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Monday, February 6, 2017

सीएम की ब्रांडिंग, कनफूंकवा और बेचारी जनता.....

ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे इस कार्यक्रम के लिए सीएम की ब्रांडिंग करनेवाले कंपनियों के हाथ-पांव फूलते जा रहे है। हर दो-तीन दिन पर कनफूंकवों की टीम, सीएम के कान में कुछ फूंक दे रही है और लीजिये ब्रांडिंग करनेवाली कंपनियां नये-नये होर्डिंग्स लगाकर सीएम को खुश करने में लग जा रही है, दूसरी ओर मंत्रियों के दल ने इस समिट से धीरे-धीरे दूरियां बनानी शुरु कर दी है। कुछ तो सीधे कहते है कि यह पैसे और समय की बर्बादी है। कुछ तो यह भी कहते है कि हम दूसरे की मांग लाल देखकर, अपना मांग लाल नहीं कर सकते। झारखण्ड, गुजरात या मध्य-प्रदेश नहीं है। यह नवोदित राज्य है, यहां की जनता सर्वाधिक गरीबी से पीड़ित है, ऐसे में इस प्रकार के आयोजन से गरीबी बढ़ेगी, पूंजीपति और संपन्न होंगे।
दूसरी ओर विरोधी दलों के नेता तो ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के नाम से ही भड़क उठते है। वे कहते है कि इस प्रकार के आयोजन से झारखण्ड को नुकसान छोड़, लाभ किसी जिंदगी में नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वाधिक पूंजी निवेश का हाल यहां की जनता भुगत रही है। पूरा प्रदेश विस्थापन का दंश झेल रहा है, पर मुख्यमंत्री रघुवर दास केवल अपनी मन की कर रहे है और अधिकारियों के कुछ समूह ने बे-सिरपैर की बातें कर पूरे प्रदेश को भ्रमित कर दिया है। विरोधी दलों के नेताओं का समूह तो यह भी कहता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास जो नित्य नये-नये होर्डिंग्स और विज्ञापन के माध्यम से जो अपनी ब्रांडिंग कर रहे है, उससे जनता का भला नहीं हो रहा, ये राज्य की जनता के पैसे का अपव्यय है, मुख्यमंत्री को समझ लेना चाहिए।
हम आपको बता दें कि फिलहाल राज्य के बाहर की तीन-तीन कंपनियां सीएम की ब्रांडिंग में लगी है, जबकि राज्य सरकार के क्रियाकलापों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए पूर्व से ही राज्य में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग कार्यरत है, पर स्थिति ऐसी है कि ये विभाग फिलहाल चूं-चूं का मुरब्बा हो गया है।
यह विभाग जो सीधे मुख्यमंत्री के सम्पर्क में है, स्वयं मुख्यमंत्री को इस विभाग के अधिकारियों पर विश्वास नहीं है, क्योंकि कनफूकवों की टीम, ऐसा मुख्यमंत्री के कान में फूंक देती है कि मुख्यमंत्री को लगता है कि उनके कनफूंकवें सही है और विभागीय अधिकारी गलत है। यहीं कारण रहा कि यहां एक वन विभाग में कार्यरत अधिकारी को विभाग का कार्यभार सौंपा गया, जिसे विभागीय कार्य की जानकारी ही नहीं। जैसे-तैसे विभाग चल रहा है, जो निकम्मे और आलसी थे, आज स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे है। आश्चर्य इस बात की है कि जिसके खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, उस अधिकारी को पुनः रांची मुख्यालय में महिमामंडित करने की तैयारी कनफूंकवों द्वारा शुरु कर दी गयी है। कुछ दिनों में ही वह अधिकारी जिसके खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, जल्द ही सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के मुख्यालय में दिखेगा, उसकी तैयारी पूरी कर ली गयी है। ...और इधर देखिये ब्रांडिग करनेवाले कंपनियों का हाल, कनफूंकवों ने इनका क्या हाल बना दिया है?
