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Saturday, March 25, 2017

शरद यादव जी, आपकी पार्टी भी कोई दूध की धूली नहीं है...........

23 मार्च 2017
राज्यसभा, नई दिल्ली
जदयू सांसद शरद यादव गरज रहे है...
वे पत्रकारिता जगत में आयी गिरावट, कुरीतियों एवं अखबार-चैनल के मालिकों द्वारा की जा रही गंदी हरकतों और उससे शर्मसार होता लोकतंत्र पर केन्द्र सरकार का ध्यान आकृष्ट करा रहे हैं। विषय गंभीर है, पर राज्यसभा में गिने-चुने सदस्य ही मौजूद है, स्वयं जदयू के कई सांसद राज्यसभा से गायब है। सरकार के नुमाइंदों की संख्या भी कम है। ले-देकर एक केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ही मौजूद है, जो एक तरह से नमूने ही कहे जायेंगे।
जदयू सांसद शरद यादव, बहुत अच्छा बोलते है, इसमें कोई दो मत नहीं, कई बार मैंने उनके लोकसभा और राज्यसभा में वक्तव्यों को सुना है, पर क्या कारण है कि उनकी बात ठीक उसी प्रकार काफूर हो जाती है, जैसे विभिन्न कारखानों के चिमनियों अथवा घरों से निकलनेवाली धुओँ का हवा में विलीन हो जाना।
आखिर जदयू सांसद ने राज्यसभा में क्या कहा, स्वयं देखिये। उन्होंने कहा कि...
• अखबारों - चैनलों के मालिक-प्रबंधक, मजीठिया वेज बोर्ड द्वारा दी गई सुविधाओं से अपने यहां कार्यरत पत्रकारों को वंचित रखते है और अपने यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों को ठेके पर रखते है, जिससे यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों का जीवन प्रभावित हो गया है।
• अखबारों – चैनलों के मालिक-प्रबंधक अपने यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों को दोयम दर्जे का समझते है और उनके साथ न्याय नहीं करते।
• अखबारों – चैनलों के मालिक-प्रबंधक अपने संवाददाताओं-पत्रकारों से वे कार्य कराते है, जिसकी इजाजत इंसानियत भी नहीं देती, ये लोग पेड न्यूज चलाते है, जिससे लोकतंत्र खतरे में है, वे इसके लिए कई उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।
• पूरे देश में पूंजीपतियों का बोलबाला हो गया है, जो अखबारों-चैनलों पर कब्जा कर रखे है, और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, इन चैनलों-अखबारों का इस्तेमाल करते है, ये करोड़ों की जमीन, प्रापर्टी इसके माध्यम से खड़े कर रहे है और इसमें सरकार भी इनका सहयोग करती है।
• यहीं नहीं ये अखबारों-चैनलों के मालिक-प्रबंधक-संपादक, पत्रकारिता का धौंस दिखाकर एमपी भी बन जा रहे है, इसलिए सरकार एक कानून बनाये ताकि पत्रकारिता में शामिल कोई भी पूंजीपति या मालिक एमपी न बन सकें या दूसरा उद्योग न खोल सकें।
मेरा मानना है कि...
जो बातें राज्यसभा में सांसद शरद यादव ने उठायी, उसे किसी भी प्रकार से गलत नहीं कहा जा सकता, पर सवाल स्वयं राज्यसभा में इस मुद्दे को उठानेवाले जदयू सांसद शरद यादव से...
आपकी पार्टी ने भी तो वहीं कुकर्म किये है, जिन कुकर्मों को लेकर आपने सदन का, सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया...
जैसे...
प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को राज्यसभा में भेजना, क्या जदयू द्वारा प्रभात खबर को अपने ग्रिप में लेने का प्रयास नहीं था... क्या हरिवंश ने प्रधान संपादक की आड़ में नीतीश कुमार का महिमा मंडन अपने अखबार में नहीं किया... क्या आप बता सकते है या आपके पास कोई प्रमाण है कि प्रभात खबर ने आपके नेता नीतीश कुमार के खिलाफ एक भी खबर छापी...
क्या ये सही नहीं कि प्रभात खबर में कार्यरत, जिन लोगों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सुविधा प्राप्त करने के लिए, आंदोलन किया, उनके साथ दोयम दर्जें का व्यवहार किया गया, उनकी हालत बद से बदतर कर दी गयी और आप की पार्टी ने ऐसे लोगों को सम्मानित ही नहीं किया, बल्कि राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया। वह आदमी आपके ही साथ, संसद में बैठता है, जरा पूछिये, उससे। क्या वह जवाब दे पायेगा।
उत्तर होगा – नहीं। आप ही के ये सांसद कभी अपनी सुविधानुसार पत्रकार तो कभी सांसद बनकर जनता के सामने उपस्थित होते है... ये दोहरा चरित्र क्या बताता है?
दूसरा उदाहरण कशिश टीवी के मालिक-बिल्डर सुनील चौधरी को जदयू का टिकट दिलवाना और उसे बिहार विधानसभा में भेजकर विधायक बनाने का प्रयास क्या बताता है?
कमाल है, शरद यादव जी, आप वहीं कुकर्म करें, तो आनन्द और दूसरा यहीं कुकर्म करें, तो उसे सदन में अपमानित और उसे गलत कहने की परिपाटी आपने कब से सीख लिया। पहले स्वयं में सुधार लाइये, फिर दूसरे पर अंगूली उठाइये। इससे आपके बात की वजन भी बढ़ेगी और आप हंसी के पात्र भी नहीं बनेंगे।
मैं जानता हूं कि भारत में छपनेवाले अखबार हो, या चलनेवाले चैनल। इसके मालिक और यहां काम करनेवाले, उनके इशारों पर चलनेवाले प्रबंधक या संपादक, सभी पेड न्यूज चलाते है और इसमें सरकार भी सहयोग करती है। ये सारे सभी पत्रकारों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते है, उन्हें ठेके पर रखते है और पत्रकार-संवाददाता भी ठेके पर रहने के लिए, गुलामी सहने के लिए व्याकुल रहते है, वे इसके लिए अपनी लज्जा और शर्म को अपने घर की खूंटी पर टांग कर आते है, क्योंकि उनके भी बच्चे है, बीवियां है, बेचारे उनका भरण-पोषण कैसे करेंगे?  इसी क्रम में वे अपना जमीर बेच देते है, घूंट-घूंट कर मरते है। आजकल तो स्थिति ऐसी हो गयी कि अब ये पत्रकार आत्महत्या भी करने लगे है, पर इन प्रबंधकों-मालिकों को शर्म नहीं आती, उन्हें तो सिर्फ अपने कल-कारखानों की ही चिंता होती है ताकि उनका करोड़ों-अरबों का व्यापार प्रभावित न हो, ये इसकी आड़ में करोड़ों-अरबों की जमीन लूट रहे है और इसमें सरकार भी इनकी मदद करती है...
ऐसे में, ये लोकतंत्र जीवित रहेगा, हमें शक लगता है...
चलिए, शरद यादव जी, आप भी दूध के धूले नहीं है, आपकी भी पार्टी इसी रंग में रंगी है, पर आपने इस मुद्दे को राज्यसभा में उठाया। अच्छा लगा। आप इसी तरह इन महत्वपूर्ण मामलों को उठाते रहिये, एक दिन ऐसा जरुर आयेगा कि कोई सरकार इस मामले पर गंभीरता से विचार करेगी और पत्रकारिता की गंगा की धारा जो गंदगियों के कारण अविरल नहीं बह रही, उसमें धार लाने का प्रयास करेगी...
बहुत-बहुत धन्यवाद।

Friday, March 24, 2017

जय गुरु......................

