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Saturday, March 11, 2017

यह चुनाव परिणाम सबक है, सभी नेताओं, पत्रकारों और ब्रांडिंग कंपनियों के लिए..........

आखिर जनता क्या चाहती है?
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की है, ऐसी जीत हासिल की है, कि ऐसी जीत रामलहर में भी नहीं हुई थी। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड पर शानदार कब्जा जमाया, तो जिस मणिपुर में उसके एक भी सदस्य विधानसभा में नहीं थे, वहां पर सत्ता की प्रबल दावेदार के रूप में उभर कर सामने आयी, गोवा में हालांकि उसे झटका जरुर लगा है, पंजाब में उसकी सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल सत्ता से बाहर हो गयी। इस चुनाव परिणाम के द्वारा उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड की जनता ने नेताओं की ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियों और उन पत्रकारों को भी खबरदार किया है, जो राज्यसभा जाने के लिए किसी भी पार्टी के लिए आजकल प्रवक्ता के रूप में स्वयं को चैनल के समक्ष प्रस्तुत कर रहे है। ये वे पत्रकार है, जिनका जनता से कोई सरोकार नहीं होता, बल्कि अपने मालिकों के द्वारा दी गयी चैंबर में एक समाचार पत्र या चैनल के प्रबंधक सह निदेशक के रुप में कार्य करते है। जरा एक उदाहरण देखिये...
एक पत्रकार ने सोशल साइट में स्वयं को खुलकर बसपा के प्रवक्ता के रूप में पेश किया, वे खूब बसपा, हाथी और मायावती के एजेंट के रूप में पेश आये और भाजपा नेता एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जमकर गरियाया। जब वे अपने सोशल साइट पर मायावती का चुनाव प्रचार कर रहे थे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गरिया रहे थे, उसी वक्त उनके समर्थक और पत्रकारिता जगत के मूर्धन्य लोग तथा वामपंथियों का समूह उनके पक्ष में खुलकर उनके प्रति समर्थन जूटा रहा था, पर आज इनकी स्थिति क्या है? सामान्य सा उत्तर – हास्यास्पद। अरे भाई जब हम पत्रकार है, तो हमें किसी खूंटे से बंधे होने की क्या जरुरत? जो सही है, उसे डंके की चोट पर लिखेंगे, बोलेंगे और करेंगे भी।
जरा देखिये, उक्त पत्रकार ने नौ मार्च को सोशल साइट पर क्या लिखा...
बहन जी के द्वार पर, भइ संतन की भीड़
मोटू लाला चंदन घिसै, तिलक देत श्रमवीर
इस दोहे के आधार पर उसने मोटू लाला को नरेन्द्र मोदी और अमित शाह करार दिया, जबकि श्रमवीर कहकर मायावती समर्थकों को मान बढ़ाया।
इसी पत्रकार ने नौ मार्च को ही लिखा...
रन अप टू अप रिजल्ट लेट्स अस रिकॉल बिहार
यानी उक्त पत्रकार ने कह दिया कि ११ मार्च को आनेवाला पांच प्रांतों का चुनाव परिणाम खासकर उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम, बिहार के चुनाव परिणाम की याद दिला सकते हैं।
और आज वहीं पत्रकार उत्तर प्रदेश के आये चुनाव परिणाम के बाद मायावती के बारे में लिख डाला कि अब...
मायावती का क्या होगा?
यानी आज उत्तर प्रदेश की जनता द्वारा दिये गये चुनाव परिणाम को भी वह स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा है, ये स्थिति है आज के पत्रकारों की...
