Showing posts with label हेमंत सोरेन. Show all posts
Showing posts with label हेमंत सोरेन. Show all posts

Tuesday, May 31, 2016

अर्जुन मुंडा ने शुरू की झारखण्ड में लालू स्टाइल में राजनीति...

झारखण्ड का अर्जुन लालू बनेगा, लालू स्टाइल में राजनीति करेगा और भाजपा को डूबो कर अपने अपमान का बदला लेगा। 29 मई 2016, झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा धनबाद के ब्राह्मण बरारी बस्ती में बांगला व खोरठा भाषा में लालू स्टाइल में भाषण दे रहे थे। जैसे लालू यादव का भाषण ब्राह्मण विरोध पर शुरु होता है और ब्राह्मण विरोध पर ही खत्म होता है, ठीक उसी स्टाइल में वे भाषण दे रहे थे। वे उपस्थित जनता को आह्वान कर रहे थे कि जनता भ्रष्ट अधिकारियों को ओखली में कूटे। वे धनबाद के डीसी कृपानन्द झा और एसएसपी सुरेन्द्र कुमार झा पर खूब बरसे। और तल्ख टिप्पणी करते हुए, सीधे कहा कि ये अधिकारी धनबाद को बिहार का झाझा शहर न बनायें। वे सतीश महतो के निमंत्रण पर जो इस कोयलानगरी में नया – नया आउटसोर्सिग में हाथ आजमा कर बहती गंगा में हाथ धोना चाहता है, उसका राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए यहां पहुंचे थे। अर्जुन मुंडा सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन को इशारों ही इशारों में ये कहना चाहते थे कि यहां के अधिकारी सतीश महतो को हर प्रकार की सहूलियत प्रदान करें, ताकि सतीश अपना दबदबा कायम कर, इस कोयला नगरी में एक आतंक के रूप में उभर सकें, जिसका आर्थिक फायदा अर्जुन मुंडा जैसे नेताओं को भी मिल सकें।
और अब सवाल भाजपा के दिग्गज नेताओं से...
1. अगर अर्जुन मुंडा जैसा व्यक्ति जो राज्य का पूर्व मुख्यमंत्री रह चुका है, वो सार्वजनिक सभा में यह कहता है कि जनता भ्रष्ट अधिकारियों को ओखली में कूटे तो क्या जनता को यह अधिकार नहीं कि वह भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को भी ओखली में कूट दें, जिसके कारण झारखण्ड तबाह और बर्बाद हो गया, या हो रहा है।
2. धनबाद के डीसी कृपानन्द झा और एसएसपी सुरेन्द्र कुमार झा अगर ब्राह्मण समुदाय से है तो उन पर जातिगत टिप्पणी करना कहा तक जायज है, और उन्हें भ्रष्ट बताना कहां से जायज है, क्या अर्जुन मुंडा के पास एक विशेष प्रकार का चश्मा है, जिससे उन्होंने पता लगा लिया कि वे दोनों भ्रष्ट है, और अगर ये दोनों भ्रष्ट है तो उन्हें सजा देने-दिलाने का काम अर्जुन मुंडा का है क्या?
3. कल जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे, तो यही अधिकारियों का दल इनकी आरती उतारता था तो बहुत अच्छा था और आज जब ये अपना काम करने में लगा हैं और इनकी नहीं सुन रहा तो भ्रष्ट हो गया। ये तो वहीं बात हो गयी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में – कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा चप-चप।
4. अपना राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए एक नया भस्मासुर पैदा करने से क्या धनबाद की स्थिति सुधर जायेगी? क्या धनबाद के लोग नहीं जानते है कि ये सतीश महतो कौन है और इसका मकसद क्या है?
और अब अपनी बात...
झारखण्ड की जनता को यह जान लेना चाहिए कि...
झारखण्ड में चाहे बाबू लाल मरांडी हो, या अर्जुन मुंडा या शिबू सोरेन या हेमंत सोरेन या कोई भी नेता – सच्चाई यहीं है कि ये सभी अपना पीए या सलाहकार ब्राह्मण जाति के समुदाय के लोगों को ही रखते है, या रखे हुए है। किसी कारण से अगर वे सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन से नीचे आते है तो वे इनका संरक्षण करने के लिए, हद से गुजर जाते है। ...पर जरा देखिये, सार्वजनिक सभाओं में इनका चरित्र कैसे उजागर होता है? बस मौका मिलना चाहिए, इन्हें ब्राह्मणों को गाली देने का, ये दे चलते है, क्योंकि ये राजनीतिबाज जो ठहरे, राजनीतिबाजी से कैसे स्वयं को अलग कर सकते है? देश – समाज भाड़ में जाये, इससे उन्हें क्या मतलब। उन्हें तो मतलब है किसी ऐसे समुदाय को गाली देने से, जिससे आज की जनता बहुत ही प्रसन्न होती है और वह जाति है –ब्राह्मण, क्यों अर्जुन मुंडा जी।

Saturday, April 9, 2016

और रघुवर ऐतिहासिक हो गये.........

