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Thursday, May 18, 2017

झारखण्ड रघुवर के हाथों असुरक्षित............

आज राज्य के सभी समाचार पत्रों में मुख्यमंत्री रघुवर दास का भारी-भरकम विज्ञापन छपा हैं। मात्र 3 माह के भीतर, 20+ परियोजनाएं, शिलान्यास को तैयार। 21000 से अधिक नौकरियों के सृजन की क्षमता। 8 क्षेत्रों में साझेदारी, यानी एक बार फिर राज्य की जनता की आंखों में धूल झोंकने की तैयारी।
शायद कनफूंकवों ने राज्य की जनता को निरा बेवकूफ समझ रखा है कि वे जो मुख्यमंत्री रघुवर दास से बोलवायेंगे, जनता मान लेगी। हमें लगता है कि जो ऐसा सोच रहे हैं, वे मुगालते में है।
• पहली बात, एमओयू और शिलान्यास में कोई फर्क नहीं होता। जैसे एमओयू हो गया तो वो काम हो ही जायेगा, इसकी अनिश्चितता बरकरार रहती है, ठीक उसी प्रकार शिलान्यास होने पर काम हो ही जायेगा, इसकी भी अनिश्चितता बरकरार रहती है। उदाहरणस्वरुप रघुवर दास से पूछिये कि जब वे बाबूलाल मरांडी सरकार में मंत्री थे, तो उसी वक्त भाजपा के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने सुकुरहुट्टू में नई राजधानी बनाने के लिए एक शिलान्यास किया था, क्या रघुवर दास बता सकते है कि वो राजधानी वहां बनी है या नहीं बनी। अरे छोड़िये, कम से कम वो पत्थर ही लाकर दिखा दें, जिस पर शिलान्यास किया गया। हम मान लेंगे कि रघुवर की सारी योजनाएं सफल हो गयी या हो जायेंगी।
• दूसरी बात, व्यवसायियों को जमीन दिलाने का काम अब मुख्य सचिव का रह गया है क्या? मैं तो देख रहा हूं कि व्यवसायियों को जमीन दिलाने का काम अब सिर्फ मुख्य सचिव का रह गया है, क्योंकि वहीं आजकल जमीन देखने का काम कर रही है, यानी जो काम हलका कर्मचारी, सर्किल इंस्पेक्टर, अंचलाधिकारी, भूमिसुधार उप समाहर्ता, उपायुक्त, राजस्व सचिव का है, वह काम अकेले मुख्य सचिव देख रही है, यानी राज्य में सारा सिस्टम फेल।
• तीसरी बात, आज जो खेलगांव में कार्यक्रम रखा गया, जिसमें कहा जा रहा है सरकार के पिछलग्गूओं द्वारा कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खेलगांव से झारखण्ड के नवनिर्माण की नींव रखी तो ये बतायें कि इस प्रकार के शिलान्यासों को कराने के लिए व्यवसायियों ने इनको आमंत्रित किया था क्या? या खुद सरकार अपने विरोधियों को बताना चाहती है कि हम बहुत अच्छा कर रहे है, गर ऐसा ही है तो यह राज्य के लिए दुर्भाग्य की बात है, न की सराहनीय।
• सच्चाई यह है कि आज भी गोड्डा में अदानी परिवार को पावर प्लांट बनाने में पसीने छूट रहे है, ये अलग बात है कि एक अखबार ने अदानी को मजबूती प्रदान करने के लिए उसके पक्ष में समाचार छाप दिये है।
• आज भी रांची में सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल चलाने के लिए कोई तैयार नहीं है, जबकि रांची के अलबर्ट एक्का चौक पर ढांचा बनकर तैयार है।
• जो भी कंपनी का आज नाम दिया जा रहा है, वो सिर्फ राज्य सरकार अपना लाज बचाने के लिए तथा विरोधियों को जवाब देने के लिए ऐसा कर रही है, क्योंकि सच्चाई सब को पता है।
आजकल जो विभिन्न चौक चौराहों पर रघुकुल रीति वाली जो होर्डिंग्स लगाई गयी है, उससे कई लोग अभी से ही कांप गये है, क्योंकि उनका रघुवर दास का रघुकुल जमशेदपुर में किस प्रकार आतंक फैला रहा है, वह किसी से छुपा नहीं।
हां एक बात की दाद दुंगा, कभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहा करते थे कि जब वे काला धन भारत लायेंगे तो प्रत्येक भारतीयों के खाते में पन्द्रह-पन्द्रह लाख रुपये स्वयं आ जायेंगे, जिसका शुभारंभ राज्य सरकार द्वारा कुंदन पाहन जैसे नक्सलियों के खाते में पन्द्रह लाख रुपये देकर कर दिया गया।
यानी समझते रहिये कि झारखण्ड, रघुवर दास के हाथों में कितना सुरक्षित है?

Saturday, May 13, 2017

जनता की नजरों में मुख्यमंत्री रघुवर दास............

झारखण्ड की जनता की नजर में मुख्यमंत्री रघुवर दास की कोई इज्जत नहीं। कल की ही बात है, मैं रांची मेन रोड स्थित सुप्रसिद्ध व्यवसायी एवं उद्योगपति एक जैन परिवार से मिला। पूरा परिवार भाजपा एवं संघ से जुड़ा हुआ और जब मैंने उनसे राज्य और सरकार के बारे में खुलकर बात की, तो मैं सुनकर हैरान रह गया। वे इस बात को लेकर दुखी थे कि मुख्यमंत्री रघुवर दास को बात करने की तमीज तक नहीं। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री रघुवर दास को कहा क्या बोलना है? कैसे बोलना है? कैसे अपनी बात रखनी है? इसका ज्ञान ही नहीं। ऐसे में यह राज्य उनके नेतृत्व में प्रगति करेगा, उन्हें ऐसा नहीं लगता। ढाई साल बीतने को आये, ढाई साल शेष है, जब आपने ढाई साल में कुछ काम नहीं किया तो मैं ये कैसे मान लूं कि आनेवाला ढाई साल ये कुछ अच्छा कर लेने में कामयाब हो जायेंगे। वे तो इतने दुखी थे कि वे ये भी कहने लगे कि यार काम करो या न करो, आपको बात करने में क्या परेशानी है? बात में रुखापन क्यों? आप किसी को इज्जत क्यों नहीं देते?
ठीक यहीं बात चर्च रोड स्थित एक व्यवसायी और गोस्सनर कॉलेज में पढ़ाई कर रहे एक युवा छात्र ने कहीं कि मुख्यमंत्री रघुवर दास के लक्षण कुछ ठीक नहीं दीख रहे, अगली बार जब भी कभी विधानसभा के चुनाव होंगे, इस सरकार के जाने की पूरी गारंटी है, पर पुनः आने की संभावना दूर – दूर तक नहीं दीखती।
चुटिया में भाजपा कार्यकर्ताओं की एक बड़ी टीम बताती है कि आनेवाले लोकसभा चुनाव में वे मोदी जी के लिए काम करेंगे पर विधानसभा चुनाव में वे इस राज्य सरकार को हटाने के लिए जोर लगायेंगे, क्योंकि जनता को जवाब मुख्यमंत्री को नहीं देना होता है, कार्यकर्ताओं को देना होता है, इस मुख्यमंत्री के व्यवहार ने उन कार्यकर्ताओं को कहीं का नहीं छोड़ा है, इनसे कहीं अच्छे मुख्यमंत्री के रुप में अर्जुन मुंडा थे, जिनका कार्यकर्ताओं पर ध्यान रहता था, पर ये तो किसी को सुनते ही नहीं, पता नहीं कौन कनफूंकवा इनकी कान फूंक देता है और उसी के फूंक पर ये दीवाने होकर वे काम कर रहे है, जिससे पार्टी जनता से दूर होती चली गयी।

Thursday, February 9, 2017

रघुवर के अरे राज में, अर्जुन तीर चलाए............

ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट की, चर्चा है चहुंओर।
नेता - अधिकारी बने, देखो माखनचोर।।
विज्ञापन से सब नपे, नपे चैनल-अखबार।
गिफ्ट-रुपये से नपे, नपे संपादक-पत्रकार।।
सागर पवित्र स्नान को, जब मन करे ललचाय।
पूंजीपति-राजनीतिबाज को, चले सब माथ नवाय।।
कनफूंकवों की चल बनी, ईमानदार बौराए।
रघुवर के अरे राज में, अर्जुन तीर चलाए।।
सीएस के आगे डायरेक्टर, पीआरडी शीश नवाए।
जैसे-जैसे वे कहे, वैसे ही वह करते जाये।।
किसी की भी ना सुने, सिर्फ सुने वह कान लगाये।
सीएस की ही चाकरी, दिन-रात करत बिताये।।
सीएस की ही ब्रांडिंग, हो रही अखबार में आज।
पीछे हो गये सीएम, अब सीएस चलाये राज।।
कल तक पीएम को भूलो, अब पीएम को करो याद।
आनन-फानन में मोदी, अब पोस्टर दिखलाय।।
पूरे विश्व में हाथी, केवल झारखण्ड में भाई।
पूंछ उठाकर- सूड़ हिलाकर, दीखे गगन-उड़ाई।।
हा-हा करती जनता बोले, ये क्या चक्कर भाई।
क्या हाथी उड़ा है अब तक, जो सरकार दिखाई।।
क्या हुआ झारखण्ड को, जनता करे सवाल।
रघुवर जी मेरी सुनो, सुनो तुम कान लगाये।।
हमें नहीं दिलचस्पी, इस समिट में यार।
जो वादे तुम हमें किये, पूरी करो ध्यान लगाये।।
(ध्यान रखें - इस दोहे को हृदय से, मन लगाकर पढ़ने से, सीएम के आस-पास रहनेवाले कनफूंकवें, भ्रष्ट अधिकारी व ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से अनुप्राणित होनेवाले जीवात्मा प्रसन्न होते है तथा आप अंत में, परम आनन्द को प्राप्त करते हुए रघुवर लोक में पहुंच जाते है। - कृष्ण बिहारी मिश्र)

Saturday, February 4, 2017

बियॉन्ड न्यूज.............

बियॉन्ड न्यूज, जब इस पुस्तक का लोकार्पण हो रहा था, तो मैं रांची में ही था, पर यह पुस्तक उस वक्त मेरे हाथ नहीं लगी। पुस्तक लोकार्पण के दूसरे दिन समाचार पत्रों को जब, मैं उलट रहा था। तब जाकर पता चला कि शक्ति व्रत और संजीव शेखर की लिखित पुस्तक बियॉन्ड न्यूज का लोकार्पण हुआ है। लोकार्पण के वक्त झारखण्ड विधानसभा के प्रथम विधानसभाध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा तथा अन्य विद्वान मौजूद थे। हम आपको बता दें कि संजीव शेखर से मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई, जब वे स्टार न्यूज संवाददाता बनकर पहली बार रांची आये। बेहद ही शालीन और पत्रकारिता के प्रति गहरी निष्ठा, उनके स्वभाव में है, क्योंकि इनका बैक ग्राउंड बहुत ही प्रभावशाली रहा है। इनके पिता डा. शालीग्राम यादव बिहार के जाने माने शिक्षाविद् थे, जो आज दुनिया में नहीं है, पर उनकी कृति आज भी जीवित है। उपनिषद कहता भी है – कीर्तियस्य स जीवति।
विवादरहित संजीव अपने स्वभाव के कारण पत्रकार मित्रों में भी जल्दी ही लोकप्रिय हो जाते है, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यह लोकप्रियता सभी को नसीब नहीं होती। बियॉन्ड न्यूज पुस्तक में तीन पत्रकार मित्रों की कहानी है। जो संजय से जुड़े है। संजीव ने अपने पुस्तक में तीन पत्रकारों के माध्यम से वर्तमान पत्रकारिता में हो रहे ह्रास और सत्यनिष्ठ पत्रकार के दर्द को उकेरा है। एक ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार कैसे जीता है?, कैसे उसके बॉस, उसके तथाकथित पत्रकार मित्र जो दावा करते है कि उनके साथ है, पर समय – समय पर जलील करने से नहीं चूकते? कैसे एक गांव में एक पत्रकार तिल-तिल मर रहा होता है और बड़े महानगरों से आनेवाले संपादक और वरीय संवाददाताओं को दल उनका शोषण करने से नहीं चूकता? कैसे एक ईमानदार पत्रकार जो पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान एक आदर्श को लेकर आगे की ओर बढ़ता है, पर जैसे ही सच्चाई से भेंट होती है, तो उसके आदर्श एक – एक कर धूल – धूसरित होते जाते है? इस पुस्तक में एक पत्रकार के माता-पिता का दर्द तो दिखेगा ही, साथ ही उसकी आदर्श पत्नी का दर्द भी महसूस होगा कि वह कैसे अपने पति को ढाढ़स बंधाती है।
संजय के एक मित्र सजल जिसकी पत्नी मानसिक आरोग्यशाला में भर्ती है, जिसकी छोटी बेटी वसुंधरा है, फिर भी वह पत्रकारिता कर रहा है, अपने उसूलों से समझौता नहीं कर रहा, अपनी बीमार पत्नी को भी देख रहा है, छोटी बिटिया को भी संभाल रहा है, साथ ही पत्रकारिता का धर्म भी निर्वहण कर रहा है, पर उसके इस बलिदान को उसका संपादक नहीं समझ रहा, जब संपादक और अखबार की धज्जियां उड़ती है तो उसे संजय के मित्र सजल की याद आती है...
कमाल है, पत्रकारिता के आदर्श एक – एक कर धूल धूसरित हो रहे है, और उस धूल – धूसरित हो रही व्यवस्था को प्रणाम कर दोनों संजय और सजल आज एक अच्छे मुकाम पर है, सजल की बेटी वसुंधरा तो आईएएस आफिसर है, पर अंजन आज भी पत्रकारिता कर रहा है और उसे तिल-तिल मरना पड़ रहा है, वह जलील भी हो रहा है, जिसके लिए वह सब कुछ लूटा रहा है, वह उसे समझने को तैयार नहीं है...
जरा इसके संवाद देखिये...
संजय के पिताजी का ये कहना – ये सब जिंदगी का एक हिस्सा है। गिरना – उठना लगा रहता है, इससे विचलित और हताश होने के बजाय तुम्हें शिक्षा लेनी चाहिए।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था – अगर आप सही हैं तो गुस्सा होने की जरुरत नहीं और यदि गलत हैं तो गुस्सा होने का हक नहीं है।
ईमानदार और मेहनती लोग पत्रकारिता में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकते हैं।
मेरे विचार से, जो युवा पत्रकारिता को अपना लक्ष्य बनाकर चलना चाहते है, कम से कम वे यह पुस्तक अवश्य पढ़े, ये पुस्तक उनके लिए मार्गदर्शक का काम करेगा।
और
जो पत्रकारिता क्षेत्र में हैं, उनके लिए भी यह पुस्तक कम उपयोगी नहीं, उनके लिए तो यह पुस्तक हर प्रकार के रोगों के लिए रामबाण है...
सचमुच शक्तिव्रत और संजीव शेखर जी आपको इस पुस्तक के लिए साधुवाद...

Tuesday, May 31, 2016

अर्जुन मुंडा ने शुरू की झारखण्ड में लालू स्टाइल में राजनीति...

