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Monday, May 8, 2017

यहां तो सीएम और उनके उच्चाधिकारी टेंडर मैनेज कराते है, ये भ्रष्टाचार क्या रोकेंगे? – बाबू लाल मरांडी

बाबू लाल मरांडी यानी झारखण्ड के पहले मुख्यमंत्री, जिन्हें कभी झारखण्ड की राजनीति में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का वरद हस्त प्राप्त था। आज भी जो लोग राजनीति में शुचिता व शुद्धता की बात करते है, वे बाबू लाल मरांडी को पसंद करते है। हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह बयान की झारखण्ड के मुख्यमंत्री पद के लिए बाबू लाल मरांडी ही उपयुक्त है, ये बात बताती है कि आज भी विपक्षी खेमे में बाबू लाल मरांडी का व्यक्तित्व और उनका जादू बरकरार है।
याद करिये बाबू लाल मरांडी के मुख्यमंत्रित्व काल में झारखण्ड का विकास का पहिया कितनी तीव्र गति से चल रहा था, शायद यहीं कारण था कि बाबू लाल मरांडी उस वक्त देश के सर्वश्रेष्ठ तीन मुख्यमंत्रियों में बहुत जल्द शामिल हो गये थे।
उन्ही के शासनकाल में...
1.  स्कूली लड़कियों को साइकिल देने की योजना लागू हुई थी।
2.  उन्हीं के समय में बीटीबीसी की पुस्तकों की जगह झारखण्ड में एनसीईआरटी की पुस्तकों ने स्थान ले लिया था। लक्ष्य था झारखण्ड के बच्चों को राष्ट्रीय स्तर तक के पाठ्यक्रम से परिचय कराना।
3.  आधारभूत संरचनाओं को ठीक करने का काम, इन्हीं के शासनकाल में हुआ। जो सड़कें पूर्व में सिर्फ कागजों पर बन जाया करती थी, सहीं मायनों में सड़कों का रुप ले सकी थी, लोग कहने लगे थे कि हम झारखण्ड पहुंच गये है, वह भी तब जब लोग बिहार या ओड़िशा से सड़क मार्ग से झारखण्ड में प्रवेश करते थे, आज की क्या स्थिति है?  सभी को मालूम है।
4.  आदिवासी छात्र-छात्राओं के लिए होस्टल और खेलकूद में रुचि रखनेवाले छात्र-छात्राओं को विशेष व्यवस्था के साथ हॉस्टल खुलवाने का काम किया जाने लगा।
5.  लघु उद्योग जो दम तोड़ रहे थे, उन्हें भी ठीक किया जाने लगा।
6.  उग्रवाद कारण और निवारण विषयक संगोष्ठी कराकर, उग्रवाद के सफाये के लिए विशेष अभियान चलाने की कोशिश की गयी।
7.  आदिवासी इलाकों में विशेष ऋण देने, 90 प्रतिशत अनुदान पर बस उपलब्ध कराने की व्यवस्था करायी गयी ताकि आदिवासी समुदाय अपने पैरों पर खड़े हो सके।
8.  गांव – गांव में छोटे-छोटे पुल-पुलियों को ठीक किया जाने लगा।
9.  भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए निगरानी ब्यूरो को चुस्त-दुरुस्त किया गया। इन्हीं के समय में भ्रष्ट अधिकारियों के समूह में हड़कम्प मचा, कई जेल भेजे गये।
पर देखते  ही देखते बाबू लाल मरांडी की बढ़ती लोकप्रियता ने उस वक्त के नीतीश कुमार की पार्टी में रह रहे लाल चंद महतो, जलेश्वर महतो, बच्चा सिंह, रमेश सिंह मुंडा, मधु सिंह आदि मंत्रियों की नींद उड़ा दी। इन सभी ने ऐसा कुचक्र रचा, जिसके शिकार बाबू लाल मरांडी हो गये, हालांकि उस वक्त भी नीतीश कुमार और देश के उच्च स्तर के राजनीतिज्ञों ने बाबू लाल मरांडी का साथ नहीं छोड़ा। इन नेताओं का दबाव था कि बाबू लाल मरांडी अपने पद से इस्तीफा न दे, पर समय की परिस्थितियों को भांपते हुए बाबू लाल मरांडी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
जो लोग उन्हें जानते है, आज भी उन्हें सम्मान करते है, इधर वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सत्ता संभालने के बाद, जो कुछ ठोस निर्णय लिया था, उससे लगा था कि रघुवर दास, बाबू लाल मरांडी का रिकार्ड तोड़ देंगे, पर इधर कुछ छः सात महीनों से वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जो निर्णय लिया है, उससे वे राज्य की जनता ही नहीं, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं के नजरों से भी गिर गये है। हाल ही में धनबाद में भाजपा विधायक ढुलू महतो के घर वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने गये मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भाजपा कार्यकर्ताओं से दूरियां बनाई, उससे भाजपा कार्यकर्ताओं में गहरा आक्रोश है, जिसे वहां के वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने अखबारों और सोशल साइट पर स्थान भी दिया।
अब से दो दिन पूर्व ही हमारी मुलाकात बाबू लाल मरांडी से हुई। उनसे राज्य के राजनीतिक हालात, जनता के हालात और विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुई। उन्होंने हमसे खुलकर हर उन बिन्दुओं पर अपना पक्ष रखा, जो बताता है कि राज्य के वर्तमान हालात ठीक नहीं है।
कृष्ण बिहारी मिश्र – राज्य की जनता रघुवर सरकार से बहुत ही नाराज है, अभी चुनाव हो जाये तो रघुवर सरकार की बुरी तरह हार तय है, आप की पार्टी इस वक्त क्या कर रही है? क्या वर्तमान राजनीतिक हालात को देखते हुए कुछ आपने प्लान बनायी?
बाबू लाल मरांडी – इन्हीं हालातों को देखते हुए, हमने अपनी पार्टी को मजबूत करने का काम शुरु किया है, चूंकि झारखण्ड की स्थिति एक समान नहीं है, अलग – अलग क्षेत्रों में अलग – अलग लोगों की बाहुल्यता है, उनकी परंपराएं – संस्कृतियां अलग – अलग है, कहीं कोई और पार्टी मजबूत है तो कहीं और, ऐसे में समान विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर एकरुपता लाने की हम कोशिश कर रहे है। हम एक ऐसा एजेंडा तैयार कर रहे है, जिसमें एक समानता हो। इस कार्य में सफलता मिल रही है। सभी पार्टियां इस बात को स्वीकार कर रही है कि भाजपा को शिकस्त देने के लिए एकता आवश्यक है, वोटो का बिखराव न हो, इस पर ज्यादा ध्यान है।
कृष्ण बिहारी मिश्र – राष्ट्रपति चुनाव में किसे समर्थन करेंगे?
