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Monday, March 14, 2011

तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा..................!


जी हां। तुम मेरी आरती उतारो, मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा। कुछ ऐसी ही सोच है, झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का। जोड़ – तोड़, सांठ – गांठ, तिकड़मबाजी में महारत हासिल, भाजपा के इस नेता ने झारखंड की सत्ता संभालने के बाद अपनी छवि जनता के बीच ठीक जाये, इसके लिए, इन्होंने अपने आवास पर 12 मार्च 2011 को मीडियाकर्मियों को भोज पर आमंत्रित किया, और उनसे गुफ्तगू की। इस गुफ्तगू में रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के गण्यमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया। सभी पहुंचे भी। क्योंकि राज्य के मुख्यमंत्री ने भोज पर आमंत्रित किया था। ऐसे भी जब दिल्ली में प्रधानमंत्री, दिल्ली के पत्रकारों को अपने आवास पर भोज में आमंत्रित करें तो भला किस पत्रकार की लार नहीं टपकेगी। ठीक उसी प्रकार, मुख्यमंत्री आवास से जैसे ही भोज का आमंत्रण मिला। रांची के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार पहुंच गये। जिनका मुख्य मकसद मुख्यमंत्री की चाटुकारिता करना, उनके सम्मान में स्वयं को समर्पित कर देना और इसके बदले सरकारी विज्ञापन प्राप्त करना, मुंहमांगी उपहार प्राप्त करना, पैरवी कर अपने लोगों को धन्य – धन्य करा देना, होता हैं, पर इसके उलट इस भोज में कुछ ऐसे भी एक दो पत्रकार पहुंचे थे, जिनका इन सबसे कोई भी लेना देना नहीं होता, जब उन्होंने मुख्यमंत्री आवास पर पत्रकारों के हाल देखे तो भौचक्के रह गये, क्योंकि ये वे पत्रकार थे जिनके जेहन में केवल पत्रकारिता और सिर्फ पत्रकारिता ही होती है।
मुख्यमंत्री आवास पर मुख्यमंत्री के साथ पत्रकारों ने चर्चाएं भी की। पत्रकारों ने कुछ मांगे भी मुख्यमंत्री के सामने रखी। मुख्यमंत्री ने भी दिल खोलकर बातें की --- पत्रकारों के हाल, उनके सम्मान, फैलोशिप, जो अच्छे समाचार प्रसारित अथवा प्रकाशित करेगा, उन्हें सरकार सम्मानित करेगी, धन उपलब्ध करायेगी। पता नहीं क्या – क्या बातों का दौर चला। मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे पत्रकार खुश, क्योंकि अब जो जितनी चाटुकारिता करेगा, उसे उतना ही लाभ मिलेगा। पत्रकारों को खुशी का ठिकाना नहीं था। अब रेवड़ियां केवल एक को नहीं, बल्कि सबको मिलेगी। फिर भी कुछ को चिंता थी कि ये कैसे हो सकता है। जिसे मुख्यमंत्री पहले से ही रेवड़ियां देते आये हैं, क्या इस प्रकार की शुरुआत से उन्हें तकलीफ नहीं होगी। क्योंकि वे तो चाहते ही हैं कि मुख्यमंत्री रेवड़ियां सिर्फ उन्हें ही दे, ऐसे भी मुख्यमंत्री, उन्हें रेवड़ियां देने में सबसे ज्यादा आगे रहते है, क्यूं रहते है, ये तो मुख्यमंत्री ही बेहतर बता सकते है।
मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये भोज में कुछ ऐसे तथाकथित पत्रकार भी पहुंचे थे, जिनका मुख्यमंत्री आवास पर आना जाना बराबर होता हैं, जो इनके सामने साष्टांग दंडवत् किये हुए रहते है और मुख्यमंत्री भी बड़ी उदारता से उन्हें लाखों के विज्ञापन और उपहार देकर, उपकृत करते रहते हैं, यहीं नहीं, मुख्यमंत्री को भी खुद उनके साथ बैठना और बातें करते रहना अच्छा लगता हैं, ऐसे भी अपनी बड़ाई सुनना किसे अच्छा नहीं लगता। जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपनी बड़ाई सुनने में आनन्द प्राप्त होता है, तो ये तो झारखंड के मुख्यमंत्री है। पर जनता जानती हैं कि दोनों के कामकाज में आकाश जमीन का फर्क हैं। एक ने अपने काम काज से, अखबारों में सुर्खियां बटोरी, आवश्यकतानुसार विज्ञापन दिये, तो दूसरे ने काम काज पर कम और अपनी छवि जनता के बीच बेहतर दिखे, इसके लिए पत्रकारों को विज्ञापन और उपहार के लॉलीपॉप का लालच दिखाया, और पत्रकार भी इस लॉलीपॉप के आगे उछलते कूदते नजर आये।
ऐसे में झारखंड की जनता के पास मरने के सिवा दूसरा क्या रास्ता बचा हैं। जहां का शासक अपनी छवि बेहतर दीखे, उसके लिए पत्रकारों को मुंहमांगी धन व उपहार देकर, उनकी मुंह बंद करना चाहता हैं और पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के आगे अपनी मुंह बंद करने के लिए करवद्ध हो, खड़ा रहता हैं, साष्टांग दंडवत् करता हैं, उस राज्य का भगवान ही मालिक है।
जिस प्रकार से मुख्यमंत्री आवास में पत्रकारों के लिए भोज आयोजित किये जाते है, और जिस प्रकार से पत्रकार उन भोजों पर टूटते हैं, उसे देखकर कोई भी सामान्य व्यक्ति लज्जित हो जाता हैं कि ये आदमी हैं या कुछ और.......!
कभी – कभी तो मैंने खुद देखा हैं कि मुख्यमंत्री आवास अथवा अन्य जगहों पर जिन पत्रकारों को भोज पर आमंत्रित नहीं किया जाता, जो सिर्फ समाचार संकलन के लिए जाते है, वे भी बिना किसी आग्रह के भोजन व उपहार पर टूट पड़ते हैं, जो बताता हैं कि यहां किस प्रकार की पत्रकारिता चल रही है और जब पत्रकार खुद बिकने को तैयार है तो शासक वर्ग को खरीदने में क्या दिक्कत, वो अपना काम कर रहा है।