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Thursday, May 2, 2013

सरबजीत की बहन दलबीर की ललकार के बावजूद भारतीय जगेंगे, मनमोहन और सोनिया की जमीर जगेगी, इसकी संभावना हमें दूर - दूर तक नहीं दीखती........

भारतीय बेटी और बहन - दलबीर कौर ने आज मीडिया के समक्ष जो बाते कही, वो दिल को दहलानेवाला हैं। अपने भाई सरबजीत की पाकिस्तान में की गयी हत्या के बाद जो दलबीर ने कहा, वो प्रमुख वाक्यांश इस प्रकार हैं...................
पाक में चुनाव के चलते सरबजीत की हत्या।
भारतीय होने की वजह से सरबजीत का कत्ल।
लाहौर के जिन्ना अस्पताल की घटना - सरबजीत का हाल पूछने पर डाक्टर हंसते थे।
सरबजीत की बहन ने कहा - अंसार बर्नी, पाकिस्तान का बड़ा मानवाधिकार कार्यकर्ता, जिसने कहा 25 करोड़ दो, सरबजीत लो।
चुनाव के लिए जरदारी ने मरवाया।
पाक को पता था सरबजीत जिंदा नहीं हैं।
सरबजीत देश के लिए शहीद हुआ।
पाक मे हमारे साथ सही बर्ताव नहीं।
सही कोशिश होती तो सरबजीत जिंदा रहता।
पाक ने भारत की पीठ पर छुरा घोपा।
अब पाक को बर्दाश्त करने का वक्त नहीं।
बेईमान हैं पाक, कायर हैं पाक।
पाक को सारी दुनिया को जवाब देना होगा।
और अब दुनिया का सबसे घटिया मीडिया बीबीसी ने क्या लिखा, उसे भी जानिये - बीबीसी ने जो समाचार बनायी है। उसमें उसने सरबजीत को भारतीय जासूस बताया हैं। पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर बीबीसी ने बता दिया कि वो भी भारत और भारतीयों के प्रति क्या रुख रखता हैं, यानी उसने भी भारत के साथ पत्रकारिता के नाम पर गद्दारी की सारी सीमा रेखा लांघ दी। ऐसे भी बीबीसी कभी भी भारत और भारत के प्रति संवेदना नहीं दिखायी, इसलिए इस गद्दार बीबीसी से भारत प्रेम की संभावना तलाशना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। पता नहीं, कैसे भारतीयों का एक वर्ग - बीबीसी से प्रेम रखता हैं और उससे आजीविका चलाता हैं। मुझे तो बीबीसी न कल अच्छा लगता था और ऩ आज ही अच्छा लगा, क्योंकि इस बीबीसी ने भारत के प्रति आज भी आग उगल कर करोड़ों भारतीयों के छाती पर गहरे जख्म दिये हैं। 
पाकिस्तान और चीन से भारतीयों के प्रति प्रेम की संभानाएं तलाशना भी कायरता हैं। हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ( सोनिया गांधी के इशारे पर ठुमके लगानेवाले प्रधानमंत्री ), या अन्य मंत्रालय संभाल रहे मंत्रियों का समूह जो सोनिया के इशारे पर ठुमके लगाते हैं, उन्हें सरबजीत की हत्या से क्या लेना - देना, एक बार फिर घड़ियाली आंसू बहायेंगे। दलबीर को झूठे दिलासे दिलायेंगे और आगे  बढ़ जायेंगे। सरबजीत की हत्या के बाद भी शायद भारतीयों के आंख खुले। क्योंकि मैं जानता हूं कि ये भारतीय कुछ दिनों तक पाकिस्तान को भला - बुरा कहेंगे और फिर पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलने, पाकिस्तान के साथ संगीत का कार्यक्रम शेयर करने और पाकिस्तानियों को भारत में बुलाकर उसका स्वागत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इसके बदले पाकिस्तान उसके बदले में हर जगह, हर मोर्चे पर हमें नीचा दिखायेगा, वो हमारे जवान का सरकलम करके, हमारी गैरत को ललकारेगा और हम अपनी सेनाओं को सरहद तक ले जाकर, फिर अपने अपने बैरकों में वापस ले आयेंगे। 
हद तो तब हो गयी कि चीन हमारी सीमा में 20 किलोमीटर अंदर घूस आया हैं और हमारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ( सोनिया गांधी के इशारे पर ठुमके लगानेवाला प्रधानमंत्री ) कहता हैं कि इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए। हां प्रधानमंत्री जी, जरुरत क्या हैं तूल देने का। आपका जमीन तो गया नहीं हैं, आप तो आराम से सोनिया के इशारे पर ठुमके लगाते हुए प्रधानमंत्री कहलायेंगे और फिर दूसरे देश जाकर आराम फरमायेंगे। आपको क्या पता कि देश की मिट्टी क्या होती हैं। देश के लिेए मरना क्या होता हैं। देश को अपना मानना क्या होता हैं। आप मस्ती मारिये, और भारत के सम्मान को चीन और पाकिस्तान के पैरों तले रौंदवाते जाइये। ऐसे भी भारत की जनता को क्या चाहिए, आप और आपकी पार्टी को अच्छी तरह से मालूम हैं। पर ये जान लीजिये कि जिस दिन भारत की जनता देशभक्ति के पागलपन से लवरेज हुई तो फिर आप लोग कहां होंगे, शायद आपको पता नहीं। फिलहाल सभी अपने - अपने में मस्त हैं। आप भी मस्त रहिए। इतनी गद्दारी के बावजूद, चीन द्वारा 20 किलोमीटर जमीन ताजा - ताजा हड़पने के बावजूद आपके लिए एक अच्छी खबर कि आप कर्नाटक में वापस आ रहे हैं, और ये सारी घटनाएं सिर्फ भारत में ही दीखती हैं, क्योंकि देश की जमीन गवां देने वाली सरकार की वापसी सिर्फ भारत में ही होती हैं, दूसरे देशों में नहीं...........।

Saturday, September 15, 2012

शर्मनाक, हमारे नेताओं ने देश को बाजार बना दिया.............................

