Showing posts with label प्रधानमंत्री. Show all posts
Showing posts with label प्रधानमंत्री. Show all posts

Friday, January 27, 2017

धिक्कार रांची की मीडिया और मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र को ...............

धिक्कार...
रांची की मीडिया को जिन्होंने रांची की बेटियों की आवाज सुनने से इनकार कर दिया...
धिक्कार उस सरकार को जिसे पता ही नहीं कि उनकी बेटियों के संग उन्हीं के नाक के नीचे क्या हो रहा है...
रांची स्थित सूचना भवन में चल रहे मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिलाकर्मियों ने राज्य महिला आयोग को पत्र लिखा है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत वरीय अधिकारियों एवं नियोक्ता के द्वारा उनके साथ बराबर दुर्व्यवहार किया जाता है, अपमानित किया जाता है... इन महिलाकर्मियों ने उक्त पत्र की प्रतिलिपि राष्ट्रीय महिला आयोग नई दिल्ली, प्रधानमंत्री भारत सरकार, मुख्यमंत्री झारखण्ड, राज्यपाल झारखण्ड, मुख्य न्यायाधीश झारखण्ड, मंत्री महिला एवं बाल विकास, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और सचिव को भी भेजा है... इन महिलाकर्मियों ने अपने पत्र में लिखा है कि...
क. मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र के वरीय अधिकारियों और नियोक्ता का व्यवहार अपने महिला संवादकर्मियों के प्रति बेहद आपत्तिजनक और अशोभनीय होता है।
ख. यहां कार्यरत वरीय अधिकारियों के करतूतों से अखबार के पन्ने रंगे हुए है, पर इन वरीय अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, उदाहरणस्वरुप रांची के सुखदेवनगर थाने में इसी मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत एक महिलाकर्मी द्वारा दर्ज करायी गयी वह प्राथमिकी है, जिसकी सुनवाई भी नहीं हुई और मामले को रफा-दफा करते हुए जिस लड़की ने एफआईआर दर्ज कराया था, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
ग. जब भी कोई महिलाकर्मी बाथ रुम जाती है, तो उसका पीछा किया जाता है, उनके साथ ऐसी हरकतें की जाती है, जिसका उल्लेख वो इस पत्र में नहीं कर सकती।
घ. यहां के नियोक्ता द्वारा बराबर सामूहिक स्तर पर महिला संवादकर्मियों को अपमानित व प्रताड़ित किया जाता है।
ड. एक ही कार्य के लिए नियुक्त कई महिला संवाद कर्मियों को चेहरे देखकर वेतन का भुगतान किया जाता है, जिसमें किसी को पांच तो किसी को दस हजार वेतन भुगतान किया जाता है।
च. दो वर्ष हो गये पर किसी को भी नियुक्ति पत्र नहीं दी गयी।
छ. हाल ही में एक सप्ताह पूर्व बिना किसी सूचना के संवादकर्मियों का परीक्षा लिया गया, क्या बतायेंगे कि नियोक्ता ने यह परीक्षा किसके कहने पर और क्यों ली?
ज. भारत सरकार का आदेश है, जहां बड़ी संख्या में लड़कियों या महिलाओं का समूह कार्य करता है, वहां आंतरिक शिकायत समिति का होना जरुरी है, जिसका अध्यक्ष वहां कार्यरत वरीय महिलाकर्मी को बनाये जाने का प्रावधान है, पर आज तक सूचना भवन में मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में जहां बड़ी संख्या में लड़कियां कार्य करती है, वहां आंतरिक शिकायत समिति का गठन क्यों नहीं हुआ? ऐसे में लड़कियां किससे शिकायत करेंगी?
और अब सवाल सीधे मुख्यमंत्री रघुवर दास से...
मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, क्या आपको याद है कि जब ३ मई २०१६ को रांची के सूचना भवन में जब मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की पहली वर्षगांठ मनायी जा रही थी, तब जिन लड़कियों ने आपको मिठाई खिलाई थी, जिन्हें आपने शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया था, वह मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में आपके इस सम्मान देने के बाद एक महीने भी क्यों नहीं टिक पाई?
क्या आपको याद है कि आपके सचिव सुनील कुमार बर्णवाल ने यहीं पर कार्यरत प्रियंका पल्लवी के बारे में उस दिन आपके समक्ष क्या कहा था? मैं बता देता हूं, उन्होंने कहा था कि ये लड़की बहुत अच्छा काम कर रही है, फिर भी ऐसा क्या हुआ कि उस प्रियंका पल्लवी को एक महीने के अंदर ही बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया गया। हमारे पास एक से एक प्रमाण है, जो बताने के लिए काफी है कि मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, पर आपके अधिकारी इन सारी हरकतों से आंखें मूंदे है, मैं पूछता हूं, आखिर क्यों?
मेरे पास कई प्रमाण है, आइये दिखाता हूं मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र की हरकतें। आप कहते कि ७० प्रतिशत शिकायतों का निष्पादन हो गया, यह सफेद झूठ के सिवा दूसरा कुछ भी नहीं... आकड़ें बिठाकर, दिखाने में आप जो आगे निकलने की कोशिश कर रहे है, वो सहीं नहीं है, सच्चाई कुछ और ही है, ये आंकड़े कैसे बैठाये जा रहे है, वो हम जानते है... अगर ये लड़कियां कह रही है कि आंतरिक शिकायत समिति का गठन अब तक क्यों नहीं की गयी तो गलत क्या है? फिर भी आप कहेंगे कि आंतरिक शिकायत समिति का गठन किया गया है, तो मैं आपसे पूछता हूं कि उस महिला का नाम बताइये जो इसका अध्यक्ष बनी और अगर अध्यक्ष बनी है तो कब बनाई गयी?
यहीं नहीं आप जो श्रम कानूनों के सरलीकरण का ढिंढोरा पीटते है कि यहां श्रम सुधारों में झारखण्ड विश्व बैंक के मानकों के आधार पर प्रथम स्थान पर है तो आप ही बताइये कि आप ही के देखरेख में चलनेवाले मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिला संवादकर्मियों को अब तक नियुक्ति पत्र क्यों नहीं मिला?
एक तरह से देखा जाये तो इसके लिए आप भी दोषी है... ये अलग बात है कि आपके खिलाफ कोई नहीं बोलता और वह भी सिर्फ इसलिए कि जो लोग गलत कर रहे है, वे आपसे अनुप्राणित है, अनुप्राणित होनेवाले वे सारे लोग है जो किसी न किसी रुप से आपसे कुछ न कुछ प्राप्त कर रहे है, चाहे प्रत्यक्ष रुप से या अप्रत्यक्ष रुप से। जरा देखिये, यहां के मीडिया को चाहे वह प्रिट हो या इलेक्ट्रानिक मीड़िया, सभी इस समाचार को खा-पका गये, क्योंकि मामला मुख्यमंत्री से जुड़ा है, क्योंकि मामला विज्ञापन से जुड़ा है, क्योंकि मामला मुख्यमंत्री से पत्रकारों के मधुर संबंधों का है... और ये हरकतें राज्य के लिए शर्मनाक है... अरे जब बेटियां मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में अपमानित महसूस कर रही है तो अन्य जगहों पर इन बेटियों का क्या होता होगा, समझने की जरुरत है, अरे जब मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में कार्यरत महिलाओं-बेटियों को सम्मान नहीं, तो हम ये कैसे समझ लें कि बुटी में जिस लड़की की दुष्कर्म के बाद नृशंस हत्या हुई, उसके अपराधियों को पकड़ने में रांची पुलिस सफल हो जायेगी। अरे ये तो सीबीआई को जैसे ही मामला दिया गया, उसी दिन पता चल गया कि यहां की सरकार कैसे और किस प्रकार शासन कर रही है? फिर भी, इतना होने के बावजूद, उन दो लड़कियों को सलाम, जिसने मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र में हो रहे गड़बड़ियों पर समाज का ध्यान आकृष्ट कराया और अपनी बातें हर जगह पहुंचाने की कोशिश की... ये अलग बात है कि रांची से प्रकाशित करीब सारे अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इनकी आवाज अनसुनी कर दी... इन लड़कियों की आवाज को वे जगह देंगे भी कैसे, जो स्वयं भ्रष्टाचार की गंगोत्री में स्नान कर रहे है, वे क्या किसी की मदद करेंगे?

Thursday, December 8, 2016

प्रधानमंत्री के निर्णयों का बेवजह विरोध सहीं नहीं.........

हाहाहाहाहाहा...
सावन का महीना था...
बादल बरस रहे थे...
तभी बिजली गिरी और एक का घर ढह गया, एक व्यक्ति मर गया...तभी किसी ने चिल्लाया कि हमारा प्रकृति या भगवान से अनुरोध है कि पानी बरसाना बंद करें, क्योंकि जब भी बारिश होती है, बिजली कड़कती है, किसी का मकान ढह जाता है, कोई व्यक्ति मर जाता है, इसलिए पानी बरसना बंद हो जाना चाहिए...
हाहाहाहाहाहा...
गंगा बहती रहती है, उसमें कई लोग डूब कर मर जाते है, तभी एक ने चिल्लाया, ये गंगा क्यों बहती है?, लोग इसमें डूब कर मर जाते है, सरकार को चाहिए कि गंगा को बहने पर रोक लगा दें...
हाहाहाहाहाहाहा...
एक बार, एक पेड़ एक इंसान पर गिर गया, इंसान मर गया...तभी एक ने चिल्लाया ये पेड़ पूरी तरह से काट देने चाहिए क्योंकि बड़े - बड़े पेड़ कहीं भी गिर जाते है, जिससे जन-धन की हानि होती है...
ठीक उसी प्रकार से, जब से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया है, तभी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस अभियान की हवा निकालने के लिए देश के मूर्धन्य नेताओं और उनके समर्थकों की फौज बेसिरपैर की बातें करने लगे है। भारत में तो देखता हूं कि एक संप्रदाय ऐसा है कि उसे नरेन्द्र मोदी की हर बात में ही गड़बड़ी लगती है, चाहे वो देशहित में ही क्यों न हो? वो नरेन्द्र मोदी की हर बात की काट निकालने को तैयार रहता है, जबकि लोकतंत्र में हर बात को कसौटी पर खड़ा रखकर बाते करनी चाहिए, पर क्या करें? हमें नरेन्द्र मोदी को गाली देनी है तो गाली देंगे। फेसबुक पर ऐसे लोगों की एक बड़ी जमात है, जो नोटबंदी की हवा निकालने के लिए बेसिरपैर की बात करते है, जबकि वहीं लोगों को देखता हूं कि भाजपा नेताओं के आगे गणेश परिक्रमा भी करते नजर आते है। उनके इस चरित्र को देख हम भी आश्चर्य करते है कि ऐसा संभव कैसे है?, पर क्या करें?, ऐसा मैं देख रहा हूं।
ठीक इसी प्रकार जदयू के वरिष्ठ नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नोटबंदी का समर्थन किया पर उन्हीं के पार्टी के कुछ लोगों, खासकर काला धन रखनेवालों की टीम नरेन्द्र मोदी के इस अभियान की हवा निकालने में लगी है, यहीं नहीं उन पत्रकारों की भी नींद हराम हो गयी है, जो निरंतर पेड न्यूज में दिलचस्पी रखते हुए ब्लैक मनी इकट्ठा करते थे, इनकी भी नींद उड़ गयी है, वे भी अनाप-शनाप बोलकर नरेन्द्र मोदी को गरिया रहे है। इन सारे लोगों के लिए ममता बनर्जी और अरविंद केजरीबाल भगवान हो गये है, और आज के हालात में नीतीश कुमार की आलोचना करने से भी नहीं चूक रहे...
आजकल ये भी देख रहा हूं कि जो लोग नरेन्द्र मोदी की बातों का समर्थन करते है, उन्हें ये मोदी विरोधी भक्त कहकर गरियाते है, पर जब इन मोदी विरोधियों को जब कोई सटीक जवाब देता है, तो उनकी घिग्घी बंद हो जाती है।
मैं तो देख रहा हूं कि स्थिति ठीक उसी प्रकार की है, जब कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कम्प्यूटर क्रांति का श्रीगणेश किया था, तब उनका भी विरोध इसी प्रकार हुआ था।
मैं कहता हूं कि डिजिटल होने में जाता क्या है? हम पैसे कहां से लाते है, और कहां खर्च करते है?, इसकी जानकारी सरकार को क्यों नहीं होनी चाहिए?, हम जितना कमाते है, उतनी ही ईमानदारी से टैक्स क्यूं नहीं चुकाना चाहिए? केवल आयकर के डर से, ये सारी नौटंकियां और मोदी का विरोध कभी सहीं नहीं ठहराया जा सकता। देश को ईमानदार बनाना है, तो ऐसे एक्शन बहुत पहले लिये जाने चाहिए थे, पर देर से ही सही, किसी ने उठाया तो उसका समर्थन भी करना चाहिए।
ऐसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 50 दिन मांगा, 50 दिन देने में जाता क्या है? इतना सहा, थोड़ा और सहें, गलत होंगे तो उनका भी विरोध किया जायेगा, ऐसा थोड़े ही है कि यहां राजतंत्र है, गलत करेंगे, सत्ता से हटायेंगे और फिर एक नया जनादेश देंगे, पर थोड़ा देखे तो कि इस नोटबंदी का क्या असर होने जा रहा है, बेवजह का विरोध किसी भी प्रकार से सहीं नहीं ठहराया जा सकता...

Thursday, November 10, 2016

माफ करिये मोदी जी................

