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Tuesday, June 7, 2011

ऐसी हरकतें सिर्फ कांग्रेसी ही कर सकते हैं............

संदर्भ --- बाबा रामदेव प्रकरण
सारा देश जानता हैं कि विदेशों में जो काला धन है, वो काला धन किस पार्टी का है और उस काला धन को संरक्षित करने में कौन सी सरकार ज्यादा दिमाग लगाती है। ऐसे में उस काला धन के खिलाफ जो भी आवाज उठायेगा, उसका हश्र क्या होगा। वो बाबा रामदेव के साथ जो आज आधी रात को कांग्रेसी सरकार ने किया, उससे सभी को सीख लेनी चाहिए। आप गुंडों और अपराधियों के घर के पास जाकर, कहो कि तुम गुंडे और अपराधी हो, ऐसे में वो गुंडा या अपराधी, गांधीवादी तो हैं नहीं कि आपको मिठाई खिलाकर अथवा फूल मालाओं से लादकर विदा करेगा, अरे वो तो वो कुटाई करेगा कि आप जिंदगी भर याद रखेंगे। वहीं कुटाई कांग्रंसियों और उसकी सरकार ने रामदेव के साथ कर दी, तो इसमें आश्चर्य कैसा, ये तो होना ही था, ये तो कांग्रेस का चरित्र ही है। जब भी देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठी, उस भ्रष्टाचार के खिलाफ उठनेवाली आवाज को कांग्रेंसियों ने बखूबी बंद किया। क्योंकि ये सशरीर भ्रष्टाचार रुपी नदीं में प्रतिदिन डुबकी लगाते हैं, नहीं तो जरा इनसे पूछो कि इनके पास जो ज्यामितीय प्रणाली से धन बढ़ते हैं, उसका राज क्या हैं।
कांग्रेसियों के घटियास्तर के चरित्र से देश को कितना नुकसान हो रहा हैं, उससे इन्हें क्या मतलब, ये तो देश भाड़ में जाय, खुद अरबों की संपत्ति इकट्ठा कर परम सुख पाते हुए, इस दुनिया से चल जाना चाहते हैं, ये कहकर की देश की आजादी हमारे लोगों ने लड़कर दिलायी हैं तो इसका फायदा, ब्याज सहित प्राप्त करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जो इसका विरोध करेगा, वो झेलेगा।
बाबा रामदेव पर हमले कराना, बाबा रामदेव के आंदोलन व आमरण अनशन की धार को कुंद करने के लिए जनार्दन व्दिवेदी के प्रेस कांफ्रेस में एक सुनियोजित साजिश के तहत एक व्यक्ति द्वारा जनार्दन पर जूते फेंकने का नाटक करवाना, और इस घटना के लिए भाजपा और आरएसएस को दोषी ठहराना और इसके बाद रामदेव के चल रहे आमरण अनशन से देश और मीडिया का ध्यान बटवाना, इऩका बाये हाथ का खेल है। आजादी के बाद से लेकर, ये तो यहीं सब किये हैं। दिल्ली के मीडिया में, हैं किसी की हिम्मत जो कांग्रेसियों के इस चरित्र को नंगा करके दिखायें, जो उसके खिलाफ बोलेगा, कांग्रेसी साम दाम दंड भेद के द्वारा उसकी बोलती बंद करेंगे। यहीं कारण हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार के नाम पर जितने भी आंदोलन हुए, उसका फलाफल य़े हैं कि मीडिया कांग्रेसी नेताओं के तलवे चाटने में ही ज्यादा रुचि दिखायी, उसका सुंदर उदाहरण लोकनायक जयप्रकाश आंदोलन के बाद की इंदिरा की राजनीति है। मैं ये नहीं कहता कि देश के सभी मीडिया हाउस और पत्रकार कांग्रेसियों के हाथों के कठपुतलियां हैं, पर इतना जरुर कह सकता हूं कि ज्यादातर ऐसे ही हैं।