एक सवाल -------
1. भारत के प्रधानमंत्री व उनके मंत्रिपरिषद् से,
2. कांग्रेसियों से,
3. कांग्रेस के पिछलग्गू पार्टियों व अन्यान्य संगठनों से, तथा
4. कांग्रेस भक्त पत्रकारों से.
जब देश को बाजार ही बनाना था, तो 1947 के पूर्व भारत के अमर स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त क्यों कराया, अंग्रेज तो वहीं कर रहे थे, जो आज की हमारी सरकार आजादी के 65 साल बाद करने के लिए बेकरार हैं। जब मैट्रिक का मैं विद्यार्थी था, उस वक्त रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी देखने को मिली। इस गांधी फिल्म में एक दृश्य हैं -- जिसमें एक अंग्रेज, स्वतंत्रता सेनानियों पर अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहता हैं कि तुम जो स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे हो, क्या तुम इस स्वतंत्रता को बचाकर रख पाओगे, कुछ ही साल बाद तुम गुलाम हो जाओगे। वह संवाद, अक्षरशः हमे आज सत्य दिखता हैं। हमारी मनमोहन सरकार, थाल में सजाकर अपने देश भारत को, विदेशियों के आगे रख दिया कि वे आये और देश का मान मर्दन करें, अपने देश में बने विदेशी सामानों को भारत की छाती पर रखकर, भारत को ही बर्बाद कर दे, और इस कार्य में दिल खोलकर सहायता कर रहे, वे चारों जिससे हमने सवाल पूछे हैं -------------
आज सुबह सभी कांग्रेस भक्त मीडिया बंधुओं ने एक समाचार प्रकाशित किया हैं, जिसमें उन्होंने एफडीआई की केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी और उसके फायदे को प्रमुखता से छापा हैं, पर सच्चाई क्या हैं, आजादी के बाद से लेकर आज तक वह किसान-मजदूर और वो देशभक्त परिवार महसूस कर रहा हैं, जो इस देश से सच्चा प्यार करता हैं। हमें तो कभी - कभी अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर तरस आती हैं, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राहुल और सोनिया के इशारों पे हमेशा ता-ता-थै-या करते नजर आते हैं। विदेशी शासकों के प्रमुखों के साथ इनकी जब फोटो दिखती हैं तो इनका दब्बूपन व कायरता साफ झलकता हैं। संसद में जब ये बोल रहे होते हैं तो इनकी आवाज सिंह सी नहीं, बिल्ली सी प्रतीत होती हैं।
14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के दिन, इनकी कृपा से विदेशी ताकतों के आगे झूकनेवाले भारतीय नहीं, बल्कि उन देशभक्त भारतीय परिवारों पर दो बम फटे, जिनकी जिंदगी सिर्फ भारत पर शुरु होती हैं और भारत पर ही खत्म हो जाती हैं। इस मनमोहन सरकार ने भारतीय किसानों की जिंदगी तबाह कर दी, डीजल का दाम 5.90 रुपये बढ़ाकर और मध्यम वर्गीय परिवारों को ये बताकर कि अब आपको मात्र साल में 6 सिलिण्डर मिलेंगे, सब्सिडी पर, इसके बाद आपको अपनी जरुरत पूरी करने के लिेए एक सिलिण्डर के 750 रुपये देने पड़ेंगे। साथ ही यह भी कह डाला कि देश अभी गंभीर संकटों से जूझ रहा हैं और इसके लिए कड़े फैसले सरकार को लेने पड़े हैं। इसलिए ऐसे हालात में देशवासियों को समान रुप से संकट झेलने को तैयार रहना चाहिए, यानी जिसकी रोज की आमदनी 26 रुपये और जिसकी रोज की आमदनी दस हजार रुपये हैं, सभी एक जैसी समस्याएं झेले। हैं न हैरानी वाली बात। हाल ही में मैंने अखबारों में पढ़ा कि हमारे प्रधानमंत्री की जमा राशि मात्र एक साल में दोगुणी हो गयी, जबकि मैंने जिन बैंकों में पैसे डाले हैं वो आज तक एक क्या पांच साल में भी  दोगुणे नहीं किये। शायद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास अलादीन के चिराग होंगे, जिससे वे अपनी आर्थिक स्थिति जब चाहे दोगुणे या पांच गुणे कर लेते होंगे। काश प्रधानमंत्री जी वहीं अलादीन के चिराग, संपूर्ण देश के नागरिकों को दे देते तो कितना अच्छा होता। कांग्रेस की ही नेता हैं -- शीला दीक्षित जो दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं, बड़ी बेशर्मी से बयान देती हैं कि ठीक हैं सिलिण्डर व डीजल के दाम बढ़ गये, पर लोगों की सैलरी भी तो बढ़ी हैं, तो मैं पूछता हूं कि हे शीले, ये बताओ कि देश में कितने लोग सैलरी पर जीवित हैं, गर नहीं तो तुम ऐसी घटिया स्तर का बयान क्यों दी। ऐसे भी इन कांग्रेसियों के बयान को देखेंगे तो पायेंगे कि इनके बयान गैरजिम्मेदाराना, बेहूदापन और घटियास्तर से भरे होते हैं। उदाहरण के लिए कपिल सिब्बल, मणीष तिवारी और दिग्विजय सिंह के बयानों को आप देख सकते हैं। 
ऐसे तो पूरे देश में विपक्षी दल भी इस डीजल की मूल्यवृद्धि, सिलिण्डर में सब्सिडी की कटौती पर हाय तौबा मचा रहे हैं, हो सकता हैं कि कांग्रेस की सरकार सोची समझी रणनीति के तहत एक - दो रुपये डीजल का दाम घटा दे या इसी तरह की निर्णय सिलिण्डर पर भी कर दें पर जरा सोचिये आज इस देश की ऐसी हालत किसने की। आखिर देश के सभी नेताओं के पास बेतहाशा दौलत कहां से आये, गर आ भी गये तो ये बेतहाशा दौलत इन्होंने कहां छुपा रखा हैं। आखिर देश आर्थिक संकट से जूझ रहा हैं तो इनमें त्याग की भावना क्यों नहीं, ये क्यों नहीं अपने काले धन को भारत में लाकर, भारत को आर्थिक शक्ति बना देते हैं। सच्चाई तो ये हैं कि हमारे देश के नेताओं की जमीर मर चुकी हैं। ये अपने खानदान को सांसद बनाते हैं, देश व राज्य की बागडोर सौपते हैं। इनके खानदान विदेशों में अपने लिए शान की जिंदगी जीने के लिेए विलासिता संबंधी वस्तुओं का उपयोग करते हैं और देश की जनता को जाति व सांप्रदायिकता की आग में झोंक कर अपना उल्लू सीधा करते हैं, और देश की जनता पर जब इस प्रकार के बम फूंटते हैं तो जनता कराहने के सिवा कुछ नहीं कर पाती।
कमाल हैं, अपनी सरकार मंगल ग्रह पर उपग्रह भेजने की बात करती हैं। मिसाइल बनाने की बात करती हैं, प्रक्षेपास्त्र छोड़ने की बात करती हैं, पर सच्चाई ये हैं कि यहां की 90 प्रतिशत जनता पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का शासन चलता हैं, सच बात तो ये हैं कि ये कंपनियां गर भारत से हाथ खींच ले तो यहां की जनता पागलों की तरह अपने बालों को नोंच रही होगी, क्योंकि इनके बालों में शैम्पू से लेकर, इन्हें नहलाने, कपड़े धोने, दांत साफ करने, यहां तक की शौचालय में हाथ धुलाने का काम इऩ्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ले रखा हैं और ये सब देने हैं कांग्रेस की। उस कांग्रेस की, जिसमें महात्मां गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार पटेल जैसे नेताओं की भागीदारी रहीं, दुर्भाग्य उस कांग्रेस में सोनिया, राहुल, शीला, मनमोहन, दिग्विजय जैसे घटिया स्तर के नेता हैं। अरे महात्मा गांधी को नाथुराम गोडसे ने एक बार मारा, पर गांधी को, उनके विचारों को सर्वाधिक हत्या किसी ने की, तो वह और कोई नहीं ये कांग्रेसी ही हैं। आज स्वतंत्रता के बाद गांधी और बिनोवा के विचारों को अपनाते हुए, ग्राम स्वराज्य की बात पर अमल की गयी होती, तो देश आज बाजार नहीं बनता।
आज सारा देश जब कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण कराह रहा हैं तो देश की युवा पीढ़ी और देशभक्त जनता को चाहिए कि कांग्रेस से अपना नाता तोड़े और ईमानदारीपूर्वक जीवन व्यतीत करे। एफडीआई हमारे सरकार की मजबूरी हो सकती हैं, पर हमारी मजबूरी नहीं। आराम से स्वदेशी वस्तूओ का उपभोग करें, जब विकल्प न मिले तो विदेशी वस्तुओ का उपयोग करें। जो नेता या पार्टियां या मीडिया हाउस विदेशी वस्तूओं का उपभोग करती हैं या विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती हैं, उसका बहिष्कार करें। उनका स्पर्श किया हुआ सामग्रियों का भी परित्याग करें। याद रखे, देश है तो आप हैं, देश नहीं तो कुछ नहीं। बड़ी त्याग और बलिदान से हमारे पूर्वजों ने देश को स्वतंत्र कराया हैं, कृपया अपने देश को बाजार बनने न दे, हांलांकि देश के सर्वोच्च संस्थाओं पर बैठे हमारे नेताओं ने देश को गुलाम बनाने के लिेए कोई कसर नहीं छोड़ रखी हैं, फिर भी एक और लड़ाई लडने के लिेए स्वयं को तैयार रखे और इस बार की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा खतरनाकर होगी, क्योंकि दुश्मन अब अपने घर में भी एक नहीं, अनेक हैं......................................