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 व 1000 के नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक क्या चलायी, बाजार से एक, पांच, दस, बीस, पचास और 100 रुपये के नोट ही गायब हो गये। जिन्हें घर में सब्जी या जरुरत की चीजें - राशन खरीदनी है, उनके लिए जीवन - मरण का यक्ष प्रश्न आ गया है। सर्वाधिक चिंता का विषय ग्रामीण इलाकों में है, जहां स्थिति भयावह है। कल तक बैंक और पोस्टआफिस के बाबू मक्खी मारते थे, आज उनकी पौ बारह है। हर कोई उनकी आरती उतार रहा है, शायद ये बाबू भगवान बनकर कुछ मदद करा दें। एक से लेकर 100 रुपये के कुछ भी नोट का दर्शन करा दें, ताकि बनियों की दुकान पर जाकर, वे जरुरत का सामान खरीद सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि कुछ दिन दिक्कते आ सकती है, शायद उनका इशारा इसी ओर था, पर हमें लगता है कि ये दिक्कतें बहुत लम्बी जायेगी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत अन्य मंत्रियों के बयान अखबारों में धमाल मचा रहे हैं। देश की जनता भी प्रसन्न है, मोदी जी ने बहुत अच्छा काम किया है। नक्सलियो से लेकर आतंकवादियों, जमाखोरों तक पर बुलडोजर चला दिया, पर जब वे बाजार जा रहे है और उनसे पूछा जा रहा है कि छोटे नोट है, तो उनके हाथ - पांव फूल जा रहे है। शायद जमाखोरों को भी पता था कि मोदी जी धमाल मचायेगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी धमाल में उन्होंने देश में पड़े सारे छोटे नोटों पर कुंडली मार कर बैठ गये। मोदी जी, कभी-कभी अच्छा काम से भी नुकसान होता है...
हम जानते है कि आपका हृदय साफ है, पर यकीन मानिये हमलोगों का भी हृदय साफ है। बहुतों के घर में शहनाइयां बजनेवाली है...कहीं ऐसा नहीं कि उनके घरों में मातम पसर जाये। बहुत सारी देश की महिलाएँ अपने पति से छुपाकर पैसे रखती है, ताकि आसन्न संकटों का मुकाबला किया जा सकें, यहीं नहीं वे इन पैसों से अपने पति और परिवार का मान भी रखती है, पर आज वो मजबूर होकर घर से पैसे निकाल रही है। आपने कहा था कि आप बाहर के पैसों को भारत ला्येंगे, पर आपने घर से ही उनके पैसे निकाल लिये, जिनके सपने थे। आपने बहुत अच्छा किया है, आपकी सरकार में शामिल सभी मंत्री और नेता और आपकी पार्टी दूध के धूले है, लेकिन हमारा मत है कि देश की बेटियां और मां आपके लोगों से ज्यादा ईमानदार है...उन्हें भी देश प्यारा है...वे भी आतंकियों और नक्सलियों को अपने पैरों के ठोकरों पर रखती है...पर क्या करें। वे आज दुखी है। कहीं ऐसा नहीं कि उनकी आह आपको ले डूबे...इसलिए पहले वो काम करें, जिससे इन गरीबों व महिलाओं के सम्मान पर आंच न आये...बाकी आप जो करें, देश और जनता तो आपके साथ है ही...

Monday, June 6, 2016

भला अनैतिक रूप से अर्जित धन से पोषित बच्चे देश भक्त कैसे होंगे...

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में अधिकांश माता –पिता अनैतिक रूप से धन कमाकर, अपने बच्चों का भरण-पोषण करते है, साथ ही ये आशा भी रखते है कि ये बच्चे बड़े होकर, उनकी सेवा करें और देशभक्त हो। भला अनैतिक रूप से धन कमाकर, उस धन से बच्चों का भरण-पोषण होने से बच्चे नैतिकरुप से कैसे मजबूत होंगे, ये मुझे समझ में नहीं आता। ये तो वहीं बात हुई कि पेड़ बो रहे है बबूल के और आशा रख रहे है कि इस बबूल से आम निकलेंगे।
ऐसे भी हमारा देश काफी प्रगति किया है...
जैसे जिन्हें चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण करना है, तो वे धन-पशु बनने में सर्वाधिक समय व्यतीत कर रहे हैं, धन-पशु बनने के लिए जितनी भी कलाएं होनी चाहिए, उन सारे कलाओं में पारंगत हो गये, नतीजा स्वयं देखिये कल तक योगगुरु थे, आज व्यवसायी गुरु हो गये। कल तक उनकी एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते थे, आज वे स्वयं को मॉडल के रूप में स्थापित कर रहे है, फिर भी उन्हें वो सम्मान नहीं मिल रहा, जिनकी उन्होंने कभी लालसा रखी थी, वे तो इतने गिर गये है कि उन्हें अब राम और रावण में भी फर्क करना नहीं आ रहा...
इसी प्रकार, मैं देखता हूं कि कई ऐसे मंदिर देश में बने है, जो उद्योगपतियों के नाम पर है...कई ऐसे राजनीतिज्ञों को देखता हूं कि अनैतिक रूप से धन कमाकर, अपनी हैसियत दिन दुनी रात चौगुनी करते जा रहे है, और जब रमजान का महीना आयेगा तो ये अपने घरों में सफेद टोपी पहनकर इफ्तार का ऐसा आयोजन करते है, जैसे लगता है कि इन्होंने जिंदगी में कोई दंगा-फसाद या घृणित कार्य ही न किया हो और उससे भी बड़ा आश्चर्य कि ऐसे घटियास्तर के राजनीतिबाजों के इफ्तार में शामिल होने के लिए तथाकथित बड़े-बड़े मौलानाओं की झूंड भी आ खड़ी होती है।
रांची में एक सज्जन है, बहुत बड़े व्यापारी, मीडिया हाउस चलाते है, धन इतना कमाया है कि पूछिये मत, पर पर्यावरण की धज्जियां उड़ाने में, खनिज संपदा को लूटने में, अपने यहां कार्यरत कर्मचारियों का शोषण करने में, सरकार की कर प्रणालियों को चूना लगाने में, सबसे आगे है।
रांची में एक और सज्जन को मैंने देखा है कि वे बराबर नैतिकता की दूहाई देते थे, कोई ऐसा महीना नहीं होगा, जिस महीने में वे छद्म नाम से नैतिकता संबंधी या स्वयं के नाम पर नैतिकता संबंधी आलेख न छापे हो, उनके इस आलेख से कई लोग भ्रमित होकर, उन्हें महान इंसान समझ रखे थे, पर जैसे ही बिहार के एक राजनीतिज्ञ ने उन्हें राज्यसभा का टिकट देने का ऐलान किया, उनकी सारी पत्रकारिता की नैतिकता की गंगोत्री उस बिहार के राजनीतिज्ञ के चरणों में जाकर लोटने लगी।
मैंने कई आइएएस और आइपीएस अधिकारियों को देखा है, जिन्हें देखकर या उनकी स्क्रिप्ट पढ़कर मैं हैरान हो जाता हूं कि ये आदमी आइएएस या आइपीएस कैसे बन गया, तभी मेरे दिल के किसी कोने से आवाज आती है कि बेटे ये भारत देश है , यहां भाग्य का भी विधान है, ये भाग्य का बहुत ही मजबूत है, पूर्व जन्म में कुछ बेहतर किया है, इसलिए इस जन्म में आइएएस या आइपीएस बन गया है, इसका राजयोग है, जब तक जिंदा रहेगा, लूटेगा, खायेगा, मर जायेगा, इससे देश-सेवा या समाज-सेवा की परिकल्पना भी करना बेमानी है...
ये कुछ दृष्टांत है...
और अब सवाल कि आखिर ये सब लिखने की आवश्यकता क्यों है...
मैंने इसमें राजनीतिज्ञों, पत्रकारों, उद्योगपतियों, अधिकारियों और संतो के कुछ दृष्टांत दिये है, जो बताने के लिए काफी है कि हमारा समाज कितना गिर रहा है, यह भी बताने के लिए काफी है, कि जिनके उपर दारोमदार है, देश को आगे बढ़ाने का, वे कितने गिरे हुए है और जब जिनके कंधों पर जिम्मेदारी है, देश को आगे बढ़ाने का और वे अपने बेटे-बेटियों और अपनी पत्नियों के आगे कुछ सोचे ही नहीं तो समझ लो, देश बदल रहा है, और ये आगे नहीं, पीछे जा रहा है। देश या समाज, वहां रह रहे व्यक्तियों के चरित्र व व्यक्तित्व से जाना जाता है, और ये चरित्र या व्यक्तित्व का झलक मिलता है, वहां कार्य कर रहे अधिकारियों, संतों, पत्रकारों, उदयोगपतियों, राजनीतिज्ञों और वहां रह रही आम जनता से, पर यहां सभी ने सारी मर्यादाएं तोड़कर धन-पशु बनने में ही समय ज्यादा लगा दिया है, ऐसे में इन धन-पशुओं से भारत के निर्माण की बात करना मूर्खता है...
एक बात और जान लीजिये...
भारत बहुमंजिलों इमारतवाली भवनों वाली स्थानों का नाम नहीं...
भारत कल-कारखानोंवाली औद्योगिक स्थलियों का नाम नहीं...
भारत महानगरों में डांसबार या बीयरबार वाली सांस्कृतिक केन्द्रों का नाम नहीं...
भारत महानगरों में अधकचरा ज्ञान बिखरनेवाले पत्रकारों की अशिष्ट मंडलियों का नाम नहीं...
भारत घटियास्तर के राजनीतिज्ञों जो अपनी पत्नी, बेटे और बेटियों में अपना सुख-चैन देखते हैं, उसका नाम नहीं...
भारत उन अधिकारियों वाले देश का नाम नहीं, जो जिंदगी भर जोंक की तरह भारत की जनता का खून चूसकर धन इकट्ठा करते हैं...
भारत उन उदयोगपतियों का नाम नहीं, जो अनैतिक रुप से धन कमाते हैं...
भारत तो त्याग का दूसरा नाम है...
भारत तो मर्यादा का दूसरा नाम है...
भारत तो गुणता का दूसरा नाम है...
भारत तो कर्मयोग को ग्रहण करने का दूसरा नाम है...
पर फिलहाल, भारत में अधिकांश लोग, धन-पशु बनने की कला में माहिर होकर, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ धन-पशु बनने के लिए एक – दूसरे को पछाड़ने में लगे हैं...
जिसमें राजनीतिज्ञों-पत्रकारों-अधिकारियों और सामान्य जन के लोग भी दिल से लगे हुए हैं, यानी कल तक जो भारत जिस चीज के लिए जाना जाता था, आज वहीं चीज यहां ढूंढने को नहीं मिल रही, ये हैं 1947 के बाद हमारे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि...

Friday, December 11, 2015

अरविंद और नरेन्द्र मोदी में बेशर्म कौन............