हमने बाबू लाल को भी देखा है...
हमने अर्जुन मुंडा को भी देखा है...
हमने मधु कोड़ा को भी देखा और शिबू सोरेन को भी देखा...
देखने के लिए तो हेमंत को भी देख लिये...
सभी ने डोमिसाइल के नाम पर, स्थानीयता के नाम पर बवाल काटे, राजनीति की फसल काटी, पर किसी ने भी इस समस्या का संवैधानिक हल निकालने की ईमानदार कोशिश नहीं की, पर रघुवर दास ने ऐसा कर दिखाया कि सभी राजनीति के इस अखाड़े में चित्त हो गये...
हमने डोमिसाइल के आंदोलन को नजदीक से देखा है...
स्थानीय नीति के नाम पर 2002 में हुए बवाल, सड़कों पर उठती आग की लपटों, धू-धू कर जलती मोटरसाइकिलें और कारें, आंदोलनकारियों और पुलिस की गोलियों से छलनी होती झारखण्ड के नागरिकों की छातियों और लाशों के ढेर पर राजनीति करते, अपना राजनीतिक फसल उगाते राजनीतिज्ञों, अपने टीआरपी के लिए जद्दोजहद करते इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों और कैमरामैनों, मीडिया हाउस में इस आंदोलन को और हवा देने के लिए बन रही रणनीतियों को भी हमने देखा है...
झारखण्ड बने 15 साल हो गये। इस राज्य में अब तक 10 मुख्यमंत्री बने, पर किसी ने इस समस्या का हल निकालने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। एक ने तो इसी पर सत्ता भी संभाली पर सत्ता मिलते ही इस नीति को भूल गये, पर दसवें मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बता दिया कि उनमें हर प्रकार की कूबत है, वे हर समस्या का हल निकालना जानते है, उन्हें पता है कि शासन कैसे चलाया जाता है, नीतियां कैसे बनायी जाती है और उसे कैसे क्रियान्वित की जाती है...
अभी मुख्यमंत्री रघुवर दास के मुख्यमंत्री पद संभाले एक साल ही बीते है और उनके इस सीमित कार्यकाल का लेखा-जोखा देखा जाये, तो ये अब तक बने सारे मुख्यमंत्रियों में बीस साबित हो गये...
आखिर एक साल में इन्होंने क्या – क्या किया...
जरा देखिये...
1. झारखण्ड को अपनी विधानसभा भवन नहीं थी, विधानसभा भवन का निर्माण प्रारंभ करा दिया।
2. झारखण्ड हाई कोर्ट भवन का निर्माण प्रारंभ करा दिया।
3. यहां के पत्रकारों को सम्मान दिया और रांची में प्रेस क्लब का निर्माण शुरु करा दिया।
4. राज्य को उदय योजना में शामिल होनेवाला पहला राज्य बना दिया।
5. आज वर्ल्ड बैंक भारत के अगर किसी राज्य को सर्वाधिक सम्मान दे रहा है, तो वह हैं – झारखण्ड।
6. श्रम सुधार में प्रथम, नीर-निर्मल योजना में प्रथम, आधारभूत संरचनाओं को ठीक करने में पूरे भारत में अग्रणी, व्यापार सुगमता सूचकांक में तीसरा और तेजी से विकास करनेवाले राज्यों में चौथा स्थान...और ये सब हुआ हैं मात्र एक वर्ष में।
7. हजारीबाग के बरही में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की नींव डलवाकर, दूसरी हरित क्रांति का बीज बो दिया।
8. रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि खेल विश्वविद्यालय के साथ – साथ तकनीकी विश्वविद्यालय का शुभारंभ कराया।
9. समाज में कुछ लोगों ने अशांति फैलाने की कोशिश की, वह रांची के दंगा प्रभावित इलाकों में खुद ही कूद पड़ा...
10. किसानों के लिए कृषि सिंगल विंडो प्रारँभ करा दिया।
11. उद्योग जगत को झारखण्ड में आकर्षित करने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम लागू कराया, साथ ही साइन वन कार्यक्रम की शुरुआत करा दी।
12. कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कौंसिल का गठन करा कर कारपोरेट से जुड़े लोगों को उनके दायित्वों के पूर्ति के लिए संवेदनशील बनाया।
13. भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का गठन कर, इसे और सशक्त बनाया।
14. आदिवासियों को वनाधिकार पट्टा दिलाया। आदिम जनजातियों के लिए विशेष बटालियन का गठन कराया।
यानी अगर हम विकास की धारा को गिनाने बैठ जाये तो हम 100 की संख्या पार कर जायेंगे। ऐसी सोच वाला मुख्यमंत्री हमनें झारखण्ड में अब तक नहीं देखी।
सचमुच अगर इरादे व हौसले बुलंद हो तो फिर दिक्कत कहां आती है...
इधर सारे अखबार स्थानीय नीति के समाचार से रंगे है...
मैं जानता हूं कि ये क्यूं रंगे है...
उन्हें पता है कि ये स्थानीय नीति लागू करना बर्रे के छत्ते में हाथ डालने के बराबर है, जिसे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने चुनौती के रुप में स्वीकारा। हम जानते है कि हर अच्छे काम का विरोध होता है, आजकल तो लोकतंत्र में विपक्षी दल का काम ही हो गया है कि खुद बेहतर काम न करो और कोई बेहतर काम करें तो उसके बेहतर काम की प्रशंसा न कर, उसकी आलोचना करना शुरु कर दो, उसके हर अच्छे काम में अड़ंगा लगाओ, क्योंकि खुद तो अच्छा करना है नहीं, अगर दूसरा कोई अच्छा करेगा तो उसका राजनीतिक कद, ऊंचा हो जायेगा और ये आज के विरोधियों को बर्दाश्त नहीं...