बाबू लाल मरांडी – निःसंदेह हम सत्तारुढ़ दल के प्रत्याशी का विरोध करेंगे और विपक्षी दलों के प्रत्याशी का समर्थन करेंगे।
कृष्ण बिहारी मिश्र – रघुवर सरकार को आप कहां-कहां गलत देख रहे है?
बाबू लाल मरांडी – आप स्वयं बताए कि ये सही कहा है?  राज्य में कानून-व्यवस्था नहीं है। गुंडागर्दी चरम पर है। जमशेदपुर में मुख्यमंत्री के परिवार का आंतक है, स्वयं भाजपा के लोग, कार्यकर्ता आंतकित है, उनसे दूर होने लगे है। भ्रष्टाचार चरम पर है, कोई ऐसा विभाग नहीं, जहां बिना घूस के काम हो जाये। हमें याद है कि जब मैं मुख्यमंत्री था तब मैने कहा था कि जब हमें जानकारी मिलती है कि कहीं भ्रष्टाचार हो रहा है तो हमें नींद नहीं आती, जिसे लोग ने बहुत बड़ा मुद्दा बनाया था, पर आज की क्या स्थिति है? यहां तो मुख्यमंत्री के लोग टेंडर मैनेज कराते है।  मुख्यमंत्री और उच्चाधिकारियों का दल इसमें संलिप्त रहता है। पैसे मिले और उधर टेंडर मनमुताबिक लोगों को मिला। ये क्या हो रहा है?  झारखण्ड में। ये कैसा विकास है कि कई साल पहले रांची में एक अस्पताल बन कर तैयार है और वह काम नहीं कर रहा है, कैसी सरकार है यहां,  जो अपने जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा उपलब्ध नहीं करा रही, स्किल डेवलेपमेंट के नाम पर इन सब ने लूट मचा रखी है। सिंचाई का बुरा हाल है, डोभा के नाम पर पैसे की खुली लूट हुई, जनता को क्या मिला?  सरकार बताये कि कहां डोभा है और उस डोभे में कितना पानी है?
कृष्ण बिहारी मिश्र – कहा जाता है कि आपकी पार्टी को प्रदीप यादव ने डूबा दिया, जो भी विधायक पार्टी छोड़े, उन्होंने प्रदीप यादव की निरंकुशता पर अपना ध्यान आकृष्ट कराया?
बाबू लाल मरांडी – ये सफेद झूठ है, जिन्हें जाना है, वे जायेंगे, उन्हें कुछ न कुछ बोलना है, बोलेंगे।
सच्चाई यह है कि भाजपा और भाजपा के लोगों को बाबू लाल मरांडी और उनका दल हमेशा आंखों में खटकता है। वे जानते है कि भाजपा का कोई नुकसान करेगा तो वह है बाबू लाल मरांडी, क्योंकि झारखण्ड में जितनी पार्टियां है, उनके वोट बैंक अलग है, वो भाजपा को प्रभावित नहीं करती, चूंकि हमारी पार्टी जितना मजबूत होगी, उतना ही भाजपा को नुकसान होगा, ये बाते भाजपा के लोग जानते है, इसलिए वे बाबू लाल मरांडी को नुकसान पहुंचाने का कार्य करते है. हाल ही में झाविमो विधायकों को लालच दिखाकर उन्हें तोड़ना और भाजपा में शामिल कराना उसी की एक कड़ी है और मैं इन सबसे न तो घबराता हूं और टूटता हूं, अपना काम करता हूं, जनता सब देख रही है, परिणाम आयेगा।
कृष्ण बिहारी मिश्र – सरकार विकास के लिए लैंड बैंक बनायी है, कहती है कि उनके पास जमीन की कोई कमी नहीं है?
बाबू लाल मरांडी – अगर उनके पास जमीन है तो फिर आदिवासियों के जमीन पर उनकी नजर क्यों गड़ी है?  वे उन जगहों पर अपनी नजर क्यों नहीं गड़ाते, जहां जनसंख्या नहीं है, कौन उन्हें रोक रहा है? सच्चाई यह है कि लैंड बैंक के नाम पर भी सरकार लोगों को धूल झोंक रहीं है, क्योंकि जो लैंड के नाम पर सर्वे हुए है, वे बहुत पहले हुए है, और आज की जो स्थिति है, वह दूसरी है, शायद रघुवर दास और उनके उच्चाधिकारियों को मालूम नहीं।
कृष्ण बिहारी मिश्र – आप जब सत्ता में थे तो ग्रेटर रांची की बात करते थे पर आज सरकार स्मार्ट सिटी की बात कर रही है तो आप उसका विरोध क्यों कर रहे है?
बाबू लाल मरांडी – ग्रेटर रांची और स्मार्ट रांची में आकाश – जमीन का अंतर है। मेरे ग्रेटर रांची में रांची की जनता और झारखण्ड की जनता के बीच अनुकूलता और उसकी उपयोगिता पर बल दिया गया है। हमारे ग्रेटर रांची में कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य आधारभूत संरचनाओं का समावेश है, वह भी जरुरतों को मुताबिक, जबकि स्मार्ट सिटी में ये बातें नहीं दिखती, ये उनलोगों के लिए बनायी जा रही है जो आर्थिक रुप से समृद्ध है, जिन्हें झारखण्ड की समझ नहीं है, इसका विरोध व्यापक स्तर पर होना चाहिए, अभी स्थिति है कि हमारे पास पीने को पानी नहीं है और चल रहे है स्मार्ट सिटी बनाने, ये क्या दिमागी फित्तूर है, हमें समझ में नहीं आ रहा, आज तो रांची के लोगों की जरुरतों को पूरा नहीं कर पा रही सरकार, स्मार्ट सिटी में बसनेवालों का क्या हाल होगा?
कृष्ण बिहारी मिश्र – राज्य सरकार स्थानीय नीति, सीएनटी-एसपीटी नीति लाई है, क्या आपकी सरकार आयेगी तो इसे बदलेंगे?
बाबू लाल मरांडी – निः संदेह बदलेंगे.  हम अपने झारखण्डियों के सपनों के अनुरुप कार्य करेंगे, न कि किसी पूंजीपतियों-उद्योगपतियों के मनोबल बढ़ाने और राज्य की जनता को गर्त में धकलेनेवाले नीतियों पर राज्य की जनता को ले चलेंगे।
कृष्ण बिहारी मिश्र – गोड्डा प्रकरण पर क्या कहेंगे?
बाबू लाल मरांडी – हमारा दृष्टिकोण साफ है, अगर कोई बेईमानी पर उतर जाये तो हम आंदोलन करेंगे।
कृष्ण बिहारी मिश्र – आपके दल से टिकट लेकर जीते लोग, दल बदल लिए, ढाई साल सरकार के होने चले, आखिर आपको न्याय कब मिलेगा?  जब सरकार अपने कार्यकाल पूरे पांच वर्ष पूरा कर लेगी तब?
बाबू लाल मरांडी – जब कोई बेईमानी पर उतर जाये, जब कोई संविधान को मानने से इनकार कर दें, जब अनुसूची 10 में स्पष्ट है कि कोई निर्दलीय भी अगर दल बदल करता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है, तो हम क्या कर सकते है?  हम कह सकते है कि झारखण्ड विधानसभा के विधानसभाध्यक्ष ने मर्यादा तोड़ी है, उन्होंने संविधान के प्रति निष्ठा न रखकर, अपने दल के प्रति निष्ठा रखी, जो सहीं नहीं है। ये तो उन्हें खुद आत्ममंथन करना चाहिए, क्योंकि स्पीकर का पद किसी दल का नहीं होता, वह तो संवैधानिक है।