जय गुरु
पहली बार रांची मेरा पदार्पण 4 जून 1985 को हुआ था, क्योंकि 5 जून को मेरी शादी रांची में थी। मेरी पत्नी उस वक्त योगदा सत्संग विद्यालय की नौंवी कक्षा की छात्रा थी, उनके हाथों में कई बार योगी कथामृत मैंने देखा था, पर कभी पढ़ नहीं सका। उसी समय से कभी कभार योगदा सत्संग आश्रम में आना – जाना लगा रहा, कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे औषधालय गया तो कभी योगदा सत्संग द्वारा चलाये जा रहे मोतियाबिंद के आपरेशन में शामिल हुआ। हम आपको बता दें, कि छोटी-छोटी बीमारियों को लेकर अपनी पत्नी योगदा सत्संग द्वारा संचालित औषधालयों का लाभ लेने के लिए यदा-कदा जाया करती थी, पर मैं योगदा सत्संग से दिल से कभी नहीं जूड़ सका।
इसी बीच ईटीवी से जुड़ा, तब उस वक्त ईटीवी को देख रहे गुंजन सिन्हा ने हमें ईटीवी रांची में योगदान देने को कहा, और मैं ईटीवी रांची से जूड़ गया। ईटीवी से जुड़ने के दौरान समाचार संकलन के लिए हमें यदा-कदा योगदा सत्संग आश्रम जाना पड़ा। इसी दौरान हमें योगदा सत्संग आश्रम के बारे में जानकारियां मिलनी शुरु हो गयी। कुछ लोग गलत धारणाओँ से जूड़े होने के कारण गलत बताते तो कुछ आध्यात्मिक उत्थान के लिए इसे आवश्यक बताते। रांची आने के बाद हमें अपने दो बच्चों की पढ़ाई के लिए चिंता हुई, उस वक्त रांची में कई कान्वेंन्ट और अंग्रेजी पद्धति के विद्यालय थे, पर मैं इन विद्यालयों में अपने बच्चों को देना नहीं चाहता था, क्योंकि मेरा मानना था कि आप शिक्षित है, पर संस्कारित नहीं है, तो ऐसी शिक्षा आपके जीवन को नरकमय बना देती है। अचानक मैं समाचार संकलन के उद्देश्य से जगन्नाथपुर गया, जहां मेरी नजर सुदुर और रमणीक क्षेत्र एवं एकान्त में बने योगदा सत्संग विद्यालय पर पड़ी, जहां इस विद्यालय के प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र मौजूद थे। मैंने उनसे अपने बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर चर्चा की। उनकी बातें और विद्यालय का परिदृश्य देख, मैंने अपने बच्चों को इसी विद्यालय में नामांकन कराया। बड़ा बच्चा नौवी कक्षा में तो छोटे बच्चे का नामांकन सातवीं कक्षा में हुआ, चूंकि मेरी आर्थिक स्थिति भी ठीक नही थी कि मैं अपने बच्चों को बड़े स्कूलों में दे सकूं। ऐसे भी ईटीवी की ओर से मुझे उस वक्त छह हजार रुपये मासिक मिला करते थे, जिसमें 2200 रुपये तो किराये में ही चल जाते थे, ऐसे में घर चलाना और बच्चों को पढ़ाना दोनों मुश्किल था, इसलिए मैंने ऐसा स्कूल चुना, जहां कम पैसे में बच्चे संस्कार और शिक्षा दोनों प्राप्त कर लें और इसके लिए योगदा सत्संग स्कूल जैसा विद्यालय मेरी नजर में सर्वश्रेष्ठ मालूम पड़ता था।
सन् 2003 की बात है।
हमें पता चला कि योगदा सत्संग आश्रम में हर वर्ष छठी कक्षा के बच्चों के लिए एक सप्ताह का विशेष शिविर लगाया जाता है। मैंने उसी वक्त प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र से बात की, कि क्या मेरे छोटे बच्चे को उस शिविर में भाग लेने दिया जा सकता है? उनका कहना था कि ऐसा संभव नहीं, चूंकि मेरा बच्चा सातवीं कक्षा का छात्र था। इसी बीच आज स्वामी निष्ठानन्द जी, जो उस वक्त कमल जी के नाम से जाने जाते थे, मुलाकात हुई। मैंने उनसे प्रार्थना की, कि वे मेरे छोटे बच्चे को उस शिविर में रखने की अनुमति दें। उन्होंने कहा कि वे देखते है कि, वे क्या कर सकते है?  इसी बीच कोई सूचना हमें प्राप्त नहीं हुई। गर्मी की छुट्टी थी, बच्चे अपने दादी के पास पटना जाने की जिद कर रहे थे और उनकी जिद के आगे मैं अपने बच्चों को पटना भेज दिया। तभी प्राचार्य डा. विश्वम्भर मिश्र जी का मेरे पास फोन आया कि मिश्र जी आपके बच्चे को शिविर में जाने की अनुमति मिल गयी है। मुझे खुशी का ठिकाना नहीं रहा, मैंने तुरंत पटना फोन किया कि छोटे वाले बच्चे को पटना-रांची वाली बस पर बिठा दें, हम उसे रांची में ले लेंगे। मेरा छोटा बच्चा रांची आया, शिविर में भाग लिया और उस शिविर में भाग लेने का प्रभाव यह पड़ा कि उसका जीवन ही बदल गया। आज भी योगदा सत्संग आश्रम का प्रभाव उसके दैनिक जीवन पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है।
हमें खुशी है कि मेरी पत्नी और मेरे दोनों बच्चे योगदा सत्संग विद्यालय से ही अपनी पढ़ाई की शुरुआत की और वे सभी बेहतर है, संस्कारित है, सुशिक्षित है, जीवन के मूल उद्देश्यों को समझते है। मैं मानता हूं कि ये सब पूर्व जन्म के संस्कारों व किये गये कार्यों से ऐसा संभव हुआ है, नहीं तो रांची की जनसंख्या लाखों में हैं, यहां प्रतिदिन लाखों लोग आते है, जाते है, कई लोग और उनके पूर्वज तो वर्षों से यहां रह रहे है, पर उन्हें तो ऐसा सौभाग्य नहीं प्राप्त होता।
गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है...
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
बिना ईश्वरीय कृपा के, संतों से मुलाकात संभव नहीं होती है...
मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर परमहंस योगानंद जी की कृपा नहीं होती तो मेरा परिवार जो आनन्द को प्राप्त कर रहा है, वह आनन्द कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता था। ये सब पूर्व जन्म में किये गये कर्मो का फल है कि हम रांची में है, जहां योगानन्द जी की स्मृतियां हमारा मार्गदर्शन करती है।
एक दृष्टांत...
बात सन् 2014 की। मैं जयपुर में था। भयंकर बीमारी का शिकार हुआ। ऐसा लगा कि अब जीवन का अंत निकट है। मैं 2015 की गुरु पूर्णिमा के दिन सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में कार्यरत उप-निदेशक शालिनी वर्मा के साथ योगदा सत्संग आश्रम पहुंचा (इसका वर्णन मैं पूर्व के आलेखों में कर चुका हूं), उसके बाद से वह बीमारी कहां गयी, मुझे पता ही नहीं चला, आज मैं पूर्णतः स्वस्थ हूं।
और इस घटना के बाद से, योगदा सत्संग आश्रम जाने का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वो आज भी जारी है। इसी बीच स्वामी योगानन्द के अनन्य भक्त श्यामानन्द झा जी से मुलाकात हुई, उन्होंने हमें आश्रम से जुड़वाने में महत्वपूर्ण मदद की और मैं धीरे- धीरे आश्रम के और निकट होता चला गया।