अरविंद और नरेन्द्र मोदी में बेशर्म कौन ?
हमारे देश में बेशर्मों की कमी नहीं, उन्हीं बेशर्मों में से एक है –अरविंद केजरीवाल। ईमानदारी का ढोल पीटकर, दिल्ली की 70 सीटों में से 67 सीटों पर कब्जा कर लिया और अपने 67 विधायकों का वेतन 400 फीसदी बढ़ा लिया। क्या अरविंद केजरीवाल बता सकता है? कि उसने अपने राज्य के कर्मचारियों और कामगारों को 400 फीसदी वेतन बढ़ायी, जैसा कि खुद के लिए कर लिया...उत्तर होगा नहीं। क्या दिल्ली में आम आदमी की हैसियत बढ़ी? अगर नहीं बढ़ी तो फिर अरविंद केजरीवाल किस हैसियत से अपना और अपने मातहतों विधायकों का जीवन स्तर सुधारने के लिए स्वयं के वेतन में अप्रत्याशित वृद्धि कर ली।
यह है 100 प्रतिशत सत्ता का चरित्र...सत्ता खुद को ईमानदार घोषित करने से मिलती है और जब सत्ता मिल जाये तो अपने परिवारों और अपने शुभचिंतकों का ख्याल रखों, जनता जाये भाड़ में....और मजाक उड़ाओ, उनका जो कभी तुम्हारा मजाक उड़ाया करते थे, ये कहकर कि रह गये न...
ये है हमारे देश के नये – नये नेता अरविंद केजरीवाल, कभी बोलता था कि उसकी पार्टी आम आदमी की पार्टी है, इसलिए पार्टी का नाम रखा – आम आदमी पार्टी। जरा पूछो अरविंद केजरीवाल से कि क्या आम आदमी की सैलरी उतनी है?, जितनी उसकी है...क्योंकि वो तो आम आदमी का नेता है...
जब कथनी और करनी में अंतर होता है, तभी भ्रष्टाचार का जन्म होता है। भ्रष्टाचार केवल धन लोलुपता ही नहीं, भ्रष्टाचार आचरण की मर्यादा को तोड़ना भी है, पर हम ऐसे घटियास्तर के नेताओं से उसकी आचरण की मर्यादा के बारे में भी बात नहीं कर सकते, क्योंकि ज्यादा दिनों की बात नहीं है, वो हाल ही में भ्रष्टाचार शिरोमणि सजायाफ्ता लालू प्रसाद के भी गले मिल चुका है, शायद वो दिखलाना चाहता हो कि लालू तुम क्या जानते हो? भ्रष्टाचार में हम तुम्हारे भी बाप सिद्ध होंगे। सत्ता का स्वाद भी चखेंगे, खूब पैसे भी कमायेंगे, जनता को लूटेंगे भी, फिर आनन्द से उपर भी जायेंगे और बाद में दिल्ली या देश की सड़कों पर अपनी मूर्ति बनवाकर सदा के लिए खुद को पूजवायेंगे भी...
लेकिन इस के विपरीत सत्ता में ही रहकर सत्ता का सुख लेने से वंचित त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को देखिये, इन सबसे अलग उन्हें क्या करना है?, वे करते जा रहे है?
ठीक उसी प्रकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखिये, उनके उपर लगातार छीटाकशीं व हमले जारी हैं, पर इनसे बेफिक्र, वे देश सेवा में लगे है, हालांकि नरेन्द्र मोदी की सत्ता जल्द समाप्त हो, इसके लिए तो कांग्रेस के कई नेता पाकिस्तान जाकर नवाज शरीफ के तलवे तक चाट चूके है, ऐसे –ऐसे बयान दिये है, जिसे पढ़ व सुनकर शर्म महसूस होती है कि ऐसे नेता इस भारत में ही क्यों पैदा होते है?, अन्य जगहों पर क्यों नहीं? कुछ दिनों पूर्व, एक कांग्रेसी ने नेपाल संकट पर जो बयान दिया, उस बयान से एक बात फिर पुष्ट हो गयी कि कांग्रेस सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है, पर फिलहाल उसका वश नहीं चल रहा...
दूसरी ओर जरा अरविंद केजरीवाल का बड़बोलापन देखिये, अपने प्रधानमंत्री का किस प्रकार मजाक उड़ाते है...विधानसभा में अपने मंत्रियों और विधायकों की सैलरी में 400 फीसदी का इजाफा करनेवाले अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर उनकी सैलरी को लेकर उनका मजाक उड़ाया था। कहा था कि ओबामा यदि मोदी से उनकी सैलरी पूछेंगे, तो क्या बतायेंगे कि उन्हें 1.60 लाख रुपये मिलते है। मोदी जी को अपनी सैलरी बढ़ाकर 10 लाख रुपये तक कर लेनी चाहिए...पर शायद अरविंद केजरीवाल और उनके पिछलग्गूओं को पता नहीं कि...
देश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा व्यक्तित्व कहीं नहीं...
अरविंद जान लो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में और उनके वेतन के बारे में...
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ज्यादातर सैलरी दान कर देते है।
गुजरात के सीएम थे, तब भी ऐसा ही करते थे।
गुजरात से दिल्ली चले, तो 21 लाख रुपये गुजरात की बेटियों के नाम कर दिया, ताकि वह पढ़े और आगे बढ़े।
इस महीने की तनख्वाह चेन्नई में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए देंगे।
मई में अपने हिस्से की सैलरी नेपाल पीड़ितों के नाम की थी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टेक होम सैलरी भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भी कम है। मनमोहन सिंह की टेक होम सैलरी करीब 48,000 रुपये होती थी।
अब निर्णय जनता करें...
कि बेशर्म और बदतमीज कौन है?
अरविंद केजरीवाल या नरेन्द्र मोदी?

Monday, October 26, 2015

मीडिया की संकीर्ण मानसिकता...........

कल यानी 25 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के तहत अपनी विचारधारा भारतीय जनमानस के बीच रखने का प्रयास किया। इस कार्यक्रम को सभी चैनलों ने बारीकी से जनता के समक्ष रखा। प्रधानमंत्री ने इस मन की बात कार्यक्रम के दौरान बहुत ही अच्छी – अच्छी बातें की, गर उस पर सचमुच ध्यान दिया जाय तो मानवता और भारतीयता को बल मिलेगा। अंगदान, ग्रुप बी, सी एवं डी में साक्षात्कार की समाप्ति व सांसदों द्वारा गांवों को गोद लेकर उनके कायाकल्प का कार्य आदि बातों को प्रधानमंत्री ने जोरदार ढंग से उठाया और लगे हाथों प्रधानमंत्री ने स्वच्छता कार्यक्रम को भी जनता के समक्ष रखा।
इस स्वच्छता कार्यक्रम में मीडिया की भूमिका की भी प्रधानमंत्री ने जमकर सराहना की। प्रधानमंत्री ने आजतक, ईटीवी, जीटीवी, एबीपी, एनडीटीवी आदि चैनलों की जमकर प्रशंसा की, पर किसी चैनल ने अपने समाचार में ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने जब मीडिया की सराहना की तो उन्होंने सिर्फ एक चैनल का नाम नहीं लिया, बल्कि बहुतेरे चैनलों का नाम लिया, कुछ अखबारों का भी नाम लिया। सारे चैनलों ने अपने अपने समाचार के बुलेटिन में जब भी स्वच्छता कार्यक्रम के समाचार की बात हुई तो अपनी पीठ खुद थपथपाई, ये कहकर की प्रधानमंत्री मन की बात में उनके चैनल यानी जो चैनल समाचार प्रसारित करता, सिर्फ अपने चैनल का नाम लेकर समाचार का इतिश्री कर लेता। क्या ये संकीर्ण मानसिकता नहीं है?
अच्छा तो ये होता कि सारे चैनल, गांव व देश की सफाई के कार्यक्रम को जमीन पर उतारने की तरह अपने संकुचित मानसिकता की भी सफाई करते और ईमानदारी से लोगों को बताते कि प्रधानमंत्री ने विभिन्न चैनलों का नाम लिया और उन्हें इस बात की बधाई दी, कि वे स्वच्छता कार्यक्रम को महत्व दे रहे है।
मतलब समाज के सामने भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करनेवाले, नेताओं के बोली के बाल का खाल निकालनेवाले कितना एक दूसरे से ईर्ष्या करते है, ये बातें एक बार फिर कल स्पष्ट रुप से उजागर हो गयी। मैं रांची में भी देखता हूं कि कई अखबार बहुत अच्छे – अच्छे कार्यक्रम का आयोजन करते है, पर वह समाचार सिर्फ उसी अखबार में दिखाई पड़ता है, जो करा रहा होता है, क्या ये ईर्ष्या अथवा जलन नहीं है? गर ये ईर्ष्या व जलन है, तो फिर ऐसे लोगों से क्या समाज व देश का भला होगा, या हित होगा? इस प्रश्न को मैं जनता के समक्ष रख रहा हूं, जनता चिन्तन करें......

Monday, July 27, 2015

यानी बिहारी बाबू बन गये बोकरादी बाबू.........

अब तो नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं लेकिन हम आपको बता दें कि जब से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बात चली थी, तभी से बिहार का एक भाजपा नेता व फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को बोकरादी की बीमारी लग गयी, बेचारा पगला गया। उसे नीतीश और लालू में खुदा नजर आने लगा। कारण बिहार के लोग भी जानते हैं और हम भी, गर कोई नहीं जानता हैं, तो वह भी जान ले, चूंकि शत्रुघ्न सिन्हा की जिंदगी में गर कोई उसका सबसे बड़ा शत्रु हैं तो वह हैं अमिताभ बच्चन। अमिताभ बच्चन और नरेन्द्र मोदी के बीच किस प्रकार की दोस्ती चल रही हैं, वह सभी जानते है। कैसे नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए और डीडी किसान चैनल को प्रमोट करने के लिए अमिताभ बच्चन को स्थान दिया। ऐसे में भला शत्रुघ्न सिन्हा को बोकरादी की बीमारी का बढ़ जाना स्वाभाविक हैं, इसलिए वह नरेन्द्र मोदी को थोड़ा डोज देना चाहता हैं, पर वो नहीं जानता कि नरेन्द्र मोदी एक ऐसे शख्स का नाम हैं कि वह शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई लोगों की बोकरादी छुड़ा चुका हैं, ऐसे अभी जिस शत्रुघ्न सिन्हा को नीतीश व लालू में खुदा नजर आ रहा हैं, उन दोनों को नरेन्द्र मोदी जो हैं, बोकरादी छुड़ा चुका हैं तो फिर शत्रुघ्न सिन्हा किस खेत का मूली है....शत्रुघ्न सिन्हा, बिहार के लिए क्या किया हैं, सभी जानते हैं। जब फिल्म स्टार था, जब उसकी चलती थी तो बोला था कि वो बिहार के लोगों के लिए कुछ करना चाहता हैं, कैंसर हास्पिटल खोलने की बात करता था, पर सच्चाई ये हैं कि इसने बिहार के लोगों को सपना तो दिखाया, पर उसने सपने पूरे नहीं किये। हां बिहार के लोगों को समय - समय पर धोखा देकर, वह कई बार सांसद जरुर बन गया। जरा इस बोका बिहारी से पूछिये कि वह सांसद रहते हुए, बिहार के लिए क्या किया...पता चलेगा कुछ नहीं, फिलहाल अमिताभ बच्चन को मिल रही इज्जत से वह पागलपन का शिकार हो गया हैं, इसलिए कभी वो याकूब मेनन जैसे आतंकी के पक्ष में तो कभी नीतीश व लालू के पक्ष में अनाप-शनाप बयान दिये जा रहा है, और जिस थाली में खा रहा हैं, उसी में छेद कर रहा हैं। ये हैं बिहारी बाबू का असली चेहरा...यानी बिहारी बाबू बन गये बोकरादी बाबू.........

Wednesday, January 28, 2015

...और हिमांशु को न्याय दिलाने में प्रधानमंत्री कार्यालय भी विफल........