जरा अखबार पलटिये...
जो कल तक स्थानीय नीति को लेकर आंदोलन किया करते थे, जिन्होंने इसका राजनीतिक फायदा भी उठाया, जैसे बंधू तिर्की और चमरा लिंडा। आजकल इनके धांसू बयान अखबारों से गायब है। झामुमो ने सरकार द्वारा लागू स्थानीय नीति का विरोध किया है, और विरोध का जिम्मा उठाया है झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने। झाविमो और राजद जैसी पार्टियों ने नपा तुला बयान दिया है। हम आपको बता दें कि बाबू लाल मरांडी के डोमिसाइल नीति के खिलाफ उस वक्त राजद कुछ ज्यादा ही सक्रिय था, पर चूंकि आज वह विपक्ष में है, इसलिए उसके सुर में बदलाव स्वाभाविक है।
सवाल यह है कि डर के कारण, हम अच्छा काम करना बंद कर देंगे?
जनहित में फैसले लेने बंद कर देंगे?
हम इसलिए काम करने बंद कर देंगे कि एक बड़ा वर्ग हमसे असंतुष्ट हो जायेगा?
अगर इस प्रकार की सोच हम रखे तो निश्चित ही पार्टी भले ही आगे निकल जाये या व्यक्ति जरुर आगे निकल जाये, पर अंततः देश व राज्य का नुकसान ही होता है...
पर रघुवर दास ने इन सारे सवालों पर विराम लगाकर स्थानीय नीति को परिभाषित कर दिया, इसके लिए इनकी प्रशंसा होनी ही चाहिए। कितने शर्म की बात है कि छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड ये दोनों राज्य झारखण्ड के समकक्ष ही जन्म लिये थे, इन्होंने स्थानीय नीति जल्द घोषित कर दी, पर झारखण्ड को स्थानीय नीति घोषित करने में पन्द्रह साल लग गये।
हमें आज भी याद है कि 2002 में जो स्थानीय नीति के नाम पर दंगे भड़के और जिसमें 6 लोगों की जाने गई। उसके लिए अगर कोई दोषी है तो वह है
• उस समय की सरकार जिसने इस स्थानीय नीति का ईमानदारी से हल निकालने की कोशिश नहीं की।
• हिंसक आंदोलन कर रहे आंदोलनकारियों पर अंकुश लगाने का काम नहीं किया, बल्कि उसे और हवा दी।
• मीडिया हाउस जिसने अपनी मर्यादा का उल्लघंन किया और डोमिसाइल आंदोलन में एक दूसरे को देख लेने वाले युवाओं को हतोत्साहित करने के बदले प्रोत्साहित किया।
• अगर सूत्रों की मानें तो मिशनरियों की भी भूमिका संदिग्ध थी।
आज रघुवर सरकार ने स्थानीय नीति लागू कर दी है। हो सकता है, (हालांकि इसकी संभावनाएं न के बराबर है) कुछ उपद्रवी इसके नाम पर आंदोलन करें, जरुरत है, ऐसे लोगों से सख्ती से निबटने की, क्योंकि आज झारखण्ड बहुत आगे निकल चुका है, और ये उपद्रवी चाहेंगे कि झारखण्ड पुनः विकास की पटरी से नीचे आ जाये, ताकि रघुवर दास की भी छवि सामान्य मुख्यमंत्री के रुप में जनता के बीच आ जाये।
हम एक बार फिर मुख्यमंत्री रघुवर दास, दबंग मुख्यमंत्री रघुवर दास, बोल्ड डिसीजन लेनेवाले मुख्यमंत्री रघुवर दास की इस बात के लिए सराहना करते है, जिन्होंने स्थानीयता नीति पर बोल्ड स्टेप लिया और अपने घोर विरोधियों को बता दिया कि वे झारखण्ड को विकास के पथ पर ले चलते हुए, अपने राज्य को कहा ले जाना चाहते है...
आखिर क्या है रघुवर की स्थानीय नीति...
आइये इस पर गौर फरमाये...
वे सभी स्थानीय माने जायेंगे, जो इस केटगरी में स्वयं को पायेंगे...
• वैसे सभी लोग, जिनका स्वयं अथवा पूर्वज के नाम से पिछले सर्वे खतियान में नाम दर्ज हो। वैसे मूल निवासी जो भूमिहीन है, उनके संबंध में भी उनकी प्रचलित भाषा, संस्कृति एवं परंपरा के आधार पर ग्राम सभा द्वारा पहचान किये जाने पर स्थानीय की परिभाषा में शामिल हो सकेंगे।
• झारखण्ड के वैसे निवासी जो राज्य में पिछले 30 साल या उससे अधिक समय से निवास कर रहे हों और अचल संपत्ति अर्जित किया हो। ऐसे व्यक्ति स्वयं, उनकी पत्नी और बच्चे इसमें शामिल होंगे।
• राज्य सरकार या राज्य सरकार द्वारा संचालित या मान्यता प्राप्त संस्थानों, निगम आदि में नियुक्त एवं कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी एवं उनकी पत्नी और बच्चे।
• केन्द्र सरकार के वैसे कर्मचारी एवं पदाधिकारी जो झारखण्ड में कार्यरत हो, वे स्वयं, उनकी पत्नी और बच्चे।
• झारखण्ड राज्य में किसी संवैधानिक अथवा विधिक पदों पर नियुक्त व्यक्ति और उनकी पत्नी एवं बच्चे।
• ऐसे व्यक्ति जिनका जन्म झारखण्ड में हुआ हो और जिन्होंने मैट्रिक एवं समकक्ष स्तर की पूरी शिक्षा झारखण्ड में स्थित मान्यता प्राप्त संस्थानों से पूरी की हो, वे स्थानीय होंगे।
कैबिनेट ने इस नीति पर मुहर लगा दी है। अब अधिसूचना जारी होने के साथ ही झारखण्ड में यह कानून लागू हो जायेगा। सचमुच रघुवर दास, आज आप ऐतिहासिक हो गये। आपका हृदय से, फिलहाल इस कार्य के लिए अभिनन्दन।

