है, उसे जनता का नब्ज पहचानने नहीं आता। उसने उस वक्त आलेख में लिखा था कि बिहार में लोकसभा चुनाव का जो परिणाम आयेगा वह अप्रत्याशित होगा, जो भाजपा के खिलाफ रहेगा, पर हुआ ठीक इसके उलटा। भाजपा के लहर में बिहार से उसके भगवान नीतीश का ही सफाया हो गया।
फिलहाल नीतीश, लालू और राहुल की तिकड़ी से बने महालंठबंधन को जीताने के लिए अंदर ही अंदर वह सक्रिय है। खबर मंत्र में कल के छपे आलेख से फिर इसकी कलाकारी दीख रही है। बहुत कम ही लोगों को पता है कि रवीश कुमार का भाई ब्रजेश पांडे गोविंदगंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। सूत्र बताते है कि जहां से रवीश का भाई चुनाव लड़ रहा है, वहां ब्रजेश पांडे आज तक कभी गया ही नहीं, फिर भी वह जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि रवीश के नीतीश भक्ति का ही कमाल है कि गोविंदगंज से मीना द्विवेदी, जो जदयू के टिकट पर लगातार दो बार चुनाव जीतती आयी थी, उस मीना द्विवेदी को नीतीश ने इस बार नहीं उतारा और ये सीट अपने भक्त रवीश को खुश करने लिए रवीश के भाई ब्रजेश को दिलवा दिया और आज ब्रजेश कांग्रेस के टिकट पर अपना किस्मत आजमा रहा है। यानी पत्रकारिता में भी, भाई – भतीजावाद शुरु और पत्रकारिता के आड़ में अब नेतागिरी भी, हालांकि हम आपको बता दें कि रवीश के भाई ब्रजेश की जीतने की उम्मीद न के बराबर है। रवीश अकेले नहीं, बहुत ऐसे पत्रकार है, जिन्हें नीतीश में भगवान नजर आता है, आनन्द नजर आता है, इसलिए नीतीश की गलतियां उसे दिखाई नहीं देती, पर जो रवीश करते है, वैसा कोई नहीं करता, यानी हाथी के दांत दिखाने को कुछ और खाने को कुछ...। हम आपको बता दें कि इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मीडिया को अपने चरणों में नतमस्तक कराने के लिए अनेक कार्य किये है, जैसे प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को राज्यसभा भेजा। बिल्डर और कशिश चैनल के मालिक सुनील चौधरी को बेनीपुर से विधानसभा का टिकट देकर उसे बिहार विधानसभा में भेजने के लिए लगा है। यहीं नहीं ऐसे कई उदाहरण है, जो बताने के लिए काफी है कि नीतीश ने मीडिया को अपने चरण छूने को कैसे विवश किया है, पर मीडिया के लोग है, जो लालच में आकर, वह सब कर रहे जो आज का नेता करता है........यानी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबने की ललक......क्योंकि उसे भी वह सब कुछ चाहिए, जो नेता के पास होता है......ये नीतीश भक्ति का ही कमाल है कि महागठबंधन के एक नेता लालू प्रसाद की अतरी में मंगलवार को सभा थी, और उस सभा से भीड़ ही गायब थी, पर गया से ही प्रकाशित प्रभात खबर में लालू प्रसाद से संबंधित यह समाचार पूर्णतः गायब है....साथ ही कई चैनलों ने इसे दिखाया ही नहीं, आखिर ये नीतीश भक्ति नहीं तो और क्या है.........

Saturday, October 3, 2015

देश में दंगा भड़काने का काम, अब मीडिया का.......