Sunday, June 12, 2011

संतों को नमन..........................


उन संतों को नमन, जिन्होंने राष्ट्र के स्वाभिमान की रक्षा के लिए, सारे काम काज छोड़ कर, भ्रष्टाचार के खिलाफ, सड़कों पर उतर गये। जिन्होंने राक्षस रुपी कांग्रेस गठबंधन केन्द्र सरकार के नाक में दम कर दिया। जिन्होंने दिल्ली के राष्ट्रीय चैनलों के पत्रकारों पर चढ़ा कांग्रेसी मुखौटा उतारकर फेंक दिया। जिन्होंने कांग्रेसियों द्वारा चलाये जा रहे दमन अभियान की परवाह नहीं की और पूरे देश के जनमानस में भ्रष्टाचार और विदेशों में पड़ें कांग्रेसी नेताओं और यहां के अन्य देशद्रोहियों के काले धन के खिलाफ, सभी के हृदय में बीजारोपण कर दिया, आप माने या न मानें पर कालांतराल में, ये बीज एक दिन वृक्ष बनेगा और फिर ये भारतीय जनता इन भ्रष्ट कांग्रेसियों और देशद्रोहियों को सबक सीखाने के लिए सड़कों पर उतरेगी और जब ये सड़कों पर उतरेगी, तो स्वयं को चालाक समझनेवाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहां होंगे, उन्हें इस बात पर ज्यादा चिन्तन करना चाहिए। रही बात कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी, सुबोधकांत सहाय और पी चिदम्बरम जैसे अंगूलियों में गिने जानेवाले घटियास्तर के नेताओं की तो ये उस वक्त कहां होंगे, उन्हें खुद पता नहीं चलेगा।
इधर एक और बिहार के नेता लालू प्रसाद कुछ ज्यादा ही बोलने लगे है, वो लालू जिसने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के सपनों का सत्यानाश कर दिया। बाबा रामदेव के खिलाफ घटिया स्तर का बयान देने लगा, मजाक उड़ाने लगा। यानी जो खुद आज मजाक बना हुआ हैं, वो मजकिया लहजे, में अलबल बक रहा है, वो भी रामदेव के खिलाफ। ये वे लालू है – जो जयप्रकाश आंदोलन के समय कांग्रेस के खिलाफ बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे, जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने एक समय बिहार के 54 लोकसभा सीट से किसी भी कांग्रेसी को दिल्ली जाने नहीं दिया था, आज सोनिया माता का हृदय से प्रतिदिन सोनिया जप करते है, कि वो किसी भी प्रकार से उन्हें उपकृत कर दें। वो लालू जो अपनी पत्नी और बेटे-बेटियों के अलावा किसी की सोचते नहीं, वो लालू जिसने चारा घोटाले, अलकतरे घोटाले, वर्दी घोटाले, यानी बिहार को घोटालों का प्रदेश बना दिया, आज बहुत बोलने लगे हैं, वो भी तब जब बिहार की जनता इन्हें लगातार, उनकी औकात बता रही हैं, तब। वो कहावत हैं न, रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया। ये इसी कहावत के फिलहाल सटीक उदाहरण बनते जा रहे हैं। खैर, इनकी मर्जी ये भाड़ में जाये, इनसे हमें और बिहार की जनता को क्या मतलब, ये सोनिया माता का आंचल और राहुल का कुर्ता पकड़कर सत्ता की वैतरणी पार करते रहे।
आज एक अच्छी खबर हैं, कि संतों के आग्रह पर, बाबा रामदेव ने अपनी नौ दिन पुरानी अनशन तोड़ दी। ये अलग बात हैं कि उनके अनशन तोड़ने पर भी कांग्रेसी और कांग्रेस समर्थित पत्रकार ये पूछने से बाज नहीं आ रहे कि केन्द्र ने तो उनकी बात नहीं मानी, फिर भी बाबा रामदेव ने अनशन तोड़ दिया, आखिर इस अनशन का क्या मतलब, ये तो बाबा रामदेव का सत्याग्रह झूठ निकला। इस बारे में मेरा कहना स्पष्ट हैं कि मूर्खों और बेशर्मों से सत्य से संबंधित सवालों को पूछा जाना और उनके उत्तर उनके द्वारा पचा पाने का आग्रह रखना मुर्खता के सिवा दुसरा कुछ नहीं। इसलिए मूर्खों और बेशर्मों के द्वारा इस मुददे पर पूछे जा रहे सवालों को जवाब देने के पहले सोच लीजिये कि सवाल पूछनेवाला कांग्रेसी और कांग्रेस समर्थित पत्रकार, दोयम दर्जे का राक्षस है। क्योंकि रावण भी राक्षस था, पर वो भी मर्यादित व्यवहार करता था, पर ये ऐसा राक्षस है कि कब क्या कर देगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसलिए ऐसे राक्षसों से हमें निरंतर लड़ते रहना हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ अभी जंग खत्म नहीं हुई। हमें इस लड़ाई को यहीं पर छोड़ना नहीं हैं, इसे तब तक जारी रखना हैं, जब तक विदेश में पड़े कांग्रेसियों और कांग्रेस समर्थित पत्रकारों, देशद्रोहियों के काले धन, अपने देश तक नहीं आ जाते। ये भी याद रखिये कि जब तक कांग्रेसी सत्ता में बने रहेंगे, ये काम पूरा नहीं होगा, इसलिए आनेवाले समय में जब भी चुनाव हो, इन सत्ता में बैठे देशद्रोहियों को हिन्द महासागर में फेंकने के लिए तैयार रहे। हो सकता हैं कि इस संघर्ष में ये कांग्रेसी आपको जान लेने की कोशिश करें, जैसा कि उसने बाबा रामदेव के साथ किया। आधी रात को उनके आंदोलन को कुचलने के लिए हजारों पुलिस के जवान लगा दिये। उनके आमरण अनशन को समाप्त कराने के लिए दिलचस्पी नहीं ली, ये सोचकर कि वो आमरण अनशन पर है, भूख से तड़प तड़प कर खुद ही मर जायेगा, और हमारे रास्ते का- कांटा भी निकल जायेगा, ऐसे में इस संन्यासी के आमरण अनशन को खत्म करने की क्या जरुरत….? सुना हैं, ये कांग्रेसी अब बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन का जवाब देने का मन बना रहे हैं, ये देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने की बात कर रहे हैं, यानी अब मच्छड़, पहलवान बनने की सोच रहा हैं। आईये इन मच्छड़ों की औकात बताये और देश में उठे भ्रष्टाचार के खिलाफ ज्वार को, इस आंदोलन के दीप को कभी भी बुझने न दें।
जय हिन्द।

