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Wednesday, August 26, 2015

“मांझी – द माउंटेन मैन” ये बाते कुछ हजम नहीं हुई...........

“मांझी – द माउंटेन मैन”
ये बाते कुछ हजम नहीं हुई...........
आजकल “मांझी – द माउंटेन मैन” फिल्म की चर्चा जोरों पर है। जिसे देखो – दिये जा रहा हैं। टीवी पर मांझी, अखबारों में मांझी, पत्रों में मांझी और पत्रिकाओं में मांझी। कोई मांझी से खुद को जबर्दस्ती जोड़े जा रहा हैं, पुरानी अखबारों के कतरन के साथ कि सबसे पहले हमनें इस खबर को स्थान दिया था, तो कोई अखबार दिये जा रहा हैं, कि गर वो नहीं होता तो मांझी को इतना स्थान नहीं मिलता, लोग जानते ही नहीं, जबकि सच्चाई ये हैं कि आपका हर अच्छा काम, आपको वो स्थान दिलाकर रहता हैं, जिसके आप हकदार हैं, चाहे इसके लिए आपके जीवन में कितनी भी रुकावटें क्यों नहीं आये। दशरथ मांझी – उसके जीते जागते उदाहरण है। एक ऐसा व्यक्ति जो दलित समुदाय से आता है। जिसका जीवन ही गाली से शुरु होता हैं और गाली पर ही खत्म हो जाता है, पर ये व्यक्ति किसी का प्रतिकार नहीं करता, वह तो कठोर पठार को काटकर, सड़क बना देता हैं, जिस रास्ते पर आज लोग चल रहे हैं, उसके लिए उसने कितनी गालियां सुनी, कितने ताने सहे, कितने थपेड़ें सहे, पर लक्ष्य को पाकर रहा। इस लक्ष्य को पाने के लिए, उसे क्या-क्या नहीं करना पड़ा। पर वो स्थितियां व परिस्थितियां आज भी मौजूद है।
जरा देखिये........
उसके नाम पर फिल्म बन गयी, पर उसके लोगों व समुदाय का क्या हाल हैं....जिन लोगों ने उसके नाम पर करोड़ों कमाए या कमा रहे हैं, उन्होंने क्या किया?
एक चैनल हैं, मैं उसे अराष्ट्रीय चैनल मानता हूं, नाम हैं – एनडीटीवी। देख रहा था, जिसमें दशरथ मांझी के परिवार के लोग बोल रहे थे कि सुप्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान आये। बोले कि दशरथ का घर बनवा देंगे, पर घर आज तक नहीं बना। क्या आमिर खान के पास इतने पैसे भी नहीं कि वो दशरथ मांझी के परिवार को दो कोठरी का घर बनवाकर दे दें। और जब उसे बनवाना नहीं था तो फिर वायदा क्यों किया।
दूसरी बात, दशरथ मांझी के ही परिवार से जूड़े एक महिला का कहना था कि वो पानी के लिए काफी दिक्कत उठा रही हैं, एक चापाकल हो जाता तो मजा आ जाता। क्या वहां एक चापाकल लगवाने की भी ताकत किसी में नहीं हैं। जबकि अखबारवाले या पत्रकार जो चिल्ला – चिल्लाकर भोंपू बजाकर ये कह रहे है कि मैंने पहले छापी तो क्या वे भी इस हालात में नहीं कि वहां एक चापाकल लगवा दें। हद हो गयी भाई। हमें पानी की जरुरत हैं और लोग कह रहे हैं अखबार पढ़ों, हमें भोजन की जरुरत हैं और लोग कह रहे हैं सिनेमा देखो। कमाल है........
और फिल्म भी मैंने देखी, देखकर निहाल हो गया.......
फिल्म में श्रीमती इंदिरा गांधी भी हैं, जो बोल रही हैं कि उनके हाथों को मजबूत करिये, कमाल है गरीबी हटाओ की बात हो रही हैं, इमरजेंसी के पहले का चित्रण हैं और हाथ को मजबूत की बात। कोई बता सकता हैं कि इंदिरा जी का चुनाव चिह्न हाथ कब हुआ।
यहीं नहीं, मांझी दिल्ली जा रहा हैं और जनक्रांति की बात हो रही हैं, ये जनक्रांति क्या हैं भाई, कब हुआ था......हमें तो मालूम नहीं। हां संपूर्ण क्रांति सुना था, जयप्रकाश नारायण ने आह्वान किया था। बात 1974-75 की हैं। यानी जो मन करें दिखा दो, जो मन करें तकिया- तकिया खेला दों, और माल बटोर लो। दशरथ के नाम पर पैसा और ख्याति मिले और क्या चाहिए......

देश जाये तेल लेने और मांझी का परिवार जाये तेल लेने। हम तो बम बम हो गये न.......

Thursday, August 13, 2015

नीतीश का डीएनए करे पुकार...............

नीतीश का डीएनए करे पुकार
बबुआ नीतीश अब जइब हार
पहले दिया लालू को झटका
बाद में दिया भाजपा को अटका
लगे हाथ मांझी को पटका
फिर दिया चारा लालू को डाल
बबूआ नीतीश अब जइब हार
जंगल राज का देख रहा सपना
गंदगी - मैला से ढक दिया पटना
न कोई नीति न हैं सिद्धांत
बबुआ नीतीश अब जइब हार
राबड़ी खुश हो, देख रही सपना
घूटना टेक, नीतीश हुआ अपना
एमएलए बनेगा, पुतर हमार
बबुआ नीतीश अब जइब हार
तीर- लालेटन मे होड़ मची है
भ्रम पाल, सब लगी हुई है
जनता पटखनी देने को तैयार
बबुआ नीतीश अब जइब हार

Sunday, June 21, 2015

नीतीश अर्थात् भस्मासुर................

