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Monday, November 5, 2012

इन बेशर्म पत्रकारों को तनिक लज्जा नहीं आती............................

आज सुबह सुबह मैंने सारे समाचार पत्रों को खंगाला हैं। सभी समाचार पत्रों ने नीतीश की स्तुतिगान की हैं। स्तुतिगान करना आवश्यक भी था, क्योंकि अब विज्ञापन नहीं छपते हैं। विज्ञापन के बदले, ऐसे समाचार छाप दिये जाते हैं, जो विज्ञापन का ही काम करता हैं और उसके बदले, उसकी एक बड़ी राशि समाचार से प्रभावित होनेवाले व्यक्ति अथवा संस्थानों से ले लिेये जाते हैं। ऐसा देश के सभी समाचार पत्र कर रहे हैं, इसलिए राष्ट्रीय से लेकर, क्षेत्रीय समाचार पत्रों ने भी वहीं किया, जिसका मैंने पूर्व में आकलन किया था। इसके पहले, इस तरह का काम, सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय टीवी चैनल कल कर चुके हैं। 
आज सुबह - सुबह करीब सारे राष्ट्रीय चैनल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को फांसी पर लटकाने के लिए बेताब दीखे, लगे हाथों भाजपा के चिरप्रतिद्वंदी कांग्रेस पार्टी की ओर से भाजपा अध्यक्ष नितिन के खिलाफ बयान भी आ गया, जिसे इन चैनलों द्वारा दिखाया और सुनाया भी जा रहा हैं। हद हो गयी, इसे लेकर विशेष समाचार प्रसारित शुरु कर दिये गये हैं। समाचार क्या हैं, जरा आप ही पढ़िये और विचार कीजिये। भोपाल के एक कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने एक बयान दिया कि विवेकानंद और दाउद के आईक्यू एक ही थे, पर एक ने उस आईक्यू द्वारा देश और विश्व को नयी दिशा दी तो दूसरे ने विध्वंसात्मक कार्य कर मानवता का अहित किया। अब आप ही बताये, इसमें गलत क्या हैं। आज भी हम राम और रावण, कृष्ण और कंस का तुलनात्मक विवरण अपने बच्चों को नहीं देते हैं क्या और इस विवरण के द्वारा, हम बच्चों में ये प्रेरणा नहीं भरते हैं क्या, कि तुम्हें राम बनना हैं, तुम्हें कृष्ण बनना हैं, तुम्हें विवेकानन्द जैसा बनना हैं, जिससे हमारा समाज और हमारा राष्ट्र गौरवान्वित हो। ऐसा हम जब करते हैं तो फिर नितिन गडकरी के खिलाफ हाय तौबा क्यों। ये तो वहीं बात हुई, बेसिरपैर के बाल का खाल निकालना। गर राष्ट्रीय चैनल के पत्रकारों को कोई बात नहीं समझ आती या वे पागल हो गये हो तो इसमें नितिन गडकरी को हलाल करने की आवश्यकता क्यों। इन्हें खुद आगरा अथवा रांची के मनःचिकित्सा अस्पतालों में जाकर शरण लेनी चाहिए।