Thursday, November 24, 2016

ये माननीय नहीं हो सकते.............

ये माननीय नहीं हो सकते...
जो स्पीकर पर कुर्सियां फेकें...
जो स्पीकर पर जूते फेकें...
जो स्पीकर पर फॉगिंग स्प्रे करें...
जो रिपोर्टिंग टेबल पर आ धमकें...
जो मार्शल के साथ धक्का-मुक्की करें...
जो संसदीय कार्य मंत्री से कार्य सूची लूट कर फाड़ डालें...
जो झारखण्ड की भोली-भाली जनता के सम्मान की धज्जियां उड़ाएं...
वे माननीय नहीं हो सकते...
वे सिर्फ और सिर्फ गुंडे होते है...
कल झारखण्ड विधानसभा में जो कुछ हुआ, वह झारखण्ड की सवा तीन करोड़ जनता का अपमान है...
यह भारतीय लोकतंत्र का अपमान है...
इन जनप्रतिनिधियों को ये नहीं भूलना चाहिए कि जनता ने उन्हें विपक्ष में बैठने के लिए जनादेश दिया। विपक्ष में बैठने का ये मतलब नहीं कि आप सत्तापक्ष को अपने गुंडागर्दी से या अन्य प्रकार से भय दिखाकर कोई काम करने से रोक दें। आप विपक्षी दल है, राज्य सरकार अगर गलत कर रही है, तो उसके खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने अथवा जनता को गोलबंद करने के और भी उपाय है, न कि आप गुंडागर्दी करें और किसी पर वह भी सदन में, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहते है, वहां आप किसी पर जानलेवा हमला करें।
कल इन्हीं बातों को लेकर, जब आपकी सदन में जाने के पूर्व जांच की जाने लगे और कल ये कह दिया जाये कि आप सदन में जूते खोल कर जाये, तो आप कहेंगे कि आपका अपमान किया जा रहा है, पर आपने स्वयं को अपमान कराने की तो सारी तैयारी कर ली, हमारे विचार से तो सारे जनप्रतिनिधियों को सदन में जाने के पूर्व हर प्रकार से जांच की जानी चाहिए ताकि उनके पास कोई ऐसी चीज न हो, जिससे वे हिंसक वारदातों को अंजाम दें...
शर्मनाक, गुंडई की हद है...
इन घटनाओं के लिए हम किसी एक दल को दोषी नहीं ठहरा सकते, ऐसा ही नजारा, उस वक्त देखने को मिला था, जब बाबू लाल मरांडी मुख्यमंत्री थे, तब तत्कालीन स्पीकर इंदर सिंह नामधारी पर भाजपा के रवीन्द्र राय ने इस प्रकार की हरकत की थी, जो अशोभनीय थी। क्या सदन इसी के लिए बना है?, ये राजनीतिक दल विचार करें, क्या वे आनेवाले पीढ़ी को यहीं आचरण करने के लिए बतायेंगे? क्योंकि ये जैसा आज बोएंगे, वैसा ही काटेंगे-कटवायेंगे?
हम चाहेंगे कि विधानसभाध्यक्ष, कल सदन में जनप्रतिनिधियों के द्वारा की गई गुंडागर्दीवाली विजूयल को जनता के समक्ष सार्वजनिक करें, ताकि लोग देख सकें कि उनके जनप्रतिनिधि जिन्हें जनता ने वोट देकर सदन में पहुंचाया, वे किस प्रकार की हरकतें कर रहे हैं? इन जनप्रतिनिधियों की संतानें और उनकी गृहिणियां भी देखें कि जिन पर उन्हें नाज है, वे कैसी हरकतें, वह भी सदन में करते हुए दिखाई देते है?
हम चाहेंगे कि विधानसभाध्यक्ष ऐसे जनप्रतिनिधियों पर ऐसी कार्रवाई करें ताकि आनेवाले समय में फिर कोई जनप्रतिनिधि इस प्रकार की गुंडई न कर सकें। जब ये जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के मंदिर में इस प्रकार की हरकतें कर सकते है, तो वे सामान्य स्थलों पर इनकी हरकतें कैसी होती होंगी?, ये अब समझने या समझाने की जरुरत नहीं है।