झारखण्ड का अर्जुन लालू बनेगा, लालू स्टाइल में राजनीति करेगा और भाजपा को डूबो कर अपने अपमान का बदला लेगा। 29 मई 2016, झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा धनबाद के ब्राह्मण बरारी बस्ती में बांगला व खोरठा भाषा में लालू स्टाइल में भाषण दे रहे थे। जैसे लालू यादव का भाषण ब्राह्मण विरोध पर शुरु होता है और ब्राह्मण विरोध पर ही खत्म होता है, ठीक उसी स्टाइल में वे भाषण दे रहे थे। वे उपस्थित जनता को आह्वान कर रहे थे कि जनता भ्रष्ट अधिकारियों को ओखली में कूटे। वे धनबाद के डीसी कृपानन्द झा और एसएसपी सुरेन्द्र कुमार झा पर खूब बरसे। और तल्ख टिप्पणी करते हुए, सीधे कहा कि ये अधिकारी धनबाद को बिहार का झाझा शहर न बनायें। वे सतीश महतो के निमंत्रण पर जो इस कोयलानगरी में नया – नया आउटसोर्सिग में हाथ आजमा कर बहती गंगा में हाथ धोना चाहता है, उसका राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए यहां पहुंचे थे। अर्जुन मुंडा सीधे तौर पर स्थानीय प्रशासन को इशारों ही इशारों में ये कहना चाहते थे कि यहां के अधिकारी सतीश महतो को हर प्रकार की सहूलियत प्रदान करें, ताकि सतीश अपना दबदबा कायम कर, इस कोयला नगरी में एक आतंक के रूप में उभर सकें, जिसका आर्थिक फायदा अर्जुन मुंडा जैसे नेताओं को भी मिल सकें।
और अब सवाल भाजपा के दिग्गज नेताओं से...
1. अगर अर्जुन मुंडा जैसा व्यक्ति जो राज्य का पूर्व मुख्यमंत्री रह चुका है, वो सार्वजनिक सभा में यह कहता है कि जनता भ्रष्ट अधिकारियों को ओखली में कूटे तो क्या जनता को यह अधिकार नहीं कि वह भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को भी ओखली में कूट दें, जिसके कारण झारखण्ड तबाह और बर्बाद हो गया, या हो रहा है।
2. धनबाद के डीसी कृपानन्द झा और एसएसपी सुरेन्द्र कुमार झा अगर ब्राह्मण समुदाय से है तो उन पर जातिगत टिप्पणी करना कहा तक जायज है, और उन्हें भ्रष्ट बताना कहां से जायज है, क्या अर्जुन मुंडा के पास एक विशेष प्रकार का चश्मा है, जिससे उन्होंने पता लगा लिया कि वे दोनों भ्रष्ट है, और अगर ये दोनों भ्रष्ट है तो उन्हें सजा देने-दिलाने का काम अर्जुन मुंडा का है क्या?
3. कल जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे, तो यही अधिकारियों का दल इनकी आरती उतारता था तो बहुत अच्छा था और आज जब ये अपना काम करने में लगा हैं और इनकी नहीं सुन रहा तो भ्रष्ट हो गया। ये तो वहीं बात हो गयी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में – कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा चप-चप।
4. अपना राजनीतिक कद बढ़ाने के लिए एक नया भस्मासुर पैदा करने से क्या धनबाद की स्थिति सुधर जायेगी? क्या धनबाद के लोग नहीं जानते है कि ये सतीश महतो कौन है और इसका मकसद क्या है?
और अब अपनी बात...
झारखण्ड की जनता को यह जान लेना चाहिए कि...
झारखण्ड में चाहे बाबू लाल मरांडी हो, या अर्जुन मुंडा या शिबू सोरेन या हेमंत सोरेन या कोई भी नेता – सच्चाई यहीं है कि ये सभी अपना पीए या सलाहकार ब्राह्मण जाति के समुदाय के लोगों को ही रखते है, या रखे हुए है। किसी कारण से अगर वे सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन से नीचे आते है तो वे इनका संरक्षण करने के लिए, हद से गुजर जाते है। ...पर जरा देखिये, सार्वजनिक सभाओं में इनका चरित्र कैसे उजागर होता है? बस मौका मिलना चाहिए, इन्हें ब्राह्मणों को गाली देने का, ये दे चलते है, क्योंकि ये राजनीतिबाज जो ठहरे, राजनीतिबाजी से कैसे स्वयं को अलग कर सकते है? देश – समाज भाड़ में जाये, इससे उन्हें क्या मतलब। उन्हें तो मतलब है किसी ऐसे समुदाय को गाली देने से, जिससे आज की जनता बहुत ही प्रसन्न होती है और वह जाति है –ब्राह्मण, क्यों अर्जुन मुंडा जी।

Wednesday, May 18, 2016

हम ऐसी पत्रकारिता की कड़ी भर्त्सना करते हैं.......

30 दिसम्बर 2015
स्थान – सूचना भवन, रांची।
कार्यक्रम – मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’।
एक शिकायत है - लातेहार के बालूमाथ में उत्क्रमित मध्य विद्यालय बरहनियां खांड़ में कार्यरत पारा शिक्षक रमेश पांडेय हमेशा अनुपस्थित रहते है। ये प्रखण्ड स्तर पर दैनिक जागरण के पत्रकार भी है। पत्रकार होने के कारण दबंगई भी दिखाते है, जिनके डर से कोई बोलता नहीं। इनके घर में दो पहिया वाहन है, आर्थिक रुप से संपन्न है। इसके बावजूद बीपीएल की सूची में भी दर्ज है। मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जिला के उपायुक्त को जांच का आदेश दिया। जांच में आरोप सही पाया गया और रमेश पांडेय को पारा शिक्षक के पद से निलंबित कर दिया गया।
1 फरवरी 2016
स्थान – सूचना भवन, रांची।
कार्यक्रम – मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’।
आनन्द कुमार की शिकायत थी कि चतरा का उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय टिलरा हेट-आहर पिछले एक साल से बंद है, जिसमें लगभग 50 विद्यार्थी अध्ययनरत थे, विद्यालय के बंद रहने से सारे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो गयी। विद्यालय के प्रधानाध्यापक मालिक बाबू ग्राम टिलरा के जन-वितरण प्रणाली के डीलर और प्रखण्ड स्तर पर एक प्रेस समूह में बतौर संवाददाता कार्य करते है, यहीं नहीं जनाब ठेकेदारी भी करते है। इन्होंने एक और कमाल किया है विद्यालय के भवन निर्माण के लिए वर्ष 2008 में 8 लाख रुपये आये थे, उसे बिना कार्य संपन्न कराये ही निकाल लिया।
जैसे ही मुख्यमंत्री रघुवर दास की ‘सीधी बात’ में यह मामला आया, मुख्यमंत्री ने संबंधित जिला शिक्षा अधीक्षक को मामले की जांच करने और इस पर त्वरित कार्रवाई करने का आदेश दिया। पूरे मामले की जांच हुई। आरोप सही पाया गया। मालिक बाबू की सेवा समाप्त कर दी गयी और इनके खिलाफ मयूरहंद थाने में प्राथमिकी भी दर्ज करा दी।
18 मई 2016
रांची से प्रकाशित सारे अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर खबर छापी है कि ताजा टीवी के पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह उर्फ इंद्रदेव यादव की हत्या उग्रवादी संगठन टीपीसी ने करायी है, मामला लेवी से जुड़ा है। चतरा एसपी के बयान से बताया गया है कि पत्रकार इंद्रदेव यादव राजपुर थाना क्षेत्र में डीवीसी के तहत 33 हजार पोल लगाने का ठेका लिया था। वह तीन साल से काम कर रहा था। उग्रवादी संगठन टीपीसी ने सात लाख रुपये लेवी की मांग की। लेवी नहीं देने पर पत्रकार की हत्या 12 मई को 9.30 बजे रात्रि में कर दी गयी।
कुछ अन्य घटनाएं...
जब मैं ईटीवी धनबाद में कार्यरत था, तब उस समय भी दो हृदय विदारक घटनाएं घटी थी, जब एक पत्रकार से ठेकेदार बने व्यक्ति की हत्या कर दी गयी थी और दूसरा मैथन के हिन्दुस्तान संवाददाता पर जानलेवा हमला हुआ था। जिसने जानलेवा हमला किया था, वह हमला का जो कारण बताया था, वह बड़ा ही शर्मनाक था। यहीं नहीं 31 दिसम्बर 2006 को तो धनबाद के ही गांधी सेवा सदन में धनबाद के तथाकथित पत्रकारों का समूह मुर्गा तक कटवा दिया था, शराब की बोतले तक खोल दी थी, सिगरेट तक फूंक डाले गये थे जबकि सबको पता है कि गांधी से संबंधित किसी भी सदन में इस प्रकार की हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाता, फिर भी पत्रकारों ने ऐसी हरकत की। मैंने पत्रकारों के इस हरकतों को अपने ईटीवी पर दिखाया, नतीजा यह हुआ कि धनबाद के सारे मीडिया हाउस में बैठे शीर्षस्थ महानुभावों ने संयुक्त रुप से मेरे खिलाफ मोर्चा खोला और मेरे खिलाफ अनाप – शनाप एक अखबार में छपवाने लगे, उन्हें लगा कि मैं इससे डर जाउंगा, मैंने उनका मुकाबला किया और अपनी उपस्थिति शानदार ढंग से दर्ज करायी।
ये दृष्टांत है – आज के पत्रकारों के। मैं यह नहीं कहता कि झारखण्ड या अन्य जगहों के सारे पत्रकार ऐसे ही है, पर हां, इतना जरूर कहूंगा कि इनकी संख्या बहुतायत है और इनकी हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कुछ लोगों को तो मैं देख रहा हूं, जिनसे ये आशा की जा सकती है कि वे पत्रकारिता के क्षेत्र में आदर्श स्थापित करेंगे, जिसे देखकर आनेवाली पीढ़ी सीख लेंगी, वे मर्यादा को तोड़ने में ज्यादा रूचि दिखा रहे है। कोई राजनीतिज्ञों की भक्ति में ऐसे लग गया कि उसे राज्यसभा पहुंचने में परम आनन्द की प्राप्ति हो रही है, कोई सूचना आयुक्त बनकर स्वयं को धन्य कर चुका है, कोई बाडीगार्ड लेकर घूम रहा है और शान बघार रहा है, कोई कुकृत्यों से धन इकट्ठा कर रहा है, कोई अपनी पत्नी के नाम पर पोर्टल चला रहा है और नाना प्रकार से धन जुटाने के लिए वह सारी हरकतें कर रहा है, जिसे पत्रकारिता इजाजत नहीं देती। आश्चर्य इस बात की भी है कि ऐसे लोग ही उन लोगों को प्रवचन दे रहे है, जिन्होंने अपनी जिंदगी में खासकर पत्रकारिता के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया है। कमाल है, जो पग-पग पर पत्रकारिता को अपनी जागीर बनाकर, स्वयं के जमीर को बेच डाला, वे पुरस्कृत हो रहे है, और जो किसी के आगे सर नहीं झुकाया, वे उसे कोस रहे है, यह कहकर कि अरे वो गधा है, वो क्या जाने की पत्रकारिता क्या है?
कुछ लोग तो यह भी कहेंगे कि पत्रकार क्या करे बेचारा। उसे तो अखबार वाले और इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले कुछ भी नहीं देते। मैं कहता हूं कि अगर कुछ नहीं देते तो इसका मतलब कि तुम जहां रहते हो, उसका हक छीन लोगे, उस पर दबंगई दिखाओगे। अगर अखबार वाले और इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले तुम्हें कुछ नहीं देते, तो तुम उनके यहां काम क्यों कर रहे हो, आखिर क्या वजह है कि तुम बिना पैसे के काम करने को तैयार हो, और उनकी सेवा को भी तैयार हो। मैं बताता हूं कि आखिर ऐसा तुम क्यों करते हो। वह हैं – झूठी इज्जत और पत्रकारिता की झूठी धौंस का तिलिस्म, जो तुम्हें इनके प्रति खींचता है और तुम जब तक जिंदा रहते हो, इस झूठी शान में अपनी जिंदगी गंवा देते हो, साथ ही अपने परिवार को और आनेवाले पीढ़ी को बर्बाद कर देते हो।
कमाल है, आजकल झारखण्ड में कुकुरमुत्ते की तरह पत्रकारों के हित के लिए लड़नेवाले संगठन भी खड़े हो गये है, जिन्हें कल तक कोई नहीं जानता था, आज लाखों-करोड़ों में खेलने लगे है। रांची, धनबाद, जमशेदपुर, गिरिडीह ही नहीं बल्कि दिल्ली में भी भाषण दे रहे है, किताबे छपवा रहे हैं, मंत्रियों और नेताओं को बुलाकर स्वयं महिमामंडित हो रहे हैं और चिरकूट टाइप के लोग उन्हें वाह-वाह करके आनन्दित हो रहे है। मैं कहता हूं कि अगर यहीं हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं कि जनता इन्हें पटक-पटक कर मारेगी...
कमाल है, आजकल मैं यह भी देख रहा हूं कि ये संगठन सरकार से पत्रकारों के लिए सुविधा मांग रहे हैं, पर जहां ये काम कर रहे होते है, वहां पर उन्हें इज्जत बचाने के लिए कुछ रोटी का प्रबंध हो जाये, कुछ पैसे मिल जाये, वहां आंदोलन करने और कराने में इनकी नानी मर जाती है, क्योंकि वे जानते है कि जैसे ही उन संस्थानों में ये आंदोलन करने जायेंगे, वहां पहले से ही रखे बाउंसर इनका ऐसा इलाज करेंगे कि इनकी सारी नेतागिरी ही तेल लेने चली जायेगी...
अंत में – जो चरित्रवान पत्रकार है, उन्हें कहीं कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत तो उन्हें है, जो नेताओं की चरणवंदना या अधिकारियों की चाटुकारिता करते है, तभी तो इसी रांची के एटीआई में एक कार्यक्रम में एक अधिकारी ने कह डाला था कि आप पत्रकारों और माननीय मुख्यमंत्री के बीच में तो पति-पत्नी का संबंध होता है, पर किसी पत्रकार ने इसकी आलोचना तक नहीं की थी, सभी मन ही मन आनन्दित हो रहे थे, अंत में किसने इस पर प्रतिकार किया, किसने इसकी आलोचना की, वहां जो पत्रकार होंगे, उन्हें जरुर पता होगा। हमें लगता है कि इस पर अब ज्यादा लिखने की आवश्यकता नहीं।

Thursday, November 19, 2015

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........