बिहार में एक नेता पैदा हुआ - नीतीश, जिसे आप भस्मासुर भी कह सकते हैं, क्योंकि इस नेता को लालू के खिलाफ भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने खड़ा किया.........अब वहीं नेता भाजपा को खत्म करने की बात कर रहा हैं, पर उसे पता नहीं कि भस्मासुर तो भस्मासुर ही होता हैं, वो पैदा ही होता हैं भस्म हो जाने के लिए.....बस विधानसभा चुनाव का इंतजार कीजिये...बिहार की जनता ने तो संकल्प ले ही लिया हैं कि...............
जो लालू के संग जायेगा,
कभी सीएम न बन पायेगा.........
नीतीश का घमंड तोड़िये,
नया विकल्प चूनिये.........
बिहार का सम्मान बढाईये,
बेटे और पत्नी से प्यार करनेवाले नेता को साइड करिये...........
अबकी बार किसकी सरकार,
नीतीशविहीन बिहार सरकार.............
जो गंदगी फैलाये, वो नेता नहीं.
जो योग का विरोध करें, वो नेता हमें पसंद नहीं...........
जो बिहार से करें प्यार
वो नीतीश का घमंड तोड़ेगा इस बार............
पत्रकारों, अखबारों और चैनलों को, अपनी ओर करने की नीतीश ने की तैयारी,
रुपयो का बंडल लेकर जदयू नेता, मालिकों का मुंह बंद करने को हो रहे बेकरारी............
जिसने दलितों का किया अपमान
उस नीतीश को, न अब दें सम्मान.............

Sunday, December 21, 2014

घोर आश्चर्य ?


झारखंड में विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद से लेकर मतदान संपन्न होने तक, मात्र चंद पैसों के लिए विज्ञापन के नाम पर --- हरे मोदी, हरे मोदी, मोदी- मोदी, हरे हरे, हरे अमित शाह, हरे अमित शाह, अमित शाह – अमित शाह, हरे हरे।। - का जाप करनेवाले, आज ताल ठोंक रहे हैं कि राज्य में उनके चलते मतदान की प्रतिशतता बढ़ी हैं, क्या ये शर्मनाक नहीं हैं, क्या ये खुद को ईश्वर बताने की, मानने की कुटिल चाल नहीं हैं, जनता ऐसे लोगों से, ऐसे अखबारों और चैनलों से सावधान रहें, क्योंकि कुछ ही दिनों में मतगणना होगी, और जिसकी सरकार बनेगी, ये मीडिया वाले, उनकी चरणवंदना करने में सबसे आगे रहेंगे, साथ ही अपने हक का झारखंड लूटने में प्रमुख भूमिका निभायेंगे, उसके बाद क्या होगा, होगा वहीं - जनता एक बार फिर अन्य दिनों की तरह मीडियावालों से छली जायेंगी। ये मैं इसलिए लिख रहा हूं कि आज सुबह जैसे ही मेरी नींद खुली। एक अखबार ने राज्य में भारी मतदान पर संपादकीय लिख डाली और ये मान बैठा कि उसके कारण ऐसा संभव हुआ हैं। उसने एक अभियान चलाया और जनता उस अभियान से प्रभावित होकर 9 प्रतिशत ज्यादा मतदान कर बैठी, जबकि सच्चाई ये हैं कि राज्य में मतदान की प्रतिशतता बढ़ने के दूसरे बहुत सारे कारण है। जनता की वर्तमान सरकार से नाराजगी सबसे बड़ा कारण हैं, साथ ही बार-बार गठबंधन की सरकार के कारण विकास कार्य प्रभावित होना भी एक कारण हैं। तीसरा सबसे बड़ा कारण मोदी के बार – बार झारखंड आने और खुद को विकास के एजेंडें तक सीमित रखने और विश्वास बनाने, कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों का इस चुनाव के प्रति घोर निराशा का होना और मीडिया का मोदी के इर्द-गिर्द सिर्फ चंद पैसों के लिए जी – हुजूरी करना शामिल हैं। मीडिया ये नहीं भूले कि झारखंड को बर्बाद करने में गर नेताओं की अहम भूमिका हैं तो पत्रकारों की भी कम भूमिका नहीं हैं। झारखंड में पत्रकारों की एक बहुत बड़ी लंबी लिस्ट हैं, जिन्होंने भ्रष्टाचार के रिकार्ड बनाये हैं गर इसकी सूची प्रकाशित हुई तो बहुत सारे लोग नंगे हो जायेंगे। कोई किसी आर्गेनाइजेशन का संयोजक बनने के लिए तो कोई सूचना आयुक्त बनने के लिए, कोई सरकारी संस्थानों में अपने भाई-भतीजों को नौकरी दिलवाने के लिए, कोई कोयला और सोने के खदानों को पाने के लिए, कोई निजी संस्थानों में खुद को प्रतिष्ठित करने के लिए कैसे झारखंड की भोली – भाली जनता को लूटा हैं। वो सभी जानते हैं, पर अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया को देखे तो पता चलेगा कि दूनिया की सारी सच्चाई और ईमानदारी का ठेका, इन्हीं मीडियाकर्मियों ने ले रखा हैं। जिस प्रकार राष्ट्रीय चैनलों के मालिक और कई संपादक अपनी जमीर नेताओं के आगे गिरवी रखा हैं, उसी प्रकार झारखंड में भी वो चीजें देखने को मिल रही हैं, ऐसे में झारखंड की प्रगति का रोना-रोना मीडियाकर्मियों या उनके बॉस या उनके मालिक को शोभा नहीं देता। उनके इस रोने को घड़ियाली आंसू कहना, घड़ियाल तक का अपमान हैं। ये वे लोग हैं, जिन्हें ईश्वर ने दंडित करने का विशेष अभियान चलाने का शायद फैसला कर लिया हैं, जल्द ही वे इन फैसलों के अमल में आने के बाद दंडित होंगे, क्योंकि दो प्रकार के संविधान हैं। एक जिसे ईश्वर ने बनाया और एक वो जिसे मनुष्य ने अपनी सफलता और असफलता को सिद्ध करने के लिए खुद से संविधान बना डाली। मनुष्य के बनाये संविधान से तो वो बच जायेगा, पर ईश्वर के बनाये संविधान से बच पायेगा, हमें नहीं लगता। इन सभी ने शर्म बेच खाया हैं, इन सभी ने ईमान बेच खाया हैं, निर्मल बाबा और हनुमान यंत्र में भी इन्हें भेद नजर आता हैं, चूंकि निर्मल बाबा ने विज्ञापन के नाम पर माल नहीं दिया, तो उसे बदनाम कर ड़ाला, और जिसने विज्ञापने के नाम पर माल दिया, उसे मालोमाल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा दी। जबकि ईश्वर की अदालत में दोनों समान रुप से अपराधी हैं। ये तो एक प्रकार का उदाहरण, मैंने सामान्य जनता के सामने रखा हे। मैं झारखंड की जनता से यहीं कहूंगा कि आप स्वयं को इन अखबारों और चैनलों से बचा कर रखिये, क्योंकि इन पर विश्वास करना, खुद को धोखे में रखना, मूर्ख बनना और राज्य को गर्त में डालने के सिवा दूसरा कुछ भी नहीं..............