देश में दंगा भड़काने का काम, अब मीडिया का.......
देश की जनता, सावधान...
मीडिया ने देश में सांप्रदायिक उन्माद फैलाने का संकल्प ले लिया...
देश की जनता से विनम्र निवेदन है कि वे मीडिया की बातों में न आए, मीडिया में काम करनेवाले लोग, ज्यादातर बेवकूफ, आला दर्जें के गधे व खुद को तेज समझनेवाले बीमारी से पीड़ित इंसान होते हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया की सारी बुद्धिमानी उन्हीं के गिरफ्त में है, जबकि उनके सामनेवाला व्यक्ति आला दर्जें का मूर्ख है। इसलिए वे कभी – कभी समाचार पत्र तो कभी विभिन्न चैनलों में डिस्कसन के माध्यम से तो कभी फेसबुक, टिवटर, वाट्सएप पर अपना अधकचरा ज्ञान बिखरते रहते है। अपने घटियास्तर के धनपशु मालिकों के इशारे पर ताता –थैया करते हुए, देश की एकता व अखंडता के साथ खिलवाड़ भी करते है। वे अपनी अखबारों व चैनलों में अधूरी ज्ञान के चलते कभी-कभी कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा भी बता देते है।
इधर उनके दिमाग में एक जबर्दस्त कीड़ा घूस गया है, जो कैंसर और एड्स से भी ज्यादा खतरनाक है। वे आजकल गाय और गाय से संबंधित डिस्कशन, कार्टून व बेवजह के घटियास्तर के इंसानों के बयान छाप रहे, दिखा रहे और विभिन्न सूचना तंत्रों के माध्यम से इसे फैला रहे है, ताकि देश में सांप्रदायिक उन्माद फैले और देश की समरसता पूरी तरह से नष्ट हो जाये। ये किनके इशारे पर ऐसा कर रहे है, थोड़ा सा आप दिमाग लगायेंगे तो पता चल जायेगा।
सबसे पहले आप उदाहरण देख लीजिये...
रांची से प्रकाशित एक उर्दू अखबार फारुकी तंजीम ने गाय से संबंधित एक आलेख छापा, जिसके कारण पूरे राज्य में सांप्रदायिक तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी। इसी अखबार ने कुछ दिन पहले एक लेख छापा जिसमें लिखा था कि हिन्दुस्तान ने कभी भी पाकिस्तान से कोई जंग जीती ही नहीं।
अभी एक दो दिन पहले की घटना है – एबीपी न्यूज ने एक सेलिब्रेटी (पता नहीं वह सेलिब्रेटी है भी या नहीं, क्योंकि जिसको सेलिब्रेटी एबीपी ने कहा हैं उसे बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिसे जानते ही नहीं, लेकिन एबीपी उसे सेलिब्रेटी मानता है) के माध्यम से बयान दिखाया व अन्य संचार माध्यमों से उसे जन- जन तक पहुंचवाया कि “मैंने अभी – अभी बीफ खाया हैं आओ मेरा कत्ल कर दो”। सवाल उठता है कि कौन क्या खा रहा है?, और क्यूं खा रहा हैं?, उससे आम आदमी को क्या मतलब? कोई एबीपी से पूछने गया था क्या? कि वो सेलिब्रेटी क्या खाने में शान समझ रही है? अरे बहुत सारे देश है – जहां इसानों के मांस भी इंसान बड़े शौक से खाते है।
यहीं नहीं दिल्ली से प्रसारित एक राष्ट्रीय चैनल एनडीटीवी ने कुछ साल पहले जब दिल्ली में कथित तौर पर चर्च पर हमले हो रहे थे, तो वह बार – बार इस प्रकार के समाचार को ज्यादा प्रसारित करता था और उसमें जानबूझकर यह दिखाने की कोशिश करता था कि ऐसा करने में हिन्दू संगठनों का हाथ है, जबकि उसी के समाचार में अधिकारियों का बयान आता था कि यहां पर आग शार्ट सर्किट से लगी है, पर वह विद्युत अधिकारियों व कर्मचारियों की बातों को नजरंदाज कर, हिन्दू संगठनों पर ही इसका दोष मढ़ देता था। इसके प्रमाण हैं, मेरे पास, एनडीटीवी द्वारा प्रसारित सारे समाचार उस वक्त के, मेरे सामने देखिये, बताता हूं कि उक्त चैनल ने कैसे ढोंग करके देश में सांप्रदायिकता के बीज बोए।