Sunday, October 23, 2016

प्रभात खबर के लिए बाबू लाल हीरो और रघुवर खलनायक........

रांची से प्रकाशित अखबार प्रभात खबर ने आज बाबू लाल मरांडी को हीरो और रघुवर को विलेन बनाकर जनता के सामने पेश किया है। इसका मूल कारण प्रभात खबर के प्रधान संपादक रह चुके हरिवंश है, जो फिलहाल जनता दल यू से राज्यसभा सांसद है, हालांकि कहनेवाले ये भी कहते है कि हरिवंश प्रभात खबर छोड़ चुके है, पर हमारे पास पुख्ता प्रमाण है कि वे प्रभात खबर छोड़े नहीं है, आज भी वे प्रभात खबर को कस कर पकड़े हुए है। चूंकि नीतीश कुमार ने झारखण्ड मामले में अपनी नीति स्पष्ट कर दी है कि बाबू लाल मरांडी झारखण्ड के नायक है, वे ही उनकी ओर से झारखण्ड के मुख्यमंत्री उम्मीदवार है। तभी से हरिवंश ने उनकी राह आसान बनाने के लिए कमर कस ली है और जब भी मौका मिलता है, वे बाबू लाल के प्रति वफादार बन कर पत्रकारिता को अपने इशारों पर नचा रहे है। जैसे कल ही की बात को ले लीजिये। रांची में कल आदिवासी आक्रोश रैली थी। इस रैली में 42 आदिवासी संगठनों के लोग थे, पर प्रभात खबर ने इस पूरे प्रकरण का हीरो बाबू लाल मरांडी को बना दिया, जबकि उस रैली में कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू, गीताश्री उरांव, झामुमो के पौलुस सुरीन और अन्य नेता भी मंच पर मौजूद थे। यहीं नहीं अपने अखबार में प्रथम पृष्ठ पर इस प्रकार की हेडिंग दे दी कि अगर सामान्य व्यक्ति उस समाचार को पढ़े तो पता लग जायेगा कि यहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास सचमुच में खलनायक है, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।
प्रभात खबर के अनुसार, कल की रैली को रोकने के लिए राज्य सरकार ने कमर कस लिया था, और इसी क्रम में खूंटी में फायरिंग हुई और एक व्यक्ति की मौत हो गयी, जबकि सच्चाई कुछ और ही है। इस सच्चाई को जानने के लिए आपको दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आजाद सिपाही, राष्ट्रीय सागर तथा अन्य अखबारों का रूख करना पड़ेगा।
दैनिक भास्कर ने अपने प्रथम पृष्ठ पर फोटो देते हुए हेडलाइन्स दिया – रांची में रैली, खूंटी में नाकेबंदी से आक्रोश। एएसपी-थानेदार को ढाई घंटे रस्से से बांधकर पीटा, फिर पुलिस फायरिंग में किसान की मौत, लेकिन प्रभात खबर ने इसी घटना को पृष्ठ संख्या 11 पर लिखा – खूंटी में प्रशासन ने एक हजार ग्रामीणों को रोका और पुलिस के साथ होनेवाली हादसे और सेंदरे की बात अपनी ओर से छुपा ली, साथ ही इस घटना को सामान्य दिखाते हुए पुलिस के मुख से लिखवाया, जैसे लगता है कि वहां कोई ऐसी घटना घटी ही नहीं। जबकि सच्चाई यह है कि अगर पुलिस आत्मरक्षार्थ गोली नहीं चलाती तो आज कितने पुलिसकर्मियों के घरों में लाशों के ढेर नजर आते क्योंकि इस रैली में नक्सलियों ने अपनी भूमिका तय कर रखी थी। इस घटना को दैनिक जागरण ने प्रथम पृष्ठ पर हेडिंग्स देते हुए लिखा – खूंटी में उग्र भीड़ पर फायरिंग, एक मरा, पुलिस ने आत्मरक्षार्थ चलाई गोलियां, 8 ग्रामीण घायल और इस हेडिंग्स के माध्यम से दैनिक जागरण ने पत्रकारिता धर्म की रक्षा की, साथ ही आक्रोश रैली को भी प्रमुखता से उठाया, जो उठाना भी चाहिए।
चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने तो परसो से ही ताल ठोक दिया था कि उसे आदिवासी आक्रोश रैली को बेहतर ढंग से पेश करना है और रघुवर दास की सरकार को कील ठोकना है, तो उसने अपने उक्त निर्णयों पर आगे बढ़ते हुए, आज भी वहीं किया। इसलिए हिन्दुस्तान अखबार पर क्या कहना।
अब अपनी बात – ये जो अखबार वाले है न। कोई धर्म या समाज हित में पत्रकारिता के लिए अपना दुकान नहीं खोले है। प्रभात खबर का मालिक प्रभात खबर की आड़ में कहा-कहां माइन्स चला रहा है, क्या किसी को नहीं मालूम। हिन्दुस्तान अखबार के लोग अर्जुन मुंडा के शासन काल में कहा पर गोल्डमाइन्स लिये थे। हमको नहीं मालूम है क्या? यानी ये अखबार वाले अपना धंधा चलाने के लिए आदिवासियों की जमीन लूटे तो सही और दूसरा कोई लूटे तो गलत। अरे गलत है तो सब गलत है, एक गलत और दूसरा सहीं...और दूसरा गलत तो पहला सही कैसे भाई। सच्चाई यह है कि यहां झारखण्ड का हर नेता और हर पत्रकार अपने – अपने ढंग से राज्य की जनता को बरगला रहा है, और भोली-भाली जनता इनके बहकावे में आ रही है। नेताओं और पत्रकारों को तो कुछ नहीं होता, पर जनता हर प्रकार से मारी जाती है। अखबार के मालिकों और संपादकों को क्या है? वे तो पेड न्यूज की आड़ में अपनी गोटी सेंक चुके होते है और उनके प्यादे यानी रिपोर्टर्स उनके इशारे पर वो न्यूज बनाते है, जो उनके आकाओं को पसंद आती है। आज का अखबार देखने से तो यहीं लगता है।
... और अब एक सलाह राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास को, आप कृपा कर किसी भी अखबार के कार्यक्रम में जाये, तो प्लीज ये न कहें कि पत्रकारिता हो तो फंलाने अखबार जैसी। हमारे पास प्रमाण है एक अखबार बार-बार आपका वक्तव्य छापता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने प्रभात खबर की प्रशंसा की। हमें हंसी आती है, जो अखबार हमारे परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के परिवार के साथ धोखा करता है। अमर शहीद की मिट्टी पर राजनीति करता है, उसे आप कैसे कह सकते है कि बहुत ही अच्छा है। प्लीज माफ करें। झारखण्ड की जनता के साथ इँसाफ करें। ये अखबारवाले किसी के नहीं है, न तो देश के और न ही देश के जवानों के। ये तो वीर जवानों के शहीदों का भी व्यवसायीकरण कर देते है। शर्मनाक...