कांग्रेस में एक नेता है – दिग्विजय सिंह, उसे मध्यप्रदेश की जनता ने जब से मुख्यमंत्री पद से हटाया, वो पागल सा हो गया है। उसका पागलपन इसी से सिद्ध होता है कि वह लादेन के लिए, सम्मानजनक सूचक शब्द का प्रयोग करता हैं, और बाबा रामदेव को महाठग करार देता है। मुख्यमंत्री पद खोने के बाद, उसे आरएसएस और भाजपा के भूत दिन-रात, सुबह-शाम दिखाई पड़ते हैं, उसका वश चले तो ये भी कह दें कि ओसामा बिन लादेन को मारने में भाजपा और आरएसएस का ही हाथ हैं, वो कुछ भी कह सकता हैं और ऐसे पागलों को कभी कभी कांग्रेसी, उनका व्यक्तिगत बयान मानकर पिंड भी छुड़ा लेते हैं, पर जब सोनिया माता पर बन आती है, और सोनिया माता के पक्ष में जब इसका बयान कांग्रेसियों को लगता हैं कि सही है तो इसकी लंगोटी को पकड़ने के लिए, सभी कांग्रेसी राग यमन गाने लगते है। ये हैं कांग्रेसियों का चरित्र। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि देश में लोकतंत्र को गर खतरा है तो इन कांग्रेसियों से। इन्होंने देश का सत्यानाश करने का ठेका ले रखा है और इसके खिलाफ एक जोरदार आंदोलन की जरुरत है और वो आंदोलन एक दिन अवश्य होगा। कांग्रेसियों को हिन्द महासागर में फेंकने के लिए एक और लोकनायक को जन्मलेना होगा।
ऐसे मैं बता दूं कि रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु किये गये आंदोलन अथवा विदेशों में पड़े भारतीयों के कालेधन को भारत लाने की मांग का मैं भी समर्थक हूं, पर उनके आंदोलन की कड़ी आलोचना करने में मैं पीछे नहीं हटता, क्योंकि वे खुद अपने को संत बताते हैं, योगगुरु बताते हैं पर शायद उन्हें पता नहीं कि संतों अथवा योगगुरु का काम, आंदोलन करना नहीं, बल्कि आंदोलन करवाना है। चाणक्य खुद लड़ा नहीं, बल्कि चंद्रगुप्त को पैदा कर वो काम करा लिया, जो वो चाहता था। महर्षि विश्वामित्र चाहते तो, खुद सुबाहु मारीच और ताड़का को मार सकते थे पर उन्होंने ऐसा किया नहीं, बल्कि उन्होंने दशरथ पुत्र राम और लक्ष्मण को इसका श्रेय दिया। पर रामदेव तो संत हैं नहीं कि उन्हें इसका भान हो अथवा कोई उऩ्हें बता दें कि ऐसा करें और वो मान ले। वो तो शत प्रतिशत उदयोगपति और राजनीतिज्ञ है, और जैसा कि एक उदयोगपति अपना उद्योग लगाने के लिए अथवा राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति चमकाने के लिए तेला – बेला करता हैं, वो भी कर रहे हैं, ऐसे भी इसमें गलती क्या हैं, सबको अपने अपने ढंग से जीने का अधिकार हैं, बाबा को सबको मूर्ख बनाने और अपना जय जयकार कराने में मजा आता हैं, और उनके अनुयायियों को भी मूर्ख बनने में परम आनन्द की प्राप्ति होती हैं तो गलत क्या हैं। खैर, हम इस पचड़ें में पड़ना भी नहीं चाहते।
पहले आंदोलन की बात ----------------
क्या ये सही नहीं कि बाबा रामदेव ने दिल्ली प्रशासन से झूठ बोला कि वो दिल्ली के रामलीला मैंदान में योग शिविर लगायेंगे और योग शिविर के नाम पर लगे हाथों सत्याग्रह और आमरण अनशन की धमकी दे डाली। क्या ये रामदेव के दोहरे चरित्र का भान नहीं कराता। जो संत अपने समर्थकों को दिल्ली में बुला लें और चुपके से दिल्ली की केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ बैठक कर अपने आंदोलन पर डील कर लें, फिर डील तोड़ने का नाटक करें और अपने समर्थकों को फिर आंदोलन के नाम पर भड़काने का काम करें, क्या ये एक संत का चरित्र हो सकता हैं और इस प्रकार के लोगों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन क्या मूर्तरुप ले सकते हैं। उत्तर होगा – कभी नहीं। आप ऐसा कर, भीड़ इक्ट्ठी कर सकते हैं, पर एक सफल आंदोलन नहीं कर सकते, क्योंकि आपके आंदोलन में ही खोट हैं। विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन पर चलाये गये बाबा रामदेव के इस आंदोलन से, बाबा रामदेव के असली चरित्र का भान शायद भारतवासियों को हो चुका हैं, और जो कुछ बचा हैं, वो धीरे – धीरे इनके द्वारा कालांतराल में जब कभी आंदोलन चलाया जायेगा, लोग पूरी तरह से जान लेंगे।