प्रधानमंत्री, कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्री और गृह मंत्री जवाब दें................
आखिर SSC इलाहाबाद में धांधली कब तक चलती रहेंगी............
आखिर बिहार के हिमांशु जैसे अभ्यर्थियों का शिकार कर्मचारी चयन आयोग इलाहाबाद कब तक करता रहेगा..........................
आखिर हिमांशु जैसे अभ्यर्थियों को न्याय कब मिलेगा......................
केन्द्र में सरकार बदल गयी पर हिमांशु जैसे अभ्यर्थियों को उसका ऐहसास कब होगा....................
अच्छे दिन आनेवाले हैं – के नारे का ढिंढोरा पिटनेवाले लोग बताये कि प्रधानमंत्री कार्यालय में जो सूचना के अधिकार से संबंधित सूचना देने के लिए कार्यालय खोले गये हैं, वो कार्यालय सहीं मायने में काम करना कब शुरु करेगा, कब सूचनाएं देना शुरु करेगा, क्योंकि मैं महसूस कर रहा हूं कि ये कार्यालय बहुत ही आसानी से सूचना के अधिकार अधिनियम 6(3) का सहारा लेकर संबंधित विभाग को अंतरित कर देता हैं, फिर वो विभाग तब तक निष्क्रिय रहता हैं, जब तक उसे प्रथम अपीलीय पत्र का मजमून न मिल जाये, फिर वो आनन फानन में वो दूसरे विभाग को पत्र अंतरित करता हैं और इसी प्रकार महीनों बीत जाते हैं, प्रक्रिया अनवरत चलती रहती हैं, और सूचनाएं नहीं मिलती हैं, गर ज्यादा जानकारी लेनी हो तो हिमांशु द्वारा मांगे  गये सूचना के अधिकार के तहत सूचनाओं की स्थिति देख लीजिये, जो प्रधानमंत्री कार्यालय में 1 नवम्बर 2014 को हिमांशु ने भेजा और प्रधानमंत्री कार्यालय ने पत्रांक संख्या आरटीआई /7906/2014 पीएमआर के तहत सचिव भारत सरकार कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को अंतरित कर दी, फिर दो महीने रखकर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने कर्मचारी चयन आयोग नई दिल्ली अपीलीय प्राधिकारी आरटीआई सेल को भेज दी, तीन महीने बीतने को आये, पर सूचनाएं जिसे मिलनी चाहिए, सूचना नहीं मिली, तो मिल क्या रहा हैं, विभागों का पता, कब तक मिलेगा, विभागों का पता, पता नहीं.....
सच्चाई ये है कि जहां से सूचनाएं विधिवत् मिलनी हैं, उससे तीन साल पहले हिमांशु ने 2011 में सूचनाएं मांगी, प्रथम अपील भी किया, पर सूचना नहीं मिली, तभी तो हारकर हिमांशु ने प्रधानमंत्री कार्यालय का दरवाजा खटखटाया और वहां से भी जब सूचनाएं नहीं मिले और न्याय न मिले तो क्या कहा जाये, हिमांशु अब किसके पास जाये, ये यक्ष प्रश्न हिमांशु को साल रहा हैं......यानी सरकार किसी की भी आये या जाये, कोई फर्क नहीं पड़ता, तंत्र अपने ढंग से काम कर रहा हैं.........वाह री केन्द्र सरकार, वाह रे अच्छे दिन लानेवाले........मान गये नरेन्द्र मोदी जी आपको......
हिमांशु जैसे बिहार के कई अभ्यर्थी हैं, जो न्याय की गुहार लगा रहे हैं, पर उसकी कोई सुध नहीं ले रहा। पिछले तीन सालों से हिमांशु कर्मचारी चयन आयोग इलाहाबाद से पत्राचार कर रहा हैं, पर उसके प्रश्नों का उत्तर कर्मचारी चयन आयोग इलाहाबाद नहीं दे रहा हैं। वह फोन भी करता हैं तो उसे जवाब नहीं मिल रहा।  हार-थक कर हिमांशु ने प्रधानमंत्री कार्यालय का दरवाजा खटखटाया, पर यहां भी उसे निराशा हाथ लग रही हैं, तो फिर हिमांशु अब कहां जाय, किससे इंसाफ मांगे ताकि उसे न्याय मिल सके, सवाल ये हैं....................
ये इसलिए लिखना पड़ रहा हैं, क्योंकि हार-थक कर जब हिमांशु को किसी ने कहा कि उसे अपनी बात प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजनी चाहिए तब उसने प्रधानमंत्री कार्यालय से सूचना के अधिकार 2005 के तहत वहीं सूचनाएं मांगी जो कर्मचारी चयन आयोग इलाहाबाद से वह पूछता रहा हैं, पर उसे यहां भी निराशा हाथ लगी। हां, एक प्रधानमंत्री कार्यालय से उसे पत्र आया, जिसका पत्रांक संख्या – आरटीआई /7906/2014 पीएमआर था। जिसमे लिखा था, कि हिमांशु के सूचना से संबंधित प्रश्नों की जानकारी के लिए संबंधित विभाग – सचिव, भारत सरकार, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, नार्थ ब्लाक, नई दिल्ली को अंतरित की गयी हैं, और उसके बाद से आज तीन महीने बीतने को आये, कोई सूचना नहीं मिली, हां एक पत्र कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने जरुर भेजा, वह भी 28 जनवरी 2015 को हिमांशु को मिला, जिसमें कहा गया हैं कि वो अपने जवाब के लिए कर्मचारी चयन आयोग नई दिल्ली अपीलीय प्राधिकारी आरटीआई सेल से संपर्क करें यानी अब सीधे केन्द्रीय सूचना आयोग से अपील करने के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता, जरा सोचिये, गर यही हाल प्रधानमंत्री कार्यालय का है तो आम कार्यालयों की क्या बात करें.......................
इसलिए हिमांशु अकेला युवा नहीं जो निराश हैं, ऐसे कई युवा हैं, जो निराश हैं, और उन्हें आशा की किरण नहीं दीख रही.......................
आखिर हिमांशु का मामला क्या हैं, ये आप जानेंगे, तो आप के पांव तले जमीन खिसक जायेगी................
कर्मचारी चयन आयोग ने दिनांक 5 फरवरी 2011 को रोजगार समाचार के अंग्रेजी संस्करण में सीमा सुरक्षा बल, केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल तथा सशस्त्र सीमा बल में सिपाही सामान्य ड्यूटी भर्ती  2011 से संबधित विज्ञापन प्रकाशित किया था। इस भर्ती प्रकिया में 10 वीं पास सभी उम्मीदवारों से आवेदन आमंत्रित किए गए थे। आवेदन प्राप्ति की अंतिम तिथि 04 मार्च 2011 तथा लिखित परीक्षा 5 जून 2011 को निर्धारित की गई थी। बिहार राज्य के अभ्यर्थियों को जो इस नियुक्ति प्रक्रिया में भाग लेना चाहते थे, से आवेदन 04 मार्च 2011 तक  क्षेत्रीय निदेशक, मध्य क्षेत्र,  कर्मचारी चयन आयोग 8 ए बी बेलीरोड, इलाहाबाद पिन- 211002 पते पर मांगा गया था। चूंकि हिमांशु बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्र पटना से आता है, इस कारण उसने अपना आवेदन 6 फरवरी 2011 को ही भारतीय डाक द्वारा उक्त पते पर प्रेषित कर दिया था। उसने आवेदन फॉर्म के क्रम संख्या 17 Preference of Post for CPOs   में
1.    केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल
2.    सशस्त्र सीमा बल
3.    सीमा सुरक्षा बल
4.    केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल
क्रमशः BDAC वरीयता को दर्शाया था।
हिमांशु के आवेदन पत्र को कर्मचारी चयन आयोग, इलाहाबाद द्वारा स्वीकृत कर लिया गया। परिणामस्वरुप उसे 22 मार्च 2011 को शारीरिक परीक्षा (PST/PET ) के लिए केद्रींय रिजर्व पुलिस बल कैंप, गया, बिहार में बुलाया गया। वहां पर वह सभी परीक्षणों में सफल रहा। जैसा कि लिखित परीक्षा 5 जून 2011 को  पहले से ही निर्धारित था, इसी तय तिथि को वह बलदेव इंटर स्कूल, दानापुर कैंट पटना बिहार  परीक्षा केन्द्र पर पहुंचकर लिखित परीक्षा में भाग लिया। लिखित परीक्षा में उसे कुल 100 अंक में से 47 अंक प्राप्त हुए। तत्पश्चात वह 20 अगस्त 2011 को चिकित्सीय जांच परीक्षा के लिए सीमा सुरक्षा बल, खागड़ा कैंप, किशनगंज, बिहार पिन-855107 केन्द्र पर उपस्थित हुआ। यह जांच परीक्षा 20 अगस्त 2011 को सुबह 7 बजे से 21 अगस्त 2011 के शाम 7 बजे तक चला। इस परीक्षा में भी वह चिकित्सीय जांच में  फिट (MEDICAL  FIT) घोषित हुआ।
इन सभी चरणों के परीक्षण में सफल होने के बावजूद उसे मेधा सूची (MERIT LIST) में कर्मचारी चयन आयोग द्वारा स्थान नहीं दिया गया, जबकि उससे कम अँक लानेवालों को मेधा सूची में डालकर नौकरी दे दी गयी। जबकि 26 नवम्बर 2011 को जारी अधिसूचना तथा मेधा सूची  SSC.NIC.IN वेबसाईट के अनुसार----
1.    बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से चयनित अनारक्षित कोटि में अंतिम अभ्यर्थी का अंक सीमा सुरक्षा बल में 45 है।
2.    बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से चयनित अनारक्षित कोटि  में अंतिम अभ्यर्थी का अंक केद्रींय रिजर्व पुलिस बल में 40 है। 
3.    बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से चयनित अनारक्षित कोटि  में अंतिम अभ्यर्थी का अंक सशस्त्र सीमा बल में 47 है। 
वहीं 2 दिसम्बर 2011 को SSC.NIC.IN वेबसाईट के अनुसार दिए गए अंक तालिका में हिमांशु, जिसका क्रमांक – 3206002186 है, का प्राप्तांक 47 है। हिमांशु सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी होने के साथ साथ बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्र पटना से आता हैं। उसने
सीमा सुरक्षा बल, केद्रींय रिजर्व पुलिस बल और सशस्त्र सीमा बल में चयनित सामान्य वर्गों के अंतिम अभ्यर्थियों से ज्यादा अंक लाया है और प्रथम मेडिकल जांच में फिट भी है, इस कारण उसे प्राथमिकता के साथ मेधा सूची में स्थान मिलना चाहिए था और अब तक उसे केन्द्रीय सेवा में रहना चाहिए था परंतु उसके पत्राचार करने के बावजूद कर्मचारी चयन आयोग द्वारा उसे अनदेखा किया गया है।
उसे मेरिट लिस्ट में स्थान क्यों नहीं दिया गया यह जानने के लिए उसने और उसके पिताजी ने कर्मचारी चयन आयोग नई दिल्ली और क्षेत्रीय कार्यालय इलाहाबाद को ई- मेल, फोन तथा भारतीय डाक के स्पीड पोस्ट सेवा तथा साधारण डाक सेवा से उक्त दोनों कार्यालयों में कई बार संपर्क किया, परंतु एक भी पत्र का जवाब कर्मचारी चयन आयोग नई दिल्ली और कर्मचारी चयन आयोग क्षेत्रीय कार्यालय इलाहाबाद ने देना उचित नहीं समझा।
इन सभी घटनाओं से परेशान होकर हिमांशु ने 27 दिसम्बर 2011 को 10 रुपये का पोस्टल ऑडर के साथ सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 का सहारा लिया और इसके तहत कुल 6 प्रश्न पुछे थे। यह आवेदन CPIO  कर्मचारी चयन आयोग, (म.क्षे) को भेजा था। ये हिमांशु जैसे कई युवाओं के नियुक्ति से संबधित बुनियादी प्रश्न थे। अब 2015 हो गए परंतु आजतक उसे इसका भी कोई जवाब नहीं मिला।
दिनांक 1 नवम्बर 2014 को हिमांशु ने प्रधानमंत्री कार्यालय से इसी सबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत फिर से सूचनायें मांगी, यह पत्र उसने
श्री कृष्ण कुमार , निदेशक, प्रधानमंत्री कार्यालय, साउथ ब्लाक, नई दिल्ली – 110011. को लिखा था। 15 कागजात संलग्न कर इसी में एक अलग से पत्र था जो उसने प्रधानमंत्री जी को ही लिखा था, यह  पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय में 5 नवम्बर 2014 को भारतीय डाक के स्पीड पोस्ट सेवा से पहुंच गया था। दिनांक 13 नवम्बर 2014 को भारतीय डाक के रजिस्टर्ड डाक सेवा से ए डी के साथ उसे इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री कार्यलय से एक पत्र प्राप्त हुआ।
पत्रांक संख्या आरटीआई /7906/2014 पीएमआर से उसे पता चला कि उसके आरटीआई आवेदन को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6 (3) के तहत यथोचित कार्रवाई हेतु सचिव, भारत सरकार, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, नार्थ ब्लॉक नई दिल्ली को अंतरित कर दी गई है। जबकि उसने इसी संदर्भ में 13 दिसम्बर 2014 को एक स्मरण पत्र  श्री पी. के. शर्मा, अवर सचिव एवं केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी, प्रधानमंत्री कार्यालय, साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली – 110011 को भेजा । उसने उक्त पते पर ही प्रथम अपील दिनांक 18 दिसम्बर 2014  तथा सचिव, भारत सरकार, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, नार्थ ब्लॉक नई दिल्ली को प्रेषित किया। ये सारे पत्र उसके द्वारा ईमेल से भी भेजे गये है। पर अब तक सूचनायें नहीं मिली। अब वह किस पर भरोसा करे, क्यों करे, कैसे करे................ ? उसे न्याय कैसे मिले? उसका अनुरोध है कि अब उससे उसकी धैर्य की परीक्षा न ली जाए और उसे जल्द से जल्द यथोचित सूचनाएँ उपलब्ध कराने के साथ साथ न्याय दिलाने का भी कष्ट किया जाय
और अंत में, उसके प्रश्न आज भी सामयिक और ज्वलंत हैं कि........
1.    उसे इस नियुक्ति के संबध में सिर्फ यही कहना है कि कर्मचारी चयन आयोग आखिर अपनी गलती कब स्वीकार करेगा और हिमांशु को मेरिट लिस्ट में स्थान देकर, उसे केन्द्रीय सेवा में जाने का मार्ग प्रशस्त करेगा?
2.    उससे कम अंक वाले तथा जो आवेदन फॉर्म में Preference of Post for CAPFs में वरीयता भी नहीं दिए थे अथवा सिर्फ एक वरीयता को दर्शायें थे को मेरिट लिस्ट और रिजर्व लिस्ट में स्थान दे दिया गया और हिमांशु जिसने इन सभी से अधिक अंक लाये, फिर भी उसे अब तक सेवा में नहीं लिया गया, आखिर क्यों?
3.    बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से चयनित अनारक्षित कोटि में कई ऐसे अभ्यर्थी हैं जो दूसरी बार मेडिकल परीक्षा अर्थात शारीरिक जांच परीक्षा में फिट पाये गये है तथा हिमांशु, क्रमांक - 3206002186 से भी कम अंक लायें हैं, को मेरिट लिस्ट में स्थान देकर उन अभ्यर्थियो को नॉमिनेशन करा दी गई, क्यों?
4.    बिहार के नक्सल प्रभावित क्षेत्र से चयनित अनारक्षित कोटि में एक ऐसा अभ्यर्थी भी है जो कट ऑफ अंक से भी नीचे अंक लाया है और उसे भी नॉमिनेशन करा दिया गया, जबकि हिमांशु हर प्रकार से योग्य हैं, फिर भी उसे अब तक मेरिट लिस्ट से बाहर रखा गया, और उसे केन्द्रीय सेवा से वंचित रखा गया आखिर क्यूं?
    क्या ये समझ लिया जाय कि इस देश में हिमांशु जैसे युवाओं को अब न्याय नहीं मिलेगा, अब हिमांशु जैसे युवा, कर्मचारी चयन आयोग में व्याप्त धांधली, पक्षपात और भ्रष्टाचार के शिकार होते रहेंगे और उनका भविष्य इसी तरह चौपट होता रहेगा।
प्रधानमंत्री जी, जवाब चाहिए.........
कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्री जी, जवाब चाहिए..............
गृह मंत्री जी, जवाब चाहिए.....................

Monday, June 16, 2014

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, क्या हुआ, आप भी तो वहीं कर रहे हैं, जो कांग्रेस करती थी यानी मर जवान मर किसान.............

