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Tuesday, October 25, 2016

झारखण्ड बंद की हवा निकल गयी................

दिनांक 24 अक्टूबर, दिन सोमवार को हजारीबाग के बड़कागांव में बीते दिनों हुई पुलिस फायरिंग के विरोध में कांग्रेस, झाविमो, राजद, जदयू और सभी वामदलों एवं आदिवासी नामधन्य संगठनों ने झारखण्ड बंद का ऐलान किया था। इस बंद को राज्य की प्रमुख विपक्षी दल झामुमो ने भी अपना नैतिक समर्थन दिया था। कुल मिलाकर कहें तो भाजपा को छोड़कर सभी दलों ने बंद बुलाया था, जिस प्रकार बंद की तैयारी थी, उस प्रकार से तो ये बंद ऐतिहासिक हो जानी चाहिए थी, पर आम जनता द्वारा इस बंद को नकार दिये जाने के कारण ये बंद प्रभावहीन दिखा। हम आपको यह भी बता दें कि इस बंद को एक प्रकार से रांची के प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों ने भी अपना नैतिक समर्थन दिया था। एक अखबार जो स्वयं को अखबार नहीं आंदोलन कहता है, उसने तो इस आंदोलन को दमदार आंदोलन की संज्ञा दे डाली थी, पर उसे कल अवश्य घोर निराशा हाथ लगी होगी कि उसके इस दमदार आंदोलन में रांची में मात्र 472 बंद समर्थक ही सड़क पर दीखे, जो गिरफ्तार हुए। अगर हम झारखण्ड बंद की बात करें, तो पूरे झारखण्ड में बंद का मिला-जुला असर दिखा। राज्य के प्रमुख महानगरों जैसे रांची, जमशेदपुर, धनबाद व डालटनगंज में बंद का कोई असर नहीं दिखा। रांची में तो दोपहर के 12 बजे, जिंदगी आमदिनों की तरह दिखी।
सर्वाधिक मजा तो धनबाद में बंद के दौरान दिखा। बंद करानेवाले नेता मुकदमे के डर से स्वयं ही सेल्फी लेकर अपना फोटो पत्रकारों को उपलब्ध करा रहे थे। स्थिति ऐसी थी कि धनबाद में ज्यादातर नेता ड्रामेबाजी में ही मशगुल दीखे। कांग्रेस का एक नेता संतोष सिंह सुबह में राजधानी एक्सप्रेस को रोकने धनबाद स्टेशन पहुंचा, ट्रेन के आने पर फोटो खिंचवाई और चलता बना। झाविमो का रमेश राही का भी यहीं हाल था, सुबह बंद कराने निकले, स्टेशन पहुंचे, चेहरा चमकाये और चल दिये। जदयू के पिंटू सिंह का भी यही हाल था, यानी जेल और मुकदमे के डर ने इन नेताओं का गला सूखा दिया था।
आखिर ये बंद क्यों असफल रहा? इस बंद के असफल होने का मूल कारण, बंद के तिथि का समय ठीक नहीं होना है। चूंकि दीपावली है, धनतेरस है, धन्वतंरि जयंती है, भैया दूज है, छठ महापर्व का आगमन है, इन सारे पर्व – त्यौहारों के कारण बंद की हवा निकल गयी और जनता ने इस बंद से स्वयं को अलग रखा। शायद बंद समर्थक नेता व कार्यकर्ता इन बातों को समझने में असफल रहे।
बंद का भी एक समय होता है, आप जब बंद बुला लें और बंद का जनसमर्थन जुटा लें, ये संभव नहीं है। हां, अगर जनता का समर्थन चाहिए तो जनता का दिल भी टटोलना होगा, उनकी मनोदशा का भी आकलन करना होगा।
एक बात और, यहां की जनता पिछले 15 सालों से बंद का दंश झेलकर आजीज हो चुकी है, अब एक तरह से वह बंद से नफरत करने लगी है, ये बंद समर्थकों को समझना होगा। हां अब बंद का वे विकल्प तलाशें, अच्छा रहेगा कि ये बंद एकदिवसीय न होकर, कुछ घंटे का हो, जिसमें बंद समर्थक अपनी नीतियों को सरकार तक भी पहुंचा दें और आम जनता को तकलीफ भी नहीं हो। अगर इन विकल्पों पर राजनीतिक दलों ने नहीं सोचा, तो समझ लीजिये, राज्य की जनता उन्हें अच्छी तरह समझा देगी, क्योंकि ये राजनीतिज्ञ कोई दूध के धूले नहीं है, जनता सब समझती है...
एक बात और, भले ही बंद समर्थकों के बंद को रांची की जनता ने नकार दिया, पर झारखण्ड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने बंद को सम्मान देते हुए बंद समर्थकों के हौसले जरुर बुलंद कर दिये। उन्होंने अपने एक कार्यक्रम को झारखण्ड बंद के कारण रद्द कर दिया। जैसे उन्हें कल रांची के एक्सआइएसएस जाना था, पर वे वहां नहीं गयी और कह दिया कि चूंकि बंद है, इसलिए वे वहां जाने में असमर्थ है, यानी सरकार बंद में जनता के साथ और राज्यपाल बंद में बंद समर्थकों के साथ।