कुछ बातें कांग्रेसियों से ----------------
जब बाबा रामदेव का आंदोलन, गलत था। रामदेव और उनके समर्थक गैर कानूनी ढंग से आंदोलन स्थल पर आ डटे, तब उनसे किस आधार पर बात करने की केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने पहल की। क्या ये गलत नहीं था और जब सरकार ने बात कर ली, सारे बात बाबा रामदेव के मान लिये, तो चुपके से आधी रात को जब सारे के सारे सत्याग्रही सोये थे, तो किस पुरुषार्थ को आधार बनाकर, वहां लाठियां चला दी, आंसू गैस के गोले छोड़ दिये, ये तो केन्द्र सरकार को अपनी बात जनता के समक्ष रखनी ही चाहिए, पर कांग्रेसी सरकार ऐसा करेगी, हमें नहीं लगता। क्योंकि महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान आत्माओं के सपनों का गला घोंटनेवाली इस निकम्मी और कायर सरकार से देश की ज्वलंत समस्याओं और विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन को, स्वदेश लाने की कल्पना करना बेमानी और मूर्खता है।
भले ही रामदेव में लाखों दुर्गुण हो, पर ईश्वर ने उससे इतना काम जरुर करा लिया हैं कि उसके द्वारा जनता को मैसेज जरुर गया हैं कि जनता जगे। खासकर विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन को लेकर। देश का पैसा, कांग्रेसियों और देश के करोड़ों भारतीयों के सपनों का गला घोटनेवाले कुछ चंद लोगों ने विदेशों में जमा कर रखा है। आज इसकी शुरुआत हुई हैं, ये आंदोलन और भड़केगा, हो सकता हैं कि कुछ वर्षों तक ये आंदोलन ढीला भी पड़ जाये, पर यकीन मानिये कि एक न एक दिन करोंड़ों भारतीयों का सपना पूरा होगा, और विदेशों में पड़ें चंद लोगों के काला धन भारत आयेगा और फिर इससे देश एक नये कीर्तिमान को गढ़ेगा, क्योंकि कोई भी घटना जब घटती हैं तो जब तक उसका परिणाम नहीं आ जाता, वह कालांतराल में विभिन्न रुप लेकर आपके सामने घटती रहती हैं, इसलिए विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन पर अब जनता ने करवट लिया हैं, इसका परिणाम जरुर निकलेगा।
बाबा रामदेव को भी चाहिए कि उनके पास जो अकूत संपति हैं, उस संपत्ति को भी देश के हवाले कर दें, ठीक वैसे ही जैसे कि कई संतों ने देशहित में अपने शरीर तक को त्याग दिया। गर रामदेव को उस संत का भान नहीं तो मैं बता देता हूं, उनका नाम था – दधीचि। वो इसलिये, कि आप खुद धन बनाने के चक्कर में विभिन्न स्थानों पर योगशिविर लगा रहे हो, और दूसरों से कह रहे हों कि विदेशी काला धन स्वदेश आये, ये दोहरा चरित्र है। ये भी चोरों के लक्षण है। क्योंकि कबीर की पंक्ति हैं-------------
साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय,
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय

पर पता नहीं आपको कितना धन चाहिए, कब आपकी धन कमाने की भूख मिटेगी, कब आप बड़बोले बनने से बचेंगे, हमें इसका कोई प्रत्य़क्ष प्रमाण नहीं दीखता और यहीं संत और असंत के विभेद का बहुत बड़ा कारण हैं।
पहले आप शत प्रतिशत संत बनिये, क्योंकि अभी आप संत नहीं, एक चालाक नागरिक हैं, जो बहुत ही चालाकी से, वो सब कुछ किये जा रहा, जिसका ज्ञान सामान्य जन को नहीं हैं, और जिस दिन ये सामान्य जन आपकी चालाकी को जान जायेगा, आप पूरी तरह से समाप्त हो जायेंगे, फिर आप दिल्ली में मजमा लगाने की कोशिश करेंगे भी तो लोग विश्वास नहीं करेंगे, जैसा कि आज देखने को मिला हैं। धन्यवाद।

Thursday, June 2, 2011

चला रामदेव हीरो बनने..........