आपको याद होगा कि सर्वप्रथम धौनी द्वारा हाथी को उड़ाते हुए ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को सफल बनाने के लिए जनता से सहयोग मांगा जा रहा था, कनफूंकवों ने जैसे ही सीएम के कान में ये बात कही कि हाथी के उड़ाने से मोमेंटम झारखण्ड का मजाक उड़ रहा है। झट से आनन-फानन में हाथी के उड़ानेवाले बैनर-पोस्टर की जगह केवल धौनी का बैनर-पोस्टर जारी हुआ, हाथी को उड़ानेवाला दृश्य गायब किया गया। इसके बाद फिर कनफूंकवों ने कंपनियों के उपर अँगूली उठाई कि इससे तो धौनी का ब्रांडिग हो रहा है, सीएम रघुवर दास तो कहीं है ही नहीं। तब ऐसे हालत में कंपनियों ने धौनी और रघुवर दास, दोनों का फोटो समेत बैनर-होर्डिंग्स लगानी शुरु की। इस बैनर-पोस्टर लगाने के बाद फिर कनफूंकवों ने कहा कि सीएम इस बैनर-पोस्टर से भी खुश नहीं। कुछ नया होना चाहिए, जिसमें धौनी नहीं, सिर्फ और सिर्फ सीएम होने चाहिए, रघुवर दास होने चाहिए। ब्रांडिंग कंपनियों ने फिर से नया बैनर-पोस्टर बनवाया और आज जगह-जगह केवल रघुवर दास ही अब नजर आ रहे है और धौनी धीरे-धीरे गायब होते दिख रहे है। ज्यादा दिन नहीं, कुछ दिन के बाद, लगता है कि धौनी पूरी तरह से बैनर-पोस्टर से गायब हो जायेंगे और इन बैनरों-पोस्टरों पर रघुवर ही रघुवर दिखेंगे। ऐसे में आनेवाला ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट का क्या हाल होगा? समझ लीजिये। बेचारी ब्रांडिंग कंपनियों का क्या? वो तो अपने करार के अनुसार, पैसे लेंगे चल देंगे, ब्रांडिंग किसकी हुई?, झारखण्ड की या सीएम की, ये वक्त बतायेगा, पर इतना तो तय है कि जनता को नुकसान के सिवा कुछ भी हाथ नहीं आयेगा, क्योंकि हाथी उड़ता नहीं है, यह विशालकाय प्राणी जितना खाता है, उतना ही नुकसान भी करता है, पर यहां तो राज्य सरकार और उनके अधिकारियों ने इसे उड़ाने की कोशिश कर दी है, ऐसे में झारखण्ड आज सर्वत्र हंसी का पात्र बन गया है।

Friday, January 13, 2017

ये “दंगल” बहुत कुछ कह रहा है..............

ये “दंगल” बहुत कुछ कह रहा है...
कह रहा है – अब अच्छी फिल्मों के दौर फिर से शुरु होंगे। “नदिया के पार”, “हम आपके है कौन” के बाद जो रिक्तिता आ गयी थी, वो अब खत्म होनेवाला है। हमारे देश में एक प्रकार का दौर चलता है। कोई फिल्म जो सुपरहिट होती है, उसके सुपर हिट होने के बाद, ठीक उसी प्रकार की फिल्म बननी शुरु हो जाती है, अगर ऐसा होता है तो देशहित व समाजहित में एक प्रकार से क्रांति संभव है। बहुत दिनों के बाद “दंगल” फिल्म देखने को मिली, जिसे देखने के लिए पूरा समाज विभिन्न मल्टीप्लेक्सों व छविगृहों के चक्कर लगा रहा है। फिल्म टैक्स फ्री नहीं है, फिर भी इसे देखनेवालों की भीड़ खूब यहां दिखाई पड़ रही है। हाल ही में क्रिकेटर धौनी को केन्द्र में रखकर एक और फिल्म बनी थी – “धौनी – ए अनटोल्डस स्टोरी” और अब एक और फिल्म जल्द ही देखने को मिलेगी जो सचिन तेंदुलकर के जीवन पर आधारित है। फिल्म का नाम है - “ए बिलियन ड्रीम्स”। सचमुच अगर ऐसी फिल्म बननी शुरु हुई तो समाज पर उसका असर पड़ना तय है, क्योंकि फिल्मों का हमारे जीवन पर असर खूब पड़ता है... और अब हम बात कर रहे है, फिल्म “दंगल” की। आखिर “दंगल” में क्या है? कुछ दिन पूर्व सायं समय जयपुर की वरिष्ठ पत्रकार मोनालिसा ने मेरे मोबाइल पर फोन किया। सर, आपकी बहुत याद आ रही है। मैंने पूछा – क्यों? तब उसने कहा कि सर मैंने अभी फिल्म दंगल देखी है। उस फिल्म में जैसे एक पिता ने अपनी दोनों बेटियों को बेहतर बनाने के लिए दुनिया से लड़ाइयां लड़ी, ठीक उसी प्रकार आप हमें बेहतर बनाने के लिए लोगों से लड़ जाया करते। मोनालिसा का ये कहना था कि मैंने सोचा कि मुझे यह फिल्म देखनी चाहिए, तभी मेरे बेटे सुधांशु ने नई दिल्ली से मेरे और अपनी मां के लिए ऑनलाइन टिकट बुक कर दी और मैं एक जनवरी को ग्लिट्ज में पिक्चर देखने के लिए पहुंचा। पूरी फिल्म देखने के बाद, हमारे मुख से वाह निकल गयी। क्या नहीं था – इस फिल्म में। इस फिल्म ने बताया है कि एक पिता को अपने सपनों को पूरा करने के लिए किस प्रकार की योजना बनानी चाहिए।
इस फिल्म ने बताया कि ईश्वर सबको मौका देता है, बस उस मौके को लाखों में कोई एक ही पहचान पाता है। इस फिल्म ने बताया है कि मिथक तोड़िये कि जो काम बेटे कर सकते है, वे बेटियां नहीं कर सकती। इस फिल्म ने बताया है कि एक बेहतरीन फिल्मों से भी अच्छी कमाई की जा सकती है। बशर्ते कि बेहतरीन फिल्म, समाज को सुदृढ़ करने, सशक्त करने, संदेश देने के लिए बनाये जाये। इस फिल्म ने बताया है कि राष्ट्रभक्ति क्या है? याद करिये, फिल्म समाप्त हो रहा है, फिल्म अभिनेता आमिर खान कमरे में बंद है, राष्ट्रीय धुन बज रहा है, कानों तक वह धुन पहुंची है, बड़ी शान से खड़ा होकर वे राष्ट्रीय धुन को सम्मान दे रहे है, और उन्हीं के साथ फिल्म देख रहे, सारे लोग उनके साथ खड़े हो जाते है, यहां सारी जातियां व धर्म दोनों समान रूप से राष्ट्रीय धुन के सम्मान में खड़े हो रहे है...
अगर फिल्में ऐसी बनेंगी तो देश बनेगा, समाज बनेगा... खुशी इस बात की है, अब ऐसी फिल्मों के बनने का दौर शुरु हो रहा है। जल्द ही सचिन की “ए बिलियन ड्रीम्स” आयेगी। लोग देखने जायेंगे। चरित्र और संस्कार का सुंदर समन्वय इन फिल्मों में देखने को मिलेगा। अपना देश मजबूत होगा... और क्या चाहिए हमें। आमिर खान और उनकी पूरी टीम, जिन्होंने “दंगल” बनायी, उनकी प्रशंसा होनी चाहिए। इस फिल्म के माध्यम से एक संदेश उन फिल्म निर्माताओं को भी मिला है, जो ये कहते है कि अब अच्छी फिल्में लोग देखना नहीं चाहते है। उनके लिए एक ही जवाब – गर फिल्म अच्छा बनाओगे तो लोग देखेंगे... उसका प्रचार आम जनता स्वयं करेगी... जरा देखो, आमिर खान ने अपनी बहुत सारी फिल्मों को खूब प्रचार – प्रसार किया है, पर “दंगल” का प्रचार तो आम जनता ने खुद ही शुरु कर दिया, जो भी देख रहा है, वो अपने लोगों को कह रहा है कि आप “दंगल” देखिये और अपनी बेटियों से प्यार करिये, साथ ही एक बेहतर पिता भी बनिये, ठीक “दंगल” वाले आमिर खान जैसा...

Saturday, January 7, 2017

भला हाथी भी कहीं उड़ता है.......

ये हाथी कभी नहीं उड़ेगा, चाहे धौनी जितना भी उड़ाने का प्रचार क्यों न कर लें... धौनी चाहे जिस भी मिट्टी के बने हो, पर हमारा हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान की महक के रुप में जाना जानेवाला झारखण्ड अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं जानता और न ही ऐसे सपने देखता है, जो सपने कभी पूरे ही न हो...
झारखण्ड बढ़ेगा, अवश्य बढ़ेगा पर पंखों वाला हाथी से नहीं, बल्कि झारखण्ड के करोड़ों मेहनतकश-मजदूरों और उनके मजबूत इरादों और बुलंद हौसलों से... न कि परछाइयों के शहरों में रहनेवालों से...