Saturday, December 13, 2014

झारखंड के नवनिर्माण के बाद चल रही गठबंधन सरकार पर पहला कील, नीतीश के चहेतों ने ठोका.....................

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को महापुरुष सिद्ध करने में बिहार – झारखंड से प्रकाशित होनेवाले एक अखबार ने एड़ी-चोटी लगा दी है। उस अखबार को लगता हैं कि ऐसा करने से दोनों प्रदेशों की जनता उसके झूठी खबरों के झांसे में आ जायेगी, और वहीं करेगी, जो वह सोचता हैं, पर क्या ऐसा संभव हैं। गाहे – बगाहे, उक्त अखबार में नीतीश कुमार का बयान प्रमुखता से छापा जाता हैं, जैसे लगता हैं कि नीतीश वर्तमान राजनीति के आदर्श पुरुष हैं। हाल ही में झारखंड में हो रहे चुनाव के दौरान बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने चहेते खीरु महतो, बटेश्वर महतो और जलेश्वर महतो के पक्ष में चुनावी सभा की और अपने चिर परिचित अंदाज में भाजपा की बखिया उधेड़नी शुरु की। हम आपको बता दें कि नीतीश का भाजपा के खिलाफ विषवमन तब से शुरु हुआ, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इनके सपने को पूर्णतः ध्वस्त कर दिया, और वे भारत के प्रधानमंत्री बन गये। तभी से उनके लिए भाजपा अछूत बन गयी और लगे भाजपा को अपनी ताकत दिखाने, हालांकि उनकी कितनी ताकत हैं, वो तो पता लोकसभा के चुनाव में ही लग गया, जब उनकी पार्टी दो सीटों में सिमट गयी और वे उससे इतने विचलित हुए कि जिसके खिलाफ जनता ने उन्हें वोट देकर बिहार का सिरमौर बनाया था, वे उसी यानी लालू प्रसाद यादव के गोद में बैठकर भाजपा को मिटाने का सपना देखने लगे हैं। सपना उन्हें देखना भी चाहिए, पर ये सपना पूरा होगा या खुद ही राजनीति से मिट जायेंगे, इसका जवाब तो बिहार की जनता बेसब्री से देने को तैयार हैं। कुछ – कुछ इसकी तैयारी तो नीतीश के ही उत्तराधिकारी, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपने बयानों से करनी शुरु कर दी हैं। अभी हाल ही में एक चुनावी सभा में इनका बयान आया है, जिसे रांची से प्रकाशित उक्त अखबार ने प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से छापा कि मोदी बतायें, गठबंधन सरकार के लिए कौन सी कीमत चुकायी। इस पर उन्होंने कई प्रमाण भी दिये, जिसमें उन्होंने ये सिद्ध करने की कोशिश की कि गठबंधन सरकार से कोई दिक्कत नहीं होती, उन्होंने इसके लिए केन्द्र में गठबंधन के तौर पर चली अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का उदाहरण दिया, पर शायद उन्हें नहीं मालूम कि झारखंड के नवनिर्माण के बाद चल रही गठबंधन सरकार पर पहला कील, नीतीश के चहेतों ने ही ठोका था। क्या नीतीश को मालूम नहीं कि उनके ही चहेतों ने बाबूलाल मरांडी की चल रही सरकार को नाक में दम कर रखा था, वह भी भ्रष्टाचार के लिए। क्या नीतीश को मालूम नहीं कि उन्हीं के एक बड़े नेता जार्ज फर्नांडीस ने उर्जा मंत्री लाल चंद महतो के आवास पर प्रेस काँफ्रेस कर तत्त्कालीन मंत्री मधु सिंह को भ्रष्टाचार के आरोप में पार्टी से निलंबित कर दिया था। क्या नीतीश को मालूम नहीं कि बाबू लाल मरांडी की सरकार क्यों गिर गयी थी। बाबूलाल मरांडी की गलती क्या थी। क्यों उन्हें सत्ता से जाना पड़ा और अर्जुन मुंडा को सत्ता सौप दी गयी। क्या नीतीश बता सकते हैं कि बाबू लाल मरांडी की गलती क्या थी और उनके चहेते रमेश सिंह मुंडा, जलेश्वर महतो, बच्चा सिंह, मधु सिंह, लाल चंद महतो किन कारणों से बाबू लाल मरांडी से चिढ़े थे, कि उक्त अखबार को मालूम नहीं हैं। हमें लगता हैं कि मालूम तो सबको हैं, पर वे जनता को दिग्भ्रमित करना चाहते हैं। सच्चाई यहीं हैं कि तत्कालीन भाजपा गठबंधन बाबूलाल मरांडी सरकार को जो नीतीश के चहेतों ने बेदखल किया, वह भी उलजुलूल- भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए, उसका दंश आज भी झारखंड झेल रहा हैं, और नीतीश को इसके लिए पूरे प्रदेश की जनता से माफी मांगनी चाहिए कि उनके चहेतों ने जो गठबंधन सरकार को नहीं चलने देने का बीजारोपण किया, वो आज भी झारखंड में जारी हैं, जिसके कारण झारखंड आजतक अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सका। जो नीतीश बिहार के विकास को लेकर खुद को चिंतित होना दिखाते हैं, उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए, कि उस विकास में भाजपा की भी सहभागिता रही, अकेले उन्होंने ही बिहार की तकदीर नहीं बदली और बिहार की क्या स्थिति हैं, उस पर ताल ठोंकने के पहले वो रिपोर्ट देख लेनी चाहिए, नीतीश को, जिसमें बिहार की राजधानी पटना को सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल किया गया हैं। ये हैं बिहार की छवि। जिस लालू की गोद में बैठकर, बिहार को आगे बढ़ाने का दावा कर रहे हैं, नीतीश को मालूम होना चाहिए कि पन्द्रह साल लालू परिवार और दस साल करीब आपका भी शासन हुआ, और बिहार की राजधानी पटना में आनेवाले बाहर के लोग अभी तक नाक पर से रुमाल हटाना नहीं छोड़ा हैं। यत्र-तत्र-सर्वत्र मल-मूत्रों से अटा पटा आपका पटना बता देता हैं कि यहां कितना विकास हुआ। आपके नेता कितने अच्छे ढंग से अपनी बातों को रखते हैं, वो कभी – कभी नहीं, बल्कि हमेशा राष्ट्रीय व प्रादेशिक चैनलों की सुर्खियां बनती हैं। दस सालों में हमने यहीं देखा हैं कि आज भी बिहार की जनता अच्छे स्वास्थ्य के लिए तमिलनाडू या दिल्ली की दौड़ लगाती हैं। पढ़ाई के लिए आज भी बिहार के बच्चे, बिहार में नहीं बल्कि दक्षिण के प्रदेशों की दौड़ लगाते हैं। पर आपको शर्म नहीं। हां, आपको इसके लिए मैं जरुर धन्यवाद दूंगा कि आपने अपने शासनकाल में दारु की दुकान हर स्कूल-कालेजों के पास खुलवा दी, ताकि बच्चें आराम से दारु के बारे में जाने ही नहीं, बल्कि उसका रसास्वादन कर अपना भविष्य बेहतर कर सकें। ज्यादा जानकारी के लिए दानापुर के डीएवी स्कूल के पास चल रहे सरकारी देसी दारु की दुकान पर जाकर आप भी आनन्द की प्राप्ति कर सकते हैं। हमें लगता हैं कि इतनी बातें सब के समझ में आ जानी चाहिए, कि नीतीश कैसे हैं और क्या हैं। बिहार का तो वो हाल इस व्यक्ति ने किया हैं कि आनेवाले दिनों में बिहार के बच्चे दारु लेकर सड़कों पर दौड़ते नजर आये तो इसे अतिश्योक्ति नही समझना चाहिए। हालांकि इसके बावजूद नीतीश भक्त पत्रकारों की टोली, नीतीश में भगवान राम और कृष्ण की छवि देखे तो इसे हम और आप क्या कर सकते हैं. उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चुनौती तो हम दे नहीं सकते। उन्हें भी हक हैं नीतीश पुराण में लीन होने की....................