झारखंड के सर्वाधिक लोकप्रिय और ग्राह्य नेता है बाबू लाल मरांडी..........
पन्द्रह साल झारखंड बने हो गये...
राज्य की जनता ने इसी बीच एक से एक नेता देखें, जिन्होंने झारखंड का नेतृत्व किया...पर किसी नेता में हिम्मत नहीं हुई कि बाबू लाल मरांडी द्वारा खींची गयी विकास की लकीर से बड़ी लकीर खींच कर दिखा दें...।
कितने नाम गिनाऊं...
अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन और अब रघुवर दास...। दावे तो सबके थे और हैं, पर जरा पूछिये कि वो कौन ऐसी चीजें है, जिसको लेकर राज्य की जनता इन पर गर्व कर सकें और ये कहें कि ये इनकी देन है – इन झारखंडी नेताओं का...झारखंड की जनता के लिए...।
सच्चाई यह है कि इन सारे नेताओं ने अपनी कोठी ठीक की, अपना दबदबा कायम किया पर जनता के हित में कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिस पर जनता इन्हें अपना मान सकें...हां इतना जरुर हुआ कि इनके यशोगान गानेवाले मीडिया में रह रहे लोग व इनके चारणों की आर्थिक स्थिति इन नेताओं के समान जरुर हो गयी...।
गर इन नेताओं के कार्यकाल को देखिये और विभिन्न अखबारों में इनके शासनकाल के दौरान विकास को पैमाना बनाकर छपे विज्ञापनों को देखे तो इनकी पोल खुलकर रह जायेगी...। ये सारे नेता बाबू लाल मरांडी के इर्द-गिर्द भी नहीं ठहरते...।
हमें याद है कि जब बाबू लाल मरांडी ने सत्ता संभाली तो बिहार के घटिया स्तर नेताओं की मार झेल रहा झारखंड को उपर उठाना कोई सामान्य कार्य नहीं था, पर बाबू लाल मरांडी ने योग्य लोगों की मदद से जो खाका तैयार किया और उस पर जो चलने की कोशिश की...उसका फायदा सबने उठाया और आज भी वह फायदा देखने को मिल रहा है...
हालांकि बाबू लाल के विकासात्मक सोच को कुंद करने और झारखंड के विकास की पटरी को धराशायी करने का प्रयास उस वक्त के नीतीश भक्त नेताओं व विधायकों ने कम नहीं किया...। जिसका खामियाजा लाल चंद महतो, जलेश्वर महतो, बच्चा सिंह, गौतम सागर राणा आज भी उठा रहे है, जबकि मधु सिंह और रमेश सिंह मुंडा तो स्वर्ग ही सिधार गये...। इसलिए इन पर बोलना अब ठीक नहीं...पर सच्चाई यहीं है...
आखिर क्या किया बाबू लाल ने...आज इस पर चर्चा होना ही चाहिए, क्योंकि झारखंड अपने स्थापना के 15 साल पूरे कर लिए और आज 16 वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है...।
बाबू लाल का झारखंड को देन......
1. झारखंड के बच्चों को बिहार से पिंड छुड़ाया और सीधे सीबीएसई पैटर्न लागू करते हुए, झारखंड के बच्चों को एनसीईआरटी की पुस्तकें निःशुल्क थमा दी...पढ़ों और खुद को गढ़ो का सिद्धांत बाबू लाल ने झारखंड के बच्चों को दिया... और किसी से भेदभाव नहीं की....
2. झारखंड की आदिवासी बालिकाएँ कल्याण विभाग को जान सकी और वे साइकिल से अपने घरों से निकलती हुई, स्कूल पहुंचने लगी...ऐसा पहली बार सुंदर सा दृश्य झारखंड में देखने को मिला, जहां बेटियां आगे निकल रही थी...वह सरकार द्वारा दिये गये साइकिल से अपने स्कूल जा रही थी।
3. बाबू लाल जानते थे कि बिना आधारभूत सरंचना के झारखंड का विकास नहीं हो सकता...इसलिए उन्होंने जर्जर झारखंड को ठोस झारखंड बनाना शुरु किया...बड़े पैमाने पर पुल-पुलिया बनाये गये...सड़कों की दशा सुधारी गयी...उस वक्त लोग बोला करते थे कि गर बसे हिचकोले खाना बंद कर दें तो समझ लो, झारखंड आ गया...
4. भारतीय रेल की मदद ली...झारखंड में अच्छी ट्रेनें इन्हीं के शासनकाल में देखने को मिली, जो रांची में इक्के – दुक्के ट्रेन देखने को मिलते थे, जहां दिल्ली जाने के लिए कोई बेहतर ट्रेन नहीं थी, इनके शासन काल में भारत सरकार के सहयोग से रांची देश के सभी महत्वपूर्ण महानगरों से रेलमार्ग द्वारा जुड़ना शुरु हुआ...यहीं नहीं कई रेलवे प्रोजेक्ट भी उन्होंने शुरु करवाएं...ज्यादा जानकारी के लिए तत्कालीन रेलमंत्री और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कोई भी दरवाजा खटखटा सकता है...
5. बाबू लाल ने भ्रष्टाचार पर भी सीधा चोट किया... मात्र एक साल में बाबू लाल मरांडी के शासन काल में सौ से भी ज्यादा भ्रष्ट अधिकारी व कर्मचारी निगरानी की भेंट चढ़ चुके थे।
6. झारखंड के दलितों व आदिवासियों के आर्थिक उत्थान के लिए बाबू लाल मरांडी ने उन्हें बस, टेम्पू भी उपलब्ध करायी थी...
7. किसानों को कम कीमत पर पानी पटाने के लिए डीजल चालित मशीन उपलब्ध करायी गयी, यहीं नहीं जैसे ही सुखा पड़ने की आशंका होती, वे बैठक बुलाते और एक्शन लेते, ये अलग बात थी कि जैसे ही एक्शन की बात होती, प्रकृति इतनी बारिश कर देती कि राज्य से सूखे पड़ने की आशंका ही खत्म हो जाती...
8. बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में ही विधानसभा में सरपल्स बजट पेश होता था...
9. बाबू लाल मरांडी ने ही झारखंड के मूलवासियों को उनका हक मिले, इसके लिए डोमिसाइल नीति की घोषणा की, इस नीति में कहीं भी कुछ गड़बड़ नहीं था, पर उनके विरोधियों ने उनके खिलाफ कुचक्र रचा, जिसके वे शिकार हुए...आखिर झारखंड जिनके लिए बना, उन्हें वह हक क्यों नहीं मिलना चाहिए...आखिर जो अन्य राज्यों में भी वहां का डोमिसाइल बनाकर लाभ ले रहे है, वे यहां भी उसका लाभ ले, यानी एक व्यक्ति का परिवार दो – दो जगहों का लाभ लें और यहां के आदिवासी – मूलवासी झारखंड में भी दोयम दर्जें का नागरिक बन कर रहें, क्या ये गलत नहीं?
10. आज जो विधानसभा भवन और उच्च न्यायालय भवन निर्माण की बात हो रही है, उसके लिए ग्रेटर रांची बनाने का स्वप्न किसका था, ये तो सबको मालूम होना चाहिए...
11. ये किसी को नहीं भूलना चाहिए कि झारखंड के मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी ही थे, जो विकास के आधार पर देश के सभी राज्यों में से सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री के रुप में उस वक्त तीसरे स्थान पर पहुंच गये थे...जो आज तक कोई नहीं पहुंच सका....
12. जब उनका शासन था तो झारखंड का सम्मान था...जरा पूछिये मधु कोड़ा से और उनका समर्थन करनेवाले झामुमो, कांग्रेस और राजद के नेताओं व विधायकों से आज वो झारखंड को सम्मान क्यों नहीं मिलता...आखिर झारखंड के सम्मान के साथ खिलवाड़ किसने की...
13. भाजपा को शिखर पर ले जाने में भी बाबू लाल मरांडी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता...हमें याद है कि झारखंड बनने के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई...। उस वक्त राजनाथ सिंह, अर्जुन मुंडा और बाबू लाल मरांडी ने संयुक्त रुप से प्रेस कांफ्रेस किया था...। हमारा सवाल था – बाबू लाल मरांडी से कि गर भाजपा सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री कौन होगा...बाबू लाल मरांडी ने बिना देर किये बताया – अर्जुन मुंडा। तुरंत यहीं सवाल अर्जुन मुंडा से मेरा था, अर्जुन मुंडा ने जवाब दिया कि पार्टी जो कहेगी, वो करेंगे, हालांकि वे भी दरियादिली दिखा सकते थे, पर उन्होंने नहीं दिखायी। ये वो समय था जब लाल कृष्ण आडवाणी के होठों पर अटल बिहारी वाजपेयी और अटल बिहारी वाजपेयी के होठो पर आडवाणी हुआ करते थे, पर झारखंड में बाबू लाल मरांडी के होठों पर अर्जुन मुंडा तो थे, पर अर्जुन मुंडा के होठों पर बाबू लाल मरांडी नहीं थे। एक बात और...झारखंड के राजनीति के धुरंधरों को ये जान लेना चाहिए कि अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक ले जाने में बाबू लाल मरांडी की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी... न कि किसी और नेता की...पर काल के पहिये ने... बाबू लाल मरांडी को भाजपा से इतना दूर कर दिया कि....वे भाजपा को आज की तारीख में पसंद ही नहीं करते...और न भाजपा के नेताओं को....
14. बाबू लाल मरांडी मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान अपने विरोधियों को भी उतना ही सम्मान देते थे, जितना आज तक किसी ने नहीं दिया...याद करिये...भाकपा माले विधायक दल के नेता महेन्द्र प्रसाद सिंह के प्रति विधानसभा में दिया गया उनका बयान बहुत कुछ कह देता है...जरा आज के नेताओं का बयान देख लीजिये....हालांकि बाबू लाल मरांडी आज भी अपने विरोधियों को उतना ही सम्मान देते है...चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट और ये पूछना...क्या जी, कैसे है, सब ठीक...
15. सिंगल विंडो सिस्टम हो या ग्रेटर रांची, सब पर बाबू लाल मरांडी का विजन क्लियर था...नक्सलवाद का सफाया हो...या बेहतर झारखंड निर्माण की ललक...सचमुच बाबू लाल मरांडी आज भी झारखंड की जनता के बीच उतने ही लोकप्रिय है, जितने कल थे...ये अलग बात है कि चुनाव के समय उनके सहयोग से लोग जीत तो जाते है, पर झारखंड के दलबदलू कल्चर से अनुप्राणित होकर, ये जीते विधायक बाबू लाल मरांडी को ही ठेंगा दिखा देते है...हमें लगता है कि ऐसे लोगों को भी जनता देख रही है...
एक बार फिर बाबू लाल मरांडी को हृदय से आभार...
क्योंकि उनकी सोच, आज भी झारखंड को मजबूत करती है...

Tuesday, December 23, 2014

सब पर भारी, झारखंड की जनता हमारी। कोई नहीं भरमा पायेगा, जब जनता जग जायेगा।।..........

हां भाईयों, सब पर भारी, झारखंड की जनता हमारी। कोई नहीं भरमा पायेगा, जब जनता जग जायेगा।। – ये नारा सम-सामयिक हैं, क्योंकि कल तक सारे राजनीतिज्ञों, मीडियाकर्मियों और ज्योतिषियों की धड़कनें तेज थी कि पता नहीं जनता का जनादेश क्या होगा......सभी अपनी –अपनी कलाबाजियों का प्रदर्शन करते हुए, डींगे हांक रहे थे। सब की अपनी – अपनी दलीलें, कोई कह रहा था कि मेरे क्षेत्र में हमने इतने काम किये हैं कि वहां से कोई दूसरा जीत ही नहीं सकता, कोई कह रहा था कि हमने धूप में बाल थोड़ी ही सुखायें हैं, पत्रकारिता की हैं, इसलिए जो हम बोल रहे हैं, वहीं होगा और राजनीतिक भविष्यवाणी करनेवाले ज्योतिषियों की तो हवा निकल गयी हैं, बोलते ही नहीं बन रहा, कल तक अर्जुन मुंडा को पुनः प्रतिष्ठित करनेवाले यानी मुख्यमंत्री बनाने का दावा करनेवाले ज्योतिषी खोजते नहीं मिल रहे। एक दो राजनीतिक पंडितों से बात हमने करनी चाही तो वे अपनी मोबाइल बंद कर सोते हुए मिले....कुछ की पत्नियां फोन उठायी और बड़ी विनम्रता से बोली, पंडित जी महराज सो रहे हैं, कृपा कर बाद में फोन करें..............अब हम क्या बोले कि पंडित जी को आज सोना ही देना उत्तम होगा, क्योंकि आज का दिन उनके लिए सोने के लिए ही संदेश लेकर आया हैं................ आखिर क्या हुआ हैं – झारखंड में.................. झारखंड में वो हुआ हैं, कि ऐसा किसी प्रदेश में आज तक नहीं हुआ..... जनता ने एक साथ कई को सबक सिखाया हैं और कहा हैं कि अब ज्यादा चूं कि तो समझ लो, तुम्हारी खैर नहीं.................. झारखंड की जनता ने वो काम किया हैं कि जिसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम हैं, गर मेरी चले तो तो मैं एक लाइन में कह दूं कि यहां की जनता ने झारखंड के साथ खिलवाड़ करनेवाले नेताओं के साथ - साथ मीडिया को भी बजा दिया हैं कि मन करता हैं जनता जनार्दन का हाथ चूम लूं.......... यहां की जनता ने पहली बार राज्य के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत निवर्तमान मुख्यमंत्री तक को पहले धूल चटाया हैं......... जैसे बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन ( बरहेट से जीते जरुर पर दुमका से हारे भी) को हराया............. यहीं नहीं..... आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो को भी बाहर का रास्ता दिखाया.......... काग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत और नेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र प्रसाद सिंह को भी सदन में जाने से रोका............ झारखंड की पहली सरकार में कील ठोकनेवाले और गठबंधन की पहली सरकार को पटरी से उतारनेवाले लालचंद महतो और जलेश्वर महतो (प्रदेश अध्यक्ष जदयू) की औकात बता दी.......... राजद के प्रदेश अध्यक्ष गिरिनाथ सिंह और राजद की तेज तर्रार नेता अन्नपूर्णा देवी को भी कह दिया कि इस बार आपकी सदन में जरुरत नहीं............ जो मीडिया हरे मोदी, हरे मोदी, हरे अमित शाह, हरे अमित शाह कहकर उनके मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा था उसे भी औकात बता दी और राज्य में एक मजबूत विपक्ष भी इस बार प्रदान कर दिया.........और अंत में कह डाला कि देश की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां, ज्योतिषियों का झूंड और खुद को लोकतंत्र का 4था स्तंभ कहनेवालों झारखंड की जनता के इस निर्णय का सम्मान करें और सबक लें...नहीं तो जब भी मौका मिलेगा, हम अपना निर्णय सुनायेंगे और वो निर्णय ऐसा होगा, जिसकी परिकल्पना किसी ने नहीं की होगी............... अब जरा सोचिये किसी ने सोचा था क्या कि दो सीटों से चुनाव लड़नेवाले बाबू लाल मरांडी, खरसावां से चुनाव लड़नेवाले मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार अर्जुन मुंडा, दुमका से हेमंत सोरेन, मझगांव से मधु कोड़ा चुनाव हार जायेंगे, पर हुआ तो ऐसा ही....क्या किसी मीडियावालों ने सोचा था क्या कि इस बार सिल्ली से सुदेश हार जायेंगे, क्योंकि हर बात में मीडिया उनकी स्तुति गा दिया करता था..........पर हुआ तो ऐसा ही हैं............... मैं, जब एक महीने पहले जयपुर से रांची आया तो जनता के बीच गया, छटपटाहट देखी, वो छटपटाहट थी – बार बार दामन पर लगनेवाले दाग की, वो छटपटाहट थी की मीडिया और राजनीति में शामिल लोग उन्हें बार – बार बदनाम क्यों करते हैं, ये क्यों कहते हैं कि स्पष्ट जनादेश जनता ने नहीं दिया......आखिर चुनाव आयोग क्यों पांच चरणों में चुनाव कराता हैं, आखिर राज्यसभा में उनके चूने हए प्रतिनिधि क्यों पैसे लेकर वोट डाला करते हैं, क्यों उन्हीं के समय जन्म लिया छत्तीसगढ़, उत्तराखंड उनसे आगे निकल गया और हम पीछे रह गये, आखिर उनके नेता विकास की सीढ़ियां चढ़ते हुए उनसे आगे कैसे निकल गये और वे पीछे क्यूं रह गये....क्यों उनके नेता विदेशों में अपने परिवार का इलाज कराने के लिए उन्हीं के पैसों का इस्तेमाल करते हैं पर उनके बेटे-बेटियां अच्छे इलाज के लिए तरस जाते हैं और इन्हीं छटपटाहटों के बीच झारखंड की जनता ने स्पष्ट जनादेश देने का मन बनाया और साथ ही संकल्प लिया कि वे उन्हें सबक सिखायेंगे, जो उन्हें सबक सिखाने की सोचते हैं, लीजिये जनादेश सामने हैं, जनता ने अपना काम कर दिया...गर इस जनादेश को समझ कर भी किसी की समझ नहीं खुलती हैं तो ऐसे लोगों के लिए तो भगवान ही मालिक हैं.....................

Sunday, March 31, 2013

हनुमान मंदिरों का शहर - रांची......................