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, क्या हुआ, आप भी तो वहीं कर रहे हैं, जो कांग्रेस करती थी यानी मर जवान मर किसान। याद करिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशाल रैली....। कांग्रेस पर बरसते हुए, प्रधानमंत्री मोदी जी को....जिसमें वे कांग्रेस पर बरसते थे। कहते थे कि कांग्रेस का नारा था - जय जवान, जय किसान। पर अब नारा बदल गया हैं, कांग्रेस कहती हैं कि मर जवान, मर किसान। पर सच्चाई क्या हैं....ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं। दिल्ली एयरपोर्ट पर कार्यरत सीआईएसएफ के जवानों को देख लीजिये। उनके साथ गृह मंत्रालय में कार्यरत, और उनके इशारों पर कार्य करनेवाले वरीय अधिकारी ही अपने कनीय जवानों के साथ क्या कर रहे हैं। जवानों से 18-18 घंटे काम लिये जा रहे है। यहीं नहीं 18-19 घंटे की ड्यूटी खत्म हुई नहीं कि तीन घंटे बाद उन्हें पीटी-परेड के लिए बुला लिया जा रहा हैं। यहीं नहीं उन्हें खाने पीने की भी सुविधा नहीं कि वे ड्यूटी के दौरान खा पी ले। यहीं नहीं गर इसी बीच उन्हें पेशाब या शौच लग गया तो हो गयी उनकी कयामत। अपने जवानों से इस प्रकार की हैवानियत जैसा व्यवहार कौन कर रहा हैं। ये कोई दूसरा नहीं, ये वहीं लोग हैं जो उच्च पदों पर स्थित हैं। शायद उन्हें भूख नहीं लगती होगी, या पेशाब- शौच नहीं लगता होगा। नौकरी के भय से ये जवान कुछ बोलते नहीं, पशुवत जिंदगी जीने को मजबूर हैं, पर सत्ता के मद में चूर लोगों को इनसे क्या मतलब। वोट मिल गया। जवान भार में जाये। इससे क्या मतलब। इतिहास लिखेगा कि एक गुजरात का मुख्यमंत्री था, जो प्रधानमंत्री बन गया। संघ कहेगा कि हमने वो काम कर दिया जो कोई कर ही नहीं सकता था, पर गांव के किसी कोने में बैठा, जवान का परिवार यहीं कहेगा कि जैसे कांग्रेस ने अब तक छल किया। एक और व्यक्ति, जिसका नाम नरेन्द्र मोदी हैं, उसने भी छल किया। जरा सोचिये कि दिल्ली जहां संसद हैं, वहीं पर सीआईएसएफ के जवानों का ये हाल होगा, तो बार्डर पर जो जवान रहते होंगे,  जो जेसलमेर, बाड़मेर आदि जहां 50 डिंग्री सेल्सियस गर्मी में तापमान होता हैं। भारत चीन सीमा जहां जाड़े में माइनस डिंग्री तापमान हो जाता हैं, वहां काम कर रहे जवानों की क्या हालत होती होगी। क्या जवान सचमुच सिर्फ मरने के लिए होते हैं, जैसा कि बिहार के एक मंत्री ने बयान दिया था। फिलहाल देखकर तो ऐसा ही लगता हैं। नहीं तो देश के जवानों में मंत्री, नेता, आईएएस, आईपीएस, व्यापारी, धनाढ्य वर्गों के बच्चे क्यों नहीं शामिल होते। यहां तक की एनसीसी में भी गरीबों के बच्चें क्यों, अमीरों के क्यों नहीं। इससे साफ पता चलता हैं कि इस देश में भेदभाव शुरु से चला आ रहा हैं, और ये तब तक चलता रहेगा, जब तक घटियास्तर की सोच के लोग सत्ता पर काबिज होते रहेंगे। फिलहाल एक और व्यक्ति, एक और पार्टी जिसका नाम भाजपा हैं, वो छलने के लिए तैयार हैं, उसे पांच साल तक मिल गया हैं, हमें और हमारे जवानों को उल्लू बनाने के लिए.............

Wednesday, November 6, 2013

लो, अब लताजी भी सांप्रदायिक हो गयीं.............

लो कर लो बात, अब विश्व की सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर जी भी सांप्रदायिक हो गयी, क्योंकि उनकी दिली ख्वाहिश है कि नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने और ये उद्गार उन्होंने अपने एक निजी कार्यक्रम में व्यक्त कर दिया। उन्होंने ऐसा बयान देकर, भाजपा के घुर विरोधियों की नींद उड़ा दी है। जो सोते जागते एक ही सपना देखते हैं कि कैसे नरेन्द्र मोदी का अहित हो। नरेन्द्र मोदी का अहित चाहनेवालों में केवल राजनीतिक पार्टियां ही नहीं, देश के वे कांग्रेस व नीतीश भक्त राष्ट्रीय चैनलों के पत्रकार और मालिक भी हैं, जिन्हें नरेन्द्र मोदी फूटी आंख भी नहीं सुहाते। बस इन्हें मौका मिलना चाहिए, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मीन-मेख निकालने की। फिर क्या सारा काम-काज छोड़कर, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मीन-मेख निकालने लगेंगे, भद्दी-भद्दी गालियां देंगे, कीचड़ उछालेंगे, विष-वमन करेंगे और उसके बाद भी, इनकी हरकतों पर आम जनता पर कोई असर, अगर नहीं पड़ा तो जनता को ही कटघरे में खड़ें कर देंगे और कहेंगे कि भारत की जनता तो एकदम खत्म हैं। इधर इन राजनीतिज्ञों और कांग्रेस – नीतीश भक्त पत्रकारों का एक ही सूत्री कार्यक्रम हैं – वो कार्यक्रम है सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी का विरोध करना। अभी कई चैनलों के मालिक और पत्रकार विधवा प्रलाप करने में लगे हैं, ये कहते हुए कि हाय, लताजी आप तो बहुत अच्छी थी, आपको तो हम भी बहुत मानते थे, पर आपने ये क्या कह दिया, आखिर क्यों आप नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनवाने पर तूली हैं, गर आप नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का इरादा रखती भी हैं, तो आपने इस इरादे को क्यों व्यक्त किया, अपने मन की बात, मन में ही रखती। अब हम कर ही क्या सकते हैं, हमारी तो आदत हैं, नरेन्द्र मोदी को गाली देने की और उन्हे भी गाली देने की जो नरेन्द्र मोदी के पक्ष में बयान देते हैं, इसलिए अब हम आपको भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए बयानवीर नेताओं के बयानों के आधार पर हम आप में भी मीन-मेख निकालेंगे, आपको भी नहीं छोड़ेंगे, जहां तक ताकत होगा, कांग्रेस भक्त और नीतीश भक्त पत्रकार और नेता, आपके खिलाफ भी विषवमन करने से बाज नहीं आयेंगे। ये अलग बात हैं कि इस विषवमन अभियान से आपका अहित होता हैं या नहीं होता, पर आपके खिलाफ हम अभियान शुरु कर चुके हैं और आज से आप भी सांप्रदायिक हो गयी, क्योंकि आप भी नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही हैं, जिसका विरोध हम जन्म-जन्मातंर से कर रहे हैं। हमारे पास एक से एक उदाहरण है। एक राष्ट्रीय चैनल के पत्रकार का विधवा प्रलाप देखिए। हाल ही में नरेन्द्र मोदी बिहार आये, पटना ब्लास्ट में प्रभावित परिवारों से मिलने गये। मीडिया से बाद में उन्होंने बातचीत की, पर जब इस राष्ट्रीय चैनल के पत्रकार के किसी प्रश्नों का जवाब नरेन्द्र मोदी ने नहीं दिया, तो वह दोपहर में अपने एंकर के सवालों का जवाब न देकर, वो नरेन्द्र मोदी को ही भला-बुरा कहने लगा और अपनी बातों को सही करने के लिए कपिल सिब्बल तक का सहारा ले लिया, ऐसे हैं पटना के ये मठाधीश पत्रकार और ऐसा ही इनका चैनल। आजकल इस चैनल को नीतीश में केवल गुण ही गुण नजर आ रहे हैं और सारे दुर्गुण उसे नरेन्द्र मोदी में ही नजर आते हैं। इस चैनल की सायं और रात की विशेष बुलेटिन में नीतीश का गुणगान देखा जा सकता हैं, पर नीतीश की कुटिल मुस्कान और उसके द्वारा अपने विरोधियों के प्रति अभद्र भाषा का किया गया प्रयोग, इसे सुनायी नहीं देता, शायद उस राष्ट्रीय चैनल के प्रबंधक, या पटना में रह रहा उसका संवाददाता या एंकर बहरा हो जाता होगा, जब कुटिलता से लवरेज नीतीश, अपने विरोधियों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे होते हैं। धन्यवाद दूंगा, आजतक व जी मीडिया को, जिसने सही को सही रखने का प्रयास किया। शायद यहीं कारण हैं कि इन दोनों चैनलों ने देश में अपनी साख पूर्व की तरह बरकरार रखी हैं, पर जरा उस वामपंथी विचारधारावाले निकम्मों, पत्रकारों और उसके प्रबंधकों को देखिये। जबसे लता जी ने नरेन्द्र मोदी के पक्ष में, वे प्रधानमंत्री के रुप में दीखे – बयान दिया। जदयू के एक नेता के सी त्यागी, कांग्रेस के राजीव शुक्ला, सपा और पता नहीं दीमक की तरह देश में कितनी पार्टियों के नेता हैं, जो कभी नगरपालिका के वार्ड आयुक्त का चुनाव तक नहीं जीत सकते, लता जी के खिलाफ अनाप-शनाप बयान दे डाला। जिसकी जितनी निंदा की जाय कम है। यहीं नहीं इन नेताओं ने मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी। ये अपनी अभिव्यक्ति के लिए तो एडी-चोटी एक कर देते हैं, पर लता मंगेशकर जैसी महान गायिका के प्रति घटिया स्तर के शब्दों का प्रयोग करने से नहीं चूकते। बयान देखिये इन घटियास्तर के नेताओं का – सुरसाम्राज्ञी को सलाह देते हैं कि वे राजनीति से दूर रहे। कमाल हैं देश को रसातल में ले जानेवाले ये नेता और इनकी पार्टी राजनीति में रहे, पर देश को मान-सम्मान बढ़ानेवाली लताजी राजनीति से दूर रहे। वो अपनी भावनाओं को भी अभिव्यक्त नहीं करें। ये घटियास्तर के नेता, जिनकी औकात नहीं कि वे जहां रहते हो, वहां ही रह रहे किसी चरित्रवान व्यक्ति की आंखों में आंख डालकर बात कर सकें। ये लता जी को राजनीति का एबीसीडी सीखाने चल पड़े और देखिये इन पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्षों को जो इन सड़क-छाप नेताओं के खिलाफ एक्शन भी नहीं लेते कि वे लता जी के खिलाफ क्यूं इस प्रकार का वक्तव्य दे रहे हैं। यानी धर्मनिरपेक्षता का सारा ठेका, इन्होंने ही ले रखा हैं, बाकी सभी सांप्रदायिक हो गये। लानत हैं, इन नेताओं और घटियास्तर के उन पत्रकारों को, जो घटियास्तर का सोच रखते हैं और लताजी जैसी महान गायिका पर कीचड़ उछालने से नहीं चूकते। ऐसे भी कीचड़ उछालने वाले और कर ही क्या सकते हैं। जिन्होंने देश में महंगाई, भ्रष्टाचार और अपने हित में दंगा करवाकर देश को नरक बना डाला हो, उनसे हम उम्मीद ही क्या कर सकते हैं। लताजी आप, आप हैं, आप ने अपनी गीतों से कभी देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरुजी को रुलाया हैं। आपने देश ही नहीं बल्कि विश्व में रहनेवाले करोड़ों – करोड़ भारतीयों का मान बढ़ाया हैं। भारतीय सैनिकों के मनोबल बढाने के लिए आपने क्या नहीं किया। कभी मां, तो कभी बहन, तो कभी बेटी, पता नहीं कितने रिश्तों को आपने गीतों में जीया हैं, आप देश की शान हैं, आप भारत रत्न हैं, और भारत रत्न को कैसे सम्मान दिया जाता हैं, गर यहां के नेता नहीं जानते, पत्रकार नहीं जानते तो आप इन्हें माफ कर दीजिये, क्योंकि आपका दिल बड़ा हैं, आपके गीत लोगों को जोड़ते हैं पर ये तोड़नेवाले नेता क्या जाने, कि आपने किस भाव से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। लता जी आपको अपनी भावना जन-जन तक रखने के लिए कोटिशः धन्यवाद, साथ ही नरेन्द्र मोदी के घुरविरोधियों को उनकी औकात बताने के लिए शत् शत् नमन।

Tuesday, March 5, 2013

सोनिया जैसी क्यूं बने राज्यपाल महोदय, देश में अन्य वीरांगनाओं की कमी हैं क्या....................................