अपने देश में एक रामदेव है, जिन्हें कई लोग बाबा रामदेव, योगगुरु रामदेव, संत रामदेव और पता नहीं क्या क्या, विभिन्न नामों से पुकारते है। ये स्वयं को क्रांतिदूत कहलाने में भी फक्र महसूस करते है। इन दिनों इनकी खूब चर्चा है और वो चर्चा है – विदेश में जमा भारतीय काले धन को, देश में लाने के नाम पर आंदोलन करने और आगामी 4 जून से देशव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन करने के ऐलान के कारण। इस ऐलान से सुना हैं कि देश की लोकतांत्रिक केन्द्र सरकार के मुखिया भी हिल गये है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें पत्र लिखकर, उनसे आमरण अनशन न करने की अपील की है। रामदेव ने भी, प्रधानमंत्री के इस मार्मिक अपील से वशीभूत होकर, प्रधानमंत्री पद को लोकपाल से मुक्त करने की बात कहीं है।
हम आपको बता दें कि देश में आज तक ऐसा कोई संत नहीं हुआ। जिसने बाबा रामदेव की तरह, प्लानिंग के तहत, ऐसा काम किया हो, जिसे पूरे संत समाज का सर झूक जाये। एक नहीं, अनेक संत, कितने का नाम लूं। गुरुनानक, रविदास, नामदेव, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, अगर नाम जूड़वाने लगे तो दस पेज, ऐसे संतों के नाम लिखवाने में खर्च हो जायेंगे, पर इतना मान लीजिये कि किसी योगी ने, इस प्रकार से भारत के विभिन्न शहरों में जाकर योग के नाम पर दुकानें नहीं खोली और न चलायी, जो इन्होंने किया है और इन दुकानों से इनकी चांदी भी हो रही है। एक तो रांची में ही संत योगानन्द जी का आश्रम है जो बताता हैं कि संत और संत की गरिमा क्या होती है।
आजकल सारे इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों में इनका महिमामंडन हो रहा हैं, जाहिर हैं कि इनके महिमामंडन होने से पूरे देश के लोगों की नजरें इन पर आ टिकी है। ( उन इलेक्ट्रानिक मीडिया और अखबारों के द्वारा महिमामंडन हो रहा हैं जो पिछले कई वर्षों से आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित साईबाबा के खिलाफ खूब विषवमन करते थे, अनाप शनाप दिखाया करते थे, पर जैसे ही उनका स्वर्गवास हो गया, उनका यशोगान करना शुरु कर दिया, और लगे हाथों अपनी गलतियां सुधारने लगे, साई बाबा से संबंधित सकारात्मक खबरों को दिखाने लगे। यहीं नहीं ये वे इळेक्ट्रानिक मीडिया, उनकी जय – जयकार कर रहे हैं, जो पैसे लेकर कभी – कभी दो नंबर के संतों को, विज्ञापन के रुप में प्रोजेक्ट कर, उन्हें महान संतों की श्रेणी में लाने का कुत्सित प्रयास करते हैं) खैर, शेर की खाल में जब भेड़िये होंगे तो समाज और देश का क्या होगा, जगजाहिर है।
फिलहाल केन्द्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है और इस सरकार के मुखिया, यूपीए गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा उपकृत और मनोनीत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह है, ये वे ही करते है जो उन्हें कहा जाता है। इसलिए बेचारे के बारे में मैं क्या बोलूं......। फिलहाल इन्हें किसी ने कह दिया होगा कि रामदेव के भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से सरकार की सेहत पर असर पड़ेगा, उन्होंने रामदेव के आगे अपनी झोली फैला दी। बेचारे रामदेव कहां चुप रहनेवाले थे, संत हैं और संत तो कुछ न कुछ देते हैं, कह दिया कि प्रधानमंत्री सम्मानित और गरिमा वाला पद हैं, इसलिए इस पद को लोकपाल से मुक्त रखना चाहिए, पर ये भी कह दिया कि वे आमरण अनशन के निर्णय पर अडिग हैं।