धौनी कल क्रिकेट खेलते थे, बाद में विज्ञापनों से खेलने लगे, एक मोटरसाइकिल का प्रचार करते थे, कहते थे मैं तो दूध पीता हूं, ये तो कुछ भी नहीं पीता, फिर भी दौड़ता रहता है... बाद में हमारे धौनी दारु का भी प्रचार करने लगे, उस दारु का, जिसका प्रचार आज तक क्रिकेट के भगवान माने जानेवाले भारत रत्न सचिन तेंदुलकर ने नहीं किया...
ऐसे धौनी को राज्य सरकार ने मोमेंटम झारखण्ड का ब्रांड एंबेसडर बनाया है, इसका फायदा राज्य सरकार को कितना मिलेगा, ये तो वक्त बतायेगा, पर राज्य को नुकसान होना तय है... हम तो एक ही बात जानते है, कि गांधी ने ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना की थी... बार-बार गांधी की बात करनेवाली सरकार, उनके 150 वीं जयंती पर स्वच्छता अभियान की बात करनेवाली सरकार, उनके मूल वक्तव्य ग्राम स्वराज्य से भटक रही है और जिन विदेशियों को गांधी ने देश से बाहर किया, उन विदेशियों को पुनः भारत में लाने का हर प्रकार का नौटंकी कर रही है... जिसमें केन्द्र से लेकर राज्य सरकार भी शामिल है... संघ जिसकी राजनीतिक इकाई भाजपा है, वह भी इस हथकंडे से तौबा करती है, और ग्राम स्वराज्य-स्वदेशी की परिकल्पना को साकार करने की बात करती है, पर इन सबसे दूर, राज्य और केन्द्र सरकार ने पूंजी निवेश के नये तरीके ईजाद कर स्थिति ऐसी कर दी है जैसे लगता है कि बिना पूंजी निवेश के राज्य व देश आगे बढ़ ही नहीं सकता...
क्या ऐसे हालात में आप धौनी के इस अपील को स्वीकार करेंगे कि - " ये हाथी उड़ेगा, और झारखण्ड इंडिया का नंबर वन इंवेस्टमेंट डेस्टिनेशन बनेगा। अब सवाल ये है क्या आप हमारे साथ होंगे?" मैं तो भाई, साफ-साफ कह देता हूं कि धौनी के इस बयान के साथ मैं तो नहीं हूं, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि हाथी उड़ता नहीं है...

Sunday, October 2, 2016

एम एस धौनी दि अनटोल्ड स्टोरी – खूब तो नहीं, पर चलेगा जरुर........

रांची की धड़कन है धौनी
हर युवा के दिलों में बसते है धौनी
इसलिए एम एस धौनी पर तो रांची का हक बनता ही है। मीडिया से लेकर सोशल साइट्स तक धौनी के फिल्म की धूम है। तभी तो फेसबुक पर कई लोगों ने अपने फोटो पर एम एस धौनी दि अनटोल्ड स्टोरी की मुहर लगाकर फिल्म का एक तरह से प्रचार भी कर दिया और अपने फोटो को कवर फोटो बनाने से भी हिचक नहीं की। एम एस धौनी दि अनटोल्ड स्टोरी बनाने के लिए फिल्म निर्माता अरुण पांडे, निर्देशक नीरज पांडे बधाई के पात्र है, वे प्रशंसा के हकदार है। फिल्म नीति राज्य में लागू हो जाने के बाद, इस प्रकार के फिल्म की राज्य को जरुरत भी थी और उस पर से अपने ही राज्य का कोई आइ-कॉन पर फिल्म बन जाये तो मजा आनी ही है।
इस फिल्म को राज्य सरकार ने टैक्स फ्री कर दिया है। हमारा राज्य सरकार से अनुरोध होगा कि वे इस फिल्म पर रहम करें और अपना टैक्स फ्री की कृपा वापस ले लें, क्योंकि इसका फायदा राज्य की जनता को न के बराबर मिल रहा है, हमें लगता है कि राज्य की जनता के हित में ही राज्य सरकार ने यह फैसला लिया होगा, पर जब राज्य की जनता को इसका लाभ न मिलें तो इस प्रकार की घोषणा या फैसला बेमानी है, टैक्स फ्री का सीधा फायदा मिल रहा है मल्टीप्लेक्स और सिनेमाघरों को। फिल्म अच्छी बन पड़ी है, लोग देख रहे है, लोगों को फिल्म प्रभावित भी कर रही है, एक साधारण घर में पैदा लेनेवाला बच्चा अपनी प्रतिभा के आधार पर कैसे शिखर पर पहुंचता है, इसकी बानगी है – एम एस धौनी, दि अनटोल्ड स्टोरी।