Tuesday, October 28, 2014

जरा सोचिये, क्या इन बेईमानों से झारखंड को बचाना आपका फर्ज नहीं...........................

झारखंड में चुनाव की घोषणा क्या हुई........आईपीएस अधिकारियों, पत्रकारों, बिस्तर की तरह दल बदलनेवाले नेताओँ, अधिकारियों की बन आई हैं। सभी की पहली पसंद भाजपा हो गयी हैं। शायद उन्हें मालूम हैं कि भाजपा में जाने का मतलब श्योर शॉट - विधायक बन जाना हैं। भाजपा वाले भी खुश हैं - उनके दल के प्रति लोगों की सोच बदल रही हैं, माहौल बन रहा हैं, तो क्या गलत हैं। भाजपा के अंदर जो नेता व कार्यकर्ता जो मुंह पिजाये थे कि इस बार मोदी लहर में, उनका विधायक बनना तय था, बेचारे मुंह लटका लिये हैं, क्योंकि बाहर के जो नेता हैं, पहले से अपनी सीट बुक करवा चुके हैं, चूंकि विधायक हैं, इसलिए टिकट की दावेदारी तो प्रथम उन्हीे का बनता हैं। कल तक जो मुक्त कंठ से भाजपा को गरियाते थे, वे आज भाजपा नेताओं के साथ गलबहियां डाले हुए हैं, इधर भाजपा कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी फौज खिसयाई हुई हैं, पर क्या करें, अनुशासन का डंडा, उनको गुस्साने भी नहीं दे रहा। बहुत सारे भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं के बेटे और बेटियां, ये बोलने से नहीं चूंक रहे, अपने सगे संबंधियों को कि कल तक आप भाजपा का झंडा व डंडा ढोते थे, आपको क्या मिला। जब मेवा खाने का मौका आया, तो दूसरा दल से आया नेता और पुलिस अधिकारी विधायक बनने जा रहा हैं। आपको  क्या मिला - बाबाजी का ठुल्लू। बेचारे भाजपा नेता व कार्यकर्ता क्या बताये कि उनका भी इस मु्द्दे पर जी कसमसा रहा हैं, पर क्या करें।
इधर मीडिया के बंधु भी सदाचार के किस्से सुनाने लगे हैं। बड़े बड़े अखबार और चैनल के मालिक और तथाकथित पत्रकार चरित्र की बात कह रहे हैं। झारखंड प्रेम और उसकी दिशा पर आलेख लिख और दिखा रहे हैं। ये वो लोग हैं, जो पत्रकारिता की आड़ में सूचना आयुक्त, राज्यसभा सांसद और पता नहीं क्या- क्या बन चुके हैं और बनने का सपना देखते हैं। ये वे लोग हैं, जो बिल्डरों के अवैध धंधों को सहारा देते हैं, और ये बिल्डर इन पत्रकारों और अखबारों की आड़ में आम जनता के सपनों को लूट रहे हैं। कमाल हैं, झारखंड की जनता को लूटने के लिए और झारखंड को बर्बाद करने के लिए एक बार फिर नेता, पत्रकार, पुलिस अधिकारी और प्रशानिक उच्चाधिकारी मिल बैठ गये हैं, सभी विधायक बनने और बनाने की तिकड़म में व्यस्त हैं। इनके तिकड़मों को जो जानते हैं, उन लोगों ने भी इनका जवाब देने का मन बनाया हैं, जो वोट बेचते हैं और वोट बिकवाने तथा खरीदने का कारोबार करते हैं। सभी ने अपना दुकान खोल दिया हैं। गली मोहल्लों में नुक्कड़ सभा करने, ओटा पर बैठकी लगाने, वोटरस्लिप बांटने, पार्टी का झंडा लगाने, प्रति व्यक्ति वोटर की कीमत भी लग चुकी हैं, बस लीजिये और दीजिये का काम बाकी हैं।
दूसरी ओर ऐसे लोग हैं, जो इस प्रकार की हरकतों को देख, किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। फिर चुनाव आया हैं। कह तो सभी रहे हैं कि झारखंड बनाना हैं, पर क्या ऐसे में झारखंड बनेगा। जहां का मीडिया बिका हुआ हो, जहां के नेता दलबदलू हो, जहां के पुलिस पदाधिकारी जो आज विधायक बनने को आतुर हैं और जिनका सेवा के दौरान रिकार्ड खराब रहा हो, क्या ऐसे लोग झारखंड का निर्माण करेंगे। सवाल ये हैं....
इसलिए झारखंड की जनता से सादर अनुरोध......
कृपया आप किसी लहर में नहीं बहें.........
दल के साथ -साथ जिन्हें आप वोट देने जा रहे हैं, उनके बारे में पूरा रिपोर्ट कार्ड देखें.....
हो सकें तो जब तक आप मतदान नहीं कर लेते हैं, अखबार पढ़ना पूरी तरह बंद कर दें या चैनल देखना पूरी तरह बंद कर दें, क्योंकि ये आपके मन मस्तिष्क को प्रभावित करेंगे, क्योंकि ये विभिन्न दलों से पैसे लेकर वो सारे हथकंडे अपनाते हैं, जिससे वे खुद भी बच जाते हैं और कानून को धोखा देते हुए, आपको भी प्रभावित कर डालते हैं, गर ज्यादा जरुरी हो तो चैनल को सिर्फ नौटंकी के रुप में देखे, जिसका मतलब सिर्फ मनोरंजन होता हैं, ज्ञान बांटना नहीं..........
ये मौका बार बार नहीं मिलेगा....पांच साल के बाद मिलता हैं, झारखंड बनाने का जिम्मा केवल नेताओं का नहीं, आपका भी हैं, जरा सोचिये आप अपनी आनेवाली पीढ़ी को क्या देंगे, किसके हाथों में झारखंड सौपेंगे...बेईमानों के हाथों में या ईमानदारों के हाथों में....
मौका हैं, सही व्यक्ति को, देश हित में राज्य हित में, सदन में पहुंचाये...........

Thursday, December 20, 2012

गुजरात की जनता का अपमान बंद कर, जनादेश का सम्मान करें राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित नेता..........................

