Showing posts with label उत्तरप्रदेश. Show all posts
Showing posts with label उत्तरप्रदेश. Show all posts

Thursday, March 23, 2017

इलाका रघुवर का और नाम योगी का...................

झारखण्ड में इन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चर्चा जोरों पर हैं, लोग उनके बारे में जानना चाहते है, यूपी में वे क्या कर रहे है? कौन सी योजनाओं को जमीन पर उतार रहे है? लोगों की उन्हें जानने की उत्सुकता है। यहीं कारण है कि रांची से प्रकाशित सारे अखबारों में योगी ही योगी छाये हुए है, जबकि इसके विपरीत रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान रांची के ही अखबारों में डूमरी के फूल होते दीख रहे है। ऐसे भी रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान की जो कार्यशैली है या उनके पीछे जो लोग होते है, उनकी हरकते और उनके मुख से निकले बोल बहुत कुछ बता देते है... ...फिर भी रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान झारखण्ड के मुख्यमंत्री के रुप में डटे है। रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान की इस स्थिति को देखते हुए इन पर यह लोकोक्ति फिट बैठती है – अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान।
आश्चर्य इस बात की है कि पिछले महीने झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर अपनी ब्रांडिंग कराने में 100 करोड़ रुपये से भी ज्यादा फूंक डाले, पर निकला क्या?  न तो इनकी ब्रांडिंग ही हो सकी और न ही झारखण्ड को कुछ प्राप्त हुआ। हां इतना जरुर हुआ कि बाहर से इनके कनफूंकवों द्वारा बुलाई गयी ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियां मालामाल जरुर हो गयी, और ये दुआएं भी दी कि ये राज्य हमेशा मूरख बना रहे, ताकि उनकी दुकानें इसी प्रकार चलती रहे, जबकि इसके विपरीत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी किसी भी ब्रांडिंग कंपनी को अपनी ब्रांडिंग के लिए उत्तर प्रदेश नहीं बुलाया पर इनकी ब्रांडिंग स्वयं देश के विभिन्न राज्यों के मीडिया हाउस बहुत ही शिद्दत से कर रही है।
आखिर मीडिया में आदित्यनाथ योगी क्यों छाये हुए है? उसका कारण है...
उन्होंने सत्ता में आते ही, वह काम करना प्रारंभ किया, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।
1. सत्ता में आते ही उन्होंने अपने मंत्रियों से 15 दिनों में आय-संपत्ति का ब्यौरा मांग लिया।
2. नेताओं को बेकार की बयानबाजी बंद करने को स्पष्ट रुप से कहा।
3. यूपी के सरकारी दफ्तरों में पान-गुटखा पर बैन लगाकर दूसरे राज्यों के सामने एक नजीर पेश कर दी।
4. एक सप्ताह के अंदर अपने अनुभागों में रखी फाइलों को व्यवस्थित कराना प्रारंभ किया।
5. महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया, पूरे राज्य में एंटी रोमियो स्क्वायड का गठन कराया, ताकि बेटियों के सम्मान पर कोई आंच नहीं आये।
6. गोरक्षा के प्रति विशेष अभियान चलाया, अवैध बूचड़खानों को सील किया गया, उन पर बूलडोजर चलाया गया।
यहीं नहीं पूरे प्रदेश में एक विश्वास पैदा किया, गुंडों-अपराधियों में खौफ पैदा किया कि अब राज्य का निजाम बदल चुका है, गलत करेंगे तो जल्द ही जेल के अंदर होंगे...
इसके विपरीत झारखण्ड में क्या हो रहा है...