Saturday, March 12, 2016

वो तीर-धनुष उठायेंगे और हम घर छोड़कर भाग खड़े होंगे............

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के बड़बोले नेता हेमंत सोरेन पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सुप्रीमो राज ठाकरे का गहरा प्रभाव है, जैसे राज ठाकरे समय – समय पर गैर मराठियों को उनकी औकात बताने के लिए नाना प्रकार के चिरकूटई टाइप के बयान देते रहते है, जिनके बयान आते ही, मनसे कार्यकर्ता गैर-मराठियों के खिलाफ मार-धाड़ करने के लिए निकल पड़ते है, ठीक उसी प्रकार हेमंत का बयान आज रांची से निकलनेवाले कमोवेश सभी अखबारों में पढ़ने को मिले। चूंकि हमारे देश के चिरकूट टाइप के बहुत सारे नेताओं को ये गलतफहमी हो गयी है, कि इस प्रकार के बयान देने से लोकप्रियता में बढ़ोत्तरी हो जाती है, इसलिए वे इस प्रकार का बयान देते रहते है।
अपने डेढ़ साल के मुख्यमंत्रित्व काल में हेमंत सोरेन ने इस प्रकार का बयान देने से खुद को बचा रखा था, शायद इस दौरान उन्हें दिव्य ज्ञान हासिल हो गया था कि मुख्यमंत्री पद पर रहकर ऐसा बयान नहीं दिया जाता। पर आज क्या हो गया...। हम आपको बता दें कि हेमंत को दिमाग देनेवाले बहुत सारे ऐसे लोग है, जिन्हें राजनीति की एबीसीडी नहीं आती...पर वो कहते है न, कभी – कभी मूर्खों और गधों की बातें भी दैवकृपा से सिद्ध हो जाती है...जिस के प्रभाव में आकर नेताओं का एक वर्ग, उन गधों और मूर्खों को दिव्य पुरुष मानकर, उसकी हर बातें इस प्रकार स्वीकार करता है, जैसे लगता है कि भगवान के श्रीमुख से निकली वाणी हो...
हेमंत को मालूम होना चाहिए कि इस प्रकार का बयान उनके भविष्य की राजनीति पर सदा के लिए प्रश्न चिह्न लगा देगा...हेमंत को जो लोग ओवैसी या राज ठाकरे बनने की सलाह दे रहे है...उन्हें नहीं पता कि वे आग से खेल रहे हैं...क्योंकि ये घटियास्तर की सलाह और चिरकूटई टाइप का बयान झारखण्ड को कहीं का नहीं छोड़ेगा...
झारखण्ड के लिए खुशी की बात है, कि इन दिनों पूरे देश में झारखण्ड की एक बेहतर तस्वीर गयी है...और ये झामुमो या हेमंत के चलते नहीं गयी...ये गयी है दीपिका और धौनी जैसे खिलाड़ियों की वजह से...अंशुता और सुमराई जैसे खिलाड़ियों की वजह से...। इनकी पार्टी ने तो झारखण्ड की वो दुर्गति कराई है कि सारा देश जानता है...। शायद हेमंत को पता नहीं कि झारखण्ड की जनता अभी तक भूली नहीं है कि इनकी पार्टी के नेताओं ने किस प्रकार रिश्वत लेकर नरसिंहा राव की सरकार बचाई थी...। जनता ये भी नहीं भूली है कि किस – किस को उनके लोगों ने पैसे लेकर राज्यसभा में पहुंचाया और बाद में वहीं व्यक्ति इनकी पार्टी और झारखण्ड को ठेंगा दिखाया...यानी ये तो वहीं बात हुई जो झारखण्ड को लूटवाया वो खुद को झारखण्ड का हितैषी बता रहा है...ये व्यक्ति जब सरकार में था, सत्ता में था तो डोमिसाइल समस्या हल नहीं किया...डोमिसाइल की फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और जैसे ही भाजपा की सत्ता आयी, इसे डोमिसाइल पर प्रवचन करने की बात याद आ गयी...पता नहीं कैसे – कैसे नेता झारखण्ड में आ गये है जो अपनी ही माटी के दुश्मन बन गये....इनकी हरकत देख कर कौए और गीध तक शरमा जाय...।

Tuesday, December 29, 2015

हेमंत का दिव्यज्ञान........