जब पत्रकार बसपाई हो जाये
जब पत्रकार भाजपाई हो जाये
जब पत्रकार सपाई हो जाये
जब पत्रकार वामपंथी हो जाये
तो उससे सर्वाधिक नुकसान उस राज्य व देश को होता है, जहां वह पत्रकार रह रहा होता है, अरे कोई जीते, कोई हारे। हमें उससे क्या? हमें तो यह देखना है कि क्या जनता का हित सध रहा है, अगर जनता का हित सध रहा है तो ठीक है, अगर नहीं हित सधा तो हम सरकार किसी का हो, उसकी बैंड बजायेंगे। ऐसा नहीं कि हम हाथी, कमल, हाथ, साइकिल, तीर-धनुष, तीर, लालटेन आदि की सेवा में स्वयं को लगा देंगे और उसके बदले स्वयं को उपकृत करेंगे।
जिस दिन उत्तर प्रदेश का अंतिम चरण का मतदान समाप्त हुआ। उस दिन एक न्यूज चैनल ने अपने परिचर्चा में कई पत्रकारों को बुलाया, जो किसी न किसी पार्टी से जुड़े थे और उसकी प्रशंसा में स्वयं को आत्मानुरागी की तरह पेश कर रहे थे, जो बता रहा था कि आजकल के ये पत्रकार कितने गिर चुके है। हमें तो लगता है कि उन्हें स्वयं इस पर परिचर्चा करनी चाहिए कि आखिर वे कितने गिर सकते है, क्या उन्होंने अब ये ठान लिया है कि वे पत्रकारिता करते-करते बुढ़ापे की ओर कदम बढ़ाते ही, किसी दल की चाटुकारिता या नौकरी करेंगे और उसके बदले राज्यसभा जायेंगे, गर ऐसा है तो वे देश और समाज के सबसे बड़े दुश्मन है, हमें इनसे ज्यादा सावधान होना पड़ेगा, साथ ही देश व समाज को इनसे रक्षा के लिए कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे, क्योंकि निः संदेह इनसे देश को खतरा उत्पन्न हो गया है।
और अब ब्रांडिंग का दुकान चलानेवालों को भी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के चुनाव परिणाम ने एक करारा संदेश दिया है, संदेश उन नेताओं को भी दिया जो इन ब्रांडिंग का दुकान चलानेवालों के बल पर सत्ता का स्वाद चखने का मन बना चुके थे। अरे यार, काठ की हांडी एक बार चढ़ती है, बार-बार नहीं। बिहार में आप कमाल दिखा दिये तो इसका मतलब ये नहीं कि यूपी की जनता भी इस चक्कर में आ जायेगी। ऐसा नहीं है कि बिहार की जनता ने प्रशांत किशोर के कहने पर वोट जाकर डाल आयी थी। बिहार की सच्चाई यह थी कि लोकसभा के चुनाव परिणाम के बाद ही नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को पटखनी देने के लिए एक रणनीति बनाई, जातिगत सामाजिक समीकरण को उभारा, मुस्लिम, यादव और कुर्मी तथा अन्य पिछड़ी जातियों को गोलबंद किया और परिणाम सामने आ गया। लालू और नीतीश की जोड़ी मोदी पर भारी पड़ गयी। इसमें प्रशांत किशोर की बाजीगरी कहा थी? और जब ये बाजीगरी थी भी तो फिर ये कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सत्ता में क्यों नहीं ले आयी? उलटे राहुल गांधी की खटिया कैसे खड़ी हो गयी?
यहीं नहीं झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को भी इस चुनाव परिणाम से सबक लेनी चाहिए, जो वे ब्रांडिंग के नाम पर बेतहाशा पैसे खर्च कर रहे है, जरा पूछिये कि उन्हीं के राज्य में इवाई जिसे वे अपनी ब्रांडिंग के लिए रखा है, वहीं इवाई उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को सत्ता में क्यों नहीं ले आयी? अभी भी वक्त है, रघुवर दास जी समझ जाइये, क्योंकि किसी भी नेता को लोकप्रिय या अलोकप्रिय उसकी हरकतें, उसके काम-काज और जनता के प्रति उसकी संवेदनशीलता ही कराती है, न कि ब्रांडिंग करानेवाली कंपनियां।
