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Monday, April 10, 2017

मोदी और नीतीश से अपील..............

मोदी और नीतीश से अपील...
प्रभात खबर को साधुवाद...
सचमुच चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने के अवसर पर प्रभात खबर ने जो दो पृष्ठों का विशेष परिशिष्ट, वह भी मुख्य पृष्ठ पर दिया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। ऐसे अवसरों पर देश व राज्यों के बच्चों को यह बताना कि आज का दिन कितना महत्वपूर्ण है, इसकी जिम्मेवारी लेना बहुत बड़ी बात है। अच्छा होता कि देश व राज्य के सभी अखबार चंपारण सत्याग्रह के महत्व को समझते, पर ऐसा संभव नहीं हुआ है। हम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी अनुरोध करेंगे कि चूंकि चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का टर्निंग प्वाइंट है, इसलिए इसे सामान्य समझने का भूल न करें और इस समय का देशहित में सही फायदा उठाये, क्योंकि सच्चाई यह है कि चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे हो जाने के बाद भी नई पीढ़ी को यह पता ही नहीं कि चंपारण सत्याग्रह का स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका रही है? जबकि इतिहासकार और स्वतंत्रता सेनानियों का दल स्वीकार करता है कि गांधी को गांधी बनाने में चंपारण की भूमिका प्रमुख रही। यहीं कारण रहा कि सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रिचर्ड एटनबरो ने भी अपनी फिल्म गांधी में इसका खुबसुरती से चित्रण किया है।
अतः भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अनुरोध है कि वे अपने-अपने स्तर पर देश व राज्य के विभिन्न स्कूलों व कॉलेजों में चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने के अवसर पर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी अवश्य दिखाये, हो सके तो एक बार फिर दूरदर्शन पर इस फिल्म को पुनः दिखाया जाय, साथ ही गांधी के जीवनवृत्त, जिसमें चंपारण सत्याग्रह का विशेष जिक्र हो, इसकी एक लघु पत्रिका बनवाकर, जन-जन तक पहुंचाये जाये, ताकि लोग गांधी और चंपारण सत्याग्रह को आज के परिपेक्ष्य में कम से कम भूल न पायें...
यह समय की मांग भी है, क्योंकि वर्तमान में गांधी को भूलना, चंपारण को भूलना देश और बिहार दोनों के लिए आत्मघाती होगा।
#narendramodi #nitishkumar

Saturday, March 11, 2017

यह चुनाव परिणाम सबक है, सभी नेताओं, पत्रकारों और ब्रांडिंग कंपनियों के लिए..........

आखिर जनता क्या चाहती है?
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की है, ऐसी जीत हासिल की है, कि ऐसी जीत रामलहर में भी नहीं हुई थी। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड पर शानदार कब्जा जमाया, तो जिस मणिपुर में उसके एक भी सदस्य विधानसभा में नहीं थे, वहां पर सत्ता की प्रबल दावेदार के रूप में उभर कर सामने आयी, गोवा में हालांकि उसे झटका जरुर लगा है, पंजाब में उसकी सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल सत्ता से बाहर हो गयी। इस चुनाव परिणाम के द्वारा उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड की जनता ने नेताओं की ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियों और उन पत्रकारों को भी खबरदार किया है, जो राज्यसभा जाने के लिए किसी भी पार्टी के लिए आजकल प्रवक्ता के रूप में स्वयं को चैनल के समक्ष प्रस्तुत कर रहे है। ये वे पत्रकार है, जिनका जनता से कोई सरोकार नहीं होता, बल्कि अपने मालिकों के द्वारा दी गयी चैंबर में एक समाचार पत्र या चैनल के प्रबंधक सह निदेशक के रुप में कार्य करते है। जरा एक उदाहरण देखिये...
एक पत्रकार ने सोशल साइट में स्वयं को खुलकर बसपा के प्रवक्ता के रूप में पेश किया, वे खूब बसपा, हाथी और मायावती के एजेंट के रूप में पेश आये और भाजपा नेता एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जमकर गरियाया। जब वे अपने सोशल साइट पर मायावती का चुनाव प्रचार कर रहे थे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गरिया रहे थे, उसी वक्त उनके समर्थक और पत्रकारिता जगत के मूर्धन्य लोग तथा वामपंथियों का समूह उनके पक्ष में खुलकर उनके प्रति समर्थन जूटा रहा था, पर आज इनकी स्थिति क्या है? सामान्य सा उत्तर – हास्यास्पद। अरे भाई जब हम पत्रकार है, तो हमें किसी खूंटे से बंधे होने की क्या जरुरत? जो सही है, उसे डंके की चोट पर लिखेंगे, बोलेंगे और करेंगे भी।
जरा देखिये, उक्त पत्रकार ने नौ मार्च को सोशल साइट पर क्या लिखा...
बहन जी के द्वार पर, भइ संतन की भीड़
मोटू लाला चंदन घिसै, तिलक देत श्रमवीर
इस दोहे के आधार पर उसने मोटू लाला को नरेन्द्र मोदी और अमित शाह करार दिया, जबकि श्रमवीर कहकर मायावती समर्थकों को मान बढ़ाया।
इसी पत्रकार ने नौ मार्च को ही लिखा...
रन अप टू अप रिजल्ट लेट्स अस रिकॉल बिहार
यानी उक्त पत्रकार ने कह दिया कि ११ मार्च को आनेवाला पांच प्रांतों का चुनाव परिणाम खासकर उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम, बिहार के चुनाव परिणाम की याद दिला सकते हैं।
और आज वहीं पत्रकार उत्तर प्रदेश के आये चुनाव परिणाम के बाद मायावती के बारे में लिख डाला कि अब...
मायावती का क्या होगा?
यानी आज उत्तर प्रदेश की जनता द्वारा दिये गये चुनाव परिणाम को भी वह स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा है, ये स्थिति है आज के पत्रकारों की...
जब पत्रकार बसपाई हो जाये
जब पत्रकार भाजपाई हो जाये
जब पत्रकार सपाई हो जाये
जब पत्रकार वामपंथी हो जाये
तो उससे सर्वाधिक नुकसान उस राज्य व देश को होता है, जहां वह पत्रकार रह रहा होता है, अरे कोई जीते, कोई हारे। हमें उससे क्या? हमें तो यह देखना है कि क्या जनता का हित सध रहा है, अगर जनता का हित सध रहा है तो ठीक है, अगर नहीं हित सधा तो हम सरकार किसी का हो, उसकी बैंड बजायेंगे। ऐसा नहीं कि हम हाथी, कमल, हाथ, साइकिल, तीर-धनुष, तीर, लालटेन आदि की सेवा में स्वयं को लगा देंगे और उसके बदले स्वयं को उपकृत करेंगे।
जिस दिन उत्तर प्रदेश का अंतिम चरण का मतदान समाप्त हुआ। उस दिन एक न्यूज चैनल ने अपने परिचर्चा में कई पत्रकारों को बुलाया, जो किसी न किसी पार्टी से जुड़े थे और उसकी प्रशंसा में स्वयं को आत्मानुरागी की तरह पेश कर रहे थे, जो बता रहा था कि आजकल के ये पत्रकार कितने गिर चुके है। हमें तो लगता है कि उन्हें स्वयं इस पर परिचर्चा करनी चाहिए कि आखिर वे कितने गिर सकते है, क्या उन्होंने अब ये ठान लिया है कि वे पत्रकारिता करते-करते बुढ़ापे की ओर कदम बढ़ाते ही, किसी दल की चाटुकारिता या नौकरी करेंगे और उसके बदले राज्यसभा जायेंगे, गर ऐसा है तो वे देश और समाज के सबसे बड़े दुश्मन है, हमें इनसे ज्यादा सावधान होना पड़ेगा, साथ ही देश व समाज को इनसे रक्षा के लिए कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे, क्योंकि निः संदेह इनसे देश को खतरा उत्पन्न हो गया है।
और अब ब्रांडिंग का दुकान चलानेवालों को भी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के चुनाव परिणाम ने एक करारा संदेश दिया है, संदेश उन नेताओं को भी दिया जो इन ब्रांडिंग का दुकान चलानेवालों के बल पर सत्ता का स्वाद चखने का मन बना चुके थे। अरे यार, काठ की हांडी एक बार चढ़ती है, बार-बार नहीं। बिहार में आप कमाल दिखा दिये तो इसका मतलब ये नहीं कि यूपी की जनता भी इस चक्कर में आ जायेगी। ऐसा नहीं है कि बिहार की जनता ने प्रशांत किशोर के कहने पर वोट जाकर डाल आयी थी। बिहार की सच्चाई यह थी कि लोकसभा के चुनाव परिणाम के बाद ही नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को पटखनी देने के लिए एक रणनीति बनाई, जातिगत सामाजिक समीकरण को उभारा, मुस्लिम, यादव और कुर्मी तथा अन्य पिछड़ी जातियों को गोलबंद किया और परिणाम सामने आ गया। लालू और नीतीश की जोड़ी मोदी पर भारी पड़ गयी। इसमें प्रशांत किशोर की बाजीगरी कहा थी? और जब ये बाजीगरी थी भी तो फिर ये कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सत्ता में क्यों नहीं ले आयी? उलटे राहुल गांधी की खटिया कैसे खड़ी हो गयी?
यहीं नहीं झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को भी इस चुनाव परिणाम से सबक लेनी चाहिए, जो वे ब्रांडिंग के नाम पर बेतहाशा पैसे खर्च कर रहे है, जरा पूछिये कि उन्हीं के राज्य में इवाई जिसे वे अपनी ब्रांडिंग के लिए रखा है, वहीं इवाई उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को सत्ता में क्यों नहीं ले आयी? अभी भी वक्त है, रघुवर दास जी समझ जाइये, क्योंकि किसी भी नेता को लोकप्रिय या अलोकप्रिय उसकी हरकतें, उसके काम-काज और जनता के प्रति उसकी संवेदनशीलता ही कराती है, न कि ब्रांडिंग करानेवाली कंपनियां।
इधर, हम स्वीकार करते हैं कि आज के चुनाव परिणाम से बसपा और कांग्रेस- सपा को बेहद निराशा हुई होगी, पर इसका मतलब ये नहीं कि वे मन में निराशा का भाव रखकर सब कुछ भाजपा के हाथों छोड़ दे। आज गर जनता इनसे नाराज हुई है, तो कल जनता इनके साथ भी हो सकती है, क्योंकि जनता तो जनता है, वह किसी की जागीर नहीं होती, जो बेहतर होगा, उनके पास जैसा विकल्प होगा, वह चुन लेगी, फिलहाल जनता को लगा कि भाजपा उसका बेहतर विकल्प है, इस बार भाजपा को सत्ता सौंपी है। याद करिये उत्तरप्रदेश में इसके पूर्व सपा और उसके पूर्व बसपा को इसी जनता ने सत्ता सौंपा था, इसलिए इस जनादेश को सबको सम्मान करना चाहिए, निराशा में आकर जनता का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं, न तो उन पत्रकारों को जो अपने गले में किसी विशेष पार्टी या दल का मंगलसूत्र धारण कर राज्यसभा जाने का ललक रखते हो अथवा वे लोग जो किसी न किसी पार्टी से जुड़े है।
बधाई भाजपा को, कि उसने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में बड़ी जीत दर्ज की। मणिपुर में अच्छी स्थिति दर्ज की। गोवा में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जबकि पंजाब में उसे करारी हार देखने को मिली। हम चाहेंगे कि वे इस सफलता, इस जीत को सामान्य रुप में लेते हुए, ज्यादा जोश न दिखाये, सीधे जनता से किये वायदे को पूरा करने में अपना समय व्यतीत करें, क्योंकि जनता, तो जनता है, वह किसी की नहीं होती, और नहीं वह किसी खूंटे में रहना पसंद करती है। उसका उदाहरण देखना है तो बिहार के लालू प्रसाद को ही देख लीजिये, बहुत घमंड किया करते थे, पर आज क्या है? बिहार में अकेले बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता का रसास्वादन और जनता की सेवा करने का विशेषाधिकार नीतीश को प्राप्त है। इसलिये विपक्षी दल जनता की सेवा को प्रमुख साधन बनाये और पत्रकार सत्ता से चिपकने की जगह जनहित में पत्रकारिता कर, समाज को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये।

Tuesday, November 22, 2016

सचमुच देश बदल रहा है.................

सचमुच देश बदल रहा है...
जो अंधे है, वे देख रहे है...
जो बहरे है, वे सुन रहे है...
जो गूंगे है, वे बोल रहे है...
जो लंगड़े है, वे दौड़ रहे है...
जिनके पास कल तक पैसे नहीं थे...
वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए बैंकों की लाइन को कम नहीं होने दे रहे...
जिनके घर में कल तक शादी नहीं थी, वे शादी का कार्ड छपवा रहे है...
जो कल तक तत्काल टिकट के लिए लाइन में लगा करते थे, वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए दिमाग लगाकर पैसे बटोर रहे है...
जो कल तक खड़े नहीं हो रहे थे, वे घंटो बैंक की लाइन में, एटीएम की लाइन में खड़े होकर मुस्कुरा रहे है...
जो कल तक बीमार ही नहीॆं होते थे, आज वे बीमार भी पड़ रहे है...
भारत में इन दिनों चाहे मौत की वजह कुछ भी क्यों न हो, पर सब आजकल नोटबंदी से ही मर रहे है...
एनडीटीवी, आजतक के चैनलों के संवाददाताओं की फौज को उनके मनपसंद बाइट नहीं मिल रहे, उलटे जनता ही उन्हें निशाने पर ले रही है...
नीतीश नोटबंदी के साथ, तो लालू को मोदी की यह आइडिया फर्जिकल स्ट्राइक लग रही है...
बेइमान आईएएस और आईपीएस की टोलियों के चेहरे मुरझा रहे है...
कुछ तो एक-दो दिन की छुट्टियां लेकर, रूपयों को ठिकाने में लगे है...
दो हजारिये से नीचे बात नहीं करनेवाले डाक्टरों का दल, एक अखबार को बुलवाकर, अपना बयान छपवा रहे है...
कल तक लाल बहादुर शास्त्री के एक इशारे पर, एक बयान पर एक दिन का उपवास करनेवाली भारत की जनता में से आज कुछ देश के वर्तमान प्रधानमंत्री को एक दिन भी देने को तैयार नहीं है...
सीमा पर सैनिक मरें, पर हम देश के भीतर भी अच्छे कार्यों के लिए किसी को एक मौका देने को तैयार नहीं है...
कल तक एक दूसरे को आपस में ही देखनेवाले नेताओं का दल, वर्तमान में एक ही सुर में मोदी के खिलाफ झकझूमर गा रहे है...
सचमुच देश बदल रहा है...

Thursday, September 29, 2016

थाली में छेद..........

