Showing posts with label कोंग्रेस. Show all posts
Showing posts with label कोंग्रेस. Show all posts

Tuesday, June 7, 2011

ऐसी हरकतें सिर्फ कांग्रेसी ही कर सकते हैं............

संदर्भ --- बाबा रामदेव प्रकरण
सारा देश जानता हैं कि विदेशों में जो काला धन है, वो काला धन किस पार्टी का है और उस काला धन को संरक्षित करने में कौन सी सरकार ज्यादा दिमाग लगाती है। ऐसे में उस काला धन के खिलाफ जो भी आवाज उठायेगा, उसका हश्र क्या होगा। वो बाबा रामदेव के साथ जो आज आधी रात को कांग्रेसी सरकार ने किया, उससे सभी को सीख लेनी चाहिए। आप गुंडों और अपराधियों के घर के पास जाकर, कहो कि तुम गुंडे और अपराधी हो, ऐसे में वो गुंडा या अपराधी, गांधीवादी तो हैं नहीं कि आपको मिठाई खिलाकर अथवा फूल मालाओं से लादकर विदा करेगा, अरे वो तो वो कुटाई करेगा कि आप जिंदगी भर याद रखेंगे। वहीं कुटाई कांग्रंसियों और उसकी सरकार ने रामदेव के साथ कर दी, तो इसमें आश्चर्य कैसा, ये तो होना ही था, ये तो कांग्रेस का चरित्र ही है। जब भी देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठी, उस भ्रष्टाचार के खिलाफ उठनेवाली आवाज को कांग्रेंसियों ने बखूबी बंद किया। क्योंकि ये सशरीर भ्रष्टाचार रुपी नदीं में प्रतिदिन डुबकी लगाते हैं, नहीं तो जरा इनसे पूछो कि इनके पास जो ज्यामितीय प्रणाली से धन बढ़ते हैं, उसका राज क्या हैं।
कांग्रेसियों के घटियास्तर के चरित्र से देश को कितना नुकसान हो रहा हैं, उससे इन्हें क्या मतलब, ये तो देश भाड़ में जाय, खुद अरबों की संपत्ति इकट्ठा कर परम सुख पाते हुए, इस दुनिया से चल जाना चाहते हैं, ये कहकर की देश की आजादी हमारे लोगों ने लड़कर दिलायी हैं तो इसका फायदा, ब्याज सहित प्राप्त करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार हैं, जो इसका विरोध करेगा, वो झेलेगा।
बाबा रामदेव पर हमले कराना, बाबा रामदेव के आंदोलन व आमरण अनशन की धार को कुंद करने के लिए जनार्दन व्दिवेदी के प्रेस कांफ्रेस में एक सुनियोजित साजिश के तहत एक व्यक्ति द्वारा जनार्दन पर जूते फेंकने का नाटक करवाना, और इस घटना के लिए भाजपा और आरएसएस को दोषी ठहराना और इसके बाद रामदेव के चल रहे आमरण अनशन से देश और मीडिया का ध्यान बटवाना, इऩका बाये हाथ का खेल है। आजादी के बाद से लेकर, ये तो यहीं सब किये हैं। दिल्ली के मीडिया में, हैं किसी की हिम्मत जो कांग्रेसियों के इस चरित्र को नंगा करके दिखायें, जो उसके खिलाफ बोलेगा, कांग्रेसी साम दाम दंड भेद के द्वारा उसकी बोलती बंद करेंगे। यहीं कारण हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार के नाम पर जितने भी आंदोलन हुए, उसका फलाफल य़े हैं कि मीडिया कांग्रेसी नेताओं के तलवे चाटने में ही ज्यादा रुचि दिखायी, उसका सुंदर उदाहरण लोकनायक जयप्रकाश आंदोलन के बाद की इंदिरा की राजनीति है। मैं ये नहीं कहता कि देश के सभी मीडिया हाउस और पत्रकार कांग्रेसियों के हाथों के कठपुतलियां हैं, पर इतना जरुर कह सकता हूं कि ज्यादातर ऐसे ही हैं।