मेरा रांची से 28 सालों का रिश्ता है। इस दौरान रांची में, मैंने बहुत कुछ देखा और महसूस किया। सर्वाधिक अचरज में डाला - रांची के लोगों का हनुमान प्रेम। ये हनुमान प्रेम ही हैं कि रांची में यत्र-तत्र-सर्वत्र हनुमान ही  हनुमान दीखते है। कोई ऐसा इलाका नहीं, जहां हनुमान विद्यमान न हो। ऐसे कहा भी गया हैं कि हनुमान, इस कलियुग के एकमात्र जीवित देवता हैं, जो सरल, सहज व सहृदय हैं, भक्तों की जल्द सुनते हैं और हर प्रकार के कष्टों से मुक्त कर देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि रांचीवासियों को संकटमुक्त करने के उद्देश्य से, रांचीवासियों ने इन्हें यत्र-तत्र-सर्वत्र स्थापित कर दिया हैं और लगे हाथों हनुमानजी ने भी, रांचीवासियों की सुरक्षा का भार संभाल लिया हैं। आखिर कहां- कहां हनुमानजी हैं, सबसे पहले हम इसकी चर्चा करते हैं।
प्रारंभ रांची जंक्शन से - गर आप झारखंड अथवा रांची के बाहर के निवासी हैं तो आप सबसे पहले रांची जंक्शन आये। आप देखेंगे कि स्टेशन से बाहर निकलते ही उत्तर की ओर, संकटमोचन हनुमान मंदिर दीखेगा, जिसे टेम्पूचालकों, रिक्शाचालकों और स्थानीय लोगों ने स्थापित किया हैं। रांची जंक्शन के सौंदर्यीकरण के दौरान इस मंदिर को स्थानांतरित करने का प्रयास करने की कोशिश की गयी, फिर क्या था, लोग उबल पड़े। खूब भजन-कीर्तन होने लगी। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जूड़े लोग आ खड़े हुए और सौंदर्यीकरण का काम ठप पड़ गया। अंततः फैसला हुआ कि हनुमान मंदिर को छूए बिना सौंदर्यीकरण का कार्य शुरु हो, और हनुमान जी तब से लेकर आज तक गदा पकड़े और संजीवनी उठाये जमे हुए हैं। रांची जंक्शन के दक्षिण ओर गर आप जाये तो इसके दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम दिशाओं में भी हनुमान जी दीखेंगे। ये हनुमान इस प्रकार से आपको मिलेंगे, जैसे लगता हैं कि हनुमान जी, पूरे रांची जंक्शन की सुरक्षा में लग गये हो। रांची जंक्शन से जैसे आप ओभरब्रिज की ओर चलेंगे तो पटेल चौक पर भी हनुमान मंदिर दीखेगा। शायद यहां के हनुमान जी लोहरदगा-रांची रेलवे लाइन, सरकारी बस स्टैंड और इसके आसपास स्थिति विभिन्न लग्जरी होटलों की सुरक्षा में लग गये हो, यहीं नहीं इसी चौक से शुरु होती हैं रांची-पटना मुख्यमार्ग तो इसकी भी सुरक्षा, हनुमान जी ही किया करते हैं। इससे थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो मिलेगा ओभरब्रिज और ठीक इसके नीचे आपको हनुमान मंदिर मिलेगा, जहां हनुमान जी आपको करताल बजाते मिलेंगे। शायद ये हनुमान जी करताल बजाते हुए, ये कह रहे हो कि रांची में रामजी की कृपा से सब कुछ ठीक-ठाक हैं और यहीं से पश्चिम की ओर बढ़ेंगे तो कडरु ओभरब्रिज मिेलेगा, उसके नीचे भी हनुमानजी मिलेंगे, यहीं नहीं यहीं से थोड़ा दूर हटकर, अरगोड़ा रेलवे स्टेशन जानेवाली मार्ग पर भी  हनुमान जी हाथ में गदा हिलाते हुए मिल जायेंगे। दूसरी ओर सुजाता चौक अथवा लाला लाजपत राय चौक पर भी हनुमान जी की मंदिर आपको देखने को मिलेंगी। अलबर्ट एक्का चौक की ओर गर आप बढ़े विभिन्न प्रमुख बैंकों, गुरुद्वारों और होटलों के ठीक पास एक मल्लाह टोली हैं, जहा आपको हनुमानजी वीरासन में बैठें मिलेंगे और ठीक इसके आगे मिलेंगे डेली मार्केट के पास हनुमान जी, अपने पांवों से अहिरावण को दबाये, अपने कंधों पर राम और लक्ष्मण को उठाये। इस मंदिर को भव्यता प्रदान करने के लिए भक्तों की बड़ी टोली लगी हैं, निरंतर यहां कुछ न कुछ निर्माण चलता रहता हैं। 
हनुमान जी का सिक्का यहां कैसे चलता हैं, उसका परिदृश्य देखिये। जब अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास में भी हनुमान मंदिर का निर्माण करा दिया। अब जब राज्य के मुख्यमंत्री, हनुमान के शरण में हो, तो आप समझ सकते हैं कि यहां हनुमान जी कैसे राजकाज में दखल देते हुए सुरक्षा का भार उठाये हुए हैं। मुख्यमंत्री आवास हो या राजभवन या स्पीकर आवास या पुलिस आवास, इन सभी आवासों से निकलनेवाले महानुभावों की सुरक्षा का भार भी हनुमान जी ने उठा रखा हैं। वे इसके लिए रातू रोड चौक पर उपस्थित होकर, सभी को सुगमता और सुरक्षा प्रदान करते हैं। कहा भी गया हैं कि जो हनुमान की शरण में गया, उसके सारे ग्रह-गोचर ठीक, क्योंकि हनुमान हैं ही ऐसे।
गोस्वामी तुलसीदास को जब कष्ट हुआ तो वे हनुमानजी की शरण में ही गये और लिख डाली - हनुमान चालीसा। ये हनुमान चालीसा इतनी लोकप्रिय हो गयी, कि पूरे देश में बिना सूचना एवं प्रौद्योगिकी के ही घर - घर पहुंच गयी। धन्य हैं हनुमान जी..................
कहा भी जाता हैं....................
संकट कटैं मिटै सब पीड़ा,
जो सुमिरै हनुमत बल-बीरा
जै जै हनुमान गोसाईं
कृपा करहुं गुरदेव की नाईँ
जो सत बार पाठ कर कोई
छुटिहिं बंदि महासुख होई
जब हनुमान चालीसा पढ़ने से महासुख हो सकता हैं तो भला हनुमानजी के दर्शन करने से क्या होता होगा, समझा जा सकता हैं, इसलिए, रांचीवासी फिलहाल हनुमान की शरण में हैं और हनुमानजी सभी का कल्याण करने के लिए, सुरक्षा प्रदान करने के लिए पूरे रांची के मुह्ल्लों, चौक-चौराहों में विद्यमान हैं। हमें लगता हैं कि इतने हनुमानजी तो किसी तीर्थस्थल पर भी नहीं होंगे, जितने हमारे रांची में। अब तो हमारी हनुमानजी से यहीं प्रार्थना हैं कि जैसे, उन्होंने सभी के सुरक्षा का भार उठा रखा हैं, थोडा़ हमारे उपर भी कृपा बनाये रखे...............

Sunday, March 10, 2013

झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष के लिए भाजपा में घमासान......................................

देश के हर समस्याओं के समाधान का दावा करनेवाली भाजपा, एक प्रदेश अध्यक्ष चुनने में नाकामयाब हैं। झारखंड में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर घमासान हैं। प्रदेश अध्यक्ष बनने की लाईन में रघुवर दास, रवीन्द्र राय, सुनील सिंह, यदुनाथ पांडेय आदि नेताओं की लंबी लाइन हैं, पर राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सूझ ही नहीं रहा कि वे झारखंड की कमान किसके हाथों में सौंपे। इधर झारखंड में भाजपा के स्वंयभू नेता अर्जुन मुंडा परेशान हैं, वो चाहते हैं कि प्रदेश में ऐसा व्यक्ति अध्यक्ष बने, जो उनके इशारों पर नाचे, जैसा कि अभी दिनेशांनद गोस्वामी कर रहे हैं। इसलिए वे रवीन्द्र राय को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। उनको लगता हैं कि रवीन्द्र राय, जो उनके कहने पर प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे, वे आजन्म उनके प्रति वफादार रहेंगे, जैसा कि पूर्व में बाबू लाल मरांडी के प्रति अपनी वफादारी, उन्होंने दिखायी थी, पर स्थिति ऐसी हैं कि अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में रवीन्द्र राय के नाम उछलवाने के बावजूद, अर्जुन मुंडा को सफलता नहीं मिल रही। ऐसी स्थिति में, अर्जुन मुंडा ने एक सुनियोजित साजिश के तहत भाजपा विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा देने की घोषणा करवा दी। ये जानते हुए कि ऐसी घोषणा के कोई मायने नहीं, क्योंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हैं। ऐसे में आप किसी दल के विधायक दल के नेता रहे अथवा नहीं रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। 
अर्जुन मुंडा भाजपा के तेज व चालाक नेता हैं। किसको कैसे पटाना हैं और कैसे किनारे लगाना हैं, वे इसमें माहिर हैं। जो लोग अर्जुन मुंडा को जानते हैं, वे ये भी जानते हैं कि ये वे ही अर्जुन मुंडा हैं, जो एक समय बाबू लाल मरांडी की गणेश परिक्रमा किया करते थे, और उन्हीं की कृपा से वे मुख्यमंत्री भी बने और जैसे ही ये मुख्यमंत्री बने, उन्होंने बाबू लाल मरांडी को ऐसा परेशान किया कि बाबू लाल ने सदा के लिए भाजपा ही छोड़ दी और ये खंड खंड हो रही भाजपा के अखंड नेता बनकर उभरे। इन्होंने कभी भी देश हित अथवा दल हित में इस्तीफा देने की पेशकश नहीं की, पर जैसे ही प्रदेश अध्यक्ष की बात आयी और उनकी बातों को नजरंदाज करने की कोशिश की गयी। उन्होंने इस्तीफे का दांव खेला, ताकि लोगों को लगे कि ये व्यक्ति भाजपा का महान कार्यकर्ता हैं, पर चाल तो चाल होती हैं, सभी इस चाल को समझ गये हैं। यानी बात वहीं हैं वो बात हैं कि ये एक बूंद खून बहाकर, शहीद होने की श्रेणी में खड़ा होना चाहते हैं।
सच्चाई ये हैं कि इसी प्रकार की घटिया स्तर की राजनीति के कारण भाजपा पूरी तरह से नष्ट होती जा रही हैं। कोई भी भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बने या खुद अर्जुन मुंडा ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष क्यों न बन जाये, भाजपा पुनः राज्य में प्रतिष्ठित हो जायेगी, ऐसा अब नहीं लगता, क्योंकि पूरे प्रदेश में भाजपा में फिसड्डी नेताओं का आधिपत्य हो गया हैं, जो न चरित्रवान हैं और न ही दल के प्रति समर्पित। ये भी वहीं करते हैं, जैसा कि अन्य दलों के कार्यकर्ता और नेता। जब सभी वहीं करते हैं और भाजपा भी वहीं कर रही हैं तो ऐसे में लोग भाजपा के साथ क्यों चले। सवाल यहीं बार - बार झारखंड की जनता के मन में घर कर रहा हैं और गर यहीं चलता रहा तो भाजपा के लाश पर चढ़कर अन्य पार्टियां यहां शासन करने लगे तो इस बात को लेकर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।

Tuesday, September 11, 2012

अर्जुन मुंडा सरकार के दो साल......................

अर्जुन मुंडा सरकार के दो साल हो गये। उस सरकार के दो साल हुए, जिस सरकार में शामिल दलों में आपसी समन्वयता हैं ही नहीं। इस सरकार की यहीं सबसे बड़ी प्रमुख बात हैं। सांप्रदायिकता के नाम पर भाजपा को हरदम गाली देनेवाली झामुमो और निरंतर सत्ता के निकट गणेश परिक्रमा करनेवाली आजसू जैसी दलों की खिचड़ी सरकार ने जैसे तैसे दो साल पूरे कर लिये हैं। ये सचमुच बड़ी बात हैं। कहने को एक बार फिर अर्जुन भक्त पत्रकार व मीडिया वहीं कह रहे हैं, जो एक साल पहले कहा था, यानी उनके पास कहने के लिए कुछ भी नहीं हैं, इसलिए वे कहेंगे क्या। निरंतर सरकारी विज्ञापनों की चाहत ने उन्हें सत्य बात लिखने और बोलने से रोका भी हैं, पर हम अपनी क्या कहें, कहे बिना और लिखे बिना रुक नहीं सकता, इसलिए मन किया, लिख रहा हूं. जनता निर्णय करें, सत्य क्या हैं और असत्य क्या हैं।
एक बार फिर एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक ने लिखा हैं कि पंचायत चुनाव और राष्ट्रीय खेल इस सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि हैं, पर सच्चाई ये है कि ये दोनों उपलब्धि पिछले साल की हैं, न कि इस साल की। हुआ तो ये हैं कि सरकार ने पंचायत चुनाव तो कराये पर पंचायतों को अधिकार ही नहीं दिये, यानी शादी तो कराया पर दुल्हा-दुल्हन का मिलन ही नहीं कराया, जब दुल्हा-मिलेंगे ही नहीं तो फिर ये शादी हो या नहीं, क्या फर्क पड़ता हैं, आज भी पंचायत प्रतिनिधि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, कुछ दिन पहले तो इन्होंने झारखंड बंद का ऐलान भी किया, जिसका असर भी देखने को मिला, पर सरकार के उपर जूं तक नहीं रेंगी।
राष्ट्रीय खेल करानेवाली मुंडा सरकार से पूछिये कि पिछले साल की उपलब्धि, इस साल भी गिनाने में लगे हैं तो ये बताये कि इस साल उन्हीं पिचों व मैदानों पर खेल का कौन सा राष्ट्रीय आयोजन हुआ। सच्चाई ये हैं कि इन खेल स्टेडियमों में आशा नाइट व आयटम सांग गानेवाली कलाकारों का जमावड़ा हो रहा हैं या इन स्टेडियमों का वे लोग यूज कर रहे हैं जो किसी न किसी क्षेत्र में पावर रखते हैं और इन पावरों का यूज कर अपने - अपने लिए इन स्टेडियमों को यूज कर रहे हैं। इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या हो सकती हैं।
इस साल मुख्यमंत्री दुर्घटनाग्रस्त हुए, ईश्वरीय कृपा बाल - बाल बच गये, उन्हें कुछ भी नहीं हुआ। ईश्वर को इसके लिेए कोटि कोटि धन्यवाद, पर एक सवाल मुंडाजी से भी कि ऐसी हालात में वे रिम्स न जाकर अपोलो क्यों गये, क्या उनकी इलाज रिम्स में बेहतर ढंग से नहीं हो सकती थी, गर वे अपोलो के बदले रिम्स जाते तो रिम्स की विश्वसनीयता में चार चांद लगता और यहां के डाक्टरों और यहां इलाज कराने आये मरीजों और उनके परिवारों का मनोबल भी बढ़ता, वे ये कहते कि हमारा मुख्यमंत्री भी वहीं इलाज कराता हैं, जहां सामान्य लोग जाते हैं, कितनी बड़ी बात होती। 
इसी साल मुख्यमंत्री ने अपने विशेषाधिकार से उन पत्रकारों को अपने विशेषाधिकार से लाखों रुपये दे डाले, जो उनकी आरती उतारने में लगे रहते हैं, वह भी फैलोशिप और लाइफटाइम एचीवमेंट के नाम पर। पत्रकारों ने लिया भी। एक ही परिवार से कई लोग उपकृत भी हुए, पर क्या ऐसे फैलोशिप और लाइफटाइम एचीवमेंट का पुरुस्कार लेने व देने से झारखंड का सम्मान बढ़ गया या हम वहीं ढाक के तीन पात पर विचरण कर रहे हैं। 
सच्चाई तो ये हैं कि इस प्रकार की आरती उतारने और उतरवाने की परंपरा को त्यागकर स्थानीयता नीति पर सरकार जल्द से जल्द कुछ ठोस प्रयास करती। पड़ोसी छतीसगढ़  स्थानीयता नीति स्पष्ट कर दिया पर झारखंड में देखिए, पिछले साल एक कमेटी बनती हैं और वो कमेटी दो साल में एक बार मीटिंग करती हैं और उस मीटिंग में भी कुछ निकल कर नहीं आता। क्या ये शर्मनाक नहीं हैं।
इस सरकार में शामिल दलों के नेताओं और यहां के अधिकारियों ने एक काम बहुत अच्छा किया कि वे जनता के पैसों से जर्मनी, इंग्लैंड और अमेरिका का खुद दौरा किया, वह भी स्टडी टूर के नाम पर और पता नहीं क्या क्या। पर उस स्टडी टूर का कितना फायदा मिला वो तो मैं झारखंड की राजधानी रांची समेत कई जिलों की स्थिति देखकर आनन्दित हो जाता हूं। अपने ही लोगों के माथे पर सर रखकर कैसे विकास के नाम पर, उस जमीन को औने पौने दाम पर देश के उद्योगपतियों को जमीन शिफ्ट कर दी जाती हैं, इसे देखकर हमें हैरानी होती हैं, पर इसके लिए, सिर्फ अर्जुन मुंडा को ही दोषी ठहराना मै उचित नहीं समझता, क्योंकि इसके लिए पक्ष व विपक्ष दोनों जिम्मेदार हैं, पर वर्तमान सरकार इतना तो जरुर कर सकती थी कि वो ऐसे कृत्यों पर लगाम लगाती। 
राजधानी रांची तो नर्क लगता हैं, किसी भी प्रकार से ये राजधानी लगता ही नहीं। सारा का सारा नगर तबेला नजर आता हैं। प्रतिदिन जाम, जल जमाव, अव्यवस्थित बाजार इसकी शोभा बन गयी हैं, जबकि राजधानी किसी भी प्रांत का दर्पण हैं, पर इसकी शोभा कैसे बढ़े, इस पर किसी का भी ध्यान नहीं हैं। राज्य की राजधानी रांची में यहां वरीय पुलिस अधिकारियों का काम रह गया हैं -- छोटे छोटे चोरों को पकड़ना और अपनी फोटो खींचवाकर, अखबारों व इलेक्ट्रानिक मीडिया में दिखलाना, जबकि इसी रांची से कई आतंकी, दूसरे राज्यों की पुलिस पकड़कर, अपने यहां ले जा चुकी हैं, ये शैली हैं - यहां की पुलिस के काम करने की और इन पुलिस पर सरकार का कुछ भी नहीं चलता। यानी यहां किसकी सरकार हैं, कैसी सरकार हैं, पता ही नहीं चल रहा, फिर भी दो साल इस सरकार ने पूरे कर लिए, चलिए हम सब मिलकर, इस सरकार की जय बोले.....क्योंकि अर्जुन तो अर्जुन हैं, वो अपने तरकस में हर प्रकार के बाण रखे हैं, जो समय समय पर यूज करता रहता हैं, हो सकता हैं कि एक दिन उसके तरकस से ऐसा भी बाण निकले, जिससे झारखंड की सारी समस्याओं का ही अंत हो जाय, इसलिए हम उस दिन का इंतजार करें, साथ ही इस सरकार के मनोबल को भी बढ़ाये, इन आशाओं के साथ की आनेवाले समय में कुछ न कुछ नया अवश्य होगा...................