गुजरात की जनता ने एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के हाथों में गुजरात की बागडोर सौंप दी हैं। इस बार भी भारी बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी सत्तारुढ़ हुए हैं। ये अलग बात हैं कि इस भारी जीत को उनके विरोधी पचा नहीं रहे हैं, और फिर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए, उन्हें धर्मनिरपेक्ष बताने से इनकार कर रहे हैं। इसकी शुरुआत, बिहार से ही हुई हैं। बिहार में भाजपा की वैशाखी पर टिकी, नीतीश की पार्टी के एक प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा हैं कि वे नरेन्द्र मोदी को धर्मनिरपेक्ष नहीं मानते। ऐसे भी समय - समय पर इनकी पार्टी और इनके बहुत सारे नेता, जिसमें राजद से जदयू में गये शिवानंद तिवारी और राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी हैं जो नरेन्द्र मोदी को समय - समय पर नीचा दिखाने के लिए बेतुके बयान देते रहते हैं पर उन्हें नहीं मालूम कि उनका इस प्रकार का बयान, नरेन्द्र मोदी का अपमान नहीं, बल्कि सीधे तौर पर गुजरात की छः करोड. जनता का अपमान कर देता हैं, जो नरेन्द्र मोदी को बार - बार सत्ता सौंपता हैं। 
ऐसे ही लोग मीडिया में भी हैं। जो गाहे - बगाहे नरेन्द्र मोदी को नाना प्रकार के विभूषणों से समय - समय पर अलंकृत करते रहते हैं। जब - जब चुनाव आते हैं, इन मीडिया हाउस को कई साल पहले हुए गुजरात के दंगे याद आने लगते हैं, और इसका दृश्य वे बार - बार अपने टीवी चैनलों के माध्यम से जनता को दिखाने शुरु करते हैं। यहीं नहीं इस दंगे में नरेन्द्र मोदी को लपेटने का भी प्रयास करते है, पर गुजरात की जनता शायद इस घटना को उस रुप में नहीं लेती और अपने ढंग से मतदान कर, सबको बता देती हैं कि उसे अपने नरेन्द्र पर कितना भरोसा हैं। 
सवाल उठता हैं कि गुजरात में दगे हुए, तो उसके लिए भाजपा के नरेन्द्र मोदी दोषी, तो फिर हाल ही में असम में जो दंगे हुए, उसके लिए असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई व भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोषी क्यों नहीं। देश की भुतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो पूरे देश में सिक्ख विरोधी दंगे फैले, उसके लिए कांग्रेसी दोषी क्यों नहीं, जबकि उस वक्त देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी का दंगे पर ही विवादास्पद बयान आ गया था। दंगों पर मीडिया और देश के मूर्धन्य नेताओं का दोहरा मापदंड क्यों। आपके पास कानून हैं, संविधान हैं। आपके पास गर सबूत हैं, तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाये, कोई रोक रखा हैं क्या। अदालत में उन्हें दोषी सिद्ध करें और फिर बोले कि वो नरेन्द्र मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, पर बिना किसी सबूत के किसी व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष न बताकर, उसे दोषी सिद्ध कर देना, क्या गलत नहीं हैं।
इधर मैं देख रहा हूं कि जिसकी कोई औकात नहीं, जो खुद भाजपा के वैशाखी पर सत्तासुख प्राप्त कर रहे हैं,  या जिन्होंने सत्तासुख पाया हैं। जो समय - समय पर भाजपा का सहयोग लेकर संविधान में प्रमोशन पर संशोधन के समर्थन का सहयोग लेने को लालायित भी रहते हैं, पर जब भाजपा को सहयोग करने की बात आती हैं तब उसे सांप्रदायिक कहकर, कन्नी काट लेते हैं, जैसे लगता हैं कि भाजपा अछूत हैं, उसे भारतीय राजनीति में रहने का कोई हक ही नहीं। अब तो कई पार्टियों ने धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी करने का दुकान भी खोल दिया हैं। ये समय - समय पर धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी भी करते रहते हैं। जबकि सबसे बड़े सांप्रदायिक और जातिवाद तथा परिवारवाद के पोषक वहीं हैं। मुलायम की पार्टी समाजवादी पार्टी हो या लालू की पार्टी राजद अथवा मायावती की पार्टी बसपा। क्या ये पार्टियां जातिवाद का सहारा लेकर देश को तोड़ने का काम नहीं करती, क्या जातिवाद से देश को खतरा नहीं हैं। सांप्रदायिकता से देश को खतरा और जातिवाद से देश बनता हैं क्या। इस देश में तो ज्यादातर पार्टियां जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष घोषित की हुई हैं, वे खुद घोर सांप्रदायिक और जातिवाद की शिकार हैं। हाल ही में जाति आधारित जनगणना करवाकर,  इन पार्टियों ने सिद्ध कर दिया कि इनकी मानसिकता कितनी भयानक हैं और देश को तोड़ने के लिए ये कितना बड़ा षडयंत्र रच रहे हैं। 
इसमें कोई दो मत नहीं कि आज देश को नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं की जरुरत हैं, क्योंकि वो जो कहता हैं, वो करता हैं। वो जाति की राजनीति नहीं करता। वो अपने छः करोड़ गुजरातियों की बात करता हैं। वो किसी दूसरे प्रांत से आये, नागरिकों को ये कहकर नहीं दुत्कारता कि तुम बिहारी हो, अपने प्रांत लौट जाओ। आज भी गुजरात के कई शहरों में लाखों की संख्या में बिहारी रहते हैं और गुजरात के विकास में चार चांद लगा रहे हैं साथ ही अपने बिहार में रह रहे परिवारों का भरण - पोषण कर रहे हैं। जरा दिल्ली में देखिये - शीला दीक्षित बिहारियों और यूपी के लोगों के बारे में क्या बयान जारी करती हैं। ये तो कांग्रेसी हैं। इनका इस प्रकार का बिहार व यूपी के लोगों के बारे में घटिया बयान क्यों आता हैं, पर जब शोर मचता हैं तो वो अपने बयान में क्यों सुधार करती हैं। पूछिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृश्वी राज चौहान से कि जब महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर अत्याचार होते हैं तब ये अपना मुंह क्यों सी लेते हैं। ये कुछ उदाहरण हैं। सभी को अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए। 
सब ने नरेन्द्र मोदी के नाम पर गुजरात की जनता का अपमान किया हैं। साथ ही अपमान करने का सिलसिला रुका भी नहीं हैं, जारी हैं। मीडिया व देश के कुछ पार्टियों के नेता अभी भी नरेन्द्र मोदी को सांप्रदायिक बनाने पर तूले हैं। जरुरत हैं जैसे गुजरात की जनता, गोधरा और अन्य दंगे भूलकर, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात को आगे बढ़ाने के लिए लालायित हैं। सभी मीडिया और अन्य पार्टियों के लोग अपने बयानों और कार्यो में सुधार लाये और गुजरात की जनता का अपमान करने का काम नहीं करें, क्योंकि आपको किसी ने ये अधिकार नहीं दिया कि आप बेवजह, उनका अपमान करें..............।

