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Wednesday, September 21, 2016

शहीदों के नाम पर हिन्दुस्तान अखबार और छपास की बीमारी से पीड़ित नेता.............

सदैव अश्लील व अनैतिक विज्ञापनों को प्रकाशित करनेवाला तथा बच्चों में मानसिक विकृतियों का जन्मदाता हिन्दुस्तान अखबार के हृदय में 20 सितम्बर को देशभक्ति का ज्वार फूंटा। उसने अपने विशेष माध्यम से लोगों को उड़ी की याद दिलाई और लोगों से कैंडल मार्च में शामिल होने का अनुरोध कर डाला, चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने अनुरोध किया तो जितने भी छपास की बिमारी से पीड़ित नेता (चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो) और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग उनके कार्यक्रम में आ धमके, खूब फोटो सेशन कराया, हंसा – हंसाया और फिर रोजमर्रा के कामों में जूट गये। इन्हें न तो देशभक्ति से मतलब था और न ही उड़ी की घटनाओं से, चूंकि अखबार को आदमी चाहिए थे, अपने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए, उन्हें आदमी मिल गये और जिन्हें चेहरे चमकाने थे, उनके चेहरे चमक गये, पर जिन्होंने उड़ी के नाम पर ये सब किया, उनसे कुछ सवाल तो मैं जरुर पूछना चाहुंगा।
सवाल नं. 1 – क्या उड़ी में शहीद हुए सैनिकों की आत्मा या उनके परिवार के लोगों ने उनसे ऐसा कार्यक्रम आयोजित करने को कहा था, क्या?
सवाल नं. 2 – क्या कोई बता सकता है, कि जो लोग इस कार्यक्रम में शामिल थे, उनके परिवार के कितने लोग सेना या केन्द्रीय अर्द्ध सैनिक बलों में कार्यरत है?
सवाल नं. 3 – क्या जिस प्रकार का ये फोटो सेशन कराये हैं और इस मर्माहत होनेवाली घटनाओं में दांत निपोड़ें है, उनके घरों में भी ऐसी हादसा होने पर, वे इसी प्रकार दांत निपोड़ा करते है क्या?
सवाल नं. 4 – क्या इस प्रकार के आयोजन से माइलेज लेने की जो नई प्रवृत्ति का जन्म हुआ है, उससे पता नहीं चलता कि लोगों में संवेदनशीलता समाप्त हो गयी और लोग इस शहादत का भी व्यवसायीकरण करने में लग गये, ये कहकर कि लोग जाने कि हिन्दुस्तान अखबार का जवाब नहीं और जब अखबार में काम करनेवाले लोगों में संवेदनशीलता है ही नहीं तो इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने के मायने क्या है?
आप पूछेंगे कि ये सब लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी, आवश्यकता है, हमारे पास प्रमाण है कि इस दुख भरी घटना में, जहां सारे देश में उबाल है, एक नेता मुस्कुरा रहा है, और अगर यह दृश्य देखना है तो धनबाद से प्रकाशित हिन्दुस्तान का पृष्ठ संख्या 3 देखिये, जिसमें भाजपा सांसद पी एन सिंह मुस्कुराते हुए फोटो खींचा रहे है, जैसे लग रहा है कि फोटो सेशन चल रहा है, यहीं भाजपा समर्थित एक मेयर भी है, उसके चेहरे को भी पढ़ने की कोशिश कीजिये, कैसे वह फोटो सेशन में स्वयं को समाहित कर रहा है और पृष्ठ संख्या 4 देखियेगा तो आपको सब कुछ क्लियर हो जायेगा, कि हिन्दुस्तान अखबार का बैनर लेकर लोग कैसे आनन्दित हो रहे है, मुस्कुरा रहे है, जैसे लगता है कि देश में कोई जश्न का माहौल हो...यहीं नहीं इस अखबार में काम करनेवाले कई कर्मचारियों ने तो गजब कर डाला है, फोटो खिंचवाया तो खिंचवाया, उसे बड़े शान से सोशल साइट्स पर भी डाल दिया। लीजिये देखिये, हिन्दुस्तान अखबार के कारनामे, फोटो सब कुछ क्लियर कर दे रहा है...

Wednesday, January 13, 2016

ऐसे ही युवा मंत्री की झारखण्ड को जरुरत है......

ऐसे ही युवा मंत्री की झारखण्ड को जरुरत है...
जो इसकी परवाह नहीं करें कि उसका भाषण सुननेवालों की संख्या कितनी है...
या हैं भी या नहीं...
वो डंके की चोट पर अपने इरादे को स्पष्ट रुप से रखे...
और वहीं करें, जिसका संकल्प लेकर वो घर से निकला है...
आज सुबह – सुबह एक अखबार पर नजर पड़ी है, प्रथम पृष्ठ पर राज्य के पर्यटन मंत्री अमर कुमार बाउरी का भाषण देते हुए तस्वीर है, जिसमें दिखाया गया है कि अमर कुमार बाउरी भाषण दे रहे हैं, पर उन्हें सुननेवाला कोई नहीं...
मेरा मानना है,
कि हम भारत में रहते हैं...
भारत के शब्द है ये, जो कहते है कि आप को जो करना है, करो...
क्योंकि सुक्ष्मावस्था में बहुत सारे ऐसे जीव है, जो आपको देख व सुन रहे है...
बधाई अमर कुमार बाउरी जी, आपने वो कर दिखाया, जो बहुत कम ही लोग करते है...
दूसरा नेता रहता या उस अखबार का ही कोई प्रतिनिधि होता तो भाग खड़ा होता...यह कहकर कि यहां तो कोई हैं ही नहीं, तो भाषण किसको सुनाऊँ...
खैर,
इसी घटना को देख व सुनकर मुझे ईटीवी धनबाद याद आ गया...। जब मैं ईटीवी धनबाद कार्यालय में कार्यरत था, तब उसी दौरान ईटीवी हैदराबाद मुख्यालय से एंटी टूबैको कंपेन चलाने को कहा गया। संभवतः जून का महीना था, जिस दिन से एंटी टूबैको कंपेन चलना था, संयोग से ठीक उसके एक दिन पहले विश्व हिन्दू परिषद ने भारत बंद का ऐलान कर दिया। हैदराबाद से फोन आया कि चूंकि विश्व हिन्दू परिषद ने भारत बंद का ऐलान कर दिया है, इसलिए एंटी टूबैको कंपेन दूसरे दिन से चलाया जायेगा। मैंने तुरंत सवाल खड़ा किया कि घर में शादी- विवाह होता, और उसी दिन कोई संगठन बंद का कॉल कर देता तो क्या आनन-फानन में शादी – विवाह का दिन भी बदल जाता क्या? हैदराबाद वालों ने कहा कि आप पूर्व निर्धारित तिथि अनुसार कार्य करें, बाकी जगहों पर एक दिन बाद शुरु होगा और मैंने पूर्व निर्धारित तिथि और समयानुसार कार्यक्रम को संपन्न कराया। कहीं कोई दिक्कत नहीं। जिनको भारत बंद करना था, वे भारत बंद किये और हमें एंटी टूबैको कंपेन चलाना था, मैंने एंटी टूबैको कंपेन चलाया। इसी बीच इस कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए, हमें एक आदमी की तलाश थी, जिसने कभी टूबैको को यूज नहीं किया हो। संयोग से पता चला कि धनबाद रेल मंडल के तत्कालीन मंडल रेल प्रबंधक अम्बरीश कुमार गुप्ता इन सबसे वंचित है। मैने उनसे उद्घाटन के लिए आग्रह किया, मेरे आग्रह को स्वीकार करते हुए, वे ठीक समय पर पहुंचे। उस वक्त भी मेरे उद्घाटन कार्यक्रम के समय एक भी व्यक्ति मौजूद नहीं था, फिर भी चूंकि समय निर्धारित था, मैंने बिना किसी के परवाह किये, कार्यक्रम का उद्घाटन करवाया, क्योंकि मैं जानता था कि समय का क्या महत्व है?
और ऐसे भी, कोई रहे या न रहे...आप जो करने जा रहे है, उसकी धमक जहां तक पहुंचनी है, पहुंचेगी ही, गर आपका चरित्र और लक्ष्य सही है, लीजिये और हम इसमें कामयाब भी हुए।
इस कार्यक्रम को संपन्न कराने में जिन्होंने हमारी दिल से मदद की, उन्हें मैं भूल नहीं सकता। वे थे जगदीश राव, जो आजकल वाराणसी में हैं और दूसरे रहमान भाई जो धनबाद क्रिकेट से जूड़े है...सचमुच आप दोनों एक बार फिर याद आ गये...मैं आप दोनों को भूल नहीं सकता, भाई।