Thursday, September 15, 2011

क्या किसी पत्रकार और राजनीतिज्ञ के बीच पति-पत्नी जैसे संबंध हो सकते हैं......?

14 सितम्बर 2011, दिन के 11 बजे, रांची का एटीआई हॉल, मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का प्रेस कांफ्रेस, इलेक्ट्रानिक व प्रिंट के छायाकारों और पत्रकारों साथ ही राज्य के आला अधिकारियों से पूरा एटीआई खचाखच भरा हैं। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा पत्रकार सम्मेलन को संबोधित करने एटीआई पहुंचते हैं, तभी मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डी के तिवारी, अपने सीट से उठते हैं और माईक से कुछ बोलना शुरु करते हैं। अचानक वे तपाक से ये भी बोल देते हैं कि मुख्यमंत्री और आप पत्रकारों के बीच का रिश्ता पति - पत्नी जैसा होता हैं, इसलिए अब हम मुख्यमंत्री को कहेंगे कि वे आप पत्रकारों को संबोधित करें। इधर मुख्यमंत्री अपनी बातें रखना शुरु कर देते हैं। वे बताते हैं कि किन विकट परिस्थितियों में उन्होंने राज्य की बागडोर संभाली और कैसे एक साल का मार्ग सुगमता से तय किया। जब तक वे बोल रहे होते हैं - सभी पत्रकार , उनकी बातों को ध्यान से सुन रहे हैं। एक साल की अपनी कार्यकुशलता को बताने में मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को काफी समय लग जाता हैं। इसी बीच मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा द्वारा पत्रकारों के संबोधन के बाद कुछ पत्रकार, मुख्यमंत्री से सवाल जवाब करते हैं। सवाल - जवाब भी ऐसा कि पूछिये मत। उन सवालों को मैं लिख भी नहीं सकता। पत्रकारों के सवालों से साफ लग रहा था -- कि मुख्यमंत्री के आगे नतमस्तक होने की जिजीविषा संवाददाताओं में पलने लगी हैं, ताकि जब कभी समय मिले, वे मुख्यमंत्री से कृपा पा जाये। आश्चर्य इस बात की भी कि किसी पत्रकार ने ये सवाल नहीं पूछा कि क्या एक पत्रकार का संबंध किसी राजनीतिज्ञ से पति - पत्नी का हो सकता हैं, गर पति पत्नी जैसा संबंध राजनीतिज्ञों और पत्रकारों के बीच होगा। तो फिर क्या ऐसे में उस राज्य अथवा उस राजनीतिज्ञ या जनता का भला होगा। गर नहीं तो फिर पति - पत्नी का संबंध कैसे। चूंकि उस पत्रकार सम्मेलन में मैं भी गया था -- मुझसे रहा नहीं गया। मैने पूछ दिया कि मुख्यमंत्रीजी पहली बार किसी अधिकारी वह भी डी के तिवारी के मुंह से सुनने को मिला कि पत्रकारों और आपके बीच संबंध - पति पत्नी का हैं, तो इसमें आप ये बतायें कि पत्रकार और राजनीतिज्ञ यानी आप के बीच में पति कौन हैं और पत्नी कौन हैं, और जब पति -- पत्नी का संबंध हैं तो फिर पति - पत्नी के बीच जब संवाद होता हैं तो उसमें तीसरा कोई नहीं होता -- ये अधिकारी पत्रकारों और आपके बीच में दीवार क्यों बन रहे हैं, इनकी क्या आवश्यकता। फिर क्या था -- पूरा एटीआई हंसी के ठहाकों से गूंज उठा। इसी दरम्यान डी के तिवारी उठे और कुछ टोका टाकी की। मैंने स्पष्ट कह दिया कि वे आराम से बैठे और मुझे सवाल करने दे, गर सवाल नहीं करने देंगे तो मैं इस पत्रकार सम्मेलन से उठकर चल दूंगा। मुख्यमंत्री ने हस्तक्षेप किया और उन्होंने मुझे प्रश्न पूछने दिया। मैंने इसी ठहाकों के बीच पूछा कि क्या आपके द्वारा कन्यादान योजना चलायी गयी थी उसका क्या हुआ। उ्दयोग के प्रसार के लिए सिंगल विंडो सिस्टम चालू किया गया था क्या हुआ। मनरेगा की क्या स्थिति हैं। जलसंरक्षण के लिए कानून बनाने की बात की थी, उसका क्या हुआ। दूसरी ओर नार्थइस्ट के उग्रवादियों के पांव, झारखंड तक पहुंच गये, सरकार क्या कर रही हैं। मुख्यमंत्री ने अपने उत्तर में कहा कि सबसे पहले मैं आपके पहले प्रश्न का उत्तर दे दूं कि -- ये शोध का विषय हैं कि हममें से पति कौऩ हैं और पत्नी कौन हैं और ये शोध आप पत्रकार ही करें तो बेहतर होगा। फिर एटीआई ठहाकों से गूंज उठा। बाकी बचे प्रश्नों का उत्तर उन्होंने गोलमटोल दिया, जैसा कि आम तौर पर एक राजनीतिज्ञ देता हैं। अब बात चिंतन की, क्या अब राज्य के पत्रकार, राजनीतिज्ञों के पत्नी की रोल में पत्रकारिता करेंगे या उनका कोई सम्मान हैं, गर सम्मान हैं तो अब यहां के पत्रकारों को ही सोचना होगा कि क्या करें कि, फिर कोई अधिकारी फिर कभी किसी राजनीतिज्ञ की उन्हें पत्नी बनाने की कोशिश नहीं करें, नहीं तो पत्रकारिता की जो स्थिति हैं वो तो भगवान भरोसे हैं। ज्यादातर पत्रकारों ने अपनी स्थितियां खुद ही बिगाड़ ली हैं, ऐसे में कोई अधिकारी गर कुछ और नये शब्दों का प्रयोग पत्रकारों के लिए कर दें तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी।

Saturday, September 10, 2011

एक वर्ष अर्जुन मुंडा के शासन के ---------------------

गर एक पंक्ति में कहे तो झारखंड में झारखंड के दुर्भाग्य ने अभी तक पीछा नहीं छोडा़ हैं, सबसे पहले उपलब्धियों की बात करें, जिसको लेकर अर्जुन मुंडा ने अपनी पीठे थपथपायी हैं----

1. ये मैं नहीं, अर्जुन मुंडा का कहना हैं कि उन्होंने 32 वर्षों के बाद पंचायत चुनाव सफलता से करा दी, अब पूरे राज्य में पंचायती शासन व्यवस्था लागू हैं।
2. राष्ट्रीय खेल करा दिया, जो पिछले कई वर्षों से टलता जा रहा था।
3. राज्य में सेवा का अधिकार लागू कर दिया।
4. गठबंधन की सरकार, शानदार ढंग से चला रहे हैं, किसी को किसी से कोई दिक्कत नहीं, विपक्ष लगातार हमले कर रहा हैं,
पर उनकी सरकार निरंतर बिना किसी बाधा के चलती ही जा रही हैं।
जनाब, अर्जुन मुंडा जी,
इस देश में 28 प्रांत और 7 केन्द्र शासित प्रदेश हैं, सभी जगह सरकारें चल रही हैं, पर जिस तरह आप चला रहे हैं, वैसी ही चल रही हैं क्या। गर नहीं तो मेरे सवालों का जवाब दीजिये -------
सवाल नं. 1 - आपके नेता लालकृष्ण आडवाणी भ्रष्टाचार के खिलाफ रथयात्रा निकालने की बात कर रहे हैं, आप बतायेंगे कि आपके यहां भ्रष्टाचार समाप्त हो गयी हैं क्या, गर नहीं तो भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए आपके पास क्या योजनाएं हैं, उत्तर होगा -- कुछ नहीं। रही बात भ्रष्टाचार के आपके शासनकाल के रिकार्ड की तो एक नहीं कई बार कैग ने आपके शासनकाल के समय की खर्च के बारे में जो ब्यौरे दिये हैं, वो बताने के लिए काफी हैं कि आप के शासनकाल में भ्रष्टाचार के क्या रिकार्ड रहे हैं।
सवाल नं. 2 - आपने पंचायती शासन व्यवस्था तो लागू कर दी, पर सच्चाई ये हैं कि आज तक उन्हें अधिकार ही नहीं दिया गया और जब अधिकार ही नहीं दिये जायेंगे तो पंचायत चुनाव हो अथवा न हो, क्या फर्क पड़ता हैं।
सवाल नं. 3 - राष्ट्रीय खेल करा दिया, पर क्या आपने राष्ट्रीय खेल संपन्न कराने के बाद इस पर श्वेत पत्र जारी किया, गर आप श्वेत पत्र जारी करेंगे तो पता चलेगा कि इस राष्ट्रीय खेल को संपन्न कराने में भ्रष्टाचार ने कितने रिकार्ड तोड़ें हैं। राष्ट्रीय खेल समाप्ति के बाद तो महिला आयोग की सदस्य ने तो प्रेस कांफ्रेस कर साफ कर दिया कि राष्ट्रीय खेल के दौरान किस प्रकार सेक्स रैकेट चलानेवालों ने झारखंड की संस्कृति को तार-तार किया। और कैग की रिपोर्ट ने भी बता दिया कि यहां राष्ट्रीय खेल की तैयारी में कैसे कैसे गोरखधंधे हुए हैं।
सवाल नं. 4 - राज्य में सेवा का अधिकार लागू कर दिया, पर आपके पास न तो पर्याप्त संख्या में प्रशासनिक अधिकारी हैं और न कर्मचारी तो फिर आप सेवा का अधिकार लागू कैसे करेंगे, अरे आपके इस सेवा का अधिकार का हाल, ठीक सूचना के अधिकार कार्यालय जैसा होने जा रहा हैं।
सवाल नं. 5 - क्या ये सही नहीं हैं कि 11 सितम्बर को सत्ता संभालने के बाद, मंत्रिमंडल विस्तार में आपको पसीने छूट गये, करीब एक महीने के बाद आपके मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ, उसमें भी कई मंत्री अपने विभागों को लेकर असंतुष्ट थे, जिसे मनाने में ही ज्यादा समय बीत गया।
सवाल नं. 6 - राज्य में भूख और गरीबी का आलम ये हैं कि अच्छी मानसून के बावजूद लोगों का पलायन जारी हैं, आदिवासी महिलाएं आज भी बड़े - बड़े महानगरो में शोषण की शिकार होती जा रही हैं, और इन भूख और गरीबी से त्राण दिलाऩे के लिए चलायी जा रही मनरेगा योजना आपके राज्य में पूरी तरह फेल हैं। स्थिति ये हैं कि 9 सितम्बर 2011 को मनरेगा पर आपके आवास के ठीक पंद्रह - बीस कदम की दूरी पर एटीआई में सोशल आडिट चल रहा था पर आपने उसमें भाग लेने की जहमत नहीं उठाई, नतीजा ये रहा कि विभागीय मंत्री समेत सभी वरीय अधिकारी इस महत्वपूर्ण बैठक से गायब रहे।

सवाल नं. 7 - अतिक्रमण की आग ने पूरे राज्य को उद्वेलित किया। अतिक्रमण की आग की आड़ में एक नगर ही आपने तबाह करा दी, उस नगर के लोग आज भी इधर से उधर भटक रहे हैं आपकी सरकार ने पुनर्वासित करने की बात भी कही थी, पर क्या आप बता सकते हैं कि वे कहां पुनर्वासित हैं, जहां जाकर मैं देख सकूं कि वे लोग आनन्दित हैं।
सवाल नं. 8 - आपने न्यायालय में शपथ पत्र दायर किया कि पूरे राज्य से अतिक्रमण हटा लिया गया हैं, पर सच्चाई क्या हैं, वो आप भी जानते हैं और हम भी जानते हैं, आज भी रांची का मेनरोड ये बताने के लिए काफी हैं कि अतिक्रमणकारियों ने किस प्रकार रांची की शक्ल बिगाड़ दी हैं, पर आपको तो गरीबों को उजाड़ने में कुछ ज्यादा ही आनन्द आता हैं।
सवाल नं. 9 - आपके सरकार के एक साल पूरे हो गये। इसी साल में आपने बजट सत्र के दौरान 15,300 करोड़ रुपये का बजट पारित कराया और छह महीने बीत गये, उस समय से लेकर, आज के समय तक आपने मात्र 1425.38 करोड़ रुपये खर्च किये, यानी मात्र साढ़े नौ प्रतिशत ही खर्च कर पाये, ऐसे में शेष बचे छह माह में क्या कर लेंगे।
सवाल नं. 10 - जब आपके पास बजट सत्र की राशि बची हुई हैं तो फिर प्रथम अऩुपूरक बजट की आवश्यकता क्यों पड़ गयी।
सवाल नं. 11 - आपके यहां 34 विभाग हैं, जिसकी कुल योजनाएं - 410 हैं, पर सच्चाई ये हैं कि इनमें से 328 योजनाओं में तो अभी तक काम ही नहीं शुरु हुआ, ऐसे में आप जव विकास की बात करते हैं तो सामान्य जनता को हंसी आती हैं, यानी 80 प्रतिशत योजनाओं में तो काम ही अब तक नहीं शुरु हुआ। कमाल हैं 34 विभागों में 18 विभाग तो ऐसे हैं जिसमें या तो सिर्फ एक योजना प्रारंभ हुई या एक भी नहीं।
सवाल नं. 12 - मुख्यमंत्री आदिवासी हैं, इनके गुरुजी आदिवासी हैं पर इन्ही के राज्य में आदिम जनजातियों के लिए दो वर्षों में एक भी आवास नहीं बन सका है। आखिर क्यों।
सवाल नं. 13 - भारत सरकार की शहरी आवास योजना के तहत आपको मिला पैसा, ऐसे ही धूल फांक रहा हैं, पर आपने इस ओर ध्यान हीं नहीं दिया, पता नहीं क्यों।
सवाल नं. 14 - आपकी सरकार ने जनता से वायदा किया कि तीन महीने के अंदर नया राशन कार्ड सबको मिल जायेगा, क्या हुआ सभी को राशन कार्ड मिल गया। आपने जो योजना चालू की थी, बीपीएल परिवारों को एक रुपये प्रतिकिलो अनाज देने की, क्या सबको मिल रहा हैं, गर नहीं तो फिर इस प्रकार की ढपोरशंखी योजना चलाने से मतलब।
सवाल नं. 15 - पहले खनिज नीति के अनुसार - 2006 के अनुसार - आयरन ओर बाहर नहीं जायेगा। पर आज उसकी क्या स्थिति हैं, अपने अंदर झांक कर देखे।
सवाल नं. 16 - आपही के मंत्री मथुऱा महतो, टाटा सबलीज पर कुछ कहते हैं और मुख्यमंत्री कुछ कहते हैं, टाटा सबलीज की फाईल 6 दिसम्बर 2010 से आखिर कहां गुम हो गयी।
सवाल नं. 17 - आपके शासनकाल में ट्रांसफर पोस्टिंग उद्योग इस प्रकार फला - फूला हैं कि पूछिये मत। कोई ऐसा विभाग नहीं, जहां ट्रांसफर - पोस्टिंग न हुआ हो, ऐसे भी आपकी जब भी सरकार बनी हैं, तो सबसे पहले आपका ध्यान इसी ओर जाता हैं।
सवाल नं. 18 - मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली और नागपुर की आपने खूब सैर की। न्यूयार्क - बर्लिन तक चले गये। जनता को इससे क्या मिला। आपने अपने बच्चे की बेहतर इलाज के लिए अमरीका तक की यात्रा की। यहां की गरीब जनता पूछती हैं कि उनके गरीब बेटे की इलाज की बेहतरी के लिए आपने राज्य में कौन ऐसी बेहतर सेवा शुरु करा दी। आप आज भी देखे यहां के लोग मामूली मलेरिया से दम तोड़ रहे हैं।
सवाल नं. 19 - विधि व्यवस्था का आलम ये हैं कि आपके शासनकाल में दो जेलब्रेक की घटना हो गयी - एक चाईबासा और दूसरा आपका ही विधानसभा क्षेत्र - सरायकेला - खरसावां। इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या हो सकती हैं।
सवाल नं. 20 - आज भी आपके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों की बात, राज्य के अधिकारी हवा मं उड़ा देते हैं, सुनते ही नहीं। ऐसे में आपके शासन का भगवान ही मालिक हैं। गर इसे आप शासन कहते हैं तो कह लीजिये पर आनेवाले समय में मुझे नहीं लगता कि जनता आपको माफ करेगी। जमशेदपुर चुनाव तो एक ट्रेलर था, पूरी फिल्म जब विधानसभा के चुनाव होंगे तो जनता दिखा देगी। तब तक के लिए आप शासन का सुख भोगिये।

Saturday, May 21, 2011

ऐसे आयोजन से क्या लाभ, जब आप समय का मूल्य न समझे और न अनुशासित हो.....!