1. बेटियां यहां आज भी सुरक्षित नहीं, स्वयं मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की महिला संवादकर्मियों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अपनी शिकायत दर्ज करायी पर इन महिला संवादकर्मियों को उनकी आवाज बंद करा दिया गया। कस्तूरबा बालिका विद्यालय गढ़वा की आदिवासी बालिका गर्भवती हो गयी, इस मामले को भी दबा दिया गया। बूटी मोड़ की जिस लड़की की बलात्कार कर नृशंस हत्या कर दी गयी, उस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया, सीबीआई कहती है कि अभी तक उसे इस संबंध में कोई प्रपत्र प्राप्त ही नहीं हुआ, जबकि इसी मामले में मुख्यमंत्री रघुवर दास का बयान आया था कि इस कांड में सफेदपोश लोग भी शामिल है, जल्द उन्हें पकड़ लिया जायेगा, पर क्या हुआ? कोई अभी तक पकड़ा नहीं जा सका, यानी महिलाएं आज भी असुरक्षित महसूस कर रही है, झारखण्ड में।
2. गो हत्या तो यहां आम बात है, रांची की सड़कों पर बड़ी संख्या में सुबह, दोपहर और शाम को इस धंधे में लगे लोग, गायों को लाते है और कत्लखानों में भेज देते है, आज भी इस राज्य में बड़ी संख्या में अवैध बूचड़खानें चल रहे है, पर रघुवर दास की हिम्मत नहीं कि इन पर बुलडोजर चला दें।
3. सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों का हाल ये है कि उन्हें प्रशासन का डर ही नहीं, जमकर भ्रष्टाचार है, बिना पैसे के कोई काम हो ही नहीं सकता, और यह पैसा नीचे से लेकर उपर तक जाता है, जबकि सत्ता इन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ ही मिला था।
4. कानून – व्यवस्था तो पूर्णतः चौपट है, धनबाद में पूर्व मेयर नीरज सिंह समेत 4 की हत्या तो एक बानगी है।
5. मुख्यमंत्री क्या बोलते है? क्या करते है? भगवान ही मालिक है... ...ज्यादा जानकारी के लिए आज का अखबार पढ़ लीजिये, मुख्यमंत्री का भाषण छपा है, जो एक कार्यक्रम से संबंधित है, चूंकि मुख्यमंत्री रघुवर दास के आस-पास मूर्खों का जाल है, ऐसे भी मुख्यमंत्री रघुवर दास को लगता है कि ये मूर्ख ही सर्वाधिक विद्वान है, जिसका नतीजा सामने है, पूरे राज्य में मुख्यमंत्री रघुवर दास और झारखण्ड के सम्मान का बट्टा लग रहा है, याद करिये इस राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 8 मार्च को एक पीड़ित पिता के साथ कैसा दुर्व्यवहार किया था, जिसके कारण पूरे देश में मुख्यमंत्री रघुवर दास की थू-थू हुई थी, जिसे अखबार और चैनलवालों ने नहीं उठाया, बल्कि सोशल साइट ने इसे मुद्दा बनाया।
तो जहां ऐसे मुख्यमंत्री का राज चल रहा हो, जो कनफूकवों की मदद से चलती हो, उस राज्य के मुख्यमंत्री का क्या हाल होगा? आप समझते रहिये। फिलहाल झारखण्ड में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ छाये हुए है... ...अपने विवादित बयानों से नहीं, बल्कि कार्य शैली से और एक जनाब अपने मुख्यमंत्री रघुवर दास उर्फ शाहरुख खान है... ...जो अपने ही राज्य में बेगाने हो चले है।
मैं तो कहता हूं कि अभी भी मौका है, मुख्यमंत्री अपनी कार्यशैली में सुधार लाये, नहीं तो पता चलेगा कि 2019 की लोकसभा चुनाव में हर राज्य से, भाजपा सीट ला रही है और झारखण्ड में कांग्रेस तथा झामुमो की लॉटरी निकल गई है...

Saturday, March 11, 2017

यह चुनाव परिणाम सबक है, सभी नेताओं, पत्रकारों और ब्रांडिंग कंपनियों के लिए..........

आखिर जनता क्या चाहती है?
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की है, ऐसी जीत हासिल की है, कि ऐसी जीत रामलहर में भी नहीं हुई थी। उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड पर शानदार कब्जा जमाया, तो जिस मणिपुर में उसके एक भी सदस्य विधानसभा में नहीं थे, वहां पर सत्ता की प्रबल दावेदार के रूप में उभर कर सामने आयी, गोवा में हालांकि उसे झटका जरुर लगा है, पंजाब में उसकी सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल सत्ता से बाहर हो गयी। इस चुनाव परिणाम के द्वारा उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड की जनता ने नेताओं की ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियों और उन पत्रकारों को भी खबरदार किया है, जो राज्यसभा जाने के लिए किसी भी पार्टी के लिए आजकल प्रवक्ता के रूप में स्वयं को चैनल के समक्ष प्रस्तुत कर रहे है। ये वे पत्रकार है, जिनका जनता से कोई सरोकार नहीं होता, बल्कि अपने मालिकों के द्वारा दी गयी चैंबर में एक समाचार पत्र या चैनल के प्रबंधक सह निदेशक के रुप में कार्य करते है। जरा एक उदाहरण देखिये...