Friday, October 30, 2015

कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...

कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...
मनमुताबिक मंतव्य लेने के लिए, लोक अभियोजक का तबादला...
प्रभार लेने के पूर्व ही, सरकार के मनमुताबिक रिपोर्ट, धनबाद डीसी को भेजा ए के सिंह-2 ने...
मुख्यमंत्री रघुवर दास राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड बनाने का दावा करते है, पर सच्चाई इसके ठीक उलट है, ऐसे में राज्य भ्रष्टाचार मुक्त होगा या यहां भ्रष्टाचार चरम सीमा पर पहुंचेगा, ये निर्णय करने का अधिकार, मैं जनता को सौंपता हूं, वह निर्णय करें और सरकार से पूछे कि आखिर ये मामला क्या है?
ढुलू महतो, भाजपा के बाघमारा विधायक है। इसके पहले ढुलू झाविमो विधायक भी रह चुके है और कभी बाबूलाल मरांडी उनके लिए ढाल का भी काम कर चुके है, पर इधर ढुलू मुद्दे पर बाबू लाल मरांडी का दल रघुवर दास का भी क्लास ले रहा है, यानी मेरे दल में है तो संत और दूसरे दल में गया तो चोर वाली कहावत....।
और अब सीधे काम की बात...
पिछले साल 24 जून 2014 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से भेजा गया F.NO.IV/15012/4/2014-CSRII पत्र जो विधायकों/सांसदों के अपराधिक मामलों को जल्द से जल्द ट्रायल कर निबटाने से संबंधित था। झारखंड सरकार को प्राप्त हुआ। इस पत्र में संबंधित जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश - अध्यक्ष, संबंधित जिले के उपायुक्त – सदस्य, सबंधित जिले के वरीय पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक – सदस्य, संबंधित जिले के प्रभारी लोक अभियोजक/लोक अभियोजक – सचिव को मिलाकर एक जिलास्तरीय समन्वय समिति बनानी थी, जिसके आधार पर विधायकों/सांसदों से संबंधित अदालत में चल रहे अपराधिक मामलों का ट्रायल कर त्वरित निष्पादन करना था।
इस पत्र के आलोक में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपने विधायक ढुलू महतो पर कृपा बरसानी शुरु कर दी और गृह मंत्रालय की ओर से उपायुक्त धनबाद को पत्र भेजा कि वह विधायक ढुलू महतो से संबंधित अपराधिक मामलों से संबंधित अपना मंतव्य सरकार को प्रेषित करें, ताकि ढुलू महतो पर चलाये जा रहे सारे मुकदमे वापस ले लिये जाये। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण मामला धनबाद कतरास थाना कांड संख्या -120/13 है, जिसमें विधायक ढुलू महतो को सजा मिलनी तय है, साथ ही उनकी विधायक पद पर भी खतरा मंडरा रहा है, विधायकी जाने का खतरा ढुलू महतो पर इतना ज्यादा हो गया है कि वे चाहते है कि जल्द से जल्द इस मामले में सरकार उन्हें दोष मुक्त कर दें, ताकि उनकी विधायकी बच जाये। इधर उपायुक्त धनबाद ने प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद से धनबाद कतरास थाना कांड संख्या – 120/13 की मुकदमा वापसी के संबंध में मंतव्य मांगा। उपायुक्त धनबाद को तत्कालीन प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी ने बिना देर किये अपने लिखित मंतव्य में मुकदमे का वापस लिया जाना लोकहित व न्यायहित के खिलाफ बता दिया।
प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद ने उपायुक्त धनबाद को 29.09.2014 पत्रांक संख्या 2952 के हवाले से अपना मंतव्य देते हुए लिखा कि –
कंडिका 4 – यह कि उपर्युक्त वाद धारा 147/148/149/341/323/353/332/290/427/283/224/225/504 भादवि के अंतर्गत सूचक रामनारायण चौधरी, तत्कालीन थाना प्रभारी, बरोरा थाना के द्वारा किया गया है जिसमें ढुलू महतो पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि वे अपने समर्थकों के सहयोग से पुलिस बल पर हरवे हथियार के साथ हमला कर गिरफ्तार वारंटी को छुड़ा ले गये एवं वादी का सर्विस पिस्टल छीनने का प्रयास किया, साथ ही पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट कर एक पुलिसकर्मी की वर्दी भी फाड़ दी। इस प्रकार इस कांड में सरकार के विरुद्ध गंभीर अपराध कर सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई।
कंडिका 5 – यह कि, इस घटना के पूर्व भी ढुलू महतो के विरुद्ध अनुमंडल न्यायालय में निम्नलिखित वाद गवाही पर लंबित है –
1. GR4041/06, U/S 147/149/353/332/224/511 IPC
2. GR1782/06, U/S 143/144/341/353/506/290/283IPC
3. GR851/07, U/S 147/148/341/323/332/353/149/225/511 IPC
4. GR3183/10,U/S 147/148/323/341/342/353/286/186/504/506IPC
इसके अलावा और भी कई वाद भिन्न-भिन्न न्यायालय में ढुलू महतो के विरुद्ध लंबित है।
कंडिका 8 – यह कि मुकदमे की वापसी होने की स्थिति में समाज पर एक ऐसे विधायक के तौर पर छवि उभरकर सामने आएगी जो कानून तोड़कर भी कानून की गिरफ्त से बाहर है और वह सरकार के विरुद्ध कोई भी न्याय विरोधी कार्य कर सकता है।
उपर्युक्त बातों पर विचार करते हुए मेरा मंतव्य है कि विधि का शासन कायम करने हेतु इस मुकदमे को वापस करना न्यायहित व लोकहित में उचित नहीं है।