Saturday, June 11, 2011

विनाशकाले विपरीतबुद्धि

शास्त्रों में एक बात आयी है – जिनको ईश्वर दुख देने को होते हैं – उनकी मति (ज्ञान) हर लेते है। शायद ये वाक्य सत्तारुढ़ कांग्रेस पर सत्य साबित होती है। दो साल पूर्व सत्ता में दोबारा आयी, इस सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी के नेताओं को लगता है – जनता ने उन्हें सदा के लिए सत्तारुढ़ होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया है और इसी मद (अहंकार) में चूर होकर, वो सब काम कर रही है, जिसे न तो धर्म इजाजत देता है और न ही सत्य (ईश्वर)। जबकि इस सरकार में शामिल सभी मंत्री ईश्वर की ही शपथ लेकर सत्ता का सुख भोग रहे है, पर इनके ज्ञान को देखिये कितनी निम्नस्तर की हो गयी कि इन्हें अभी तक पता ही नहीं चल पा रहा कि उन्हें आज की परिस्थितियों में क्या करना चाहिए।
फिलहाल ये एक संन्यासी से टकराने में अपना पुरुषार्थ समझ रहे है और सच पूछिये, तो उस संन्यासी से टकराने का खामियाजा उसे भुगतना भी पड़ रहा हैं पर उसे इसका अनुमान नहीं हो रहा, क्योंकि फिलहाल धृतराष्ट्रों की संख्या इस पार्टी में ज्यादा दिखाई पड़ रहा है। मुझे एक बात समझ में नहीं आ रहा कि बाबा रामदेव ने भारतीयों के विदेशी काला धन को, भारत में लाने और भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की बात कहकर क्या गलत कह दिया, जो कांग्रेसियों को रास नहीं आ रहा। इससे तो बिहार में प्रचलित लोकोक्ति की याद आ रही है कि – चोर के दाढ़ी में तिनका। इसका मतलब हैं कि कांग्रेसियों के ही धन विदेशी खातों में जमा है, जिससे भयभीत कांग्रेसी नहीं चाहते कि वो काला धन, भारत में आये और यहां की जनता उन पर थू – थू करें।
हालांकि बाबा रामदेव के आंदोलन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान चालाकी भरा रहा हैं, जबकि उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों और कांग्रेसी नेताओं का बयान अमर्यादित और संस्कारहीन आचरण को जन्मदेनेवाला रहा है। दूसरी ओर दिल्ली के विभिन्न राष्ट्रीय चैनलों ने तो हद कर दी है, वो तो फिलहाल इस दौड़ में शामिल हो गयी हैं कि कौन चैनल बाबा रामदेव को भ्रष्ट साबित करने में एक नंबर हैं ताकि कांग्रेसियों और सोनिया गांधी के द्वारा उपकृत हो सकें। मुझे तो इन चैनलों और ऐसे घटियास्तर के पत्रकारों की बुद्धि पर तरस आती है कि आखिर इनका आचरण इतना घटिया कैसे हो गया, पर चिंतन करने पर पता लगता है कि भला मुर्खों से विद्वता की अपेक्षा रखना भी, मुर्खता ही है।
जरा प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों और राष्ट्रीय चैनलों का बाबा रामदेव के आंदोलन के पूर्व का चरित्र और उनके आंदोलन को कुचलने के बाद के चरित्र को देखिये, पता लग जायेगा कि देशद्रोही कौन है। सबसे पहले रामदेव के आंदोलन के पूर्व का चरित्र पर ध्यान दीजिये ---------
1. प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल तथा कांग्रेस के सभी नेताओं का बयान, बाबा रामदेव के खिलाफ न होकर मर्यादित है, सभी चाहते हैं कि बाबा रामदेव आंदोलन पर न बैठे, उनके आमरऩ अनशन का आंदोलन किसी भी कीमत पर समाप्त हो, इधर राष्ट्रीय चैनल भी बाबा रामदेव को नायक के रुप में प्रदर्शित कर रहे हैं, सभी विदेशी काला धन को भारत में लाने की उनके आंदोलन को लेकर जय जयकार कर रहे हैं, परिचर्चा करा रहे हैं, सरकार को कटघरे में लाने का प्रयास कर रहे है. पर जैसे ही बात बनते बनते बिगड़ती है कांग्रेस अपना असली रुप अख्तियार करती है, कांग्रेस का साथ देने में राष्ट्रीय चैनल आगे आते हैं और फिर ये सत्तारुढ़ कांग्रेसियों के साथ सुर में सुर मिलाकर बाबा रामदेव के खिलाफ समाचार दिखाने का अभियान शुरु कर देती है, वो चैनल जिनकी हिम्मत नहीं थी बाबा रामदेव की आंखों में आंख डालकर बात करने की, वो उन्हें बाबा रामदेव से रामदेव और पता नहीं क्या क्या कह डालने में शेखी बघारते हैं।
और अब बाबा रामदेव के आंदोलन को कुचलने के बाद का चरित्र देखिये ------
जो कांग्रेसी और मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में शामिल मंत्री बाबा रामदेव के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलते थे। आग उगलने शुरु करते है। कांग्रेसी दिग्विजय सिंह को आगे करते है और ये दिग्विजय वहीं करता हैं जो सोनिया माता उसे पूर्व में सिखाये रहती है, वो सोनिया के चरणों में, सर्वस्व समर्पित कर, एक संन्यासी के खिलाफ विषवमन करता है और सभी चैनल दिग्विजय सिंह जैसे नेता को एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत अपने चैनल में प्रोजेक्ट कर, बाबा रामदेव के आंदोलन पर कीचड़ उछालते हैं।
2. जनार्दन और दिग्विजय सिंह जैसे नेता, इस आंदोलन को भाजपा और संघ द्वारा प्रायोजित करार देता है। दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो नेपाल और भारत के साथ चल रही मित्रता को भी आग में झोंक देना चाहता है, वो बालकृष्ण को नेपाली कहकर, संबोधित कर डालता है, बेशर्मी की हद तो ये है कि इस आड़ में देशभक्ति गीतों पर झूमनेवाली सुषमा स्वराज के चरित्र पर भी अंगूली उठाता हैं, वो दिग्विजय जिसमें छेद ही छेद हैं, वो कहावत हैं न कि चलनी दूसे, सुप के जिन्हें बहत्तर छेद।
3. इधर कुछ दिनों के बाद अपना गृहमंत्री को पता नहीं कहां से दिव्य ज्ञान हो जाता है, लगे हाथों वह भी अपना हाथ साफ करने लगता है, वो कहता हैं कि बाबा रामदेव के आंदोलन में भाजपा और संघ का हाथ है, पर यहीं गृह मंत्री को पता नहीं, उस वक्त दिव्य ज्ञान कहा चला गया था, जब इसके मंत्री, आंदोलन को कुचलने के पहले, बाबा रामदेव के आगे पीछे दौड़ लगा रहे थे। ये गृहमंत्री इतना नीचे गिरता हैं कि अपना गिरेबां न देखकर, बाबा रामदेव को ही भला बुरा कहते हुए, सारी मिशनरियों का दुरुपयोग करते हुए, बाबा के खिलाफ, वो हर प्रकार के कुकर्म करता हैं, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं और विभिन्न राष्ट्रीय चैनल, इस गृहमंत्री के आगे पीछे ठुमके लगाते हुए, वो खबरें दिखाता हैं, जो इस गृहमंत्री और कांग्रेसियों को पसंद होता हैं। ये हैं सत्तारुढ कांग्रेसियों और राष्ट्रीय चैनलों के चरित्र।
पर इसके विपरीत एक सामान्य संन्यासी, जिसे लोग बाबा रामदेव, संत रामदेव और पता नहीं क्या क्या नामों से संबोधित करते हैं। (जिन्हें मैं संत नहीं, बल्कि एक सामान्य व्यक्ति के अलग कुछ नहीं मानता) इस सतारुढ़ सरकार के नाक में ऐसा दम करता है – वो भी आमरण अनशन के माध्यम से कि इस सरकार की हालत सांप और छुछुंदर की तरह हो जाती है और लगे हाथों ये बयान प्रसारित करती हैं कि वो बाबा रामदेव के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन चलायेगी – बताईये ये कितना हास्यास्पद बयान है। एक सरकार, चुनी गयी सरकार, एक संन्यासी के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन चलाने की बात करें, तो उसे क्या कहेंगे। एक सामान्य निश्छल व्यक्ति से इसका जवाब पूछे तो ये ही कहेगा कि ये तो एक संन्यासी की शानदार जीत है, पर इस केन्द्र सरकार को कौन बताये कि उसने किस प्रकार अपना संचित सम्मान खो दिया है।
बाबा रामदेव पिछले आठ दिनों से आमरऩ अनशन पर है, केन्द्र सरकार को हिला कर रख दिया है, ये अलग बात हैं कि केन्द्र सरकार जिसको अपने सम्मान की चिंता नहीं, गलथेथरी बतिया रही हैं कि हम सही हैं, पर सच्चाई क्या हैं, सभी जानते हैं पर राष्ट्रीय चैनलों की गलथेथरी देखिये – वो बाबा रामदेव के अनशन पर ही सवाल उठा रही हैं कि बाबा ने ग्लूकोज ले लिया हैं तो भला अनशन कैसा। अनशन तो टूट गया। अरे बेशर्म पत्रकारों, तुम्हें पत्रकार किसने बना दिया, क्यूं कांग्रेसियों और सरकार के तलवे चाटने में समय जाया कर रहे हो, कम से कम, सच तो बोलों, नहीं तो जान लो, इन कांग्रेसियों और सरकार को तो आनेवाले समय में जनता सबक सिखायेंगी ही, तुम्हें भी तुम्हारी औकात बतायेगी। फिर तुम्हारे टीआरपी का क्या होगा, तुम जब जनता की नजर में गिरोगे तो क्या फिर उठ पाओगे, क्यों विनाशकाल की ओर आगे बढ़ रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी विपरीत बुद्धि तुम्हें विनाशकाल की ओर ले जा रही हैं।