Monday, January 4, 2016

वाह रे ढुलू, तेरी तो निकल पड़ी...............

आज रांची से प्रकाशित “प्रभात खबर” ने पृष्ठ संख्या 7 पर “ढुल्लू पर मुकदमा
वापसी के फैसले पर उठे सवाल” नामक शीर्षक से जो आलेख प्रकाशित करते हुए एक विशेष पेज दिया है। उनमें जितने भी सवाल उठाये गये। उन सवालों को मैंने अपने फेसबुक और ब्लॉग के माध्यम से 30 अक्टूबर को ही उठा दिया था, जो आज भी मेरे फेसबुक और ब्लाग www.vidrohi24.blogspot.in पर मौजूद है। मैंने 30 अक्टूबर को लिखा था “कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...
मनमुताबिक मंतव्य लेने के लिए, लोक अभियोजक का तबादला...
प्रभार लेने के पूर्व ही, सरकार के मनमुताबिक रिपोर्ट, धनबाद डीसी को भेजा ए के सिंह-2 ने...”
गर उस आलेख को ध्यान से देखें अथवा पढ़े तो सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा...
चलिये सवाल किसी ने भी उठाया हो, वो सवाल पहले उठाया गया अथवा बाद में...यह महत्वपूर्ण नहीं...
गर सवाल में ताकत है तो उसका जवाब सरकार की ओर से आनी ही चाहिए, क्योंकि सरकार ने कई बार कहा है कि वह भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड बनाना चाहती है...
अब सरकार ही बताये...
कि जो व्यक्ति अथवा विधायक
1. पुलिस की वर्दी फाड़ दे...
2. संभ्रांत नागरिकों को चोर – चुहाड़ बोले...
3. जिसके भय से डीएसपी कांपने लगे...
4. जिसके भय से बीसीसीएल के वरीय अधिकारी इस्तीफा देने की पेशकश करें...
5. जो स्थानीय पुलिस के समानान्तर एक टाइगर सेना बना लें...
6. जो अपने विरोधियों को भगवान के पास भेजने का बयान जारी करें...
और ऐसे लोगों को सरकार बचाने का प्रयास ही नहीं, बल्कि उसे बचा लें तो क्या ऐसे में झारखंड भ्रष्टाचार मुक्त बनेगा...

Tuesday, December 29, 2015

हेमंत का दिव्यज्ञान........

झारखण्ड का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य, यहां एक से बढ़कर एक नेता है...
जब ये सत्ता में रहते हैं तब इनका दिव्यज्ञान घास चरने चला जाता है और जब विपक्ष में होते है तब इनका दिव्यज्ञान पुनः इनके मनमस्तिष्क में दिव्यता के साथ आ धमकता है...फिर जब ये देना शुरु करते है तो जैसे लगता है कि दुनिया की सारी बुद्धि गर किसी के पास हैं तो इन्हीं के पास है...।
जरा देखिये आज के अखबारों को, हेमंत सोरेन जो शिबू सोरेन के बेटे है, वहीं शिबू सोरेन जिन्होंने घूस लेकर कांग्रेस के नरसिम्हा राव सरकार को जीवनदान दिया था, वहीं शिबू सोरेन जो झारखण्ड बनने के क्रम में पहला मुख्यमंत्री बनने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के चरण स्पर्श किये और गणेश परिक्रमा की थी, वहीं शिबू सोरेन जो कभी भाजपा के वोट से राज्यसभा भी पहुंचे थे, वहीं शिबू सोरेन जो अपने परिवार के सभी सदस्यों को राजनीति के माध्यम से उनका जीवन सफल करने में लगे रहते है, जिनके परिवार के सदस्यों के पीछे सीबीआई हमेशा लगी रहती है, वहीं शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन ने बयान दिया है कि खतियान हो स्थानीयता का आधार। मैं पूछता हूं – भैया हेमंत, जो स्थानीयता पर आज बयान दिये जा रहे हो, इसी प्रकार का बयान तो कभी कांग्रेस की विधायक गीताश्री उरांव ने दिये थे, जब आप मुख्यमंत्री थे। उस वक्त आपने स्थानीयता का मुद्दा क्यों नहीं हल किया? उस वक्त तो सत्ता आपके हाथ में थी...अगर आपकी सरकार इस मुद्दे पर चल भी जाती, फिर भी आप पूर्ण बहुमत में आते...। इसके बावजूद इस स्थानीयता के आग से खेलने की रुचि क्यों नहीं दिखाई? उस वक्त आप के आज का दिव्यज्ञान कहां चला गया था?
हे खतियान भक्त नेता हेमंत जी, आज आप जो अपने प्रिय हिमांशु शेखर चौधरी को झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के सहयोग से सूचना आयुक्त बनाया, क्या आप बता सकते हो कि राज्य के कितने आदिवासी बच्चों का इसी प्रकार आपने कल्याण कराया?, वह भी तब जबकि आप राज्य के मुख्यमंत्री थे। आप बता सकते हैं कि झामुमो के दिग्गज नेता हेमलाल मुरमू और सायमन मरांडी जैसे नेताओं को भाजपा का दामन क्यों पकड़ना पड़ा? आपके पिता और आपकी पार्टी तो के डी सिंह जैसे लोगों को महान बनाती है और कैसे बनाती है?, वो राज्य की जनता से छूपी हैं क्या?
जरा आप अपने पिता शिबू सोरेन से ही पूछिये कि आखिर क्या वजह है कि रघुवर सरकार की वे प्रशंसा करते नहीं थक रहे, आज भी अखबारों में आया कि शिबू ने रघुवर सरकार की प्रशंसा की और आप रघुवर दास की सरकार के खिलाफ दिये जा रहे है...कहीं कोई डीलिंग वाली बात तो नहीं हैं न...गर कोई डीलिंग करनी हैं और डीलिंग की राजनीति कर रहे हैं तो फिर तो बात ही नहीं करनी...क्योंकि झारखंड की राजनीति तो डीलिंग ही प्रधान है...। मैंने तो कई नेताओं और विधायकों को देखा कि वे सदन में और सदन के बाहर बाबू लाल मरांडी की आलोचना करते थे, और जब बाबू लाल मरांडी के मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचते थे, तो डीलिंग करने लगते थे, जिस पर बाबू लाल मरांडी हंस भी दिया करते थे और कहते थे कि यार राजनीति करनी है या झारखंड का विकास करना है... अच्छी तरह पहले सोच लो, तो फिर बात करो...
तो लगे हाथों आप भी बता ही दीजिये... कि स्थानीयता के खतियान वाले बयान से रघुवर सरकार को आप ब्लेकमेल कर रहे है या सचमुच आपको झारखंड के विकास की चिंता है...
हालांकि मैं जानता हूं कि आप को झारखंड के विकास की कितनी चिंता है? असली बात तो यह हैं कि आपको जो चाहिए, वो मिल गया... कम से कम कहने में आता हैं न कि आप राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री है...आपको विकास से क्या मतलब? और रही बात रघुवर दास सरकार के काम-काज की...। तो कम से कम आपकी सरकार से तो यह बेहतर ही काम कर रही है और इसका सर्टिफिकेट आपके पिताश्री शिबू सोरेन एक नहीं, दो बार दे चुके हैं...