इन दिनों देश का सर्वाधिक नुकसान तथाकथित पत्रकारों द्वारा हो रहा हैं। ये सभी कांग्रेसभक्त बनकर, देश की अस्मिता व इसके वैभवशाली इतिहास पर कुठाराघात कर रहे हैं और इसके बदले वे कांग्रेस से उपकृत होते जा रहे हैं। हमारे पास कई सबूत हैं, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि अब तक इन मीडिया हाउस के मालिकों और पत्रकारों ने क्या किया हैं। कोई इस प्रकार के समाचारों को प्रसारित व प्रकाशित कर प्रधानमंत्री का प्रेस सलाहकार बन जाता हैं तो कोई राज्यसभा के सांसद के रुप में उपकृत होता हैं, कोई इसी के आड़ में अपना व्यवसाय चलाता हैं तो कोई अपने बेटे - बेटियों और संगे संबंधियों को सरकारी अथवा कारपोरेट जगत में लाखों - करोंड़ों के पैकेज पर नौकरी दिलवाता हैं। ऐसे में इन पत्रकारों द्वारा प्रकाशित अथवा प्रसारित खबरों पर अपना मन बनाना, देश के साथ खिलवाड़ करने के सिवा कुछ नहीं। इसलिए सभी देशवासियों को चाहिए, कि ऐसे पत्रकारों से अपनी दूरियां बनाये और इनके द्वारा प्रकाशित और प्रसारित समाचारों के प्रति कड़ा प्रतिवाद करें, ऐसा माहौल बनाये, कि इनके कुकर्मों से देश को बचाया जा सकें। क्योंकि परमाणु बम से भी ज्यादा खतरनाक, इनके विचार हैं। परमाणु बम से केवल एक खास इलाका प्रभावित होता हैं, पर इनके  खतरनाक विचार, पूरे भारत को निगलने के लिए तैयार हैं। ऐसे भी इन घटियास्तर के पत्रकारों की सोच पर अंकुश लगाने के लिए संविधान में कुछ भी नहीं हैं, ये स्वयं को देश के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताकर देश की जनता को दिग्भ्रमित भी कर रहे हैं। इसलिए सावधान हो, और इन घटियास्तर के चैनलों व पत्रकारों को अपने वैचारिक जागरुकता से पराजित करने के लिेए, मिलकर एक ऐसा कदम उठाये, कि ये सारे पत्रकार भारत की जनता से थर्रा उठे।

Saturday, December 4, 2010

संघ, भाजपा और गडकरी के बेटे की शादी...!


संघ का एक गीत है --------------
"देश के लिये जीये,
समाज के लिये जीये,
ये धड़कनें, ये श्वास हो,
पुण्यभूमि के लिए, जन्मभूमि के लिए..............."
पर ये गीत, संघ और संघ का एक राजनीतिक संगठन भाजपा से जूड़ें कुछ धनाढ्य लोगों, अंधकूप में रहनेवालों, केवल खुद के लिए जीनेवालों पर लागू नहीं होता, ये लागू होता हैं, उन अंसख्य स्वयंसेवकों पर जो लाठी और गणवेश में खुद को, इस गीत पर झूमा रहे होते हैं और भ्रम में जीने को विवश होते हैं। ये कैसे होता हैं। उसका बानगी देखने को मिला -- झारखंड की राजधानी रांची से प्रकाशित एक समाचार पत्र प्रभात खबर में। इस अखबार ने 03 दिसम्बर को बड़ी ही संजीदगी से प्रथम पृष्ठ पर दो समाचारों को एक साथ स्थान दिया और जनता को सोचने और समझने पर विवश कर दिया कि जनता जाने कि जो भाजपा और संघ उसके समक्ष दिखाई पड़ रहा हैं, सचमुच उसका चरित्र हैं या उसने अपना चरित्र खो दिया हैं। सचमुच प्रभात खबर को, हृदय से बधाई, ऐसे समाचार प्रकाशित करने के लिए। ऐसे भी, इस प्रकार की खबरें, प्रभात खबर में ही दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि बाकी अखबारों में तो इस प्रकार की खबरों को स्थान मिलना, असंभव सा दिखता हैं।
आखिर इस अखबार ने क्या छाप दिया.......................