झारखण्ड का सौभाग्य कहे या दुर्भाग्य, यहां एक से बढ़कर एक नेता है...
जब ये सत्ता में रहते हैं तब इनका दिव्यज्ञान घास चरने चला जाता है और जब विपक्ष में होते है तब इनका दिव्यज्ञान पुनः इनके मनमस्तिष्क में दिव्यता के साथ आ धमकता है...फिर जब ये देना शुरु करते है तो जैसे लगता है कि दुनिया की सारी बुद्धि गर किसी के पास हैं तो इन्हीं के पास है...।
जरा देखिये आज के अखबारों को, हेमंत सोरेन जो शिबू सोरेन के बेटे है, वहीं शिबू सोरेन जिन्होंने घूस लेकर कांग्रेस के नरसिम्हा राव सरकार को जीवनदान दिया था, वहीं शिबू सोरेन जो झारखण्ड बनने के क्रम में पहला मुख्यमंत्री बनने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के चरण स्पर्श किये और गणेश परिक्रमा की थी, वहीं शिबू सोरेन जो कभी भाजपा के वोट से राज्यसभा भी पहुंचे थे, वहीं शिबू सोरेन जो अपने परिवार के सभी सदस्यों को राजनीति के माध्यम से उनका जीवन सफल करने में लगे रहते है, जिनके परिवार के सदस्यों के पीछे सीबीआई हमेशा लगी रहती है, वहीं शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन ने बयान दिया है कि खतियान हो स्थानीयता का आधार। मैं पूछता हूं – भैया हेमंत, जो स्थानीयता पर आज बयान दिये जा रहे हो, इसी प्रकार का बयान तो कभी कांग्रेस की विधायक गीताश्री उरांव ने दिये थे, जब आप मुख्यमंत्री थे। उस वक्त आपने स्थानीयता का मुद्दा क्यों नहीं हल किया? उस वक्त तो सत्ता आपके हाथ में थी...अगर आपकी सरकार इस मुद्दे पर चल भी जाती, फिर भी आप पूर्ण बहुमत में आते...। इसके बावजूद इस स्थानीयता के आग से खेलने की रुचि क्यों नहीं दिखाई? उस वक्त आप के आज का दिव्यज्ञान कहां चला गया था?
हे खतियान भक्त नेता हेमंत जी, आज आप जो अपने प्रिय हिमांशु शेखर चौधरी को झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के सहयोग से सूचना आयुक्त बनाया, क्या आप बता सकते हो कि राज्य के कितने आदिवासी बच्चों का इसी प्रकार आपने कल्याण कराया?, वह भी तब जबकि आप राज्य के मुख्यमंत्री थे। आप बता सकते हैं कि झामुमो के दिग्गज नेता हेमलाल मुरमू और सायमन मरांडी जैसे नेताओं को भाजपा का दामन क्यों पकड़ना पड़ा? आपके पिता और आपकी पार्टी तो के डी सिंह जैसे लोगों को महान बनाती है और कैसे बनाती है?, वो राज्य की जनता से छूपी हैं क्या?
जरा आप अपने पिता शिबू सोरेन से ही पूछिये कि आखिर क्या वजह है कि रघुवर सरकार की वे प्रशंसा करते नहीं थक रहे, आज भी अखबारों में आया कि शिबू ने रघुवर सरकार की प्रशंसा की और आप रघुवर दास की सरकार के खिलाफ दिये जा रहे है...कहीं कोई डीलिंग वाली बात तो नहीं हैं न...गर कोई डीलिंग करनी हैं और डीलिंग की राजनीति कर रहे हैं तो फिर तो बात ही नहीं करनी...क्योंकि झारखंड की राजनीति तो डीलिंग ही प्रधान है...। मैंने तो कई नेताओं और विधायकों को देखा कि वे सदन में और सदन के बाहर बाबू लाल मरांडी की आलोचना करते थे, और जब बाबू लाल मरांडी के मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचते थे, तो डीलिंग करने लगते थे, जिस पर बाबू लाल मरांडी हंस भी दिया करते थे और कहते थे कि यार राजनीति करनी है या झारखंड का विकास करना है... अच्छी तरह पहले सोच लो, तो फिर बात करो...
तो लगे हाथों आप भी बता ही दीजिये... कि स्थानीयता के खतियान वाले बयान से रघुवर सरकार को आप ब्लेकमेल कर रहे है या सचमुच आपको झारखंड के विकास की चिंता है...
हालांकि मैं जानता हूं कि आप को झारखंड के विकास की कितनी चिंता है? असली बात तो यह हैं कि आपको जो चाहिए, वो मिल गया... कम से कम कहने में आता हैं न कि आप राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री है...आपको विकास से क्या मतलब? और रही बात रघुवर दास सरकार के काम-काज की...। तो कम से कम आपकी सरकार से तो यह बेहतर ही काम कर रही है और इसका सर्टिफिकेट आपके पिताश्री शिबू सोरेन एक नहीं, दो बार दे चुके हैं...