Thursday, November 19, 2015

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........
पन्द्रह साल झारखंड बने हो गये...
राज्य की जनता ने इसी बीच एक से एक नेता देखें, जिन्होंने झारखंड का नेतृत्व किया...पर किसी नेता में हिम्मत नहीं हुई कि बाबू लाल मरांडी द्वारा खींची गयी विकास की लकीर से बड़ी लकीर खींच कर दिखा दें...।
कितने नाम गिनाऊं...
अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन और अब रघुवर दास...। दावे तो सबके थे और हैं, पर जरा पूछिये कि वो कौन ऐसी चीजें है, जिसको लेकर राज्य की जनता इन पर गर्व कर सकें और ये कहें कि ये इनकी देन है – इन झारखंडी नेताओं का...झारखंड की जनता के लिए...।
सच्चाई यह है कि इन सारे नेताओं ने अपनी कोठी ठीक की, अपना दबदबा कायम किया पर जनता के हित में कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिस पर जनता इन्हें अपना मान सकें...हां इतना जरुर हुआ कि इनके यशोगान गानेवाले मीडिया में रह रहे लोग व इनके चारणों की आर्थिक स्थिति इन नेताओं के समान जरुर हो गयी...।
गर इन नेताओं के कार्यकाल को देखिये और विभिन्न अखबारों में इनके शासनकाल के दौरान विकास को पैमाना बनाकर छपे विज्ञापनों को देखे तो इनकी पोल खुलकर रह जायेगी...। ये सारे नेता बाबू लाल मरांडी के इर्द-गिर्द भी नहीं ठहरते...।
हमें याद है कि जब बाबू लाल मरांडी ने सत्ता संभाली तो बिहार के घटिया स्तर नेताओं की मार झेल रहा झारखंड को उपर उठाना कोई सामान्य कार्य नहीं था, पर बाबू लाल मरांडी ने योग्य लोगों की मदद से जो खाका तैयार किया और उस पर जो चलने की कोशिश की...उसका फायदा सबने उठाया और आज भी वह फायदा देखने को मिल रहा है...
हालांकि बाबू लाल के विकासात्मक सोच को कुंद करने और झारखंड के विकास की पटरी को धराशायी करने का प्रयास उस वक्त के नीतीश भक्त नेताओं व विधायकों ने कम नहीं किया...। जिसका खामियाजा लाल चंद महतो, जलेश्वर महतो, बच्चा सिंह, गौतम सागर राणा आज भी उठा रहे है, जबकि मधु सिंह और रमेश सिंह मुंडा तो स्वर्ग ही सिधार गये...। इसलिए इन पर बोलना अब ठीक नहीं...पर सच्चाई यहीं है...
आखिर क्या किया बाबू लाल ने...आज इस पर चर्चा होना ही चाहिए, क्योंकि झारखंड अपने स्थापना के 15 साल पूरे कर लिए और आज 16 वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है...।
बाबू लाल का झारखंड को देन......
1. झारखंड के बच्चों को बिहार से पिंड छुड़ाया और सीधे सीबीएसई पैटर्न लागू करते हुए, झारखंड के बच्चों को एनसीईआरटी की पुस्तकें निःशुल्क थमा दी...पढ़ों और खुद को गढ़ो का सिद्धांत बाबू लाल ने झारखंड के बच्चों को दिया... और किसी से भेदभाव नहीं की....
2. झारखंड की आदिवासी बालिकाएँ कल्याण विभाग को जान सकी और वे साइकिल से अपने घरों से निकलती हुई, स्कूल पहुंचने लगी...ऐसा पहली बार सुंदर सा दृश्य झारखंड में देखने को मिला, जहां बेटियां आगे निकल रही थी...वह सरकार द्वारा दिये गये साइकिल से अपने स्कूल जा रही थी।
3. बाबू लाल जानते थे कि बिना आधारभूत सरंचना के झारखंड का विकास नहीं हो सकता...इसलिए उन्होंने जर्जर झारखंड को ठोस झारखंड बनाना शुरु किया...बड़े पैमाने पर पुल-पुलिया बनाये गये...सड़कों की दशा सुधारी गयी...उस वक्त लोग बोला करते थे कि गर बसे हिचकोले खाना बंद कर दें तो समझ लो, झारखंड आ गया...
4. भारतीय रेल की मदद ली...झारखंड में अच्छी ट्रेनें इन्हीं के शासनकाल में देखने को मिली, जो रांची में इक्के – दुक्के ट्रेन देखने को मिलते थे, जहां दिल्ली जाने के लिए कोई बेहतर ट्रेन नहीं थी, इनके शासन काल में भारत सरकार के सहयोग से रांची देश के सभी महत्वपूर्ण महानगरों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ना शुरु हुआ...यहीं नहीं कई रेलवे प्रोजेक्ट भी उन्होंने शुरु करवाएं...ज्यादा जानकारी के लिए तत्कालीन रेलमंत्री और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कोई भी दरवाजा खटखटा सकता है...
5. बाबू लाल ने भ्रष्टाचार पर भी सीधा चोट किया... मात्र एक साल में बाबू लाल मरांडी के शासन काल में सौ से भी ज्यादा भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी निगरानी की भेंट चढ़ चुके थे।
6. झारखंड के दलितों व आदिवासियों के आर्थिक उत्थान के लिए बाबू लाल मरांडी ने उन्हें बस, टेम्पू भी उपलब्ध करायी थी...
7. किसानों को कम कीमत पर पानी पटाने के लिए डीजल चालित मशीन उपलब्ध करायी गयी, यहीं नहीं जैसे ही सुखा पड़ने की आशंका होती, वे बैठक बुलाते और एक्शन लेते, ये अलग बात थी कि जैसे ही एक्शन की बात होती, प्रकृति इतनी बारिश कर देती कि राज्य से सूखे पड़ने की आशंका ही खत्म हो जाती...
8. बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में ही विधानसभा में सरपल्स बजट पेश होता था...
9. बाबू लाल मरांडी ने ही झारखंड के मूलवासियों को उनका हक मिले, इसके लिए डोमिसाइल नीति की घोषणा की, इस नीति में कहीं भी कुछ गड़बड़ नहीं था, पर उनके विरोधियों ने उनके खिलाफ कुचक्र रचा, जिसके वे शिकार हुए...आखिर झारखंड जिनके लिए बना, उन्हें वह हक क्यों नहीं मिलना चाहिए...आखिर जो अन्य राज्यों में भी वहां का डोमिसाइल बनाकर लाभ ले रहे है, वे यहां भी उसका लाभ ले, यानी एक व्यक्ति का परिवार दो – दो जगहों का लाभ लें और यहां के आदिवासी – मूलवासी झारखंड में भी दोयम दर्जें का नागरिक बन कर रहें, क्या ये गलत नहीं?
10. आज जो विधानसभा भवन और उच्च न्यायालय भवन निर्माण की बात हो रही है, उसके लिए ग्रेटर रांची बनाने का स्वप्न किसका था, ये तो सबको मालूम होना चाहिए...
11. ये किसी को नहीं भूलना चाहिए कि झारखंड के मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ही थे, जो विकास के आधार पर देश के सभी राज्यों में से सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रुप में उस वक्त तीसरे स्थान पर पहुंच गये थे...जो आज तक कोई नहीं पहुंच सका....
12. जब उनका शासन था तो झारखंड का सम्मान था...जरा पूछिये मधु कोड़ा से और उनका समर्थन करनेवाले झामुमो, कांग्रेस और राजद के नेताओं व विधायकों से आज वो झारखंड को सम्मान क्यों नहीं मिलता...आखिर झारखंड के सम्मान के साथ खिलवाड़ किसने की...
13. भाजपा को शिखर पर ले जाने में भी बाबू लाल मरांडी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता...हमें याद है कि झारखंड बनने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई...। उस वक्त राजनाथ सिंह, अर्जुन मुंडा और बाबू लाल मरांडी ने संयुक्त रुप से प्रेस कांफ्रेस किया था...। हमारा सवाल था – बाबू लाल मरांडी से कि गर भाजपा सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा...बाबू लाल मरांडी ने बिना देर किये बताया – अर्जुन मुंडा। तुरंत यहीं सवाल अर्जुन मुंडा से मेरा था, अर्जुन मुंडा ने जवाब दिया कि पार्टी जो कहेगी, वो करेंगे, हालांकि वे भी दरियादिली दिखा सकते थे, पर उन्होंने नहीं दिखायी। ये वो समय था जब लाल कृष्ण आडवाणी के होठों पर अटल बिहारी वाजपेयी और अटल बिहारी वाजपेयी के होठो पर आडवाणी हुआ करते थे, पर झारखंड में बाबू लाल मरांडी के होठों पर अर्जुन मुंडा तो थे, पर अर्जुन मुंडा के होठों पर बाबू लाल मरांडी नहीं थे। एक बात और...झारखंड के राजनीति के धुरंधरों को ये जान लेना चाहिए कि अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जाने में बाबू लाल मरांडी की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी... न कि किसी और नेता की...पर काल के पहिये ने... बाबू लाल मरांडी को भाजपा से इतना दूर कर दिया कि....वे भाजपा को आज की तारीख में पसंद ही नहीं करते...और न भाजपा के नेताओं को....
14. बाबू लाल मरांडी मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान अपने विरोधियों को भी उतना ही सम्मान देते थे, जितना आज तक किसी ने नहीं दिया...याद करिये...भाकपा माले विधायक दल के नेता महेन्द्र प्रसाद सिंह के प्रति विधानसभा में दिया गया उनका बयान बहुत कुछ कह देता है...जरा आज के नेताओं का बयान देख लीजिये....हालांकि बाबू लाल मरांडी आज भी अपने विरोधियों को उतना ही सम्मान देते है...चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट और ये पूछना...क्या जी, कैसे है, सब ठीक...
15. सिंगल विंडो सिस्टम हो या ग्रेटर रांची, सब पर बाबू लाल मरांडी का विजन क्लियर था...नक्सलवाद का सफाया हो...या बेहतर झारखंड निर्माण की ललक...सचमुच बाबू लाल मरांडी आज भी झारखंड की जनता के बीच उतने ही लोकप्रिय है, जितने कल थे...ये अलग बात है कि चुनाव के समय उनके सहयोग से लोग जीत तो जाते है, पर झारखंड के दलबदलू कल्चर से अनुप्राणित होकर, ये जीते विधायक बाबू लाल मरांडी को ही ठेंगा दिखा देते है...हमें लगता है कि ऐसे लोगों को भी जनता देख रही है...
एक बार फिर बाबू लाल मरांडी को हृदय से आभार...
क्योंकि उनकी सोच, आज भी झारखंड को मजबूत करती है...