एक पत्रकार ने सोशल साइट में स्वयं को खुलकर बसपा के प्रवक्ता के रूप में पेश किया, वे खूब बसपा, हाथी और मायावती के एजेंट के रूप में पेश आये और भाजपा नेता एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जमकर गरियाया। जब वे अपने सोशल साइट पर मायावती का चुनाव प्रचार कर रहे थे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गरिया रहे थे, उसी वक्त उनके समर्थक और पत्रकारिता जगत के मूर्धन्य लोग तथा वामपंथियों का समूह उनके पक्ष में खुलकर उनके प्रति समर्थन जूटा रहा था, पर आज इनकी स्थिति क्या है? सामान्य सा उत्तर – हास्यास्पद। अरे भाई जब हम पत्रकार है, तो हमें किसी खूंटे से बंधे होने की क्या जरुरत? जो सही है, उसे डंके की चोट पर लिखेंगे, बोलेंगे और करेंगे भी।
जरा देखिये, उक्त पत्रकार ने नौ मार्च को सोशल साइट पर क्या लिखा...
बहन जी के द्वार पर, भइ संतन की भीड़
मोटू लाला चंदन घिसै, तिलक देत श्रमवीर
इस दोहे के आधार पर उसने मोटू लाला को नरेन्द्र मोदी और अमित शाह करार दिया, जबकि श्रमवीर कहकर मायावती समर्थकों को मान बढ़ाया।
इसी पत्रकार ने नौ मार्च को ही लिखा...
रन अप टू अप रिजल्ट लेट्स अस रिकॉल बिहार
यानी उक्त पत्रकार ने कह दिया कि ११ मार्च को आनेवाला पांच प्रांतों का चुनाव परिणाम खासकर उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम, बिहार के चुनाव परिणाम की याद दिला सकते हैं।
और आज वहीं पत्रकार उत्तर प्रदेश के आये चुनाव परिणाम के बाद मायावती के बारे में लिख डाला कि अब...
मायावती का क्या होगा?
यानी आज उत्तर प्रदेश की जनता द्वारा दिये गये चुनाव परिणाम को भी वह स्वीकार करने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा है, ये स्थिति है आज के पत्रकारों की...
जब पत्रकार बसपाई हो जाये
जब पत्रकार भाजपाई हो जाये
जब पत्रकार सपाई हो जाये
जब पत्रकार वामपंथी हो जाये
तो उससे सर्वाधिक नुकसान उस राज्य व देश को होता है, जहां वह पत्रकार रह रहा होता है, अरे कोई जीते, कोई हारे। हमें उससे क्या? हमें तो यह देखना है कि क्या जनता का हित सध रहा है, अगर जनता का हित सध रहा है तो ठीक है, अगर नहीं हित सधा तो हम सरकार किसी का हो, उसकी बैंड बजायेंगे। ऐसा नहीं कि हम हाथी, कमल, हाथ, साइकिल, तीर-धनुष, तीर, लालटेन आदि की सेवा में स्वयं को लगा देंगे और उसके बदले स्वयं को उपकृत करेंगे।
जिस दिन उत्तर प्रदेश का अंतिम चरण का मतदान समाप्त हुआ। उस दिन एक न्यूज चैनल ने अपने परिचर्चा में कई पत्रकारों को बुलाया, जो किसी न किसी पार्टी से जुड़े थे और उसकी प्रशंसा में स्वयं को आत्मानुरागी की तरह पेश कर रहे थे, जो बता रहा था कि आजकल के ये पत्रकार कितने गिर चुके है। हमें तो लगता है कि उन्हें स्वयं इस पर परिचर्चा करनी चाहिए कि आखिर वे कितने गिर सकते है, क्या उन्होंने अब ये ठान लिया है कि वे पत्रकारिता करते-करते बुढ़ापे की ओर कदम बढ़ाते ही, किसी दल की चाटुकारिता या नौकरी करेंगे और उसके बदले राज्यसभा जायेंगे, गर ऐसा है तो वे देश और समाज के सबसे बड़े दुश्मन है, हमें इनसे ज्यादा सावधान होना पड़ेगा, साथ ही देश व समाज को इनसे रक्षा के लिए कुछ ठोस कदम उठाने पड़ेंगे, क्योंकि निः संदेह इनसे देश को खतरा उत्पन्न हो गया है।