प्रभारी लोक अभियोजक, डी एम त्रिपाठी के इस मंतव्य ने सरकार की नींद उड़ा दी और ये समझ लिया गया कि डी एम त्रिपाठी के रहते ढुलू को मुकदमे से वापसी संभव नहीं, इसलिए सरकार के गृह मंत्रालय ने डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण करने का फैसला लिया और 27 जून 2015 दिन शनिवार, यानी जिस दिन झारखंड मंत्रालय बंद रहता है, प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण का आदेश दे डाला। डी एम त्रिपाठी को जिला अभियोजन कार्यालय बोकारो और डी एम त्रिपाठी की जगह अनिल कुमार सिंह-2 को अपर लोक अभियोजक धनबाद बनाकर भेजा गया, ताकि सरकार के अनुरुप अनिल कुमार सिंह -2 प्रस्ताव बनाकर उपायुक्त को भेज सकें और फिर सरकार मनमाफिक निर्णय ले सके। हुआ भी यहीं, पर इस बार सरकार की कलई खुल गयी। अनिल कुमार सिंह – 2 ने 23 जुलाई 2015 को लोक अभियोजक धनबाद के रुप में पदभार ग्रहण किया, पर पदभार ग्रहण करने के पूर्व ही सरकार के मनमुताबिक प्रस्ताव जो ढुल्लू महतो को निर्दोष साबित करता था, बनाकर 13 जुलाई 2015 को ही उपायुक्त धनबाद को संप्रेषित कर दी, जबकि उपायुक्त धनबाद ने लोक अभियोजक अनिल कुमार सिंह से रिपोर्ट भी नहीं मांगी थी। उपायुक्त ने दुबारा ढुलू महतो से संबंधित रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक धनबाद से मांगी थी, बाद में पुलिस अधीक्षक ने इस पत्र को बाघमारा डीएसपी को भेजा और इसकी प्रतिलिपि सिर्फ सूचनार्थ लोक अभियोजक को भेजी थी। पुलिस अधीक्षक के कार्यालय से जारी 6 जुलाई 2015 का पत्रांक संख्या 3448 देखा जा सकता है।
अब सवाल सरकार से, खासकर मुख्यमंत्री से.............
क. क्या सर्वोच्च न्यायालय के प्रपत्र को आधार बनाकर, एक अपराध से संबंधित व्यक्ति जो विधायक बन गया है, जिसने कानून को चुनौती दी, सरकार को चुनौती दी, लोकशाही को चुनौती दी, उसे बचाना क्या भ्रष्टाचार नहीं है?, और जब ऐसा करना भ्रष्टाचार नहीं है, तो फिर केवल ढुलू महतो को ही बचाने का ये अभियान क्यों चल रहा है?, ऐसे और भी अपराधी है, जो विधायक बने है, उन पर भी मुख्यमंत्री कृपा क्यों नही लूटा रहे?
ख. आखिर जब प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी से उपायुक्त धनबाद ने ढुलू महतो से संबंधित अपराधिक मुकदमों पर मंतव्य मांगा और डी एम त्रिपाठी ने अपना मंतव्य देने के साथ ही इसे न्यायहित और लोकहित के खिलाफ बताया तो सरकार ने इस मंतव्य को मानने से इनकार क्यों किया? डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण क्यों किया गया?
ग. डी एम त्रिपाठी की जगह पर अनिल कुमार सिंह – 2 को ही क्यों लाया गया?, जबकि उनके पहले कई ऐसे सीनियर है जो लोक अभियोजक धनबाद हो सकते थे, उन्हें न बनाकर अनिल कुमार सिंह – 2 को ही क्यों?, क्या सरकार को पता था कि अन्य लोक अभियोजक उनके सुर में सुर नहीं मिला सकते, और अनिल कुमार सिंह – 2 ऐसा कर सकते है।
घ. अनिल कुमार सिंह – 2 प्रभार लेते है – 23 जुलाई 2015 को, और वे अपना प्रस्ताव 13 जुलाई 2015 को ही धनबाद उपायुक्त के पास भेज देते है, वह भी ढुलू महतो के बचाव में, आखिर ये क्या मामला है? क्या उपायुक्त धनबाद ने उनसे कोई रिपोर्ट मांगी थी? वह भी प्रभार लेने के पूर्व ही कोई व्यक्ति वो काम कैसे कर सकता हैं?, जिसकी इजाजत कानून भी नहीं दे सकता, क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है?
ङ. क्या सरकार बता सकती है कि ऐसी भी क्या मजबूरी थी कि प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी के स्थानांतरण के लिए कार्य दिवस के दिन कार्य न करके, एक ऐसे दिन स्थानांतरण का आदेश निकाला गया, जिस दिन सरकार की आफिस ही बंद रहती है?
च. क्या राज्य सरकार की डिक्शनरी में भ्रष्टाचार का पैमाना दूसरा और अन्य के लिए कुछ और होता है?
छ. 24 अक्टूबर 2015 को सारे समाचार पत्रों में यह भी समाचार प्रकाशित हुआ है कि विधायक ढुलू महतो की गुंडागर्दी से आजिज होकर सिजुआ क्षेत्र के जीएम जे पी गुप्ता ने इस्तीफा दे दिया। जीएम जे पी गुप्ता का कहना है कि सभी चीजों के लिए सिस्टम बना हुआ है। मगर विधायक ने अनुचित रुप से दबाव बना कर उन्हें निचितपुर कोलियरी जहां एक मजदूर की मौत हुई थी। उक्त घटनास्थल पर बुलाया और जबरन चार लाख रुपये मुआवजा दिलाने की घोषणा कर दी। आपत्तिजनक शब्दों के नारे भी लगवाये। इससे आहत होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
ज. हद तो ये भी हो गयी कि 20 अक्टूबर को धनबाद के कतरास में प्रशासन द्वारा आयोजित शांति समिति के बैठक में, भाजपा विधायक ढुलू महतो ने शांति समिति में भाग ले रहे सदस्यों को चोर - चुहाड़ तक कह डाला, क्या एक विधायक की यहीं भाषा है, कि वह किसी को भी, कही भी बेइज्जत कर सकता है, वह भी यह कहकर कि वह भाजपा विधायक है।
सूत्र बताते है कि ढुल्लू महतो को बचाने के लिए मुख्यमंत्री इसलिए रुचि ले रहे हैं कि इनसे उनका राजनीतिक और अन्य स्वार्थ सिद्ध हो रहा है...और इसमें भाजपा के कद्दावर राष्ट्रीय नेताओं की भी मिलीभगत है। आश्चर्य इस बात की, कि भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं का ढुलू महतो से इतना जल्द प्रेम प्रगाढ़ हो जायेगा, यहां के नेताओं को इसका अंदाजा ही नहीं था, हालांकि कुछ दिन पहले धनबाद में भाजपा के ही विधायक फूलचंद मंडल और ढुलू महतो के गुर्गों के बीच मुठभेड़ हो चुकी है, जिसकी खबर धनबाद से प्रकाशित होनेवाली सारी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया...फिर भी राज्य सरकार का ढुल्लू प्रेम, आम जनता के लिए कौतूहल का विषय बन गया है, साथ ही मुख्यमंत्री रघुवर दास के भ्रष्टाचारमुक्त झारखंड बनाने के दावे पर अब सवाल भी उठने लगे है...
सरकार जवाब दें...