Friday, October 30, 2015

कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...

कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...
मनमुताबिक मंतव्य लेने के लिए, लोक अभियोजक का तबादला...
प्रभार लेने के पूर्व ही, सरकार के मनमुताबिक रिपोर्ट, धनबाद डीसी को भेजा ए के सिंह-2 ने...
मुख्यमंत्री रघुवर दास राज्य को भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड बनाने का दावा करते है, पर सच्चाई इसके ठीक उलट है, ऐसे में राज्य भ्रष्टाचार मुक्त होगा या यहां भ्रष्टाचार चरम सीमा पर पहुंचेगा, ये निर्णय करने का अधिकार, मैं जनता को सौंपता हूं, वह निर्णय करें और सरकार से पूछे कि आखिर ये मामला क्या है?
ढुलू महतो, भाजपा के बाघमारा विधायक है। इसके पहले ढुलू झाविमो विधायक भी रह चुके है और कभी बाबूलाल मरांडी उनके लिए ढाल का भी काम कर चुके है, पर इधर ढुलू मुद्दे पर बाबू लाल मरांडी का दल रघुवर दास का भी क्लास ले रहा है, यानी मेरे दल में है तो संत और दूसरे दल में गया तो चोर वाली कहावत....।
और अब सीधे काम की बात...
पिछले साल 24 जून 2014 को भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से भेजा गया F.NO.IV/15012/4/2014-CSRII पत्र जो विधायकों/सांसदों के अपराधिक मामलों को जल्द से जल्द ट्रायल कर निबटाने से संबंधित था। झारखंड सरकार को प्राप्त हुआ। इस पत्र में संबंधित जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश - अध्यक्ष, संबंधित जिले के उपायुक्त – सदस्य, सबंधित जिले के वरीय पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक – सदस्य, संबंधित जिले के प्रभारी लोक अभियोजक/लोक अभियोजक – सचिव को मिलाकर एक जिलास्तरीय समन्वय समिति बनानी थी, जिसके आधार पर विधायकों/सांसदों से संबंधित अदालत में चल रहे अपराधिक मामलों का ट्रायल कर त्वरित निष्पादन करना था।
इस पत्र के आलोक में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपने विधायक ढुलू महतो पर कृपा बरसानी शुरु कर दी और गृह मंत्रालय की ओर से उपायुक्त धनबाद को पत्र भेजा कि वह विधायक ढुलू महतो से संबंधित अपराधिक मामलों से संबंधित अपना मंतव्य सरकार को प्रेषित करें, ताकि ढुलू महतो पर चलाये जा रहे सारे मुकदमे वापस ले लिये जाये। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण मामला धनबाद कतरास थाना कांड संख्या -120/13 है, जिसमें विधायक ढुलू महतो को सजा मिलनी तय है, साथ ही उनकी विधायक पद पर भी खतरा मंडरा रहा है, विधायकी जाने का खतरा ढुलू महतो पर इतना ज्यादा हो गया है कि वे चाहते है कि जल्द से जल्द इस मामले में सरकार उन्हें दोष मुक्त कर दें, ताकि उनकी विधायकी बच जाये। इधर उपायुक्त धनबाद ने प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद से धनबाद कतरास थाना कांड संख्या – 120/13 की मुकदमा वापसी के संबंध में मंतव्य मांगा। उपायुक्त धनबाद को तत्कालीन प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी ने बिना देर किये अपने लिखित मंतव्य में मुकदमे का वापस लिया जाना लोकहित व न्यायहित के खिलाफ बता दिया।
प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद ने उपायुक्त धनबाद को 29.09.2014 पत्रांक संख्या 2952 के हवाले से अपना मंतव्य देते हुए लिखा कि –
कंडिका 4 – यह कि उपर्युक्त वाद धारा 147/148/149/341/323/353/332/290/427/283/224/225/504 भादवि के अंतर्गत सूचक रामनारायण चौधरी, तत्कालीन थाना प्रभारी, बरोरा थाना के द्वारा किया गया है जिसमें ढुलू महतो पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि वे अपने समर्थकों के सहयोग से पुलिस बल पर हरवे हथियार के साथ हमला कर गिरफ्तार वारंटी को छुड़ा ले गये एवं वादी का सर्विस पिस्टल छीनने का प्रयास किया, साथ ही पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट कर एक पुलिसकर्मी की वर्दी भी फाड़ दी। इस प्रकार इस कांड में सरकार के विरुद्ध गंभीर अपराध कर सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई।
कंडिका 5 – यह कि, इस घटना के पूर्व भी ढुलू महतो के विरुद्ध अनुमंडल न्यायालय में निम्नलिखित वाद गवाही पर लंबित है –
1. GR4041/06, U/S 147/149/353/332/224/511 IPC
2. GR1782/06, U/S 143/144/341/353/506/290/283IPC
3. GR851/07, U/S 147/148/341/323/332/353/149/225/511 IPC
4. GR3183/10,U/S 147/148/323/341/342/353/286/186/504/506IPC
इसके अलावा और भी कई वाद भिन्न-भिन्न न्यायालय में ढुलू महतो के विरुद्ध लंबित है।
कंडिका 8 – यह कि मुकदमे की वापसी होने की स्थिति में समाज पर एक ऐसे विधायक के तौर पर छवि उभरकर सामने आएगी जो कानून तोड़कर भी कानून की गिरफ्त से बाहर है और वह सरकार के विरुद्ध कोई भी न्याय विरोधी कार्य कर सकता है।
उपर्युक्त बातों पर विचार करते हुए मेरा मंतव्य है कि विधि का शासन कायम करने हेतु इस मुकदमे को वापस करना न्यायहित व लोकहित में उचित नहीं है।
प्रभारी लोक अभियोजक, डी एम त्रिपाठी के इस मंतव्य ने सरकार की नींद उड़ा दी और ये समझ लिया गया कि डी एम त्रिपाठी के रहते ढुलू को मुकदमे से वापसी संभव नहीं, इसलिए सरकार के गृह मंत्रालय ने डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण करने का फैसला लिया और 27 जून 2015 दिन शनिवार, यानी जिस दिन झारखंड मंत्रालय बंद रहता है, प्रभारी लोक अभियोजक, धनबाद डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण का आदेश दे डाला। डी एम त्रिपाठी को जिला अभियोजन कार्यालय बोकारो और डी एम त्रिपाठी की जगह अनिल कुमार सिंह-2 को अपर लोक अभियोजक धनबाद बनाकर भेजा गया, ताकि सरकार के अनुरुप अनिल कुमार सिंह -2 प्रस्ताव बनाकर उपायुक्त को भेज सकें और फिर सरकार मनमाफिक निर्णय ले सके। हुआ भी यहीं, पर इस बार सरकार की कलई खुल गयी। अनिल कुमार सिंह – 2 ने 23 जुलाई 2015 को लोक अभियोजक धनबाद के रुप में पदभार ग्रहण किया, पर पदभार ग्रहण करने के पूर्व ही सरकार के मनमुताबिक प्रस्ताव जो ढुल्लू महतो को निर्दोष साबित करता था, बनाकर 13 जुलाई 2015 को ही उपायुक्त धनबाद को संप्रेषित कर दी, जबकि उपायुक्त धनबाद ने लोक अभियोजक अनिल कुमार सिंह से रिपोर्ट भी नहीं मांगी थी। उपायुक्त ने दुबारा ढुलू महतो से संबंधित रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक धनबाद से मांगी थी, बाद में पुलिस अधीक्षक ने इस पत्र को बाघमारा डीएसपी को भेजा और इसकी प्रतिलिपि सिर्फ सूचनार्थ लोक अभियोजक को भेजी थी। पुलिस अधीक्षक के कार्यालय से जारी 6 जुलाई 2015 का पत्रांक संख्या 3448 देखा जा सकता है।
अब सवाल सरकार से, खासकर मुख्यमंत्री से.............
क. क्या सर्वोच्च न्यायालय के प्रपत्र को आधार बनाकर, एक अपराध से संबंधित व्यक्ति जो विधायक बन गया है, जिसने कानून को चुनौती दी, सरकार को चुनौती दी, लोकशाही को चुनौती दी, उसे बचाना क्या भ्रष्टाचार नहीं है?, और जब ऐसा करना भ्रष्टाचार नहीं है, तो फिर केवल ढुलू महतो को ही बचाने का ये अभियान क्यों चल रहा है?, ऐसे और भी अपराधी है, जो विधायक बने है, उन पर भी मुख्यमंत्री कृपा क्यों नही लूटा रहे?
ख. आखिर जब प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी से उपायुक्त धनबाद ने ढुलू महतो से संबंधित अपराधिक मुकदमों पर मंतव्य मांगा और डी एम त्रिपाठी ने अपना मंतव्य देने के साथ ही इसे न्यायहित और लोकहित के खिलाफ बताया तो सरकार ने इस मंतव्य को मानने से इनकार क्यों किया? डी एम त्रिपाठी का स्थानांतरण क्यों किया गया?
ग. डी एम त्रिपाठी की जगह पर अनिल कुमार सिंह – 2 को ही क्यों लाया गया?, जबकि उनके पहले कई ऐसे सीनियर है जो लोक अभियोजक धनबाद हो सकते थे, उन्हें न बनाकर अनिल कुमार सिंह – 2 को ही क्यों?, क्या सरकार को पता था कि अन्य लोक अभियोजक उनके सुर में सुर नहीं मिला सकते, और अनिल कुमार सिंह – 2 ऐसा कर सकते है।
घ. अनिल कुमार सिंह – 2 प्रभार लेते है – 23 जुलाई 2015 को, और वे अपना प्रस्ताव 13 जुलाई 2015 को ही धनबाद उपायुक्त के पास भेज देते है, वह भी ढुलू महतो के बचाव में, आखिर ये क्या मामला है? क्या उपायुक्त धनबाद ने उनसे कोई रिपोर्ट मांगी थी? वह भी प्रभार लेने के पूर्व ही कोई व्यक्ति वो काम कैसे कर सकता हैं?, जिसकी इजाजत कानून भी नहीं दे सकता, क्या ये भ्रष्टाचार नहीं है?
ङ. क्या सरकार बता सकती है कि ऐसी भी क्या मजबूरी थी कि प्रभारी लोक अभियोजक डी एम त्रिपाठी के स्थानांतरण के लिए कार्य दिवस के दिन कार्य न करके, एक ऐसे दिन स्थानांतरण का आदेश निकाला गया, जिस दिन सरकार की आफिस ही बंद रहती है?
च. क्या राज्य सरकार की डिक्शनरी में भ्रष्टाचार का पैमाना दूसरा और अन्य के लिए कुछ और होता है?
छ. 24 अक्टूबर 2015 को सारे समाचार पत्रों में यह भी समाचार प्रकाशित हुआ है कि विधायक ढुलू महतो की गुंडागर्दी से आजिज होकर सिजुआ क्षेत्र के जीएम जे पी गुप्ता ने इस्तीफा दे दिया। जीएम जे पी गुप्ता का कहना है कि सभी चीजों के लिए सिस्टम बना हुआ है। मगर विधायक ने अनुचित रुप से दबाव बना कर उन्हें निचितपुर कोलियरी जहां एक मजदूर की मौत हुई थी। उक्त घटनास्थल पर बुलाया और जबरन चार लाख रुपये मुआवजा दिलाने की घोषणा कर दी। आपत्तिजनक शब्दों के नारे भी लगवाये। इससे आहत होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया।
ज. हद तो ये भी हो गयी कि 20 अक्टूबर को धनबाद के कतरास में प्रशासन द्वारा आयोजित शांति समिति के बैठक में, भाजपा विधायक ढुलू महतो ने शांति समिति में भाग ले रहे सदस्यों को चोर - चुहाड़ तक कह डाला, क्या एक विधायक की यहीं भाषा है, कि वह किसी को भी, कही भी बेइज्जत कर सकता है, वह भी यह कहकर कि वह भाजपा विधायक है।
सूत्र बताते है कि ढुल्लू महतो को बचाने के लिए मुख्यमंत्री इसलिए रुचि ले रहे हैं कि इनसे उनका राजनीतिक और अन्य स्वार्थ सिद्ध हो रहा है...और इसमें भाजपा के कद्दावर राष्ट्रीय नेताओं की भी मिलीभगत है। आश्चर्य इस बात की, कि भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं का ढुलू महतो से इतना जल्द प्रेम प्रगाढ़ हो जायेगा, यहां के नेताओं को इसका अंदाजा ही नहीं था, हालांकि कुछ दिन पहले धनबाद में भाजपा के ही विधायक फूलचंद मंडल और ढुलू महतो के गुर्गों के बीच मुठभेड़ हो चुकी है, जिसकी खबर धनबाद से प्रकाशित होनेवाली सारी अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया...फिर भी राज्य सरकार का ढुल्लू प्रेम, आम जनता के लिए कौतूहल का विषय बन गया है, साथ ही मुख्यमंत्री रघुवर दास के भ्रष्टाचारमुक्त झारखंड बनाने के दावे पर अब सवाल भी उठने लगे है...
सरकार जवाब दें...