Thursday, November 19, 2015

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........
पन्द्रह साल झारखंड बने हो गये...
राज्य की जनता ने इसी बीच एक से एक नेता देखें, जिन्होंने झारखंड का नेतृत्व किया...पर किसी नेता में हिम्मत नहीं हुई कि बाबू लाल मरांडी द्वारा खींची गयी विकास की लकीर से बड़ी लकीर खींच कर दिखा दें...।
कितने नाम गिनाऊं...
अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन और अब रघुवर दास...। दावे तो सबके थे और हैं, पर जरा पूछिये कि वो कौन ऐसी चीजें है, जिसको लेकर राज्य की जनता इन पर गर्व कर सकें और ये कहें कि ये इनकी देन है – इन झारखंडी नेताओं का...झारखंड की जनता के लिए...।
सच्चाई यह है कि इन सारे नेताओं ने अपनी कोठी ठीक की, अपना दबदबा कायम किया पर जनता के हित में कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिस पर जनता इन्हें अपना मान सकें...हां इतना जरुर हुआ कि इनके यशोगान गानेवाले मीडिया में रह रहे लोग व इनके चारणों की आर्थिक स्थिति इन नेताओं के समान जरुर हो गयी...।
गर इन नेताओं के कार्यकाल को देखिये और विभिन्न अखबारों में इनके शासनकाल के दौरान विकास को पैमाना बनाकर छपे विज्ञापनों को देखे तो इनकी पोल खुलकर रह जायेगी...। ये सारे नेता बाबू लाल मरांडी के इर्द-गिर्द भी नहीं ठहरते...।
हमें याद है कि जब बाबू लाल मरांडी ने सत्ता संभाली तो बिहार के घटिया स्तर नेताओं की मार झेल रहा झारखंड को उपर उठाना कोई सामान्य कार्य नहीं था, पर बाबू लाल मरांडी ने योग्य लोगों की मदद से जो खाका तैयार किया और उस पर जो चलने की कोशिश की...उसका फायदा सबने उठाया और आज भी वह फायदा देखने को मिल रहा है...
हालांकि बाबू लाल के विकासात्मक सोच को कुंद करने और झारखंड के विकास की पटरी को धराशायी करने का प्रयास उस वक्त के नीतीश भक्त नेताओं व विधायकों ने कम नहीं किया...। जिसका खामियाजा लाल चंद महतो, जलेश्वर महतो, बच्चा सिंह, गौतम सागर राणा आज भी उठा रहे है, जबकि मधु सिंह और रमेश सिंह मुंडा तो स्वर्ग ही सिधार गये...। इसलिए इन पर बोलना अब ठीक नहीं...पर सच्चाई यहीं है...
आखिर क्या किया बाबू लाल ने...आज इस पर चर्चा होना ही चाहिए, क्योंकि झारखंड अपने स्थापना के 15 साल पूरे कर लिए और आज 16 वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है...।
बाबू लाल का झारखंड को देन......
1. झारखंड के बच्चों को बिहार से पिंड छुड़ाया और सीधे सीबीएसई पैटर्न लागू करते हुए, झारखंड के बच्चों को एनसीईआरटी की पुस्तकें निःशुल्क थमा दी...पढ़ों और खुद को गढ़ो का सिद्धांत बाबू लाल ने झारखंड के बच्चों को दिया... और किसी से भेदभाव नहीं की....
2. झारखंड की आदिवासी बालिकाएँ कल्याण विभाग को जान सकी और वे साइकिल से अपने घरों से निकलती हुई, स्कूल पहुंचने लगी...ऐसा पहली बार सुंदर सा दृश्य झारखंड में देखने को मिला, जहां बेटियां आगे निकल रही थी...वह सरकार द्वारा दिये गये साइकिल से अपने स्कूल जा रही थी।
3. बाबू लाल जानते थे कि बिना आधारभूत सरंचना के झारखंड का विकास नहीं हो सकता...इसलिए उन्होंने जर्जर झारखंड को ठोस झारखंड बनाना शुरु किया...बड़े पैमाने पर पुल-पुलिया बनाये गये...सड़कों की दशा सुधारी गयी...उस वक्त लोग बोला करते थे कि गर बसे हिचकोले खाना बंद कर दें तो समझ लो, झारखंड आ गया...
4. भारतीय रेल की मदद ली...झारखंड में अच्छी ट्रेनें इन्हीं के शासनकाल में देखने को मिली, जो रांची में इक्के – दुक्के ट्रेन देखने को मिलते थे, जहां दिल्ली जाने के लिए कोई बेहतर ट्रेन नहीं थी, इनके शासन काल में भारत सरकार के सहयोग से रांची देश के सभी महत्वपूर्ण महानगरों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ना शुरु हुआ...यहीं नहीं कई रेलवे प्रोजेक्ट भी उन्होंने शुरु करवाएं...ज्यादा जानकारी के लिए तत्कालीन रेलमंत्री और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कोई भी दरवाजा खटखटा सकता है...
5. बाबू लाल ने भ्रष्टाचार पर भी सीधा चोट किया... मात्र एक साल में बाबू लाल मरांडी के शासन काल में सौ से भी ज्यादा भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी निगरानी की भेंट चढ़ चुके थे।
6. झारखंड के दलितों व आदिवासियों के आर्थिक उत्थान के लिए बाबू लाल मरांडी ने उन्हें बस, टेम्पू भी उपलब्ध करायी थी...