Monday, June 1, 2015

विजय ने ताल ठोंकी और शेखर मेयर बन गया............



मैंने धनबाद को पत्रकारिता के दौरान दो-दो बार सेवाएं दी। एक जब दैनिक जागरण का ब्यूरो प्रमुख बना तब और दूसरी बार जब ईटीवी ने धनबाद की बागडोर सौंपी। नजदीक से देखा हूं, धनबाद को। यहां ए के राय जैसे महान वामपंथी विचारक व विजय झा जैसे देशभक्त लोग है तो  दूसरी ओर कई लंपटों का समूह भी हैं, जो येन-केन-प्रकारेण धनबाद को अपनी स्वार्थ के लिए बर्बाद करता रहता हैं और इसी को वो समाज सेवा के रुप में आमजन को प्रदर्शित भी करता हैं। आश्चर्य इसलिए भी कि जनता भी कभी-कभी उसके इस झांसे में आकर स्वयं को गौरवान्वित भी महसूस करती है। चलिए छोड़िये इन बातों को, अब हम बात करते हैं, इस बार हुए धनबाद के मेयर चुनाव की। इस बार मेयर के चुनाव में चंद्रशेखर अग्रवाल भारी मतों से विजयी हुए हैं। चंद्रशेखर अग्रवाल विशुद्ध रुप से भाजपाई हैं। मेयर चुनाव जीतने के बाद फिलहाल गणेश परिक्रमा करने के लिए रांची आये हुए हैं। गणेश परिक्रमा में ये सर्वप्रथम भाजपा कार्यालय जाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और कार्यालय में वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मिल चुके हैं। तदुपरांत मुख्यमंत्री आवास जाकर मुख्यमंत्री रघुवर दास की परिक्रमा भी कर चुके हैं। सूत्रों की माने तो चंद्रशेखर अग्रवाल रघुवर गुट से आते हैं, जबकि मेरा मानना हैं कि राजनीति में कोई गुट नहीं होता, जब आप शक्तिशाली होते हैं तो सभी आपके गुट के होते हैं और जब दुर्बल होते है तो आपसे लोग कन्नी कटाते है। स्थिति ऐसी होती हैं कि वे दुर्बल व्यक्ति अथवा नेता के साथ फोटो खीचाना तो दूर, गर पुराना फोटो भी होता हैं तो उसे ऐसा दबा कर रख देते हैं कि कहीं कोई उस फोटो को फेसबुक वाल पर डालकर उसकी राजनीति की नैया न डूबा दें।
फिलहाल चंद्रशेखर अग्रवाल ने मेयर का चुनाव जीतकर धनबाद के सांसद पी एन सिंह और धनबाद के विधायक राज सिन्हा की औकात तो जरुर बता दी, क्योंकि इन दोनों नेताओं ने चंद्रशेखर अग्रवाल को हराने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दी थी। यहीं नहीं जिस चंद्रशेखर अग्रवाल को खुद को भाजपा नेता-कार्यकर्ता कहने में गर्व महसूस होता था। उस चंद्रशेखर अग्रवाल को दिन में तारे दिखाई पड़ने लगे थे, जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनसे दूरियां बनाकर, पीएन सिंह और राज सिन्हा समर्थक प्रत्याशी राज कुमार अग्रवाल को जीताने के लिए पील पड़े। बेचारे अब शेखर क्या करें। वस्तुतः सांसद पी एन सिंह और विधायक राज सिन्हा को चंद्रशेखर अग्रवाल से भविष्य में होनेवाले संकट को लेकर स्पष्ट खतरा महसूस हो रहा था। इन दोनों को लग रहा था कि गर चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीते तो कहीं ऐसा नहीं कि भाजपा आनेवाले दिनों में सांसद का टिकट अथवा विधायकी का टिकट चंद्रशेखर अग्रवाल के लिए सुरक्षित न कर दें, क्योंकि सांसद के रुप में पीएन सिंह का कार्य धनबाद की जनता के अनुरुप नहीं रहा हैं, और न ही संसद में इन्होंने कोई ऐसा कमाल दिखाया हैं, जिस पर धनबाद की जनता गर्व कर सकें। राज सिन्हा तो चूंकि पहली बार विधायक ही बने हैं, इसलिए अभी इन पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, पर इतना तो तय हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल की जीत, पी एन सिंह और राज सिन्हा की नींद हराम कर दी हैं। आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल को जीत कैसे मिली। उसका मूल कारण – विजय झा का शेखर अग्रवाल के लिए चाणक्य की भूमिका में प्रकट होना और पूरे चुनाव की जिम्मेदारी और उसका संचालन ही नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी से इसकी मानिटरिंग करना। चूंकि विजय झा, एक समय भाजपा जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं, साथ ही उनकी छवि निर्विवाद रही हैं, आज भी वे धनबाद में एक प्रतिष्ठित समाजसेवक के रुप में याद किये जाते है। पूर्व में मेयर के चुनाव में उनकी पत्नी शिवानी झा मुख्य प्रतिद्वंदी रही, इसलिए पूर्व का अनुभव भी विजय झा के साथ रहा। जिसका इस्तेमाल, उन्होंने इस चुनाव में किया और नतीजा सामने है। चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीत गये। संभव हैं आनेवाले समय में वे सांसद और विधायकी पर भी दावा ठोंके पर ये तो भविष्य की बात हैं। हमें लगता हैं कि भाजपा को भी अब विचार करना होगा, क्या वो कांग्रेस की बी टीम होगी, या स्वयं को परिमार्जित करेगी, शुद्ध करेगी। उसे आत्ममंथन करना होगा कि  आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल की जगह राज कुमार अग्रवाल भाजपाईयों की पसंद क्यूं बन गये। आखिर विजय झा जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का भाजपा से मोहभंग क्यों हो गया। गर एक एक कर इसी तरह से योग्य व सम्मानित व्यक्ति अपमानित होकर, भाजपा से निकलते गये तो इसमें कोई दो मत नहीं कि आनेवाले समय में जो जितना बड़ा भ्रष्ट वो उतना बड़ा भाजपा का कैंडिडेट होगा, फिर भाजपा का आम नागरिकों के हृदय में क्या स्थान होगा। भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को अभी से ही आत्ममंथन करना शुरु कर देना चाहिए। साथ हीं, हमें लगता हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल को भी समझ में आ गया होगा कि भाजपा क्या हैं, क्योंकि ये जीत उन्हें भाजपाईयों ने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति ने दिलायी, एक ऐसे जनसमूह ने दिलायी, जिसका भाजपा से प्यार नहीं था, बल्कि प्यार था, सम्मान से, प्यार था प्रतिष्ठा से, प्यार था धनबाद के स्वाभिमान और विकास से। ये बातें चंद्रशेखर अग्रवाल को गांठ बांधकर रख लेना चाहिए, नहीं तो कालांतराल में क्या स्थिति होगी, वो समझ सकते हैं, क्योंकि जनता किसी की भी जागीर नहीं होती..........

Friday, February 1, 2013

बेचारा मुर्गा, बयानवीर नेता और कोयलांचल के ज्ञानवान पत्रकार..........................