16 मई से 20 मई तक राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने रांची के बीएनआर होटल में विभिन्न विभागों पर परिचर्चाएँ करायी, लोगों से सुझाव मांगें कि 12वीं पंचवर्षीय योजनाओं में राज्य की विभिन्न विभागों को योजनाओं को कैसे मूर्तरुप दिया जाय, ताकि झारखंड विकास के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बन जाये। लोगों ने सूझाव भी दिये, लोगों ने इनकी परिचर्चाओं में भाग लिया, मीडिया ने अपनी विशिष्ट भूमिका भी निभायी। सच्चाई ये भी हैं कि मैं खुद चाहता हूं कि ये प्रांत जो विभिन्न प्रकार से कष्टों को झेल रहा हैं, आगे बढ़े, शक्तिमान बने, पर जो स्थितियां हैं, उससे साफ लगता हैं कि इस राज्य को अभी भी दुर्दिन देखने हैं, कयोंकि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता है। अतीत कैसा था, वो आज के वर्तमान को देखकर पता लग रहा है, पर जो आज का वर्तमान है और जिस प्रकार के लोग इस वर्तमान के माध्यम से झारखंड के सुखद भविष्य का सपना संजोये हैं, उससे लगता हैं कि फिलहाल इस प्रांत का भविष्य अंधकारमय है।
किसी भी देश, प्रांत, संस्थान अथवा व्यक्ति के विकास के लिए अनुशासन काफी मायने रखता है, और ये अनुशासन सर्वप्रथम राज्य के प्रमुख व्यक्तियों में देखा जाता हैं कि वो कितना अनुशासित है, क्योंकि जब वो अऩुशासित होगा, तभी उसका देश, प्रांत, संस्थान और वह व्यक्ति विकसित होगा, नहीं तो किसी जिंदगी में वो विकसित नहीं हो सकता और न ही वो देश व प्रांत का कायाकल्प कर सकता हैं, ये छोटी सी बात सभी को समझ में आ जाना चाहिए, क्योंकि ये ध्रुव सत्य है।
कल यानी 20 मई को मुझे सूचना मिली। राज्य के सूचना भवन के माध्यम से कि मुख्यमंत्री आज यानी 21 मई को हटिया डैम का निरीक्षण सुबह 9 बजे करेंगे। आज 21 मई को जब सुबह के दस बजे तब मुझे सुचना मिली की, मुख्यमंत्री 11 बजे हटिया डैम पहुंचेगे, लेकिन जब 1 बज गये तब हमने, मुख्यमंत्री आवास पर फोन लगाया, तब सूचना मिली की मुख्यमंत्री हटिया डैम पहुंचेंगे जरुर, लेकिन अभी विलम्ब हैं, चूकि उन्हें आज जमशेदपुर जाना हैं, इसलिए जमशेदपुर जब जायेंगे तब रास्ते में हटिया डैम भी जायेंगे। ये हैं हमारे राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की सोच। और उनकी समय की पाबंदी तथा अनुशासन। और इधर उऩके समाचार को संकलन करने तथा उनके दर्शन को व्याकुल जनता राहे जोह रही हैं कि मुख्यमंत्री अब आ रहे हैं, तब आ रहे हैं। जहां सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठा व्यक्ति समय और अनुशासन को नहीं समझ पा रहा तो ऐसे में राज्य का विकास कैसे होगा।
विकास कोई निश्चित स्थान नहीं हैं, कि वहां पहुंच गये तो विकास की मंजिल पा ली, ये निरंतर चलने वाली प्रक्रिया हैं, इसका लक्ष्य समय समय पर बदलता रहता हैं और यहीं नियति भी हैं पर इतनी छोटी सी बात हमारे देश व प्रांत के भविष्यद्रष्टा को दिखाई नहीं पड़ती। बीएनआर होटल में एक बार हमने जाकर देखने की कोशिश की कि सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं को मूर्तरुप देने के लिए जो बैठक बुलायी हैं, उसकी स्थिति क्या हैं। हमने देखा कि वहां वैसे ही लोग हैं जो पूर्व से ही राज्य की विभिन्न योजनाओं पर कुंडलियां मारकर बैठे हैं, जिन्होंने विभिन्न योजनाओं को सत्यानाश करके रख दिया हैं और इसी में अपना उल्लू भी सीधा कर रहे हैं और भ्रष्टाचार की नयी परिभाषा गढ़कर, इतनी कमायी अवश्य कर ली कि इनके सात पुश्तों तक अब आगे पीछे सोचने की जरुरत ही नहीं।
अरे भाई, शिक्षा में सुधार लाना चाहते हो, तो करना क्या हैं..........
सुधार लाओ, किसने रोक रखा हैं, पर सच्चाई ये हैं कि तुम खुद ही नहीं चाहते कि शिक्षा में सुधार हो, क्योंकि गर शिक्षा में सुधार हो गया तो फिर तुम्हारे बच्चों का क्या होगा। हम कहना क्या चाहते हैं दिमाग पर जोर लगाईये। समझ में आ जायेगा। और जिन्हें नहीं समझ में आ रहा। वो ऐसे समझिये। क्या आपके प्रांत के नेताओं, वरीय अधिकारियों, व्यवसायियों, बड़े-बड़े पूंजीपतियों अथवा जिनके पास थोड़े से भी पैसे हैं, उनके बच्चे क्या सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं अथवा सरकारी अस्पतालों में इनकी इलाज होती हैं। गर नहीं तो फिर ऐसे स्कूल अथवा अस्पताल की आवश्यकता क्यूं। अरे भई जिस दिन से इन नेताओं, वरीय अधिकारियों, व्यवसायियों, बड़े बड़े पूंजीपतियों और मठाधीशों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ने और सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने लगेंगे। ये सब खुद ब खुद ठीक हो जायेंगे। मैंने तो देखा कि जो टीचर जिस सरकारी स्कूल से 40-50 हजार का वेतन उठा रहा होता हैं, वो खुद अपने बेटों-बेटियों को उस स्कूल में न पढ़ाकर, निजी स्कूलों में पढ़ा रहा होता हैं. यहीं नहीं यहीं हाल सरकारी अस्पतालों से अपनी जिंदगी बेहतर कर रहे डाक्टरों का हैं।
पूरे देश व पूरे राज्य को चरित्रहीन बना कर रख दिया और अब चले हैं देश व राज्य को बेहतर बनाने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं पर चर्चा कराने के लिए, ये तो वहीं बात हुई। बचपन में तोता रटंत की कथा वाली बात।
गर सचमुच में कोई राज्य को आगे बढ़ाने की बात करता है तो मैं यहीं सुझाव दूंगा कि पहले गांधी की तरह बनने की कोशिश करो। नहीं तो ये झूठी दिलासा देना बंद करों कि तुम झारखंड को आगे बढ़ाना चाहते हो।
गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे तब वे मुंबई में गोपाल कृष्ण गोखले से मिले, उन्होंने गांधी से सिर्फ यहीं कहा कि गांधी जो आप सोच रहे हो, वो भारत नहीं हैं, पहले आप भारत को निकट से देखो, तब पता चलेगा कि भारत क्या हैं और उसके बाद जब लक्ष्य बनाकर चलोगे तो तुम अवश्य कामयाब होंगे। मैं भी यहीं कहता हूं कि यहां के राजनीतिज्ञ पहले झारखंड को नजदीक से देखे, यहां की जनता क्या चाहती हैं, उनके दिलों से पूछे, राजधानी और बड़े शहरों से प्यार जरुर करें पर गांवों में रहनेवाले लोगों को ये महसूस नहीं होने दें कि वे उऩसे दूर हैं नहीं तो स्थिति भयावह हो जायेगी क्योंकि शहर तक आने के लिए गांव को मजबूत होना बहुत ही जरुरी है। सच्चाई यहीं हैं कि यहां ज्यादातर नेता चालाक है, अपनी चालाकी में ये ज्यादा मशगूल है। और वो चालाकी जनता खूब समझती हैं पर ये समझते हैं कि जनता महामूर्ख हैं।
एक मई को यहां के एक नेता ने मोराबादी मैदान में आमरण अनशन का कार्यक्रम रखा, गांधी बनने की कोशिश की, पर सच्चाई ये भी हैं कि इनके आमरण अनशन को तुड़वाने के लिए न तो सरकार आगे आयी और न ही जनता। खुद इन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को मोराबादी बुलवाया, एक भोजपुरी गायक अभिनेता आया, सभी ने गुहार लगायी, कि वे अऩशन तोड़े और उन्होंने अनशन तोड़ दिया। जबकि गांधी ने जब भी अनशन किया और सत्याग्रह की, तब तब वे कामयाब होकर लौटे। ये हैं कल के गाँधी और आज के नेताओं का चरित्र। ऐसे में ये प्रांत झारखंड कैसे आगे बढ़ेगा। मैं तो यहीं कहूंगा कि बस सारे नेता चरित्रवान बन जाये, समय को पहचाने, आदर्शवादिता को अपनाएं, जो कहें वो करें जो करें वो कहें, मन, वचन और कर्म से एक रहे, फिर देखिये कि ये झारखंड कहां जाता हैं, पर बिना चरित्रवान बने, आप चाहेंगे कि देश व समाज को नयीं दिशा दे दें तो ये तो किसी जिंदगी में आप नहीं कर सकतें और न ही आनेवाले समय में आपको लोग याद रखेंगे।

Sunday, May 1, 2011

निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय...!


झारखंड में अतिक्रमण की आग में छः लोगों की जान चली गयी। सैकड़ों गरीबों के आशियाने उजाड़ दिये गये। जानें उन लोगों की गयी, आशियाने उनके उजाड़े गये, जो आजीवन कमाई करते करते मर भी जाये, तो भी वे किसी जिंदगी में जमीन खऱीदकर अपना आशियाना नहीं बना सकते। ये दलित और अनुसूचित जन जाति से भी नहीं आते कि सरकार इनके लिए इंदिरा आवास उपलब्ध करा दें। पर इन पर गाज लोकतंत्र के तीन स्तंभ कहे जानेवाले विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी ने मिलकर गिरायी। ये रोते रहे, बिलखते रहे, इनके सपनों का आशिय़ाना ढहता रहा, पर किसी को दया नहीं आयी। वह भी तब, जबकि सभी जानते हैं। तुलसीदास ने कहा हैं कि ------------------
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़िये, जब तक घट में प्राण।।

अतिक्रमण हटना चाहिए, मैं भी इसका पक्षधर हूं, पर अतिक्रमण हटाने के नाम पर सिर्फ गरीबों पर बूलडोजर चलाना, इसे कायरता व बुजदिली समझता हूं। जिसने भी गरीबों पर बूलडोजर चलायी हैं, उसे उसके किये की सजा ईश्वर अवश्य देगा, चाहे वो कितना भी बड़ा अथवा सर्वशक्तिमान व्यक्ति क्यूं न हो, जो इस अहं में जी रहा हैं कि उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता. वह भी कबीर की, इस पंक्ति को पढ़ ले, गर वो बाल्यकाल से लेकर वृद्धावस्था तक नहीं पढ़ा हो, पंक्तियां है ------------
निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय।
मरे मृग के छाल से, लौह भस्म हो जाय।।

राज्य में अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है, कहा जा रहा है कि न्यायालय के आदेश पर चल रहा है, पर ये अतिक्रमण हटाओ अभियान चल कहा रहा है। वहां चल रहा है – जहां गरीबों का निवासस्थल है। जिनकी फूटपाथ पर जिंदगी चलती है और फूटपाथ पर ही समाप्त हो जाती है, पर जिन अमीरों ने कानून को ठेंगा दिखाकर, फूटपाथ को भी नहीं छोडा, उस पर बुलडोजर क्या, एक सूई भी नहीं चूभोई गयी है। ये है – हमारा देश भारत, उसका एक प्रांत झारखंड और उसकी व्यवस्था।
शायद ऐसी व्यवस्था, इसलिए कि लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों ने रामचरितमानस की चौपाईयों को अक्षरशः कंठस्थ कर, उस पर चलना शुरु कर दिया है – ये कहकर कि ----------------------
समरथ के नहिं दोषु गोसाई
आज हमें हरि शंकर परसाई बरबस याद आ रहे है........। उनकी लिखी कहानी भेड़ और भेड़िये याद आ रही है। हमें लगता है कि अतिक्रमण के नाम पर, अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर जिस प्रकार से गुंडागर्दी चली हैं, मुझे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से विश्वास उठ गया है। पूर्व में, जो घटनाएं घटी, जो मेरे आंखों के सामने नहीं घटी थी, फिर भी इस प्रकार की घटनाएं घटित होती थी, तो मैं समझता था कि देश में कानून का राज है। जो लोग गलत करेंगे, उन्हें आज न कल सजा मिलेगी। पर मैंने जो महसूस किया, उसका लब्बोलुआब ये है कि गरीब तो पैदा ही होते है, अमीरों के द्वारा काट दिये जाने के लिए।
गरीबों को तो जीने का अधिकार ही नहीं है, जीने का अधिकार तो सिर्फ उन्हें है – जो हजारों, लाखों और करोड़ों में खेलते है। जो झारखंड के महानगरों में, टूटे – फूटे प्लास्टिक, मिट्टी और कचरों के घरों में रहकर, इन अमीरों के सुख साधन का सामान जूटाने और उनकी सेवाओं में अपना सम्मान तक गिरवी रख देते है, उन्हें जीने का अधिकार किसने दे दिया। शायद यहीं कारण रहा कि गरीबों के आशियाने ढहते रहे, गरीबों के बेटे पुलिसिया गोली के शिकार होते रहे और लोकतंत्र के तीनों स्तंभ चुपचाप मौन रहकर, इनकी बेबसी पर खुश होते रहे, इन्हें इनके हाल पर दया तक नहीं आयी।
ये खुश होनेवाले वे लोग है --------- जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी ईमानदारी नहीं बरती। जिन्होंने इन्हीं गरीबों के पैसे खाकर, उनकी जिंदगी तबाह कर दी और विभिन्न घोटालों को अंजाम दिया। जिन्होंने अपने लिए बिना किसी नक्शा को पास कराये, बड़े-बड़े आलीशान होटल और अपने मकान बनाये। जिन्होंने बेईमानी के सारे रिकार्ड तोड़ कर अपने परिवार के लिए दुनिया के सारे सुखसाधन अपने लिये जुटा लिये और जूटा रहे है। इन पर किसी की नजर नहीं जाती, क्योंकि ऐसे लोग इन लोकतंत्र के तीनों स्तंभों में बड़ी संख्या में देखने को मिल जाते है। इसलिए इन पर बुलडोजर चले भी तो कैसे। इधर अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर गरीबों के आशियाने पर बुलडोजर चलते रहे, गरीबों के छातियों पर गोलियां चला दी गयी, पर सरकार बेबस थी। केवल एक राग अलाप रही थी कि न्यायालय का आदेश है ----------- इसलिए वह अतिक्रमण हटाओ अभियान चला रही है। विपक्ष न्यायालय पर तो नहीं, पर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा था कि ये गलती सरकार की है। इस अतिक्रमण हटाओ अभियान से मुक्ति सिर्फ अध्यादेश लाकर ही पायी जा सकती है, पर इनके इस अध्यादेश लाने के चक्कर में कितनी मांओं के गोद सुनी हो गयी, शायद लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों को मालूम नहीं। उन्हें ये भी मालूम नहीं कि अपने आशिय़ाने को ढहने का समाचार मिलते ही, कितनों की दहशत में ही जान निकल गयी, पर लोकतंत्र के इन तीन स्तंभों को इससे क्या मतलब। मौत तो इस देश में होती ही रहती हैं............................
और अब इस राज्य के तथाकथित गुरुजी यानी बात शिबू सोरेन की ------------------झारखंड के लोग, इन्हें गुरुजी के नाम से जानते है, इन्हें गुरुजी किसने बनाया, हमें नहीं मालूम और न ही हम जानना चाहते है। अचानक पता चला, कि ये जनाब अतिक्रमण हटाओ अभियान और गरीबों पर चल रही बुलडोजर से परेशान है, दुखी है। इन्होंने मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को पत्र लिखा है कि मुख्यमंत्री जल्द इस समस्या का समाधान करें। बेचारे इतने दुखी थे कि इन्होंने संथालपरगना में होनेवाले उदघाटन और शिलान्यास कार्यक्रम से स्वयं को अलग कर दिया। लगा कि सरकार अब गयी और तब गयी, पर जैसा कि गुरुजी का आदत है कि वे क्या बोलते है और क्या करते है उन्हें खुद मालूम नहीं होता। उन्होंने आनन फानन में कोर कमेटी और पता नहीं क्या – क्या झामुमो की बैठक बुला दी और हुआ वहीं यानी ढाक के तीन पात। सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है, वो सरकार और सरकार के मुखिया से नाराज नहीं है। ये बयान दे डाला। जब सरकार अच्छा ही काम कर रही थी तो उन्होंने अर्जुन मुंडा को पत्र ही क्यूं लिखा कि वे सरकार के काम काज से दुखी हैं या संथाल परगना के उद्घाटन और शिलान्यास कार्यक्रम से खुद को अलग क्यूं कर लिया। यानी ये जनता को बेवकूफ समझते है, ये समझते है कि वे गुरु जी है और झारखंड के नागरिक उनके चेले। जैसा कहेंगे वैसा समझ लेंगे, पर उन्हें ये मालूम नहीं कि उनकी इस गंदी राजनीति को जनता बहुत अच्छे ढंग से समझती है। यहां की जनता जानती हैं कि जो नरसिम्हा राव की सरकार, रिश्वत लेकर बचा सकते है, उस पर भरोसा कभी किया ही नहीं जा सकता और न ही जनता गुरुजी पर विश्वास करती है।

Monday, March 14, 2011

तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा..................!