क्या होता है थाली में छेद?
आम तौर पर अगर किसी व्यक्ति को आप कहे कि वो तो जिस थाली में खाता है, उसी थाली में छेद करता है, बस देखिये जिसके बारे में कहा गया, वह व्यक्ति ये वाक्य बोलनेवाले व्यक्ति का किस प्रकार मुंह नोच लेता है, अगर मुंह नोचने की ताकत नहीं तो फिर उससे वह वो बदला लेगा, जिससे ये वाक्य बोलनेवाले की नानी – दादी याद आ जायेगी।
आम तौर पर इस लोकोक्ति का प्रयोग सर्वाधिक हो रहा है, खासकर तब, जब किसी को नीचा दिखाने की जरुरत हो। सर्वाधिक इस लोकोक्ति का प्रयोग वे लोग करते है, जो अपना जमीर बेच चुके होते है, भले ही उसका कारण कुछ भी हो।
आजकल बहुत सारे पत्रकारों का समूह अपना जमीर बेचकर विभिन्न संस्थानों में कार्य कर रहा है और अपने संस्थान के मालिक अथवा संपादकों के इशारे पर वह कुकृत्य कर रहा है, जिसकी इजाजत उसका जमीर भी नहीं देता, पर दूसरों को उल्लू बनाने के लिए वह इस डायलॉग का प्रयोग खुब करता है कि वह जिस थाली में खाता है, उस थाली में छेद नहीं करता, यानी उसके कुकृत्यों से देश का भले ही नुकसान हो जाये, या यो कहें कि देश की थाली में भले ही छेद हो जाये, पर उस संस्थान या मालिक की थाली में छेद नहीं होना चाहिए, जिसने देश का नुकसान करने का बीड़ा उठा लिया है।
जरा देखिये, एक से एक नमूने है...
पटना में एक संवाददाता है, खूब नीतीश की परिक्रमा करता है, उसे नीतीश में खुदा नजर आता है, कभी – कभी उसके सपने में नीतीश तीर लेकर राम के रुप में भी आ जाते है, इसलिए नीतीश के खिलाफ वो सुनना ही नहीं चाहता और चूंकि अब लालू भी नीतीश के साथ हो गये तो वह लालू को हनुमान के रुप में हृदय में धारण किये है, ये अलग बात है कि इनके कुकृत्यों से बिहार का जो नुकसान होना है, वो हो ही रहा है, पर चूंकि वह जिस संस्थान में काम करता है उसका मालिक स्वयं नीतीश की पार्टी से विधायक बना हुआ है, इसलिए वह लालू और नीतीश के बारे में कुछ सुनना ही नहीं चाहता, पर मोदी के खिलाफ विषवमन करने की बात हो तो देखिये वह अपने मालिक को खुश करने के लिए हद से भी गुजर जाता है। अब ऐसे लोगों से क्या बात करनी।
कल ही की बात है उक्त सज्जन को एक व्यक्ति ने उसे आइना देखाने की कोशिश की, तो उसका जवाब था कि झारखंड सरकार के पैसे पर अपना काम चलाने वाले लोग अगर नैतिकता की दुहाई दें तो यह शर्म की बात है?
हमारा उत्तर - क्या झारखण्ड सरकार में काम करना और उस काम का पैसे लेना अनैतिक है?
हम बताते है कि अनैतिक क्या है? झारखण्ड सरकार के आगे विज्ञापन के लिए नाक रगड़ना और उस विज्ञापन के पैसे से अपना पेट चलाना और उसके बाद अपना जमीर गिरवी रख देना, यह अनैतिक है। जो आजकल सभी कर रहे है। हमारे पास एक नहीं कई उदाहरण है। बिहार में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार थे। उन्होंने ईटीवी पर ऐसा जादू डाला कि रात्रि के नौ बजे के समाचार में 18 मिनट नीतीश का ही समाचार येन केन प्रकारेन चलता रहा और भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की खबर तेल लेने चली गयी। ये कुछ उदाहरण है और मैं फिर ताल ठोंक कर कहता हूं कि बिहार में कई चैनल या अखबार है, पत्रकार है, जो नीतीश और लालू के दरबारी है। और अब हम आपको बताते है कि अनैतिक क्या है?
क. जमीर बेचना अनैतिक है।
ख. जमीर बेचकर अपने मालिक और संस्थानों के लिए सिर्फ जीना और इसकी आड़ में देश को नुकसान पहुंचाना अनैतिक है।
ग. अपने गिरेबां में नहीं झांकना और दूसरों पर झूठा आरोप लगाना अनैतिक है।
घ. कोई भी व्यक्ति कहीं भी काम कर सकता है, चाहे वह सरकारी सेवा में रहे या निजी संस्थाओं में, ध्यान यह रहे कि वह कहीं भी काम कर रहा है, पर अपना जमीर तो नहीं बेच रहा। अगर जमीर बेच दिया, देश को नुकसान किया, एकतरफा सोच रखा तो अनैतिक है।
ङ. हां, हर बात में अपने मालिक की हां में हां मिलानेवाला, देश का सबसे बड़ा शत्रु और अनैतिक है, क्योंकि वह सही मायनों में देश की थाली में छेद कर रहा है, जिससे अंततः उसका भी नुकसान होता है, क्योंकि वह देश से अलग नहीं है।

Thursday, August 13, 2015

नीतीश का डीएनए करे पुकार...............

नीतीश का डीएनए करे पुकार
बबुआ नीतीश अब जइब हार
पहले दिया लालू को झटका
बाद में दिया भाजपा को अटका
लगे हाथ मांझी को पटका
फिर दिया चारा लालू को डाल
बबूआ नीतीश अब जइब हार
जंगल राज का देख रहा सपना
गंदगी - मैला से ढक दिया पटना
न कोई नीति न हैं सिद्धांत
बबुआ नीतीश अब जइब हार
राबड़ी खुश हो, देख रही सपना
घूटना टेक, नीतीश हुआ अपना
एमएलए बनेगा, पुतर हमार
बबुआ नीतीश अब जइब हार
तीर- लालेटन मे होड़ मची है
भ्रम पाल, सब लगी हुई है
जनता पटखनी देने को तैयार
बबुआ नीतीश अब जइब हार

Sunday, March 2, 2014

नीतीश के साथ अधिकारियों ने भी थाली पीटी, किया बिहार बंद और केन्द्र से कहा मेरी थाली में भीख दे दो.........

शनिवार की सायं सात बजे....सीएम आवास पर नीतीश अपने मंत्रिमंडल और राज्य के वरीय अधिकारियों के साथ थाली पीट रहे थे...इस थाली पीटने की आवाज को, वो दिल्ली तक पहुंचाना चाहते थे पर शायद उन्हें मालूम नहीं कि उनकी थाली पीटने की आवाज पटना की गलियों तक भी नहीं पहुंच पायी........। ये बाते मैं इसलिए लिख रहा हूं कि इनके प्रदेश कार्यालय में जहां थाली पीटी जा रही थी...वहीं के कई जेडीयू कार्यकर्ताओं को पता नहीं था कि ये थाली पीटी क्यूं जा रहीं हैं। हांलांकि नीतीश ने पूरे बिहारवासियों से थाली पीटने की गुजारिश की थी...पर ये थाली पीटने का कार्यक्रम जेडीयू का कार्यक्रम बन कर रह गया....बिहार की जनता की भागीदारी न के बराबर रही.....। याद करिये वो जमाना....जब पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भारत की जनता से अपील की थी और उस अपील को भारतीय जनता ने स्वीकार किया और उसके अनुरुप कार्य भी किया.....। पर नीतीश की ये अपील को बिहार की जनता ने पूरी तरह नकार दिया......। आज नीतीश ने सत्याग्रह की घोषणा के साथ - साथ बिहार बंद का ऐलान किया था. अपने बयान में ये भी कहा था कि उनके कार्यकर्ता सड़कों पर उतरेंगे पर जोर - जबर्दस्ती नहीं करेंगे.....पर उनके कार्यकर्ताओं ने किस प्रकार की गुंडागर्दी की..आगजनी की...किसी से छूपा नहीं हैं....। नीतीश के बंद को सफल बनाने के लिए तो पुलिसकर्मी भी आतुर दीखे....कई जगहों पर पुलिसकर्मियों ने खुद ही रस्सा बांध दिया...ताकि सड़कों पर आवागमन बाधित हो जाय। मैं नीतीश से अपील करुंगा...कि ऐसे पुलिसकर्मियों को वे महिमामंडित करें, पुलिस पदक दिलाये क्योंकि इन्होंने जेडीयू धर्म का पालन किया हैं......। नीतीश का बिहार बंद हैं....पर आम जनता कहीं नहीं दिख रही.... इनके पैसों से कुकुरमुत्ते की तरह उगे कार्यकर्ता सड़कों पर कुछ जगह दीखे और टायर जलाया....नीतीश जिंदाबाद के नारे लगाये और गायब हो गये.......। आम जनता कहीं इनके बंद में शामिल नहीं दिखी....। कहने को तो नीतीश और नीतीश भक्त पत्रकार ये भी कहेंगे कि बिहार बंद सफल रहा.......क्योंकि आज स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय, केन्द्र सरकार के कार्यालय, राज्य सरकार के कार्यालय, व्यापारिक प्रतिष्ठान, बैंक आदि सभी बंद रहे पर ये नहीं कहेंगे कि आज रविवार भी हैं.....क्योंकि बेशर्मों को भी शर्म होती हैं क्या.............. कमाल है, जब बिहार का बंटवारा हुआ था तब राबड़ी ने भी बिहार को विशेष दर्जा देने की मांग की थी...तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बिहार को विशेष दर्जा देने को तैयार भीॉ थे पर खुद नीतीश अड़ंगा डालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी...ये बात सभी जानते हैं पर आज सीमांध्र और तेलंगाना दो राज्य अस्तित्व में आये हैं और केन्द्र ने सीमांध्र को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया तो ये इस मुद्दे को बिहार के विशेष राज्य के मुद्दे से जोड़कर देखना और दिखाना चाह रहे हैं....यानी कड़वा - कड़वा थू - थू और मीठा - मीठा चप - चप। नीतीश को ये नहीं भूलना चाहिए कि त्रेतायुग में रावण था..जिसको बहुत घमंड था, क्योंकि उसे लगता था कि उसका साम्राज्य सुर और असुर लोकों मेंं हैं, कौन हैं जो उससे भयभीत नहीं हैं...पर उसका भी घमंड ज्यादा दिनों तक नहीं रहा.....। यहीं नहीं एक समय इसी बिहार में लालू यादव को भी घमंड हो गया था....आज लालू की क्या स्थिति हैं वो किसी से छुपा नहीं हैं....ऐसे भी जब सत्ता में कोई आता हैं तो उस पर सत्ता का नशा कुछ ज्यादा ही छा जाता हैं और इसी नशे में वो हर प्रकार की हरकतें करता हैं, जिसकी इजाजत धर्म नहीं देता...नीतीश अभी उसी सत्ता के नशे में चूर हैं....बस अब ज्यादा देर नहीं...उनका नशा जल्द ही उतरनेवाला हैं....क्योकि लोकसभा का चुनाव सर पर हैं और बिहार की जनता नीतीश को सबक सिखाने के लिए बस मौके का इंतजार कर रही हैं....फिर क्या...नीतीश का घमंड स्वाहा...उसका बड़बोलापन स्वाहा...........

Wednesday, November 6, 2013

लो, अब लताजी भी सांप्रदायिक हो गयीं.............