झारखंड के राज्यपाल डा. सैय्यद अहमद ने राज्य की महिलाओं से अपील की हैं कि वो इंदिरा गांधी, लक्ष्मीबाई या सोनिया गांधी जैसी बनकर देश का विकास करें। इंदिरा गांधी बनना, लक्ष्मीबाई बनना तो हमें समझ में आता हैं, पर सोनिया बनना और उसका विकास से जुड़ जाना हमें समझ में नहीं आया। खासकर तब, जब इस महिला ने भारत के प्रधानमंत्री को नाइटवाच मैन बना दिया हो, जो प्रधानमंत्री अपने ढंग से सोच नहीं सकता और न ही कोई फैसला ले सकता हो, जिस महिला ने रेलमंत्री पवन कुमार बंसल को जी हूजुरी करना सिखाया हो। मैं उस पवन कुमार बंसल की बात कर रहा हूं, जिसने इस बार रेलवे बजट के दौरान राजीव गांधी को इसलिए याद किया, कि उन्होंने बंसल को राजनीति के क्षेत्र में कहां से कहां पहुंचा दिया, जिसने सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र से उपर जाने की कोशिश तक नहीं की हो, उस सोनिया को इंदिरा और लक्ष्मीबाई की श्रेणी में ला खड़ा करना - बुद्धिमानी हैं या चाटुकारिता। हमें लगता हैं कि ये बताने या समझाने की जरुरत नहीं। ऐसे भी सामान्य व्यक्ति, जिसकी कोई औकात नहीं हो, और उसे किसी की कृपा से, कोई बड़ी जगह मिल जाती हैं तो उसे उस व्यक्ति को याद करना मजबूरी होती हैं, जब तक वह जिंदा रहता हैं, अथवा जिसकी कृपा से वह बार -बार उपकृत होता रहता हैं। सोनिया ने देश को कहां पहुंचा दिया वो तो इस साल का प्रस्तुत बजट ही साफ - साफ बता देता हैं। 
इधर झारखंड के राज्यपाल द्वारा विभिन्न चैनलों को दिये गये विज्ञापन भी बहुत कुछ कह देते हैं कि यहां किसका शासन हैं। आप इस विज्ञापन को साफ - साफ देखे, जिसमें एक उद्घाटन के दौरान राज्यपाल सैय्यद अहमद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री व रांची के सांसद सुबोधकांत सहाय के साथ दीख रहे हैं। ये तस्वीर ही साफ साफ बयां करती हैं कि यहां राष्ट्रपति शासन कम और कांग्रेस का शासन ज्यादा हैं। जो अभी कुछ महीनों तक चलेगा और फिर इसी आधार पर विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए वोट भी मांगे जायेंगे। ये कहकर कि देखिये हमने राष्ट्रपति शासन के दौरान - कैसे झारखंड की कायाकल्प कर दी। हालांकि कायाकल्प हुआ या झारखंड और नीचे चला गया, इसका आकलन करना अभी ठीक नहीं हैं। अभी तो एक महीने ही हुए हैं और इस एक महीने के दौरान, ट्रेन का हाईजेक होना, चतरा में सांप्रदायिक दंगा का होना और रांची में एक व्यापारी का अपहरण कर हत्या कर देने की घटना बहुत कुछ बता देती हैं कि राज्य में किस प्रकार से शासन चल रहा हैं।
देश का दुर्भाग्य हैं कि इधर जितने भी राज्यपाल हो रहे हैं, चाहे वे किसी भी प्रदेश के क्यूं न हो। वे संवैधानिक कम, पर किसी पार्टी के प्रति और उससे भी बढ़कर उसके सुप्रीमो के प्रति ज्यादा वफादार होने का सबूत देने के लिए मौके तलाशते रहते हैं, हो सकता हैं कि कुछ लोग, एक अखबार में छपे, राज्यपाल के इस बयान को बतौर सोनिया तक भी अब तक भेज दिये हो, कि मैडम देखिये - झारखंड के महामहिम, आपको कितना सम्मान देते हैं, आप तो लक्ष्मीबाई और इंदिराजी की श्रेणी में आ गयी। मैंडम आप धन्य हैं और धन्य हैं झारखंड के राज्यपाल, जिनकी इतनी सुंदर सोच हैं। ऐसे ही कांग्रेसियों से देश व राज्य का भला होगा, दूसरे से नहीं।
 

Saturday, September 22, 2012

हमारे प्रधानमंत्री डायलॉग बहुत अच्छा बोल लेते हैं......................

ल यानी 21 सितम्बर 2012 को अपने देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का हिंदी में भाषण सुनने को मिला। आमतौर पर अंग्रेजी में बोलनेवाले मनमोहन सिंह को शायद ये परमज्ञान हो गया होगा कि यहां की जनता अंग्रेजी थोड़ा कम जानती हैं, इसलिए हिंदी में पहले और बाद में उन्होंने अंग्रेजी का सहारा लिया, हालांकि आम तौर पर देखा गया हैं कि जब अंग्रेजी में ये बड़े बड़े महानुभाव भाषण दे देते हैं तो इनके भाषण का हिंदी अनुवाद ये कहकर पेश नहीं किया जाता कि उनके हिंदी भाषण को पढ़ा हुआ मान लिया जाय, और लोग पढ़ा हुआ मान लेते हैं। ऐसे भी, मेरा ये विषय भी नहीं कि उन्होंने किस भाषा में भाषण दिया, क्योंकि ये महाशय अपने देश की सम्मान के प्रति कितना गंभीर हैं, वो देश की जनता जानती हैं।
अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को अभी एफडीआई की जरुरत हैं। उन्होंने बड़ी ही बेशर्मी से ये भी कहा कि 1991 में जब आर्थिक सुधार कार्यक्रम देश में शुरु किये गये तो यहीं लोग जो आज विरोध कर रहे थे, उस वक्त भी विरोध करना शुरु किया था, पर आज उसका क्या फायदा मिला, सभी को ज्ञात हैं। उन्होंने ये भी बड़े बेशर्मी से कह दिया कि देश के ज्यादातर हिस्सों में ज्यादातर लोग एक साल में छह सिंलिंडर से ही काम चला लेते हैं, पर ये नहीं बताया कि उनके ( प्रधानमंत्री के ) घर में कितने सिलिंडर, एक साल में खर्च होते हैं। कल के भाषण में इतना तो स्पष्ट हो गया कि हमारे प्रधानमंत्री डायलॉग बहुत अच्छा बोल लेते हैं। इसलिए हम तो यहीं चाहेंगे कि जैसे उन्होंने ब्यूरोक्रेट में रहकर अपनी पोजीशन ठीक की। राजनीति में हाथ पांव मारकर बिना किसी लोकसभा चुनाव जीते, प्रधानमंत्री बन गये। अब उन्हें फिल्मी दुनिया में भी हाथ अजमाना चाहिए, निःसंदह वे तीनों शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान को परास्त कर सुपर स्टार बन जायेंगे और इस प्रकार से एक रिकार्ड भी बना लेंगे, कि एक व्यक्ति जो हर जगह फिट हैं, वो सिर्फ और सिर्फ मनमोहन हैं। बेचारे प्रधानमंत्री ऐसे तो बहुत कम बोलते हैं, कम बोलने का रिकार्ड भी उन्ही के पास हैं, जब ममता बनर्जी ने जैसे ही एफडीआई मुद्दे पर, केन्द्र से अपना समर्थन वापस लिया, उनका मुंह खुल गया और जनता से सहयोग मांगने लगे।
इधर कल तक एफडीआई के विरोध में भारत बंद में शामिल होनेवाली समाजवादी पार्टी, जिसका चरित्र सदैव संदिग्ध रहा हैं। उसके बड़े नेता मुलायम सिंह यादव, सोनिया गांधी के चरण कमल पर लोटने के लिेए मजबूर हो गये। याद रखिये ये वहीं मुलायम हैं जो दो दिन पहले कोलकाता में कांग्रेस को कोस चुके हैं। ये वहीं मुलायम हैं जिनकी जीभ प्रधानमंत्री पद के लिए हमेशा लपलपायी रही हैं। ये वहीं मुलायम हैं, जिन्होंने अपने पुरे खानदान को राजनीति में घुसाकर, उन्हें अनुप्राणित किया हैं। ये वहीं मुलायम हैं, जिन्हें वामपंथी नेता एबी वर्द्धन, एनसीपी के कई नेता, थर्ड फ्रंड की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में देर तक नहीं की हैं, और उतनी ही जल्दी, इस नेता यानी मुलायम ने कांग्रेस के गोद में बैठने में अपनी पुरुषार्थ दिखा दी। ये कहकर कि वे नहीं चाहते कि देश में सांप्रदायिक शक्तियां मजबूत हो। यानी देश मुलायम की जातिगत राजनीति के कारण और कांग्रेस की गलत आर्थिक नीतियों के कारण भले ही भाड़ में चला जाये, पर मुलायम  और सोनिया की बादशाहत किसी भी प्रकार से कम नहीं होने चाहिेये। ये हैं हमारे देश के नेताओं का दोहरे चरित्र को उजागर करती आज की राजनीति। ऐसे ऐसे नेता, हमारे देश को महान बनाने के लिए, आजकल पैदा लिेए हैं, जो देश को अमरीका और अन्य देशों के हाथों गिरवी रखकर, उऩके उपनिवेश शासक के तौर पर खुद को प्रतिष्ठित करने का सपना देख रहे हैं। क्या होगा, इस देश का, जहां ऐसे ऐसे घटिया स्तर के नेताओं की फौज आज विद्यमान हैं।
कल हमारे प्रधानमंत्री ये भी बोले कि अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों में आयी आर्थिक मंदी का असर भारत में भी देखने को मिला हैं, पर हमारे उपर उतना बोझ नहीं पड़ा हैं। मैं कहता हूं की गर नहीं पड़ा तो डीजल का भाव क्यों बढ़ा दिया। यहीं नहीं हमारे प्रधानमंत्री ने कहा कि देश में डीजल का उपयोग बड़े बड़े अमीर करते हैं, क्या देश के खेतों में काम करने वाले किसानों और खेतिहर मजदूरों के डीजल पंपिंग सेट, पेट्रोल पर चलते हैं। क्या हमारे देश के सारे के सारे किसान अमीर हो गये। क्या प्रधानमंत्री का इस प्रकार दिया गया बयान करोंड़ों किसानों के मुंह पर तमाचा नहीं हैं। प्रधानमंत्री जी, आम जनता से सहयोग मांगते हो, कठोर फैसले लेने की मजबूरी का हवाला देते हो, और खुद तुम्हारे मंत्रिमंडल के लोग जनता की गाढ़ी कमायी के अरबों - खरबों रुपये लूटकर विदेशों में जमा कर दे रहे हैं, साथ ही लूटने का क्रम जारी भी हैं। उस भ्रष्टाचार पर आप अंकुश नहीं लगाते और आम जनता को देश के लिए जीने की दुहाई देते हो यानी हम जिंदगी भर देश के लिए सब कुछ लुटाते रहे और आप जिंदगी भर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठकर शान बघारते रहो और अंत में तिंरगा को लपेटकर, अपने सैल्यूट भी मरवाओ। क्या बात हैं। ये सिर्फ, इसी देश भारत में होता हैं और कहीं नहीं। दूसरा देश होता तो स्थिति कुछ और होती। बगल में चीन हैं -- देख लो। तुम्हारी - हमारी सदैव औकात बताता हैं और हमारी इतनी भी ताकत नहीं कि उसकी औकात बता दें। पूरा देश चीनी माल से अटा पटा हैं। मैं पूछता हूं हमारे प्रधानमंत्री ये तो बताये कि चीन के किस नगर में, मेरे देश की बनी सामग्रियां बिकती दिखायी दे रही हैं, गर नहीं तो इसके लिए जिम्मेवार कौन हैं। पिछले 65 सालों में दस साल निकाल दें तो कांग्रेस की ही सरकार रही हैं, और इस देश का बंटाधार कांग्रेस और इसको सहयोग करनेवाली पार्टियां के सिवा किसी और ने नहीं किया। ऐसे में आम जनता, आप के इस लल्लो - चप्पो वाली भाषण पर विश्वास क्यों करे। आप प्रधानमंत्री हैं -- 2014 तक आपको मिला हैं, शासन करने को। करते रहिये, देश को विदेशियों के हाथो लूटवाते रहिये। आगे देखते हैं कि 2014 के बाद कोई देश से प्यार करनेवाला सहीं व्यक्ति मिलता हैं या नहीं, जो प्रधानमंत्री पद पर रहकर, देश का सम्मान बढ़ा सके।

Saturday, September 15, 2012

शर्मनाक, हमारे नेताओं ने देश को बाजार बना दिया.............................