Thursday, June 2, 2011

चला रामदेव हीरो बनने..........

अपने देश में एक रामदेव है, जिन्हें कई लोग बाबा रामदेव, योगगुरु रामदेव, संत रामदेव और पता नहीं क्या क्या, विभिन्न नामों से पुकारते है। ये स्वयं को क्रांतिदूत कहलाने में भी फक्र महसूस करते है। इन दिनों इनकी खूब चर्चा है और वो चर्चा है – विदेश में जमा भारतीय काले धन को, देश में लाने के नाम पर आंदोलन करने और आगामी 4 जून से देशव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन करने के ऐलान के कारण। इस ऐलान से सुना हैं कि देश की लोकतांत्रिक केन्द्र सरकार के मुखिया भी हिल गये है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें पत्र लिखकर, उनसे आमरण अनशन न करने की अपील की है। रामदेव ने भी, प्रधानमंत्री के इस मार्मिक अपील से वशीभूत होकर, प्रधानमंत्री पद को लोकपाल से मुक्त करने की बात कहीं है।
हम आपको बता दें कि देश में आज तक ऐसा कोई संत नहीं हुआ। जिसने बाबा रामदेव की तरह, प्लानिंग के तहत, ऐसा काम किया हो, जिसे पूरे संत समाज का सर झूक जाये। एक नहीं, अनेक संत, कितने का नाम लूं। गुरुनानक, रविदास, नामदेव, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, अगर नाम जूड़वाने लगे तो दस पेज, ऐसे संतों के नाम लिखवाने में खर्च हो जायेंगे, पर इतना मान लीजिये कि किसी योगी ने, इस प्रकार से भारत के विभिन्न शहरों में जाकर योग के नाम पर दुकानें नहीं खोली और न चलायी, जो इन्होंने किया है और इन दुकानों से इनकी चांदी भी हो रही है। एक तो रांची में ही संत योगानन्द जी का आश्रम है जो बताता हैं कि संत और संत की गरिमा क्या होती है।
आजकल सारे इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों में इनका महिमामंडन हो रहा हैं, जाहिर हैं कि इनके महिमामंडन होने से पूरे देश के लोगों की नजरें इन पर आ टिकी है। ( उन इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों के द्वारा महिमामंडन हो रहा हैं जो पिछले कई वर्षों से आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित साईबाबा के खिलाफ खूब विषवमन करते थे, अनाप शनाप दिखाया करते थे, पर जैसे ही उनका स्वर्गवास हो गया, उनका यशोगान करना शुरु कर दिया, और लगे हाथों अपनी गलतियां सुधारने लगे, साई बाबा से संबंधित सकारात्मक खबरों को दिखाने लगे। यहीं नहीं ये वे इळेक्ट्रानिक मीडिया, उनकी जय – जयकार कर रहे हैं, जो पैसे लेकर कभी – कभी दो नंबर के संतों को, विज्ञापन के रुप में प्रोजेक्ट कर, उन्हें महान संतों की श्रेणी में लाने का कुत्सित प्रयास करते हैं) खैर, शेर की खाल में जब भेड़िये होंगे तो समाज और देश का क्या होगा, जगजाहिर है।
फिलहाल केन्द्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है और इस सरकार के मुखिया, यूपीए गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा उपकृत और मनोनीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, ये वे ही करते है जो उन्हें कहा जाता है। इसलिए बेचारे के बारे में मैं क्या बोलूं......। फिलहाल इन्हें किसी ने कह दिया होगा कि रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से सरकार की सेहत पर असर पड़ेगा, उन्होंने रामदेव के आगे अपनी झोली फैला दी। बेचारे रामदेव कहां चुप रहनेवाले थे, संत हैं और संत तो कुछ न कुछ देते हैं, कह दिया कि प्रधानमंत्री सम्मानित और गरिमा वाला पद हैं, इसलिए इस पद को लोकपाल से मुक्त रखना चाहिए, पर ये भी कह दिया कि वे आमरण अनशन के निर्णय पर अडिग हैं।
ये निर्णय का ऐलान करना उऩ्हें जरुरी भी था क्योंकि सारी मीडिया, वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी बिना विज्ञापन के उनकी जयजयकार करने, उन्हें महानायक बनाने पर तुली हो तो क्यों न इसका पूरा पूरा लाभ उठा लिया जाय, क्योंकि ये ही वो मीडिया हैं, जिसने बिना किसी विज्ञापन के अन्ना हजारे को हीरो बना दिया था और सरकार झूक गयी थी तो वो तो रामदेव है। इस देश में कई भ्रष्टाचार में लिप्त और सरकार को करोड़ों का चूना लगानेवाले उदयोगपति और राजनीतिज्ञ उनके चेले हैं, जिनकी कृपा से उन्होंने खुद इतना धन इकट्ठा कर लिया हैं कि उतनी संपत्ति देश में शायद ही, किसी तथाकथित संत के पास होगी।
हमारे विचार से संत का शाब्दिक अर्थ हैं --- स+अन्त यानि जो समस्याओं का अंत करें, वो संत। जो समस्याओँ को बढ़ा दे। वो संत कैसे हो सकता हैं। भ्रष्टाचार और देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में सत्याग्रह और आमरण अनशन का विशेष महत्व था। अंग्रेजी सरकार, इससे झूकती थी, क्योंकि एक बहुत बड़ा चरित्रवानों का समूह इन आंदोलन के पीछे रहता था, पर आज की जो स्थिति हैं, उसे देखकर हमें हंसी आती है। हमनें बाल्यकाल से लेकर अभी तक कई पुस्तकें पढ़ी हैं, सभी में सत्याग्रह और आमरण अनशन का जिक्र है, गांधी का सत्याग्रह तो अनुरकरणीय है। गांधी ने कह दिया कि फलां तारीख से वे सत्याग्रह पर है और सत्याग्रह शुरु। न किसी पंडाल की जरुरत और न किसी से उनके साथ रहने का आग्रह और न ये ढिंढोरा पिटवाने की जरुरत कि वे आंदोलन पर जा रहे हैं, पर जरा आज देखिये क्या हो रहा है ----------