और अब ब्रांडिंग का दुकान चलानेवालों को भी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के चुनाव परिणाम ने एक करारा संदेश दिया है, संदेश उन नेताओं को भी दिया जो इन ब्रांडिंग का दुकान चलानेवालों के बल पर सत्ता का स्वाद चखने का मन बना चुके थे। अरे यार, काठ की हांडी एक बार चढ़ती है, बार-बार नहीं। बिहार में आप कमाल दिखा दिये तो इसका मतलब ये नहीं कि यूपी की जनता भी इस चक्कर में आ जायेगी। ऐसा नहीं है कि बिहार की जनता ने प्रशांत किशोर के कहने पर वोट जाकर डाल आयी थी। बिहार की सच्चाई यह थी कि लोकसभा के चुनाव परिणाम के बाद ही नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा को पटखनी देने के लिए एक रणनीति बनाई, जातिगत सामाजिक समीकरण को उभारा, मुस्लिम, यादव और कुर्मी तथा अन्य पिछड़ी जातियों को गोलबंद किया और परिणाम सामने आ गया। लालू और नीतीश की जोड़ी मोदी पर भारी पड़ गयी। इसमें प्रशांत किशोर की बाजीगरी कहा थी? और जब ये बाजीगरी थी भी तो फिर ये कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सत्ता में क्यों नहीं ले आयी? उलटे राहुल गांधी की खटिया कैसे खड़ी हो गयी?
यहीं नहीं झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को भी इस चुनाव परिणाम से सबक लेनी चाहिए, जो वे ब्रांडिंग के नाम पर बेतहाशा पैसे खर्च कर रहे है, जरा पूछिये कि उन्हीं के राज्य में इवाई जिसे वे अपनी ब्रांडिंग के लिए रखा है, वहीं इवाई उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को सत्ता में क्यों नहीं ले आयी? अभी भी वक्त है, रघुवर दास जी समझ जाइये, क्योंकि किसी भी नेता को लोकप्रिय या अलोकप्रिय उसकी हरकतें, उसके काम-काज और जनता के प्रति उसकी संवेदनशीलता ही कराती है, न कि ब्रांडिंग करानेवाली कंपनियां।
इधर, हम स्वीकार करते हैं कि आज के चुनाव परिणाम से बसपा और कांग्रेस- सपा को बेहद निराशा हुई होगी, पर इसका मतलब ये नहीं कि वे मन में निराशा का भाव रखकर सब कुछ भाजपा के हाथों छोड़ दे। आज गर जनता इनसे नाराज हुई है, तो कल जनता इनके साथ भी हो सकती है, क्योंकि जनता तो जनता है, वह किसी की जागीर नहीं होती, जो बेहतर होगा, उनके पास जैसा विकल्प होगा, वह चुन लेगी, फिलहाल जनता को लगा कि भाजपा उसका बेहतर विकल्प है, इस बार भाजपा को सत्ता सौंपी है। याद करिये उत्तरप्रदेश में इसके पूर्व सपा और उसके पूर्व बसपा को इसी जनता ने सत्ता सौंपा था, इसलिए इस जनादेश को सबको सम्मान करना चाहिए, निराशा में आकर जनता का अपमान करने का अधिकार किसी को नहीं, न तो उन पत्रकारों को जो अपने गले में किसी विशेष पार्टी या दल का मंगलसूत्र धारण कर राज्यसभा जाने का ललक रखते हो अथवा वे लोग जो किसी न किसी पार्टी से जुड़े है।
बधाई भाजपा को, कि उसने उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में बड़ी जीत दर्ज की। मणिपुर में अच्छी स्थिति दर्ज की। गोवा में अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जबकि पंजाब में उसे करारी हार देखने को मिली। हम चाहेंगे कि वे इस सफलता, इस जीत को सामान्य रुप में लेते हुए, ज्यादा जोश न दिखाये, सीधे जनता से किये वायदे को पूरा करने में अपना समय व्यतीत करें, क्योंकि जनता, तो जनता है, वह किसी की नहीं होती, और नहीं वह किसी खूंटे में रहना पसंद करती है। उसका उदाहरण देखना है तो बिहार के लालू प्रसाद को ही देख लीजिये, बहुत घमंड किया करते थे, पर आज क्या है? बिहार में अकेले बड़ी पार्टी होने के बावजूद सत्ता का रसास्वादन और जनता की सेवा करने का विशेषाधिकार नीतीश को प्राप्त है। इसलिये विपक्षी दल जनता की सेवा को प्रमुख साधन बनाये और पत्रकार सत्ता से चिपकने की जगह जनहित में पत्रकारिता कर, समाज को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये।

Thursday, January 8, 2015

पीके के नाम पर (भाग – 2).........................