ये निर्णय का ऐलान करना उऩ्हें जरुरी भी था क्योंकि सारी मीडिया, वो प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक सभी बिना विज्ञापन के उनकी जयजयकार करने, उन्हें महानायक बनाने पर तुली हो तो क्यों न इसका पूरा पूरा लाभ उठा लिया जाय, क्योंकि ये ही वो मीडिया हैं, जिसने बिना किसी विज्ञापन के अन्ना हजारे को हीरो बना दिया था और सरकार झूक गयी थी तो वो तो रामदेव है। इस देश में कई भ्रष्टाचार में लिप्त और सरकार को करोड़ों का चूना लगानेवाले उदयोगपति और राजनीतिज्ञ उनके चेले हैं, जिनकी कृपा से उन्होंने खुद इतना धन इकट्ठा कर लिया हैं कि उतनी संपत्ति देश में शायद ही, किसी तथाकथित संत के पास होगी।
हमारे विचार से संत का शाब्दिक अर्थ हैं --- स+अन्त यानि जो समस्याओं का अंत करें, वो संत। जो समस्याओँ को बढ़ा दे। वो संत कैसे हो सकता हैं। भ्रष्टाचार और देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में सत्याग्रह और आमरण अनशन का विशेष महत्व था। अंग्रेजी सरकार, इससे झूकती थी, क्योंकि एक बहुत बड़ा चरित्रवानों का समूह इन आंदोलन के पीछे रहता था, पर आज की जो स्थिति हैं, उसे देखकर हमें हंसी आती है। हमनें बाल्यकाल से लेकर अभी तक कई पुस्तकें पढ़ी हैं, सभी में सत्याग्रह और आमरण अनशन का जिक्र है, गांधी का सत्याग्रह तो अनुरकरणीय है। गांधी ने कह दिया कि फलां तारीख से वे सत्याग्रह पर है और सत्याग्रह शुरु। न किसी पंडाल की जरुरत और न किसी से उनके साथ रहने का आग्रह और न ये ढिंढोरा पिटवाने की जरुरत कि वे आंदोलन पर जा रहे हैं, पर जरा आज देखिये क्या हो रहा है ----------
रामदेव के इस तथाकथित आंदोलन पर नजर डालिये। एक अखबार ने लिखा हैं कि
दिल्ली के रामलीला मैदान में ढाई लाख वर्ग फुट का पंडाल बन रहा हैं, उस पंडाल में मच्छड़ न रहे, इसके लिए फोगिंग मशीन लगायी गयी है। एक लाख आरओ वाटर का इंतजाम किया गया हैं। 1000 शौचालय बनाये जा रहे है। 40 बेड का वातानूकूल आईसीयू, 3000 वर्ग फुट का चार मंच बनाया जा रहा है। इनकी सुरक्षा में 500 दिल्ली पुलिस के जवान लगाये जा रहे हैं। पांच बड़े एलसीडी स्क्रीन लगेंगे। यानी पूरे आंदोलन को हाईटेक करने की कोशिश की जा रही है। यानी भ्रष्टाचार रोकने के लिए, कालेधन को देश लाने के लिए, ये सब किया जा रहा है, वो भी कोई रामदेव के द्वारा।
जब मैं ईटीवी में था। तब धनबाद में मुझे ईटीवी में सेवा देने का मौका मिला। उस दरम्यान, ये रामदेव, धनबाद आये थे। और वहां के चनचनी कालोनी में एक बहुत बड़े धनाढ्य के घर में उनका प्रवास हुआ था। बड़े – बड़े उद्योगपतियों जो पांच लाख रुपये दे सकते थे, आराम से मिलते, उनके आश्रम को पैसे देने के लिए जीजान से जूटते वो भी उनके साथ खूब गप्पे लड़ाते, आनन्दित होते। एक दिन प्रेस काँफ्रेस हुआ था, उसी चनचनी कालोनी में, उसी धनाढ्य के घर में, मैं भी गया था, देखा कि सारे पत्रकार, उनके साथ फोटो खिचाने के लिए बेताब थे, जैसे कि गर उनके साथ फोटों नहीं खिचाया तो जीवन ही बर्बाद हो जायेगा, ऐसी स्थिति थी। पर मैं इन सबसे अलग रहता हूं क्योंकि पता नहीं क्यूं। घर के हालात या माता पिता द्वारा दिया गया संस्कार अथवा वो श्लोक