जो लोग धौनी को जानते है, समझते है, उनके लिए ये फिल्म किसी रामायण से कम नहीं पर जिनको धौनी पसंद नहीं, उनके लिए भी ये फिल्म किसी इतिहास से कम नहीं। जरा फिल्म को देखिये। हर जगह कसावट, बिना विलेन के फिल्म, और लोग कुर्सी से चिपके है। डायलॉग भी बिहारी और झारखण्डी टोन लिये हुए, इसलिए हंसी खूब जमकर आ रही है। इस फिल्म में कुछ रोचक तथ्य भी जोड़े गये है, जैसे पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के वे बयान जो धौनी पर दिये गये, इस फिल्म में दिखाया गया है। जो लोग जानते है कि भारत की करारी हार के बाद, रांची के एक पत्रकार द्वारा कैसे धौनी के घर पर पत्थरबाजी करवायी गयी थी, विजूयल बनाने के लिए, उसका भी चित्रण है। चित्रण इसका भी किया गया है कि कैसे फार्म में नहीं चल रहे सचिन तेदुंलकर को लेकर, धौनी ने टीम भावना को उपर रखते हुए अपनी बात रखी थी। चूंकि फिल्म का नाम द अनटोल्ड स्टोरी से जुड़ा है, इसलिए धौनी के दिल पर राज करनेवाली युवती का बड़ा ही खुबसुरत और मार्मिक चित्रण इस फिल्म में देखने को मिला है, पर कुछ अनसुलझे सवाल भी है, जो फिल्मकार सुलझा नहीं पाये, दर्शकों को यह बात कुछ ज्यादा ही खटकती है।
महेन्द्र सिंह धौनी के एक बड़े भाई है – संभवतः नरेन्द्र सिंह धौनी। आखिर जब फिल्मकारों ने धौनी के परिवारों को दिखाया, और धौनी के जन्म से लेकर बात उठाई तो भला उनका बड़ा भाई नरेन्द्र कहां गायब हो गया। हो सकता है कि नरेन्द्र से किसी बात को लेकर, धौनी के परिवार को दूरियां हुई हो, पर उसे बचपन के रोल में तो दिखाया ही जा सकता था, इस फिल्म में तो महेन्द्र सिंह धौनी की एक बहन को दिखाया गया पर भाई को छोड़ दिया गया। यहां दर्शकों के साथ फिल्मकार द्वारा न्याय नहीं किया गया।
महेन्द्र सिंह धौनी, ऑल राउंडर है, वे अच्छा बैटिंग करते है, अच्छा फील्डिंग करते है, अच्छा विकेट कीपरिंग करते है, कभी – कभी वे बालिंग भी कर लेते है, पर मूलतः वे विकेटकीपर ही है, इस फिल्म में उन्हें केवल बैट भांजते हुए दिखाया गया, पर यह नहीं दिखाया गया कि वे कैसे फील्डिंग, कैसे विकेट कीपरिंग कर अपने देश का सम्मान बढ़ाया। यानी फिल्मकार ने विकेटकीपर को केवल बैट्समेन बनाकर प्रस्तुत किया।
धौनी के नेतृत्व में भारत ने वर्ल्ड कप जीता पर धौनी के नेतृत्व में भारत ने टी 20 पर भी कब्जा जमाया, पर हमें लगता है कि फिल्म की लंबाई बढ़ने के भय ने फिल्मकारों को वर्ल्ड कप तक ही रखने पर विवश किया होगा।
एक बात और फिल्मकारों ने दिउड़ी मंदिर को कैसे छोड़ दिया, क्योंकि धौनी तो कहा जाता है कि जब भी रांची आते है तो दिउड़ी मंदिर जरुर जाते है, उनके कारण ही दिउड़ी मंदिर की लोकप्रियता बढ़ी, खूब यहां के चैनलवालों ने भी इस मंदिर को धौनी से जोड़ा और फिल्मकारों को इसकी भनक तक नहीं लगी, आश्चर्य है।
पूरे फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत, राजेश शर्मा, दिशा पटानी ने बेहतर अभिनय से लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है, जबकि अनुपम खेर इस फिल्म में सामान्य नजर आये, ऐसे भी इस फिल्म में उनके लिए कुछ करने को भी न था। अंततः पूरे देश को एक बेहतरीन, साफ-सुथड़ी फिल्म बहुत दिनों के बाद मिली है, लोग पूरे परिवार के साथ इस फिल्म का आनन्द ले सकते है। रही बात झारखण्ड की, तो धौनी के लिए तो पूरा झारखण्ड ही उतावला है। आशा की जानी चाहिए कि पांडे परिवार द्वारा बनायी गयी यह फिल्म उनके कैरियर में भी धौनी की तरह धनवृद्धि का उपहार विशेष तौर पर लेकर आयेगी।