लो कर लो बात, अब विश्व की सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर जी भी सांप्रदायिक हो गयी, क्योंकि उनकी दिली ख्वाहिश है कि नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने और ये उद्गार उन्होंने अपने एक निजी कार्यक्रम में व्यक्त कर दिया। उन्होंने ऐसा बयान देकर, भाजपा के घुर विरोधियों की नींद उड़ा दी है। जो सोते जागते एक ही सपना देखते हैं कि कैसे नरेन्द्र मोदी का अहित हो। नरेन्द्र मोदी का अहित चाहनेवालों में केवल राजनीतिक पार्टियां ही नहीं, देश के वे कांग्रेस व नीतीश भक्त राष्ट्रीय चैनलों के पत्रकार और मालिक भी हैं, जिन्हें नरेन्द्र मोदी फूटी आंख भी नहीं सुहाते। बस इन्हें मौका मिलना चाहिए, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मीन-मेख निकालने की। फिर क्या सारा काम-काज छोड़कर, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मीन-मेख निकालने लगेंगे, भद्दी-भद्दी गालियां देंगे, कीचड़ उछालेंगे, विष-वमन करेंगे और उसके बाद भी, इनकी हरकतों पर आम जनता पर कोई असर, अगर नहीं पड़ा तो जनता को ही कटघरे में खड़ें कर देंगे और कहेंगे कि भारत की जनता तो एकदम खत्म हैं। इधर इन राजनीतिज्ञों और कांग्रेस – नीतीश भक्त पत्रकारों का एक ही सूत्री कार्यक्रम हैं – वो कार्यक्रम है सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी का विरोध करना। अभी कई चैनलों के मालिक और पत्रकार विधवा प्रलाप करने में लगे हैं, ये कहते हुए कि हाय, लताजी आप तो बहुत अच्छी थी, आपको तो हम भी बहुत मानते थे, पर आपने ये क्या कह दिया, आखिर क्यों आप नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनवाने पर तूली हैं, गर आप नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का इरादा रखती भी हैं, तो आपने इस इरादे को क्यों व्यक्त किया, अपने मन की बात, मन में ही रखती। अब हम कर ही क्या सकते हैं, हमारी तो आदत हैं, नरेन्द्र मोदी को गाली देने की और उन्हे भी गाली देने की जो नरेन्द्र मोदी के पक्ष में बयान देते हैं, इसलिए अब हम आपको भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए बयानवीर नेताओं के बयानों के आधार पर हम आप में भी मीन-मेख निकालेंगे, आपको भी नहीं छोड़ेंगे, जहां तक ताकत होगा, कांग्रेस भक्त और नीतीश भक्त पत्रकार और नेता, आपके खिलाफ भी विषवमन करने से बाज नहीं आयेंगे। ये अलग बात हैं कि इस विषवमन अभियान से आपका अहित होता हैं या नहीं होता, पर आपके खिलाफ हम अभियान शुरु कर चुके हैं और आज से आप भी सांप्रदायिक हो गयी, क्योंकि आप भी नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही हैं, जिसका विरोध हम जन्म-जन्मातंर से कर रहे हैं। हमारे पास एक से एक उदाहरण है। एक राष्ट्रीय चैनल के पत्रकार का विधवा प्रलाप देखिए। हाल ही में नरेन्द्र मोदी बिहार आये, पटना ब्लास्ट में प्रभावित परिवारों से मिलने गये। मीडिया से बाद में उन्होंने बातचीत की, पर जब इस राष्ट्रीय चैनल के पत्रकार के किसी प्रश्नों का जवाब नरेन्द्र मोदी ने नहीं दिया, तो वह दोपहर में अपने एंकर के सवालों का जवाब न देकर, वो नरेन्द्र मोदी को ही भला-बुरा कहने लगा और अपनी बातों को सही करने के लिए कपिल सिब्बल तक का सहारा ले लिया, ऐसे हैं पटना के ये मठाधीश पत्रकार और ऐसा ही इनका चैनल। आजकल इस चैनल को नीतीश में केवल गुण ही गुण नजर आ रहे हैं और सारे दुर्गुण उसे नरेन्द्र मोदी में ही नजर आते हैं। इस चैनल की सायं और रात की विशेष बुलेटिन में नीतीश का गुणगान देखा जा सकता हैं, पर नीतीश की कुटिल मुस्कान और उसके द्वारा अपने विरोधियों के प्रति अभद्र भाषा का किया गया प्रयोग, इसे सुनायी नहीं देता, शायद उस राष्ट्रीय चैनल के प्रबंधक, या पटना में रह रहा उसका संवाददाता या एंकर बहरा हो जाता होगा, जब कुटिलता से लवरेज नीतीश, अपने विरोधियों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे होते हैं। धन्यवाद दूंगा, आजतक व जी मीडिया को, जिसने सही को सही रखने का प्रयास किया। शायद यहीं कारण हैं कि इन दोनों चैनलों ने देश में अपनी साख पूर्व की तरह बरकरार रखी हैं, पर जरा उस वामपंथी विचारधारावाले निकम्मों, पत्रकारों और उसके प्रबंधकों को देखिये। जबसे लता जी ने नरेन्द्र मोदी के पक्ष में, वे प्रधानमंत्री के रुप में दीखे – बयान दिया। जदयू के एक नेता के सी त्यागी, कांग्रेस के राजीव शुक्ला, सपा और पता नहीं दीमक की तरह देश में कितनी पार्टियों के नेता हैं, जो कभी नगरपालिका के वार्ड आयुक्त का चुनाव तक नहीं जीत सकते, लता जी के खिलाफ अनाप-शनाप बयान दे डाला। जिसकी जितनी निंदा की जाय कम है। यहीं नहीं इन नेताओं ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी। ये अपनी अभिव्यक्ति के लिए तो एडी-चोटी एक कर देते हैं, पर लता मंगेशकर जैसी महान गायिका के प्रति घटिया स्तर के शब्दों का प्रयोग करने से नहीं चूकते। बयान देखिये इन घटियास्तर के नेताओं का – सुरसाम्राज्ञी को सलाह देते हैं कि वे राजनीति से दूर रहे। कमाल हैं देश को रसातल में ले जानेवाले ये नेता और इनकी पार्टी राजनीति में रहे, पर देश को मान-सम्मान बढ़ानेवाली लताजी राजनीति से दूर रहे। वो अपनी भावनाओं को भी अभिव्यक्त नहीं करें। ये घटियास्तर के नेता, जिनकी औकात नहीं कि वे जहां रहते हो, वहां ही रह रहे किसी चरित्रवान व्यक्ति की आंखों में आंख डालकर बात कर सकें। ये लता जी को राजनीति का एबीसीडी सीखाने चल पड़े और देखिये इन पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्षों को जो इन सड़क-छाप नेताओं के खिलाफ एक्शन भी नहीं लेते कि वे लता जी के खिलाफ क्यूं इस प्रकार का वक्तव्य दे रहे हैं। यानी धर्मनिरपेक्षता का सारा ठेका, इन्होंने ही ले रखा हैं, बाकी सभी सांप्रदायिक हो गये। लानत हैं, इन नेताओं और घटियास्तर के उन पत्रकारों को, जो घटियास्तर का सोच रखते हैं और लताजी जैसी महान गायिका पर कीचड़ उछालने से नहीं चूकते। ऐसे भी कीचड़ उछालने वाले और कर ही क्या सकते हैं। जिन्होंने देश में महंगाई, भ्रष्टाचार और अपने हित में दंगा करवाकर देश को नरक बना डाला हो, उनसे हम उम्मीद ही क्या कर सकते हैं। लताजी आप, आप हैं, आप ने अपनी गीतों से कभी देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरुजी को रुलाया हैं। आपने देश ही नहीं बल्कि विश्व में रहनेवाले करोड़ों – करोड़ भारतीयों का मान बढ़ाया हैं। भारतीय सैनिकों के मनोबल बढाने के लिए आपने क्या नहीं किया। कभी मां, तो कभी बहन, तो कभी बेटी, पता नहीं कितने रिश्तों को आपने गीतों में जीया हैं, आप देश की शान हैं, आप भारत रत्न हैं, और भारत रत्न को कैसे सम्मान दिया जाता हैं, गर यहां के नेता नहीं जानते, पत्रकार नहीं जानते तो आप इन्हें माफ कर दीजिये, क्योंकि आपका दिल बड़ा हैं, आपके गीत लोगों को जोड़ते हैं पर ये तोड़नेवाले नेता क्या जाने, कि आपने किस भाव से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। लता जी आपको अपनी भावना जन-जन तक रखने के लिए कोटिशः धन्यवाद, साथ ही नरेन्द्र मोदी के घुरविरोधियों को उनकी औकात बताने के लिए शत् शत् नमन।

Tuesday, June 18, 2013

बिहार के दंगाई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गुंडागर्दी.............................

आज बिहार में भाजपा विश्वासघात दिवस मना रही हैं, पूरे राज्य में बिहार बंद का आह्वान किया हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दंगाई बतानेवाला बिहार का दंगाई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की गुंडागर्दी देखिये। वे अपने जदयू कार्यकर्ताओं को आह्वाऩ कर रहे हैं कि वे सड़कों पर उतरे। भाजपा कार्यकर्ताओं का मुकाबला करें और इनके आह्वाऩ पर जदयू कार्यकर्ताओं ने वहीं किया जो उनके आलाकमान नीतीश ने कहा - जमकर भाजपा कार्यकर्ताओं पर लाठियां बरसायी। भाजपा कार्यकर्ताओॆं को घायल कर दिया। इनके कार्यकर्ता राइफल लेकर भी पहुंचे, ये राइफल लेकर सड़कों पर भजन गाने के लिए तो आये नहीं थे। अंततः जदयू के इस गुंडागर्दी और स्वयं पर लाठियां बरसते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं ने वहीं किया जो सामान्य व्यक्ति ऐसी अवस्थाओं में करता हैं।
मैं पूछता हूं - कि नीतीश बिहार के खुद मुख्यमंत्री हैं। वे सरकार में हैं। पुलिस उनकी। प्रशासन उनका। ऐसे में वे पुलिस प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने के बदले, जदयू कार्यकर्ताओं को उकसाने का काम क्यों किया। ऐसा काम सेक्यूलर नेता नहीं बल्कि एक गुंडा करता हैं। ये बिहार ही नहीं, बल्कि देश का बच्चा - बच्चा जानता हैं। क्या नीतीश बता सकते हैं कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता जदयू के कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा कार्यालय क्यों गये थे। उनकी मंशा क्या थी। ऐसे में नीतीश के पुलिसकर्मी क्या कर रहे थे, वे क्या इंतजार कर थे, कि जदयू कार्यकर्ता, भाजपा कार्यालय जाये, भाजपा कार्यकर्ताओं को जमकर, उनकी औकात बताये। ऐसे में पूरे राज्य में कानून व्यवस्था गर बिगड़ी तो उसका जिम्मेदार कौन होगा।
कल तक भाजपा अच्छी, सत्ता से उसके साथ चिपकने में अच्छा लगा और अब लगे भाजपा और भाजपा कार्यकर्ताओं को औकात बताने। धर्मनिरपेक्षता का इतना ही ठेका ले रखा हैं, तो लोकनायक जयप्रकाश नारायण का लबादा क्यों ओढ़ रखा हैं, उसे फेंक दो और जाओ सोनिया व राहुल के चरणों में बलिहारी जाओ। ऐसे भी सोनिया और राहुल के इशारों पर ठूमके लगानेवाला, भारत का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तुम्हें धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण पत्र आज दे ही दिया हैं। इस देश की विडम्बना हैं, कि सत्ता से बाहर रहने पर सारे के सारे नेताओं को भाजपा अच्छी लगती हैं, उसके कंधों पर मुख्यमंत्री बनना अच्छा लगता हैं, पर जैसे ही उसे अपनी मूर्खता पर अभिमान आने लगता हैं, उसे भाजपा और भाजपा के नेता दंगाई नजर आने लगते हैं। पूरे बिहार को विकास का हौवा खड़ाकर, बिहार का नाश करनेवाला, बिहार की लड़कियों से काला दुपट्टा उतरवानेवाला नीतीश, पूरे बिहार को बर्बाद कर के रख दिया। फिर भी पता नहीं, नीतीश भक्त पत्रकार, आर्थिक विश्लेषक और उसके टुकड़ों पर पलनेवाले मूर्खों को नीतीश क्यूं अच्छा लगता हैं, समझ में नहीं आता। 
आश्चर्य तो तब हुआ, कि कल रांची से प्रकाशित एक अखबार ने लंदन में अपनी पूरी जिंदगी गुजारनेवाला एक व्यक्ति का आलेख छापा - कि नीतीश बिहार को संभाल लेंगे। उसका नमूना तो आज ही दीख गया कि नीतीश कैसे बिहार को संभालने का प्रबंध कर रखा हैं। अरे जो नेता, अपने ही नेता जार्ज फर्नांडिंस, दिग्विजय सिंह को ठिकाने लगा दे और अब शरद यादव को उसकी औकात बताते हुए, पूरे पार्टी से लोकतंत्र समाप्त कर दे और खुद को स्वयंभू नेता घोषित कर दे, वो देश या प्रांत का नेता या सेवक नहीं होता, वो तो विशुद्ध रुप से तानाशाह कहलाता हैं, और आज जिस प्रकार से उसने अपने कार्यकर्ताओं को पूरे प्रदेश में सड़कों पर उतरने का आह्वान कर दिया, उससे साफ लगता हैं कि ये काम तो गुंडें का भी नहीं, ये तो पूर्णतः दंगाई का काम हैं, पर देश के अन्य नेताओं को नीतीश का ये कुकृत्य दिखाई नहीं देता।

Saturday, June 15, 2013

नीतीश बदनाम हुआ, मुसलमां तेरे लिए.......

बहुत पहले एक गाना सुना था -- लौंडा बदनाम हुआ, नसीबन तेरे लिए......। ये गीत अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश पर पूरी तरह फिट बैठ रही हैं और वह भी इस प्रकार- नीतीश बदनाम हुआ, मुसलमां तेरे लिए...........,क्योंकि नीतीश सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोट के लिए, वो सारे कार्य कर रहे हैं, जो किसी भी राजनीतिज्ञ को शोभा नहीं देता। इन्हें ये लगता हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करके ये पूरे बिहार में मुसलमानों के रहनुमा बन जायेंगे। अकेले बिहार में लोकसभा और विधानसभा में जदयू का परचम लहरा देंगे, तो ये उनकी मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। मुस्लिम मतदाता चाहे वह बिहार का हो या किसी अन्य प्रांत का, हमें नहीं लगता कि वो इतना मुर्ख हैं कि सिर्फ मोदी का विरोध कर देने से, इनके साथ अथवा किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ चिपक जायेगा।बिहार में कभी कांग्रेस, कभी लालू को अपना हीरो चुननेवाली मुस्लिम मतदाता, कल तक नीतीश के साथ थी, पर महराजगंज लोकसभा उपचुनाव ने ये सिद्ध कर दिया कि मुस्लिम मतदाताओं को ज्यादा दिनों तक कोई भी मुर्ख नहीं बना सकता, पर जब कोई मुर्ख बनने को तैयार हैं, अपने घर में आग लगाकर खुद तमाशा देखना चाहता हैं तो उसे किया ही क्या जा सकता हैं। उसे भी अपना घर फूंकने का पूरा अधिकार है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत एक महान देश हैं और बिहार उसमें अनोखा। एक फिल्म में बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा ने डायलाग बोला था। डायलॉग था - बिहार में तो मां के पेट में ही बच्चा राजनीति सीख लेता हैं। तब समझ लीजिये, बिहार में राजनीति कैसे सर चढ़कर बोलता है। फिलहाल बिहार में नीतीश कुमार को, नरेन्द्र मोदी से चिढ़ हैं। उनका कहना हैं कि नरेन्द्र मोदी सांप्रदायिक हैं। उन पर 2002 में गुजरात में हुए दंगे का दाग हैं। उनके इस चिढ़ को उनके आसपास अथवा उनकी कृपा से दिल्ली के राज्यसभा तक पहुंचने वाले चिरकुट नेता शिवानन्द तिवारी अथवा कृषि मंत्नी नरेन्द्र सिंह बढ़ा चढ़ाकर पेश करते हैं और बताते हैं कि नीतीश सर्वाधिक सेक्यूलर नेता है, पर इन नेताओं के चेहरे से तब हवाइंया उड़ने लगती है। जब एक देशभक्त सवाल पूछ देता हैं, वो सवाल हैं............................
क. जब 2002 में गुजरात जल रहा था, उस वक्त नीतीश कुमार केन्द्र में मंत्री थे, उसी समय वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ इतनी उग्रता क्यों नहीं दिखाई, क्यों नही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक्शन लेने के लिए दबाव बनाया।
ख. आडवाणी सेक्यूलर कैसे हो गये, आडवाणी को वे प्रधानमंत्री बनाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं, जबकि उन्हीं की पार्टी के कई नेता अच्छी तरह जानते हैं कि  रामरथ यात्रा निकालकर आडवाणी ने क्या किया था।
ग. भाजपा धर्मनिरपेक्ष नहीं पर कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष कैसे हो गयी, जबकि इंदिरा गांधी हत्याकांड के बाद देश में हुए दंगे के दौरान हजारों सिक्खों का कत्लेआम कर दिया गया। हाल ही में असम में एक बहुत बड़ा नरसंहार हो गया, वहां किस समुदाय के लोग मारे गये, ये नीतीश बहुत अच्छी तरह जानते हैं। यानी भाजपा करे तो दंगे और कांग्रेस व नीतीश की पार्टी करे तो हर हर गंगे।
घ. पूरा बिहार जानता हैं कि नीतीश बिहार के विकास की हवा खड़ा करते हैं, पर स्वयं घोर जातिवादी हैं, ये तो फूट जालो शासन करों में विश्वास रखते हैं, जैसे देखिये दलितों में भी बंटवारा खड़ा कर दिया और एक वर्ग को महादलित घोषित कर दिया, क्या इससे उस समुदाय का कल्याण हो गया।
ड. नीतीश ने विकास का हवा खड़ा कर, सर्वाधिक फायदा उन अपराधियों को पहुंचाया जो इनके दल में शामिल थे, और जो अपराधिक किस्म के नेता दूसरे दलों में थे, उन्हें चून-चूनकर जेलों के अंदर पहुंचाया, ताकि नीतीश का सामना कोई कर ही न सकें।
च. नीतीश ने नीतीश भक्त पत्रकारों को खूब फायदा पहुंचाया।  नीतीश भक्त पत्रकारों ने भी नीतीश को जमकर फायदा पहुंचाया। उसका नमूना देखिये, जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी पटना में तो एक चैनल ने पटना में आयोजित भाजपा कार्यकारिणी की बैठक का समाचार दो मिनटो में खत्म कर दी और नीतीश की एक सभा के समाचार को 21 मिनट स्थान दिया। बाद में जब हमने पता लगाया तो पता चला कि नीतीश के समर्थन में ये पेड न्यूज था।
छ. इसी नीतीश ने अपनी ही पार्टी के टॉप स्तर के नेता को ठिकाने लगाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। जान बूझकर बांका संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से दिग्विजय सिंह का टिकट काटा। अंत में दिग्विजय सिंह खुद निर्दलीय लड़ गये और नीतीश को उसकी औकात बता दी। फिलहाल दिग्विजय सिंह दुनिया में नहीं हैं।
ज. सच्चाई ये हैं कि जदयू कोई राष्ट्रीय पार्टी नहीं हैं, ये क्षेत्रीय पार्टी हैं जो बिहार में भाजपा के वैशाखी पर टिकी है, नीतीश इसके एकमात्र नेता हैं, जो कुर्मी जाति से आते हैं। इस नीतीश ने जदयू को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया हैं। शरद यादव तो मुखौटा हैं, उनकी इतनी हिम्मत भी नहीं कि नीतीश के खिलाफ बगावत या आवाज बुलंद कर सकें, क्योंकि उन्हें भी लोकसभा पहुंचना हैं, राजनीति करनी हैं और वे जानते हैं कि नीतीश उन्हें लोकसभा में आराम से पहुंचा सकते हैं, इसलिए ये चाहकर भी राजग गठबंधन को मजबूती नहीं प्रदान कर सकते, ये वहीं करेंगे, जो नीतीश कहेंगे, इसलिए बेचारे शरद यादव पर क्या लिखना और क्या बोलना।
हमारे देश में अल्पसंख्यक का मतलब। बौद्ध, जैन, यहुदी अथवा पारसी नहीं होता। इनके खिलाफ कुछ भी अत्याचार कोई भी कर दे, किसी भी नेता के आंख से आंसू नहीं दिखाई पड़ेंगे पर जैसे ही मुस्लिम या इसाईयों के खिलाफ गर छिटपुट हिंसा भी हो जाये तो फिर देखिये इन घडि़याली नेताओँ के घड़ियाली आंसू, इतने आंसू टपकायेंगे कि पूछिेय मत। ये इसलिए घड़ियाली आंसू टपकाते है, क्योंकि कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रो में ये वोटर के रुप में निर्णायक हैं। गर इन्हें पता लग जाये कि मुस्लिम या इसाई वोट अब निर्णायक नहीं रहे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये घडि़याली आंसू क्या ये तो एक बूंद पसीने भी इनके लिए नहीं बहाये। ये हैं हमारे देश के वर्तमान घटियास्तर के नेताओं का चरित्र। विधायक और सांसद बनने के बाद तो ये शपथ लेते है कि वे भारत के संविधान की मर्यादाओं की रक्षा करेंगे पर सच्चाई ये  हैं कि जितना संविधान की धज्जियां ये उड़ाते हैं, उतना कोई नहीं और वोट के लिए तो ये कहीं मुसलमान तो कहीं घोर जातिवादी होने से भी नहीं चूकते। हम कहते हैं कि जब मुस्लिम वोटरों की इतनी ही चिंता हैं तो हमारा सलाह हैं कि नीतीश धर्मपरिवर्तन क्यों नहीं कर लेते। इससे अच्छा तो दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। मुस्लिम भी कहेंगे कि देखो ये नीतीश को, जो इस्लाम कबूल कर लिया, अपने हिंदू धर्म से खुद को अलग कर लिया। नेता हो तो ऐसा हो, जो वोट के लिए अपना ईमान और धर्म भी बदल लिया हैं, इसलिए वोट तो हम नीतीश कुमार जो अब मो.नीतीशुद्दीन बन गये हैं, उन्हें ही देंगे। इससे जदयू भी मजबूत हो जायेगा और सदा के लिए नीतीश बिहार के मुसलमानों में लोकप्रिय और ऐतिहासिक पुरुष हो जायेंगे................

Wednesday, June 12, 2013

बिहार में नरेन्द्र मोदी की बहती बयार व जदयू नेताओं का पागलपन.....................

नरेन्द्र मोदी को भाजपा ने चुनाव प्रचार अभियान समिति का कमान क्या सौंपा। भाजपा में शामिल आडवाणी ने भाजपा की नैया में पहली कील ठोक दी। फिर क्या था, जदयू जो पहले से ही गुजरात की जनता और वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को खूलेआम गाली दे रहा था, उसे मौका मिल गया। अब तो वो ताल ठोक कर नरेन्द्र मोदी को दंगाई कह रहा हैं, भाजपा से तलाक लेने की बात कर रहा है, भाजपा से खुद को अलग कर 2014 की लोकसभा के चुनाव लड़ने की बात कह रहा है। उसे ऐसा करना भी चाहिए, उसकी ताकत का उसे अंदाजा लगना भी चाहिए। हम बार - बार कह भी रहे हैं कि 2014 का चुनाव जब भी हो, लालू यादव के पास खोने के लिए कुछ नहीं, जबकि नीतीश के पास पाने के लिए कुछ भी नहीं, क्योंकि लालू के वोटर कल भी नहीं उससे खिसके थे, आज भी नहीं खिसके है। महराजगंज का लोकसभा का उपचुनाव परिणाम बताने के लिए काफी है।
आज नीतीश सरकार में शामिल जदयू कोटे से शामिल कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह ने बयान दिया हैं कि मोदी दंगाई है। ये वहीं नरेन्द्र सिंह हैं जो एक जनता दरबार में एक आम जनता को अपने संबोधन में ये कह देता हैं कि थोड़ा सा हमने आपको सम्मान दिया और लगे आप सर चढ़कर ........। ये वहीं नरेन्द्र सिंह हैं जो अन्ना हजारे को मां बहन की गाली भी दे देता हैं, वो भी तब जब संवाददाताओं को समूह उससे अन्ना हजारे से संबंधित सवाल पूछते हैं। ये वहीं नरेन्द्र सिंह हैं, जिसे ईश्वर ने भयंकर सजा भी दी, पर उसे ईश्वर की मार के बाद भी बुद्धि नहीं खुली। राजनीति में कायरता व अपराध का संगम का सबसे बड़ा नमूना नरेन्द्र सिंह आज बिहार के किसानों का भाग्य निर्माता बना बैठा हैं। ऐसे ही कई जदयू में नेता हैं, जो अपराधी किस्म के हैं, पर विधायक और मंत्री बने बैठे हैं, जिन पर कई - कई अपराधों की लंबी फेहरिस्त हैं, पर जदयू के बड़े नेताओं का इन पर ध्यान नहीं जाता। ऐसे कई नेता जो विधायक बन कर जदयू के नेता बने हैं, जिससे बिहार की छवि दूसरे प्रांतों में बदनाम होती हैं, पर ये अपने को पाक साफ बताते हैं और मोदी को गाली देने में शान समझते हैं।
जदयू को लगता हैं कि नरेन्द्र मोदी को गाली देने, गुजरात की जनता को गाली देने से, 2014 में लोकसभा की सीट बढ़ जायेगी तो उसे मुगालते में नहीं रहना चाहिए। भाजपा और उससे जूड़े अन्य संगठन कोई चूड़़ियां पहनकर नहीं बैठी हैं। उन्हें भी जवाब देना आता है। नरेन्द्र मोदी, बिहार आयेंगे और चुनाव प्रचार करेंगे। पता लग जायेगा कि बिहार में नरेंद्र मोदी क्या हैं। अगर नीतीश को हिम्मत हैं तो गुजरात जाकर लोकसभा की एक भी सीट जीतकर दिखा दें या नरेंद्र मोदी की तरह जनसभा में भीड़ एकत्रित कर दिखा दें। सारा गर्व ही चूर हो जायेगा। इधर नीतीश और उनके नेता मोदी के बयार से इतने पागल हो गये कि उन्हें रात-दिन सोते जागते मोदी - मोदी ही नजर आ रहे हैं। आश्चर्य इस बात की हैं कि जदयू के इन घटियास्तर के नेताओं को मोदी दंगाई नजर आते हैं, पर इसी पार्टी के लाल कृष्ण आडवाणी को धर्म निरपेक्ष बताने से नहीं चूक रहे। कमाल हैं कि ये वहीं आडवाणी हैं, जिन्होंने रामरथ यात्रा निकाला। जिसकी वजह से बाबरी मस्जिद का आज नामोनिशां नहीं हैं। जिनके वजह से पूरे देश में धर्मनिरपेक्षता को खतरा उत्पन्न  हो गया था, देश के कई शहरों में हिंदू मुस्लिम दंगे हो गये। जिनके बारे में इसी पार्टी के कई नेता, उस वक्त दूसरे दलों में थे, आडवाणी को देश के लिए खतरा मानते थे, आज उसके लिए वे झंडे ढोने को बेताब हैं।
कमाल इस बात की हैं, इसी देश में एक प्रधानमंत्री राजीव गांधी हुए। जिनके कार्यकाल में पूरे देश में सिक्खों का कत्लेआम हुआ, पर इन नेताओं को कांग्रंसी धर्मनिरपेक्ष दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि सिक्खों की संख्या मतदाताओं के रुप में उतना प्रभावशाली नहीं, इसलिए सिक्खों के लिए इनके आंखों से आंसू नहीं बहते और न ही बयान आता हैं। हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा अथवा सर्टिफिकेट का वितरण समय -समय पर मतदाताओं को ध्यान में रखकर रचा अथवा वितरित किया जाता हैं। धन्य हैं, भारत और भारत की जनता और इसके नेता। चीन पांच किलोमीटर अंदर तक घूसकर सड़क का निर्माण कर लिया। 20 किलोमीटर अंदर तक घूस गया, पर इनकी बेचैनी इस पर नहीं दिखी, पर नरेन्द्र मोदी के लिए बेचैनी देखिये। चीन की साम्राज्यवादी नीयतों पर इन्हें शक नहीं, उसके खिलाफ बयान हीं नहीं, बल्कि चीन का दौरा होता हैं, उसे गुरु बनाने की कोशिश होती हैं, और अपने ही देश के नागरिकों को देशद्रोही बताकर, पूरे विश्व के सामने नीचा दिखाने की कोशिश करने में, इन नेताओं को कितना आनन्द आता हैं। वाह रे नीतीश, वाह रे जदयू के घटियास्तर के नेता। तुम्हारा जवाब नहीं। बस एक साल का इंतजार करो, जनता बिहार की तैयार हैं, बताने के लिए कि तुम्हारी जगह कहां हैं...................................

Tuesday, June 11, 2013

आडवाणी का कुर्सी प्रेम और भाजपा.........................

निः संदेह लाल कृष्ण आडवाणी देश के बड़े नेता है, पर इतने भी बड़े नहीं, जिनका आचरण हम अपने जीवन में उतार सके या हम किसी को कह सके कि तुम आडवाणी जैसे नेता बनो। किसी भी नेता का जीवन-दर्शन, उसके संपूर्ण जीवन पर निर्भर करता हैं कि उसने अपने जीवन काल में क्या किया और क्या नहीं किया। क्या करने से उसके द्वारा देश को बल मिला, पार्टी को बल मिला अथवा उसकी पार्टी या देश की दुर्गति हो गयी। कमाल हैं ये वहीं आडवाणी है जो किसी समय दिल खोलकर ये बोला करते थे, कि गर देश में भाजपा सत्ता में आयी तो देश के प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी विराजमान होंगे, उन्होंने ऐसा किया भी और कभी भी वाजपेयी के आगे अपना कद उचा करने की कोशिश नहीं की, जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, पर आज नरेन्द्र मोदी के आगे आते ही, इतने बड़े नेता ने जो ओछी हरकत की, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिख, जिन बातों का पत्र में उल्लेख किया, उससे ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति ने अपने जीवन के सारे कार्यकाल पर खुद से पानी फेर दिया। हमें तो अब संदेह होता हैं कि किसी कालखंड में इस व्यक्ति ने अटल बिहारी वाजपेयी के लिए, अपना सर्वस्व त्याग भी किया होगा।
पत्र में क्या हैं - पत्र में इस नेता ने वर्तमान भाजपा में शामिल नेताओं पर देश के लिए कम और निजी जिंदगी के लिए राजनीति करने का घिनौना आरोप लगाया है। ये कहकर उसने खुद को पाक साफ और सभी भाजपाइयों पर तोहमत लगा दी। ये दिव्य ज्ञान भी लाल कृष्ण आडवाणी को तब आया, जब गोवा में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंप दी गयी। उसके पहले इन्हें दिव्य ज्ञान नहीं आया था। ये दिव्य ज्ञान आडवाणी को उस वक्त भी नहीं आया, जब नीतीश कुमार और उसकी पार्टी के  घटिया स्तर के नेताओं ने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ, गुजरात  की जनता के खिलाफ लगातार विष वमन करते रहे। आडवाणी को पता नहीं कि नरेन्द्र मोदी आज समय की मांग हैं। आम जनता नरेन्द्र मोदी की तरफ देख रही हैं, क्योंकि उसे लगता हैं कि ये व्यक्ति ऐसा हैं कि वो देश के लिए कुछ कर सकता हैं। आडवाणी बता सकते हैं कि उन्होंने देश के लिए अब तक क्या किया हैं। सिवाय कुर्सी प्रेम के। अरे आडवाणी को तो सोनिया गांधी से सीखना चाहिए, वो चाहे तो भारत की प्रधानमंत्री बन सकती थी, बन सकती हैं पर उसने कभी भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर ध्यान ही नहीं दिया। और इनको देखिये, प्रधानमंत्री बनने के लिए इतने बेचैन हैं, उस कुर्सी पर सोने के लिए इतने बेचैन हैं, कि जैसे ही उन्हें ये भनक मिली कि नरेन्द्र मोदी उनके आगे दीवार बनकर खड़े हो गये। भाजपा के सारे बड़े पदों से इस्तीफा दे दिया। ये जनाब ब्लाग भी लिखते हैं। ब्लाग में महाभारत का प्रसंग भी ऱखते हैं, पर उन्हें नहीं मालूम कि समय की मांग को देखते हुए, उस महाभारत के कई पात्रों ने कब और किस समय, किन - किन चीजों का त्याग किया।
आडवाणी को ये भी शायद मालूम नहीं हैं कि इसी देश में महात्मा गांधी थे, जो चाहते तो भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे, पर उन्होंने प्रधानमंत्री पद से ज्यादा अपने लिए गोली चुन ली। आज वे मोहनदास से महात्मा गांधी और राष्ट्रपिता बन गये। कहा भी जाता हैं कि जिसे सब कुछ मिल जाता हैं, उसे कुछ भी नहीं मिलता और जिसे कुछ नहीं मिलता, उसे सब कुछ मिल जाता हैं। क्या ये प्रसंग आडवाणी को मालूम नहीं। आडवाणी तो आज उस कसाई की तरह हो गये जो, एक बकरे को बड़े प्यार से पालता हैं और फिर उसी बकरे की अपने हित में हत्या भी कर डालता हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने भाजपा को उंचाईयों पर लाकर खड़ा किया, पर ये भी सही हैं कि जिस प्रकार की कारगुजारी, उन्होंने कल दिखायी। लगता है ंकि वो चाहते हैं कि वे अपने ही हाथों से भाजपा का गला घोंट दे। नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक जीवन की कैरियर ही समाप्त कर दे। पर उन्हें नहीं मालूम कि भारत की जनता ने कुछ फैसला किया हैं। वो फैसला देशहित में, जनहित में हैं। देश को उचांई पर ले जाने का वक्त हैं. ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी कुछ ऐसा न करें, जिससे देश की जनता और देश उन्हें कभी माफ ही न करें। ऐसे वो कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। नीतीश तो आपको धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट भी दे चुके हैं। ये वहीं नीतीश हैं जिनकी धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा समय - समय पर बदलती रहती हैं। फिर भी जब आप अपने कैरियर को खुद ही डूबो देना चाहते हैं तो कोई कर ही क्या सकता हैं। 

Thursday, June 6, 2013

बिहार ने लालू की लालटेन की लौ बढ़ाई, जबकि नीतीश के तीर भोथर किये.................