Wednesday, March 7, 2012

गुंडों को क्या हैं, हाथी से उतरे, साईकिल पर चढ़ गये ---------------


देश की नजर, 6 मार्च को होनेवाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों पर थी, पर मेरी नजर ज्यादातर उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम पर थी, कि वहां की जनता क्या जनादेश देती हैं। जनता ने जनादेश दे दिया। पिछली बार मायावती की झोली भर दी थी, इस बार मुलायम की झोली भर दी। ऐसी झोली भर दी कि पांच सालों तक कोई किच किच न हो। कोई राजनीतिज्ञ उलाहना न दे कि जनता ने जनादेश तो दिया पर बहुमत नहीं। अब लो दे दिया, काम करो। इसके पहले बहुमत मायावती को दिया, पर मायावती को अपनी मूर्ति और हाथी को सजाने से, वक्त ही नहीं मिला कि वो उत्तर प्रदेश के बारे में सोचे। मायावती तो जानती हैं कि यूपी के दलित, हाथी को छोड़कर, दूसरे पर बटन दबा ही नहीं सकते और रही बात पंडितों और मुस्लिमों की, तो पंडितों को दक्षिणास्वरुप विधानसभा की टिकट और मुस्लिमों को भाजपा का भय दिखाकर, फिर से सत्ता हासिल कर लेंगे, पर ऐसा हो न सका। बसपा का नारा -- चढ़ गुंडे की छाती पर, बटन दबेंगी हाथी पर और ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी दिल्ली जायेगा। काम नहीं आया और हाथी लखनउ तक, ही सिमट गया। इधर समाजवादी पार्टी की बल्ले बल्ले हैं, जनता ने पूर्ण बहुमत दे दिया। बांछे खिल गयी। बहुमत की बात तो समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने सपने में भी नहीं सोची होगी, पर आज बहुमत हैं। न कांग्रेस को मनाने का झंझट और न निर्दलीयों के आगे घूटने टेकने की जरुरत। बस सब बम - बम हैं। भाई यूपी की जनता ने एक बार भाजपा को भी पूर्ण बहुमत दे दिया था, पर राम मंदिर की आस्था और मंदिर निर्माण की दृढ़संकल्पिता, उसे कहीं की नहीं रखी और भाजपा आज तीसरे नंबर पर आकर अटक गयी। लगता हैं कि भाजपा फिर कभी सत्ता में नहीं आयेगी। लेकिन देश की राजनीति ऐसी हैं कि कब कौन उछलकर मुख्यमंत्री पद पर चला जायेगा या किस की फिर से बहुमत आ जायेगी, कहां नहीं जा सकता। एक समय था कि लोग जनसंघ( अब भाजपा ) और उसके नेताओं के बारे में बोलते थे कि ये पार्टी कभी सत्ता में नहीं आयेगी, पर ये पार्टी देश की बागडोर भी संभाली, कई प्रदेशों में इनकी सरकार हैं, इसलिए इस पर बोलना व लिखना बेकार हैं।
इधर जब जनादेश का परिणाम आ रहा था, तब देश के राष्ट्रीय समाचार पत्रों व राष्ट्रीय चैनलों में कार्यरत कांग्रेस भक्त पत्रकार, जो कल तक यूपी में कांग्रेस की शानदार सफलता का दंभ भरते आ रहे थे। अपना चेहरा छुपाते नजर आये। कुछ ऐसे बेशर्म कांग्रेस भक्त पत्रकार भी थे, जो बेशर्मी की सारी हदें पारकर, अपना चेहरा बार - बार चैनलों पर दिखा रहे थे। खैर कांग्रेस का जो होना था। हो गया। कांग्रेस पार्टी आज भी परिवारों की पार्टी हैं। हाई - फाई पार्टी हैं। जिसमें जनता की भागीदारी कम, नेताओं के खानदानों की भागीदारी ज्यादा होती हैं, और परिणाम सबके सामने हैं।