Monday, November 14, 2011

झारखंड निर्माण के 11 वर्ष -------------------

15 नवम्बर 2000 बिहार के कुछ जिलों को मिलाकर एक नया झारखंड प्रांत उदय ले रहा था। झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री के रुप में बाबू लाल मरांडी ने शपथ ली थी, प्रथम राज्यपाल बनने का सौभाग्य प्रभात कुमार को मिला था, जबकि विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष बनने जा रहे थे - इंदर सिंह नामधारी। नया प्रांत, नये सपनों के साथ जन्म ले रहा था। इसके पूर्व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद के नेता लालू प्रसाद यादव ने ताल ठोक दी थी कि झारखंड उनके लाश पर बनेगा, पर उनके रहते झारखंड बन चुका था। जब झारखंड जन्म ले रहा था, तो वे रांची में भी थे, पर उनका जादू धीरे धीरे इस इलाके में विलुप्त हो रहा था, या हम कह सकते हैं कि उनका सितारा बुलंदियों से नीचे की ओर सरकना शुरु हुआ था जो आज भी सरकता ही जा रहा हैं। लालू और उऩके जैसे कई नेता ये भी कहते थे कि गर झारखंड बन गया तो बिहार में लालू, बालू और आलू ही दिखाई पड़ेंगे। सच्चाई ये भी हैं कि जब तक मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी रहे, लगता था कि ये कथन सच हो जायेगा, पर जैसे ही उनकी तख्ता, उनसे खार खाये जदयू के नेताओं ने पलटी, झारखंड फिर ठीक से खड़ा नहीं हो सका। जबकि इसके विपरीत बिहार नीतीश कुमार के नेतृत्व में प्रगति के शिखर की ओर बढ़ रहा हैं, ऐसा इसलिए लिखना पड़ रहा हैं कि कुछ पत्र पत्रिकाओं ने नीतीश की कार्य कुशलताओं की प्रशंसा की हैं, लेकिन हमसे गर पूछे तो मुझे नीतीश न कल अच्छे लगे थे और न ही आज। ये अहंकारी पुरुष हैं, ये अलग बात हैं कि इनका कुछ काम ठीक दीखता हैं, पर इनके शासनकाल में भी लॉ एंड आर्डर की वहीं स्थिति हैं जो लालू के काल में थी। अरे जो व्यक्ति बिहार के लोकपर्व छठ पर घाटों की स्थिति नहीं सुधार सकता, जिसके शासनकाल में 24 से अधिक घाटों पर व्रत करने पर प्रतिबंध लगा दिये जाते हो, वो गर कहें कि हम विकास की रास्ते पर हैं, तो बड़ा आश्चर्य लगता हैं। फिर भी जब सब कह रहे हैं, ठीक हैं, तो चलों हम भी कह देते हैं, ठीक हैं, ऐसा कहना वैचारिक दृष्टिकोण से नीतीश के आगे आत्मसमर्पण कर देना होगा, फिर भी बिहार झारखंड के मुकाबले अच्छी स्थिति में हैं, ये मानने में हमें गुरेज नहीं।
हमें याद हैं, जब बिहार से झारखंड अलग हो रहा था, तब उस वक्त मैं पटना स्थित दैनिक जागरण कार्यालय में कार्यरत था और मुझे मोतिहारी की जिम्मेदारी सौपी जा रही थी। उस दिन मुझे झारखंड की राजधानी रांची से निकलनेवाली प्रभात खबर समाचार पत्र खूब याद आयी। वो इसलिए कि प्रभात खबर, अपने समाचार पत्र में कुछ पृष्ठ तो झारखंड के नाम से ही निकालता था। उस वक्त जब कई समाचार पत्र जो रांची से ही प्रकाशित होते थे, झारखंड लिखने से ही परहेज करते थे, पर आज झारखंड शब्द को लिखकर गौरवान्वित हो रहे थे। जिस दिन झारखंड बना, उस दिन तो इस समाचार पत्र ने ऐसे विशेषांक निकाले, जो संग्रहणीय़ थे, पर चूंकि मैं रांची में नहीं था, वो संस्करण मुझे मिले नहीं, जो मेरे मित्र व परिजन रांची में थे, उन्हें कहां था कि वो संजो कर रखे, पर देर से आने का कारण रहा या मित्रों की याददाश्त की कमी, वो संजो कर नहीं रख सकें, पर वो विशेषांक आज तक मुझे नहीं मिले, फिर भी जो लेखकों व अन्य पत्रकारों से जो मुझे संस्मरण मिले, वो बताते कि इस समाचार पत्र ने कितनी मेहनत की थी।