जी हां। तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा। कुछ ऐसी ही सोच है, झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का। जोड़ – तोड़, सांठ – गांठ, तिकड़मबाजी में महारत हासिल, भाजपा के इस नेता ने झारखंड की सत्ता संभालने के बाद अपनी छवि जनता के बीच ठीक जाये, इसके लिए, इन्होंने अपने आवास पर 12 मार्च 2011 को मीडियाकर्मियों को भोज पर आमंत्रित किया, और उनसे गुफ्तगू की। इस गुफ्तगू में रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के गण्यमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया। सभी पहुंचे भी। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री ने भोज पर आमंत्रित किया था। ऐसे भी जब दिल्ली में प्रधानमंत्री, दिल्ली के पत्रकारों को अपने आवास पर भोज में आमंत्रित करें तो भला किस पत्रकार की लार नहीं टपकेगी। ठीक उसी प्रकार, मुख्यमंत्री आवास से जैसे ही भोज का आमंत्रण मिला। रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार पहुंच गये। जिनका मुख्य मकसद मुख्यमंत्री की चाटुकारिता करना, उनके सम्मान में स्वयं को समर्पित कर देना और इसके बदले सरकारी विज्ञापन प्राप्त करना, मुंहमांगी उपहार प्राप्त करना, पैरवी कर अपने लोगों को धन्य – धन्य करा देना, होता हैं, पर इसके उलट इस भोज में कुछ ऐसे भी एक दो पत्रकार पहुंचे थे, जिनका इन सबसे कोई भी लेना देना नहीं होता, जब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास पर पत्रकारों के हाल देखे तो भौचक्के रह गये, क्योंकि ये वे पत्रकार थे जिनके जेहन में केवल पत्रकारिता और सिर्फ पत्रकारिता ही होती है।
मुख्यमंत्री आवास पर मुख्यमंत्री के साथ पत्रकारों ने चर्चाएं भी की। पत्रकारों ने कुछ मांगे भी मुख्यमंत्री के सामने रखी। मुख्यमंत्री ने भी दिल खोलकर बातें की --- पत्रकारों के हाल, उनके सम्मान, फैलोशिप, जो अच्छे समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित करेगा, उन्हें सरकार सम्मानित करेगी, धन उपलब्ध करायेगी। पता नहीं क्या – क्या बातों का दौर चला। मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे पत्रकार खुश, क्योंकि अब जो जितनी चाटुकारिता करेगा, उसे उतना ही लाभ मिलेगा। पत्रकारों को खुशी का ठिकाना नहीं था। अब रेवड़ियां केवल एक को नहीं, बल्कि सबको मिलेगी। फिर भी कुछ को चिंता थी कि ये कैसे हो सकता है। जिसे मुख्यमंत्री पहले से ही रेवड़ियां देते आये हैं, क्या इस प्रकार की शुरुआत से उन्हें तकलीफ नहीं होगी। क्योंकि वे तो चाहते ही हैं कि मुख्यमंत्री रेवड़ियां सिर्फ उन्हें ही दे, ऐसे भी मुख्यमंत्री, उन्हें रेवड़ियां देने में सबसे ज्यादा आगे रहते है, क्यूं रहते है, ये तो मुख्यमंत्री ही बेहतर बता सकते है।
मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये भोज में कुछ ऐसे तथाकथित पत्रकार भी पहुंचे थे, जिनका मुख्यमंत्री आवास पर आना जाना बराबर होता हैं, जो इनके सामने साष्टांग दंडवत् किये हुए रहते है और मुख्यमंत्री भी बड़ी उदारता से उन्हें लाखों के विज्ञापन और उपहार देकर, उपकृत करते रहते हैं, यहीं नहीं, मुख्यमंत्री को भी खुद उनके साथ बैठना और बातें करते रहना अच्छा लगता हैं, ऐसे भी अपनी बड़ाई सुनना किसे अच्छा नहीं लगता। जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी बड़ाई सुनने में आनन्द प्राप्त होता है, तो ये तो झारखंड के मुख्यमंत्री है। पर जनता जानती हैं कि दोनों के कामकाज में आकाश जमीन का फर्क हैं। एक ने अपने काम काज से, अखबारों में सुर्खियां बटोरी, आवश्यकतानुसार विज्ञापन दिये, तो दूसरे ने काम काज पर कम और अपनी छवि जनता के बीच बेहतर दिखे, इसके लिए पत्रकारों को विज्ञापन और उपहार के लॉलीपॉप का लालच दिखाया, और पत्रकार भी इस लॉलीपॉप के आगे उछलते कूदते नजर आये।
ऐसे में झारखंड की जनता के पास मरने के सिवा दूसरा क्या रास्ता बचा हैं। जहां का शासक अपनी छवि बेहतर दीखे, उसके लिए पत्रकारों को मुंहमांगी धन व उपहार देकर, उनकी मुंह बंद करना चाहता हैं और पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के आगे अपनी मुंह बंद करने के लिए करवद्ध हो, खड़ा रहता हैं, साष्टांग दंडवत् करता हैं, उस राज्य का भगवान ही मालिक है।
जिस प्रकार से मुख्यमंत्री आवास में पत्रकारों के लिए भोज आयोजित किये जाते है, और जिस प्रकार से पत्रकार उन भोजों पर टूटते हैं, उसे देखकर कोई भी सामान्य व्यक्ति लज्जित हो जाता हैं कि ये आदमी हैं या कुछ और.......!
कभी – कभी तो मैंने खुद देखा हैं कि मुख्यमंत्री आवास अथवा अन्य जगहों पर जिन पत्रकारों को भोज पर आमंत्रित नहीं किया जाता, जो सिर्फ समाचार संकलन के लिए जाते है, वे भी बिना किसी आग्रह के भोजन व उपहार पर टूट पड़ते हैं, जो बताता हैं कि यहां किस प्रकार की पत्रकारिता चल रही है और जब पत्रकार खुद बिकने को तैयार है तो शासक वर्ग को खरीदने में क्या दिक्कत, वो अपना काम कर रहा है।

Sunday, December 19, 2010

सौ दिन अर्जुन मुंडा सरकार के

अर्जुन मुंडा सरकार ने आज सौ दिन पूरे कर लिये। सचमुच बधाई स्वीकार करें, अर्जुन मुंडा जी, क्योंकि आपने सौ दिन पूरे कर लिये, पर क्या आप बता सकते हैं, कि आपने इन सौ दिनों में कौन ऐसा काम कर लिये। जिससे आम जनता के मन में ये विश्वास जगें कि ये सरकार सचमुच में उनके लिए कुछ काम कर रही हैं अथवा आप पर विश्वास कर सकें कि आपके छत्र छाया में उनका जीवन आनन्दित बीतेगा। आप से जब पत्रकार पूछते हैं कि मुंडा जी, इन सौ दिनों में आप अपनी पांच उपलब्धियां बतायें, तो आपका बयान आता हैं कि आप काम करने में विश्वास करते हैं न कि उपलब्धियां गिनाने में। गर आप काम करने में विश्वास रखते हैं तो लगे हाथों अपने काम करने का विश्वास भी तो हमें दिलाये। जिस विश्वास की आप बात करते हैं, वो तो कहीं दिखता नहीं। हमें तो लगता हैं कि आपकी उपलब्धियां न के बराबर हैं, क्योंकि न तो आपके पास झारखंड को आगे बढ़ाने का प्लान हैं और न ही विजन। बस चलते जा रहे हैं, कहां चलना हैं, क्यों चलना हैं, किसलिए चलना हैं, झारखंड को कहां ले जाना हैं, इसका भान न तो आपको हैं और न हीं यहां की जनता को हो पाया हैं कि आप उन्हें अथवा झारखंड को कहां ले जाना चाहते हैं। आपके सौ दिनों के शासनकाल में जो घटनाएं घटी हैं, वो बताता हैं कि सरकार के काम करने के तरीके और लक्षण ठीक नहीं हैं।
जरा गौर फरमाईये -----------------------------------------------
• आप ही के पार्टी के सिमडेगा विधानसभा अंतर्गत पिथरा पंचायत अध्यक्ष मदन साहू गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं, पर उसकी सूध लेनेवाला कोई नहीं होता हैं, न तो आपकी सरकार और न ही आप।
• जमशेदपुर जो आपका संसदीय इलाका हैं, वहां की महिला रेवती के साथ एक गुंडा दुष्कर्म करता हैं, फिर उसे जिंदा जलाने का प्रयास करता हैं, कई दिनों तक वो युवती इलाज कराते हुए दम तोड़ देती हैं, उसकी सुध न तो आपकी पुलिस लेती हैं और न ही आप उसे न्याय दिलाने में दिलचस्पी रखते हैं।
• आपही के इलाके की दीपिका के साथ कुछ मनचले छेड़खानी करते हैं, वो आत्महत्या कर लेती हैं, पर दीपिका को मरणोपरांत भी आप न्याय नहीं दिला पाते।
• आपही की राज्य की रुकमिणी के साथ केन्या में यौन शोषण होता हैं, यौन शोषण करनेवाला व्यक्ति गुजरात में बैठा हैं, गर आप चाहते तो मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात कर, उस व्यक्ति को सलाखों के पीछे ढकेल सकते थे, पर आपने अभी तक नरेन्द्र मोदी से बातचीत तक नहीं की, जबकि नरेन्द्र मोदी आप ही के पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं।
• आप जिस राज्य के मुख्यमंत्री हैं, आपका पड़ोसी राज्य हैं बिहार, जिसके कोख से निकला हैं – झारखंड। वहां एक दिन में सरकार बन जाती हैं, ठीक दो दिनों में विधानसभा का सत्र आहूत हो जाता हैं, सरकार ऐसे ऐसे निर्णय लेती हैं कि बिहारवासियों का सर गर्व से उठ जा रहा हैं, लेकिन आप और आपकी सरकार क्या कर रही हैं, आपको एक महीने लग जाते हैं, सरकार गठन करने में और बहाना ढूंढते हैं कि पितृपक्ष चल रहा है। वहां विधानसभा सत्र चल रहा हैं, और आप शीतकालीन सत्र तक नहीं बुला पाते, और इसके लिए भी आपने अच्छा बहाना ढूंढा, ये कह कर कि राज्य में पंचायत चुनाव हो रहे हैं। आप हर गलत काम को, छिपाने के लिए बहाने बनाते हैं और आपका पड़ोसी राज्य हर अच्छे काम को करने के लिए, अनेक प्रकार के बहाने ढूंढ रहा हैं। हैं न कमाल की बात, पर आपको इससे क्या मतलब।
• बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दिल्ली जाने में मन नहीं लगता, पर आपको दिल्ली – रांची, रांची – दिल्ली करने में बहुत मन लगता हैं अब तक आठ बार आप दिल्ली की परिक्रमा लगा चुके हैं।
• यहां आप सरकार चला रहे हैं, मंत्री लोग सरकार चला रहे हैं या राज्य के प्रशासनिक अधिकारी, सरकार चला रहे हैं, लोगों को पता ही नहीं चल पा रहा हैं, सीएनटी एक्ट पर भूमि सुधार एवं राजस्व सचिव के द्वारा, सभी उपायुक्तों को भेजा गया पत्र तो फिलहाल ये ही बता रहा हैं और हमें लगता हैं कि डोमेसाईल आंदोलन के बाद, कहीं ये मामला राज्य का बंटाधार न कर दें, यानी वो कहावत याद हैं न काम धाम कुछ नहीं, गिलास तोड़ा आठ आना।
• एक तरफ बिहार सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए लोकपाल विधेयक को मंजूरी दे रही हैं, अपने विधायकों और मंत्रियों से जल्द अपने संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने को आदेश दे दी हैं। एमएलए फंड पर रोक लगा दी हैं और आप इन सबसे अलग कुछ करने, कुछ निर्णय लेने के बजाय, सीधा कहते हैं कि जो बिहार करें, वो ही हम क्यूं करें। जबकि सर्वाधिक एमएलए फंड इसी प्रांत में हैं और इससे यहां की आम जनता का कितना भला होता हैं और विधायक और उनके परिवार तथा अधिकारी कैसे मालामाल होते हैं, वो किसी से छूपा हैं क्या।
• क्या आपको मालूम नहीं कि जिस बाबा रामदेव को आप की सरकार ने राज्य अतिथि घोषित किया हैं, वो ही झारखंड प्रवास के दौरान, यहीं की सड़कों के बारे में जो टिप्पणी की हैं, वो शर्मनाक हैं।
• भ्रष्टाचार चरम पर है, जो एसपी कोयलांचल के कोलमाफियाओं को नाक में दम कर रखी थी, जिसे धनबाद में ही रखने के लिए, धनबादवासी आंदोलनरत हैं, आप मौके की तलाश में थे उनका स्थानांतरण करने का, और जैसे ही धीरेन्द्र प्रकरण आया, आपने कोलमाफियाओं की मुंहमांगी मुराद पूरी कर दी और उन्हें स्थानांतरण करने का फैसला ले लिया, वह भी तब जब राज्य में पंचायत चुनाव की घोषणा और आचार संहिता लागू था। आखिर ऐसा कर आप क्या संदेश देना चाहते हैं।
• क्या आप बता सकते हैं कि आपकी प्लानिंग क्या हैं, विजन क्या हैं, आपके प्लानिंग और विजन को पूरा करने के लिए, कौन कौन लोग प्रयत्नशील हैं और अब तक उन्होंने इन सौ दिनों में कैसा काम किया हैं।
• इन सौ दिनों में तो हमने देखा कि आप ही के मुख्य सचिव, खुलकर स्वीकारते हैं कि राज्य में सिस्टम फेल हैं, बीडीओ – सीओ आफिस नहीं जाते हैं, इसलिए नक्सलिज्म बढ़ रहा हैं। ऐसे में आम जनता आपसे क्या उम्मीद लगायें।
• स्थिति तो ऐसी हैं कि जिन प्रशासनिक अधिकारियों को आपकी सरकार के द्वारा विभिन्न आरोप लगाकर, दंडित किया गया, फिर उन्हें शीघ्र ही महिमामंडित कर, सेवा कार्य में लगा भी दिया गया। आखिर ये दोहरे मापदंड क्यों, इस प्रकार की हरकतें, क्या साबित करती हैं।
हमारे पास एक नहीं अनेक अकाट्य प्रमाण हैं, पर कितने प्रमाण लिखूं। इतने से गर सरकार की आंखे खूल जाती हैं और सरकार कुछ जनता के हित में ठोस निर्णय लेते हुए, प्लान बना कर, अपने विजन को साकार करती हैं, तो झारखंड का बड़ा ही भला होगा, पर हमें ऐसा दीखता नहीं, क्योंकि झारखंड बर्बादी के कगार पर हैं, और बर्बादी के कगार पर पहुंचाने के बाद, इस सरकार और अन्य नेताओं को अपने बचाव के लिए एक सुंदर, उदाहरण भी मौजूद हैं, वो ये कि यहां की जनता, स्थिर सरकार ही नहीं देती, स्पष्ट जनादेश ही नहीं देती तो ऐसे में झारखंड कैसे आगे बढ़े। जो लोग इस प्रकार का तर्क देते हैं, उनसे हमारा एक ही सवाल हैं कि वे बतायें कि देश में एनडीए और उसके बाद चल रहा यूपीए का शासन क्या एक ही पार्टी का हैं, गर नहीं तो फिर इस प्रदेश का बुरा हाल क्यूं। कृपया झूठ बोलने से ये नेता बाज आये और अपने गिरेबां में झांक कर देंखे। अपनी गलतियों का ठीकरा यहां की भोली भाली जनता पर न फोड़ें, अपनी गलतियों को स्वीकार करना, बहुत बड़ा पुरुषार्थ हैं, इन नेताओं और आज की सरकार को ये बात नहीं भूलना चाहिए।

Sunday, September 19, 2010

इसमें कौन सी नयी बात है...!