पीके के नाम पर (भाग – 2).........................

जरा सोचिये, गर पीके फिल्म में...........
1.    हीरोईन हिन्दू (जिसने अपना नाम फिल्म में जग्गू रखा है) की जगह पर मुस्लिम होती और पाकिस्तान में रह रहा लड़का मुस्लिम की जगह हिन्दू होता तो क्या होता................
2.    हिन्दू देवी-देवताओं के लापता होने से संबंधित पंपलेट बांटनेवाला आमिर खान गर दूसरे धर्मावलंबियों के देवी-देवताओं या जिन्हें वे मानते हैं, जिसके लिए वे मर-मिटने को तैयार होते हैं, उसे लापता बताता तो क्या होता...............
3.    इन दिनों प्रधानमंत्री पद नहीं मिलने से अवसाद में जी रहे भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी और विश्व का कुख्यात आतंकी का आरती उतारनेवाला पत्रकार वेद प्रताप वैदिक जिसको पीके फिल्म बनानेवालों में स्वामी दयानंद की छवि दिखाई दे रही हैं, ऐसे हालात में उक्त फिल्म की भी इसी प्रकार से गर आरती उतार रहे होते तो इन दोनों का क्या होता............
4.    हमें एक बात समझ में नहीं आ रही, जिस गोले का प्राणी आमिर खान को दिखाया गया हैं, उस गोले का लोग जब दूसरे गोले की खोज के लिए अंतरिक्षविमान भेज सकता हैं, वो एक कपड़े का आविष्कार नहीं कर सकता, या वहां का लोग इतना लोल (बेवकूफ) होता हैं, जिसको ह्यूमन सेंस तक नहीं, गर उक्त गोले के व्यक्ति को भी ह्यूमन सेंस होता तो क्या होता..............
5.    जब आमिर खान भगवान की खोज में मंदिर और चर्च में चला गया तो फिर उससे मस्जिद कैसे छूट गया, क्या पीके फिल्म बनानेवालों को इस बात की जानकारी थी कि ऐसा करने से आईएस वाले या भारत में ही रहनेवाले कई आतंकी संगठन उसे पाताल से ढूंढ निकालेंगे और उसे वो मजा चखायेंगे कि उनकी आनेवाली पीढ़ी दूबारा दुनियां में पैदा लेने से थर्रायेंगी, कल्पना कीजिये कि आमिर खान मस्जिद में चला गया दिखा दिया गया होता, तो क्या होता.........
6.    जिस प्रकार से बिहार और उत्तरप्रदेश की सरकार ने पीके फिल्म को करमुक्त कर दिया है, गर फिल्म में चर्च के बाद आमिर खान को मस्जिद में जाता हुआ, दिखा दिया गया होता और दोनों प्रदेश उक्त फिल्म को करमुक्त कर दिये होते तो कल्पना कीजिये क्या होता..............
7.    क्या ये मान लिया जाये कि भारत के लोग जाहिल हैं या बहुत ही विद्वान जो अपनी संस्कृति और धर्म का माखौल उडानेवालों का मनोबल बढ़ाते हैं और आडवाणी जैसे नेता व वैदिक जैसे पत्रकार समयानूकुल आचरण कर देश की महान संस्कृति को मिट्टी में मिलाने का कोई अवसर नहीं चूकते, वह भी तब जबकि उनके निजी अहंकार को चोट लगती हैं..................