इधर, हम स्वीकार करते हैं कि आज के चुनाव परिणाम से बसपा और कांग्रेस- सपा को बेहद निराशा हुई होगी, पर इसका मतलब ये नहीं कि वे मन में निराशा का भाव रखकर सब कुछ भाजपा के हाथों छोड़ दे। आज गर जनता इनसे नाराज हुई है, तो कल जनता इनके साथ भी हो सकती है, क्योंकि जनता तो जनता है, वह किसी की जागीर नहीं होती, जो बेहतर होगा, उनके पास जैसा विकल्प होगा, वह चुन लेगी, फिलहाल जनता को लगा कि भाजपा उसका बेहतर विकल्प है, इस बार भाजपा को सत्ता सौंपी है। याद करिये उत्तरप्रदेश में इसके पूर्व सपा और उसके पूर्व बसपा को इसी जनता ने सत्ता सौंपा था, इसलिए इस जनादेश को सबको सम्मान करना चाहिए, निराशा में आकर जनता का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं, न तो उन पत्रकारों को जो अपने गले में किसी विशेष पार्टी या दल का मंगलसूत्र धारण कर राज्यसभा जाने का ललक रखते हो अथवा वे लोग जो किसी न किसी पार्टी से जुड़े है।
बधाई भाजपा को, कि उसने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में बड़ी जीत दर्ज की। मणिपुर में अच्छी स्थिति दर्ज की। गोवा में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जबकि पंजाब में उसे करारी हार देखने को मिली। हम चाहेंगे कि वे इस सफलता, इस जीत को सामान्य रुप में लेते हुए, ज्यादा जोश न दिखाये, सीधे जनता से किये वायदे को पूरा करने में अपना समय व्यतीत करें, क्योंकि जनता, तो जनता है, वह किसी की नहीं होती, और नहीं वह किसी खूंटे में रहना पसंद करती है। उसका उदाहरण देखना है तो बिहार के लालू प्रसाद को ही देख लीजिये, बहुत घमंड किया करते थे, पर आज क्या है? बिहार में अकेले बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता का रसास्वादन और जनता की सेवा करने का विशेषाधिकार नीतीश को प्राप्त है। इसलिये विपक्षी दल जनता की सेवा को प्रमुख साधन बनाये और पत्रकार सत्ता से चिपकने की जगह जनहित में पत्रकारिता कर, समाज को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये।

Thursday, December 20, 2012

गुजरात की जनता का अपमान बंद कर, जनादेश का सम्मान करें राष्ट्रीय मीडिया और तथाकथित नेता..........................

गुजरात की जनता ने एक बार फिर नरेन्द्र मोदी के हाथों में गुजरात की बागडोर सौंप दी हैं। इस बार भी भारी बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी सत्तारुढ़ हुए हैं। ये अलग बात हैं कि इस भारी जीत को उनके विरोधी पचा नहीं रहे हैं, और फिर धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुए, उन्हें धर्मनिरपेक्ष बताने से इनकार कर रहे हैं। इसकी शुरुआत, बिहार से ही हुई हैं। बिहार में भाजपा की वैशाखी पर टिकी, नीतीश की पार्टी के एक प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा हैं कि वे नरेन्द्र मोदी को धर्मनिरपेक्ष नहीं मानते। ऐसे भी समय - समय पर इनकी पार्टी और इनके बहुत सारे नेता, जिसमें राजद से जदयू में गये शिवानंद तिवारी और राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी हैं जो नरेन्द्र मोदी को समय - समय पर नीचा दिखाने के लिए बेतुके बयान देते रहते हैं पर उन्हें नहीं मालूम कि उनका इस प्रकार का बयान, नरेन्द्र मोदी का अपमान नहीं, बल्कि सीधे तौर पर गुजरात की छः करोड. जनता का अपमान कर देता हैं, जो नरेन्द्र मोदी को बार - बार सत्ता सौंपता हैं। 
ऐसे ही लोग मीडिया में भी हैं। जो गाहे - बगाहे नरेन्द्र मोदी को नाना प्रकार के विभूषणों से समय - समय पर अलंकृत करते रहते हैं। जब - जब चुनाव आते हैं, इन मीडिया हाउस को कई साल पहले हुए गुजरात के दंगे याद आने लगते हैं, और इसका दृश्य वे बार - बार अपने टीवी चैनलों के माध्यम से जनता को दिखाने शुरु करते हैं। यहीं नहीं इस दंगे में नरेन्द्र मोदी को लपेटने का भी प्रयास करते है, पर गुजरात की जनता शायद इस घटना को उस रुप में नहीं लेती और अपने ढंग से मतदान कर, सबको बता देती हैं कि उसे अपने नरेन्द्र पर कितना भरोसा हैं। 