कोयलांचल में पिछले हफ्ते एक बात थोड़े समय के लिए चर्चा में रही। वो बात थी -- भाजपाईयों द्वारा गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाने की । एक चैनल जो दक्षिण भारत के एक शहर से हिन्दी क्षेत्रों में संचालित हैं, उसने इस समाचार को गणतंत्र दिवस के दिन प्रसारित किया था। फिर क्या था -- यहां के बयानवीर नेताओं के इस पर बयान आने शुरु हुए। उन नेताओं के इस बयान को देख और पढ़कर हमें बड़ी निराशा हुई। निराशा इस बात को लेकर हुई कि यहां के नेता जिन्हे ये पता नहीं कि मांसाहार कब मना हैं और कब मना नहीं हैं वे देश और समाज को क्या दिशा देंगे। ये तो मुर्गा और मछली से उपर अब तक उठ ही नहीं पाये हैं। वे बिना सिरपैर के बयान देने शुरु कर दिये थे। जिस चैनल ने उक्त न्यूज को प्रसारित किया था, वो तो अपने समाचार को महिमामंडित करने के लिए इसका फौलोअप भी शुरु कर दिया था।
जब भी कोई समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित किया जाता हैं तो उस समाचार की वस्तुस्थिति का आकलन किया जाता हैं, तब प्रसारित या प्रकाशित किया जाता हैं, पर यहां तो कुछ और ही हो रहा था। हद तो भाजपा के नेताओं की थी, वे इस प्रकार के बयान दे रहे थे, जैसे लग रहा हो, कि उन्होंने बहुत बड़ा पाप कर दिया हो। धनबाद के भाजपा सांसद पी एन सिंह का बयान था कि उन्होंने मांस उस दिन नहीं खाया था, वे तो अपना टिफीन लेकर चलते हैं, शाकाहार भोजन ग्रहण किया था। भाजपा जिलाध्यक्ष हरि प्रकाश लाटा भी इस पूरे प्रकरण पर काउंटर करने के बजाय, स्वयं को बचाते नजर आये, जैसे लग रहा था कि गर उन्होंने इस पर बयान दिया कि उन्होंने या भाजपाईयों ने उस दिन मुर्गा खाया था, तो इज्जत चली जायेगी, यहीं हाल भाजपा के राज सिन्हा का था, जिनका बयान था कि पूर्णमासी होने के कारण, उन्होंने मुर्गा को हाथ तक नहीं लगाया। अरे भाई हाथ लगा भी देते तो क्या हो जाता। गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाना या खिलाना पाप थोड़े ही हैं, या कानून का, अथवा संविधान का उल्लंघन थोड़े ही हैं, गर आपको बुद्धि नहीं हैं, आप मीडिया के अनुसार चलते हैं तो इसमें संविधान और कानून क्या कर सकता हैं, आप हमेशा मूर्ख बनते रहिये और वो बनाते रहेंगे।
ये तो रही भाजपा और अब विपक्षी नेताओं के बयान देखिये। झारखंड विकास मोर्चा के जिलाध्यक्ष ज्ञान रंजन सिन्हा का बयान आ गया कि भाजपाईयों को बापू की प्रतिमा के समक्ष जाकर, उपवास करना चाहिए, प्रायश्चित करना चाहिए, सांसद पर मुकदमा करना चाहिए। अरे भाई भाजपाईयों को क्यों प्रायश्चित करना चाहिए। क्या उन्होंने गुनाह कर दिया, पहले गुनाह तो बताओं, गणतंत्र दिवस के दिन मांस खाना गुनाह तो हैं नहीं, फिर मुकदमा कैसा। लगे हाथों बयानवीर कांग्रेस के जिलाध्यक्ष मन्नान मल्लिक भी आपसे बाहर हो गये। इनके बयान देखिये -- इन्होंने तो सब पर कानूनी कार्रवाई करने की बात कह दी, पर कानूनी कार्रवाई करेगा कौन, कैसे करेगा। ये हमें आज तक समझ में नहीं आया। सिर्फ गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाने से, कानूनी कार्रवाई हो जायेगी, तब तो बहुत लोगों को जेल में जाना पडे़गा।
हमें गुजारिश हैं, बयानवीर नेताओं से कि कोई बयान देने के पहले वे दस बार सोंचे कि वे जो बयान देने जा रहे हैं, उस बयान का कोई अर्थ भी हैं या यूं ही अनर्गल बयान दे रहे हैं, वो भी अखबार में नाम नामक कहानी के प्रमुख पात्र गुरदास की तरह, जो अखबार में नाम छपाने के लिए उटपुटांग हरकतें कर दे रहा था। साथ ही यहां के पत्रकारों से भी, कि वे समाचार प्रसारित व प्रकाशित करने के पहले वे भी दस बार सोचे कि क्या गलत हैं क्या सही। बेवजह गलत खबरें दिखाकर, उसे प्रसारित कर, बेवजह किसी बात को तिल का ताड़ न बनाये और न ही उन बेवजह बातों को महिमामंडित करें, क्योंकि इससे अतंतः मीडिया की छवि आमजनमानस में खराब होती हैं। अंततः गणतंत्र दिवस के दिन मुर्गा खाना कोई अपराध नहीं हैं और न ही कानून की अवहेलना। ये बात मीडिया और नेताओं को भलीभांति जान लेना चाहिए।

Tuesday, November 22, 2011

बाकी भूत-प्रेत...................