रामदेव के इस तथाकथित आंदोलन पर नजर डालिये। एक अखबार ने लिखा हैं कि
दिल्ली के रामलीला मैदान में ढाई लाख वर्ग फुट का पंडाल बन रहा हैं, उस पंडाल में मच्छड़ न रहे, इसके लिए फोगिंग मशीन लगायी गयी है। एक लाख आरओ वाटर का इंतजाम किया गया हैं। 1000 शौचालय बनाये जा रहे है। 40 बेड का वातानूकूल आईसीयू, 3000 वर्ग फुट का चार मंच बनाया जा रहा है। इनकी सुरक्षा में 500 दिल्ली पुलिस के जवान लगाये जा रहे हैं। पांच बड़े एलसीडी स्क्रीन लगेंगे। यानी पूरे आंदोलन को हाईटेक करने की कोशिश की जा रही है। यानी भ्रष्टाचार रोकने के लिए, कालेधन को देश लाने के लिए, ये सब किया जा रहा है, वो भी कोई रामदेव के द्वारा।
जब मैं ईटीवी में था। तब धनबाद में मुझे ईटीवी में सेवा देने का मौका मिला। उस दरम्यान, ये रामदेव, धनबाद आये थे। और वहां के चनचनी कालोनी में एक बहुत बड़े धनाढ्य के घर में उनका प्रवास हुआ था। बड़े – बड़े उद्योगपतियों जो पांच लाख रुपये दे सकते थे, आराम से मिलते, उनके आश्रम को पैसे देने के लिए जीजान से जूटते वो भी उनके साथ खूब गप्पे लड़ाते, आनन्दित होते। एक दिन प्रेस काँफ्रेस हुआ था, उसी चनचनी कालोनी में, उसी धनाढ्य के घर में, मैं भी गया था, देखा कि सारे पत्रकार, उनके साथ फोटो खिचाने के लिए बेताब थे, जैसे कि गर उनके साथ फोटों नहीं खिचाया तो जीवन ही बर्बाद हो जायेगा, ऐसी स्थिति थी। पर मैं इन सबसे अलग रहता हूं क्योंकि पता नहीं क्यूं। घर के हालात या माता पिता द्वारा दिया गया संस्कार अथवा वो श्लोक जो बार बार मेरे कान में गूंजते हैं – अधमा धनं इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमा, उत्तमा मानं इच्छन्ति, मानो हि महता धनम्।। रामदेव मुझे प्रभावित नहीं कर सकें। क्योंकि मैंने कई संतों के बारें में पढ़ा हैं, जिन्होंने धन के पीछे, यश के पीछे भागा नहीं, वे तो निरंतर, मानव निर्माण में लगे रहते हैं, क्योंकि मानव निर्माण हो गया तो फिर समाज और देश बनने बनाने में कितना समय लगेगा। पर यहां तो एक संत द्वारा एक ऐसे पेड़ बोने की कोशिश की जा रही हैं, जिससे सदाचार फैले, पर उस सदाचार वृक्ष को रोपने में जड़ में पानी न देकर, उसके शिखाओं पर पानी देने की कोशिश हो रही हैं और इस कोशिश में सभी प्रयास कर रहे हैं। कोई गांव-शहर में जाकर मानव निर्माण का कार्य, संस्कार व चरित्र निर्माण का कार्य नहीं कर रहा। सभी पतली गली से राजनीतिक सफर तैयार करने में लगे हैं, एक देख रहा हैं कि जब योग के झांसे से पूरा देश उसके साथ हो गया और भ्रष्टाचार के नारे सें पूरी दिल्ली हिल गयी तो फिर प्रधानमंत्री का पद कितना दूर हैं। दूसरा देख रहा हैं कि बंदूक की गोली से सत्ता हथियाने में अब ज्यादा दूर हैं कहां, कई बुद्दिजीवी प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से उन्हें समर्थन दे ही रहे हैं तो फिर दिक्कत कहां हैं, इस नाहक कमजोर केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकने में कहां दिक्कत हैं, मौका मिलते ही, उखाड़ फेंकेंगे और भारत के गर्दन को जब चाहे, जब तोड़ मरोड़ देंगे और चीन के हाथों सौंप देंगे। दिक्कत कहां हैं।
कमाल है, जिस सरकार को जनता चुनती है, वो सरकार का मुखिया, एक योग के नाम पर झांसा देनेवाले के आगे झूकता हैं, चार – चार मंत्रियों को दिल्ली एयरपोर्ट भेज देता हैं, जैसे कि किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष, उससे मिलने आ रहा हो। उस प्रधानमंत्री से देश के विकास और सम्मान की आशा की जा सकती हैं। इस देश में लोकतंत्र हैं या तथाकथितयोगतंत्र। हमें तो लगता हैं कि इस देश की कोई मर्यादा ही नहीं और न ही कोई गरिमा है। सभी अपने अपने ढंग से इस देश का सत्यानाश करने में लगे है। भ्रष्टाचार क्या कोई बकरी का बच्चा है, दौड़ा और पकड़ लिया, क्या रामदेव में हैं ताकत कि वे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा दें। अगर नहीं तो इस प्रकार का नाटक क्यो, इससे किसका फायदा होगा और किसका नुकसान। ये तो योग के नाम पर झांसा देनेवाले रामदेव को तब पता चलेगा जब वे मृत्युशैय्या पर पड़ें होंगे, क्योंकि वे सब को धोखा दे सकते हैं, अपनी आत्मा को नहीं।
ऐसे भी इस देश का कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा, जो विदेशों में पड़े अपने देश के काले धन को लाना नहीं चाहेगा, कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा जो भ्रष्टाचार मुक्त भारत नहीं चाहेगा, पर इस देश में चरित्रवानों की संख्या कितनी हैं, इनकी संख्या तो देश में विलुप्त होते सिंह की तरह हो गयी हैं, जरुरत हैं, इन चरित्रवानों की संख्या में वृद्धि कराने की, जैसे ही इनकी संख्या बढ़ेगी, भ्रष्टाचार रुपी दावानल खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा, फिर किसी तथाकथित रामदेव को, दिल्ली के रामलीला मैदान में करोड़ों खर्च कर, इस प्रकार की झूठी आंदोलन करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी।

Wednesday, March 23, 2011

हमारा प्रधानमंत्री और यहां के पत्रकार बड़े होशियार हैं.......!

संदर्भ --- घूस देकर सरकार बचाने का...