एक सवाल -------
1. भारत के प्रधानमंत्री व उनके मंत्रिपरिषद् से,
2. कांग्रेसियों से,
3. कांग्रेस के पिछलग्गू पार्टियों व अन्यान्य संगठनों से, तथा
4. कांग्रेस भक्त पत्रकारों से.
जब देश को बाजार ही बनाना था, तो 1947 के पूर्व भारत के अमर स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त क्यों कराया, अंग्रेज तो वहीं कर रहे थे, जो आज की हमारी सरकार आजादी के 65 साल बाद करने के लिए बेकरार हैं। जब मैट्रिक का मैं विद्यार्थी था, उस वक्त रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी देखने को मिली। इस गांधी फिल्म में एक दृश्य हैं -- जिसमें एक अंग्रेज, स्वतंत्रता सेनानियों पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहता हैं कि तुम जो स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हो, क्या तुम इस स्वतंत्रता को बचाकर रख पाओगे, कुछ ही साल बाद तुम गुलाम हो जाओगे। वह संवाद, अक्षरशः हमे आज सत्य दिखता हैं। हमारी मनमोहन सरकार, थाल में सजाकर अपने देश भारत को, विदेशियों के आगे रख दिया कि वे आये और देश का मान मर्दन करें, अपने देश में बने विदेशी सामानों को भारत की छाती पर रखकर, भारत को ही बर्बाद कर दे, और इस कार्य में दिल खोलकर सहायता कर रहे, वे चारों जिससे हमने सवाल पूछे हैं -------------
आज सुबह सभी कांग्रेस भक्त मीडिया बंधुओं ने एक समाचार प्रकाशित किया हैं, जिसमें उन्होंने एफडीआई की केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी और उसके फायदे को प्रमुखता से छापा हैं, पर सच्चाई क्या हैं, आजादी के बाद से लेकर आज तक वह किसान-मजदूर और वो देशभक्त परिवार महसूस कर रहा हैं, जो इस देश से सच्चा प्यार करता हैं। हमें तो कभी - कभी अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर तरस आती हैं, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राहुल और सोनिया के इशारों पे हमेशा ता-ता-थै-या करते नजर आते हैं। विदेशी शासकों के प्रमुखों के साथ इनकी जब फोटो दिखती हैं तो इनका दब्बूपन व कायरता साफ झलकता हैं। संसद में जब ये बोल रहे होते हैं तो इनकी आवाज सिंह सी नहीं, बिल्ली सी प्रतीत होती हैं।
14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के दिन, इनकी कृपा से विदेशी ताकतों के आगे झूकनेवाले भारतीय नहीं, बल्कि उन देशभक्त भारतीय परिवारों पर दो बम फटे, जिनकी जिंदगी सिर्फ भारत पर शुरु होती हैं और भारत पर ही खत्म हो जाती हैं। इस मनमोहन सरकार ने भारतीय किसानों की जिंदगी तबाह कर दी, डीजल का दाम 5.90 रुपये बढ़ाकर और मध्यम वर्गीय परिवारों को ये बताकर कि अब आपको मात्र साल में 6 सिलिण्डर मिलेंगे, सब्सिडी पर, इसके बाद आपको अपनी जरुरत पूरी करने के लिेए एक सिलिण्डर के 750 रुपये देने पड़ेंगे। साथ ही यह भी कह डाला कि देश अभी गंभीर संकटों से जूझ रहा हैं और इसके लिए कड़े फैसले सरकार को लेने पड़े हैं। इसलिए ऐसे हालात में देशवासियों को समान रुप से संकट झेलने को तैयार रहना चाहिए, यानी जिसकी रोज की आमदनी 26 रुपये और जिसकी रोज की आमदनी दस हजार रुपये हैं, सभी एक जैसी समस्याएं झेले। हैं न हैरानी वाली बात। हाल ही में मैंने अखबारों में पढ़ा कि हमारे प्रधानमंत्री की जमा राशि मात्र एक साल में दोगुणी हो गयी, जबकि मैंने जिन बैंकों में पैसे डाले हैं वो आज तक एक क्या पांच साल में भी  दोगुणे नहीं किये। शायद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास अलादीन के चिराग होंगे, जिससे वे अपनी आर्थिक स्थिति जब चाहे दोगुणे या पांच गुणे कर लेते होंगे। काश प्रधानमंत्री जी वहीं अलादीन के चिराग, संपूर्ण देश के नागरिकों को दे देते तो कितना अच्छा होता। कांग्रेस की ही नेता हैं -- शीला दीक्षित जो दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं, बड़ी बेशर्मी से बयान देती हैं कि ठीक हैं सिलिण्डर व डीजल के दाम बढ़ गये, पर लोगों की सैलरी भी तो बढ़ी हैं, तो मैं पूछता हूं कि हे शीले, ये बताओ कि देश में कितने लोग सैलरी पर जीवित हैं, गर नहीं तो तुम ऐसी घटिया स्तर का बयान क्यों दी। ऐसे भी इन कांग्रेसियों के बयान को देखेंगे तो पायेंगे कि इनके बयान गैरजिम्मेदाराना, बेहूदापन और घटियास्तर से भरे होते हैं। उदाहरण के लिए कपिल सिब्बल, मणीष तिवारी और दिग्विजय सिंह के बयानों को आप देख सकते हैं। 
ऐसे तो पूरे देश में विपक्षी दल भी इस डीजल की मूल्यवृद्धि, सिलिण्डर में सब्सिडी की कटौती पर हाय तौबा मचा रहे हैं, हो सकता हैं कि कांग्रेस की सरकार सोची समझी रणनीति के तहत एक - दो रुपये डीजल का दाम घटा दे या इसी तरह की निर्णय सिलिण्डर पर भी कर दें पर जरा सोचिये आज इस देश की ऐसी हालत किसने की। आखिर देश के सभी नेताओं के पास बेतहाशा दौलत कहां से आये, गर आ भी गये तो ये बेतहाशा दौलत इन्होंने कहां छुपा रखा हैं। आखिर देश आर्थिक संकट से जूझ रहा हैं तो इनमें त्याग की भावना क्यों नहीं, ये क्यों नहीं अपने काले धन को भारत में लाकर, भारत को आर्थिक शक्ति बना देते हैं। सच्चाई तो ये हैं कि हमारे देश के नेताओं की जमीर मर चुकी हैं। ये अपने खानदान को सांसद बनाते हैं, देश व राज्य की बागडोर सौपते हैं। इनके खानदान विदेशों में अपने लिए शान की जिंदगी जीने के लिेए विलासिता संबंधी वस्तुओं का उपयोग करते हैं और देश की जनता को जाति व सांप्रदायिकता की आग में झोंक कर अपना उल्लू सीधा करते हैं, और देश की जनता पर जब इस प्रकार के बम फूंटते हैं तो जनता कराहने के सिवा कुछ नहीं कर पाती।
कमाल हैं, अपनी सरकार मंगल ग्रह पर उपग्रह भेजने की बात करती हैं। मिसाइल बनाने की बात करती हैं, प्रक्षेपास्त्र छोड़ने की बात करती हैं, पर सच्चाई ये हैं कि यहां की 90 प्रतिशत जनता पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का शासन चलता हैं, सच बात तो ये हैं कि ये कंपनियां गर भारत से हाथ खींच ले तो यहां की जनता पागलों की तरह अपने बालों को नोंच रही होगी, क्योंकि इनके बालों में शैम्पू से लेकर, इन्हें नहलाने, कपड़े धोने, दांत साफ करने, यहां तक की शौचालय में हाथ धुलाने का काम इऩ्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ले रखा हैं और ये सब देने हैं कांग्रेस की। उस कांग्रेस की, जिसमें महात्मां गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल जैसे नेताओं की भागीदारी रहीं, दुर्भाग्य उस कांग्रेस में सोनिया, राहुल, शीला, मनमोहन, दिग्विजय जैसे घटिया स्तर के नेता हैं। अरे महात्मा गांधी को नाथुराम गोडसे ने एक बार मारा, पर गांधी को, उनके विचारों को सर्वाधिक हत्या किसी ने की, तो वह और कोई नहीं ये कांग्रेसी ही हैं। आज स्वतंत्रता के बाद गांधी और बिनोवा के विचारों को अपनाते हुए, ग्राम स्वराज्य की बात पर अमल की गयी होती, तो देश आज बाजार नहीं बनता।
आज सारा देश जब कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण कराह रहा हैं तो देश की युवा पीढ़ी और देशभक्त जनता को चाहिए कि कांग्रेस से अपना नाता तोड़े और ईमानदारीपूर्वक जीवन व्यतीत करे। एफडीआई हमारे सरकार की मजबूरी हो सकती हैं, पर हमारी मजबूरी नहीं। आराम से स्वदेशी वस्तूओ का उपभोग करें, जब विकल्प न मिले तो विदेशी वस्तुओ का उपयोग करें। जो नेता या पार्टियां या मीडिया हाउस विदेशी वस्तूओं का उपभोग करती हैं या विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती हैं, उसका बहिष्कार करें। उनका स्पर्श किया हुआ सामग्रियों का भी परित्याग करें। याद रखे, देश है तो आप हैं, देश नहीं तो कुछ नहीं। बड़ी त्याग और बलिदान से हमारे पूर्वजों ने देश को स्वतंत्र कराया हैं, कृपया अपने देश को बाजार बनने न दे, हांलांकि देश के सर्वोच्च संस्थाओं पर बैठे हमारे नेताओं ने देश को गुलाम बनाने के लिेए कोई कसर नहीं छोड़ रखी हैं, फिर भी एक और लड़ाई लडने के लिेए स्वयं को तैयार रखे और इस बार की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाकर होगी, क्योंकि दुश्मन अब अपने घर में भी एक नहीं, अनेक हैं......................................

Wednesday, December 28, 2011

बेशर्मों को शर्म कहां.............

पांच राज्यों में चुनाव हैं। कांग्रेस ने सुनियोजित साजिश रचकर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए, अल्पसंख्यकों को धर्म के आधार पर आरक्षण दे दिया, जबकि संविधान इसकी इजाजत नहीं देता। इससे कांग्रेस को फायदे हैं, इसाई बहुल गोवा में कहेंगी कि वह इसाईयों को आरक्षण दे दी हैं, सिक्ख बहुल पंजाब में कहेगी कि उसने सिक्खों को आरक्षण दे दिया हैं, और मुस्लिम बहुल उत्तरप्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों में वो इसी आधार पर मुस्लिमों को भी आकर्षित करते हुए वोट मांगेगी। संभव हैं, उसे फायदे मिले भी क्योंकि हमारे देश की जनता, कांग्रेस के इस लालीपाप पर आकर्षित हो कर, उसके पक्ष में भारी मतदान कर दे, तो इस पर किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए, क्योंकि यहां की जनता क्या हैं, वो इतिहास बताता हैं, जब अंग्रेज इस देश में आये और विदेशी बाबर इस देश में आया तो कैसे यहां की जनता ने उसका स्वागत करते हुए, अपने देश पर विदेशियों का शासन हंसते हंसते करवाया, और खुद गुलाम बनकर आनन्दित होते रहे, कमोवेश आज भी यहीं स्थिति हैं। भले ही आज की पीढ़ी न स्वीकारें, पर सच्चाई यहीं हैं। फिलहाल कांग्रेस की नजर सर्वाधिक उत्तरप्रदेश पर हैं। अल्पसंख्यकों के नाम पर मुस्लिमों को 4 प्रतिशत आरक्षण का लालीपॉप दिलाने के बावजूद भी, कांग्रेस और कांग्रेस भक्तो को लगता हैं कि अन्ना हजारे उऩके लिए शामत खड़ी कर सकते हैं. इसलिए कांग्रेस को पांच राज्यॉ में जीत सुनिश्चित करने के लिए, कांग्रेस और कांग्रेस भक्तों में धमा चौकड़ी चल रही हैं कि कौन सर्वाधिक सोनिया और राहुल की चरण वंदना करते हुए चाटुकारिता का रिकार्ड तोड़ता हैं। इनमें शामिल हैं - कांग्रेस के कार्यकर्ता-नेता, कांग्रेस भक्त पत्रकार और केन्द्र शासित प्रदेशों में कार्यरत प्रशासनिक उच्चाधिकारी जो कांग्रेसी नेताओं की कृपापात्र बनकर देश का सत्यानाश कर रहे हैं। एक बात मैं बता दूं कि मैं अन्ना, टीम अन्ना और उनके आंदोलन का कतई समर्थक नहीं हूं, गर ज्यादा जानकारी इस संबंध में लेना हैं तो इसी ब्लाग पर अन्ना के आंदोलन और उनके सदस्यों के प्रति हमारे विचार आज भी लिखे पड़े हैं, उन्हें पढ़कर, मेरे विचारों से अवगत हुआ जा सकता हैं, लेकिन अऩ्ना के खिलाफ कांग्रेसियों के आक्रामक रवैये ने हमे ये लिखने पर मजबूर कर दिया कि भारत में जितने भी पागलखाने हैं, उनमें कम से कम कांग्रसियों के लिए कुछ शायिका आरक्षित होने चाहिए क्योंकि ये सभी मानसिक दिवालियेपन के शिकार हो रहे हैं और गर इनका इलाज नहीं किया गया, तो ये पागल होकर भारत के विभिन्न शहरों मे घूमेंगे, जिससे हमें इन्हें देखकर दुख होगा, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि इनके परिवार, अपने इस पागल सदस्य को देख विधवा प्रलाप करे।
जरा सोनिया का बयान देखिये -- वो कहती हैं कि अन्ना पर व्यक्तिगत हमले नहीं होने चाहिए। सोनिया ये बतायें कि अऩ्ना पर व्यक्तिगत हमले कौन कर रहा हैं। अन्ना को भगोड़ा कौन कह रहा हैं, संघ का एजेंट कौन कह रहा हैं। गर नहीं उसे बूझा रहा तो ऐसी नेता को हम क्या कहें। जरा बेनी प्रसाद वर्मा का बयान देखिये -- ये कह रहे हैं कि अन्ना भाजपा के एजेंट हैं, और भारत पाक युद्ध के समय के भगोड़े भी हैं, तो बेनी जी, भारत सरकार और जिस सरकार में आप भी अपनी गाल लाल कर चुके हैं, बैठ कर क्या कर रहे थे, इसी दिन का इंतजार कर रहे थे क्या, कि कब सोनिया माता की जय बोलने का अवसर मिले, कब अपना सर राहुल के चरण कमलों पर रखने का मौका मिले। गर ऐसा हैं तो आपने सिद्ध कर दिया हैं - राहुल और सोनिया आप की हो गयी, क्योंकि आपने तो ऐसा बयान दे दिया कि आपने पागलपन में दिग्विजय और मणीष तिवारी को भी पीछे छोड़ दिया। इधर कांग्रेसियों को कहीं से पुराना चित्र मिल गया हैं, जिसमें नानाजी देशमुख के साथ अन्ना हजारे का फोटो हैं। इस पर वे बावेला मचाये हुए हैं और अपने कांग्रेस भक्त पत्रकारों को कह रहे हैं कि वे इस मु्ददे को उछालकर, अन्ना की हालत खराब कर दें, पर उन्हें पता नहीं कि जिसका जितना विरोध होता वो उतना ही शक्तिशाली बनकर उभरता हैं। मैं पूछता हूं कि --- नानाजी देशमुख की समाजसेवा व देशभक्ति पर कोई अंगूली उठा सकता हैं क्या। संघ क्या देशद्रोहियों की संस्था हैं क्या, गर संघ देशद्रोहियों की संस्था हैं, तो अटल बिहारी वाजपेयी तो संघ के प्रचारक भी थे, वो तो प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गये। आपके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, हाल ही में उनके जन्मदिन पर, उनके घर पर पहुंचकर शुभकामनाएँ भी दी, तो क्या देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी संघ के एजेंट हैं क्या। देश के पूर्व प्रधानमत्री लाल बहादुर शास्त्री से लेकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी संघ पर कई सकारात्मक टिप्पणी की हैं तो वे सभी संघ और भाजपा के एजेंट थे क्या। पता नहीं आजकल के नेताओं को क्या हो गया हैं, कि सभी संघ - संघ चिल्ला रहे हैं, गर संघ से इतनी ही चिढ़ हैं तो तुम्हारे पास सत्ता हैं, कर क्या रहे हो, औरंगजेब और बाबर की तरह संघ के कार्यालय जहां जहां हैं - ढहवां दो, प्रतिबंध लगा दो, संघ के लोगों को रासुका के तहत जेल में डलवा दो, पर ये भी तुम नहीं कर सकते, क्योंकि आपकी औकात यहां की जनता जिसके पास शर्म और हया बची हैं, वो जानती हैं। आपके घटियास्तर के बयानों के आधार पर ही शायद आप जैसे नेताओँ को छुटभैया, रीढ़विहीन, दलाल, राजनीतिबाज, चिरकुट आदि नामों से विभूषित किया जाता हैं।
और अब मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी का बयान देखिये जो यहां की सभी अखबारों में छपा हैं, उनका बयान ही बताता हैं कि उन्हें भी अन्ना के आंदोलन से चिढ़ और कांग्रेस को पुनः सर्वत्र स्थापित करने में कितनी दिलचस्पी हैं। उनका बयान मैंने एक अखबार में पढ़ा -- पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ अभियान करने के टीम अन्ना के प्रस्ताव के औचित्य और नैतिकता पर सवाल खड़ा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने रविवार को चेतावनी दी कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के रास्ते में जो कुछ भी आयेगा, उसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। सवाल ये हैं कि टीम अन्ना के कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन चलाने पर चेतावनी देने वाले, कुरैशी कौन होते हैं। उनका काम हैं चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से कराना। पर उन्हें अन्ना या अन्ना की टीम ऐसा करने से रोक रही हैं क्या और गर कोई गलत करेगा, तो उसके खिलाफ कानून अपना काम करेगा। आप संवाददाताओं के माध्यम से टीम अन्ना को धमकाना चाहते हैं कि वे कांग्रेस के खिलाफ बोलने से बचे। आजतक किसी मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस प्रकार से किसी समाजसेवी के खिलाफ बयान नहीं दिया पर इन्होंने बयान देकर बता दिया कि आखिर इनके मन में क्या हैं। सवाल तो ये भी उठता हैं कि उधर कांग्रेस धर्म आधारित आरक्षण की घोषणा करती हैं, और ठीक तुरंत बाद ये पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा करते हैं, आखिर ये सब क्या हैं, इसकी जांच होनी चाहिए। हमें तो लगता हैं कि देश में हर चीज का कांग्रेसीकरण हो गया हैं, जो देश के लिए खतरा हैं। लोकतंत्र के लिए खतरा हैं, जरुरत हैं एक और लोकनायक जयप्रकाश की, जो ऐसी कांग्रेसी सत्ता को धूल चटाने और चुनाव आयोग जैसी संस्था और देश में अन्य प्रशासनिक विभागों में फैलें कांग्रेसी भूतों से देश को मुक्त कराये। हमें लगता हैं कि अब देर नहीं, जल्दी ही वो दिन आयेगा, जब देश कांग्रेसियों के अत्याचार और शोषण से, विदेशी ताकतों के कुचक्रों से, मुक्त होगा, बस थोडी़ मेहनत और लगन से देश सेवा करने की हैं।