कांग्रेस में एक नेता है – दिग्विजय सिंह, उसे मध्यप्रदेश की जनता ने जब से मुख्यमंत्री पद से हटाया, वो पागल सा हो गया है। उसका पागलपन इसी से सिद्ध होता है कि वह लादेन के लिए, सम्मानजनक सूचक शब्द का प्रयोग करता हैं, और बाबा रामदेव को महाठग करार देता है। मुख्यमंत्री पद खोने के बाद, उसे आरएसएस और भाजपा के भूत दिन-रात, सुबह-शाम दिखाई पड़ते हैं, उसका वश चले तो ये भी कह दें कि ओसामा बिन लादेन को मारने में भाजपा और आरएसएस का ही हाथ हैं, वो कुछ भी कह सकता हैं और ऐसे पागलों को कभी कभी कांग्रेसी, उनका व्यक्तिगत बयान मानकर पिंड भी छुड़ा लेते हैं, पर जब सोनिया माता पर बन आती है, और सोनिया माता के पक्ष में जब इसका बयान कांग्रेसियों को लगता हैं कि सही है तो इसकी लंगोटी को पकड़ने के लिए, सभी कांग्रेसी राग यमन गाने लगते है। ये हैं कांग्रेसियों का चरित्र। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि देश में लोकतंत्र को गर खतरा है तो इन कांग्रेसियों से। इन्होंने देश का सत्यानाश करने का ठेका ले रखा है और इसके खिलाफ एक जोरदार आंदोलन की जरुरत है और वो आंदोलन एक दिन अवश्य होगा। कांग्रेसियों को हिन्द महासागर में फेंकने के लिए एक और लोकनायक को जन्मलेना होगा।
ऐसे मैं बता दूं कि रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु किये गये आंदोलन अथवा विदेशों में पड़े भारतीयों के कालेधन को भारत लाने की मांग का मैं भी समर्थक हूं, पर उनके आंदोलन की कड़ी आलोचना करने में मैं पीछे नहीं हटता, क्योंकि वे खुद अपने को संत बताते हैं, योगगुरु बताते हैं पर शायद उन्हें पता नहीं कि संतों अथवा योगगुरु का काम, आंदोलन करना नहीं, बल्कि आंदोलन करवाना है। चाणक्य खुद लड़ा नहीं, बल्कि चंद्रगुप्त को पैदा कर वो काम करा लिया, जो वो चाहता था। महर्षि विश्वामित्र चाहते तो, खुद सुबाहु मारीच और ताड़का को मार सकते थे पर उन्होंने ऐसा किया नहीं, बल्कि उन्होंने दशरथ पुत्र राम और लक्ष्मण को इसका श्रेय दिया। पर रामदेव तो संत हैं नहीं कि उन्हें इसका भान हो अथवा कोई उऩ्हें बता दें कि ऐसा करें और वो मान ले। वो तो शत प्रतिशत उदयोगपति और राजनीतिज्ञ है, और जैसा कि एक उदयोगपति अपना उद्योग लगाने के लिए अथवा राजनीतिज्ञ अपनी राजनीति चमकाने के लिए तेला – बेला करता हैं, वो भी कर रहे हैं, ऐसे भी इसमें गलती क्या हैं, सबको अपने अपने ढंग से जीने का अधिकार हैं, बाबा को सबको मूर्ख बनाने और अपना जय जयकार कराने में मजा आता हैं, और उनके अनुयायियों को भी मूर्ख बनने में परम आनन्द की प्राप्ति होती हैं तो गलत क्या हैं। खैर, हम इस पचड़ें में पड़ना भी नहीं चाहते।
पहले आंदोलन की बात ----------------