समाजवादी पार्टी -- नाम कितना सुंदर। समाज की बात करनेवाली यानी सामाजिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, देश व समाज को आगे ले जानेवाली पार्टी। पर क्या लगता हैं कि इस पार्टी से उत्तरप्रदेश का भला होगा। आज तो देश के सभी समाचार पत्रों में बड़े बड़े संपादक, और अन्य स्तंभकार, मुलायम पुत्र अखिलेश की जय जय कर रहे हैं। चाटुकारिता की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। मुलायम को सही युवराज बता रहे हैं। राहुल पर फब्तियां कस रहे हैं। ये लिखनेवाले और बोलनेवाले वो लोग हैं, जो लाखों नहीं, करोड़ों में खेलते हैं। जो यूपी की गांवों और गलियों का इतिहास भूगोल भी नहीं जानते, पर बता रहे हैं कि यूपी को अखिलेश यादव नया मार्ग दिखायेंगे, अब यूपी बहुत आगे निकल जायेगा। सपा दिल्ली में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी। हां हां क्यों नहीं निभायेगी, जनता ने भूमिका निभाने के लिए ही तो जनादेश दिया हैं। पर आज अखिलेश के आगे नतमस्तक होकर, अखिलेश यादव की चरणवंदना करनेवाले ये सारे पत्रकार, जब कांग्रेस दूसरे या तीसरे नंबर पर अथवा अपनी सीटें पूर्व के विधानसभा चुनाव के मुकाबले दुगनी कर लेती तो फिर देखते क्या होता। ये सारे के सारे पत्रकार राहुल शरणं गच्छामि कहकर, राहुल गांधी की चरणवंदना में लगे रहते। हम आपको ये भी बता दें कि भारतीय राजनीति और यहां की जनता कैसे जनादेश देती हैं, वो सबको पता हैं.............कल विदेशियों के हाथ में गर ये सत्ता सौंप दें तो इस पर भी किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि यहां किसे अपने देश और समाज की बढ़ोतरी की चिंता हैं, सभी अपने आप में लगे हैं। समाजवादी पार्टी को ही ले लो। ये समाजवाद की बात करते हैं। इंदिरा गांधी के शासनकाल के समय परिवारवाद की आलोचना करनेवाले इन समाजवादियों से पूछों कि तुम आज क्या कर रहे हो। जरा देखो -- मुलायम सिंह यादव, सांसद हैं अब मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, बेटा अखिलेश यादव खुद सांसद हैं और मुलायम की बहु डिंपल ये भी सांसद बनने जा रही थी, पर जनता ने इन्हें जिताकर नहीं भेजा, गर भेज देती तो ये भी सांसद होती। जिस पार्टी की सोच, अपने परिवार पर आकर सिमट जाती हैं, वो समाजवादी कैसे हो सकता हैं। सवाल ये हैं।
सवाल ये भी हैं -- कि जिस पार्टी ने अभी सत्ता संभाला नहीं हैं। अभी तक अपना नेता चुना नहीं हैं। ये अलग बात हैं कि मुलायम ही मुख्यमंत्री होंगे और इनके बाद इनके बेटे, कांग्रेस की तरह अपनी पार्टी का झंडा ढोयेंगे, यूपी संभालेंगे। जब चुनाव परिणाम आते ही इनके गुड़ों ने अपनी औकात दिखानी शुरु कर दी तो आनेवाले समय में क्या होगा। क्या लोगों को मालूम नहीं कि गुंडों का क्या हैं, हाथी से उतरे और साईकिल पर चढ गये। समाजवादी पार्टी के लोगों ने क्या गुंडागर्दी दिखायी हैं जरा देखिये --- सपा के बहुमत की खबर आते ही यूपी के दस शहरों में सपा के गुंडों ने बवाल काटे। यूपी के संभल में सपा प्रत्याशी की जीत पर जीत में बौराएं गुंडों ने गोलियां चलायी, एक बच्चे की मौत हो गयी। झांसी में सपाईयों ने पत्रकारों को बाथरुम में बंद कर घंटों बंधक बनाये रखा। मेरठ, फैजाबाद, आगरा, संभल में स्थिति ऐसी हो गयी कि आंसूगैस के गोले छोड़ने पड़े। ये तो शुरुआत हैं, अभी पांच साल बाकी हैं। आप मानकर चलिये, कि सपा के राज में क्या होने जा रहा हैं............। पर इसके बावजूद हम चाहेंगे कि यूपी, अन्य विकसित हो रहे प्रदेशों की तरह विकसित हो, लेकिन ऐसा नयी सरकार कर पायेगी, क्योंकि गुंडे साइकिल पर बैठकर अभी से ही इतनी तेजी दिखा दी कि सारे सपने ही टूटते नजर आ रहे हैं। हां एक खुशखबरी हैं -- कांग्रेस व सपा भक्त पत्रकारों के लिए, कि वे मुलायम और अखिलेश का चरणवंदना कर अपनी किस्मत आजमायेंगे और अपने हिस्से का यूपी लूटकर, मुलायम और मुलायम के परिवार की तरह समाजवाद का असली चरित्र पत्रकारिता में दिखायेंगे।