                 मुझे न तो फिल्म बनानेवालों की आलोचना करने में आनन्द हैं और न ही प्रशंसा करने में, मेरा तो सवाल एक ही हैं कि अरे कबीर बननेवालों, अरे स्वामी दयानन्द का ढोंग करनेवालों और पीके फिल्म की प्रशंसा करनेवाले पत्रकारों और नेताओं, गर तुम्हें थोड़ी भी शर्म हैं तो डूब मरो............क्योंकि तुमने वो कुकृत्य किया हैं, जिसकी जितनी निंदा की जाय, कम हैं..........तुम ही बताओ आडवाणी कि तुम प्रत्येक भाषण में हिंदुस्तान की जगह हिंदुस्थान क्यों बोलते हो? तुम ही बताओ रामरथ यात्रा लेकर सोमनाथ से अयोध्या क्यूं निकले थे?.........क्या हर भाषण में हिंदुस्तान की जगह हिंदुस्थान बोलना, राम के नाम पर राजनीति करना ये पाखंड नहीं हैं, और इसमें तुम्हें पाखंड नहीं दिखता। अरे धर्म के नाम पर राजनीति करनेनवालों, धर्म के नाम पर कितने को मरवा देनेवालों आज तुम्हें पीके फिल्म में एक संदेश नजर आ रहा हैं........ हम तो पीके फिल्म बनानेवालों से कहेंगे कि आडवाणी और वैदिक को भी अपनी आनेवाली फिल्म में एक रोल दे देना, क्योंकि ये भी बहुत ही अच्छा अभिनय कर लेते हैं...............गिरगिट की तरह बहुत अच्छी तरह रंग बदल देते हैं, इसलिए वर्तमान में इन बहुरुपियों से बड़ा कोई रंगकर्मी फिलहाल नहीं दिखता............एक फिल्म आडवाणी और वैदिक को लेकर तो बनना ही चाहिए, क्योंकि जनता ये भी जानना चाहती हैं कि इन बहुरुपियों का असली चरित्र क्या हैं?
भारत में सनातन धर्म पर एक नहीं अनेक हमले हुए, सदियों से इस पर हमले होते आ रहे हैं, पर इसका बाल बांका नहीं हुआ, तो फिर ये पीके वालों की क्या औकात........हमें गर्व हैं कि हम उस संस्कृति में जन्मे हैं, जहां सहिष्णुता हैं, जहां लेशमात्र का अंहकार नहीं, जहां सांप को भी दुध पिलाया जाता हैं.........हम किसी पीके वालों का प्रतिकार करने के लिए सड़क पर भी नहीं उतरते, जनता निर्णय करें, गर जनता को फिल्म अच्छी लग रही हैं तो जनता देखेंगी, नहीं तो आप लाख सर फोड़ लें, क्या फर्क पड़ता हैं, पर कुछ सवाल हैं, जिसका उत्तर पीके वालों, आडवाणी और वैदिक को देना ही चाहिए, पर वे उत्तर क्या देंगे, पद और प्रतिष्ठा के लिए ये जीनेवाले जीव को धर्म और संस्कृति से क्या लेना देना................

Wednesday, December 28, 2011

बेशर्मों को शर्म कहां.............

पांच राज्यों में चुनाव हैं। कांग्रेस ने सुनियोजित साजिश रचकर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए, अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर आरक्षण दे दिया, जबकि संविधान इसकी इजाजत नहीं देता। इससे कांग्रेस को फायदे हैं, इसाई बहुल गोवा में कहेंगी कि वह इसाईयों को आरक्षण दे दी हैं, सिक्ख बहुल पंजाब में कहेगी कि उसने सिक्खों को आरक्षण दे दिया हैं, और मुस्लिम बहुल उत्तरप्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों में वो इसी आधार पर मुस्लिमों को भी आकर्षित करते हुए वोट मांगेगी। संभव हैं, उसे फायदे मिले भी क्योंकि हमारे देश की जनता, कांग्रेस के इस लालीपाप पर आकर्षित हो कर, उसके पक्ष में भारी मतदान कर दे, तो इस पर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए, क्योंकि यहां की जनता क्या हैं, वो इतिहास बताता हैं, जब अंग्रेज इस देश में आये और विदेशी बाबर इस देश में आया तो कैसे यहां की जनता ने उसका स्वागत करते हुए, अपने देश पर विदेशियों का शासन हंसते हंसते करवाया, और खुद गुलाम बनकर आनन्दित होते रहे, कमोवेश आज भी यहीं स्थिति हैं। भले ही आज की पीढ़ी न स्वीकारें, पर सच्चाई यहीं हैं। फिलहाल कांग्रेस की नजर सर्वाधिक उत्तरप्रदेश पर हैं। अल्पसंख्यकों के नाम पर मुस्लिमों को 4 प्रतिशत आरक्षण का लालीपॉप दिलाने के बावजूद भी, कांग्रेस और कांग्रेस भक्तो को लगता हैं कि अन्ना हजारे उऩके लिए शामत खड़ी कर सकते हैं. इसलिए कांग्रेस को पांच राज्यॉ में जीत सुनिश्चित करने के लिए, कांग्रेस और कांग्रेस भक्तों में धमा चौकड़ी चल रही हैं कि कौन सर्वाधिक सोनिया और राहुल की चरण वंदना करते हुए चाटुकारिता का रिकार्ड तोड़ता हैं। इनमें शामिल हैं - कांग्रेस के कार्यकर्ता-नेता, कांग्रेस भक्त पत्रकार और केन्द्र शासित प्रदेशों में कार्यरत प्रशासनिक उच्चाधिकारी जो कांग्रेसी नेताओं की कृपापात्र बनकर देश का सत्यानाश कर रहे हैं। एक बात मैं बता दूं कि मैं अन्ना, टीम अन्ना और उनके आंदोलन का कतई समर्थक नहीं हूं, गर ज्यादा जानकारी इस संबंध में लेना हैं तो इसी ब्लाग पर अन्ना के आंदोलन और उनके सदस्यों के प्रति हमारे विचार आज भी लिखे पड़े हैं, उन्हें पढ़कर, मेरे विचारों से अवगत हुआ जा सकता हैं, लेकिन अऩ्ना के खिलाफ कांग्रेसियों के आक्रामक रवैये ने हमे ये लिखने पर मजबूर कर दिया कि भारत में जितने भी पागलखाने हैं, उनमें कम से कम कांग्रसियों के लिए कुछ शायिका आरक्षित होने चाहिए क्योंकि ये सभी मानसिक दिवालियेपन के शिकार हो रहे हैं और गर इनका इलाज नहीं किया गया, तो ये पागल होकर भारत के विभिन्न शहरों मे घूमेंगे, जिससे हमें इन्हें देखकर दुख होगा, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि इनके परिवार, अपने इस पागल सदस्य को देख विधवा प्रलाप करे।
जरा सोनिया का बयान देखिये -- वो कहती हैं कि अन्ना पर व्यक्तिगत हमले नहीं होने चाहिए। सोनिया ये बतायें कि अऩ्ना पर व्यक्तिगत हमले कौन कर रहा हैं। अन्ना को भगोड़ा कौन कह रहा हैं, संघ का एजेंट कौन कह रहा हैं। गर नहीं उसे बूझा रहा तो ऐसी नेता को हम क्या कहें। जरा बेनी प्रसाद वर्मा का बयान देखिये -- ये कह रहे हैं कि अन्ना भाजपा के एजेंट हैं, और भारत पाक युद्ध के समय के भगोड़े भी हैं, तो बेनी जी, भारत सरकार और जिस सरकार में आप भी अपनी गाल लाल कर चुके हैं, बैठ कर क्या कर रहे थे, इसी दिन का इंतजार कर रहे थे क्या, कि कब सोनिया माता की जय बोलने का अवसर मिले, कब अपना सर राहुल के चरण कमलों पर रखने का मौका मिले। गर ऐसा हैं तो आपने सिद्ध कर दिया हैं - राहुल और सोनिया आप की हो गयी, क्योंकि आपने तो ऐसा बयान दे दिया कि आपने पागलपन में दिग्विजय और मणीष तिवारी को भी पीछे छोड़ दिया। इधर कांग्रेसियों को कहीं से पुराना चित्र मिल गया हैं, जिसमें नानाजी देशमुख के साथ अन्ना हजारे का फोटो हैं। इस पर वे बावेला मचाये