बिहार में महराजगंज लोकसभा के उपचुनाव के परिणाम आ गये। राजद के प्रभुनाथ सिंह 1 लाख 37 हजार से भी अधिक मतों से जीते। जदयू के पी के शाही दूसरे नंबर पर रहे, जबकि कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गयी। लालू की बल्ले - बल्ले है। चुनाव परिणाम के पहले चक्र की मतगणना के बाद ही वे दहाड़ रहे थे। टीवी पर उनका बयान आ रहा था, कह रहे थे कि प्रभुनाथ लालटेन लेकर दौड़ रहा हैं। नीतीश का हाल क्या होगा - गइल गइल भइसिया पानी में। ब्रह्मर्षि समाज की जय जयकार कर रहे थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इस बार ब्रह्मर्षि समाज के लोगों ने दिल खोलकर उनका साथ दिया हैं और हुआ भी ऐसा ही। बेचारे पी के शाही जिस नीतीश के विकास का तीर लेकर महराजगंज में खूंटा गाड़ने का प्रयास कर रहे थे, उनका खूंटा प्रथम चक्र की मतगणना के बाद ही उखड़ गया। उन्होंने बयान दे डाला कि कार्यकर्ताओं का उत्साह व जोश नहीं था और पार्टी के अंदर चल रही भीतरघात और गठबंधन धर्म के ठीक से निर्वहन नहीं होने के कारण उनकी हार हो गयी। इधर लालू दहाड़ रहे थे, और दिल्ली में नीतीश, छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह से गुफ्तगूं कर रहे थे। टीवी पर ये भी दिखा कि जब नीतीश, रमण सिंह से बातें कर रहे थे, तब छायाकारों का समूह, इनकी छवि को अपने कैमरे में कैद कर रहा था, पर ये क्या जैसे ही नरेन्द्र मोदी उधर से निकले छायाकारों का समूह मोदी की ओर दौड़ पड़ा। 
पांच जून को देश के कई हिस्सों में हुए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव परिणामों ने सभी पार्टियों को सबक सिखायी हैं, पर सच्चाई ये हैं कि किसी भी दल ने इस सबक को सीखने की कोशिश नहीं की।
गुजरात में चार विधानसभा सीटों और दो लोकसभा सीटों पर भाजपा को मिली भारी जीत, इस बात का संकेत हैं कि गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को छोड़ना नहीं चाहती, उसे लगता हैं कि नरेन्द्र मोदी के हाथों में ही गुजरात का भविष्य हैं। जनता का फैसला शिरोधार्य होना भी चाहिए। पर बिहार में क्या हो रहा हैं। लगातार नीतीश के विकास का हव्वा खड़ा करनेवाले नीतीश के चाटूकारों की हवा निकल गयी हैं। बोलती बंद हैं। कल तक नीतीश - नीतीश जपनेवाले और इसी दरम्यान भाजपा की वैशाखी पर सरकार चलाते हुए भाजपा को ही आंख दिखानेवाले, मौसमी शेर गायब दीखे। महराजगंज की हार ने, उनकी सारी हेकड़ी निकाल दी हैं। जदयू के इन छुटभैयें नेताओं को लगता था कि बिहार की जनता नीतीश के आगे नतमस्तक हैं। जो नीतीश बोलेंगे, वो मानेगी। नीतीश का विकास, बिहार में सर चढ़कर बोल रहा हैं। ये हवाई किले बनानेवाले को पता नहीं कि विकास कोई सड़क बनाने और बिजली का खंभा खड़ा करने का ही नाम नहीं, उसके आगे रोजगार उपलब्ध कराने का भी नाम हैं। हद तो तब हो गयी कि आज भी बिहार के सुदुरवर्ती गांवों के लोग महाराष्ट्र और गुजरात में रोजी - रोटी कमाने के लिए जा रहे हैं, पर इन्हें रोकने के लिए बिहार सरकार ने कोई योजनाएँ नहीं बनायी। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के चिरकुट नेता बिहारियों को गाली देते थे और उसी महाराष्ट्र में जाकर नीतीश मनसे की जी हुजूरी करते दीखे। शायद बिहार की जनता इस दोहरे चरित्र को भूल गयी, उन्हें लगता होगा और जिस गुजरात ने आजतक बिहार की जनता के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला, उस गुजरात की जनता का अपमान, इस नीतीश ने बार - बार किया, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विषवमन कर। नीतीश को लगता हैं कि दुनिया की सारी खूबियां इन्हीं में हैं। खुब अहं में डूबे हैं। विज्ञापन के चाबूक से अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों को हांक रहे हैं, समझते हैं कि सम्राट अशोक हो गये, पर उन्हें नहीं मालूम कि बिहार की जनता तो असल में बिहार की जनता हैं। सबसे अनोखी। यहां जातिवाद सर चढ़कर बोलता हैं। लालू ने जातिवाद की सीढ़ी चढकर महराजगंज की लहलहाती फसल दुबारा काटी हैं। राजपूत -यादव तो उसके परंपरागत वोट हैं, भला वो मतदाता राजद से छिटके कब थे, छिटके तो मुस्लिम थे, फिर ससर गये, और लालू के लालटेन की जीत पक्की। रही बात भूमिहार जाति की, तो ये जाति अभी नीतीश से बिदकी हैं ही, ब्याज समेत इसने अपना किराया वसूल लिया और पी के शाही की तीर को भोथर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
हमें याद हैं कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर ने सामान्य बातचीत के दौरान कहा था कि भला बिहार में विकास के नाम पर वोट मिलता हैं क्या। यहां तो जातिवाद और बयार पर वोट मिलता हैं। जनता को जातीयता का बीयर पिलाते रहिए, अपना उल्लू सीधा करते रहिए और जब जीत जाईये तो अपने अनुसार उसका अर्थ निकालिये। ये हैं हमारा बिहार। उसे कभी तीर तो कभी लालटेन और कभी कमल खिलाने में आनन्द आता हैं पर वो भी जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर। बेचारी कांग्रेस जो कल तक इसी के सहारे राज करती थी, आज सारी जातियां उससे बिदक गयी हैं, देखते हैं, ये बिदकी जातियां कब कांग्रेस की ओर आती हैं  या कांग्रेस इसी तरह पिछलग्गू बनकर, बिहार में अपना काम चलाती रहेगी। फिलहाल बिहार की जनता ने लालू और उसकी पार्टी को च्यवनप्राश खिलाया हैं, ताकत दी हैं। ताकत मिलते ही, लालू अपनी आदत से लाचार हैं ही, फिर से शुरु कर दिया हैं दहाड़ना। देखते हैं कब तक दहाड़ते हैं, रही बात नीतीश की, तो मैं कहूंगा, कि अब भी वक्त हैं, अहं त्यागे और किसी की आलोचना व किसी के खिलाफ विषवमन करने से अच्छा हैं, बिहार की जनता का सम्मान बरकरार रखने में ध्यान लगाये। यहीं उनके लिए और उनकी पार्टी की सेहत के लिए बेहतर होगा।

Thursday, May 16, 2013

पटना की परिवर्तन रैली, नीतीश और लालू दोनों के लिए एक संदेश हैं, जनता की भावना को समझिये.....

15 मई को पटना में लालू की परिवर्तन रैली बहुत कुछ कह रही हैं। ये लालू के लिए भी सबक हैं और नीतीश के लिए भी। नीतीश के लिए ये कि उनके पास खोने के सिवा कुछ नहीं और लालू के लिए ये कि उन्होंने जनता द्वारा मिली सत्ता का जिस प्रकार दुरुपयोग किया, जनता आज तक वो भूली नहीं, यानी कहीं न कहीं वो दर्द जनता के बीच आज भी विद्यमान हैं। ये अच्छी बात हैं कि लालू ने इस परिवर्तन रैली के दौरान कोई ऐसी बात नहीं की, जो जनभावनाओं को ठेस पहुंचाये। ये अलग बात हैं कि वे अपने विरोधियों की तुलना कुत्तों से करने से नहीं चुके। लालू प्रसाद को मालूम होना चाहिए कि अपने विरोधियों को भी सम्मान करना, बिहार की संस्कृति रही हैं। गर आप इस प्रकार की संस्कृति को तिलांजलि दे, जब ये कहते हैं कि आप बिहार के सम्मान को बरकरार रखेंगे तो आम जनता को शक होने लगता हैं।
जब कोई राजनीतिक दल सत्ता से दूर रहे, तो उसे आत्ममंथन करना चाहिए। वो आत्ममंथन तब तक करना चाहिए, जब तक वो समस्याओं को न जान लें, कि किन कारणों से उसे सत्ता से वंचित रहना पड़ा हैं और जब समस्या मालूम हो जाये तो उसका समाधान करना चाहिए। हमें लगता है कि लालू जी ने अभी भी, इस ओर ध्यान नहीं दिया, गर ये ही हाल रहा तो नीतीश भले ही अपनी कुछ सीटे गवां दे, पर बहुमत उन्हें ही मिलेगी। ये लालू जी को मालूम होना चाहिए, जबकि सच्चाई ये हैं कि नीतीश विकास - विकास का हौवा खड़ाकर, इतने अहं में डूब गये हैं कि उन्हें अपने सामने सभी लोग जीरो दिखाई दे रहे हैं। जिसका फायदा लालू को उठाना चाहिए, पर लालू इसका फायदा उठा पायेंगे, इस पर हमें संदेह हैं। वह भी तब जबकि लालू को आज भी बिहार का एक बड़ा वर्ग अपना नेता मानता हैं। ऐसे में लालू जी को चाहिए कि वे स्वयं को पहचाने।
कुछ सवाल आज भी लालू से हैं कि जब आप रेलमंत्री बनते हैं और रेल मंत्रालय को नई दिशा दे देते है, तब आपने 15 सालों में बिहार का कबाड़ा क्यूं बनाया, और इसके लिए आप बिहार की जनता से क्यूं क्षमा नहीं मांगते। क्षमा तो अच्छे - अच्छे पालिटिशयनों ने मांगा हैं, अपनी गलतियों का पश्चाताप करते हुए, जनता से माफी मांगना कोई बुराई नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि हैं। फिर जनता को विश्वास दिलाना कि वे उनकी विकास को लेकर चिंतित हैं, ये भी जनता को दिखाना होगा, पर आप कर क्या रहे हैं, अपने बेटे और बेटियों को लांच कराने में लगे है, यानी पत्नी और ससुराल से शुरु करते हुए अब बेटे और बेटियों तक पहुंच गये। लालू जी, आप ये जान लीजिये, जिसमें नेतृत्व करने की क्षमता होती हैं, वहीं नेता होता हैं, आप लाख अपने बेटे - बेटियों को लांच कर ले, गर उनमें क्षमता होगी तो खुद ब खुद टाप के राजनीतिज्ञ हो जायेंगे। आपने तो एक बेटे को क्रिकेटर बनाने की सोची, क्या वो धौनी बन गया। ये छोटी सी बात आपको क्यों नहीं समझ आती। अरे लालूजी आपको ईश्वर ने बिहार की जनता की सेवा करने को बनाया हैं, आपके परिवार की सेवा के लिए आपको नहीं बनाया। आप परिवार को छोड़िये, जनता के बीच जाइये। सारी जनता को अपना परिवार समझिये। उनके दर्द को समझिये, फिर देखिये। नीतीश क्या, सारे के सारे लोग आपके पीछे रहेंगे, पर ऐसा कर पायेंगे। हमें संदेह हैं.......................................

Saturday, May 4, 2013

बेचारा बंसल मामा, रेलमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देगा......

रेलमत्री पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। कांग्रेस भी कह चुकी हैं कि पवन कुमार बंसल इस्तीफा नहीं देंगे। भला बंसल इस्तीफा क्यों दे, इस्तीफा तो वो देता हैं, जिसके पास जमीर होती हैं। अब कांग्रेसियों के पास जमीर तो हैं नहीं, तो भला रेलमंत्री अपने पद से इस्तीफा क्यों दे। इस्तीफा तो दिया था, हमारे लाल बहादुर शास्त्री ने, जब उनके कार्यकाल में एक रेल दुर्घटना हो गयी थी। हम आपको बता दें कि लाल बहादुर शास्त्री इस घटना के लिए जिम्मेवार नहीं थे, फिर भी नैतिकता के आधार पर कि उनके कार्यकाल के दौरान इतनी बड़ी दुर्घटना हुई थी उन्होंने रेलमंत्रालय संभालने से ही इनकार कर दिया था।
आज पवन कुमार बंसल को देखिये। इसके भांजे विजय कुमार सिंगला को सीबीआई ने 90 लाख रुपये घूस लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया। यह रकम विजय को उन्हें बतौर रिश्वत दो दिन पहले ही रेलवे बोर्ड के सदस्य बनाये गये महेश कुमार ने भिजवाई थी। पूरी डील दो करोड़ की थी और फिर भी बेशर्मी से रेलमंत्री पवन कुमार बंसल कहता है कि वो इस्तीफा नहीं देगा। कांग्रेस भी पवन कुमार बंसल के बचाव में निर्लज्जता के साथ खड़ी हो गयी हैं, ऐसे भी निर्लज्ज को लज्जा कहा आती हैं। कांग्रेस अच्छी तरह भारतीय जनता की नब्ज टटोल चुकी हैं, वो जानती हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं बनता, इस देश में भारत की सीमा चीन छोटा क्यूं न कर दें, ये मुद्दा नहीं बनता। जो जितना बड़ा भ्रष्टाचारी, वो उतना बड़ा नेता, इसलिए भ्रष्टाचार में लिप्त रहो, चीन से अपने देश की सीमा छोटी कराते रहो और फिर निर्लज्जता के साथी तीसरे टर्म के लिेए वोट मांगने को तैयार रहो। 
जनता के पास विकल्प तो हैं ही नहीं, वो क्या करेगी, अंततः कांग्रेस के साथ ही खड़ी होगी। गर किसी कारण से बहुमत नहीं भी आया तो निर्लजज्ता की श्रेणी में खड़े होने के लिए लालायित नीतीश एक न एक दिन, उनके साथ खड़े हो ही जायेंगे। बिहार में लालू और रामविलास, यूपी में मुलायम और मायावती  तो पहले से ही सोनिया नाम केवलम् का मंत्र जाप कर रहे हैं, दक्षिण में करुणानिधि और बची खुची वामपंथी पार्टियां, ये क्या करेंगी, अतंतः उन्हीं के शरण में आयेगी। देश भाड़ में जाय, हमने थोड़ी ही ठीका ले रखा हैं, आराम से लूटेंगे, विदेश में पैसे रखेंगे और फिर पूरे परिवार के साथ विदेश में कहीं बस जायेंगे। ये देश कोई रहने का हैं। देश तो इटली हैं, जहां की सोनिया माता हैं, जिनकी कृपा से राहुल और प्रियंका जी हैं। देश तो अमरीका, इंगलैंड और स्विटजरलैंड हैं, उनकी सरकारों के जूतों पर अपना नाक रगड़कर, वहां का नागरिकता प्राप्त कर लेंगे, यानी जब तक जिंदा रहेंगे, मस्ती में रहकर, पूरा जीवन गुजार देंगे।
इसलिए पवन कुमार बंसल, उसी श्रेणी के नेता हैं। सर्वदा सोनिया-राहुल और प्रियंका में अपना सर्वस्व लूटाने, चाटुकारिता करने, चरणवंदना करने, गणेश परिक्रमा करने में बड़ी ही श्रद्धा दिखाते हैं। जिसके एवज में वरदान स्वरुप रेल मंत्रालय उन्हें संभालने को मिला। आपको याद होगा, जब वे पहली बार रेलमंत्री बने थे, तो अपने भाषण में सोनिया जी की बड़ी ही श्रद्धा से नाम लिया था, राजीव गांधी का बड़ा ही नाम लिया था। उन्हें दुसरा कोई नाम याद ही नहीं था, क्योंकि जब सोनिया और राहुल जैसे भगवन् की उनके उपर कृपा हैं, तो जरुरत क्या हैं, अन्य का नाम लेने की। धन्य हैं, आज के नेता, आज के रेलमंत्री पवन कुमार बंसल जो रेल मंत्री के पद पर रहते हुए, अपने भांजे से सुंदर - सुंदर कार्य कराते हुए, भ्रष्टाचार का नया रिकार्ड बनाते हैं, ऐसे ही नेताओं से तो भारत की सुंदर तस्वीर बनती हैं। हम चाहेंगे कि देश में एक निर्लज्जता का भी एवार्ड देने की परंपरा की शुरुआत हो, ताकि ऐसे निर्लज्जों को पुरस्कृत किया जा सके, क्योंकि इन्होंने निर्लज्जता का रिकार्ड बना रखा हैं।