इस अखबार ने छापा हैं कि झारखंड के शहर सिमडेगा के पिथरा पंचायत के भाजपा अध्यक्ष मदन साहू ने गरीबी से तंग आकर गुरुवार यानी 2 दिसम्बर को आत्महत्या कर ली, जबकि दूसरी ओर इसी तारीख को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने नागपुर में अपने बेटे निखिल की शादी में 60 करोड़ खर्च कर दिये।
अखबार ने आगे लिखा हैं कि केवल एक करोड़ तो नितिन ने निमंत्रण पत्र पर खर्च कर डालें, बेटे निखिल को नौ करोड़ का बंगला और बीएमडब्लयू भी दिया। दो दिनों तक तीन लाख लोगों के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की व्यवस्था, 300 तरह के व्यंजन, रिसेप्शन में चार्टड प्लेन से मेहमानों की आने की व्यवस्था, मेहमानों के लिए 22 विशेष उड़ानों की व्यवस्था आदि कर डाली। और इधर गरीबी का शिकार पिथरा पंचायत के भाजपा अध्यक्ष मदन साहू की हालत देखिये टमाटर की खेती में उसे नुकसान उठाना पड़ा, मदन साहू अपने बच्चों और पत्नी का बोझ उठाने में असमर्थ, एक डिसिमल जमीन तक नहीं, बटाई पर खेती करके, अपने परिवार का भरण पोषण करता था, टमाटर की दर घटने से हुए भारी घाटे ने उसका जीवन बर्बाद कर दिया था, बेटी के इलाज के लिए उसके पास पैसे नहीं थे, लाल कार्ड से उसका नाम तक काट दिया गया था, बेचारा इस हालात से तंग आकर अपनी जिंदगी ही समाप्त कर डाली।
कमाल देखिये, ये अखबार आज प्रमुखता से इस समाचार को प्रकाशित किया हैं, पर भाजपा के बड़े नेता, खासकर झारखंड की राजनीति करनेवाले संघ और उसके लोग, तथा भाजपाई, उस दिवंगत मदन साहू के घर तक जाने की हिमाकत नहीं की, और चल पड़े नितिन गडकरी के नागपुर स्थित आवास, जहां दो दिनों तक चलेगी, नितिन के बेटे निखिल की रिसेप्सन पार्टी। हम आपको बता दें कि जिस नितिन के घर ये झारखंडी नेता व मंत्री सलाम बजाने गये हैं, वो नितिन इन नेताओं को शायद ही भाव देगा। फिर भी, सभी ने नागपुर का दौरा करना, ज्यादा उचित समझा।
यानी इधर गयी जान और उधर शादी आलीशान और वो भी उस पार्टी में, जो कहती हैं कि भाजपा के साथ चले, रामराज्य की ओर चले। उस पार्टी में जहां राम, सुराज, सुशासन की बात कुछ ज्यादा ही कहीं जाती है, अरे जो पार्टी अपने पंचायत अध्यक्ष की मौत की जिम्मेवारी न लें, जो पार्टी अपने पंचायत अध्यक्ष की मौत का समाचार सुनने के बाद उसके परिवार तक का सुध न लें, वो पार्टी आम जनता के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा क्या करेगी।
इधर हमने देखा हैं कि कुछ राजनीतिज्ञों के द्वारा अपने बेटे बेटियों की शादी के अवसर पर फिजूलखर्ची करना, दिखावे करने का फैशन जगा हैं, खासकर उस देश में जहां गरीबी से तंग आकर, किसानों और सामान्य लोगों का समूह हमेशा आत्महत्या कर रहा होता हैं। इसमें लालू प्रसाद, झारखंड के ही एक पूर्व मंत्री कमलेश सिंह का नाम हमारे बिहार झारखंड में ज्यादा चला हैं, पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने सबको पीछे छोड़ दिया, शायद लालू को चुनौती भी दे दी हो, कि लालू जी आप क्या खर्च करोगे, जो हमने कर दिया। सचमुच नितिन गडकरी जी, आप महान हैं, आप ऐसा ही कर सकते हैं, आप से इससे ज्यादा कुछ आशा भी नहीं की जा सकती, पर ये भी जान लीजिए, कि आप ही की पार्टी की तरह एक राष्ट्रीय पार्टी हैं, जिसका नाम हैं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस। जिसकी अध्यक्ष हैं सोनिया गांधी। जिन्होंने अपनी बेटी प्रियंका की बिल्कुल सामान्य ढंग से सादगी के साथ शादी संपन्न करायी। ये पूरा देश जानता हैं। ऐसे भी भारत का एक संदेश है --------- सादा जीवन, उच्च विचार। पर आप जैसे लोगों को इस भारतीय संस्कृति का यह सुंदर संदेश दिमाग में नहीं घूसेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक राजनीतिक संगठन भाजपा कहती हैं कि उसकी पार्टी पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के कथन पर चलनेवाली पार्टी हैं, पर भाजपा के बड़े नेता बताये कि जो चरित्र इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दिखायी हैं, क्या वो चरित्र दीन दयाल उपाध्याय के कथन से मेल खाता है। गर मेल नहीं खाता, तो आनेवाले चुनावों में यहां की जनता भाजपा को क्यों वोट दें। संघ को राष्ट्रवादी संगठन क्यों माने।
संघ ये बतायें और भाजपा भी, कि जिस देश में करोड़ों लोग भूख और गरीबी से तंग आकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हो, ठीक उसी तरह जैसे भाजपा के पंचायत अध्यक्ष ने आत्महत्या कर जीवन लीला समाप्त कर ली। यहीं नहीं जिस प्रांत से नितिन गडकरी आते हैं, उसी प्रांत में कई किसानों ने आत्महत्या की हैं। उसी देश में एक सार्वजनिक जीवन जीनेवाला व्यक्ति को इस प्रकार के समारोह आयोजित करना शोभा देता हैं। भ्रष्टाचार और चरित्र को लेकर हाय तौबा मचानेवाली, भाजपा खासकर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में संसद को जो चलने नहीं दे रही हैं, वो खुद बतायें कि कर्नाटक और झारखंड में उसके लोग क्या कर रहे हैं। अरे भाजपाईयों शर्म करना सीखों, पर तुम्हें शर्म आयेगी। इस पर हमें संदेह हैं, क्योंकि शर्म तो उन्हें आती हैं, जिनका चरित्र होता हैं। पर भाजपाईयों और संघ के लोगों ने तो अब चरित्र, तेल लेने भेज दिये हैं।

Sunday, September 19, 2010

इसमें कौन सी नयी बात है...!