क्या ये सही नहीं कि बाबा रामदेव ने दिल्ली प्रशासन से झूठ बोला कि वो दिल्ली के रामलीला मैंदान में योग शिविर लगायेंगे और योग शिविर के नाम पर लगे हाथों सत्याग्रह और आमरण अनशन की धमकी दे डाली। क्या ये रामदेव के दोहरे चरित्र का भान नहीं कराता। जो संत अपने समर्थकों को दिल्ली में बुला लें और चुपके से दिल्ली की केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ बैठक कर अपने आंदोलन पर डील कर लें, फिर डील तोड़ने का नाटक करें और अपने समर्थकों को फिर आंदोलन के नाम पर भड़काने का काम करें, क्या ये एक संत का चरित्र हो सकता हैं और इस प्रकार के लोगों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन क्या मूर्तरुप ले सकते हैं। उत्तर होगा – कभी नहीं। आप ऐसा कर, भीड़ इक्ट्ठी कर सकते हैं, पर एक सफल आंदोलन नहीं कर सकते, क्योंकि आपके आंदोलन में ही खोट हैं। विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन पर चलाये गये बाबा रामदेव के इस आंदोलन से, बाबा रामदेव के असली चरित्र का भान शायद भारतवासियों को हो चुका हैं, और जो कुछ बचा हैं, वो धीरे – धीरे इनके द्वारा कालांतराल में जब कभी आंदोलन चलाया जायेगा, लोग पूरी तरह से जान लेंगे।
कुछ बातें कांग्रेसियों से ----------------
जब बाबा रामदेव का आंदोलन, गलत था। रामदेव और उनके समर्थक गैर कानूनी ढंग से आंदोलन स्थल पर आ डटे, तब उनसे किस आधार पर बात करने की केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने पहल की। क्या ये गलत नहीं था और जब सरकार ने बात कर ली, सारे बात बाबा रामदेव के मान लिये, तो चुपके से आधी रात को जब सारे के सारे सत्याग्रही सोये थे, तो किस पुरुषार्थ को आधार बनाकर, वहां लाठियां चला दी, आंसू गैस के गोले छोड़ दिये, ये तो केन्द्र सरकार को अपनी बात जनता के समक्ष रखनी ही चाहिए, पर कांग्रेसी सरकार ऐसा करेगी, हमें नहीं लगता। क्योंकि महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री जैसे महान आत्माओं के सपनों का गला घोंटनेवाली इस निकम्मी और कायर सरकार से देश की ज्वलंत समस्याओं और विदेश में पड़े भारतीयों के काले धन को, स्वदेश लाने की कल्पना करना बेमानी और मूर्खता है।
भले ही रामदेव में लाखों दुर्गुण हो, पर ईश्वर ने उससे इतना काम जरुर करा लिया हैं कि उसके द्वारा जनता को मैसेज जरुर गया हैं कि जनता जगे। खासकर विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन को लेकर। देश का पैसा, कांग्रेसियों और देश के करोड़ों भारतीयों के सपनों का गला घोटनेवाले कुछ चंद लोगों ने विदेशों में जमा कर रखा है। आज इसकी शुरुआत हुई हैं, ये आंदोलन और भड़केगा, हो सकता हैं कि कुछ वर्षों तक ये आंदोलन ढीला भी पड़ जाये, पर यकीन मानिये कि एक न एक दिन करोंड़ों भारतीयों का सपना पूरा होगा, और विदेशों में पड़ें चंद लोगों के काला धन भारत आयेगा और फिर इससे देश एक नये कीर्तिमान को गढ़ेगा, क्योंकि कोई भी घटना जब घटती हैं तो जब तक उसका परिणाम नहीं आ जाता, वह कालांतराल में विभिन्न रुप लेकर आपके सामने घटती रहती हैं, इसलिए विदेशों में पड़े भारतीयों के काले धन पर अब जनता ने करवट लिया हैं, इसका परिणाम जरुर निकलेगा।
बाबा रामदेव को भी चाहिए कि उनके पास जो अकूत संपति हैं, उस संपत्ति को भी देश के हवाले कर दें, ठीक वैसे ही जैसे कि कई संतों ने देशहित में अपने शरीर तक को त्याग दिया। गर रामदेव को उस संत का भान नहीं तो मैं बता देता हूं, उनका नाम था – दधीचि। वो इसलिये, कि आप खुद धन बनाने के चक्कर में विभिन्न स्थानों पर योगशिविर लगा रहे हो, और दूसरों से कह रहे हों कि विदेशी काला धन स्वदेश आये, ये दोहरा चरित्र है। ये भी चोरों के लक्षण है। क्योंकि कबीर की पंक्ति हैं-------------
साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय,
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय

पर पता नहीं आपको कितना धन चाहिए, कब आपकी धन कमाने की भूख मिटेगी, कब आप बड़बोले बनने से बचेंगे, हमें इसका कोई प्रत्य़क्ष प्रमाण नहीं दीखता और यहीं संत और असंत के विभेद का बहुत बड़ा कारण हैं।
पहले आप शत प्रतिशत संत बनिये, क्योंकि अभी आप संत नहीं, एक चालाक नागरिक हैं, जो बहुत ही चालाकी से, वो सब कुछ किये जा रहा, जिसका ज्ञान सामान्य जन को नहीं हैं, और जिस दिन ये सामान्य जन आपकी चालाकी को जान जायेगा, आप पूरी तरह से समाप्त हो जायेंगे, फिर आप दिल्ली में मजमा लगाने की कोशिश करेंगे भी तो लोग विश्वास नहीं करेंगे, जैसा कि आज देखने को मिला हैं। धन्यवाद।

Thursday, November 25, 2010

चेते लालू, नहीं तो कहीं के नहीं रहेंगे।

रहस्यमय जनादेश बिहार का....!

ये जनादेश बता रही है, कि इस जनादेश में नीतीश की जीत कम एवं लालू, रामविलास और कांग्रेस की करारी हार ज्यादा हैं। गर इस जनादेश के माध्यम से भी लालू, रामविलास और कांग्रेस के राहुल नहीं चेते, तो ये सब आनेवाले समय में कम से कम बिहार में तो समाप्त ही हो जायेंगे। और बिहार से समाप्त होने का मतलब आनेवाले समय में देश की संपूर्ण राजनीति से भी समाप्त हो जाना हैं, ये बातें इन्हें नहीं भूलना चाहिए।
सबसे पहले लालू की बात ----
लालू जी ने जब 1990 में बिहार की पहली बार सत्ता संभाली तो ये सत्ता मिलते ही ऐसे बौराये कि पूछिये मत। अजब गजब के निर्णय, हर किसी को गाली और अपने आगे किसी को नहीं लगाना, मसखरी करना, खुद के लिए लालू चालीसा लिखवाना, अपनी गुणगान कराना इनके रोज का शौक बन गया। मैं, उस लालू की बात कर रहा हूं, जिस लालू के बारे में उस वक्त बिहार की जनता एक भी शब्द नहीं सुनना चाहती थी, और गर किसी ने भूल से भी लालू के बारे में बोला तो उसके बुखार छुड़ा देती थी। यानी इतना शक्तिशाली बिहार का नायक लालू, आज श्रीहीन हैं, आज का लालू सत्ता तो दूर एक एक सीट के लिए तरस रहा है और जनता उसके बारे में कुछ बात करने से भी परहेज करती हैं। शायद उस वक्त सत्ता के मद में लालू प्रसाद श्रीरामचरितमानस की चौपाई वो भूल गये थे कि
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें।।
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहु धन खल इतराई।।
फिर भी लालू अब सुधरेंगे, कल सुधरेंगे, ऐसा मानते हुए यहां की जनता ने एक नहीं तीन – तीन बार सत्ता सौंपा, पर बिहार की जनता को मिला क्या। इस व्यक्ति ने सत्ता प्राप्त कर ऐसा चक्कर चलाया कि इसी चक्कर में, इनका पूरा परिवार और ससुराल सत्ता का सुख भोगा, पन्द्रह वर्षों तक ये बिहार का भाग्य विधाता, अपने परिवार का भाग्य विधाता बनकर, सत्ता का परमसुख लेता रहा और बिहार की जनता गरीबी के बोझ तले, इधर से उधर भटकती रही, इसी दरम्यान देश के कुछ प्रांतों के लोग बिहारियों को हीन नजरों से देखकर उस पर लात घूंसों का बौछार करने से नहीं चूके। कमाल हैं बिहारी दूसरे प्रांतों में लात जूते खा रहे थे और इधर इनका ज्यादा समय पटना के गांधी मैदान में जातीयता रैली करने, और उसकी अध्यक्षता करने में जाता, यहीं नहीं गरीब रैला, लाठी पिलावन रैला, तेल पिलावन रैला, यहीं करके खुद को आनन्दित करने में यह व्यक्ति मजा लेता रहा और लोग अपने आप को कोसते रहते। यहीं नहीं इस व्यक्ति को विदेश जाने का भी मौका मिला तब विदेश में भी उसने अपने हाव भाव से बिहार के लोगों की वो तस्वीर पेश की, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम हैं। कमाल हैं बिहार की राजनीति में आज तक कोई ऐसा व्यक्ति अथवा राजनीतिज्ञ नहीं हुआ, जिसने सत्ता के मद में आकर, अपने परिवार और ससुरालवालों की इतनी आवभगत की हो या मसखरी करते हुए खुद सत्ता में नहीं है, तो अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया हो। क्या इन्हें बिहार की जनता ने इसीलिए सत्ता सौंपी थी।
बिहार को किसी भी कीमत पर नहीं बांटने की बात करनेवाले इस व्यक्ति को जैसे ही बिहार में कम सीटें मिली, इसने बिहार को बांटने का सहर्ष निर्णय ले लिया। कभी इसने कहा कि ये शाकाहारी हो गये, और कभी कहा कि भगवान उनके सपने में आये और कहा कि मांसाहारी हो जा, और वे मांसाहारी हो गये।
इस व्यक्ति के शासनकाल में महिलाएं, रात तो दूर, सायंकाल में घर से निकलना पसंद नहीं करती थी। अपहरण उद्योग तो इनके शासनकाल में ऐसा फैला कि पूछिये मत और भ्रष्टाचार का तो कहना ही नहीं। इस भ्रष्टाचार में तो खुद ऐसे पारंगत हैं कि इन्हें इसकी पाठशाला खोल देनी चाहिए ताकि लोग भ्रष्टाचार का प्रशिक्षण लेकर, देश का सत्यानाश कर सके। ये वो व्यक्ति हैं जो कहता हैं कि वो संपूर्ण क्रांति के आंदोलन का प्रोडक्ट है गर ऐसा व्यक्ति संपूर्ण क्रांति के आंदोलन का प्रोडक्ट हैं तो मुझे उस संपूर्ण क्रांति आंदोलन पर ही शक हो जाता है। पर लोकनायक जयप्रकाश के आंदोलन पर शक मैं सपने में भी नहीं कर सकता, क्योंकि इसी आंदोलन के प्रोडक्ट कई ऐसे लोग मिले हैं, जो सचमुच में संपूर्ण क्रांति के भाव को जन जन तक पहुंचा रहे हैं। याद करिये, लालू प्रसाद को, कभी ये खुद को किंग मेकर कहा करते थे, पर एक मामूली रेल मंत्रालय लेने के लिए ऐसा जिच किये कि सोनिया ने मनमोहन सिंह से कहा कि लालू को रेल वे दे दें ताकि ये रेल से खेल सकें, जैसा कि एक छोटा सा बच्चा अपनी मां से रेलरुपी खिलौने लेने की जिद कर बैठता हैं। क्या एक किंग मेकर, खुद के लिए ऐसा जिच कर सकता हैं और जो ऐसा जिच करता हैं वो कभी किंग मेकर हो सकता हैं। किंग मेकर क्या होता हैं, लालू को कम से कम सोनिया गांधी से सीखना चाहिए, पर इन्हें मसखरी करने से फुर्सत हो तब न, कुछ सीखेंगे। हर बार ये कहना कि उन्होंने गरीबों, मजलूमों को आवाज दी, जैसे लगता है कि गर ये न होते तो कभी गरीबों और मजलूमों को आवाज ही नहीं मिलती। जरा लालू जी जाकर उन गांवों में देखे कि उनके नाम पर, उनकी जाति के लोगों ने किस प्रकार से आंतक मचा कर लोगों को जीना मुहाल कर दिया, कैसे अल्पसंख्यकों की कब्रिस्तान की जमीन तक इनके लोगों ने कब्जा कर लिया है। आज ही एक चैनल ने दिखाया कि एक पटना के रिक्शेवाले ने कैसे अपनी दुख भरी कहानी सुना दी कि लालू के शासनकाल में जब वो रिक्शावाला सुबह से शाम तक रिक्शे खींचता, पैसे कमाता तो उसके पैसे को अपराधी कैसे, घर जाने के क्रम में लूट लिया करते, पर नीतीश के शासन में अब उसके साथ ऐसा नहीं होता। क्या रिक्शावाला का ये बयां, लालू के दिमाग में नहीं घूसता। कि वो क्या कहना चाहता है।
आज जब एनडीए को तीन चौथाई बहुमत मिला है, तो इस बहुमत को भी नहीं पचाना और इस पर ये टिप्पणी करना कि इसमें रहस्य हैं, ये लालू प्रसाद जैसे लोग ही बयान दे सकते हैं, जबकि दूसरे नेता तो ऐसे मौके पर अपने प्रतिद्वंदियों के घर जाकर, उसे अपनी शुभकामना देते है पर लालू प्रसाद से ऐसी परिकल्पना मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं।
जरा रामविलास पासवान को देखिये कल तक मुख्यमंत्री मुस्लिम हो, इसकी बात करनेवाला ये शख्स ऐन मौके पर ये बयान ही भूल गया और चल पड़ा अपने परिवार को मजबूत करने के लिए। कल तक कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगानेवाले ये दोनो शख्स खुद ही परिवार के आगे कुछ सोचना भी नहीं चाहता, क्या ऐसे लोगों को बिहार की जनता से वोट मांगने का हक भी हैं, और जब जनता ने अपना फैसला सुना दिया तो उस फैसले पर रहस्य पैदा करनेवाले ये कौन होते हैं। क्या ऐसा कहकर वे जनता का अपमान नहीं कर रहे।
रही बात राहुल की तो उन्हें ये जान लेना चाहिए कि ये उत्तर प्रदेश अथवा महाराष्ट्र नहीं हैं कि उनका जादू चल जायेगा, ये खांटी कर्मयोगियों की भूमि हैं, बिहार हैं, यहां एक्टिंग नहीं चलती, यहां के लोगों को जमीन से जूड़ा हुआ नेता चाहिए, इसलिए पहले वे बिहार के बारे में जानें, तब बिहार में आकर बात करें। कल तक विदेश में अपना सारा समय गंवानेवाले राहुल बिहार को क्या जानेंगे। ऐसे भी कहावत हैं, बांझ का जाने प्रसव का पीड़ा। बिहार और बिहार के लोगों की पीड़ा राहुल क्या जानेंगे। कम समय में जिस प्रकार से उन्होंने बिहार में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी चाही और जो करतब दिखायें, वो तो बिहारवासियों ने जनादेश के माध्यम से उन्हें बता दिया। शायद राहुल समझ लिये थे कि बिहार के लोग लालू जैसे होते हैं, और जैसे लालू को उन्होंने अपने कब्जें में कर लिय़ा, उसी प्रकार बिहार के लोगों के मतों पर भी कब्जा कर लेंगे, तभी तो उन्होंने साधु यादव, पप्पू यादव की पत्नी और आनन्द मोहन की पत्नी को कांग्रेस से टिकट देकर, अपनी बुद्धिमता का परिचय दे दिया और जब जनता की बारी आयी तो जनता ने इनकी सारी बुद्धिमता पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया, ये कहकर कि उन्हें न तो लालू चाहिए और न ही लालू के पदचिन्हों पर चलनेवाले पूर्व के नेता अथवा उनकी पत्नियों से उपकृत होनेवाली पार्टी।
जनता ने पहली बार, ऐसा जनादेश दिया हैं कि लोगों को बिहारी होने पर गर्व महसूस हो रहा हैं। सारे के सारे जातीय समीकरण ही ध्वस्त हो गये। नेताओं की पत्नियां और उनके परिवार के अन्य लोग हार का मुंह देखे हैं। चारों और एक ही बात की चर्चा का, हमें विकास चाहिए, बिहार का स्वाभिमान चाहिए और जो बिहार का स्वाभिमान लौटायेगा, हम उसके साथ होंगे। हम ऐसा नहीं मानते कि नीतीश ने पूरे बिहार में क्रांति ला दी हैं, पर इतना तो जरुर हैं कि नीतीश के शासनकाल में कानून व्यवस्था ठीक हुई हैं, महिलाओं को उनका अधिकार मिला हैं, लड़कियों में कोई भेदभाव नहीं हुआ हैं, चाहे वो कोई हो, माध्यमिक शिक्षा से जूड़ी बालिकाओं को साईकिल थमा दी गयी कि वे इससे जहां जाये, जायें, लेकिन पढ़े। सड़कों और आधारभूत संरचनाओं को ठीक किया। अपराधी चाहे वे किसी भी पार्टी के हो, उन्हें जेल का रास्ता दिखाया। लोगों में विश्वास जगाया कि हां राज्य में कोई शासन हैं, पर पहले के पन्द्रह सालों में कहीं कुछ दिखा ही नहीं। लालू के पन्द्रह सालों में तो अखबारों और मीडिया में लालू और लालू से संबंधित ही चीजें दिखाई पड़ती थी, चाहे वो लालू के जानवर ही क्यूं न हो, पर आज वैसी बातें नहीं दिखाई देती। आज बिहार और बिहार का युवा, कहता हैं कि वो मसखरे के राज्य का नहीं हैं, बल्कि सपने देखनेवाले राज्य का युवा हैं, जो अन्य राज्यों की तरह विकास के पथ पर चल पड़ा हैं। लेकिन नीतीश के लिए भी कुछ बातें, उन्हें भी जवाब देना होगा, ऐसा नहीं कि उनकी गलतियों पर जनता का ध्यान नहीं हैं, उन्होंने किस प्रकार इस चुनाव में मीडिया मैनेजमेंट किया और अपनी गुणगान करायीं, ये भी किसी से छुपा नहीं हैं, उदाहरण अनेक हैं, पर इतना तो तय हैं कि नीतीश के गुनाह, फिलहाल लालू, रामविलास और राहुल के गुनाहों से बहुत ही कम हैं। शायद यहीं कारण हैं कि गुनाहगारों में जो कम गुनाहगार था, जनता ने उसे अपना बहुमत दे दिया कि वो पांच साल तक, एक बेहतर बिहार बनाने की दिशा में काम करें, रही बात भाजपा की, तो वो नीतीश के पीछे पीछे चलते रहे, कुछ न कुछ, उसको इसका लाभ मिलता ही रहेगा। क्योंकि भाजपा, कांग्रेस के पदचिन्हों पर चल रही हैं, गर ये सुधर गयी तो ठीक है, नहीं तो इसका भी कांग्रेस जैसा हाल होना तय है।