Tuesday, December 23, 2014

सब पर भारी, झारखंड की जनता हमारी। कोई नहीं भरमा पायेगा, जब जनता जग जायेगा।।..........

हां भाईयों, सब पर भारी, झारखंड की जनता हमारी। कोई नहीं भरमा पायेगा, जब जनता जग जायेगा।। – ये नारा सम-सामयिक हैं, क्योंकि कल तक सारे राजनीतिज्ञों, मीडियाकर्मियों और ज्योतिषियों की धड़कनें तेज थी कि पता नहीं जनता का जनादेश क्या होगा......सभी अपनी –अपनी कलाबाजियों का प्रदर्शन करते हुए, डींगे हांक रहे थे। सब की अपनी – अपनी दलीलें, कोई कह रहा था कि मेरे क्षेत्र में हमने इतने काम किये हैं कि वहां से कोई दूसरा जीत ही नहीं सकता, कोई कह रहा था कि हमने धूप में बाल थोड़ी ही सुखायें हैं, पत्रकारिता की हैं, इसलिए जो हम बोल रहे हैं, वहीं होगा और राजनीतिक भविष्यवाणी करनेवाले ज्योतिषियों की तो हवा निकल गयी हैं, बोलते ही नहीं बन रहा, कल तक अर्जुन मुंडा को पुनः प्रतिष्ठित करनेवाले यानी मुख्यमंत्री बनाने का दावा करनेवाले ज्योतिषी खोजते नहीं मिल रहे। एक दो राजनीतिक पंडितों से बात हमने करनी चाही तो वे अपनी मोबाइल बंद कर सोते हुए मिले....कुछ की पत्नियां फोन उठायी और बड़ी विनम्रता से बोली, पंडित जी महराज सो रहे हैं, कृपा कर बाद में फोन करें..............अब हम क्या बोले कि पंडित जी को आज सोना ही देना उत्तम होगा, क्योंकि आज का दिन उनके लिए सोने के लिए ही संदेश लेकर आया हैं................ आखिर क्या हुआ हैं – झारखंड में.................. झारखंड में वो हुआ हैं, कि ऐसा किसी प्रदेश में आज तक नहीं हुआ..... जनता ने एक साथ कई को सबक सिखाया हैं और कहा हैं कि अब ज्यादा चूं कि तो समझ लो, तुम्हारी खैर नहीं.................. झारखंड की जनता ने वो काम किया हैं कि जिसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम हैं, गर मेरी चले तो तो मैं एक लाइन में कह दूं कि यहां की जनता ने झारखंड के साथ खिलवाड़ करनेवाले नेताओं के साथ - साथ मीडिया को भी बजा दिया हैं कि मन करता हैं जनता जनार्दन का हाथ चूम लूं.......... यहां की जनता ने पहली बार राज्य के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत निवर्तमान मुख्यमंत्री तक को पहले धूल चटाया हैं......... जैसे बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन ( बरहेट से जीते जरुर पर दुमका से हारे भी) को हराया............. यहीं नहीं..... आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को भी बाहर का रास्ता दिखाया.......... काग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत और नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र प्रसाद सिंह को भी सदन में जाने से रोका............ झारखंड की पहली सरकार में कील ठोकनेवाले और गठबंधन की पहली सरकार को पटरी से उतारनेवाले लालचंद महतो और जलेश्वर महतो (प्रदेश अध्यक्ष जदयू) की औकात बता दी.......... राजद के प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह और राजद की तेज तर्रार नेता अन्नपूर्णा देवी को भी कह दिया कि इस बार आपकी सदन में जरुरत नहीं............ जो मीडिया हरे मोदी, हरे मोदी, हरे अमित शाह, हरे अमित शाह कहकर उनके मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा था उसे भी औकात बता दी और राज्य में एक मजबूत विपक्ष भी इस बार प्रदान कर दिया.........और अंत में कह डाला कि देश की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां, ज्योतिषियों का झूंड और खुद को लोकतंत्र का 4था स्तंभ कहनेवालों झारखंड की जनता के इस निर्णय का सम्मान करें और सबक लें...नहीं तो जब भी मौका मिलेगा, हम अपना निर्णय सुनायेंगे और वो निर्णय ऐसा होगा, जिसकी परिकल्पना किसी ने नहीं की होगी............... अब जरा सोचिये किसी ने सोचा था क्या कि दो सीटों से चुनाव लड़नेवाले बाबू लाल मरांडी, खरसावां से चुनाव लड़नेवाले मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार अर्जुन मुंडा, दुमका से हेमंत सोरेन, मझगांव से मधु कोड़ा चुनाव हार जायेंगे, पर हुआ तो ऐसा ही....क्या किसी मीडियावालों ने सोचा था क्या कि इस बार सिल्ली से सुदेश हार जायेंगे, क्योंकि हर बात में मीडिया उनकी स्तुति गा दिया करता था..........पर हुआ तो ऐसा ही हैं............... मैं, जब एक महीने पहले जयपुर से रांची आया तो जनता के बीच गया, छटपटाहट देखी, वो छटपटाहट थी – बार बार दामन पर लगनेवाले दाग की, वो छटपटाहट थी की मीडिया और राजनीति में शामिल लोग उन्हें बार – बार बदनाम क्यों करते हैं, ये क्यों कहते हैं कि स्पष्ट जनादेश जनता ने नहीं दिया......आखिर चुनाव आयोग क्यों पांच चरणों में चुनाव कराता हैं, आखिर राज्यसभा में उनके चूने हए प्रतिनिधि क्यों पैसे लेकर वोट डाला करते हैं, क्यों उन्हीं के समय जन्म लिया छत्तीसगढ़, उत्तराखंड उनसे आगे निकल गया और हम पीछे रह गये, आखिर उनके नेता विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए उनसे आगे कैसे निकल गये और वे पीछे क्यूं रह गये....क्यों उनके नेता विदेशों में अपने परिवार का इलाज कराने के लिए उन्हीं के पैसों का इस्तेमाल करते हैं पर उनके बेटे-बेटियां अच्छे इलाज के लिए तरस जाते हैं और इन्हीं छटपटाहटों के बीच झारखंड की जनता ने स्पष्ट जनादेश देने का मन बनाया और साथ ही संकल्प लिया कि वे उन्हें सबक सिखायेंगे, जो उन्हें सबक सिखाने की सोचते हैं, लीजिये जनादेश सामने हैं, जनता ने अपना काम कर दिया...गर इस जनादेश को समझ कर भी किसी की समझ नहीं खुलती हैं तो ऐसे लोगों के लिए तो भगवान ही मालिक हैं.....................

Sunday, March 10, 2013

झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष के लिए भाजपा में घमासान......................................

देश के हर समस्याओं के समाधान का दावा करनेवाली भाजपा, एक प्रदेश अध्यक्ष चुनने में नाकामयाब हैं। झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर घमासान हैं। प्रदेश अध्यक्ष बनने की लाईन में रघुवर दास, रवीन्द्र राय, सुनील सिंह, यदुनाथ पांडेय आदि नेताओं की लंबी लाइन हैं, पर राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सूझ ही नहीं रहा कि वे झारखंड की कमान किसके हाथों में सौंपे। इधर झारखंड में भाजपा के स्वंयभू नेता अर्जुन मुंडा परेशान हैं, वो चाहते हैं कि प्रदेश में ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बने, जो उनके इशारों पर नाचे, जैसा कि अभी दिनेशांनद गोस्वामी कर रहे हैं। इसलिए वे रवीन्द्र राय को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। उनको लगता हैं कि रवीन्द्र राय, जो उनके कहने पर प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे, वे आजन्म उनके प्रति वफादार रहेंगे, जैसा कि पूर्व में बाबू लाल मरांडी के प्रति अपनी वफादारी, उन्होंने दिखायी थी, पर स्थिति ऐसी हैं कि अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रवीन्द्र राय के नाम उछलवाने के बावजूद, अर्जुन मुंडा को सफलता नहीं मिल रही। ऐसी स्थिति में, अर्जुन मुंडा ने एक सुनियोजित साजिश के तहत भाजपा विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा देने की घोषणा करवा दी। ये जानते हुए कि ऐसी घोषणा के कोई मायने नहीं, क्योंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हैं। ऐसे में आप किसी दल के विधायक दल के नेता रहे अथवा नहीं रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। 
अर्जुन मुंडा भाजपा के तेज व चालाक नेता हैं। किसको कैसे पटाना हैं और कैसे किनारे लगाना हैं, वे इसमें माहिर हैं। जो लोग अर्जुन मुंडा को जानते हैं, वे ये भी जानते हैं कि ये वे ही अर्जुन मुंडा हैं, जो एक समय बाबू लाल मरांडी की गणेश परिक्रमा किया करते थे, और उन्हीं की कृपा से वे मुख्यमंत्री भी बने और जैसे ही ये मुख्यमंत्री बने, उन्होंने बाबू लाल मरांडी को ऐसा परेशान किया कि बाबू लाल ने सदा के लिए भाजपा ही छोड़ दी और ये खंड खंड हो रही भाजपा के अखंड नेता बनकर उभरे। इन्होंने कभी भी देश हित अथवा दल हित में इस्तीफा देने की पेशकश नहीं की, पर जैसे ही प्रदेश अध्यक्ष की बात आयी और उनकी बातों को नजरंदाज करने की कोशिश की गयी। उन्होंने इस्तीफे का दांव खेला, ताकि लोगों को लगे कि ये व्यक्ति भाजपा का महान कार्यकर्ता हैं, पर चाल तो चाल होती हैं, सभी इस चाल को समझ गये हैं। यानी बात वहीं हैं वो बात हैं कि ये एक बूंद खून बहाकर, शहीद होने की श्रेणी में खड़ा होना चाहते हैं।
सच्चाई ये हैं कि इसी प्रकार की घटिया स्तर की राजनीति के कारण भाजपा पूरी तरह से नष्ट होती जा रही हैं। कोई भी भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बने या खुद अर्जुन मुंडा ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष क्यों न बन जाये, भाजपा पुनः राज्य में प्रतिष्ठित हो जायेगी, ऐसा अब नहीं लगता, क्योंकि पूरे प्रदेश में भाजपा में फिसड्डी नेताओं का आधिपत्य हो गया हैं, जो न चरित्रवान हैं और न ही दल के प्रति समर्पित। ये भी वहीं करते हैं, जैसा कि अन्य दलों के कार्यकर्ता और नेता। जब सभी वहीं करते हैं और भाजपा भी वहीं कर रही हैं तो ऐसे में लोग भाजपा के साथ क्यों चले। सवाल यहीं बार - बार झारखंड की जनता के मन में घर कर रहा हैं और गर यहीं चलता रहा तो भाजपा के लाश पर चढ़कर अन्य पार्टियां यहां शासन करने लगे तो इस बात को लेकर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।