Sunday, March 17, 2013

ये भीख मांगने का नया तरीका हैं, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश का..................................

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने, देश के अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भीख मांगने की नयी तरकीब दिखायी हैं, पर देश के अन्य अविकसित राज्यों के मुख्यमंत्री दिल्ली में इस प्रकार की अधिकार रैली कर, भीख मांगना शुरु करेंगे, ऐसा हमें संदेह हैं। भाजपा की वैशाखी पर बिहार का सत्तासुख भोग रहे नीतीश को, भाजपा के ही कई नेता अच्छे नहीं लगते हैं। वे समय - समय पर अपनी गीदड़-भभकी से भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को उनकी औकात बताते रहते हैं, पर वे जानते हैं कि बिना भाजपा की वैशाखी पर टिके वे बिहार में एक दिन भी सत्ता में नहीं रह सकते, इसलिए समय - समय पर भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के आगे झूकने का नौटंकी खूब किया करते हैं। 
हम आपको बता दें कि किसी भी रैली में भीड़ कैसे जुटती हैं या जुटायी जाती हैं, सब को पता हैं। कोई भी काम करनेवाला व्यक्ति जो काम करता हैं, वो अपने काम को नष्ट कर, किसी नेता का भाषण सुनने नहीं जायेगा, क्योंकि वो जानता हैं कि आज का नेता लाल बहादुर शास्त्री या महात्मा गांधी नहीं हैं। बिहार में इस तरह की रैली करने में माहिर लालू यादव, बहुत अच्छी तरह बता सकते हैं कि दिल्ली में हुई नीतीश की रैली में कौन - कौन से हथकंडे अपनाये गये हैं, गर लालू को मौका मिले तो वे नीतीश की अधिकार रैली से भी बड़ी रैली, दिल्ली में कर सबको आश्चर्यचकित कर सकते हैं, क्योंकि लालू ने सत्ता रहते, पटना में कभी रैली की ही नहीं, वे तो रैला किया करते थे।
बिहार की शान और बिहारियों के सम्मान करने की बात करनेवाले नीतीश ये भूल जाते हैं कि अधिकार रैली कर, केन्द्र पर दबाव बनाना, बार - बार पिछड़ों की रट लगाकर भाजपा को आंख दिखाना भी भीख मांगने की शैली हैं। नीतीश को ये भी जान लेना चाहिए कि बिहार से ज्यादा तरक्की सिक्किम और गोवा जैसे प्रांत कर रहे हैं, उन प्रांतों ने कभी भी केन्द्र को आंख नहीं दिखाया और न ही अधिकार रैली करके भीख मांगने में विश्वास किया।
रही बात बिहारियों के सम्मान की या अपमान की तो उन्हें मालूम होना चाहिए कि अब आतंकी गतिविधियों में लिप्त बिहारी भी खूब दिखाई पड़ रहे हैं। दिल्ली में जो महिला के साथ रेप की घटना हुई तो उसमें एक बिहारी भी था। जब ऐसी - ऐसी घटनाओं में बिहारियों की संलिप्तता होगी तो फिर बिहार को सम्मान कहां से मिलेगा। आज भी गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली या अन्य विकसित अथवा अविकसित प्रांतों में जो बिहारी मिल रहे हैं, जो वहां रहकर अपने बिहार में रह रहे परिवारों को भरण पोषण कर रहे हैं, वो बताता हैं कि बिहारी कितने गैरत वाले हैं। कभी - कभी बिहारियों के खिलाफ विभिन्न प्रांतों में जो गुस्सा दिखता हैं, उसका मूल कारण हैं कि वहां के लोगों को लगता हैं कि ये बिहारी, उनका हक छीन रहे हैं। जब बिहार के राजनीतिज्ञ व सत्ता में शामिल लोग, अपने ही प्रांत के लोगों के साथ कभी दलित तो कभी महादलित, पिछड़ा तो कभी अंत्यत पिछड़ा के नाम पर भेदभाव बरतते हो तो वो प्रांत क्या खाक तरक्की करेगा।
जदयू में तो एक नेता हैं - नरेन्द्र सिंह, उसे तो बात करने की तमीज ही नहीं मालूम। विभिन्न चैनलों में उसके जो भाषण व बाइट दिखाई पड़ते हैं, उससे साफ पता लग जाता हैं कि बिहार में नेताओं की क्या सोच हैं। जदयू के ही  नेता हैं - अनंत सिंह, सुनील पांडे, शिवानंद तिवारी। जिनकी हरकतों से पूरे राज्य की तस्वीर साफ हो जाती हैं। ऐसे - ऐसे नेताओं व मंत्रियों से ये बिहार की सम्मान बढ़ने और बढ़ाने की बात करते हैं। ये वहीं मुख्यमंत्री नीतीश हैं जो लड़कियों के सीने से काले दुपट्टे तक उतरवा लिये, जो महिला शिक्षकों के साथ बदतमीजी में सबसे आगे रहे और बिहार के सम्मान की बात करते हैं।
जिन्होंने दलितों में भी एक और महादलित बना डाला, यानी नरकों में ठेला ठेली की बात करनेवाले को बिहार के विकास की चिंता हैं। जिसने पत्रकारों को अपने पैसों से, विज्ञापन से खरीदकर, नचनियां बना डाला। वे बिहार और बिहारियों की बात करते हैं, इन्हें शर्म भी नहीं आती। जो फूट डालों शासन करो की आधारशिला रखकर, पूरे बिहार के लोगों को बेवकूफ बना डाला। वे बिहार की चिंता करते हैं। जरा पूछिये नीतीश से जब वे रेलमंत्री थे, केन्द्र में बड़े मंत्री थे, गुजरात दंगा, उसी समय हुआ था। उस वक्त वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विषवमन क्यों नहीं करते थे, उस वक्त उन्हें मुस्लिम प्रेम क्यूं नहीं जगा था। उन्होंने राम विलास पासवान की तरह केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र क्यो नहीं दिया और आज मुस्लिम प्रेम का ढोंग  इस प्रकार रचते हैं कि पूछिये मत। सचमुच इसने जो बिहार का अपमान किया, आज तक किसी ने नहीं की। अरे इसने तो हद कर दी, महाराष्ट्र जाकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे के इशारों पर ताता थैया  किया, पर शर्म नहीं आती। शर्म आयेगा कैसे, जमीर हो, तब न.............................

Friday, December 21, 2012

बिहार के मुख्यमंत्री अहंकारी नीतीश क्या जाने, किसी का सम्मान कैसे किया जाता हैं...........................

गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने शानदार तरीके से एक बार फिर सत्ता हासिल की हैं। गुजरात की छः करोड़ जनता ने एक बार फिर उन पर विश्वास किया और विपक्षियों के लाखों - करोड़ों आरोपों को दरकिनार करते हुए, नरेन्द्र मोदी को अपना हीरो चुना। इसमें कोई दो मत नहीं कि वे आनेवाले समय में प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार है और यहीं प्रबल दावेदारी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आंखों की नींद गायब कर दी हैं। वे इतने सदमे में हैं कि वे मर्यादा तक भूल गये हैं। बिहार में एक कहावत हैं - हम अपने दुश्मनों को भी उंचा पीढ़ा देते हैं, पर इसे देखिये। सामान्य तौर पर, लोग जो शिष्टाचार निभाते हैं। ऐसे अवसरों पर बधाई देते हैं। इसने नरेन्द्र मोदी को बधाई देना भी उचित नहीं समझा। अरे आप नरेन्द्र मोदी को बधाई दो या मत दो। उसे क्या फर्क पड़ता हैं। ऐसे थोड़े ही ना हैं कि वो आपकी बधाई की लालसा पाले हुए हैं। वो तो अच्छी तरह जानता हैं कि आप क्या हो। कल तक गाली देने में आगे थे, तो आज भी गाली ही दो। तुम्हारे मुंह से यहीं अच्छा लगता हैं। जो नीतीश को जानते हैं, वे उनके कैरेक्टर को भी जानते हैं। नीतीश भारतीय राजनीति में अहंकारी पुरुष थे, और रहेंगे। समय आने पर लालू की तरह इनका भी अहंकार मिट्टी में मिल जायेगा और जो सुशासन बाबू के नाम से जाने जाते हैं, कुशासन बाबू कहाने में भी देर नहीं लगेगा।
बिहार - एक अनोखा प्रदेश। यहां एक से एक शूरवीरों ने जन्म लिया। जिनकी यशोगाथा आज भी पूरे विश्व में देखी और सुनी जाती हैं, पर पिछले बीस पच्चीस वर्षों से इस बिहार में एक से एक मसखरे और अहंकारी दिखाई पड़ रहे हैं, जिनके कुकृत्यों से बिहार पर अंगूलियां उठायी जा रही हैं। ऐसे भी बिहार और बिहारी क्या हैं। इसके बारे में गर जानना हैं तो बिहार से अलग, आप किसी भी प्रदेश में जाकर बिहारियों के बारे में पूछे, तो पता चल जायेगा। एक नारा, बिहारियों के लिए, जो हर जगह सुनायी देती हैं वो हैं -- एक बिहारी, सौ बिमारी। 
क्या सचमुच एक बिहारी, सौ बिमारी के बराबर हैं, या लोग ऐसे ही कह देते हैं।
सबसे पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित बिहार के लोग के बारे में क्या कहती हैं, वो सुनिये --  बिहार और यूपी से आये लोगों ने दिल्ली को गंदा करके रख दिया हैं। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिव सेना के लोग तो बिहारियों को देखना ही पसंद नहीं करते और इसका मौन समर्थन करते हैं, महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेता व वहां के मुख्यमंत्री पृथ्वी राज चौहान। देश के पूर्वी भाग असम और दक्षिण के चेन्नई और बंगलौर में तो ये बिहारी कई बार मार खाकर लौट आते हैं। क्यों मार खाते हैं। ये बताने की जरुरत नहीं। इधर बिहार में लालू और अब नीतीश के शासन को झेल रहे बिहारी समझते हैं कि नीतीश के आने के बाद, बिहार का सम्मान बढ़ा हैं, बिहार तेजी से विकास कर रहा हैं। तो इन मूर्खों को कौन समझाये कि जो नयीं लेटेस्ट रिपोर्ट आयी हैं विकास की। उसमें एक नंबर पर छोटा सा प्रदेश - सिक्किम हैं। जो आज तक अपने लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग तक नहीं की हैं। जबकि बिहार का मुख्यमंत्री नीतीश हमेशा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की भीख मांगा करता हैं, जबकि यहीं शख्स जब केन्द्र में सरकार में शामिल था, तो तत्कालीन बिहार की मुख्यमंत्री रावड़ी देवी के इस मांग पर ही अंगूली उठा दी थी। हाल ही में जब महाराष्ट्र में एक बिहारी युवक की निर्मम हत्या कर दी गयी थी। नीतीश ने इस पर अपना बयान जारी किया था कि एक छोटी सी मुर्गी पर तोप छोड़ दिया गया, पर इसी नीतीश ने जब महाराष्ट्र का दौरा किया तो वह महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेताओं व कार्यकर्ताओं से डरते हुए अपने भाषण की शुरुआत ही, जय महाराष्ट्र से की।
आज भी नीतीश बिहार में उद्योग लगाने के लिए, देश के उद्योगपतियो से चिरौरी करते हैं, पर कोई भी उद्योगपति बिहार में उद्योग लगाना पसंद नहीं करता। पर गुजरात को देखिये। वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने क्या किया। बंगाल में नैनो पर ग्रहण लगा और उसने गुजरात में नैनो का प्रोडक्शन करा, दिखा दिया कि थॉट क्या हैं। गुजरात के सैकड़ों कपड़ा मिलों और अन्य संस्थानों में आज भी बिहारी मजदूर शान से काम करते हैं। इन बिहारी मजदूरों को गुजरात और गुजरातियों से कोई शिकायत तक नहीं। ये चुनावों में भी भाग लेते हैं और नरेन्द्र मोदी को अपना हीरो मानते हैं, पर नीतीश को देखिये।
नीतीश धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट बांटते हैं। ये धर्मनिरपेक्षता के सर्टिफिकेट का दुकान पटना और दिल्ली के जदयू कार्यालय में खोले हुए हैं। बिहार में भाजपा के वैशाखी पर शासन कर रहे हैं और भाजपा को ही समय - समय पर गीदड़भभकी और बंदरघुड़की दिखाते रहते हैं। बिहार के अल्पसंख्यकों को ये दिखाऩे के लिए की, वे लालू से ज्यादा सेक्यूलर हैं, अल्पसंख्यक उनकी पार्टी को भूले नहीं, इसलिए समय - समय पर नरेन्द्र मोदी को नीचा दिखाने का कोई कसर नहीं छोड़ते। इस बार तो उन्होंने मर्यादा को ही ताक पर रख दिया। सामान्य तौर पर देखा जाता हैं कि कोई भी व्यक्ति गर शीर्ष पर पहुंचता हैं या कोई विजयी होता हैं तो उसका घुरविरोधी भी उसको बधाई देने के लिए पहुंच जाता हैं। पर ये संस्कारवान अथवा चरित्रवान व्यक्ति ही कर सकता हैं। सामान्य नहीं। 
कल गुजरात में चुनाव परिणाम निकले। गुजरात परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष जो पूर्व में भाजपा में रहकर, गुजरात का बागडोर संभाल चुके हैं। भाजपा को चुनौती दी, बुरी तरह हार गये। पर नरेन्द्र मोदी को देखिये, चुनाव जीतने के बाद, वे उनके घर जाते हैं, उनका पांव छूते हैं। पर नीतीश को देखिए, अहंकार में चूर हैं। नरेन्द्र मोदी को बधाई तक नहीं दिये हैं। उनके पिछलग्गू नेता इस पर बयान देते हैं कि नीतीश जी बहुत व्यस्त हैं, इसलिए वे बधाई नहीं दे पाये। जैसे लगता हैं कि नीतीश जी के पास दो सेंकेंड का भी समय नहीं हैं। जैसे लगता हैं कि नीतीश को शौचालय जाने तक का समय नहीं हैं, या दिनचर्या के दौरान नीतीश जी मुंह भी नहीं धो पा रहे हैं और न ही नहा रहे होंगे। अरे पिछलग्गूओं साफ कहो कि नीतीश को नरेन्द्र मोदी की जीत रास नहीं आ रही हैं। उसे लग रहा हैं कि विकास को लेकर और आनेवाले समय में प्रधानमंत्री पद को लेकर, उसका कोई घुरविरोधी सामने हैं तो वो नरेन्द्र मोदी हैं, जिसके कारण वो इतना जल भून गया हैं कि उसे मर्यादा तक याद नहीं रही। ऐसे नीतीश ही बिहार की कब्र खोदेंगे। क्योंकि जिसके पास मर्यादा, चरित्र व संस्कार नहीं, वो बिहार को क्या सम्मान दिलायेगा। ये तो बेशर्मी की हद हैं। इसने तो बिहार के दस करोड़ जनता का अपमान कर दिया हैं। बिहार की तो परंपरा रही हैं कि अपने दुश्मनों को भी आगे बढ़कर स्वागत करने का, पर इस नीतीश ने तो सारी मर्यादाएं लांघ कर बता दिया कि वो सिर्फ और सिर्फ बिहार के सम्मान पर दाग लगाने के लिए सत्ता हासिल की हैं। भाजपा को चाहिए कि अपने पीठ पर जो नीतीश को उसने सवार कर रखा हैं, उसे उतार कर फेंके नहीं तो ये खुद तो जायेगा ही, भाजपा की भी कब्र खोद देगा।