Monday, June 13, 2011

बहुत कठिन है, डगर पनघट की..................................

जमशेदपुर लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। करीब हर छोटी – बड़ी पार्टियों ने अपनी ओर से उम्मीदवारी तय कर दी है। जिन बड़ी पार्टियों के बड़े नेताओं को टिकट मिलनी थी पर टिकट नहीं मिल पाया, उन्होंने अपनी पार्टी के खिलाफ शंखनाद भी कर दिया है, और एक तरह से ये कहकर ताल ठोक दिया कि अपनी पार्टी से न सहीं, दूसरे पार्टी का दामन थामकर वे चुनाव लड़ेंगे पर लड़ेंगे जरुर। जबकि कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अन्दर ही अन्दर टिकट न मिलने से नाराज है और अपने प्रत्य़ाशी की कब्र खोदने में लगे है। दूसरी ओर ऐसी भी पार्टियां हैं जो कल तक गठबंधन धर्म की दुहाई दे रही थी पर आज गठबंधन को ताक पर रख, एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवारी तय कर दी। हालांकि ये उपचुनाव आम तौर पर फ्रैंडली होगा, पर चुनाव संपन्न होने और परिणाम आने के बाद माहौल फ्रैंडली ही रहेगा, ये कहना मुश्किल है, क्योंकि जीत तो पचा ली जा सकती हैं, पर हार पचा पाना किसी भी पार्टी के लिए मुश्किल ही होगा। आश्चर्य इस बात की है जो झामुमो गठबंधन धर्म का दुहाई दे रही थी और भाजपा से सहयोग की बात कर रही थी, सुधीर महतो के टिकट की घोषणा के साथ ही नये नये झंझावातों को झेल रही हैं। उन्हीं की पार्टी से कभी लोकसभा का रास्ता तय कर चुकी सुमन महतो, तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम चुकी हैं। आजसू जो झामुमो की ही देन है, उसने भी अपनी पार्टी से आस्तिक महतो को उतार दियाहै। इधर कांग्रेस से बन्ना गुप्ता की उम्मीदवारी तय हो जाने से प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू और उनका कुनबा पूरी तरह से गुस्से में है, ये अलग बात हैं कि वो खुलकर नहीं बोल रहा, पर इतना तो तय हैं कि यहां भी सब कुछ ठीक नहीं है। कांग्रेस को लग रहा था कि गठबंधन के नाते, झाविमो के लोग उसकी मदद करेंगे, तो यहां झाविमो ने अजय कुमार को उतारकर, कांग्रेस की एकतरह से कमर ही तोड़ दी हैं, ऐसे में फिलहाल भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है, जहां विद्रोह की गुंजाईश कम दिखाई पड़ रही है, पर यहां भी सब कुछ ठीकठाक हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। कई ऐसे लोग हैं जो इस दौड़ में थे, पर टिकट नहीं मिलने से नाराज भी चल रहे हैं। कुल मिलाकर देखे, तो सभी जगह कुछ न कुछ अनबन है, और इसका परिणाम सभी पार्टियों को भुगतना पड़ेंगा।साथ ही ये भी तय हैं कि जमशेदपुर लोकसभा का चुनाव आनेवाले झारखंड की राजनीति की दशा और दिशा भी तय करेगा क्योंकि जो चुनाव जीतेगा, उसके हौसले बुलंद रहेंगे, साथ ही वो झारखंड में मजबूत स्थिति में होगा और जो हारेगा, उसकी स्थिति बहुत ही कमजोर होती जायेगी, क्योंकि इसका प्रभाव इस रुप में पड़ेगा कि हारनेवाली पार्टियों में भगदड़ की स्थिति होगी, जबकि जीतनेवाले अपने कुनबे को स्थिर और मजबूत करने की स्थिति में होंगे। शायद राजनीति केजानकार, इसीलिए इस चुनाव को झारखंड की दशा और दिशा से जोड़ रहे हैं। खुशी इस बात की हैं कि सभी पार्टियों ने अपनी उम्मीदवार जमशेदपुर की जनता के समक्ष उतार दिये है, अब जमशेदपुर की जनता के सामने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के विकल्प है, अब जमशेदपुर की जनता की भी परीक्षा हैं कि वो इतने विकल्पों में से किसे चुनती हैं, क्योंकि अब वो ये भी नहीं कह सकती कि उनके पास विकल्प नहीं था, आज उनके पास विकल्पों की भरमार हैं। देखतेहैं कि किसके माथे जीत का सेहरा और किसके माथे हार का ठीकरा फूटता हैं, तब तक नजर बनाये रखिये कि जमशेदपुर की जनता किसे संसद में भेजने के लिए राजी होती हैं।