ऐसे भी, मैं जब भी योगदा सत्संग आश्रम पहुंचा हूं, तो वहां गजब की शांति एवं आध्यात्मिक अनुभूतियों को हमने महसूस किया है। मैंने देखा है कि आश्रम में खड़े वृक्ष और वहां पड़े पत्थरों का समूह भी ईश्वर को भजते नजर आते है। उसका मूल कारण है कि स्वामी योगानन्द जी की इस आश्रम में बिखरी स्मृतियां और यहां उनके गुजरे पल, इस स्थान को ब्रह्म भाव प्रदान कर दिये है, क्योंकि आप जैसे ही इस आश्रम में आयेंगे और यहां से निकलेंगे, आपको स्वयं पता चल जायेगा कि आपने यहां से क्या प्राप्त किया और क्या छोड़ दिया?
इधर कुछ दिनों से योगी कथामृत मैंने पढ़ना शुरु किया है...
इधर मेरे माता-पिता और मेरा बचपन से लेकर शुरु किया गया पाठ, अब विनिद्र संत तक पहुंच गया है, जो धीरे-धीरे मेरे हृदय पटल को और आध्यात्मिकता के प्रति सुदृढ़ कर रहा है...
और अब देखिये, ये हमारा सौभाग्य है कि हम उस वक्त के साक्षी बने, जब योगदा सत्संग सोसाइटी अपना 100 वर्ष पूरा कर रही है। 22 मार्च को स्वामी योगानन्द जी द्वारा स्थापित यह आश्रम उस दिन अपनी दिव्यता का विशेष तौर पर ऐहसास करा रहा था। मेरा  हृदय पुलकित था, आंखे आंसू बहा रही थी और हाथों पर आया मोबाइल फोन उन दिव्यताओं को कैद करने का काम कर रहा था, अगर कोई हमसे उस वक्त पूछता कि स्वर्ग कहां है? तो मैं यहीं कहता कि अगर स्वर्ग की कही परिकल्पना है तो बस यहीं है।
जरा योगी कथामृत देखिये...
गुरु कैसा होना चाहिए?
शिष्य कैसा होना चाहिए?
ईश्वर को जानने और उसे पाने के लिए कैसी प्यास होनी चाहिए?
आध्यात्मिकता की ओर जाने के लिए कैसा दृढ़ विश्वास होना चाहिए?
ईश्वर कहां है?, क्या वह किसी खास जगह पर है?
क्या प्राप्त होने पर, जीवन सरल और सहज हो जाता है?
ऐसे प्रश्नों के उत्तर इतनी सरलता से योगी कथामृत में उपलब्ध है कि पूछिये मत...
योगी कथामृत का एक-एक पृष्ठ बहुमूल्य है, अमृत से युक्त है, हमारे विचार से तो सभी विद्यार्थियों को इसे पढ़ना चाहिए, अगर वे इसे पढ़ते है तो निश्चय ही, उनका जीवन परिवर्तित होगा...
इसमें कोई दो मत नहीं...
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान अतिव्यस्त होने के बावजूद, 7 मार्च को विज्ञान भवन में आयोजित योगदा सत्संग सोसाइटी के 100 साल पूरे होने पर जो भी कुछ कहा, वह बताता है कि भारत क्या है? और भारत की ताकत क्या है?
भारत की ताकत उसकी आध्यात्मिक शक्तियां है। विश्व भारत से उसकी आध्यात्मिकता को जानना, समझना और उसमें डूबना चाहता है। हम आपको बता दें कि धर्म और आध्यात्मिकता दोनों दो चीजें है।
कमाल है योगानन्द जी की आध्यात्मिकता मुक्ति में नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा में निहित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक ही कहा कि 65 साल पहले एक शरीर हमारे पास रह गया और सीमित दायरे में बंधी एक आत्मा युगों की आस्था बन कर फैल गयी। 95 फीसदी लोग इस महान योगीजी की आत्मकथा को पढ़ सकते है, किन्तु क्या कारण होगा कि बिना भारत देश और यहां के पहनावे के बारे में जाने विश्व भर के लोग योगी कथामृत को अपनी मातृभाषा में लिखकर जन-जन तक पहुंचाना चाहते है, यह प्रसाद बांटने के समान है, जिसे बांटने में आध्यात्मिक सुख की अनुभूति होती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने ठीक ही कहा कि कभी-कभी हठ योग को बुरा माना जाता है, लेकिन परमहंस योगानन्दजी ने इसकी सकारात्मक व्याख्या की है और क्रिया योग की तरफ प्रेरित किया है, जिसके लिए शरीर बल की नहीं बल्कि आत्मबल की आवश्यकता होती है। परमहंस योगानन्द जूते पहनकर मां भारती का स्मरण करते हुए इस दुनिया से जाना चाहते थे। पश्चिम में योग संदेश देने के लिए निकल पड़े, लेकिन भारत को नहीं भूले।
धन्य है परमहंस योगानन्द जी, जब उन्होंने अपना शरीर छोड़ा, उस दिन भी वे कर्मरत थे। भारत के राजदूत के सम्मान समारोह में व्याख्यान दे रहे थे। कपड़े बदलने में भी समय लगता है, लेकिन वे क्षण भर में चले गये। उन्होंने कहा कि जहां गंगा, जंगल, हिमालय, गुफाएं और मनुष्य भी ईश्वर पाने के स्वपन देखती है। वे धन्य है कि उनके शरीर ने उस मातृभूमि को स्पर्श किया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वे बातें आज भी मेरे कानों में गूंज रही है, जो उन्होंने परमहंस योगानन्द जी के बारे में कहा कि, अगर संस्था का मोह होता तो व्यक्ति के विचार, प्रभाव और समय का इस पर प्रभाव होता, लेकिन जो आंदोलन कालातीत होता है, काल के बंधनों में बंधा नहीं होता, अलग-अलग पीढ़ियां आती है, तो भी व्यवस्थाओं को न कभी टकराव आता है, न कभी दुराव आता है। वे हल्के-फुल्के ढंग से अपने पवित्र कार्य को करते रहते है। परमहंस योगानन्द का बहुत बड़ा योगदान है कि वे ऐसी व्यवस्था देकर गये, जिसमें बंधन नहीं है तो भी जैसे परिवार को कोई संविधान नहीं होता, फिर भी परिवार चलता है।
दुनिया आज अर्थजीवन और तकनीक से प्रभावित है, इसलिए दुनिया में जिसका जो ज्ञान होता है, उसी तराजू से वह विश्व को तौलता भी है। भारत को लोग जीडीपी, रोजगार और बेरोजगारी से तौलते है, पर भारत की सबसे बड़ी ताकत है, उसकी आध्यात्मिकता। भारत का आध्यात्मीकरण ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है और इसमें परमहंस योगानन्द जी की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण रही है।
किसी ने ठीक ही कहा है कि योग एक प्रक्रिया है, इसे समझिये, क्रिया योग के द्वारा आप इसे बेहतर ढंग से समझ सकते है, आप अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। इसी क्रिया योग को लेकर, परमहंस योगानन्द जी जन-जन तक पहुंचे थे, आज योगदा सत्संग सोसाइटी उसी कार्य को कर रही है।
आप यह भी जान लीजिये कि योगी, योगी  होता है, वह युगों-युगों तक रहता है, क्योंकि न तो वो आता है, न ही जाता है, नही मिटता है, और नहीं कोई उसे मिटा सकता है। योग अंतिम नहीं है, बल्कि यह प्रवेश द्वार है, उस परमपिता परमेश्वर तक पहुचंने का...
खुशी इस बात की है कि परमहंस योगानन्द जी द्वारा लगाया गया यह वटवृक्ष 100 साल का हो गया है, निरंतर आगे की ओर बढ़ रहा है तथा लोगों को आध्यात्मिकता से जोड़कर, क्रियायोग के माध्यम से विश्व को भारत की आध्यात्मिकता की शक्ति से ओत-प्रोत कर रहा है।
धन्य है योगदा सत्संग सोसाइटी से जुड़े वे संत, वे संन्यासी जो निरंतर चल रहे इस यज्ञ में स्वयं को समिधा बनाकर आहुति के रुप में स्वयं को प्रस्तुत कर रहे है...
ईश्वर से प्रार्थना भी कि यह पुनीत कार्य, चूंकि उन्हीं के द्वारा चल रहा है, हम जैसे लोगों का भी मार्गदर्शन करें, ताकि हमारा जीवन भी सफल हो सकें, हमारा शरीर धारण करना सचमुच में सार्थक हो सकें...
जय गुरु