अर्जुन मुंडा की नयी सरकार पर आरोप है कि इस सरकार को व्यवसायियों ने अपने फायदे के लिए बनायी है और ये सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायेगी। इस तरह का आरोप तो विधानसभा में ही संभवतः झारखंड विकास मोर्चा विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने लगाया था, जब अर्जुन मुंडा सदन में विश्वास मत प्राप्त कर रहे थे, लेकिन हम आपको बता देना चाहते हैं कि इस तरह की बातें झारखंड का बच्चा बच्चा जानता हैं, कोई इसमें नयी बात नहीं है।
पहली बात, क्या ये पहली बार हुआ हैं कि सरकार बनाने अथवा बचाने के लिए किसी राजनेता द्वारा व्यवसायियों से सहयोग लिया गया हो, ये तो हमेशा से होता रहा हैं और होता रहेगा, क्योंकि हमारे यहां राजनीति अब साधुओं अर्थात् सज्जनों की जमात नहीं करती, ये विशुद्ध राजनीतिबाज हैं जो विपरीत आचरण कर सत्ता हासिल कर स्वयं और अपने अनुयायियों को अनुप्राणित करते रहते हैं, इसके उदाहरण केवल अर्जुन मुंडा नहीं बल्कि कई राजनीतिज्ञ हैं, जिसकी एक लंबी लिस्ट हैं, जिसमें भारत के सभी राजनीतिक दल शामिल हैं।
कल एक राष्ट्रीय चैनल और आज उस राष्ट्रीय चैनल का हवाला देकर रांची से प्रकाशित कई समाचार पत्रों ने इस समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया हैं, ऐसा लगता हैं कि व्यवसायियों से सहयोग लेकर, अर्जुन मुंडा ने अपराध कर डाला हैं। लेकिन अर्जुन ने अपराध किया अथवा नहीं किया, इसका निर्णय कौन करेगा, अखबारवाले और मीडिया के लोग या समय आने पर झारखंड की जनता।
कल तक तो ये ही अखबार व मीडिया वाले अर्जुन की जयजयकार कर रहे थे, अचानक ये सुर कैसे बदल गया। कमाल की बात हैं अजय संचेती भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं, उन्हें आज भाजपा नेता कम और व्यवसायी ज्यादा बताया जाने लगा हैं। लगे हाथों भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रघुवर जो ज्यादातर विवादास्पद मुद्दों पर नो कमेंटस और मीडिया पर आंख भौं तान के निकल जाते हैं उनके मुख से ये कहलवाते हुए दिखाया गया, कि सबसे पहले अजय संचेती का उनके पास फोन आया था कि वे विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दें, बाद में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी का। हो सकता हैं कि रघुवर दास ने खुद को ये संवाद कहने के लिए ड्रामा भी कराये हो, क्योंकि राजनीति में साम दाम दंड भेद सब चलता हैं, ऐसे भी रघुवर दास मन ही मन अर्जुन से खार खाये हुए हैं और फिलहाल झारखंड में रघुवर दास नेतृत्व कर रहे है, केन्द्र के उन विक्षुब्ध नेताओं का जिन्हें फिलहाल गडकरी और अर्जुन मुंडा पसंद नहीं हैं, जो नहीं चाहते कि अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री हो, क्योंकि उनके पसंद का मुख्यमंत्री कोई दूसरा है, जिनकी पकड़ राष्ट्रीय चैनलों में भी मजबूत हैं। वो जो चाहे दिखवा सकते हैं और जो चाहे करवा सकते हैं। लेकिन इसका परिणाम क्या निकलेगा, शायद दो बंदरों और बिल्ली वाली कहानी भाजपा के ये विक्षुब्ध नेता नहीं जानते।
दूसरी बात कल एक राष्ट्रीय चैनल ने दिखाया और आज कुछ अखबारों ने फोटो छापा हैं कि जिन व्यवसायियों ने सरकार बनाने में प्रमुख निभायी, वे शपथ ग्रहण समारोह में अगली पंक्ति में बैठे थे, क्या कोई बता सकता हैं कि किसी के शपथ ग्रहण समारोह में अगली पँक्ति पर कौन बैठता हैं। अगली पंक्ति पर तो वहीं वैठेगा, जो धनवाला अथवा रसूखवाला हो, कोई रिक्शावाले या भिखमंगों को तो कोई बैठायेगा नहीं। मैं मीडियाकर्मियों से ही पूछता हूं कि गर मीडिया से ही किसी को इस दौरान बैठाना रहता तो इस शपथ ग्रहण समारोह में, अग्रिम पंक्ति में चरित्रवान पत्रकार बैठते क्या, कि यहां भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिकों और प्रबंधकों का कब्जा रहता। कोई बता सकता कि आज पत्रकारिता के नाम पर जो राज्यसभा में जा रहे हैं, वे कौन लोग हैं..........................। वे वहीं लोग हैं, जो किसी न किसी प्रकार से विभिन्न राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के टॉप के नेताओं को अपने कलम अथवा कैमरा के माध्यम से उपकृत करते रहते हैं और समय आने पर ब्याज के साथ, वो सब वसूल लेते हैं, जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। क्या ये सही नहीं कि मीडिया में, जो रसूखवाले थे, वे भी अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री पद पर बैठा देखना चाहते थे, मैंने तो अपनी आंखों से देखा कि शपथग्रहण समारोह के दिन ज्यादातर चैनलों के प्रतिनिधि और उनके आका मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के चरणों में बलिहारी जा रहे थे, क्यों बलिहारी जा रहे थे, वे वे ही मीडिया के लोग बेहतर बता सकते हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को बाजार बना दिया है। रही बात झारखंड की तो यहां के विधायकों का इतिहास रहा हैं कोई नयी बात नहीं हैं. चाहे नरसिंह राव सरकार बचाने का मामला हो या परिमल नथवानी या के डी सिंह को राज्यसभा पहुंचाने की बात, ये तो खुलकर, डंके की चोट पर वो सब काम करने को तैयार रहते हैं, जो दूसरे लोग छुप कर करते हैं। और जब अर्जुन मुंडा ने व्यवसायियों के सहयोग से सरकार बना ही ली है तो उस पर छीटाकशी कौन करेगा। वे लोग, चलनी दूसे सूप के जिन्हें बहत्तर छेद। मीडिया पहले अपने गिरेबां में झाक कर देखे और झाविमो के बाबू लाल मरांडी जैसे नेता भी। जिन्होंने इस प्रकरण पर बखूबी बयान दे डाला। क्या बाबू लाल मरांडी बता सकते हैं कि इसी विधानसभा चुनाव में उनके द्वारा उपयोग किये गये उड़नखटोले के पैसे कहां से आये, फिल्म अभिनेत्रियों को कैसे चुनावी सभा में ले जाया गया, विधानसभा चुनाव में मीडिया पर पैसा कैसे पानी की तरह बहाया गया, कूटे में महाधिवेशन के दौरान करोड़ों रुपये कैसे खर्च हो गये, आखिर ये बिना व्यवसायियों के सहयोग से हो गया क्या। गर व्यवसायियों के सहयोग से नहीं हुआ तो जनता को बतायें कि अचानक कहां से उन्हें अलादीन का चिराग प्राप्त हो गया ।

Saturday, September 11, 2010

बधाई महामहिम फारुक साहब को…।


मैं अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ढूंढ रहा हूं, एम ओ एच फारुक साहब को, पर वो मिल नहीं रहे, कल तक उनके नाम स्थानीय अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सुर्खियों में रहता था, पर अब वो दिखाई नहीं दे रहा। लोग कहते हैं कि ये देश ऐसा हैं कि यहां उगते सूर्य को ही नमस्कार किया जाता हैं, पर शायद लोग भूल रहे हैं कि ये देश ऐसा भी हैं कि डूबते सूर्य को सर्वप्रथम अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत प्रारंभ करता हैं, गर किसी को ध्यान नहीं हो, तो जरा कार्तिक शुक्ल रविषष्ठी व्रत जिसे छठ भी कहते हैं, उस ओर अपना ध्यान ले जाये।
चारों ओर जयजयकार हो रही अर्जुन मुंडा की। होनी भी चाहिए क्योंकि इस अर्जुन ने अपने तरकस से निकाल धनुष पर संधान कर ऐसी तीर छोड़ी हैं कि इस तीर से कई दिग्गज घायल हो गये, खुद जिस गुरु शिबू सोरेन ने राजनीतिक शिक्षा दी, वे खुद ही फिलहाल असहाय की स्थिति में हैं, जिस बाबु लाल मरांडी ने अर्जुन को पहली बार सत्ता सौंपी थी, वे सत्ता की चाहत में इधर से उधर भटक रहे हैं, पार्टी बना ली, फिर भी मुख्यमंत्री का पद नहीं मिला, पर जिसने कुछ भी नहीं किया, वो आज सत्ता के शीर्षस्थान पर हैं, कैसे। इस पर विचार करना चाहिए। विचार करना चाहिए, सत्ता की चाहत में बैठे, उन राजनीतिज्ञों को जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने की इच्छा रखते हैं। हम बता देना चाहते हैं कि सत्ता की राजनीति में मुख्यमंत्री पद की लालसा रखना कोई गलत बात नहीं, पर उसके लिए तिकड़म करना गंदी बात हैं। हालांकि बिना तिकड़म के राजनीति में कोई बात बनती ही नहीं। ऐसे भी साम दाम दंड भेद ये शब्द राजनीति के कोख से ही निकले हैं। चलिए झारखंड का बेटा अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बन गया । ये आज का अर्जुन हैं, ये न तो तीर चलाता हैं और न धनुष रखता हैं, पर हां, गोल्फ खेलता हैं, जबकि दोनों में लक्ष्य का निर्धारण और उसे पाना महत्वपूर्ण होता हैं। चुनाव के परिणाम आने के बाद मात्र नौ महीने में इतनी आसानी से अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री इस बार बन जायेंगे, इसका अंदाजा किसी को नहीं था। ऐसे भी इतिहास गवाह हैं कि इस अर्जुन को, सत्ता में आने के लिए कई बार संघर्ष भी करना पड़ा हैं, कभी राज्यपाल की भूमिका ने सत्ता से दूर इसे रखा तो कभी अपनों ने ऐसी तिकड़म लगायी कि इन्हें सत्ता मिलने में देर हो गयी, पर इस बार अर्जुन ने ऐसी जुगत लगायी, मीडिया और कारपोरेट जगत को ऐसा क्लच में लिया कि चारो ओर सिर्फ अर्जुन ही अर्जुन दिखाई पड़ने लगा, फिर क्या था, उधर भाजपा आलाकमान ने भी हरी झंडी दिखा दी, नतीजा सबके सामने हैं।
पर एक बात मैं कहे और लिखे बिना रुक नहीं सकता, जरा सोचिये कि आज एम ओ एच फारुक की जगह सैय्यद सिब्ते रजी या अन्य राज्यपाल होते तो क्या होता किसी ने इस बात का अंदाजा भी लगाया हैं। लोग को छोड़िये सत्ता किसी को मिले अथवा सत्ता न मिले उससे आम जनता की कोई दिलचस्पी नहीं होती पर मीडिया ने क्या किया, मीडिया ने उस शख्स को बधाई दी, अथवा दो शब्दों की उदारता दिखायी जिसने सचमुच में लोकतंत्र की मर्यादा रखी, खासकर ऐसे वक्त में जब चारों ओर लोकतंत्र का चीरहरण हो रहा है। बधाई झारखंड के राज्यपाल एम ओ एच फारुक को, जिन्होंने आज की राजनीति में, एक नया आयाम लिखा हैं, उन्होंने राजनीतिक परिपक्वता ही नहीं बल्कि शुचिता एवं शुद्धता की नयी परिभाषा लिखी हैं। याद करिये, जब इस राज्य में राज्यपाल सैय्यद सिब्ते रजी थे, उन्होंने क्या किया था, ये जानते हुए भी कि अर्जुन को बहुमत हैं, उन्होंने सत्ता से दूर रखकर उस वक्त शिबू को मुख्यमंत्री बनाने का न्यौता दे डाला था, पर एम ओ एच फारुक साहब को देखिये, जैसे ही अर्जुन मुंडा ने बहुमत जुटाई, बहुमत को राज्यपाल के समक्ष रखा। एम ओ एच फारुक ने तुरंत निर्णय लिया, राष्ट्रपति शासन हटवाने के लिए गृहमंत्री को अनुशंसा किया, ये ही नहीं जो उन्होंने राज्यहित में कुछ निर्णय ले रखे थे, उन्हें रोका, और नये सरकार पर फैसले छोड़ दिये। जल्द ही अर्जुन मुंडा को सत्ता भी सौंप दी। आज के युग में ऐसी मिसाल कहां मिलती हैं। बधाई हो एम ओ एच फारुक साहब। आपने एक नयी मिसाल कायम की हैं। राजनीति करनेवालों और राजनीति में रुचि रखनेवालों को आपने एक सबक दी हैं, आशा की जानी चाहिए कि लोग आपसे सबक सीखेंगे, हालांकि ये सच हैं कि मीडिया और कारपोरेट जगत जो अर्जुन मुंडा को सत्ता सौंपने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहा था, आपके इस उदार चरित पर ध्यान देना उचित नहीं समझा, पर झारखंड में इमानदारी से राजनीति करनेवालों को आपका ध्यान हमेशा रहेगा।
आज के युग में सत्ता किसे अच्छी नहीं लगती, आप भी औरों की तरह तिकड़म लगा सकते थे, और कुछ दिन झेल सकते थे, विधानसभा को भंग करने की सिफारिश कर सकते थे, क्योंकि झारखंड विकास मोर्चा के कई नेता तो कह ही रहे थे, कि विधानसभा भंग कर दी जाये, पर आपने ऐसा नहीं किया, विधानसभा को निलंबित ही रहने दिया पर जैसे ही अर्जुन ने बहुमत का जुगाड़ किया आपने बिना किसी इफ-बट के वो फैसले लिये, जिस फैसले की आशा तो इतनी आसानी से न तो भाजपा को थी और न तो अर्जुन मुंडा को, मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मैं पत्रकार हुं और मुझे इसका अच्छी तरह अनुमान हैं। पर यहां की मीडिया जो अर्जुन के बयार में आपके इस उदार चरित को भूल गयी, एक शब्द भी आपके बारे में लिखना उचित नहीं समझा। ये देख व जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, फिर भी, आपको मेरी ओर से महामहिम फारुक साहब आपको कोटिशः बधाई। आशा हैं आप अपनी इस प्रकार की उदारता से राजनीति में और भी मिसाल कायम करते रहेंगे। ऐसे भी आपने बहुत कम ही समय में, जो राष्ट्रपति शासन के दौरान जो झारखंड हित में निर्णय लिये हैं, उसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। सूखा झेल रहे, झारखंड और भ्रष्टाचार को रोकने में जो आपने मह्तवपूर्ण फैसले लिए, उसका पालन आनेवाली सरकार करेंगी, इसका मुझे उतना भरोसा नहीं और न ही आम जनता को हैं।