Saturday, June 11, 2011

विनाशकाले विपरीतबुद्धि

शास्त्रों में एक बात आयी है – जिनको ईश्वर दुख देने को होते हैं – उनकी मति (ज्ञान) हर लेते है। शायद ये वाक्य सत्तारुढ़ कांग्रेस पर सत्य साबित होती है। दो साल पूर्व सत्ता में दोबारा आयी, इस सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी के नेताओं को लगता है – जनता ने उन्हें सदा के लिए सत्तारुढ़ होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया है और इसी मद (अहंकार) में चूर होकर, वो सब काम कर रही है, जिसे न तो धर्म इजाजत देता है और न ही सत्य (ईश्वर)। जबकि इस सरकार में शामिल सभी मंत्री ईश्वर की ही शपथ लेकर सत्ता का सुख भोग रहे है, पर इनके ज्ञान को देखिये कितनी निम्नस्तर की हो गयी कि इन्हें अभी तक पता ही नहीं चल पा रहा कि उन्हें आज की परिस्थितियों में क्या करना चाहिए।
फिलहाल ये एक संन्यासी से टकराने में अपना पुरुषार्थ समझ रहे है और सच पूछिये, तो उस संन्यासी से टकराने का खामियाजा उसे भुगतना भी पड़ रहा हैं पर उसे इसका अनुमान नहीं हो रहा, क्योंकि फिलहाल धृतराष्ट्रों की संख्या इस पार्टी में ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। मुझे एक बात समझ में नहीं आ रहा कि बाबा रामदेव ने भारतीयों के विदेशी काला धन को, भारत में लाने और भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की बात कहकर क्या गलत कह दिया, जो कांग्रेसियों को रास नहीं आ रहा। इससे तो बिहार में प्रचलित लोकोक्ति की याद आ रही है कि – चोर के दाढ़ी में तिनका। इसका मतलब हैं कि कांग्रेसियों के ही धन विदेशी खातों में जमा है, जिससे भयभीत कांग्रेसी नहीं चाहते कि वो काला धन, भारत में आये और यहां की जनता उन पर थू – थू करें।
हालांकि बाबा रामदेव के आंदोलन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान चालाकी भरा रहा हैं, जबकि उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों और कांग्रेसी नेताओं का बयान अमर्यादित और संस्कारहीन आचरण को जन्मदेनेवाला रहा है। दूसरी ओर दिल्ली के विभिन्न राष्ट्रीय चैनलों ने तो हद कर दी है, वो तो फिलहाल इस दौड़ में शामिल हो गयी हैं कि कौन चैनल बाबा रामदेव को भ्रष्ट साबित करने में एक नंबर हैं ताकि कांग्रेसियों और सोनिया गांधी के द्वारा उपकृत हो सकें। मुझे तो इन चैनलों और ऐसे घटियास्तर के पत्रकारों की बुद्धि पर तरस आती है कि आखिर इनका आचरण इतना घटिया कैसे हो गया, पर चिंतन करने पर पता लगता है कि भला मुर्खों से विद्वता की अपेक्षा रखना भी, मुर्खता ही है।
जरा प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों और राष्ट्रीय चैनलों का बाबा रामदेव के आंदोलन के पूर्व का चरित्र और उनके आंदोलन को कुचलने के बाद के चरित्र को देखिये, पता लग जायेगा कि देशद्रोही कौन है। सबसे पहले रामदेव के आंदोलन के पूर्व का चरित्र पर ध्यान दीजिये ---------
1. प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल तथा कांग्रेस के सभी नेताओं का बयान, बाबा रामदेव के खिलाफ न होकर मर्यादित है, सभी चाहते हैं कि बाबा रामदेव आंदोलन पर न बैठे, उनके आमरऩ अनशन का आंदोलन किसी भी कीमत पर समाप्त हो, इधर राष्ट्रीय चैनल भी बाबा रामदेव को नायक के रुप में प्रदर्शित कर रहे हैं, सभी विदेशी काला धन को भारत में लाने की उनके आंदोलन को लेकर जय जयकार कर रहे हैं, परिचर्चा करा रहे हैं, सरकार को कटघरे में लाने का प्रयास कर रहे है. पर जैसे ही बात बनते बनते बिगड़ती है कांग्रेस अपना असली रुप अख्तियार करती है, कांग्रेस का साथ देने में राष्ट्रीय चैनल आगे आते हैं और फिर ये सत्तारुढ़ कांग्रेसियों के साथ सुर में सुर मिलाकर बाबा रामदेव के खिलाफ समाचार दिखाने का अभियान शुरु कर देती है, वो चैनल जिनकी हिम्मत नहीं थी बाबा रामदेव की आंखों में आंख डालकर बात करने की, वो उन्हें बाबा रामदेव से रामदेव और पता नहीं क्या क्या कह डालने में शेखी बघारते हैं।
और अब बाबा रामदेव के आंदोलन को कुचलने के बाद का चरित्र देखिये ------
जो कांग्रेसी और मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में शामिल मंत्री बाबा रामदेव के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलते थे। आग उगलने शुरु करते है। कांग्रेसी दिग्विजय सिंह को आगे करते है और ये दिग्विजय वहीं करता हैं जो सोनिया माता उसे पूर्व में सिखाये रहती है, वो सोनिया के चरणों में, सर्वस्व समर्पित कर, एक संन्यासी के खिलाफ विषवमन करता है और सभी चैनल दिग्विजय सिंह जैसे नेता को एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत अपने चैनल में प्रोजेक्ट कर, बाबा रामदेव के आंदोलन पर कीचड़ उछालते हैं।
2. जनार्दन और दिग्विजय सिंह जैसे नेता, इस आंदोलन को भाजपा और संघ द्वारा प्रायोजित करार देता है। दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो नेपाल और भारत के साथ चल रही मित्रता को भी आग में झोंक देना चाहता है, वो बालकृष्ण को नेपाली कहकर, संबोधित कर डालता है, बेशर्मी की हद तो ये है कि इस आड़ में देशभक्ति गीतों पर झूमनेवाली सुषमा स्वराज के चरित्र पर भी अंगूली उठाता हैं, वो दिग्विजय जिसमें छेद ही छेद हैं, वो कहावत हैं न कि चलनी दूसे, सुप के जिन्हें बहत्तर छेद।
3. इधर कुछ दिनों के बाद अपना गृहमंत्री को पता नहीं कहां से दिव्य ज्ञान हो जाता है, लगे हाथों वह भी अपना हाथ साफ करने लगता है, वो कहता हैं कि बाबा रामदेव के आंदोलन में भाजपा और संघ का हाथ है, पर यहीं गृह मंत्री को पता नहीं, उस वक्त दिव्य ज्ञान कहा चला गया था, जब इसके मंत्री, आंदोलन को कुचलने के पहले, बाबा रामदेव के आगे पीछे दौड़ लगा रहे थे। ये गृहमंत्री इतना नीचे गिरता हैं कि अपना गिरेबां न देखकर, बाबा रामदेव को ही भला बुरा कहते हुए, सारी मिशनरियों का दुरुपयोग करते हुए, बाबा के खिलाफ, वो हर प्रकार के कुकर्म करता हैं, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं और विभिन्न राष्ट्रीय चैनल, इस गृहमंत्री के आगे पीछे ठुमके लगाते हुए, वो खबरें दिखाता हैं, जो इस गृहमंत्री और कांग्रेसियों को पसंद होता हैं। ये हैं सत्तारुढ कांग्रेसियों और राष्ट्रीय चैनलों के चरित्र।
पर इसके विपरीत एक सामान्य संन्यासी, जिसे लोग बाबा रामदेव, संत रामदेव और पता नहीं क्या क्या नामों से संबोधित करते हैं। (जिन्हें मैं संत नहीं, बल्कि एक सामान्य व्यक्ति के अलग कुछ नहीं मानता) इस सतारुढ़ सरकार के नाक में ऐसा दम करता है – वो भी आमरण अनशन के माध्यम से कि इस सरकार की हालत सांप और छुछुंदर की तरह हो जाती है और लगे हाथों ये बयान प्रसारित करती हैं कि वो बाबा रामदेव के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन चलायेगी – बताईये ये कितना हास्यास्पद बयान है। एक सरकार, चुनी गयी सरकार, एक संन्यासी के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन चलाने की बात करें, तो उसे क्या कहेंगे। एक सामान्य निश्छल व्यक्ति से इसका जवाब पूछे तो ये ही कहेगा कि ये तो एक संन्यासी की शानदार जीत है, पर इस केन्द्र सरकार को कौन बताये कि उसने किस प्रकार अपना संचित सम्मान खो दिया है।
बाबा रामदेव पिछले आठ दिनों से आमरऩ अनशन पर है, केन्द्र सरकार को हिला कर रख दिया है, ये अलग बात हैं कि केन्द्र सरकार जिसको अपने सम्मान की चिंता नहीं, गलथेथरी बतिया रही हैं कि हम सही हैं, पर सच्चाई क्या हैं, सभी जानते हैं पर राष्ट्रीय चैनलों की गलथेथरी देखिये – वो बाबा रामदेव के अनशन पर ही सवाल उठा रही हैं कि बाबा ने ग्लूकोज ले लिया हैं तो भला अनशन कैसा। अनशन तो टूट गया। अरे बेशर्म पत्रकारों, तुम्हें पत्रकार किसने बना दिया, क्यूं कांग्रेसियों और सरकार के तलवे चाटने में समय जाया कर रहे हो, कम से कम, सच तो बोलों, नहीं तो जान लो, इन कांग्रेसियों और सरकार को तो आनेवाले समय में जनता सबक सिखायेंगी ही, तुम्हें भी तुम्हारी औकात बतायेगी। फिर तुम्हारे टीआरपी का क्या होगा, तुम जब जनता की नजर में गिरोगे तो क्या फिर उठ पाओगे, क्यों विनाशकाल की ओर आगे बढ़ रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी विपरीत बुद्धि तुम्हें विनाशकाल की ओर ले जा रही हैं।