7. किसानों को कम कीमत पर पानी पटाने के लिए डीजल चालित मशीन उपलब्ध करायी गयी, यहीं नहीं जैसे ही सुखा पड़ने की आशंका होती, वे बैठक बुलाते और एक्शन लेते, ये अलग बात थी कि जैसे ही एक्शन की बात होती, प्रकृति इतनी बारिश कर देती कि राज्य से सूखे पड़ने की आशंका ही खत्म हो जाती...
8. बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में ही विधानसभा में सरपल्स बजट पेश होता था...
9. बाबू लाल मरांडी ने ही झारखंड के मूलवासियों को उनका हक मिले, इसके लिए डोमिसाइल नीति की घोषणा की, इस नीति में कहीं भी कुछ गड़बड़ नहीं था, पर उनके विरोधियों ने उनके खिलाफ कुचक्र रचा, जिसके वे शिकार हुए...आखिर झारखंड जिनके लिए बना, उन्हें वह हक क्यों नहीं मिलना चाहिए...आखिर जो अन्य राज्यों में भी वहां का डोमिसाइल बनाकर लाभ ले रहे है, वे यहां भी उसका लाभ ले, यानी एक व्यक्ति का परिवार दो – दो जगहों का लाभ लें और यहां के आदिवासी – मूलवासी झारखंड में भी दोयम दर्जें का नागरिक बन कर रहें, क्या ये गलत नहीं?
10. आज जो विधानसभा भवन और उच्च न्यायालय भवन निर्माण की बात हो रही है, उसके लिए ग्रेटर रांची बनाने का स्वप्न किसका था, ये तो सबको मालूम होना चाहिए...
11. ये किसी को नहीं भूलना चाहिए कि झारखंड के मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ही थे, जो विकास के आधार पर देश के सभी राज्यों में से सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रुप में उस वक्त तीसरे स्थान पर पहुंच गये थे...जो आज तक कोई नहीं पहुंच सका....
12. जब उनका शासन था तो झारखंड का सम्मान था...जरा पूछिये मधु कोड़ा से और उनका समर्थन करनेवाले झामुमो, कांग्रेस और राजद के नेताओं व विधायकों से आज वो झारखंड को सम्मान क्यों नहीं मिलता...आखिर झारखंड के सम्मान के साथ खिलवाड़ किसने की...
13. भाजपा को शिखर पर ले जाने में भी बाबू लाल मरांडी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता...हमें याद है कि झारखंड बनने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई...। उस वक्त राजनाथ सिंह, अर्जुन मुंडा और बाबू लाल मरांडी ने संयुक्त रुप से प्रेस कांफ्रेस किया था...। हमारा सवाल था – बाबू लाल मरांडी से कि गर भाजपा सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा...बाबू लाल मरांडी ने बिना देर किये बताया – अर्जुन मुंडा। तुरंत यहीं सवाल अर्जुन मुंडा से मेरा था, अर्जुन मुंडा ने जवाब दिया कि पार्टी जो कहेगी, वो करेंगे, हालांकि वे भी दरियादिली दिखा सकते थे, पर उन्होंने नहीं दिखायी। ये वो समय था जब लाल कृष्ण आडवाणी के होठों पर अटल बिहारी वाजपेयी और अटल बिहारी वाजपेयी के होठो पर आडवाणी हुआ करते थे, पर झारखंड में बाबू लाल मरांडी के होठों पर अर्जुन मुंडा तो थे, पर अर्जुन मुंडा के होठों पर बाबू लाल मरांडी नहीं थे। एक बात और...झारखंड के राजनीति के धुरंधरों को ये जान लेना चाहिए कि अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जाने में बाबू लाल मरांडी की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी... न कि किसी और नेता की...पर काल के पहिये ने... बाबू लाल मरांडी को भाजपा से इतना दूर कर दिया कि....वे भाजपा को आज की तारीख में पसंद ही नहीं करते...और न भाजपा के नेताओं को....
14. बाबू लाल मरांडी मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान अपने विरोधियों को भी उतना ही सम्मान देते थे, जितना आज तक किसी ने नहीं दिया...याद करिये...भाकपा माले विधायक दल के नेता महेन्द्र प्रसाद सिंह के प्रति विधानसभा में दिया गया उनका बयान बहुत कुछ कह देता है...जरा आज के नेताओं का बयान देख लीजिये....हालांकि बाबू लाल मरांडी आज भी अपने विरोधियों को उतना ही सम्मान देते है...चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट और ये पूछना...क्या जी, कैसे है, सब ठीक...
15. सिंगल विंडो सिस्टम हो या ग्रेटर रांची, सब पर बाबू लाल मरांडी का विजन क्लियर था...नक्सलवाद का सफाया हो...या बेहतर झारखंड निर्माण की ललक...सचमुच बाबू लाल मरांडी आज भी झारखंड की जनता के बीच उतने ही लोकप्रिय है, जितने कल थे...ये अलग बात है कि चुनाव के समय उनके सहयोग से लोग जीत तो जाते है, पर झारखंड के दलबदलू कल्चर से अनुप्राणित होकर, ये जीते विधायक बाबू लाल मरांडी को ही ठेंगा दिखा देते है...हमें लगता है कि ऐसे लोगों को भी जनता देख रही है...
एक बार फिर बाबू लाल मरांडी को हृदय से आभार...
क्योंकि उनकी सोच, आज भी झारखंड को मजबूत करती है...