Wednesday, January 13, 2016

ऐसे ही युवा मंत्री की झारखण्ड को जरुरत है......

ऐसे ही युवा मंत्री की झारखण्ड को जरुरत है...
जो इसकी परवाह नहीं करें कि उसका भाषण सुननेवालों की संख्या कितनी है...
या हैं भी या नहीं...
वो डंके की चोट पर अपने इरादे को स्पष्ट रुप से रखे...
और वहीं करें, जिसका संकल्प लेकर वो घर से निकला है...
आज सुबह – सुबह एक अखबार पर नजर पड़ी है, प्रथम पृष्ठ पर राज्य के पर्यटन मंत्री अमर कुमार बाउरी का भाषण देते हुए तस्वीर है, जिसमें दिखाया गया है कि अमर कुमार बाउरी भाषण दे रहे हैं, पर उन्हें सुननेवाला कोई नहीं...
मेरा मानना है,
कि हम भारत में रहते हैं...
भारत के शब्द है ये, जो कहते है कि आप को जो करना है, करो...
क्योंकि सुक्ष्मावस्था में बहुत सारे ऐसे जीव है, जो आपको देख व सुन रहे है...
बधाई अमर कुमार बाउरी जी, आपने वो कर दिखाया, जो बहुत कम ही लोग करते है...
दूसरा नेता रहता या उस अखबार का ही कोई प्रतिनिधि होता तो भाग खड़ा होता...यह कहकर कि यहां तो कोई हैं ही नहीं, तो भाषण किसको सुनाऊँ...
खैर,
इसी घटना को देख व सुनकर मुझे ईटीवी धनबाद याद आ गया...। जब मैं ईटीवी धनबाद कार्यालय में कार्यरत था, तब उसी दौरान ईटीवी हैदराबाद मुख्यालय से एंटी टूबैको कंपेन चलाने को कहा गया। संभवतः जून का महीना था, जिस दिन से एंटी टूबैको कंपेन चलना था, संयोग से ठीक उसके एक दिन पहले विश्व हिन्दू परिषद ने भारत बंद का ऐलान कर दिया। हैदराबाद से फोन आया कि चूंकि विश्व हिन्दू परिषद ने भारत बंद का ऐलान कर दिया है, इसलिए एंटी टूबैको कंपेन दूसरे दिन से चलाया जायेगा। मैंने तुरंत सवाल खड़ा किया कि घर में शादी- विवाह होता, और उसी दिन कोई संगठन बंद का कॉल कर देता तो क्या आनन-फानन में शादी – विवाह का दिन भी बदल जाता क्या? हैदराबाद वालों ने कहा कि आप पूर्व निर्धारित तिथि अनुसार कार्य करें, बाकी जगहों पर एक दिन बाद शुरु होगा और मैंने पूर्व निर्धारित तिथि और समयानुसार कार्यक्रम को संपन्न कराया। कहीं कोई दिक्कत नहीं। जिनको भारत बंद करना था, वे भारत बंद किये और हमें एंटी टूबैको कंपेन चलाना था, मैंने एंटी टूबैको कंपेन चलाया। इसी बीच इस कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए, हमें एक आदमी की तलाश थी, जिसने कभी टूबैको को यूज नहीं किया हो। संयोग से पता चला कि धनबाद रेल मंडल के तत्कालीन मंडल रेल प्रबंधक अम्बरीश कुमार गुप्ता इन सबसे वंचित है। मैने उनसे उद्घाटन के लिए आग्रह किया, मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए, वे ठीक समय पर पहुंचे। उस वक्त भी मेरे उद्घाटन कार्यक्रम के समय एक भी व्यक्ति मौजूद नहीं था, फिर भी चूंकि समय निर्धारित था, मैंने बिना किसी के परवाह किये, कार्यक्रम का उद्घाटन करवाया, क्योंकि मैं जानता था कि समय का क्या महत्व है?
और ऐसे भी, कोई रहे या न रहे...आप जो करने जा रहे है, उसकी धमक जहां तक पहुंचनी है, पहुंचेगी ही, गर आपका चरित्र और लक्ष्य सही है, लीजिये और हम इसमें कामयाब भी हुए।
इस कार्यक्रम को संपन्न कराने में जिन्होंने हमारी दिल से मदद की, उन्हें मैं भूल नहीं सकता। वे थे जगदीश राव, जो आजकल वाराणसी में हैं और दूसरे रहमान भाई जो धनबाद क्रिकेट से जूड़े है...सचमुच आप दोनों एक बार फिर याद आ गये...मैं आप दोनों को भूल नहीं सकता, भाई।

Monday, October 26, 2015

मीडिया की संकीर्ण मानसिकता...........

कल यानी 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के तहत अपनी विचारधारा भारतीय जनमानस के बीच रखने का प्रयास किया। इस कार्यक्रम को सभी चैनलों ने बारीकी से जनता के समक्ष रखा। प्रधानमंत्री ने इस मन की बात कार्यक्रम के दौरान बहुत ही अच्छी – अच्छी बातें की, गर उस पर सचमुच ध्यान दिया जाय तो मानवता और भारतीयता को बल मिलेगा। अंगदान, ग्रुप बी, सी एवं डी में साक्षात्कार की समाप्ति व सांसदों द्वारा गांवों को गोद लेकर उनके कायाकल्प का कार्य आदि बातों को प्रधानमंत्री ने जोरदार ढंग से उठाया और लगे हाथों प्रधानमंत्री ने स्वच्छता कार्यक्रम को भी जनता के समक्ष रखा।
इस स्वच्छता कार्यक्रम में मीडिया की भूमिका की भी प्रधानमंत्री ने जमकर सराहना की। प्रधानमंत्री ने आजतक, ईटीवी, जीटीवी, एबीपी, एनडीटीवी आदि चैनलों की जमकर प्रशंसा की, पर किसी चैनल ने अपने समाचार में ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने जब मीडिया की सराहना की तो उन्होंने सिर्फ एक चैनल का नाम नहीं लिया, बल्कि बहुतेरे चैनलों का नाम लिया, कुछ अखबारों का भी नाम लिया। सारे चैनलों ने अपने अपने समाचार के बुलेटिन में जब भी स्वच्छता कार्यक्रम के समाचार की बात हुई तो अपनी पीठ खुद थपथपाई, ये कहकर की प्रधानमंत्री मन की बात में उनके चैनल यानी जो चैनल समाचार प्रसारित करता, सिर्फ अपने चैनल का नाम लेकर समाचार का इतिश्री कर लेता। क्या ये संकीर्ण मानसिकता नहीं है?
अच्छा तो ये होता कि सारे चैनल, गांव व देश की सफाई के कार्यक्रम को जमीन पर उतारने की तरह अपने संकुचित मानसिकता की भी सफाई करते और ईमानदारी से लोगों को बताते कि प्रधानमंत्री ने विभिन्न चैनलों का नाम लिया और उन्हें इस बात की बधाई दी, कि वे स्वच्छता कार्यक्रम को महत्व दे रहे है।
मतलब समाज के सामने भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करनेवाले, नेताओं के बोली के बाल का खाल निकालनेवाले कितना एक दूसरे से ईर्ष्या करते है, ये बातें एक बार फिर कल स्पष्ट रुप से उजागर हो गयी। मैं रांची में भी देखता हूं कि कई अखबार बहुत अच्छे – अच्छे कार्यक्रम का आयोजन करते है, पर वह समाचार सिर्फ उसी अखबार में दिखाई पड़ता है, जो करा रहा होता है, क्या ये ईर्ष्या अथवा जलन नहीं है? गर ये ईर्ष्या व जलन है, तो फिर ऐसे लोगों से क्या समाज व देश का भला होगा, या हित होगा? इस प्रश्न को मैं जनता के समक्ष रख रहा हूं, जनता चिन्तन करें......