Wednesday, December 5, 2012

रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया...................

आपने एक लोकोक्ति जरुर सुनी होगी - रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया। ये लोकोक्ति बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमो तथा मसखरी मे प्रवीण लालू प्रसाद यादव पर फिट बैठती हैं। बिहार की सत्ता से बेदखल होने के बाद, मुझे लगा था कि ये सुधरेंगे। मसखरी छोड़ेंगे, थोड़ी बुद्धिमानी दिखायेंगे, पर वो कहते हैं न कि नेचर और सिंगनेचर कभी बदलते नहीं। इस कहावत को भी सही कर दिखाया हैं -- माननीय फूहड़, श्री लालू प्रसाद यादव ने। मैंने फूहड़ शब्द का प्रयोग इसलिए इनके लिए किया, क्योंकि आज ही एफडीआई पर संसद में हो रही बहस के दौरान, एक सांसद को धमकी देने के क्रम में, इन्होंने खुद ये कह डाला कि वे उक्त सांसद से ज्यादा फूहड़ हैं। क्यों नहीं लालू जी, आप फूहड़ ही नहीं बहुत कुछ हो सकते हैं। आपने तो कई कीर्तिमान बनाये हैं, बिहार में। देश में। क्या - क्या कीर्तिमान बनाये हैं, जरा आप खुद देखे।
1.  आप देश के कई युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। मेरे कई मित्र जो पत्नी भक्त हैं, उन्हें मैं बार - बार कहता हूं कि तुम क्या पत्नी भक्त होगे, जो हमारे लालू जी हैं। उन्होंने अपनी पत्नी को बिहार का मुख्यमंत्री तक बना दिया, तुमने अपनी पत्नी के लिए क्या किया। इसलिए पत्नी भक्ति में आपसे बेहतर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
2. जो लोग स्वयं को संकल्पित जीवन व्यतीत करने का दावा करते हैं, उन्हें मैं तो आपका ही प्रमाण देता हूं कि लालू जी जो कहते हैं, वो करते भी हैं, जैसे उन्होंने कहा था कि बिहार उनके जीवित रहते कभी बंट ही नहीं सकता, उनकी लाश पर बनेगा झारखंड। पर जैसे ही आपकी कुर्सी हिलने को दिखी, और बिहार की जनता ने थोड़ी सीट आपकी झोली में कम कर दी,  आपने झारखंड बनवा दिया और बिहार का नक्शा, इतना छोटा हो गया कि हम क्या कहें। ये श्रेय भी, मैं आपको देना चाहता हूं।
3. जब आप सत्ता में थे, तो आपकी कृपा से, आपका अनुग्रह पाकर आपके पशु भी, विभिन्न प्रकार के शो में, प्रथम हो जाया करते थे। चाहे वो डॉग शो हो या हार्स शो।
4. बिहार में लाख आप नीतीश को गाली दे, पर इतना तो नीतीश ने जरुर किया कि कम से कम बिहार की जनता उनके ससुराल और उनके शालों को तो नहीं ही जानती, जैसा कि आप के ससुराल के बारे में जानती हैं।
5. आप जिस संसदीय दल में शामिल होकर पाकिस्तान गये थे, और पाकिस्तान के बाजार में आलू का मॉडल देख रहे थे, वहीं पाकिस्तान और वहां की जनता, नीतीश के शासन की तुलना आपके शासन की तुलना से कर, नीतीश को बेहतर शासक के रुप में प्रोजेक्ट कर रही हैं, जबकि आप की थू - थू हो रही हैं, ज्यादा जानकारी के लिए, आपसे संबंधित रिपोर्ट यूट्यूब पर भरी पड़ी हैं, पाकिस्तान के किसी भी चैनल के टीवी समाचार रिपोर्ट को आप देख लें अथवा पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की बिहार पर इंटरव्यू देख लें।
6. कल तक जिस मीडिया को आप कोसते नहीं थकते थे, सुनने में आ रहा हैं कि मीडिया के भाईयों और मीडिया के मालिकों को धन देकर, आप अपनी सभा की सीधी लाईभ शो करवा रहे हैं, और कुछ प्रिंट मीडिया के लोगों को उपकृत कर, अपनी तारीफ के पूल बंधवाने का कार्य आपने प्रारंभ किया हैं।
ये कुछ उदाहरण हैं, जो मैंने आपकी तारीफ में लिखे हैं। ऐसे भी आपने जो जातिवाद का बीज बिहार में बोया हैं, वो कभी मिट ही नहीं सकता। आज आप जो नकली ब्राह्मण प्रेम दिखा रहे हैं। आपने ब्राह्मणों को कितनी गालियां दी हैं, वो पटना जंक्शन पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु की प्रतिमा ही बतायेगी। जब आप एक सशक्त नेता बिहार के गिने जाते थे, तब आपने, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की प्रतिमा पर उनके जन्मदिन के दिन माल्यार्पण करना, अपनी शान के खिलाफ समझा था और आज सोनिया व राहुल की गणेश परिक्रमा बारंबार करने के बाद, बिहार की गलियों में घूम घूमकर ब्राह्मणों का आशीर्वाद मांग रहे हैं। मैं बिहार का ही रहनेवाला हूं। आपने किस प्रकार से बिहार के विकास में अहम योगदान देनेवाले लोगों व जातियों का आपने शासनकाल में अपमान किया हैं, वो मुझसे बेहतर कौन जान सकता हैं। आपने अपने शासन के दंभ में, कितने लोगों को सताया हैं, अपमानित किया हैं, केवल इसका पश्चाताप कर लें, तो बिहार की जनता आपको माफ कर दें, पर आपको पश्चाताप करना भी नहीं आता। आप तो स्वयंभू मसखरे हैं, आपको मसखरी करने से फूर्सत कहा हैं। मसखरी के चक्कर में आपने आज एफडीआई पर हो रही विशेष बहस के दौरान संसद में वो कह डाला, जिससे बिहार की जनता की बदनामी हो गयी। आपने भाजपा को जमूरा बता दिया, जबकि सबसे बड़ा जमूरा तो आप ही हैं। ये अलग बात है कि आपने भाजपा से इसके लिए माफी मांग ली। प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने संसद में आप पर ठीक ही टिप्पणी की -- आपको गाठें खोलना नहीं आता और मसखरी के अलावा कुछ बोलना नहीं आता। आप संसद में कहते हैं कि गर गलत हुआ तो राजद के लोग सारे दुकानों में आग लगा देंगे। आपको आग लगाने का मौका भी ये एफडीआई देगा, अरे आपने अपने ही चिराग से देश के कई घरों में आग लगा दी। आपको क्या पता कि एफडीआई से देश को क्या नुकसान होने जा रहा हैं। आप को तो सिर्फ सीबीआई की चिंता सता रही हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं कि अभी सत्ता कांग्रेस के हाथों में हैं, और सीबीआई की चाबी केन्द्र सरकार के हाथों में है। आप चारा घोटाले में बुरी तरह फंसे हैं। इसलिये सोनिया -  राहुल की परिक्रमा करने के सिवा आपके पास दूसरा कोई चारा नहीं हैं। बस इनकी परिक्रमा करते रहिए, समय - समय पर मसखरी कर, इनका दिल बहलाते रहिए, देश भाड़ में जाय, आपको क्या मतलब। आपको और आपके परिवार को बस समय - समय पर सत्ता का रसास्वादन करने का मौका मिल जाय, बस इतना ही आपके लिए काफी हैं। ऐसे भी बिहार में आपने जातीयता का ऐसा बीज बोया हैं कि उसका फायदा, देर सबेर आप जब तक जीवित रहेंगे आपको छोड़ दूसरे को थोड़े ही मिलने जा रहा। जातीयता के घोड़े पर सवार होकर, जमकर बिहार व देश को बर्बाद करते रहिए, आम जनता को धोखा देते रहिए। इससे ज्यादा यहां की जनता को आपसे आशा भी नहीं हैं।

Monday, November 5, 2012

इन बेशर्म पत्रकारों को तनिक लज्जा नहीं आती............................

आज सुबह सुबह मैंने सारे समाचार पत्रों को खंगाला हैं। सभी समाचार पत्रों ने नीतीश की स्तुतिगान की हैं। स्तुतिगान करना आवश्यक भी था, क्योंकि अब विज्ञापन नहीं छपते हैं। विज्ञापन के बदले, ऐसे समाचार छाप दिये जाते हैं, जो विज्ञापन का ही काम करता हैं और उसके बदले, उसकी एक बड़ी राशि समाचार से प्रभावित होनेवाले व्यक्ति अथवा संस्थानों से ले लिेये जाते हैं। ऐसा देश के सभी समाचार पत्र कर रहे हैं, इसलिए राष्ट्रीय से लेकर, क्षेत्रीय समाचार पत्रों ने भी वहीं किया, जिसका मैंने पूर्व में आकलन किया था। इसके पहले, इस तरह का काम, सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय टीवी चैनल कल कर चुके हैं। 
आज सुबह - सुबह करीब सारे राष्ट्रीय चैनल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी को फांसी पर लटकाने के लिए बेताब दीखे, लगे हाथों भाजपा के चिरप्रतिद्वंदी कांग्रेस पार्टी की ओर से भाजपा अध्यक्ष नितिन के खिलाफ बयान भी आ गया, जिसे इन चैनलों द्वारा दिखाया और सुनाया भी जा रहा हैं। हद हो गयी, इसे लेकर विशेष समाचार प्रसारित शुरु कर दिये गये हैं। समाचार क्या हैं, जरा आप ही पढ़िये और विचार कीजिये। भोपाल के एक कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने एक बयान दिया कि विवेकानंद और दाउद के आईक्यू एक ही थे, पर एक ने उस आईक्यू द्वारा देश और विश्व को नयी दिशा दी तो दूसरे ने विध्वंसात्मक कार्य कर मानवता का अहित किया। अब आप ही बताये, इसमें गलत क्या हैं। आज भी हम राम और रावण, कृष्ण और कंस का तुलनात्मक विवरण अपने बच्चों को नहीं देते हैं क्या और इस विवरण के द्वारा, हम बच्चों में ये प्रेरणा नहीं भरते हैं क्या, कि तुम्हें राम बनना हैं, तुम्हें कृष्ण बनना हैं, तुम्हें विवेकानन्द जैसा बनना हैं, जिससे हमारा समाज और हमारा राष्ट्र गौरवान्वित हो। ऐसा हम जब करते हैं तो फिर नितिन गडकरी के खिलाफ हाय तौबा क्यों। ये तो वहीं बात हुई, बेसिरपैर के बाल का खाल निकालना। गर राष्ट्रीय चैनल के पत्रकारों को कोई बात नहीं समझ आती या वे पागल हो गये हो तो इसमें नितिन गडकरी को हलाल करने की आवश्यकता क्यों। इन्हें खुद आगरा अथवा रांची के मनःचिकित्सा अस्पतालों में जाकर शरण लेनी चाहिए।
इन दिनों देश का सर्वाधिक नुकसान तथाकथित पत्रकारों द्वारा हो रहा हैं। ये सभी कांग्रेसभक्त बनकर, देश की अस्मिता व इसके वैभवशाली इतिहास पर कुठाराघात कर रहे हैं और इसके बदले वे कांग्रेस से उपकृत होते जा रहे हैं। हमारे पास कई सबूत हैं, जिसके आधार पर हम कह सकते हैं कि अब तक इन मीडिया हाउस के मालिकों और पत्रकारों ने क्या किया हैं। कोई इस प्रकार के समाचारों को प्रसारित व प्रकाशित कर प्रधानमंत्री का प्रेस सलाहकार बन जाता हैं तो कोई राज्यसभा के सांसद के रुप में उपकृत होता हैं, कोई इसी के आड़ में अपना व्यवसाय चलाता हैं तो कोई अपने बेटे - बेटियों और संगे संबंधियों को सरकारी अथवा कारपोरेट जगत में लाखों - करोंड़ों के पैकेज पर नौकरी दिलवाता हैं। ऐसे में इन पत्रकारों द्वारा प्रकाशित अथवा प्रसारित खबरों पर अपना मन बनाना, देश के साथ खिलवाड़ करने के सिवा कुछ नहीं। इसलिए सभी देशवासियों को चाहिए, कि ऐसे पत्रकारों से अपनी दूरियां बनाये और इनके द्वारा प्रकाशित और प्रसारित समाचारों के प्रति कड़ा प्रतिवाद करें, ऐसा माहौल बनाये, कि इनके कुकर्मों से देश को बचाया जा सकें। क्योंकि परमाणु बम से भी ज्यादा खतरनाक, इनके विचार हैं। परमाणु बम से केवल एक खास इलाका प्रभावित होता हैं, पर इनके  खतरनाक विचार, पूरे भारत को निगलने के लिए तैयार हैं। ऐसे भी इन घटियास्तर के पत्रकारों की सोच पर अंकुश लगाने के लिए संविधान में कुछ भी नहीं हैं, ये स्वयं को देश के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताकर देश की जनता को दिग्भ्रमित भी कर रहे हैं। इसलिए सावधान हो, और इन घटियास्तर के चैनलों व पत्रकारों को अपने वैचारिक जागरुकता से पराजित करने के लिेए, मिलकर एक ऐसा कदम उठाये, कि ये सारे पत्रकार भारत की जनता से थर्रा उठे।

Sunday, November 4, 2012

बिहार को विशेष दर्जा क्यों, पुरुषार्थ जगाने के बदले, भीख मांगने की नयी परंपरा की शुरुआत क्यों...........