झारखंड बनने के बाद, इस प्रांत में विकास के रास्ते खुले थे, जिस बिहार प्रांत में सड़कें कागजों में ही बन जाती थी, यहां सडकें दिखाई देने लगी। पुल पुलियों को ठीक कराया जाने लगा। स्कूलों में कल्याण विभाग सक्रिय दिखा। लड़कियां सायकिलों पर स्कूल जाने लगी थी। आदिवासी बहुल इलाकों में आदिवासियों के कल्याण के लिए कई कार्यक्रम शुरु किये जाने लगे थे। सरकारी स्कूलों मे बिहार पैटर्न को छोड़ सीबीएसई पैटर्न लागू कर दिया गया। बच्चों को मुफ्त में किताबे मिलने लगी। शिक्षा का स्तर सुधार होता दिखा। जहां बिजली दिखाई नहीं पड़ती थी वो बिजली अब यहां दिखाई पड़ने लगी। उद्योग धंधे खुलने शुरु हुए। कई परियोजनाओं को मूर्तरुप दिया जाने लगा। निजी कंपनियों के साथ एमओयू होने लगे, हालांकि इन एमओयू का विरोध भी हुआ। लेकिन बाबू लाल मरांडी के शासनकाल में उठी डोमिसाईल की आग ने झारखंड की प्रतिष्ठा में वो आग लगायी कि इस आग से आज भी झारखंड झूलस रहा हैं, हालांकि इस डोमिसाईल की आग को मीडिया ने भी हवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक समाचार पत्र और कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इस प्रकार से इस आंदोलन को हवा दी, जैसे लगा की इस आग से कभी झारखंड उबर नहीं पायेगा, पर खुशी इस बात की हैं कि डोमिसाईल की आग, अब वैसी नहीं, फिर भी कहीं न कहीं, किसी न किसी रुप में ये जिंदा हैं, और इसका भय झारखंड में बाहर से आकर बसे पुराने व नये लोगों में स्पष्ट दीखता हैं।
बिहार और झारखंड अलग - अलग हैं। आज बिहार प्रगति की ओर हैं पर झारखंड प्रगति से कोसो दूर हैं। उसके कारण स्पष्ट हैं। बिहार में एक नेतृत्व और उसकी सोच साफ दिखाई पड़ती हैं, पर यहां नेतृत्व की कमी और उसकी स्पष्टता साफ दिखाई नहीं देती। बाबू लाल मरांडी के समय लगता था कि एक सोच हैं, स्पष्टता हैं, पर उसके बाद सभी में नेतृत्व करने की क्षमता और स्पष्टता का अभाव दिखता हैं। झारखंड निर्माण के बाद, आज तक झारखंड को अपना विधानसभा, अपना सचिवालय नहीं मिला और न इसे बनाने की जरुरत समझी गयी। खेल के क्षेत्र में ये प्रदेश एक मिसाल कायम कर सकता हैं, हम ये भी कह सकते है कि ये स्टेट स्पोर्टस स्टेट बनने की क्षमता रखता हैं, पर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया, राष्ट्रीय खेल का समय तो यहां इस प्रकार से बार बार बदले गये कि इस प्रदेश की प्रतिष्ठा दांव पर लगती चली गयी, ऐसे देखा जाय तो खेल में बिहार झारखंड के आगे कहीं टिकता नजर नहीं आता। नया राज्य बनने के बाद राजधानी रांची को जिस प्रकार नये ढंग से बसाने की बात होनी चाहिए थी, उस पर तो आज तक कोई सुनने को तैयार नहीं, आज भी रांची की सभी सड़कों पर सड़क जाम की स्थिति सामान्य सी घटना होती हैं, यहां एक व्यक्ति को एक किलोमीटर की यात्रा संपन्न करने में एक घंटे लग जाते हैं। ये केवल राजधानी की स्थिति नहीं बल्कि झारखंड के सभी नगरों की हैं। विस्थापन, पलायन और गरीबी इस झारखंड की सबसे बड़ी समस्या हैं पर आजतक किसी ने भी इन समस्याओं को झारखंड से त्राण दिलाने की युक्ति नही निकाली।