Tuesday, December 23, 2014

सब पर भारी, झारखंड की जनता हमारी। कोई नहीं भरमा पायेगा, जब जनता जग जायेगा।।..........

हां भाईयों, सब पर भारी, झारखंड की जनता हमारी। कोई नहीं भरमा पायेगा, जब जनता जग जायेगा।। – ये नारा सम-सामयिक हैं, क्योंकि कल तक सारे राजनीतिज्ञों, मीडियाकर्मियों और ज्योतिषियों की धड़कनें तेज थी कि पता नहीं जनता का जनादेश क्या होगा......सभी अपनी –अपनी कलाबाजियों का प्रदर्शन करते हुए, डींगे हांक रहे थे। सब की अपनी – अपनी दलीलें, कोई कह रहा था कि मेरे क्षेत्र में हमने इतने काम किये हैं कि वहां से कोई दूसरा जीत ही नहीं सकता, कोई कह रहा था कि हमने धूप में बाल थोड़ी ही सुखायें हैं, पत्रकारिता की हैं, इसलिए जो हम बोल रहे हैं, वहीं होगा और राजनीतिक भविष्यवाणी करनेवाले ज्योतिषियों की तो हवा निकल गयी हैं, बोलते ही नहीं बन रहा, कल तक अर्जुन मुंडा को पुनः प्रतिष्ठित करनेवाले यानी मुख्यमंत्री बनाने का दावा करनेवाले ज्योतिषी खोजते नहीं मिल रहे। एक दो राजनीतिक पंडितों से बात हमने करनी चाही तो वे अपनी मोबाइल बंद कर सोते हुए मिले....कुछ की पत्नियां फोन उठायी और बड़ी विनम्रता से बोली, पंडित जी महराज सो रहे हैं, कृपा कर बाद में फोन करें..............अब हम क्या बोले कि पंडित जी को आज सोना ही देना उत्तम होगा, क्योंकि आज का दिन उनके लिए सोने के लिए ही संदेश लेकर आया हैं................ आखिर क्या हुआ हैं – झारखंड में.................. झारखंड में वो हुआ हैं, कि ऐसा किसी प्रदेश में आज तक नहीं हुआ..... जनता ने एक साथ कई को सबक सिखाया हैं और कहा हैं कि अब ज्यादा चूं कि तो समझ लो, तुम्हारी खैर नहीं.................. झारखंड की जनता ने वो काम किया हैं कि जिसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम हैं, गर मेरी चले तो तो मैं एक लाइन में कह दूं कि यहां की जनता ने झारखंड के साथ खिलवाड़ करनेवाले नेताओं के साथ - साथ मीडिया को भी बजा दिया हैं कि मन करता हैं जनता जनार्दन का हाथ चूम लूं.......... यहां की जनता ने पहली बार राज्य के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत निवर्तमान मुख्यमंत्री तक को पहले धूल चटाया हैं......... जैसे बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन ( बरहेट से जीते जरुर पर दुमका से हारे भी) को हराया............. यहीं नहीं..... आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को भी बाहर का रास्ता दिखाया.......... काग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत और नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र प्रसाद सिंह को भी सदन में जाने से रोका............ झारखंड की पहली सरकार में कील ठोकनेवाले और गठबंधन की पहली सरकार को पटरी से उतारनेवाले लालचंद महतो और जलेश्वर महतो (प्रदेश अध्यक्ष जदयू) की औकात बता दी.......... राजद के प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह और राजद की तेज तर्रार नेता अन्नपूर्णा देवी को भी कह दिया कि इस बार आपकी सदन में जरुरत नहीं............ जो मीडिया हरे मोदी, हरे मोदी, हरे अमित शाह, हरे अमित शाह कहकर उनके मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा था उसे भी औकात बता दी और राज्य में एक मजबूत विपक्ष भी इस बार प्रदान कर दिया.........और अंत में कह डाला कि देश की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां, ज्योतिषियों का झूंड और खुद को लोकतंत्र का 4था स्तंभ कहनेवालों झारखंड की जनता के इस निर्णय का सम्मान करें और सबक लें...नहीं तो जब भी मौका मिलेगा, हम अपना निर्णय सुनायेंगे और वो निर्णय ऐसा होगा, जिसकी परिकल्पना किसी ने नहीं की होगी............... अब जरा सोचिये किसी ने सोचा था क्या कि दो सीटों से चुनाव लड़नेवाले बाबू लाल मरांडी, खरसावां से चुनाव लड़नेवाले मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार अर्जुन मुंडा, दुमका से हेमंत सोरेन, मझगांव से मधु कोड़ा चुनाव हार जायेंगे, पर हुआ तो ऐसा ही....क्या किसी मीडियावालों ने सोचा था क्या कि इस बार सिल्ली से सुदेश हार जायेंगे, क्योंकि हर बात में मीडिया उनकी स्तुति गा दिया करता था..........पर हुआ तो ऐसा ही हैं............... मैं, जब एक महीने पहले जयपुर से रांची आया तो जनता के बीच गया, छटपटाहट देखी, वो छटपटाहट थी – बार बार दामन पर लगनेवाले दाग की, वो छटपटाहट थी की मीडिया और राजनीति में शामिल लोग उन्हें बार – बार बदनाम क्यों करते हैं, ये क्यों कहते हैं कि स्पष्ट जनादेश जनता ने नहीं दिया......आखिर चुनाव आयोग क्यों पांच चरणों में चुनाव कराता हैं, आखिर राज्यसभा में उनके चूने हए प्रतिनिधि क्यों पैसे लेकर वोट डाला करते हैं, क्यों उन्हीं के समय जन्म लिया छत्तीसगढ़, उत्तराखंड उनसे आगे निकल गया और हम पीछे रह गये, आखिर उनके नेता विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए उनसे आगे कैसे निकल गये और वे पीछे क्यूं रह गये....क्यों उनके नेता विदेशों में अपने परिवार का इलाज कराने के लिए उन्हीं के पैसों का इस्तेमाल करते हैं पर उनके बेटे-बेटियां अच्छे इलाज के लिए तरस जाते हैं और इन्हीं छटपटाहटों के बीच झारखंड की जनता ने स्पष्ट जनादेश देने का मन बनाया और साथ ही संकल्प लिया कि वे उन्हें सबक सिखायेंगे, जो उन्हें सबक सिखाने की सोचते हैं, लीजिये जनादेश सामने हैं, जनता ने अपना काम कर दिया...गर इस जनादेश को समझ कर भी किसी की समझ नहीं खुलती हैं तो ऐसे लोगों के लिए तो भगवान ही मालिक हैं.....................