सवाल उठता हैं कि गुजरात में दगे हुए, तो उसके लिए भाजपा के नरेन्द्र मोदी दोषी, तो फिर हाल ही में असम में जो दंगे हुए, उसके लिए असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरुण गोगोई व भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोषी क्यों नहीं। देश की भुतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जो पूरे देश में सिक्ख विरोधी दंगे फैले, उसके लिए कांग्रेसी दोषी क्यों नहीं, जबकि उस वक्त देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी का दंगे पर ही विवादास्पद बयान आ गया था। दंगों पर मीडिया और देश के मूर्धन्य नेताओं का दोहरा मापदंड क्यों। आपके पास कानून हैं, संविधान हैं। आपके पास गर सबूत हैं, तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाये, कोई रोक रखा हैं क्या। अदालत में उन्हें दोषी सिद्ध करें और फिर बोले कि वो नरेन्द्र मोदी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं, पर बिना किसी सबूत के किसी व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष न बताकर, उसे दोषी सिद्ध कर देना, क्या गलत नहीं हैं।
इधर मैं देख रहा हूं कि जिसकी कोई औकात नहीं, जो खुद भाजपा के वैशाखी पर सत्तासुख प्राप्त कर रहे हैं,  या जिन्होंने सत्तासुख पाया हैं। जो समय - समय पर भाजपा का सहयोग लेकर संविधान में प्रमोशन पर संशोधन के समर्थन का सहयोग लेने को लालायित भी रहते हैं, पर जब भाजपा को सहयोग करने की बात आती हैं तब उसे सांप्रदायिक कहकर, कन्नी काट लेते हैं, जैसे लगता हैं कि भाजपा अछूत हैं, उसे भारतीय राजनीति में रहने का कोई हक ही नहीं। अब तो कई पार्टियों ने धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी करने का दुकान भी खोल दिया हैं। ये समय - समय पर धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट जारी भी करते रहते हैं। जबकि सबसे बड़े सांप्रदायिक और जातिवाद तथा परिवारवाद के पोषक वहीं हैं। मुलायम की पार्टी समाजवादी पार्टी हो या लालू की पार्टी राजद अथवा मायावती की पार्टी बसपा। क्या ये पार्टियां जातिवाद का सहारा लेकर देश को तोड़ने का काम नहीं करती, क्या जातिवाद से देश को खतरा नहीं हैं। सांप्रदायिकता से देश को खतरा और जातिवाद से देश बनता हैं क्या। इस देश में तो ज्यादातर पार्टियां जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष घोषित की हुई हैं, वे खुद घोर सांप्रदायिक और जातिवाद की शिकार हैं। हाल ही में जाति आधारित जनगणना करवाकर,  इन पार्टियों ने सिद्ध कर दिया कि इनकी मानसिकता कितनी भयानक हैं और देश को तोड़ने के लिए ये कितना बड़ा षडयंत्र रच रहे हैं। 
इसमें कोई दो मत नहीं कि आज देश को नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं की जरुरत हैं, क्योंकि वो जो कहता हैं, वो करता हैं। वो जाति की राजनीति नहीं करता। वो अपने छः करोड़ गुजरातियों की बात करता हैं। वो किसी दूसरे प्रांत से आये, नागरिकों को ये कहकर नहीं दुत्कारता कि तुम बिहारी हो, अपने प्रांत लौट जाओ। आज भी गुजरात के कई शहरों में लाखों की संख्या में बिहारी रहते हैं और गुजरात के विकास में चार चांद लगा रहे हैं साथ ही अपने बिहार में रह रहे परिवारों का भरण - पोषण कर रहे हैं। जरा दिल्ली में देखिये - शीला दीक्षित बिहारियों और यूपी के लोगों के बारे में क्या बयान जारी करती हैं। ये तो कांग्रेसी हैं। इनका इस प्रकार का बिहार व यूपी के लोगों के बारे में घटिया बयान क्यों आता हैं, पर जब शोर मचता हैं तो वो अपने बयान में क्यों सुधार करती हैं। पूछिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृश्वी राज चौहान से कि जब महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों पर अत्याचार होते हैं तब ये अपना मुंह क्यों सी लेते हैं। ये कुछ उदाहरण हैं। सभी को अपने गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए। 