एक और घटना। मैं आपको बता दूं ये कल की ही बात है, जब मैंने फेसबुक खोला, तो एक हमारे वामपंथी मित्र ने सलमान रिज्वी का एक फोटो शेयर किया। फोटो में क्या था, जान लीजिये। फोटो में था - एक साधु के पास सिर कटी लाश पड़ी है, साधु एक हाथ में नर मुंड लिये है और दूसरे हाथ में आरती का थाल लेकर गाय की आरती उतार रहा है। जब मैंने उस फोटो को देखकर, कमेंटस किया कि जनाब आपने ये फोटो शेयर तो कर दिया पर जब इसका जवाब आयेगा तो क्या आप उसे भी इसी प्रकार स्वीकार करेंगे...तुंरत मैंने देखा कि वे जनाब, जिन्होंने इस प्रकार का फोटो शेयर किया था, तुरंत उसे हटा लिया।
आखिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जब आप किसी की भावना से खिलवाड़ करेंगे तो आप भी अपनी भावनाओं का खिलवाड़ करवाने के लिए तैयार रहे, क्योंकि न्यूटन का तीसरा नियम साफ कहता हैं कि – क्रिया तथा प्रतिक्रिया बराबर एवं विपरीत दिशा में होती हैं, पर आज के वामपंथी सिर्फ अपनी प्रतिक्रिया दूसरे के माथे पटकना जानते हैं, पर उसके जवाब में कुछ भी लेने को तैयार नहीं, भला ऐसा भी कहीं हुआ है।
अभिव्यक्ति के नाम पर कभी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मकबूल फिदा हुसैन का बचाव किया था। वह मकबूल फिदा हुसैन जो हमारे देवी – देवताओं की नग्न चित्र बनाता था। मैं पूछता हूं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसा ही कोई हरकत कोई दूसरा वर्ग करेगा, तो उसे भी हमें स्वीकार करना पड़ेगा। एक के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरे पर तलवार की मार, ये दोगली संस्कृति का प्रतीक है। अब मैं पूछता हूं कि
अपने ही देश में जो मीडिया, इस प्रकार की हरकत कर रही है, उससे क्या होगा? वैमनस्यता फैलेगी या नहीं, सांप्रदायिक उन्माद फैलेगा या नहीं, और ऐसे में फिर क्या होगा? इंसान ही इंसान को काटने के लिए दौड़ेगा तो इसे क्या कहोगे?
पहले देश में सांप्रदायिक उन्माद व जातीय उन्माद फैलाने का काम नेताओं का हुआ करता था। जिससे उन्हें फायदा भी मिलता था। सांप्रदायिक व जातीय उन्माद से उन्हें एक खास वर्ग के वोटों का ध्रुवीकरण होता था और वे सत्ता हासिल कर लेते थे। आज भी ये नेता इस कार्य को गति दे रहे है, पर अब एक नया वर्ग भी इसके साथ पैदा हुआ है। वह हैं मीडिया का। अब सांप्रदायिक व जातीय उन्माद फैलाने का काम पूरी तरह मीडिया ने ले लिया है। वह बड़े ही सुनियोजित साजिश के तहत पूरे देश में सांप्रदायिक व जातीय उन्माद फैला रही है। इसमें दक्षिणपंथी व वामपंथी दोनों मीडिया का ग्रुप शामिल है। वामपंथी मीडिया बड़े प्रेम और चालाकी से अल्पसंख्यकों की ओर से फैलाये जा रहे सांप्रदायिक उन्माद का समर्थन करता है और इसकी सारी गोष्ठियां और कार्यक्रम अल्पसंख्यकों द्वारा चलाये जा रहे संगठनों में ही आयोजित किये जाते है, जबकि बहुसंख्यकों के सांप्रदायिक उन्माद को दक्षिणपंथी संगठन समर्थन करते है। इससे पूरा देश प्रभावित हो रहा है। इसलिए आप सारे देशवासी इन मीडिया में काम करनेवाले तेज लोगों से आज ही सतर्क हो जाय। नहीं तो, न तो आप बचेंगे और न ही देश। अतः जैसे ही दाढ़ी बढ़ाकर कोई खुद को वामपंथी बताकर उपदेश दें, या टीका लगाकर दक्षिणपंथी पत्रकार बताकर आपके समक्ष उपदेश देना शुरु करें तो बस उसे वही टोकिये और कहिये, हमें आपके भाषण की जरुरत नहीं। हमें कैसे रहना हैं, हमें रहना आता है, हमें कोई ज्ञान न दें। जरा देखिये, आपके ही रांची में क्या हुआ? किसकी इज्जत गयी, पूरे देश में। इसलिए आज ही इन मीडिया व मीडियाकर्मियों से सावधान हो जाओ व देश बचाओ। सारे भारतवासी एक है। कबीर की एक वाणी याद रखो ---
कबिरा तेरा झोपड़ा गलकटियन के पास।
करेगा सो भरेगा, तू क्यों रहे उदास।।