अर्जुन मुंडा की नयी सरकार पर आरोप है कि इस सरकार को व्यवसायियों ने अपने फायदे के लिए बनायी है और ये सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायेगी। इस तरह का आरोप तो विधानसभा में ही संभवतः झारखंड विकास मोर्चा विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने लगाया था, जब अर्जुन मुंडा सदन में विश्वास मत प्राप्त कर रहे थे, लेकिन हम आपको बता देना चाहते हैं कि इस तरह की बातें झारखंड का बच्चा बच्चा जानता हैं, कोई इसमें नयी बात नहीं है।
पहली बात, क्या ये पहली बार हुआ हैं कि सरकार बनाने अथवा बचाने के लिए किसी राजनेता द्वारा व्यवसायियों से सहयोग लिया गया हो, ये तो हमेशा से होता रहा हैं और होता रहेगा, क्योंकि हमारे यहां राजनीति अब साधुओं अर्थात् सज्जनों की जमात नहीं करती, ये विशुद्ध राजनीतिबाज हैं जो विपरीत आचरण कर सत्ता हासिल कर स्वयं और अपने अनुयायियों को अनुप्राणित करते रहते हैं, इसके उदाहरण केवल अर्जुन मुंडा नहीं बल्कि कई राजनीतिज्ञ हैं, जिसकी एक लंबी लिस्ट हैं, जिसमें भारत के सभी राजनीतिक दल शामिल हैं।
कल एक राष्ट्रीय चैनल और आज उस राष्ट्रीय चैनल का हवाला देकर रांची से प्रकाशित कई समाचार पत्रों ने इस समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया हैं, ऐसा लगता हैं कि व्यवसायियों से सहयोग लेकर, अर्जुन मुंडा ने अपराध कर डाला हैं। लेकिन अर्जुन ने अपराध किया अथवा नहीं किया, इसका निर्णय कौन करेगा, अखबारवाले और मीडिया के लोग या समय आने पर झारखंड की जनता।
कल तक तो ये ही अखबार व मीडिया वाले अर्जुन की जयजयकार कर रहे थे, अचानक ये सुर कैसे बदल गया। कमाल की बात हैं अजय संचेती भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं, उन्हें आज भाजपा नेता कम और व्यवसायी ज्यादा बताया जाने लगा हैं। लगे हाथों भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रघुवर जो ज्यादातर विवादास्पद मुद्दों पर नो कमेंटस और मीडिया पर आंख भौं तान के निकल जाते हैं उनके मुख से ये कहलवाते हुए दिखाया गया, कि सबसे पहले अजय संचेती का उनके पास फोन आया था कि वे विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दें, बाद में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी का। हो सकता हैं कि रघुवर दास ने खुद को ये संवाद कहने के लिए ड्रामा भी कराये हो, क्योंकि राजनीति में साम दाम दंड भेद सब चलता हैं, ऐसे भी रघुवर दास मन ही मन अर्जुन से खार खाये हुए हैं और फिलहाल झारखंड में रघुवर दास नेतृत्व कर रहे है, केन्द्र के उन विक्षुब्ध नेताओं का जिन्हें फिलहाल गडकरी और अर्जुन मुंडा पसंद नहीं हैं, जो नहीं चाहते कि अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री हो, क्योंकि उनके पसंद का मुख्यमंत्री कोई दूसरा है, जिनकी पकड़ राष्ट्रीय चैनलों में भी मजबूत हैं। वो जो चाहे दिखवा सकते हैं और जो चाहे करवा सकते हैं। लेकिन इसका परिणाम क्या निकलेगा, शायद दो बंदरों और बिल्ली वाली कहानी भाजपा के ये विक्षुब्ध नेता नहीं जानते।