चाहे सदन में चर्चा हो या न हो। गर हो भी तो भले ही उसका अर्थ न निकले। पर प्रधानमंत्री मनमोहन जी और यूपीए की नेता सोनिया गांधी को मालूम होना चाहिए कि भारत की जनता इतनी मूर्ख नही, जितना वो समझते हैं। भारत की सौ करोड की आबादी जानती हैं कि जो केन्द्र में सरकार चल रही हैं, वो भ्रष्टाचार को आत्मसात कर ही चल रही हैं, और इसी सरकार ने पिछली बार 14 वी लोकसभा में अपनी कुर्सी को बचाने के लिए, सांसदों को घूस दिये थे। ये अलग बात हैं कि जिनके पास सबूत थे, उन पत्रकारों और नेताओं ने इस सरकार के आगे अपनी जमीर बेच दी थी। प्रधानमंत्री जी का संसद में विकीलीक्स मामले पर विपक्षी नेताओं के प्रश्नों के जवाब के दौरान ये कहना कि इसका कोई सबूत नहीं कि उऩकी पार्टी अथवा सरकार ने घूस देकर, सरकार बचायी थी, इसलिए वे निर्दोष हैं अथवा उनकी पार्टी या सरकार दोषी नहीं हैं, बचकाना बयान हैं। ये तो वहीं बयान हैं जब कोई अपराधी, अपराध तो करता हैं, जिसका ताउम्र उसे एहसास होता भी रहता हैं, पर अपने अपराधिक सबूतों को बड़ी ही सफाई से इस प्रकार गायब कर देता हैं, जिसका पता दूसरों को नहीं लगता। पर इस बार विकीलीक्स द्वारा किया गया खुलासा कि कांग्रेस ने सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचायी थी, सब कुछ क्लियर कर देता हैं कि इस देश में कैसे – कैसे राजनीतिज्ञ शासन कर रहे हैं और इसका साथ यहां के तथाकथित जमीर बेचने वाले पत्रकार कैसे दे रहे हैं । ऐसे तो सभी जानते हैं कि कांग्रेस और भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय हैं। चाहे विदेशों में धन रखने की बात हो या विभिन्न घोटालों को जन्म देना ये कांग्रेसियों का बायें हाथ का खेल हैं। ये अलग बात हैं कि भारत इनके द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार के बावजूद भी सरकता हुआ आगे बढ़ता जा रहा हैं, क्योंकि यहां की आज भी एक बहुत बड़ी आबादी देश को आगे बढ़ाने के लिए अपना खून पसीना बहाती जा रही हैं, ये कहकर कि-----
तेरा वैभव अमर रहे मां,
हम दिन चार रहे ना रहे
इस देश का दुर्भाग्य रहा हैं कि जब से ये देश स्वतंत्र हुआ तब से लेकर आज तक ज्यादातर समय तक कांग्रेसियों का शासन रहा हैं, जिन्होंने शायद संकल्प कर लिया हैं कि वे इस देश का बंटाधार करके रहेंगे। उनके इस संकल्प को पूरा करने में, वे पत्रकार भी शामिल हो गये हैं, जिनका मकसद, समाचारों के माध्यम से पत्रकारिता और देश सेवा न कर ब्लैकमेलिंग करना हैं, पर इन ब्लैकमेलर पत्रकारों को भी कैसे ठीक किया जाता हैं, शायद कांग्रेसियों को बहुत अच्छी तरह पता हैं। इसलिए जिन पत्रकारों अथवा चैनल के पास सासंदों को घूस देनेवाली खबर व उसके पूख्ता सबूत मौजूद थे, उस चैनल और उसके पत्रकारों ने बिना देर किये कांग्रेसियों के चरण पकड़ लिये ये कहकर कि आप हो तो हम हैं, इसलिए आप घबराये नहीं, हम कभी भी उस खबर को अपने चैनल पर नहीं दिखायेंगे, जिसकी वजह से सरकार पर आंच आती हो, आप जो कहेंगे, वहीं करेंगे। इसलिए, उस वक्त, उक्त चैनल ने वो समाचार नहीं दिखायी, जिसको देखने के लिए भारत की जनता बेकरार थी, जिसका कथन था, खबरें किसी भी कीमत पर वो पता नहीं कौन सी कीमत लेकर अपना जमीर बेच चुका था। पर जनता तो जनता हैं वो जान चुकी थी कि दाल में काला हैं, पत्रकारों ने जमीर बेचा हैं, सब जगह थू थू होने लगी, उक्त चैनल ने बहुत दिनों बाद, जब मामला ठंडा पड़ गया, समाचार दिखाई, वो भी जैसे तैसे, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, कांग्रेसियों ने पूरे प्रकरण को गड्मगड कर दिया था, वे अपने मकसद में कामयाब हो गये थे, पर कहा जाता हैं न कि सच, सच होता हैं, विकीलीक्स ने रहस्योदघाटन करके बता दिया कि कांग्रेसियों ने घूस देकर, अपनी सरकार बचायी, और केन्द्र की सोनिया मनमोहन की सरकार तो नंगी हुई ही, वे पत्रकार भी नंगे हो गये जिनके पास सत्य था पर वे सत्य दिखाने का साहस नहीं दिखा सकें । जो पत्रकार कहते हैं कि वे खबरें किसी भी कीमत पर जाकर दिखा सकते हैं। वे भी कांग्रेसियों के चरणोदक पीने को बेताब हो जाते हैं, जब कांग्रेसियों की धमक, उन पत्रकारों के कानों तक पहुंच जाती हैं। लेकिन देश के अन्य इमानदार पत्रकारों द्वारा, उन जमीर बेचनेवाले पत्रकारों अथवा चैनलों पर थू थू की जाती है, तब भी ये बेशर्मी से अपने को पाक साफ बताने में लग रहते हैं। जब देश के संसदीय इतिहास में पहली बार, नोटों के बंडलों को भाजपाईयों द्वारा रखा जा रहा था और ये नेता ये कहकर चिल्ला रहे थे कि उन्हें कांग्रेसियों ने खरीदने की कोशिश की, जिसका सबूत देश के एक प्रमुख चैनल और पत्रकार के पास था, उसने किस कारण से अपनी जमीर बेच दी, वे तो वहीं बता सकते हैं, पर देश की जनता जान गयी थी कि यहां नेता व पत्रकार सभी मिले हैं, सभी तरमाल खा रहे हैं, सभी देश को बर्बाद करने में तूले हैं, चारो ओर घोर अंधियारा हैं, कहीं कोई किनारा नहीं हैं, इसलिए जनता सब कुछ जानते हुए भी, एक बार फिर अनिच्छा से विष पीया और कांग्रेस को सत्ता सौंप दी, और इस सता को पाने के बाद कांग्रेसियों ने तो समझ लिया कि भारत की जनता उनके साथ हैं, इसलिए भ्रष्टाचार का कीर्तिमान बनाओ, और देश के दिल्ली में बैठे पत्रकारों को साम दाम दंड भेद के तहत अपने पास मिलाये रखों और देश पर शासन करने का मजा लेते रहो। शर्म हमें आती हैं कि हम उस कालखंड में रह रहे हैं, जहां जमीर बेचनेवाले नेता व पत्रकार देश के शीर्ष स्थानों पर बैठकर, भारत के विकास का बेशर्मी राग, देशवासियों को सुना रहे हैं, ये कितने बेशर्म हैं, इस बात का पता इसी से चल जाता हैं कि देश के संसद में भी बैठकर हसंते हुए, अपनी बेशर्मी का फागुनी राग सुना रहे होते हैं, और इनके फागुनी राग में पत्रकार भी ये कहकर बेशर्म बनते हैं, कि कांग्रेसी और मनमोहन तो आज तक कुछ गलत किया ही नहीं, ये तो विपक्षी दल के नेताओं की आदत हैं, सत्तापक्ष को कठघरे में खड़ा करने की, इसलिए गाहे बगाहे चिल्लाते रहते हैं। इसलिए इन्हें चिल्लाने दीजिये। हम अपना काम करते रहे। यानी की, हम हमेशा जीवित थोड़े ही रहेंगे, जब तक जीयेंगे ऐश करके जीये, देश भाड़ में जाये, जिनको देश के बारे में सोचना हैं, वो सोचे। अपना क्या हैं, खाओ, पीओ, ऐश करो। देश पर चीन हमले की योजना बनाये अथवा पाकिस्तान व बांगलादेश हमारी सरहदों को छोटा करने की कोशिश करें तो उससे हमें क्या। हमने ही ठेका ले रखा हैं, भारत का क्या।

Tuesday, May 11, 2010

पढने का मतलब......!