Wednesday, August 26, 2015

“मांझी – द माउंटेन मैन” ये बाते कुछ हजम नहीं हुई...........

“मांझी – द माउंटेन मैन”
ये बाते कुछ हजम नहीं हुई...........
आजकल “मांझी – द माउंटेन मैन” फिल्म की चर्चा जोरों पर है। जिसे देखो – दिये जा रहा हैं। टीवी पर मांझी, अखबारों में मांझी, पत्रों में मांझी और पत्रिकाओं में मांझी। कोई मांझी से खुद को जबर्दस्ती जोड़े जा रहा हैं, पुरानी अखबारों के कतरन के साथ कि सबसे पहले हमनें इस खबर को स्थान दिया था, तो कोई अखबार दिये जा रहा हैं, कि गर वो नहीं होता तो मांझी को इतना स्थान नहीं मिलता, लोग जानते ही नहीं, जबकि सच्चाई ये हैं कि आपका हर अच्छा काम, आपको वो स्थान दिलाकर रहता हैं, जिसके आप हकदार हैं, चाहे इसके लिए आपके जीवन में कितनी भी रुकावटें क्यों नहीं आये। दशरथ मांझी – उसके जीते जागते उदाहरण है। एक ऐसा व्यक्ति जो दलित समुदाय से आता है। जिसका जीवन ही गाली से शुरु होता हैं और गाली पर ही खत्म हो जाता है, पर ये व्यक्ति किसी का प्रतिकार नहीं करता, वह तो कठोर पठार को काटकर, सड़क बना देता हैं, जिस रास्ते पर आज लोग चल रहे हैं, उसके लिए उसने कितनी गालियां सुनी, कितने ताने सहे, कितने थपेड़ें सहे, पर लक्ष्य को पाकर रहा। इस लक्ष्य को पाने के लिए, उसे क्या-क्या नहीं करना पड़ा। पर वो स्थितियां व परिस्थितियां आज भी मौजूद है।
जरा देखिये........
उसके नाम पर फिल्म बन गयी, पर उसके लोगों व समुदाय का क्या हाल हैं....जिन लोगों ने उसके नाम पर करोड़ों कमाए या कमा रहे हैं, उन्होंने क्या किया?
एक चैनल हैं, मैं उसे अराष्ट्रीय चैनल मानता हूं, नाम हैं – एनडीटीवी। देख रहा था, जिसमें दशरथ मांझी के परिवार के लोग बोल रहे थे कि सुप्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान आये। बोले कि दशरथ का घर बनवा देंगे, पर घर आज तक नहीं बना। क्या आमिर खान के पास इतने पैसे भी नहीं कि वो दशरथ मांझी के परिवार को दो कोठरी का घर बनवाकर दे दें। और जब उसे बनवाना नहीं था तो फिर वायदा क्यों किया।
दूसरी बात, दशरथ मांझी के ही परिवार से जूड़े एक महिला का कहना था कि वो पानी के लिए काफी दिक्कत उठा रही हैं, एक चापाकल हो जाता तो मजा आ जाता। क्या वहां एक चापाकल लगवाने की भी ताकत किसी में नहीं हैं। जबकि अखबारवाले या पत्रकार जो चिल्ला – चिल्लाकर भोंपू बजाकर ये कह रहे है कि मैंने पहले छापी तो क्या वे भी इस हालात में नहीं कि वहां एक चापाकल लगवा दें। हद हो गयी भाई। हमें पानी की जरुरत हैं और लोग कह रहे हैं अखबार पढ़ों, हमें भोजन की जरुरत हैं और लोग कह रहे हैं सिनेमा देखो। कमाल है........
और फिल्म भी मैंने देखी, देखकर निहाल हो गया.......
फिल्म में श्रीमती इंदिरा गांधी भी हैं, जो बोल रही हैं कि उनके हाथों को मजबूत करिये, कमाल है गरीबी हटाओ की बात हो रही हैं, इमरजेंसी के पहले का चित्रण हैं और हाथ को मजबूत की बात। कोई बता सकता हैं कि इंदिरा जी का चुनाव चिह्न हाथ कब हुआ।
यहीं नहीं, मांझी दिल्ली जा रहा हैं और जनक्रांति की बात हो रही हैं, ये जनक्रांति क्या हैं भाई, कब हुआ था......हमें तो मालूम नहीं। हां संपूर्ण क्रांति सुना था, जयप्रकाश नारायण ने आह्वान किया था। बात 1974-75 की हैं। यानी जो मन करें दिखा दो, जो मन करें तकिया- तकिया खेला दों, और माल बटोर लो। दशरथ के नाम पर पैसा और ख्याति मिले और क्या चाहिए......

देश जाये तेल लेने और मांझी का परिवार जाये तेल लेने। हम तो बम बम हो गये न.......