सब ने नरेन्द्र मोदी के नाम पर गुजरात की जनता का अपमान किया हैं। साथ ही अपमान करने का सिलसिला रुका भी नहीं हैं, जारी हैं। मीडिया व देश के कुछ पार्टियों के नेता अभी भी नरेन्द्र मोदी को सांप्रदायिक बनाने पर तूले हैं। जरुरत हैं जैसे गुजरात की जनता, गोधरा और अन्य दंगे भूलकर, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गुजरात को आगे बढ़ाने के लिए लालायित हैं। सभी मीडिया और अन्य पार्टियों के लोग अपने बयानों और कार्यो में सुधार लाये और गुजरात की जनता का अपमान करने का काम नहीं करें, क्योंकि आपको किसी ने ये अधिकार नहीं दिया कि आप बेवजह, उनका अपमान करें..............।

Wednesday, March 7, 2012

गुंडों को क्या हैं, हाथी से उतरे, साईकिल पर चढ़ गये ---------------


देश की नजर, 6 मार्च को होनेवाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों पर थी, पर मेरी नजर ज्यादातर उत्तरप्रदेश के चुनाव परिणाम पर थी, कि वहां की जनता क्या जनादेश देती हैं। जनता ने जनादेश दे दिया। पिछली बार मायावती की झोली भर दी थी, इस बार मुलायम की झोली भर दी। ऐसी झोली भर दी कि पांच सालों तक कोई किच किच न हो। कोई राजनीतिज्ञ उलाहना न दे कि जनता ने जनादेश तो दिया पर बहुमत नहीं। अब लो दे दिया, काम करो। इसके पहले बहुमत मायावती को दिया, पर मायावती को अपनी मूर्ति और हाथी को सजाने से, वक्त ही नहीं मिला कि वो उत्तर प्रदेश के बारे में सोचे। मायावती तो जानती हैं कि यूपी के दलित, हाथी को छोड़कर, दूसरे पर बटन दबा ही नहीं सकते और रही बात पंडितों और मुस्लिमों की, तो पंडितों को दक्षिणास्वरुप विधानसभा की टिकट और मुस्लिमों को भाजपा का भय दिखाकर, फिर से सत्ता हासिल कर लेंगे, पर ऐसा हो न सका। बसपा का नारा -- चढ़ गुंडे की छाती पर, बटन दबेंगी हाथी पर और ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी दिल्ली जायेगा। काम नहीं आया और हाथी लखनउ तक, ही सिमट गया। इधर समाजवादी पार्टी की बल्ले बल्ले हैं, जनता ने पूर्ण बहुमत दे दिया। बांछे खिल गयी। बहुमत की बात तो समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने सपने में भी नहीं सोची होगी, पर आज बहुमत हैं। न कांग्रेस को मनाने का झंझट और न निर्दलीयों के आगे घूटने टेकने की जरुरत। बस सब बम - बम हैं। भाई यूपी की जनता ने एक बार भाजपा को भी पूर्ण बहुमत दे दिया था, पर राम मंदिर की आस्था और मंदिर निर्माण की दृढ़संकल्पिता, उसे कहीं की नहीं रखी और भाजपा आज तीसरे नंबर पर आकर अटक गयी। लगता हैं कि भाजपा फिर कभी सत्ता में नहीं आयेगी। लेकिन देश की राजनीति ऐसी हैं कि कब कौन उछलकर मुख्यमंत्री पद पर चला जायेगा या किस की फिर से बहुमत आ जायेगी, कहां नहीं जा सकता। एक समय था कि लोग जनसंघ( अब भाजपा ) और उसके नेताओं के बारे में बोलते थे कि ये पार्टी कभी सत्ता में नहीं आयेगी, पर ये पार्टी देश की बागडोर भी संभाली, कई प्रदेशों में इनकी सरकार हैं, इसलिए इस पर बोलना व लिखना बेकार हैं।
इधर जब जनादेश का परिणाम आ रहा था, तब देश के राष्ट्रीय समाचार पत्रों व राष्ट्रीय चैनलों में कार्यरत कांग्रेस भक्त पत्रकार, जो कल तक यूपी में कांग्रेस की शानदार सफलता का दंभ भरते आ रहे थे। अपना चेहरा छुपाते नजर आये। कुछ ऐसे बेशर्म कांग्रेस भक्त पत्रकार भी थे, जो बेशर्मी की सारी हदें पारकर, अपना चेहरा बार - बार चैनलों पर दिखा रहे थे। खैर कांग्रेस का जो होना था। हो गया। कांग्रेस पार्टी आज भी परिवारों की पार्टी हैं। हाई - फाई पार्टी हैं। जिसमें जनता की भागीदारी कम, नेताओं के खानदानों की भागीदारी ज्यादा होती हैं, और परिणाम सबके सामने हैं।
समाजवादी पार्टी -- नाम कितना सुंदर। समाज की बात करनेवाली यानी सामाजिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, देश व समाज को आगे ले जानेवाली पार्टी। पर क्या लगता हैं कि इस पार्टी से उत्तरप्रदेश का भला होगा। आज तो देश के सभी समाचार पत्रों में बड़े बड़े संपादक, और अन्य स्तंभकार, मुलायम पुत्र अखिलेश की जय जय कर रहे हैं। चाटुकारिता की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। मुलायम को सही युवराज बता रहे हैं। राहुल पर फब्तियां कस रहे हैं। ये लिखनेवाले और बोलनेवाले वो लोग हैं, जो लाखों नहीं, करोड़ों में खेलते हैं। जो यूपी की गांवों और गलियों का इतिहास भूगोल भी नहीं जानते, पर बता रहे हैं कि यूपी को अखिलेश यादव नया मार्ग दिखायेंगे, अब यूपी बहुत आगे निकल जायेगा। सपा दिल्ली में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी। हां हां क्यों नहीं निभायेगी, जनता ने भूमिका निभाने के लिए ही तो जनादेश दिया हैं। पर आज अखिलेश के आगे नतमस्तक होकर, अखिलेश यादव की चरणवंदना करनेवाले ये सारे पत्रकार, जब कांग्रेस दूसरे या तीसरे नंबर पर अथवा अपनी सीटें पूर्व के विधानसभा चुनाव के मुकाबले दुगनी कर लेती तो फिर देखते क्या होता। ये सारे के सारे पत्रकार राहुल शरणं गच्छामि कहकर, राहुल गांधी की चरणवंदना में लगे रहते। हम आपको ये भी बता दें कि भारतीय राजनीति और यहां की जनता कैसे जनादेश देती हैं, वो सबको पता हैं.............कल विदेशियों के हाथ में गर ये सत्ता सौंप दें तो इस पर भी किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि यहां किसे अपने देश और समाज की बढ़ोतरी की चिंता हैं, सभी अपने आप में लगे हैं। समाजवादी पार्टी को ही ले लो। ये समाजवाद की बात करते हैं। इंदिरा गांधी के शासनकाल के समय परिवारवाद की आलोचना करनेवाले इन समाजवादियों से पूछों कि तुम आज क्या कर रहे हो। जरा देखो -- मुलायम सिंह यादव, सांसद हैं अब मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, बेटा अखिलेश यादव खुद सांसद हैं और मुलायम की बहु डिंपल ये भी सांसद बनने जा रही थी, पर जनता ने इन्हें जिताकर नहीं भेजा, गर भेज देती तो ये भी सांसद होती। जिस पार्टी की सोच, अपने परिवार पर आकर सिमट जाती हैं, वो समाजवादी कैसे हो सकता हैं। सवाल ये हैं।
सवाल ये भी हैं -- कि जिस पार्टी ने अभी सत्ता संभाला नहीं हैं। अभी तक अपना नेता चुना नहीं हैं। ये अलग बात हैं कि मुलायम ही मुख्यमंत्री होंगे और इनके बाद इनके बेटे, कांग्रेस की तरह अपनी पार्टी का झंडा ढोयेंगे, यूपी संभालेंगे। जब चुनाव परिणाम आते ही इनके गुड़ों ने अपनी औकात दिखानी शुरु कर दी तो आनेवाले समय में क्या होगा। क्या लोगों को मालूम नहीं कि गुंडों का क्या हैं, हाथी से उतरे और साईकिल पर चढ गये। समाजवादी पार्टी के लोगों ने क्या गुंडागर्दी दिखायी हैं जरा देखिये --- सपा के बहुमत की खबर आते ही यूपी के दस शहरों में सपा के गुंडों ने बवाल काटे। यूपी के संभल में सपा प्रत्याशी की जीत पर जीत में बौराएं गुंडों ने गोलियां चलायी, एक बच्चे की मौत हो गयी। झांसी में सपाईयों ने पत्रकारों को बाथरुम में बंद कर घंटों बंधक बनाये रखा। मेरठ, फैजाबाद, आगरा, संभल में स्थिति ऐसी हो गयी कि आंसूगैस के गोले छोड़ने पड़े। ये तो शुरुआत हैं, अभी पांच साल बाकी हैं। आप मानकर चलिये, कि सपा के राज में क्या होने जा रहा हैं............। पर इसके बावजूद हम चाहेंगे कि यूपी, अन्य विकसित हो रहे प्रदेशों की तरह विकसित हो, लेकिन ऐसा नयी सरकार कर पायेगी, क्योंकि गुंडे साइकिल पर बैठकर अभी से ही इतनी तेजी दिखा दी कि सारे सपने ही टूटते नजर आ रहे हैं। हां एक खुशखबरी हैं -- कांग्रेस व सपा भक्त पत्रकारों के लिए, कि वे मुलायम और अखिलेश का चरणवंदना कर अपनी किस्मत आजमायेंगे और अपने हिस्से का यूपी लूटकर, मुलायम और मुलायम के परिवार की तरह समाजवाद का असली चरित्र पत्रकारिता में दिखायेंगे।