Monday, June 1, 2015

विजय ने ताल ठोंकी और शेखर मेयर बन गया............



मैंने धनबाद को पत्रकारिता के दौरान दो-दो बार सेवाएं दी। एक जब दैनिक जागरण का ब्यूरो प्रमुख बना तब और दूसरी बार जब ईटीवी ने धनबाद की बागडोर सौंपी। नजदीक से देखा हूं, धनबाद को। यहां ए के राय जैसे महान वामपंथी विचारक व विजय झा जैसे देशभक्त लोग है तो  दूसरी ओर कई लंपटों का समूह भी हैं, जो येन-केन-प्रकारेण धनबाद को अपनी स्वार्थ के लिए बर्बाद करता रहता हैं और इसी को वो समाज सेवा के रुप में आमजन को प्रदर्शित भी करता हैं। आश्चर्य इसलिए भी कि जनता भी कभी-कभी उसके इस झांसे में आकर स्वयं को गौरवान्वित भी महसूस करती है। चलिए छोड़िये इन बातों को, अब हम बात करते हैं, इस बार हुए धनबाद के मेयर चुनाव की। इस बार मेयर के चुनाव में चंद्रशेखर अग्रवाल भारी मतों से विजयी हुए हैं। चंद्रशेखर अग्रवाल विशुद्ध रुप से भाजपाई हैं। मेयर चुनाव जीतने के बाद फिलहाल गणेश परिक्रमा करने के लिए रांची आये हुए हैं। गणेश परिक्रमा में ये सर्वप्रथम भाजपा कार्यालय जाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और कार्यालय में वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मिल चुके हैं। तदुपरांत मुख्यमंत्री आवास जाकर मुख्यमंत्री रघुवर दास की परिक्रमा भी कर चुके हैं। सूत्रों की माने तो चंद्रशेखर अग्रवाल रघुवर गुट से आते हैं, जबकि मेरा मानना हैं कि राजनीति में कोई गुट नहीं होता, जब आप शक्तिशाली होते हैं तो सभी आपके गुट के होते हैं और जब दुर्बल होते है तो आपसे लोग कन्नी कटाते है। स्थिति ऐसी होती हैं कि वे दुर्बल व्यक्ति अथवा नेता के साथ फोटो खीचाना तो दूर, गर पुराना फोटो भी होता हैं तो उसे ऐसा दबा कर रख देते हैं कि कहीं कोई उस फोटो को फेसबुक वाल पर डालकर उसकी राजनीति की नैया न डूबा दें।
फिलहाल चंद्रशेखर अग्रवाल ने मेयर का चुनाव जीतकर धनबाद के सांसद पी एन सिंह और धनबाद के विधायक राज सिन्हा की औकात तो जरुर बता दी, क्योंकि इन दोनों नेताओं ने चंद्रशेखर अग्रवाल को हराने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दी थी। यहीं नहीं जिस चंद्रशेखर अग्रवाल को खुद को भाजपा नेता-कार्यकर्ता कहने में गर्व महसूस होता था। उस चंद्रशेखर अग्रवाल को दिन में तारे दिखाई पड़ने लगे थे, जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनसे दूरियां बनाकर, पीएन सिंह और राज सिन्हा समर्थक प्रत्याशी राज कुमार अग्रवाल को जीताने के लिए पील पड़े। बेचारे अब शेखर क्या करें। वस्तुतः सांसद पी एन सिंह और विधायक राज सिन्हा को चंद्रशेखर अग्रवाल से भविष्य में होनेवाले संकट को लेकर स्पष्ट खतरा महसूस हो रहा था। इन दोनों को लग रहा था कि गर चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीते तो कहीं ऐसा नहीं कि भाजपा आनेवाले दिनों में सांसद का टिकट अथवा विधायकी का टिकट चंद्रशेखर अग्रवाल के लिए सुरक्षित न कर दें, क्योंकि सांसद के रुप में पीएन सिंह का कार्य धनबाद की जनता के अनुरुप नहीं रहा हैं, और न ही संसद में इन्होंने कोई ऐसा कमाल दिखाया हैं, जिस पर धनबाद की जनता गर्व कर सकें। राज सिन्हा तो चूंकि पहली बार विधायक ही बने हैं, इसलिए अभी इन पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, पर इतना तो तय हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल की जीत, पी एन सिंह और राज सिन्हा की नींद हराम कर दी हैं। आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल को जीत कैसे मिली। उसका मूल कारण – विजय झा का शेखर अग्रवाल के लिए चाणक्य की भूमिका में प्रकट होना और पूरे चुनाव की जिम्मेदारी और उसका संचालन ही नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी से इसकी मानिटरिंग करना। चूंकि विजय झा, एक समय भाजपा जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं, साथ ही उनकी छवि निर्विवाद रही हैं, आज भी वे धनबाद में एक प्रतिष्ठित समाजसेवक के रुप में याद किये जाते है। पूर्व में मेयर के चुनाव में उनकी पत्नी शिवानी झा मुख्य प्रतिद्वंदी रही, इसलिए पूर्व का अनुभव भी विजय झा के साथ रहा। जिसका इस्तेमाल, उन्होंने इस चुनाव में किया और नतीजा सामने है। चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीत गये। संभव हैं आनेवाले समय में वे सांसद और विधायकी पर भी दावा ठोंके पर ये तो भविष्य की बात हैं। हमें लगता हैं कि भाजपा को भी अब विचार करना होगा, क्या वो कांग्रेस की बी टीम होगी, या स्वयं को परिमार्जित करेगी, शुद्ध करेगी। उसे आत्ममंथन करना होगा कि  आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल की जगह राज कुमार अग्रवाल भाजपाईयों की पसंद क्यूं बन गये। आखिर विजय झा जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का भाजपा से मोहभंग क्यों हो गया। गर एक एक कर इसी तरह से योग्य व सम्मानित व्यक्ति अपमानित होकर, भाजपा से निकलते गये तो इसमें कोई दो मत नहीं कि आनेवाले समय में जो जितना बड़ा भ्रष्ट वो उतना बड़ा भाजपा का कैंडिडेट होगा, फिर भाजपा का आम नागरिकों के हृदय में क्या स्थान होगा। भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को अभी से ही आत्ममंथन करना शुरु कर देना चाहिए। साथ हीं, हमें लगता हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल को भी समझ में आ गया होगा कि भाजपा क्या हैं, क्योंकि ये जीत उन्हें भाजपाईयों ने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति ने दिलायी, एक ऐसे जनसमूह ने दिलायी, जिसका भाजपा से प्यार नहीं था, बल्कि प्यार था, सम्मान से, प्यार था प्रतिष्ठा से, प्यार था धनबाद के स्वाभिमान और विकास से। ये बातें चंद्रशेखर अग्रवाल को गांठ बांधकर रख लेना चाहिए, नहीं तो कालांतराल में क्या स्थिति होगी, वो समझ सकते हैं, क्योंकि जनता किसी की भी जागीर नहीं होती..........

Thursday, November 29, 2012

ट्रेन में वो अनोखा प्यार........................