हुए हैं और अपने कांग्रेस भक्त पत्रकारों को कह रहे हैं कि वे इस मु्ददे को उछालकर, अन्ना की हालत खराब कर दें, पर उन्हें पता नहीं कि जिसका जितना विरोध होता वो उतना ही शक्तिशाली बनकर उभरता हैं। मैं पूछता हूं कि --- नानाजी देशमुख की समाजसेवा व देशभक्ति पर कोई अंगूली उठा सकता हैं क्या। संघ क्या देशद्रोहियों की संस्था हैं क्या, गर संघ देशद्रोहियों की संस्था हैं, तो अटल बिहारी वाजपेयी तो संघ के प्रचारक भी थे, वो तो प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गये। आपके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, हाल ही में उनके जन्मदिन पर, उनके घर पर पहुंचकर शुभकामनाएँ भी दी, तो क्या देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी संघ के एजेंट हैं क्या। देश के पूर्व प्रधानमत्री लाल बहादुर शास्त्री से लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी संघ पर कई सकारात्मक टिप्पणी की हैं तो वे सभी संघ और भाजपा के एजेंट थे क्या। पता नहीं आजकल के नेताओं को क्या हो गया हैं, कि सभी संघ - संघ चिल्ला रहे हैं, गर संघ से इतनी ही चिढ़ हैं तो तुम्हारे पास सत्ता हैं, कर क्या रहे हो, औरंगजेब और बाबर की तरह संघ के कार्यालय जहां जहां हैं - ढहवां दो, प्रतिबंध लगा दो, संघ के लोगों को रासुका के तहत जेल में डलवा दो, पर ये भी तुम नहीं कर सकते, क्योंकि आपकी औकात यहां की जनता जिसके पास शर्म और हया बची हैं, वो जानती हैं। आपके घटियास्तर के बयानों के आधार पर ही शायद आप जैसे नेताओँ को छुटभैया, रीढ़विहीन, दलाल, राजनीतिबाज, चिरकुट आदि नामों से विभूषित किया जाता हैं।
और अब मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी का बयान देखिये जो यहां की सभी अखबारों में छपा हैं, उनका बयान ही बताता हैं कि उन्हें भी अन्ना के आंदोलन से चिढ़ और कांग्रेस को पुनः सर्वत्र स्थापित करने में कितनी दिलचस्पी हैं। उनका बयान मैंने एक अखबार में पढ़ा -- पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ अभियान करने के टीम अन्ना के प्रस्ताव के औचित्य और नैतिकता पर सवाल खड़ा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने रविवार को चेतावनी दी कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के रास्ते में जो कुछ भी आयेगा, उसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। सवाल ये हैं कि टीम अन्ना के कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन चलाने पर चेतावनी देने वाले, कुरैशी कौन होते हैं। उनका काम हैं चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से कराना। पर उन्हें अन्ना या अन्ना की टीम ऐसा करने से रोक रही हैं क्या और गर कोई गलत करेगा, तो उसके खिलाफ कानून अपना काम करेगा। आप संवाददाताओं के माध्यम से टीम अन्ना को धमकाना चाहते हैं कि वे कांग्रेस के खिलाफ बोलने से बचे। आजतक किसी मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस प्रकार से किसी समाजसेवी के खिलाफ बयान नहीं दिया पर इन्होंने बयान देकर बता दिया कि आखिर इनके मन में क्या हैं। सवाल तो ये भी उठता हैं कि उधर कांग्रेस धर्म आधारित आरक्षण की घोषणा करती हैं, और ठीक तुरंत बाद ये पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा करते हैं, आखिर ये सब क्या हैं, इसकी जांच होनी चाहिए। हमें तो लगता हैं कि देश में हर चीज का कांग्रेसीकरण हो गया हैं, जो देश के लिए खतरा हैं। लोकतंत्र के लिए खतरा हैं, जरुरत हैं एक और लोकनायक जयप्रकाश की, जो ऐसी कांग्रेसी सत्ता को धूल चटाने और चुनाव आयोग जैसी संस्था और देश में अन्य प्रशासनिक विभागों में फैलें कांग्रेसी भूतों से देश को मुक्त कराये। हमें लगता हैं कि अब देर नहीं, जल्दी ही वो दिन आयेगा, जब देश कांग्रेसियों के अत्याचार और शोषण से, विदेशी ताकतों के कुचक्रों से, मुक्त होगा, बस थोडी़ मेहनत और लगन से देश सेवा करने की हैं।