जो बार बार मेरे कान में गूंजते हैं – अधमा धनं इच्छन्ति, धनं मानं च मध्यमा, उत्तमा मानं इच्छन्ति, मानो हि महता धनम्।। रामदेव मुझे प्रभावित नहीं कर सकें। क्योंकि मैंने कई संतों के बारें में पढ़ा हैं, जिन्होंने धन के पीछे, यश के पीछे भागा नहीं, वे तो निरंतर, मानव निर्माण में लगे रहते हैं, क्योंकि मानव निर्माण हो गया तो फिर समाज और देश बनने बनाने में कितना समय लगेगा। पर यहां तो एक संत द्वारा एक ऐसे पेड़ बोने की कोशिश की जा रही हैं, जिससे सदाचार फैले, पर उस सदाचार वृक्ष को रोपने में जड़ में पानी न देकर, उसके शिखाओं पर पानी देने की कोशिश हो रही हैं और इस कोशिश में सभी प्रयास कर रहे हैं। कोई गांव-शहर में जाकर मानव निर्माण का कार्य, संस्कार व चरित्र निर्माण का कार्य नहीं कर रहा। सभी पतली गली से राजनीतिक सफर तैयार करने में लगे हैं, एक देख रहा हैं कि जब योग के झांसे से पूरा देश उसके साथ हो गया और भ्रष्टाचार के नारे सें पूरी दिल्ली हिल गयी तो फिर प्रधानमंत्री का पद कितना दूर हैं। दूसरा देख रहा हैं कि बंदूक की गोली से सत्ता हथियाने में अब ज्यादा दूर हैं कहां, कई बुद्दिजीवी प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से उन्हें समर्थन दे ही रहे हैं तो फिर दिक्कत कहां हैं, इस नाहक कमजोर केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकने में कहां दिक्कत हैं, मौका मिलते ही, उखाड़ फेंकेंगे और भारत के गर्दन को जब चाहे, जब तोड़ मरोड़ देंगे और चीन के हाथों सौंप देंगे। दिक्कत कहां हैं।
कमाल है, जिस सरकार को जनता चुनती है, वो सरकार का मुखिया, एक योग के नाम पर झांसा देनेवाले के आगे झूकता हैं, चार – चार मंत्रियों को दिल्ली एयरपोर्ट भेज देता हैं, जैसे कि किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष, उससे मिलने आ रहा हो। उस प्रधानमंत्री से देश के विकास और सम्मान की आशा की जा सकती हैं। इस देश में लोकतंत्र हैं या तथाकथितयोगतंत्र। हमें तो लगता हैं कि इस देश की कोई मर्यादा ही नहीं और न ही कोई गरिमा है। सभी अपने अपने ढंग से इस देश का सत्यानाश करने में लगे है। भ्रष्टाचार क्या कोई बकरी का बच्चा है, दौड़ा और पकड़ लिया, क्या रामदेव में हैं ताकत कि वे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा दें। अगर नहीं तो इस प्रकार का नाटक क्यो, इससे किसका फायदा होगा और किसका नुकसान। ये तो योग के नाम पर झांसा देनेवाले रामदेव को तब पता चलेगा जब वे मृत्युशैय्या पर पड़ें होंगे, क्योंकि वे सब को धोखा दे सकते हैं, अपनी आत्मा को नहीं।
ऐसे भी इस देश का कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा, जो विदेशों में पड़े अपने देश के काले धन को लाना नहीं चाहेगा, कौन ऐसा चरित्रवान व्यक्ति होगा जो भ्रष्टाचार मुक्त भारत नहीं चाहेगा, पर इस देश में चरित्रवानों की संख्या कितनी हैं, इनकी संख्या तो देश में विलुप्त होते सिंह की तरह हो गयी हैं, जरुरत हैं, इन चरित्रवानों की संख्या में वृद्धि कराने की, जैसे ही इनकी संख्या बढ़ेगी, भ्रष्टाचार रुपी दावानल खुद ब खुद समाप्त हो जायेगा, फिर किसी तथाकथित रामदेव को, दिल्ली के रामलीला मैदान में करोड़ों खर्च कर, इस प्रकार की झूठी आंदोलन करने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी।