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Saturday, January 7, 2017

भला हाथी भी कहीं उड़ता है.......

ये हाथी कभी नहीं उड़ेगा, चाहे धौनी जितना भी उड़ाने का प्रचार क्यों न कर लें... धौनी चाहे जिस भी मिट्टी के बने हो, पर हमारा हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की महक के रुप में जाना जानेवाला झारखण्ड अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं जानता और न ही ऐसे सपने देखता है, जो सपने कभी पूरे ही न हो...
झारखण्ड बढ़ेगा, अवश्य बढ़ेगा पर पंखों वाला हाथी से नहीं, बल्कि झारखण्ड के करोड़ों मेहनतकश-मजदूरों और उनके मजबूत इरादों और बुलंद हौसलों से... न कि परछाइयों के शहरों में रहनेवालों से...
धौनी कल क्रिकेट खेलते थे, बाद में विज्ञापनों से खेलने लगे, एक मोटरसाइकिल का प्रचार करते थे, कहते थे मैं तो दूध पीता हूं, ये तो कुछ भी नहीं पीता, फिर भी दौड़ता रहता है... बाद में हमारे धौनी दारु का भी प्रचार करने लगे, उस दारु का, जिसका प्रचार आज तक क्रिकेट के भगवान माने जानेवाले भारत रत्न सचिन तेंदुलकर ने नहीं किया...
ऐसे धौनी को राज्य सरकार ने मोमेंटम झारखण्ड का ब्रांड एंबेसडर बनाया है, इसका फायदा राज्य सरकार को कितना मिलेगा, ये तो वक्त बतायेगा, पर राज्य को नुकसान होना तय है... हम तो एक ही बात जानते है, कि गांधी ने ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना की थी... बार-बार गांधी की बात करनेवाली सरकार, उनके 150 वीं जयंती पर स्वच्छता अभियान की बात करनेवाली सरकार, उनके मूल वक्तव्य ग्राम स्वराज्य से भटक रही है और जिन विदेशियों को गांधी ने देश से बाहर किया, उन विदेशियों को पुनः भारत में लाने का हर प्रकार का नौटंकी कर रही है... जिसमें केन्द्र से लेकर राज्य सरकार भी शामिल है... संघ जिसकी राजनीतिक इकाई भाजपा है, वह भी इस हथकंडे से तौबा करती है, और ग्राम स्वराज्य-स्वदेशी की परिकल्पना को साकार करने की बात करती है, पर इन सबसे दूर, राज्य और केन्द्र सरकार ने पूंजी निवेश के नये तरीके ईजाद कर स्थिति ऐसी कर दी है जैसे लगता है कि बिना पूंजी निवेश के राज्य व देश आगे बढ़ ही नहीं सकता...
क्या ऐसे हालात में आप धौनी के इस अपील को स्वीकार करेंगे कि - " ये हाथी उड़ेगा, और झारखण्ड इंडिया का नंबर वन इंवेस्टमेंट डेस्टिनेशन बनेगा। अब सवाल ये है क्या आप हमारे साथ होंगे?" मैं तो भाई, साफ-साफ कह देता हूं कि धौनी के इस बयान के साथ मैं तो नहीं हूं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि हाथी उड़ता नहीं है...

Thursday, May 14, 2015

संघ और प्रभात खबर के बीच छिड़ी जंग.........


पिछले दिनों 9 मई को प्रभात खबर के पृष्ठ संख्या 2 में पढ़ने को मिला कि समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार, झारखंड द्वारा इस वर्ष से शुरु किये गये पं. दीनदयाल राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार के लिए प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक (झारखंड) अनुज कुमार सिन्हा को चयन किया है। श्री सिन्हा को ये पुरस्कार 12 मई को एटीआई सभागार में प्रदान किया जायेगा। पुरस्कार के लिए एक चयन समिति बनायी गयी। उस चयन समिति की बैठक में ये निर्णय लिया गया, कि इस पुरस्कार के लिए प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा ही योग्य है, दूसरा कोई नहीं.....!

मुझे जैसे ही ये समाचार पढ़ने को मिला, मेरा माथा ठनका। भला ये कैसे हो सकता हैं कि संघ प्रभात खबर में कार्यरत इतने बड़े अधिकारी को वह भी संपादकीय स्तर का, उसे सम्मानित कर दें, क्या संघ का हृदय परिवर्तन हो गया.....या कुछ दूसरी बात हैं......मैंने पता लगाने की कोशिश की और 12 मई तक इँतजार किया। जैसे ही 12 मई बीता, मुझे ये बात जानने में देर नहीं लगी कि संघ का हृदय परिवर्तन हुआ या कुछ दूसरी बात हैं।

संघ जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहा जाता है। अधिकांश लोगों का मानना हैं कि ये पूर्णतः चरित्र निर्माण करनेवाली एक राष्ट्रभक्त संगठन है। जिसे लेकर देश-विदेश के कई महापुरुषों ने अपने संभाषणों में इस संगठन के क्रियाकलापों पर सुंदर प्रतिक्रियाएं दी, जिसे कई अखबारों और चैनलों ने जगह भी दी। ये अलग बात हैं कि कुछ अखबार/चैनल पूर्व से ही अपने मन में संघ के प्रति नकारात्मक भाव रखते हुए अनाप-शनाप छापते/ दिखलाते रहते हैं।

इधर कुछ महीनों से प्रभात खबर ने संघ के प्रति छद्म नाम से बहुत कुछ छापे हैं, हम उस समाचार को न तो गलत ठहरा सकते हैं और न ही सही, सच्चाई क्या है, ये जांच का विषय हैं। हर समाचार में गलतियां और हर समाचार में सच्चाईयां नहीं होती। कुछ समाचार समय, काल और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अखबार व चैनल वाले छापते व दिखाते रहते हैं, इसमें उनका निहितस्वार्थ छुपा रहता हैं, जिसे वे निहितस्वार्थ न कहकर देश व समाज के प्रति अपना कर्तव्य का निर्वहण करने का ढोंग समाज के समक्ष रखते हैं।

सूत्र बताते हैं कि इधर संघ के खिलाफ प्रभात खबर का लगातार होता दुष्प्रचार से संघ ने एक नीति बनायी, कि वह न तो अखबार के खिलाफ आंदोलन चलायेगा और न ही न्यायालय का दरवाजा खटखटायेगा। हां इतना जरुर करेगा कि वह स्वयंसेवकों से अनुरोध करेगा कि वे प्रभात खबर का बहिष्कार करना शुरु करें। आज भी आप देख सकते हैं कि संघ के ऐसे बहुतेरे स्वयंसेवक हैं, जो संघ के लिए अपना जान छिरकते हैं, उन्होंने प्रभात खबर को अपने घर में आने पर प्रतिबंध लगा दिया हैं। निवारणपुर स्थित संघ मुख्यालय में तो आप प्रभात खबर कभी देख ही नहीं सकते और न ही इसकी आनुषांगिक संगठन के कार्यालयों में।

अब बात यहां आती हैं कि जब संघ मुख्यालय में प्रभात खबर नहीं आता तो फिर प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा को पुरस्कृत करने की बात कहां से आ गयी, वह भी संघ की अनुषांगिक संगठन, समाचार एजेंसी, हिन्दुस्थान समाचार की ओर से..........। ये बात किसी भी स्वयंसेवक को पच नहीं रही थी, सभी स्वयंसेवक इसका विरोध कर रहे थे। कुछ दबीं जुबां तो कुछ खुलकर विरोध कर रहे थे। आखिर ये कैसे हो गया। क्या राज्य में सचमुच पत्रकारों का अकाल पड़ गया हैं। क्या अब जब भी पुरस्कार की बात आयेगी तो प्रभात खबर से ही लोग आयेंगे, पुरस्कार लेने। यानी जितने स्वयंसेवक, उतनी ही बातें।

सूत्र बताते हैं कि जैसे ही पं. दीन दयाल राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार देने की बात झारखंड में आयी। हिन्दुस्थान समाचार के ब्यूरो चीफ ने हिन्दुस्तान समाचार पत्र के चंदन मिश्र और दैनिक जागरण के कमलेश रघुवंशी को बुलाकर एक बैठक की और आनन-फानन में प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा को पुरस्कार देने की घोषणा कर डाली। फिर अखबारों व चैनलों से इस बात की जानकारी जनता तक पहुंचा दी गयी। जिसे संघ, हिन्दुस्थान समाचार और विश्व संवाद केन्द्र के उच्चाधिकारियों को नागवार गुजरी और उसी वक्त तय हो गया कि किसी भी हालत में प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा को 12 मई को एटीआई में आयोजित कार्यक्रम में सम्मानित नहीं किया जायेगा, हालांकि पुरस्कार दिलवानेवालों ने भी कम एड़ी-चोटी एक नहीं की। नाना प्रकार के तिकड़म लगाये पर सफलता मिलती नहीं दिखी। खैर 12 मई समयानुसार आया, कार्यक्रम आयोजित हुए। संघ, विश्व संवाद केन्द्र, हिन्दुस्थान समाचार, भाजपा और संघ के कई आनुषांगिक संगठन के लोग पहुंचे पर उन्हें सम्मान नहीं मिला, जिन्हें सम्मान देने की घोषणा की गयी थी.......। इससे प्रतिष्ठा किसकी गयी.......? सम्मान लेनेवाले की, सम्मान दिलाने की घोषणा करनेवाले की या किसी और की। आप अपने ढंग से इसकी व्याख्या कर सकते हैं।

इधर आज 14 मई को हमने चयन समिति के सदस्य चंदन मिश्र से बात की, तब उनका कहना था कि सम्मान समारोह का कार्यक्रम अभी स्थगित हुआ हैं, पुरस्कार देने की घोषणा की तिथि बाद में की जायेगी, पर संघ के सूत्र बताते हैं कि ऐसा संभव नहीं। 12 मई को संपादकीय पृष्ठ पर “सांप्रदायिकता के जहर से सावधान” नामक संपादकीय और 13 मई को पवन के. वर्मा के आलेख “भगवाकरण की घातक प्रक्रिया” में संघ के आनुषांगिक संगठनों को लंपट समूह की संज्ञा देने पर भी संघ को आपत्ति है। संघ का कहना हैं कि प्रभात खबर आखिर ये सब लिख और पढ़ा कर क्या साबित करना चाहता हैं। ये समझ से परे हैं। संघ के स्वयंसेवकों का कहना हैं कि संघ पर वैचारिक हमले हो, उसका स्वागत हैं, पर गलत, मनगढंत, अपशब्दों का प्रयोग, अखबार के मानसिक दिवालियापन की ओर संकेत करता है।

दूसरी ओर संघ समर्थकों का कहना हैं कि जब संघ इतना गलत हैं तो फिर इसके आनुषांगिक संगठनों से खुद सम्मानित होने का भाव रखना, ये क्या न्यायोचित हैं? आखिर अपने संपादक के पुरस्कृत होनेवाली खबर प्रभात खबर ने क्यों छापे? उसे तो पुरस्कार यह कहकर ठुकरा देना चाहिए था कि आप तो सांप्रदायिक हो, और हम भगवा सोच वाले, सांप्रदायिक संगठनों अथवा उसके आनुषांगिक संगठनों से अनुप्राणित अथवा पुरस्कृत नहीं होते। यानी यहां तो दो प्रकार की बातें हो रही हैं, संघ को गाली भी दे रहे हो और संघ से पुरस्कृत होने का स्वार्थ भी रखते हो। प्रभात खबर को इस विषय पर अपनी सोच बदलनी होगी। क्योंकि दोनों चीजें, एक साथ नहीं चल सकती।

इधर जहां मैं रहता हूं, वहां प्रभात खबर समर्थकों की संख्या बहुत थी, पर अब उनका भी विचार बदल रहा है। एक सज्जन ने कहा कि प्रभात खबर पर्यावरण बचाओ मुहिम चला रहा हैं और लिखता हैं कि झारखंड से 38 पहाड़ गायब हो गये। भला झारखंड तो पठारी इलाका हैं, यहां पहाड़ी हो सकते हैं, पहाड़ कहां से आ गया भाई। बचपन में जब झारखंड, संयुक्त बिहार में था तब पढ़ने को यहां मिलता था कि बिहार की सबसे ऊंची पहाड़ी पारसनाथ की पहाड़ी है, जो अब झारखंड की सबसे उंची पहाड़ी है। ऐसे में जब यहां पहाड़ हैं नहीं, तो पहाड़ गायब कैसे हो गये।

दूसरी बात जो प्रत्येक दिन अखबार के चार पेज की लाइफ रांची देखने को मिलती हैं, उसके टाइम पास वाले पृष्ठ पर अर्धनग्न नायिकाओं के चित्र परोसे जाते हैं, वो किसलिए परोसे जाते हैं, उससे कौन सा समाज, प्रभात खबर तैयार कर रहा हैं, समझ में नहीं आ रहा।

इसलिए संघ, कैंपेन चलाये, अथवा न चलाये। ऐसे भी प्रभात खबर को लेकर जनता के विचार बदल रहे है, जनता के पास अब विकल्प बहुतेरे हैं, उन विकल्पों पर जनता गौर कर रही हैं, परिणाम जल्द ही आयेगा, कोई ज्यादा दिमाग नहीं लगाये...............

Monday, June 16, 2014

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, क्या हुआ, आप भी तो वहीं कर रहे हैं, जो कांग्रेस करती थी यानी मर जवान मर किसान.............

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, क्या हुआ, आप भी तो वहीं कर रहे हैं, जो कांग्रेस करती थी यानी मर जवान मर किसान। याद करिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की विशाल रैली....। कांग्रेस पर बरसते हुए, प्रधानमंत्री मोदी जी को....जिसमें वे कांग्रेस पर बरसते थे। कहते थे कि कांग्रेस का नारा था - जय जवान, जय किसान। पर अब नारा बदल गया हैं, कांग्रेस कहती हैं कि मर जवान, मर किसान। पर सच्चाई क्या हैं....ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं। दिल्ली एयरपोर्ट पर कार्यरत सीआईएसएफ के जवानों को देख लीजिये। उनके साथ गृह मंत्रालय में कार्यरत, और उनके इशारों पर कार्य करनेवाले वरीय अधिकारी ही अपने कनीय जवानों के साथ क्या कर रहे हैं। जवानों से 18-18 घंटे काम लिये जा रहे है। यहीं नहीं 18-19 घंटे की ड्यूटी खत्म हुई नहीं कि तीन घंटे बाद उन्हें पीटी-परेड के लिए बुला लिया जा रहा हैं। यहीं नहीं उन्हें खाने पीने की भी सुविधा नहीं कि वे ड्यूटी के दौरान खा पी ले। यहीं नहीं गर इसी बीच उन्हें पेशाब या शौच लग गया तो हो गयी उनकी कयामत। अपने जवानों से इस प्रकार की हैवानियत जैसा व्यवहार कौन कर रहा हैं। ये कोई दूसरा नहीं, ये वहीं लोग हैं जो उच्च पदों पर स्थित हैं। शायद उन्हें भूख नहीं लगती होगी, या पेशाब- शौच नहीं लगता होगा। नौकरी के भय से ये जवान कुछ बोलते नहीं, पशुवत जिंदगी जीने को मजबूर हैं, पर सत्ता के मद में चूर लोगों को इनसे क्या मतलब। वोट मिल गया। जवान भार में जाये। इससे क्या मतलब। इतिहास लिखेगा कि एक गुजरात का मुख्यमंत्री था, जो प्रधानमंत्री बन गया। संघ कहेगा कि हमने वो काम कर दिया जो कोई कर ही नहीं सकता था, पर गांव के किसी कोने में बैठा, जवान का परिवार यहीं कहेगा कि जैसे कांग्रेस ने अब तक छल किया। एक और व्यक्ति, जिसका नाम नरेन्द्र मोदी हैं, उसने भी छल किया। जरा सोचिये कि दिल्ली जहां संसद हैं, वहीं पर सीआईएसएफ के जवानों का ये हाल होगा, तो बार्डर पर जो जवान रहते होंगे,  जो जेसलमेर, बाड़मेर आदि जहां 50 डिंग्री सेल्सियस गर्मी में तापमान होता हैं। भारत चीन सीमा जहां जाड़े में माइनस डिंग्री तापमान हो जाता हैं, वहां काम कर रहे जवानों की क्या हालत होती होगी। क्या जवान सचमुच सिर्फ मरने के लिए होते हैं, जैसा कि बिहार के एक मंत्री ने बयान दिया था। फिलहाल देखकर तो ऐसा ही लगता हैं। नहीं तो देश के जवानों में मंत्री, नेता, आईएएस, आईपीएस, व्यापारी, धनाढ्य वर्गों के बच्चे क्यों नहीं शामिल होते। यहां तक की एनसीसी में भी गरीबों के बच्चें क्यों, अमीरों के क्यों नहीं। इससे साफ पता चलता हैं कि इस देश में भेदभाव शुरु से चला आ रहा हैं, और ये तब तक चलता रहेगा, जब तक घटियास्तर की सोच के लोग सत्ता पर काबिज होते रहेंगे। फिलहाल एक और व्यक्ति, एक और पार्टी जिसका नाम भाजपा हैं, वो छलने के लिए तैयार हैं, उसे पांच साल तक मिल गया हैं, हमें और हमारे जवानों को उल्लू बनाने के लिए.............

Saturday, December 4, 2010

संघ, भाजपा और गडकरी के बेटे की शादी...!


संघ का एक गीत है --------------
"देश के लिये जीये,
समाज के लिये जीये,
ये धड़कनें, ये श्वास हो,
पुण्यभूमि के लिए, जन्मभूमि के लिए..............."
पर ये गीत, संघ और संघ का एक राजनीतिक संगठन भाजपा से जूड़ें कुछ धनाढ्य लोगों, अंधकूप में रहनेवालों, केवल खुद के लिए जीनेवालों पर लागू नहीं होता, ये लागू होता हैं, उन अंसख्य स्वयंसेवकों पर जो लाठी और गणवेश में खुद को, इस गीत पर झूमा रहे होते हैं और भ्रम में जीने को विवश होते हैं। ये कैसे होता हैं। उसका बानगी देखने को मिला -- झारखंड की राजधानी रांची से प्रकाशित एक समाचार पत्र प्रभात खबर में। इस अखबार ने 03 दिसम्बर को बड़ी ही संजीदगी से प्रथम पृष्ठ पर दो समाचारों को एक साथ स्थान दिया और जनता को सोचने और समझने पर विवश कर दिया कि जनता जाने कि जो भाजपा और संघ उसके समक्ष दिखाई पड़ रहा हैं, सचमुच उसका चरित्र हैं या उसने अपना चरित्र खो दिया हैं। सचमुच प्रभात खबर को, हृदय से बधाई, ऐसे समाचार प्रकाशित करने के लिए। ऐसे भी, इस प्रकार की खबरें, प्रभात खबर में ही दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि बाकी अखबारों में तो इस प्रकार की खबरों को स्थान मिलना, असंभव सा दिखता हैं।
आखिर इस अखबार ने क्या छाप दिया.......................
इस अखबार ने छापा हैं कि झारखंड के शहर सिमडेगा के पिथरा पंचायत के भाजपा अध्यक्ष मदन साहू ने गरीबी से तंग आकर गुरुवार यानी 2 दिसम्बर को आत्महत्या कर ली, जबकि दूसरी ओर इसी तारीख को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने नागपुर में अपने बेटे निखिल की शादी में 60 करोड़ खर्च कर दिये।
अखबार ने आगे लिखा हैं कि केवल एक करोड़ तो नितिन ने निमंत्रण पत्र पर खर्च कर डालें, बेटे निखिल को नौ करोड़ का बंगला और बीएमडब्लयू भी दिया। दो दिनों तक तीन लाख लोगों के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की व्यवस्था, 300 तरह के व्यंजन, रिसेप्शन में चार्टड प्लेन से मेहमानों की आने की व्यवस्था, मेहमानों के लिए 22 विशेष उड़ानों की व्यवस्था आदि कर डाली। और इधर गरीबी का शिकार पिथरा पंचायत के भाजपा अध्यक्ष मदन साहू की हालत देखिये टमाटर की खेती में उसे नुकसान उठाना पड़ा, मदन साहू अपने बच्चों और पत्नी का बोझ उठाने में असमर्थ, एक डिसिमल जमीन तक नहीं, बटाई पर खेती करके, अपने परिवार का भरण पोषण करता था, टमाटर की दर घटने से हुए भारी घाटे ने उसका जीवन बर्बाद कर दिया था, बेटी के इलाज के लिए उसके पास पैसे नहीं थे, लाल कार्ड से उसका नाम तक काट दिया गया था, बेचारा इस हालात से तंग आकर अपनी जिंदगी ही समाप्त कर डाली।
कमाल देखिये, ये अखबार आज प्रमुखता से इस समाचार को प्रकाशित किया हैं, पर भाजपा के बड़े नेता, खासकर झारखंड की राजनीति करनेवाले संघ और उसके लोग, तथा भाजपाई, उस दिवंगत मदन साहू के घर तक जाने की हिमाकत नहीं की, और चल पड़े नितिन गडकरी के नागपुर स्थित आवास, जहां दो दिनों तक चलेगी, नितिन के बेटे निखिल की रिसेप्सन पार्टी। हम आपको बता दें कि जिस नितिन के घर ये झारखंडी नेता व मंत्री सलाम बजाने गये हैं, वो नितिन इन नेताओं को शायद ही भाव देगा। फिर भी, सभी ने नागपुर का दौरा करना, ज्यादा उचित समझा।
यानी इधर गयी जान और उधर शादी आलीशान और वो भी उस पार्टी में, जो कहती हैं कि भाजपा के साथ चले, रामराज्य की ओर चले। उस पार्टी में जहां राम, सुराज, सुशासन की बात कुछ ज्यादा ही कहीं जाती है, अरे जो पार्टी अपने पंचायत अध्यक्ष की मौत की जिम्मेवारी न लें, जो पार्टी अपने पंचायत अध्यक्ष की मौत का समाचार सुनने के बाद उसके परिवार तक का सुध न लें, वो पार्टी आम जनता के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा क्या करेगी।
इधर हमने देखा हैं कि कुछ राजनीतिज्ञों के द्वारा अपने बेटे बेटियों की शादी के अवसर पर फिजूलखर्ची करना, दिखावे करने का फैशन जगा हैं, खासकर उस देश में जहां गरीबी से तंग आकर, किसानों और सामान्य लोगों का समूह हमेशा आत्महत्या कर रहा होता हैं। इसमें लालू प्रसाद, झारखंड के ही एक पूर्व मंत्री कमलेश सिंह का नाम हमारे बिहार झारखंड में ज्यादा चला हैं, पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने सबको पीछे छोड़ दिया, शायद लालू को चुनौती भी दे दी हो, कि लालू जी आप क्या खर्च करोगे, जो हमने कर दिया। सचमुच नितिन गडकरी जी, आप महान हैं, आप ऐसा ही कर सकते हैं, आप से इससे ज्यादा कुछ आशा भी नहीं की जा सकती, पर ये भी जान लीजिए, कि आप ही की पार्टी की तरह एक राष्ट्रीय पार्टी हैं, जिसका नाम हैं, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस। जिसकी अध्यक्ष हैं सोनिया गांधी। जिन्होंने अपनी बेटी प्रियंका की बिल्कुल सामान्य ढंग से सादगी के साथ शादी संपन्न करायी। ये पूरा देश जानता हैं। ऐसे भी भारत का एक संदेश है --------- सादा जीवन, उच्च विचार। पर आप जैसे लोगों को इस भारतीय संस्कृति का यह सुंदर संदेश दिमाग में नहीं घूसेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक राजनीतिक संगठन भाजपा कहती हैं कि उसकी पार्टी पंडित दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के कथन पर चलनेवाली पार्टी हैं, पर भाजपा के बड़े नेता बताये कि जो चरित्र इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दिखायी हैं, क्या वो चरित्र दीन दयाल उपाध्याय के कथन से मेल खाता है। गर मेल नहीं खाता, तो आनेवाले चुनावों में यहां की जनता भाजपा को क्यों वोट दें। संघ को राष्ट्रवादी संगठन क्यों माने।
संघ ये बतायें और भाजपा भी, कि जिस देश में करोड़ों लोग भूख और गरीबी से तंग आकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हो, ठीक उसी तरह जैसे भाजपा के पंचायत अध्यक्ष ने आत्महत्या कर जीवन लीला समाप्त कर ली। यहीं नहीं जिस प्रांत से नितिन गडकरी आते हैं, उसी प्रांत में कई किसानों ने आत्महत्या की हैं। उसी देश में एक सार्वजनिक जीवन जीनेवाला व्यक्ति को इस प्रकार के समारोह आयोजित करना शोभा देता हैं। भ्रष्टाचार और चरित्र को लेकर हाय तौबा मचानेवाली, भाजपा खासकर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में संसद को जो चलने नहीं दे रही हैं, वो खुद बतायें कि कर्नाटक और झारखंड में उसके लोग क्या कर रहे हैं। अरे भाजपाईयों शर्म करना सीखों, पर तुम्हें शर्म आयेगी। इस पर हमें संदेह हैं, क्योंकि शर्म तो उन्हें आती हैं, जिनका चरित्र होता हैं। पर भाजपाईयों और संघ के लोगों ने तो अब चरित्र, तेल लेने भेज दिये हैं।