ये उस वक्त की बात हैं। जब मैं ईटीवी में कार्यरत था। मेरी पोस्टिंग धनबाद में थी। चूंकि परिवार और बच्चे रांची में रहकर पढ़ाई कर रहे थे, तो साप्ताहिक अवकाश के दिन रांची में बिताना मेरी मजबूरी हुआ करती थी, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चे, सप्ताह में एक दिन भी मेरे साथ दूर रहे। इसी दौरान रांची - धनबाद और धनबाद - रांची करना मेरा साप्ताहिक कार्यक्रम हुआ करता था। पर इसी कालखंड में, एक से एक लोग यात्रा के दौरान मिले भी, जो देखने में तो बहुत सुंदर पर अंदर से उतने ही काले। सिर्फ अपने लिए जीने की चाह रखनेवाले, जबकि कई ऐसे भी थे, जिनको अपनी तो चाह नहीं, पर दूसरे के लिए जीना चाहते थे। उन्हीं में से एक घटना, अपने मित्रों के बीच शेयर करना चाहता हूं। आमतौर पर जहां से ट्रेन खुलती हैं, ट्रेनों की साफ - सफाई होती ही हैं, पर जैसे ही वो ट्रेन अपने गंतव्य की ओर धीरे-धीरे बढ़ती हैं, उसी ट्रेन में सफर करनेवाले, उस ट्रेन की बॉगी के साथ ऐसा शत्रुवत् व्यवहार करते हैं, जैसे लगता हैं कि अब इस ट्रेन से उनका वास्ता ही नहीं होगा। कभी - कभी मैं खुद व्यंग्यात्मक रुप से ऐसे लोगों से कह भी देता कि जनाब, आपने ट्रेन की पूरी कीमत वसूल ली हैं, ऐसा आपको करना भी चाहिए, क्योंकि ट्रेन की बॉगियां, इसी के लिए तो बनी हैं। जैसे आप खुद देखते होंगे कि ट्रेनों में पंखों के उपर जूते - चप्पल रखना, दरवाजों और शौचालयों के आसपास पान और गूटखों को पीक फेंकना, जालीदार बने सामान रखनेवाले जगह पर, उन जालियों में पान खोंसदेना या बेवजह की कागज, पालिथिन ठूस देना, जो हवाओं के आनेजाने के लिए बने हैं। यहीं नहीं, मूंगफली के छिलकों से पूरे कपार्टमेंट को गंदा कर देना, शौचालय में गये तो सीट से अलग शौच करना, फ्लैश नहीं चलाना, शौचालय के दीवारों पर कलम अथवा पेंसिल से अपनी कुत्सित भावनाओं को उकेरना, यहीं तो हम करते हैं, और करते आ रहे हैं, करते रहेंगे। गर पैसे ज्यादा हो गये तो एसीवाली बॉगी में भी वहीं हरकतें करना, पान की पींक बर्थ व सीट के नीचे फेंक देना, खाने-पीने के सामानों को यूज कर, उसके शेषांश इधर - उधर फेंक देना, और फिर इन गंदगियों के बीच भारतीय राजनीति पर चर्चा करते हुए, सारी गंदगियों और भ्रष्टाचार को लेकर, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं पर अपना गुस्सा निकालना, पर कभी भी किसी भी हालत में स्वयं को नहीं परखना कि हमारी थोड़ी सी गलती और नासमझी ने, उस जगह को नर्क बना दिया, जिस नर्क ने गंतव्य की ओर पहुचंने के क्रम में नाना प्रकार की बीमारियां उन्हें भी दी, जिन्होंने इसे फैला दी थी। ये वो लोग हैं, जो अपने घरों में रहते हैं तो ऐसी गंदगी अपने घरों में नहीं फैलाते, पर दूसरों के घरों और अन्य जगहों पर, इनकों सारा जगह कूड़ा ही नजर आता हैं, या यों कहें तो इन्हें कूड़े - कचड़े में रहना ही ज्यादा मजा आता हैं, इसलिए हर प्रकार की गंदगियां फैला देते हैं। एक दिन इन्हीं गंदगियों के बीच, धनबाद से रांची जाने का अवसर मिला। हम आपको बता दें कि धनबाद से रांची जाने के लिए हमें धनबाद एलेप्पी एक्सप्रेस पकड़नी थी। उस ट्रेन में मात्र एक ही जेनरल बॉगी होता हैं, जिसमें हम जैसे तैसे घूसे। भीड़ इतनी थी कि मुझे ट्रेन के बागी के प्रवेश द्वार पर ही टिकना पड़ा। ट्रेन खुल चुकी थी, एक व्यक्ति जो दिखने मे सज्जन, गले मे सोने की चैन, हाथ में महंगी घड़ी, सुट पहने, पांव में शानदार जूते और मुंह में गुटके चबाये थे, पास में ही खड़े थे। गुटके का गंध शायद उनको ज्यादा पसंद आ रहा था, पर उस गंध से कई लोग परेशान दीखे, मेरी तो हाल ये थी कि पूछिये मत। अचानक, मैने देखा कि जनाब ने, इधर - उधर नजर दौड़ायी, और ट्रेन के दोनो ओर बने शौचालय के बीच वाली जगह में गुटखे की ऐसी पिचकारी छोड़ी की कई लोगों के कपड़ों में वो लगने से बची। जनाब ने तो खुद राहत महसूस की, पर लोगों के हालत देखने लायक थे। मैने उस जनाब से कहा कि आप दिखने में तो रईस लगते है, कहां जाना हैं। उन्होंने बताया कि, उन्हें बस रांची जानी हैं। बात बढ़ी, मैंने कहा कि जब आप जैसे महानुभावों के लिए भारतीय रेल ने एक - एक बागी में छह- छह पीकदान, चार- चार शौचालय और उसमें भी पीकदान की व्यवस्था कर दी हैं तो फिर आप उसका उपयोग क्यों नहीं करते, क्यों दूसरो पर गुटखे का धौंस जमाते हुए, बागी को पीक से कलरफूल बनाने की कोशिश करते हैं, इससे लोगों को दिक्कत होती हैं, आपको समझ में नहीं आता। बस क्या था, जनाब भड़क गये, उन्हें इस बात को लेकर गुस्सा था कि मैंने उन्हें आईना क्यूं दिखाया, आईना दिखाया तो दिखाया, उसमें उनका चेहरा क्यूं नजर आया। वे पील पड़ें, चलिए आपको देख लूंगा। बात बढ़ती चली गयी। अचानक मैने देखा कि कोई मेरे पांव को स्पर्श कर रहा हैं, पता चला - कि स्पर्श करनेवाला व्यक्ति और कोई नहीं, नेत्रहीन हैं। शायद वो कुछ कहना चाहता हैं। नेत्रहीन व्यक्ति ने मुझसे कहा - ऐ बेटा।
मानुष मानुष बहुत हैं, मानुष में बड़ भेद।
कोई कोई तो मानुष हैं, बाकी भूत - प्रेत।।

उस नेत्रहीन ने, जैसे लगा कि सब कुछ क्लियर कर दिया। कि जो इस ट्रेन में सवार थे, सभी दीख तो मनुष्य रहे थे, पर इनमें भी मनुष्यों की संख्या कम ही थी। ज्यादा तो भूत-प्रेत ही दीख रहे थे। जिन्हें न तो इंसानियत और न ही साफ - सफाई से मतलब था। मतलब तो केवल एक था कि खुद साफ रहो और दूसरे को गंदा करते रहो। नेत्रहीन के संवाद ने तो स्पष्ट ये भी किया कि इन आंखवालों के बीच में एक ही आंखवाला था, जो नेत्रहीन था, पर अपने विचारों और दोहों से मुझे इतना प्रभावित किया, कि उसे घटना को आज तक मैं भूल ही नहीं पाया।

Sunday, March 6, 2011

आखिर सुमन गुप्ता को जाना ही पड़ा........।

दसवीं का जब छात्र था, तो उस वक्त कहानी संकलन नामक पुस्तक चला करती थी। उसी में मैंने मुंशी प्रेमचंद की लिखित कहानी नमक का दारोगा पढ़ा था, जिसमें एक पिता अपने पुत्र को नौकरी में जाने के पूर्व हिदायत दी कि बेटा मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद हैं, उपरि आमदनी बहता हुआ स्रोत हैं यानी नाना प्रकार से व्यवहारिक जिंदगी अपनाने की बात, अपने बेटे से कहीं, पर बेटा नहीं माना। नमक का दारोगा बना। ईमानदारी से जिंदगी बितानी शुरु कर दी। एक समय ऐसा आया कि धन ने धर्म पर जीत दर्ज कर ली, पर अंततः कहानी के अंत अंत आते आते, धर्म की जीत हो जाती है। यहीं जीत बताती हैं, कि भारत का ध्येय वाक्य सत्यमेव जयते की सर्वदा जय होती है, इसीलिये भय नहीं करें, संघर्ष करें, आगे बढ़ते जाये, और देश व समाज को नयी दिशा दे दे।
सुमन गुप्ता जो पुलिस अधीक्षक के पद पर धनबाद में शोभायमान थी। आज वो वहां नहीं है, उन्हें राज्य सरकार ने रांची वायरलेस के एसपी पद पर स्थानांतरित कर दिया। धनबाद एसपी के रुप में आर के धान को पदभार ग्रहण करने के लिए कहा गया है। हम आपको बता दें कि सुमन गुप्ता जैसी वीरांगनाएं कई कभी कभार ही जन्म लेती है, जबकि आर के धान जैसे लोगों की संख्या झारखंड में बहुत है, आर के धान न कभी, सुमन गुप्ता बन सकते है और न उन्हें बनने की आवश्यकता है। ऐसे तो राज्य सरकार ने पहले ही सुमन गुप्ता को स्थानांतरित करने का फैसला ले लिया था पर पता नहीं क्या उनकी मजबूरी हो गयी, उन्होंने स्थानांतरण के फैसले को स्थगित कर दिया और अब अचानक, इसे इम्पलीमेंट करा दिया। हालांकि सामान्य जनता जानती हैं कि ऐसा क्यूं हुआ हैं, और हमें लिखने में कोई दिक्कत नहीं कि राज्य सरकार ने कुख्यात कोयलामाफियाओं और कोयलांचल के कुख्यात अपराधियों, सत्तापक्ष और संपूर्ण विपक्ष में शामिल भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट वरीय पुलिस पदाधिकारियों व भ्रष्ट पत्रकारों के आगे घूटने टेकते हुए, वो कर दिया, जिसकी आशा सामान्य जनता को पहले से ही थी। सामान्य जनता जानती थी कि जिस प्रकार से सुमन गुप्ता कोयलांचल के कोलमाफियाओं पर एक एक कर हमले करते हुए, उन्हें उनकी औकात बता रही हैं, वो ज्यादा दिनों तक धनबाद नहीं टिकेंगी। और आखिर वहीं हुआ भी, नहीं टिकी। ऐसे भी यहां कोई पुलिस पदाधिकारी वो भ्रष्ट ही क्यूं न हो, ज्यादा दिनों तक नहीं टिकता, क्योंकि राज्य के वरीय पुलिस पदाधिकारी आईपीएस ही नहीं, यहां तक की आईएएस अधिकारी भी, जब झारखंड कैडर चुनते हैं तो उनकी पहली और अंतिम इच्छा होती हैं कि एक बार धनबाद संभाला जाये, क्योंकि धनबाद में वो सब कुछ है, जिसके कारण दुनिया की सारी सुख सुविधाएं, देखते ही देखते, उनके घर में आ जाती है। इसलिए हमारा मानना है कि महत्वपूर्ण ये नहीं कि धनबाद में कौन कितने दिन एसपी के रुप में रहा, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन भी रहा, कैसे रहा। और हमें ये कहने में गुरेज नहीं कि, सुमन गुप्ता का कार्यकाल अद्वितीय रहा है और आज के बाद धनबाद में जो भी एसपी आयेंगे, उन्हें सुमन गुप्ता बनने में, पसीने छूट जायेंगे। धनबाद से सुमन गुप्ता का जाना, भ्रष्ट व्यवस्था के हावी होने और भ्रष्ट अर्जुन मुंडा सरकार का प्रत्यक्ष और सुंदर उदाहरण है। कुख्यात कोयला माफियाओं, कुख्यात अपराधियों, कुख्यात पुलिस पदाधिकारियों की फौज, इस वीरांगना के खिलाफ लगी थी, जिसमें ये एकमात्र महिला अपनी पूरी ताकत लगाकर, भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ रही थी, ठीक उसी प्रकार जब 1857 में सिंधिया परिवार अंग्रेजों से मित्रता करने की संधि कर रहा था, और उसी वक्त लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से चुन चुन कर बदला ले रही थी, संघर्ष कर रही थी। जिस पर सुप्रसिद्ध कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया,
ने छोड़ी रजधानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वो तो,
झांसी वाली रानी थी।
मैं भी कहना चाहता हूं, जब सुमन गुप्ता भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिस पदाधिकारियों, कुख्यात कोल माफियाओं, भ्रष्ट पत्रकारों को उनकी औकात बता रही थी, तब अर्जुन मुंडा की सरकार, इन भ्रष्ट लोगों के साथ सुर में सुर मिलाकर ये कह रही थी कि ऐ भ्रष्टाचारियों, चिंता मत करों, मैं हूं न। जल्द ही, उक्त महिला को, मैं वहां से हटाकर, उसे ऐसा शंट करुंगा कि तुम देखते रह जाओगे। और अर्जुन मुंडा की सरकार ने ये करके दिखा दिया। शर्म – शर्म।
इधर सुमन गुप्ता का स्थानांतरण पत्र आया, उधर उक्त महिला ने तनिक देर नहीं की और अपना बोरा बिस्तर बांध लिया, चल दी। इधर आम जनता को पता लगा कि सुमन गुप्ता जा रही हैं, आम जनता की भीड़ उनके आवास पर आ खड़ी हुई, किसी के हाथों में फूल मालाएं थी, तो कोई उनसे ऑटोग्राफ ले रहा था। आश्चर्य कोई पैसा कमाता हैं तो कोई यश। मैंने कोयलांचल में, कई एसपी को आते जाते देखा, पर आज तक किसी एसपी की, ऐसी विदाई नहीं देखी।
सचमुच मह्त्वपूर्ण ये नहीं, कि कौन कितने दिन जिया, महत्वपूर्ण ये हैं कि वो जितने दिन जिया, कैसे जिया। शेर की तरह या मच्छड़ की तरह। अब धनबाद में शायद ही कोई एसपी के रुप में शेर दिखेगा। शेर लिखने का मतलब, पुरुषार्थ से हैं। सुमन गुप्ता गर चाहती तो वो भी अन्य भ्रष्ट अधिकारियों और समझौतावादी व्यवहार, भ्रष्ट नेताओं की चाटुकारिता कर वो पद पा लेती, जिसकी चाहत यहां के आईएएस व आईपीएस अधिकारियों को होती हैं, पर जो रास्ता उन्होंने अपनाया है, ईश्वर से यहीं प्रार्थना हैं कि उस पर सदैव चलती जाये, क्योंकि ये मार्ग कठिन है, इस राह में नाना प्रकार की परीक्षाएं होती है और उन परीक्षाओं में सफल होना बहुत ही कठिन होता है। क्योंकि आईएएस व आईपीएस बन जाना आसां हो जाता है, पर इस पद को पाकर, एक अच्छा इंसान बनना, पुरुषार्थी इंसान बनना, लक्ष्मीबाई बनना, बहुत मुश्किल होता है। निरंतर संघर्ष करते जाईये, सुमन जी, आप खूब चमकेंगी, क्योंकि ईश्वर आपके साथ है।

Monday, November 29, 2010

स्थानांतरण एक एसपी का ......


जनता चाहती हैं, कि वो मेरे पास रहे, मेरे साथ रहे, मेरे हर दुख सुख में साथ दें, क्योंकि वो जब से आयी, तब से धनबाद में वो चीज थम गया, जिसके लिए धनबाद जाना जाता था। आखिर वो कौन हैं – जिसके बारे में धनबाद की जनता ने धनबाद बंद बुला दिया और यहीं नहीं सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने को तैयार हो गयी। स्पष्ट हैं – वो नाम हैं, धनबाद के वर्तमान एसपी सुमन गुप्ता का। वो हैं महिला, पर पुरुषार्थ इतना भरा कि उनके सामने पुरुष की पुरुषार्थ भी फेल। जब वो धनबाद की एसपी बनी थी, तब मैं उस वक्त ईटीवी धनबाद का प्रभारी था। मनौज कौशिक एसपी की विदाई हो गयी थी और सुमन गुप्ता प्रभार ले रही थी। व्यवसायी वर्ग रोज रोज की रंगदारी से तंग था, कोल माफियाओं की तूती बोल रही थी। नेताओं-माफियाओं-भ्रष्टाचार में लिप्त कुछ पुलिसकर्मी और पत्रकारों का गठजोड़ अपने रंग में था। ऐसे में इन पर नकेल कसना और धनबाद को रास्ते पर लाना कोई सामान्य काम नहीं था। ऐसे भी कहा जाता हैं कि जो भी आईपीएस झारखंड आता है, और उसे पैसे कमाने होते हैं तो वो एक बार धनबाद की पोस्टिंग चाहता हैं, इसके लिए वो सत्ता में बैठे नेताओं को मुंहमांगी रकम देने को भी तैयार होता है। यहीं नहीं जब पैसे के बल पर, वो एसपी धनबाद आ जाता हैं, तब अपने मनमुताबिक, वो थाना प्रभारियों को नियुक्त करता हैं, सस्पेंड करने का नाटक करता हैं और जम कर पैसे कमाता हैं। ऐसे एसपी को कुछ करने की भी जरुरत नहीं पड़ती, धनबाद हैं, इसलिए पैसे खुद ब खुद इनके पास पहुंच रहा होता हैं, पर इसके बदले में एक सामान्य जनता को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं। चाल धंसते हैं, सामान्य लोग मरते हैं, व्यवसायियों से रंगदारी मांगी जाती हैं, अपहरण उद्योग चलता हैं, रेलवे से लोहे और कोयले की चोरी नहीं, तस्करी होती हैं और अपना प्रांत व देश लूट रहा होता हैं। इधर, भ्रष्ट एसपी, आराम से सो रहा होता हैं, क्योंकि उसे सोने की कीमत हर महीने, कार्यालय, आवास अथवा मनमुताबिक जगहों पर पहुंचा दी जाती हैं।
सुमन गुप्ता, झारखंड का एक जाना पहचाना नाम हैं, इसलिए नहीं कि वो एसपी हैं, इसलिए कि वो अपने कामों से जनता का दिल जीती हैं, साथ ही दिल जीती हैं, उन पुलिसकर्मियों का जो ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ हैं, और उक्त जनता का, जिसे लटपट से कोई मतलब नहीं, सिर्फ उसे मतलब हैं कि चैन से जीने का। जब मैं ईटीवी धनबाद में था, तभी मैं समझ गया था कि इनकी नेताओं, माफियाओं, धनबाद में रह रहे कुछ भ्रष्टपुलिसकर्मियों और पीतपत्रकारिता में संलिप्त लोगों से नहीं बनेगी, और हुआ भी ऐसा ही। सुनियोजित साजिश के तहत शुरु से ही ऐसा ताना बाना बनाया जाने लगा, जैसे लगता हैं कि इनके आने से धनबाद में अमन चैन ही खत्म हो गया हो। और रही सही कसर निकाल दी, धनबाद में धीरेन्द्र प्रकरण ने, जो नेता ये मुद्दा उछाल रहे हैं, उन्हें धीरेन्द्र से कोई मतलब नहीं। मतलब हैं कि इसी की आड़ में, अपना उल्लू सीधा कर लें। यहीं नहीं रांची में बैठे सत्तासीन लोगों को भी पैसे की चाहत हैं, वे भी चाहते हैं कि धनबाद में अपने ऐसे लोगों को बिठा दें, जो आराम से उनके चौखट तक पैसे पहुंचा दे। ऐसे में जब तक धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता को नहीं हटायेंगे, तो फिर मनचाहा आदमी कैसे बैठेगा। इसलिए उन्होंने तरकीब निकाली कि क्यूं नहीं, विपक्ष के इस हंगामें को आधार बनाकर, अपना उल्लू सीधा कर लिया जाय। हमें याद हैं कि जिस दिन विधानसभा अपना स्थापना दिवस मना रहा था, उस दिन धनबाद के कई पुलिसकर्मियों और पत्रकारों के फोन हमारे पास आये, उनका एक ही प्रश्न था कि धनबाद के एसपी सुमन गुप्ता का क्या हुआ। आज झाविमो विधायक समरेश सिंह और फूलचंद मंडल ने जो हंगामा किया, उसका कितना असर रहा। और जिस दिन आईपीएस अधिकारियों का तबादला हुआ, उसमें सभी समाचार पत्रों ने सुमन गुप्ता को ही प्रमुखता दे दी, जबकि तबादला सिर्फ सुमन गुप्ता का ही नहीं, औरों का भी हुआ था। ये बातें साबित करती हैं कि एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ महिला, कोलमाफियाओं, सत्ता में बैठे अथवा बाहर में रह रहे राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पुलिसकर्मियों और पीत पत्रकारिता करनेवाले पत्रकारों को किस प्रकार खटक रही हैं।
मैं ये भी नहीं कहता कि सुमन गुप्ता हमेशा धनबाद में ही रहे, ऐसी महिला, हर जगह जानी चाहिए, जिससे एक नये समाज की रचना हो, पर उक्त महिला का स्थानांतरण भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, कोलमाफियाओं, भ्रष्टपुलिसकर्मियों और भ्रष्ट पत्रकारों को खुश करने के लिए हो, तो इससे ज्यादा शर्मनाक दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। धीरेन्द्र सिंह प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, और इसके दोषियों को दंड भी मिलना चाहिए, पर इस प्रकरण को बहाना बनाकर, बिना जनता को विश्वास में लिए, स्थानांतरण करना, सरकार की नीयत पर भी सवाल खड़ें करता हैं? आखिर सरकार को सोचना चाहिए कि जो लोग रांची से धनबाद अथवा धनबाद से रांची तक ये मामला उठा रहे हैं, वे चाहते क्या हैं, उनका क्या स्वार्थ हैं, पर बिना इन सबकी जांच पड़ताल किये, स्थानांतरण कर देना, बहुत कुछ कह देता हैं। आखिर फुलचंद मंडल, ढुल्लू महतो और समरेश सिंह जैसे विधायक, धनबाद में क्या करते हैं, क्या चाहते हैं, क्या धनबाद की जनता नहीं जानती। कैसे पंचायत चुनाव के दौरान, अर्जुन मुंडा की सरकार ने आनन फानन में, सुमन गुप्ता का स्थानांतरण कर दिया, क्या इस सरकार के क्रियाकलापों को यहां की जनता नहीं जानती। सब जानती हैं, पर जनता करें क्या, यहां तो अंधेर नगरी, चौपट राजा, टके सेर भाजी और टके सेर खाजा वाली कहावत चरितार्थ हो रही हैं।