ये उन दिनों की बात है। जब मैं ईटीवी में अपनी सेवा दे रहा था। उन्हीं दिनों ईटीवी मुख्यालय हैदराबाद में हर तीन - तीन महीने पर ईटीवी के मालिक रामोजी राव स्वयं बैठकें लिया करते थे। समय - समय पर कुछ लोगों को उस बैठक में आमंत्रित भी किया जाता था। संयोग से उन दिनों, मैं तीन - चार बैठकों में भाग लिया था। इन्हीं बैठकों में भाग लेने के दौरान, मैंने फलकनुमा एक्सप्रेस में कुछ दृश्य देखे, जो आज भी हमें रोमांचित करते हैं। कभी - कभी तो मेरी जुबां से, उन दृश्यों को याद कर, ये शब्द अनायास निकल पड़ते हैं कि लोग प्यार को क्या समझते हैं। शारीरिक भूख अथवा त्याग की पराकाष्ठा। 
आज फिर वो दृश्य याद आये हैं। मैं अपने आपको रोक नहीं पा रहा हूं और उन्हें शब्दों में पिरोने की कोशिश कर रहा हूं। मैं, अपने मित्रों के साथ हैदराबाद से रांची के लिए लौट रहा था। सिकन्दराबाद के आठ नंबर प्लेटफार्म पर, फलकनुमा एक्सप्रेस लगी थी। मैं उक्त ट्रेन में यथोचित बर्थ पर जाकर विश्राम की मुद्रा में आ गया। ट्रेन चल पड़ी थी। मुझे इस ट्रेन को खड़गपुर में छोड़कर, खड़गपुर से ही रांची के लिए हावड़ा हटिया एक्सप्रेस पकड़ना था। बच्चों की याद आ रही थी। साथ ही पत्रकारिता जगत में मनुष्य के रुप में छुपे पशु भी धीरे धीरे एक - एक कर हमारे हृदय में अवतरित हो रहे थे। कैसे लोग, अपनी घटियास्तर की मनोवृत्ति को, अक्षरशः सिद्ध करने के लिए, नाना प्रकार का कुकर्म करते हैं। वह भी देखकर, मैं अचंभित था। कुछ लोग इस प्रकार के बारे में, हमसे कह चुके थे -- जनाब यहीं दुनियादारी हैं। मैं दुनियादारी, शायद समझ रहा था। इसी दुनियादारी के क्रम में रांची, डालटनगंज और धनबाद की परिक्रमा कर चुका था, पर मैं अपने परिवार के द्वारा मिले संस्कार की बात कहूं या 32 वर्षों तक उन संस्कारित व्यक्तियों की मिली श्रृंखला कहूं, जिससे हमें यहीं प्राप्त हुआ कि गंगा बहती रहती हैं, कुछ लोग उससे आचमन करते हैं और कुछ लोग उसी में गंदगी बहाते हैं, पर गंगा तो गंगा हैं, उसे इससे क्या मतलब की, उसके जल से कौन क्या करता हैं, वो तो सदैंव पहले भी बहा करती थी, आज भी बहती हैं और कल भी बहेगी। लेकिन अब तो चिंता होती हैं कि गंगा अब कैसे बहेगी, कई ने इसकी धारा को रोकने का वो प्रयास शुरु किया हैं कि अब गंगा के भविष्य को भी खतरा उत्पन्न हो गया हैं, फिर भी इन सब बातों से दूर, आज गंगा बह रही हैं। यहीं हमारे लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।
बात कर रहा हूं, अनोखे प्यार की, कही विषय से विषयांतर न हो जाउं, इसका मुझे डर बराबर लगा रहता हैं, फिर भी, अब मैं उस प्लाट पर आता हूं, जो हमारे विषय का महत्वपूर्ण बिंदु है। फलकनुमा एक्सप्रेस अपनी तेजी से बढ़ी जा रही थी। रात कब बीती, पता ही न चला। देखते देखते ट्रेन सुबह के वक्त श्रीकाकुलम को पार करते हुए, उड़ीसा प्रांत में प्रवेश कर चुकी थी। अचानक मैंने देखा कि जिस डिब्बे में हम थे। उस डिब्बे में ब्रह्मपुर स्टेशन के पास एक वृद्ध जिनकी उम्र 85 की होगी, दयनीय अवस्था में, अपनी 77 -78 वर्षीया वृद्ध पत्नी के साथ जैसे - तैसे ट्रेन में सवार हुए। ट्रेन में सवार टीटीई ने उन्हें नीचे उतारने की असफल कोशिश की, पर वृद्ध और वृद्धा की कातर आंखों ने, उक्त टीटीर्ई पर ऐसा करने से रोक लगा चुकी थी। उधर वृद्ध ने वृद्धा को एक ओर बिठाया, थोड़ी राहत की सांस ली। राहत की सांस लेने के बाद, उक्त गर्मी में, वृद्धा की प्यास कैसे बुझे, वृद्ध ने ट्रेन में ही बिखड़े प्लास्टिक के बोतलों का सहारा लिया और उसमें पड़े पानी से वृद्धा की प्यास बुझायी। प्यास बुझाने के बाद, वृद्धा को कुछ सांकेतिक भाषाओं में समझाते हुए, उसने हर डिब्बे की चक्कर लगानी शुरु कर दी। इधर मैं अपने बर्थ पर जाकर, आराम करना शुरु किया, तभी अचानक, मुझे नीचे से कुछ सरकने की आवाज आयी। नीचे देखने पर, हमने देखा कि उक्त वृद्ध कुछ खोज रहा था। हमें अधिक दिमाग लगाने की जरुरत ही नहीं पड़ी। उसके एक हाथ में प्लास्टिक के बैग में पड़े भोजन के अवशेष बताने के लिए काफी थे कि वह रेलयात्रियों के खाये हुए भोजन से बचे जूठन से कुछ अपने लिए और अपनी पत्नी के लिए भोजन की तलाश कर रहा था। देखते - देखते, वह बहुत कुछ अपने लिए निकाल चुका था। फिर उसने अपनी पत्नी के पास जल्दी पहुंचना जरुरी समझा। इधर ट्रेन भुवनेश्वर के आस - पास आ चुकी थी। मैं थोड़ा अपनी बॉडी को सीधा करने के लिए, डिब्बे के दरवाजे तक पहुंचा।
डिब्बे के दरवाजे पर जो हमने दृश्य देखा, वो चौकानेवाले थे। वृद्धा गर्मी से बेहाल थी। संभव हैं, उसे बुखार भी होगा, क्योंकि जो उसके चेहरे थे, वो बहुत कुछ कह रहे थे। अचानक प्लास्टिक के थैले से वृद्ध ने भोजन के जूठन से एक टूटा फूटा अंडा निकाला और अपनी वृद्ध पत्नी को खाने को दिया। वृद्ध पत्नी ने उसे खाने से मना कर दिया। उसने  ( वृद्ध पत्नी ने ) कहा कि पहले तुम ( वृद्ध ) खाओ। वृद्ध ने कहा कि तुम ( वृद्ध पत्नी ) बीमार हो, तुम इसे खाओगी तो तुम्हें ताकत होगा, और जल्दी ठीक हो जाओगी। इधर वृद्ध पत्नी ने कहा कि नहीं ये अंडा हैं, इसमें बहुत ताकत होता हैं, तुम ( वृद्ध ) खाओगे, तो तुम्हें ताकत होगी, फिर तुम ( वृद्ध ) जब स्वस्थ होगे, तो तुम  ( वृद्ध ) देखभाल हमारी ( वृद्ध पत्नी को )अच्छी तरह कर सकोगे, नहीं तो हमारी देखभाल कौन करेगा। इसी प्रेमालाप वाली तकरार में समय बीत रहा था, पर न तो वृद्ध और न वृद्ध की पत्नी ही खाने को तैयार थे, अंत में दोनों ने निश्चय किया कि दोंनो आधी - आधी खायेंगे ताकि किसी को किसी के प्रति हीनभावना न आये और दोनों ने ऐसा ही किया। 
ऐसी अवस्था जहां पर कोई किसी को पूछने को तैयार नहीं, वहां ऐसी सोच, रेल में यात्रा करते समय हमें एक संदेश दे गया। प्रेम का मतलब क्या - स्वार्थ या त्याग। गर स्वार्थ है तो वहां प्रेम रह कैसे सकता हैं। जहां त्याग होता हैं वहीं तो प्रेम हैं। सचमुच फलकनुमा एक्सप्रेस की वो प्रेमगाथा, हमें आज भी याद आती हैं और मैं बेचैन हो उठता हूं। एक सवाल ये भी अपने आप से पूछता हूं कि दुनिया में कितने लोग हैं जो अपनी पत्नी को इस प्रकार से प्रेम करते हैं या पत्नियां अपने पति के प्रति इतना सुंदर भाव रखती हैं।

Tuesday, November 22, 2011

बाकी भूत-प्रेत...................