दूसरी बात कल एक राष्ट्रीय चैनल ने दिखाया और आज कुछ अखबारों ने फोटो छापा हैं कि जिन व्यवसायियों ने सरकार बनाने में प्रमुख निभायी, वे शपथ ग्रहण समारोह में अगली पंक्ति में बैठे थे, क्या कोई बता सकता हैं कि किसी के शपथ ग्रहण समारोह में अगली पँक्ति पर कौन बैठता हैं। अगली पंक्ति पर तो वहीं वैठेगा, जो धनवाला अथवा रसूखवाला हो, कोई रिक्शावाले या भिखमंगों को तो कोई बैठायेगा नहीं। मैं मीडियाकर्मियों से ही पूछता हूं कि गर मीडिया से ही किसी को इस दौरान बैठाना रहता तो इस शपथ ग्रहण समारोह में, अग्रिम पंक्ति में चरित्रवान पत्रकार बैठते क्या, कि यहां भी प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिकों और प्रबंधकों का कब्जा रहता। कोई बता सकता कि आज पत्रकारिता के नाम पर जो राज्यसभा में जा रहे हैं, वे कौन लोग हैं..........................। वे वहीं लोग हैं, जो किसी न किसी प्रकार से विभिन्न राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के टॉप के नेताओं को अपने कलम अथवा कैमरा के माध्यम से उपकृत करते रहते हैं और समय आने पर ब्याज के साथ, वो सब वसूल लेते हैं, जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती। क्या ये सही नहीं कि मीडिया में, जो रसूखवाले थे, वे भी अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री पद पर बैठा देखना चाहते थे, मैंने तो अपनी आंखों से देखा कि शपथग्रहण समारोह के दिन ज्यादातर चैनलों के प्रतिनिधि और उनके आका मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के चरणों में बलिहारी जा रहे थे, क्यों बलिहारी जा रहे थे, वे वे ही मीडिया के लोग बेहतर बता सकते हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को बाजार बना दिया है। रही बात झारखंड की तो यहां के विधायकों का इतिहास रहा हैं कोई नयी बात नहीं हैं. चाहे नरसिंह राव सरकार बचाने का मामला हो या परिमल नथवानी या के डी सिंह को राज्यसभा पहुंचाने की बात, ये तो खुलकर, डंके की चोट पर वो सब काम करने को तैयार रहते हैं, जो दूसरे लोग छुप कर करते हैं। और जब अर्जुन मुंडा ने व्यवसायियों के सहयोग से सरकार बना ही ली है तो उस पर छीटाकशी कौन करेगा। वे लोग, चलनी दूसे सूप के जिन्हें बहत्तर छेद। मीडिया पहले अपने गिरेबां में झाक कर देखे और झाविमो के बाबू लाल मरांडी जैसे नेता भी। जिन्होंने इस प्रकरण पर बखूबी बयान दे डाला। क्या बाबू लाल मरांडी बता सकते हैं कि इसी विधानसभा चुनाव में उनके द्वारा उपयोग किये गये उड़नखटोले के पैसे कहां से आये, फिल्म अभिनेत्रियों को कैसे चुनावी सभा में ले जाया गया, विधानसभा चुनाव में मीडिया पर पैसा कैसे पानी की तरह बहाया गया, कूटे में महाधिवेशन के दौरान करोड़ों रुपये कैसे खर्च हो गये, आखिर ये बिना व्यवसायियों के सहयोग से हो गया क्या। गर व्यवसायियों के सहयोग से नहीं हुआ तो जनता को बतायें कि अचानक कहां से उन्हें अलादीन का चिराग प्राप्त हो गया ।