नक्सल और झारखंड तो जैसे लगता हैं कि एक दूसरे के लिए ही बने हैं और इस नक्सल की समस्याओं को बढा़ने में, खाद और बीज का काम करते हैं यहां के राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकारी। राजनीतिज्ञ तो विधानसभा में कुछ और सड़कों पर नक्सलियों के लिए कुछ और बयान देते हैं। उसका मूल कारण हैं कि वो जानते हैं कि नक्सलवाद यहां की मिट्टी में किस प्रकार जड़ समा चुका हैं। कुछ तो मानते हैं कि नक्सलवाद की समस्या, यहां से कभी खत्म ही नहीं होगी, पर मैं ऐसा नहीं मानता। गर राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों में इमानदारी के गुण आ जाये, विकास के रास्ते पर कदम बढ़ा दे, नक्सलियों के साथ कठोरता से पेश आये तो ये नक्सली किस चूहे के बिल में होंगे, पता ही नहीं चलेगा। जब पंजाब से आतंकवाद समाप्त हो सकता हैं। असम समस्या को काबू में किया जा सकता हैं, तो ऩक्सलवाद किस चिड़िया का नाम हैं। सच्चाई ये हैं कि नक्सलवाद बढ़ाने में यहां के राजनीतिज्ञों के दोहरे चरित्र ने ही मुख्य भूमिका निभायी हैं। जब विकास के नाम पर लूट होगी, राजनीतिज्ञ दस पुश्तों के लिए, धन इकट्ठा करने में लगायेंगे, तो फिर नक्सलवाद कैसे नहीं बढ़ेगा। यहां भ्रष्टाचार का आलम ये हैं कि यहां एक पूर्व मुख्यमंत्री और उनके शासनकाल के कई मंत्री होटवार जेल में कैदी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं, ये झारखंड के ऐसे बदनूमा दाग हैं, जो फिलहाल कहीं से भी धूलते नजर नहीं आते। जब - जब भ्रष्टाचार की बात आती हैं - झारखंड सूर्खियों में ही रहता हैं, चाहे वो नरसिंहराव सरकार बचाने की बात हो अथवा झारखंड प्रांत बनने के बाद एक से बढ़कर एक किये गये घोटाले की बात ही क्यों न हो।
आज यहां जो सरकार चल रही हैं - गठबंधन की। वो क्या हैं। वो भी भ्रष्टाचार की ही देन हैं। जो एक दूसरे को फूंटी आंख देखना नहीं पसंद करते, वो सरकार चला रहे हैं। क्यूं चला रहे हैं. क्या किसी को पता नहीं। खुद यहां के मुख्यमंत्री दिल्ली और विदेश की यात्राओं की झड़ी लगा दी हैं। बगल में बिहार हैं, वहां के मुख्यमंत्री तो लगता हैं कि इतनी दिल्ली यात्रा भी नहीं की होगी, जितना की यहां के मुख्यमंत्री ने एक साल में विदेश की यात्रा कर ली हैं। इसी से पता लग जाता हैं कि कौन अपने प्रांत के लिए क्या कर रहा हैं। यहीं नहीं जरा इस एक साल में देखिये -- एक ओर बिहार में सेवा का अधिकार लागू हो चुका हैं, वहीं झारखंड में सरकार ने घोषणा तो कर दी पर ये सेवा का अधिकार कब लागू होगा, इसका अभी सगुन ही देखा जा रहा हैं, ऐसे में हमें नहीं लगता कि इस 11 वें साल को पूरा कर लेने के बाद भी झारखंड में कोई नयी चीज देखने को मिलेगी, फिर भी निराशावादी से आशावादी होना अच्छा हैं। आशा करेंगे कि क्रिकेट में जैसे धौनी, सौरभ और अब वरुण ने झारखंड में आशा का संचार पैदा किया हैं। राजनीति व प्रशासनिक क्षेत्र में भी कुछ नये चेहरे दिखेंगे जो झारखंड को नयी बुलंदियों तक पहुंचायेंगे, फिलहाल जो पुराने चेहरे हैं, उनसे आशा करना बेमानी होगी, क्योंकि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता हैं। अतीत तो भ्रष्टाचार में गोता लगाता हुआ दिखा हैं, यहीं कारण हैं कि वर्तमान में कुछ हैं ही नहीं, पर देखे आगे क्या होता हैं..............