ये उस वक्त की बात हैं। जब मैं ईटीवी में कार्यरत था। मेरी पोस्टिंग धनबाद में थी। चूंकि परिवार और बच्चे रांची में रहकर पढ़ाई कर रहे थे, तो साप्ताहिक अवकाश के दिन रांची में बिताना मेरी मजबूरी हुआ करती थी, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे, सप्ताह में एक दिन भी मेरे साथ दूर रहे। इसी दौरान रांची - धनबाद और धनबाद - रांची करना मेरा साप्ताहिक कार्यक्रम हुआ करता था। पर इसी कालखंड में, एक से एक लोग यात्रा के दौरान मिले भी, जो देखने में तो बहुत सुंदर पर अंदर से उतने ही काले। सिर्फ अपने लिए जीने की चाह रखनेवाले, जबकि कई ऐसे भी थे, जिनको अपनी तो चाह नहीं, पर दूसरे के लिए जीना चाहते थे। उन्हीं में से एक घटना, अपने मित्रों के बीच शेयर करना चाहता हूं। आमतौर पर जहां से ट्रेन खुलती हैं, ट्रेनों की साफ - सफाई होती ही हैं, पर जैसे ही वो ट्रेन अपने गंतव्य की ओर धीरे-धीरे बढ़ती हैं, उसी ट्रेन में सफर करनेवाले, उस ट्रेन की बॉगी के साथ ऐसा शत्रुवत् व्यवहार करते हैं, जैसे लगता हैं कि अब इस ट्रेन से उनका वास्ता ही नहीं होगा। कभी - कभी मैं खुद व्यंग्यात्मक रुप से ऐसे लोगों से कह भी देता कि जनाब, आपने ट्रेन की पूरी कीमत वसूल ली हैं, ऐसा आपको करना भी चाहिए, क्योंकि ट्रेन की बॉगियां, इसी के लिए तो बनी हैं। जैसे आप खुद देखते होंगे कि ट्रेनों में पंखों के उपर जूते - चप्पल रखना, दरवाजों और शौचालयों के आसपास पान और गूटखों को पीक फेंकना, जालीदार बने सामान रखनेवाले जगह पर, उन जालियों में पान खोंसदेना या बेवजह की कागज, पालिथिन ठूस देना, जो हवाओं के आनेजाने के लिए बने हैं। यहीं नहीं, मूंगफली के छिलकों से पूरे कपार्टमेंट को गंदा कर देना, शौचालय में गये तो सीट से अलग शौच करना, फ्लैश नहीं चलाना, शौचालय के दीवारों पर कलम अथवा पेंसिल से अपनी कुत्सित भावनाओं को उकेरना, यहीं तो हम करते हैं, और करते आ रहे हैं, करते रहेंगे। गर पैसे ज्यादा हो गये तो एसीवाली बॉगी में भी वहीं हरकतें करना, पान की पींक बर्थ व सीट के नीचे फेंक देना, खाने-पीने के सामानों को यूज कर, उसके शेषांश इधर - उधर फेंक देना, और फिर इन गंदगियों के बीच भारतीय राजनीति पर चर्चा करते हुए, सारी गंदगियों और भ्रष्टाचार को लेकर, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं पर अपना गुस्सा निकालना, पर कभी भी किसी भी हालत में स्वयं को नहीं परखना कि हमारी थोड़ी सी गलती और नासमझी ने, उस जगह को नर्क बना दिया, जिस नर्क ने गंतव्य की ओर पहुचंने के क्रम में नाना प्रकार की बीमारियां उन्हें भी दी, जिन्होंने इसे फैला दी थी। ये वो लोग हैं, जो अपने घरों में रहते हैं तो ऐसी गंदगी अपने घरों में नहीं फैलाते, पर दूसरों के घरों और अन्य जगहों पर, इनकों सारा जगह कूड़ा ही नजर आता हैं, या यों कहें तो इन्हें कूड़े - कचड़े में रहना ही ज्यादा मजा आता हैं, इसलिए हर प्रकार की गंदगियां फैला देते हैं। एक दिन इन्हीं गंदगियों के बीच, धनबाद से रांची जाने का अवसर मिला। हम आपको बता दें कि धनबाद से रांची जाने के लिए हमें धनबाद एलेप्पी एक्सप्रेस पकड़नी थी। उस ट्रेन में मात्र एक ही जेनरल बॉगी होता हैं, जिसमें हम जैसे तैसे घूसे। भीड़ इतनी थी कि मुझे ट्रेन के बागी के प्रवेश द्वार पर ही टिकना पड़ा। ट्रेन खुल चुकी थी, एक व्यक्ति जो दिखने मे सज्जन, गले मे सोने की चैन, हाथ में महंगी घड़ी, सुट पहने, पांव में शानदार जूते और मुंह में गुटके चबाये थे, पास में ही खड़े थे। गुटके का गंध शायद उनको ज्यादा पसंद आ रहा था, पर उस गंध से कई लोग परेशान दीखे, मेरी तो हाल ये थी कि पूछिये मत। अचानक, मैने देखा कि जनाब ने, इधर - उधर नजर दौड़ायी, और ट्रेन के दोनो ओर बने शौचालय के बीच वाली जगह में गुटखे की ऐसी पिचकारी छोड़ी की कई लोगों के कपड़ों में वो लगने से बची। जनाब ने तो खुद राहत महसूस की, पर लोगों के हालत देखने लायक थे। मैने उस जनाब से कहा कि आप दिखने में तो रईस लगते है, कहां जाना हैं। उन्होंने बताया कि, उन्हें बस रांची जानी हैं। बात बढ़ी, मैंने कहा कि जब आप जैसे महानुभावों के लिए भारतीय रेल ने एक - एक बागी में छह- छह पीकदान, चार- चार शौचालय और उसमें भी पीकदान की व्यवस्था कर दी हैं तो फिर आप उसका उपयोग क्यों नहीं करते, क्यों दूसरो पर गुटखे का धौंस जमाते हुए, बागी को पीक से कलरफूल बनाने की कोशिश करते हैं, इससे लोगों को दिक्कत होती हैं, आपको समझ में नहीं आता। बस क्या था, जनाब भड़क गये, उन्हें इस बात को लेकर गुस्सा था कि मैंने उन्हें आईना क्यूं दिखाया, आईना दिखाया तो दिखाया, उसमें उनका चेहरा क्यूं नजर आया। वे पील पड़ें, चलिए आपको देख लूंगा। बात बढ़ती चली गयी। अचानक मैने देखा कि कोई मेरे पांव को स्पर्श कर रहा हैं, पता चला - कि स्पर्श करनेवाला व्यक्ति और कोई नहीं, नेत्रहीन हैं। शायद वो कुछ कहना चाहता हैं। नेत्रहीन व्यक्ति ने मुझसे कहा - ऐ बेटा।
मानुष मानुष बहुत हैं, मानुष में बड़ भेद।
कोई कोई तो मानुष हैं, बाकी भूत - प्रेत।।

उस नेत्रहीन ने, जैसे लगा कि सब कुछ क्लियर कर दिया। कि जो इस ट्रेन में सवार थे, सभी दीख तो मनुष्य रहे थे, पर इनमें भी मनुष्यों की संख्या कम ही थी। ज्यादा तो भूत-प्रेत ही दीख रहे थे। जिन्हें न तो इंसानियत और न ही साफ - सफाई से मतलब था। मतलब तो केवल एक था कि खुद साफ रहो और दूसरे को गंदा करते रहो। नेत्रहीन के संवाद ने तो स्पष्ट ये भी किया कि इन आंखवालों के बीच में एक ही आंखवाला था, जो नेत्रहीन था, पर अपने विचारों और दोहों से मुझे इतना प्रभावित किया, कि उसे घटना को आज तक मैं भूल ही नहीं पाया।

Monday, November 29, 2010

स्थानांतरण एक एसपी का ......