पढ़ने का मतलब – विद्रोही

हमारे बहुत सारे ऐसे मित्र हैं जिनकी मासिक आमदनी एक लाख से उपर हैं, वे खूब धन कमाना चाहते हैं, जिंदगी की हर खुशियों को पाना चाहते हैं, अपने बच्चों को वो बनाना चाहते हैं, जो वो नहीं बन सकें और इसी बनाने के चक्कर में खुद को नाना प्रकार के अवसादों में ढक ले रहे हैं, क्योंकि अंत में परिणाम वो आ रहा हैं, जिसकी परिकल्पना उन्होंने नहीं की थी।
मैं इन मित्रों में से कई को उदाहरण दिया हूं, वे सुनते हैं, समझते हैं, पर करते वहीं हैं, जो लक्ष्मी जी इनसे करा लेती हैं, क्योंकि ये नहीं समझते कि धन की तीन गतियां हैं – सर्वोच्च गति हैं – दान, मध्यम गति हैं – उपभोग और निकृष्ट गति जो आप चाहे या न चाहे हो ही जाती हैं – नाश।
जरा कोई हमारे मित्रों साथ ही वे लोग जो आज धनपशु बनने के चक्कर में चरित्र को श्रद्धांजलि दे, वे सब कुछ कर रहे हैं, जिससे समाज को खतरा उत्पन्न हो गया हैं, भ्रष्टाचार की सारी सीमाएँ लांघ गये हैं, हमारे कुछ सवालों का जवाब दे सकते हैं।
गांधी के माता – पिता अपने बच्चे का नाम रखा – मोहनदास, पर बेटे ने ऐसी राजनीतिक प्रबंधन की कि बेटा मोहनदास से महात्मा गांधी हो गया, यहीं नहीं जिसने उसे पैदा किया, उस़का भी बाप बन गया राष्ट्रपिता कहलाया। क्यॉ कोई बता सकता हैं कि महात्मा गांधी ने किस शिक्षण संस्थान से राजनीतिक प्रबंधन के गुर सीखे, जिसके कारण उन्होंने मरणोपरांत अपने जन्मदिन पर अतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस तक घोषित करा दिया।
कबीर, जिन्होंने कभी स्याही कलम पकड़ी नहीं और उन्होंने ऐसी साखी लिखी कि उनकी साखी पूरे दूनिया को सीख दे रही हैं। लोग कबीर की लिखी पंक्तियों पर सर्च नहीं रिसर्च कर रहे हैँ और डाक्टरेट की उपाधि ले जा रहे हैं, कमाल हैं आज तो सिर्फ ये रिसर्च कर रहे हैं, क्योंकि सर्च तो पहले ही कबीर कर चुके हैं –
ये कहकर कि –
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय
एकै आखर प्रेम का पढ़ैं सो पंडित होय
रवीन्द्र नाथ ठाकुर, जिन्होंने कभी स्कूल एवं कालेज का मुंह तक नहीं देखा, उनकी गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद धूम मचाती हैं, और वे नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर लेते हैं।
आधुनिक प्रमाण की ओर ध्यान दें –
महेन्द्र सिंह धौनी जो आज क्रिकेट जगत में धूम मचा रहे हैं, क्या उनके परिवार में कोई क्रिकेट का एबीसीडी भी जानता था, या आनेवाले समय में क्या खुद वे अपने ही संतान को उस उचाई तक ले जा सकते हैं, जिस उचाई पर वे आज हैं, अरे जब सुनील मनोहर गावस्कर अपने बेटे रोहन को उस उचाई तक नहीं ले जा सके तो और कोई क्या कर सकता हैं।
लालू यादव जो पन्द्रह सालों तक बिहार की कुर्सी से परोक्ष व अपरोक्ष रुप से चिपके रहे, जिन्होंने अँधाधूध पैसे कमाये, वो सब कुछ अपने बेटे बेटियों के लिए कर दिया, जो एक सामान्य मां – बाप कभी नहीं कर सकते, पर क्या लालू ही बताये, जो राजनीतिक उचाईयों उन्होंने छूई क्या उनके संतान भी ऐसी उंचाई छू सकते हैं।
उत्तर होगा -- नहीं
आर्थिक क्षेत्रों की ओर नजर डाले – जिस धीरु भाई अंबानी ने नया कार्यक्षेत्र का शुभारंभ किया, उनके बेटे उस क्षेत्र को नई दिशा जरुर दे रहे हैं, पर वे धीरु भाई अंबानी नहीं बन सकतें, क्योंकि खोज एक अलग चीज हें, और उसे आगे बढ़ाना दूसरी चीज।
परतंत्रता की बेड़ी में पड़े भारतवर्ष में टाटा आयरण एंड स्टील कंपनी को खोलनेवाले जमशेदजी टाटा ने जो करामात उस वक्त दिखाई क्या जमशेदजी टाटा के जैसा, उन्हीं के यहां कोई दूसरा जमशेदजी टाटा बन सका।
वर्तमान राजनीतिक क्षेत्र में देखे – मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी सभी सामान्य वर्ग से आते हैं, राजनीतिक बुलंदियों को छूआ हैं, ये आर्थिक और सामाजिक सम्मान में किसी से भी कम नहीं पर ये भी चाहे कि अपने परिवारवालों को वो चीजें दिला दें जो उन्होंने पाया। असंभव हैं।
क्योंकि वो चीजें पाने के लिए आपको भी औरों से हटकर कुछ विशेष काम करने होंगे और इनमें जो सबसे ज्यादा जरुरी हैं वो हैं – चरित्र, जिसकी सभी ने अब तिलांजलि एक तरह से दे दी हैं। सभी को लगता हैं कि धन कमाओं और इस धन से वे सारी चीजें खरीद लों, जिसकी वे चाहत रखते हैं, पर उन्हें ये मालूम नहीं कि धन से दवा खरीदी जा सकती हैं, पर दुआएं नहीं, धन से भोजन खऱीदा जा सकता हैं और पर भूख को शांत नहीं किया जा सकता, धन से सुख के सारे संसाधन खऱीदे जा सकते हैं, पर सुख नहीं। फिर भी धन कमाने की होड़, और इस होड़ में एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा हैं।
मैं, जिस गांव में पला बढ़ा हूं, उस गांव में दो धनाढ्य थे, जिनके पास धन और जमीन की कोई कमी नहीं थी, पर आज उन्हीं दो धनाढ्यों के बच्चों ने उन संपत्तियों को एक – एक कर बेचना शुरु कर दिया आज के डेट में उनके पास खाने तक को कुछ नहीं, ऐसे में इस प्रकार के धन कमाने से क्या फायदा।
हाल ही में पटना के एक अधिकारी, के यहां छापा पड़ा, जनाब छापे और पकड़ाने के भय से परिवार के साथ पर्व त्योहार भी नहीं मना सकें, बच्चे पापा को खोज रहे थे, पर पापा पता नहीं कहां थे।
समाज का कोई भी क्षेत्र हो गर आप उसमें भाग ले रहे हैं और उसमे सच्चरित्रता का समावेश कर लेते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जाता हैं, पर जहां उसमें चारित्रिक पतन का समावेश करते हैं तो सिर्फ आप धनपशु कहलाते हैं, और इसके बाद जो पशु की जिंदगी होती हैं, वो आपकी जिंदगी हो जाती हैं, आखिर आप इस छोटी सी बात को क्यों नहीं समझते।
स्वतंत्रता के पूर्व भारत में शिक्षा का अभाव था पर चरित्रता व ज्ञान की वैशिष्टयता का अभाव नहीं था, पर आज क्या हैं, शिक्षा और संचार क्रांति में भारत जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हैं, ठीक वैसे – वैसे चरित्र और ज्ञान की वैशिष्ट्यता का अभाव भी तेजी से बढ़ता चला जा रहा हैं। आज स्कूलों – कालेजों में बच्चें सब कुछ बन रहे हैं, पर आदमी नहीं बन रहे. यहीं आदमी का नहीं बनना भारत जैसे देश के लिए काल बनता चला जा रहा हैं, जो आपस में ही इतनी दूरियां तय कर दे रहा हैं कि कल भाई ही भाई के खिलाफ तलवार निकालकर, भारतीयता को ही नष्ट कर देने को उतावला हो जाये तो इसे अतिश्योक्ति नहीं माना जाना चाहिए