बिहार को विशेष दर्जा चाहिए। नीतीश ने इसके लिए अधिकार रैली पटना में बुलायी हैं। बड़ी संख्या में बिहार के सुदुरवर्ती इलाकों से लोग पहुंचे हैं, इस अधिकार रैली में। हालांकि इस प्रकार की रैली में लोग कैसे आते हैं, कैसे बुलाये जाते हैं, किस प्रकार के प्रलोभन दिये जाते हैं, ये बिहार की जनता रग - रग जानती हैं। ऐसे भी बिहार विकास के लिए कम, रैली और रैलाओं के लिए ही जाना जाता हैं। इसके पहले भी लालू प्रसाद जैसे घाघ नेता पटना में रैली बुला चुके हैं, उसका रसास्वादन भी कर चुके हैं, पर फिलहाल इनके हालत पस्त हैं। आज गर ये रैली बुलाये तो शायद ही, इनके द्वारा पूर्व में बुलायी गयी रैली, जितनी भीड़ भी जूट सके। पर जनता तो जनता हैं, कभी लालू तो अब नीतीश, आनेवाले समय में कभी दूसरे नेताओं को भी ये श्रेय वह दे दें तो अतिश्यिोक्ति नहीं होगी। 
चलिये भविष्य की बात छोड़े। अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता हैं। अतीत गरीब रैला, लाठी में तेलपिलावन रैला से होते हुए अधिकार रैली तक पहुंच चुका हैं। हर जदयू विधायक ने अपने अपने हिसाब से इस रैली में अपने लोग को बुलाने में, जमकर कसरत की हैं, जिसका रिजल्ट अधिकार रैली में देखने को मिला हैं। हम आपको बता दें कि ऐसे पूरे देश में रैली व रैला का दौर चल पड़ा हैं। लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी तो दिल्ली में आज ही के दिन कांग्रेस ने भी अपनी शक्ति प्रदर्शन कर, एक तरह से 2014 के लोकसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया हैं। जमकर सभी पार्टियों ने एक दूसरे को लताडा़ भी हैं और भ्रष्टाचार कें मुद्दे पर स्वयं को पाक साफ और महंगाई के लिए एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ा। अब जनता परेशान है कि इन रैलियों में किसे वे पाक साफ समझे और किसे कटघऱे में रखे। इसी बीच हिमाचल प्रदेश में आज मतदान चल रहा हैं, जबकि गुजरात में मतदान होना बाकी हैं, पर गुजरात और हिमाचल से जो संकेत मिल रहे हैं, वो साफ हैं कि जनता कांग्रेस से दूरी बना चुकी हैं और लोकसभा का चुनाव जब भी हो, कांग्रेस को विपक्ष में इस बार बैठने का जरुर मौका मिलेगा।
और अब हम बात करते हैं, बिहार की। जब से दूसरी बार नीतीश ने बिहार में सत्ता संभाली। वे बिहार के विशेष दर्जा दिलाने की मांग पर ज्यादा जोर देते रहे। बात यहां आती हैं कि बिहार को ही विशेष दर्जा क्यों, अन्य प्रदेशों को क्यों नहीं। देश में और भी बिहार जैसे कई प्रांत हैं, जो विकास से कोसो दूर हैं, उन्हें क्यों नहीं विशेष दर्जा मिलना चाहिए। दूसरी बात, नीतीश को ये परमज्ञान उस वक्त क्यों नहीं प्राप्त हुआ, जब वे एनडीए के शासनकाल में केन्द्र में एक जिम्मेदार मंत्रालय संभाल रहे थे और बिहार में रावडी़ देवी का शासन था। बिहार में रावड़ी भी तो वहीं बात कह रही थी और ये बार - बार इसका विरोध कर रहे थे। यानी आप जो बोलो वो देववाणी और बाकी बोले वो असुरवाणी। क्या सोच हैं - नीतीश जैसे लोगों की। जो लोग नीतीश को नजदीक से जानते हैं कि वो अच्छी तरह जानते हैं कि ये व्यक्ति, स्वयंप्रभु, भाग्यविधाता, अपने को मानता हैं। ये अपने आगे किसी को नहीं लगाता, चाहे वो जदयू में शरद यादव जैसे लोग ही क्यों न हो। हालांकि इसी अहं में वो नरेन्द्र मोदी को भी चुनौती दे डालता हैं पर इसकी ताकत इतनी नहीं कि वो नरेन्द्र मोदी से आंख में आंख मिलाकर बात भी कर सकें। इसने अहं में आकर कई बार गुजरात की जनता का भी अपमान किया, पर गुजरात की जनता, ऐसे - ऐसे व्यक्ति को, ज्यादा महत्व नहीं देती, मुझे अच्छी तरह मालूम हैं। नीतीश के बार में, मैं एक और बात कह दूं कि जिनकी याददाश्त थोड़ा कमजोर हैं तो उनके लिए उदाहरण दे देता हूं कि ये वहीं नीतीश हैं -- जिसने पिछली बार लोकसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह की बांका से टिकट कटवा दी थी। ये अलग बात हैं कि दिग्विजय सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार के रुप में लोकसभा का चुनाव लड़कर नीतीश को, उसकी औकात बता दी। आज दिग्विजय सिंह दुनिया में नहीं हैं, पर ऐसा नहीं कि उनके नहीं रहने से नीतीश के कारगुजारियों पर बोलने व लिखनेवाला कोई नहीं।
ज्यादातर लोग नीतीश को एक बेहतर शासक के रुप में मानते हैं। वे इसलिए मानते है कि लालू का जिसने शासनकाल देखा हैं, वे मानते है कि अब भी लालू से नीतीश बेहतर हैं, पर क्या, हम इन्हें भी अराजकता फैलाने का वहीं मौका दें, जो कभी लालू को दिया था। आज भी मुजफ्फरपुर की नवरुणा कहां हैं, किसी को पता नहीं। अपहरण, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक सौहार्द्र की स्थिति क्या हैं, बिहार में किसी से छुपा नहीं। फिलहाल बिहार तो आतंक का रणक्षेत्र बनता जा रहा हैं। देश के किसी भी हाल में आंतकी घटनाएं हो रही हैं, उसका किसी न किसी प्रकार से सूत्र बिहार में मिल जा रहा हैं। ऐसे में बिहार का क्या सम्मान हैं, और क्यो विशेष दर्जा मिलना चाहिए। हमारी समझ से परे हैं। 
मैं भी बिहार का रहनेवाला हूं। मैंने लालू यादव का शासन भी देखा और नीतीश का भी शासन देखा। वहां क्या स्थिति हैं। मुझसे बेहतर कौन जानता है। एक घटना सुनाता हैं। आज से तीन साल पहले पटना के गांधी मैदान में भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक चल रही थी। ये उस वक्त की बात हैं जब बिहार में विधानसभा के चुनाव की रणभेरी बज चुकी थी। एक दक्षिण से प्रसारित होनेवाली टीवी चैनल में जब हमने समाचार देखने के लिए, नौ बजे रात्रि में टीवी खोला तो देखा कि रात्रि के नौ बजे से लेकर नौ बजकर 22 मिनट तक नीतीश ही नीतीश दिखाई पड़ रहे थे। जब हमने इस संबंध में पता लगाया तो पता चला की नीतीश ने उक्त चैनल को पेड न्यूज के रुप में अपने पक्ष में इस्तेमाल करवाया। जब हमने इस संबंध मे पटना के ही एक वरिष्ठ पत्रकार जो नीतीश भक्त हैं, पूर्व में खुब पत्रकारिता जगत में नाम भी कमाया हैं, वयोवृद्ध हैं। इस संबंध में बात की तब उनका कहना था कि ये गलत नहीं हैं, हर नेता को अधिकार हैं कि वो अपने पक्ष में ऐसा करें । कमाल हैं नीतीश पेड न्यूज के आधार पर अति महत्वपूर्ण समाचारों को रुकवाकर अपने लिए चैनल को इस्तेमाल करें तो सहीं, बाकी करें तो गलत हैं।
अंत में, बिहार को किसी भी हालत में विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलना चाहिए, और इस प्रकार की केन्द्र पर बेवजह दबाव की राजनीति भी बंद होनी चाहिए। नहीं तो, हर प्रदेश के लोग ऐसा करना शुरु करेंगे। ऐसे में पूरे देश में अराजकता की स्थिति पैदा होंगी, देश टूटने के कगार पर होगा। अच्छा होगा कि बिहार के नेता, अपने पुरुषार्थ को जगाकर, स्वयं बिहार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये। ऐसे देश में कई राज्य हैं, जो स्वयं आगे बढ़े हैं, किसी से भीख नहीं मांगा और न ही विशेष राज्य का दर्जा के लिए, अधिकार रैली का आयोजन, अपने प्रांत में कराया, तो फिर बिहार में इस प्रकार की अधिकार रैली क्यों.........................

Thursday, October 11, 2012

कौआ और भैस भी काला हैं, इनका क्या होगा नीतीशजी.............................

बहुत पहले कहानियां सुना करता था कि जब किसी राजा या शहंशाह की सवारी किसी रास्ते से गुजरती तो उस रास्ते पर चलनेवाले या किसी न किसी प्रकार से जूड़े रहनेवाले को आगाह किया जाता कि जहांपनाह की सवारी आ रही हैं, सभी होशियार हो जाये.............। अब हालांकि ऐसा देखने को नहीं मिलता, पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों जब से अधिकार यात्रा पर निकले हैं और जिस प्रकार से उनका चारो ओर विरोध हो रहा हैं। हम ये कह सकते हैं कि जिस प्रकार जूतमपैजार हो रहा हैं। कहीं उनकी सभा में कुर्सियां तो कहीं चप्पल जूते तक बरस रहे हैं। ऐसे में उनके अधिकार यात्रा से संबंधित अधिकारियों ने ऐसी ऐसी कारनामें शुरु की हैं, जिस कारण उनकी ये यात्रा, अधिकार कम शर्मनाक यात्रा में ज्यादा तब्दील हो गयी हैं, पर नीतीश तो नीतीश हैं। उन पर इन सभी चीजों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। फिलहाल सत्ता के मद में वे इतने डूब गये हैं कि उन्हें अपना विरोध भी पसंद नहीं, गर कोई उनका विरोध करता हैं तो वे उसे इतने अच्छे ढंग से देख ले रहे हैं कि जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं।  
इसमें कोई दो मत नहीं कि लालू का पन्द्रह साल का शासन नरकमय था, पर नीतीश जी आपको इसका ही तो लाभ मिला कि जनता ने लालू एंड कंपनी को सत्ता से हटाकर, आपको सत्ता सौंप दी, पर आपने तो इन दिनों हद कर दी हैं। जैसे साढ़ लाल रंग देखकर भड़क जाता हैं, वैसे ही आप काला रंग देखकर भड़क जा रहे हैं। स्थिति ऐसी हैं कि आपके कई सभाओं में बिहार की बहू बेटियों के शरीर से काला दुपट्टा तक उतरवा लिया जा रहा हैं, पर आपको शर्म नहीं आ रही। कई जगहों पर युवाओं से काला टी शर्ट उतरवा लिया गया हैं। अगर कहीं मुस्लिम महिलाएं काला बुर्का पहनकर आपकी सभा में आ गयी तो आप क्या करेंगे, तब तो आपको मुस्लिम वोट ही खिसक जायेगा, पर हमें लगता हैं कि आप ऐसी गुस्ताखी नहीं करेंगे, क्योंकि आप बहुत ही चालाक हैं। कभी - कभी तो मैं सोचता हूं कि गर आपका वश चले तो आप पूरे बिहार से भैस और कौए का न सफाया कर दें क्योंकि इनका रंग भी काला हैं। ऐसे तो मैं आपको अच्छी तरह से जानता हूं कि आप बिहार के प्रति कितने ईमानदार है। अगला जब 2014 का लोकसभा चुनाव होगा तो आपकी सारी हेकड़ी निकल जायेगी और साथ ही आपके साथ चलनेवाले भाजपा और भाजपा के सुशील कुमार मोदी की भी हवा निकल जायेगी, क्योंकि  आपको शायद नहीं पता हैं कि लालू एंड कंपनी को खोने के लिए कम और पाने के लिए ज्यादा हैं, जबकि आपको खोने के लिए ज्यादा और पाने के लिए कम हैं। 
इधर आपकी नरेंद्र मोदी से ज्यादा नाराजगी दीखती हैं। पर सच्चाई ये हैं कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी गुजरात के लिए विशेष पैकेज की मांग नहीं की। फिर भी गुजरात प्रगति के शिखर पर हैं, पर आप बिहार के लिए स्पेशल पैकेज की मांग के लिए अधिकार यात्रा पर निकल गये हैं, जबकि सच्चाई ये हैं कि जब बिहार में लालू - रावड़ी का शासन था, तब भी बिहार के लिए विशेष पैकेज की मांग की गयी थी, और आप जब केन्द्र में सत्तासीन थे, तब उसका विरोध किया था, अब विशेष पैकेज की मांग आपने कहां से शुरु कर दी, ये हमारी समझ से परे हैं।
आपने आजकल पूरे बिहार को शराब पीनेवाला प्रदेश बना दिया। जहां मैं रहता हूं वहां गली - गली में शराब बिक रही हैं, गांजा बिक रहे हैं। दूध के स्टाल तक पर शराब बिक रहे हैं, दिक्कत तो ये हैं कि हम अपने बच्चों को कैसे संस्कारित करें, क्योंकि अब तो शराबी, पीकर वो नंगा नाच कर रहे हैं, कि आम महिला आपको कोस रही हैं। कहीं ऐसा नहीं कि इनकी हाय आपको लेकर डूब जाये। फिर भी आपको तीन साल और शासन करने का लाइसेंस मिला हैं, आराम से शासन करते रहिए, नरेंद्र मोदी और भाजपा को धकियाते रहिये, बिहार का नाम डूबाते रहिए, कांग्रेस और सोनिया - राहुल से संबंध मजबूत करते रहिए। हमारा वोट देने का वक्त आयेगा तो हम आपको सत्ता से धकेल जरुर देंगे। फिर उसके बाद आप किसी भी लड़की से काला दुपट्टा उतरवाने का प्रयास तो दूर उधर नजर उठाकर देख भी नहीं पायेंगे।