जनता चाहती हैं, कि वो मेरे पास रहे, मेरे साथ रहे, मेरे हर दुख सुख में साथ दें, क्योंकि वो जब से आयी, तब से धनबाद में वो चीज थम गया, जिसके लिए धनबाद जाना जाता था। आखिर वो कौन हैं – जिसके बारे में धनबाद की जनता ने धनबाद बंद बुला दिया और यहीं नहीं सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने को तैयार हो गयी। स्पष्ट हैं – वो नाम हैं, धनबाद के वर्तमान एसपी सुमन गुप्ता का। वो हैं महिला, पर पुरुषार्थ इतना भरा कि उनके सामने पुरुष की पुरुषार्थ भी फेल। जब वो धनबाद की एसपी बनी थी, तब मैं उस वक्त ईटीवी धनबाद का प्रभारी था। मनौज कौशिक एसपी की विदाई हो गयी थी और सुमन गुप्ता प्रभार ले रही थी। व्यवसायी वर्ग रोज रोज की रंगदारी से तंग था, कोल माफियाओं की तूती बोल रही थी। नेताओं-माफियाओं-भ्रष्टाचार में लिप्त कुछ पुलिसकर्मी और पत्रकारों का गठजोड़ अपने रंग में था। ऐसे में इन पर नकेल कसना और धनबाद को रास्ते पर लाना कोई सामान्य काम नहीं था। ऐसे भी कहा जाता हैं कि जो भी आईपीएस झारखंड आता है, और उसे पैसे कमाने होते हैं तो वो एक बार धनबाद की पोस्टिंग चाहता हैं, इसके लिए वो सत्ता में बैठे नेताओं को मुंहमांगी रकम देने को भी तैयार होता है। यहीं नहीं जब पैसे के बल पर, वो एसपी धनबाद आ जाता हैं, तब अपने मनमुताबिक, वो थाना प्रभारियों को नियुक्त करता हैं, सस्पेंड करने का नाटक करता हैं और जम कर पैसे कमाता हैं। ऐसे एसपी को कुछ करने की भी जरुरत नहीं पड़ती, धनबाद हैं, इसलिए पैसे खुद ब खुद इनके पास पहुंच रहा होता हैं, पर इसके बदले में एक सामान्य जनता को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं। चाल धंसते हैं, सामान्य लोग मरते हैं, व्यवसायियों से रंगदारी मांगी जाती हैं, अपहरण उद्योग चलता हैं, रेलवे से लोहे और कोयले की चोरी नहीं, तस्करी होती हैं और अपना प्रांत व देश लूट रहा होता हैं। इधर, भ्रष्ट एसपी, आराम से सो रहा होता हैं, क्योंकि उसे सोने की कीमत हर महीने, कार्यालय, आवास अथवा मनमुताबिक जगहों पर पहुंचा दी जाती हैं।
सुमन गुप्ता, झारखंड का एक जाना पहचाना नाम हैं, इसलिए नहीं कि वो एसपी हैं, इसलिए कि वो अपने कामों से जनता का दिल जीती हैं, साथ ही दिल जीती हैं, उन पुलिसकर्मियों का जो ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ हैं, और उक्त जनता का, जिसे लटपट से कोई मतलब नहीं, सिर्फ उसे मतलब हैं कि चैन से जीने का। जब मैं ईटीवी धनबाद में था, तभी मैं समझ गया था कि इनकी नेताओं, माफियाओं, धनबाद में रह रहे कुछ भ्रष्टपुलिसकर्मियों और पीतपत्रकारिता में संलिप्त लोगों से नहीं बनेगी, और हुआ भी ऐसा ही। सुनियोजित साजिश के तहत शुरु से ही ऐसा ताना बाना बनाया जाने लगा, जैसे लगता हैं कि इनके आने से धनबाद में अमन चैन ही खत्म हो गया हो। और रही सही कसर निकाल दी, धनबाद में धीरेन्द्र प्रकरण ने, जो नेता ये मुद्दा उछाल रहे हैं, उन्हें धीरेन्द्र से कोई मतलब नहीं। मतलब हैं कि इसी की आड़ में, अपना उल्लू सीधा कर लें। यहीं नहीं रांची में बैठे सत्तासीन लोगों को भी पैसे की चाहत हैं, वे भी चाहते हैं कि धनबाद में अपने ऐसे लोगों को बिठा दें, जो आराम से उनके चौखट तक पैसे पहुंचा दे। ऐसे में जब तक धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता को नहीं हटायेंगे, तो फिर मनचाहा आदमी कैसे बैठेगा। इसलिए उन्होंने तरकीब निकाली कि क्यूं नहीं, विपक्ष के इस हंगामें को आधार बनाकर, अपना उल्लू सीधा कर लिया जाय। हमें याद हैं कि जिस दिन विधानसभा अपना स्थापना दिवस मना रहा था, उस दिन धनबाद के कई पुलिसकर्मियों और पत्रकारों के फोन हमारे पास आये, उनका एक ही प्रश्न था कि धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता का क्या हुआ। आज झाविमो विधायक समरेश सिंह और फूलचंद मंडल ने जो हंगामा किया, उसका कितना असर रहा। और जिस दिन आईपीएस अधिकारियों का तबादला हुआ, उसमें सभी समाचार पत्रों ने सुमन गुप्ता को ही प्रमुखता दे दी, जबकि तबादला सिर्फ सुमन गुप्ता का ही नहीं, औरों का भी हुआ था। ये बातें साबित करती हैं कि एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ महिला, कोलमाफियाओं, सत्ता में बैठे अथवा बाहर में रह रहे राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिसकर्मियों और पीत पत्रकारिता करनेवाले पत्रकारों को किस प्रकार खटक रही हैं।
मैं ये भी नहीं कहता कि सुमन गुप्ता हमेशा धनबाद में ही रहे, ऐसी महिला, हर जगह जानी चाहिए, जिससे एक नये समाज की रचना हो, पर उक्त महिला का स्थानांतरण भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, कोलमाफियाओं, भ्रष्टपुलिसकर्मियों और भ्रष्ट पत्रकारों को खुश करने के लिए हो, तो इससे ज्यादा शर्मनाक दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। धीरेन्द्र सिंह प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, और इसके दोषियों को दंड भी मिलना चाहिए, पर इस प्रकरण को बहाना बनाकर, बिना जनता को विश्वास में लिए, स्थानांतरण करना, सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़ें करता हैं? आखिर सरकार को सोचना चाहिए कि जो लोग रांची से धनबाद अथवा धनबाद से रांची तक ये मामला उठा रहे हैं, वे चाहते क्या हैं, उनका क्या स्वार्थ हैं, पर बिना इन सबकी जांच पड़ताल किये, स्थानांतरण कर देना, बहुत कुछ कह देता हैं। आखिर फुलचंद मंडल, ढुल्लू महतो और समरेश सिंह जैसे विधायक, धनबाद में क्या करते हैं, क्या चाहते हैं, क्या धनबाद की जनता नहीं जानती। कैसे पंचायत चुनाव के दौरान, अर्जुन मुंडा की सरकार ने आनन फानन में, सुमन गुप्ता का स्थानांतरण कर दिया, क्या इस सरकार के क्रियाकलापों को यहां की जनता नहीं जानती। सब जानती हैं, पर जनता करें क्या, यहां तो अंधेर नगरी, चौपट राजा, टके सेर भाजी और टके सेर खाजा वाली कहावत चरितार्थ हो रही हैं।