Saturday, September 10, 2016

पूरा बिहार पगलाया हुआ है, शहाबुद्दीन को लेकर...............

पूरा बिहार पगलाया हुआ है,शहाबुद्दीन को लेकर...
बेचारा नीतीश लालू का चरणामृत ग्रहण करने के बाद बिहार में अखंड शासन का सुखभोग रहा है...
मैं कहता हूं कि शहाबुद्दीन जेल से छूट गया तो क्या हो गया...
इसमें पगलाने की जरुरत ही क्या है...
इतिहास के पन्ने पलटो...
आजादी के पूर्व में कोई भी एक ऐसा अंग्रेज का नाम बताओ, जिसे सजा मिली हो, यहां तक की जनरल डायर जिसने अमृतसर के जालियावालां बाग में गोलियां चलाई, सैकड़ों निहत्थों को मौत के घाट उतार दिया, क्या उसे भी अंग्रेजों ने सजा दी?
और
आजादी के बाद, एक भी ऐसे नेता का नाम बताओ, चाहे वो कोई भी पार्टी से आता हो, उसे किसी भी अदालत ने सजा दी, दिमाग लगाओ, अरे सारे नेता कुछ दिन के लिए जेल जाते है, फिर जमानत पर निकल आते है और सुप्रीम कोर्ट तक जाते - जाते किसी न किसी बहाने दोषमुक्त हो जाते है,
अरे भाई
आपको ये बात क्यों नहीं समझ आती कि हर नेता जेल जाने के समय, ये डायलॉग जरुर बोलता है कि भाई हमें न्यायालय पर और देश के कानून पर पूरा भरोसा है...
इस भरोसे का मतलब नहीं समझते यार...
तुम एक दिन देखना कि चारा खा जानेवाला नेता लालू यादव भी एक न एक दिन अदालत से जरुर बरी हो जायेगा...
नीतीश बुर्बक थोड़े ही हैं, वो देश की न्यायिक व्यवस्था को, यहां की जनता के दिमाग को जानता है...
इसीलिए चारा घोटाले और अन्य घोटाले में बार-बार लालू को कटघरे में खड़ा करने के बावजूद अंत में नीतीश, लालू का चरणामृत ग्रहण कर सो गया...
और सोने के पूर्व, चरणामृत पीते-पीते क्या श्लोक बोला -
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्याप्त नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।
अब ये नीतीश उत्तम प्रकृति का है, या अधम प्रकृति का...
समझते रहिये...

Thursday, February 11, 2016

पैसे से कलम सधे,पैसा बावन बीर...........

हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
संपूर्ण समाज और व्यवस्था को चौपट करके रख देनेवाला और प्रतिदिन अपने कारगुजारियों से सामाजिक व्यवस्था को चोट पहुंचानेवाला रांची के एक अखबार का संपादक आज विनय महतो प्रकरण पर त्वरित टिप्पणी के नाम पर प्रवचन लिख रहा है...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
रांची पुलिस लगता है कि मुंबईया फिल्म ज्यादा देखती है, जरा ध्यान दीजिये फिल्म - हेट स्टोरी 3 और फिल्म - दृश्यम्, इन दोनों की कहानियां के कुछ प्रमुख अंश, आपको विनय महतो प्रकरण में भी मिल जायेंगे...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
विनय महतो प्रकरण में छह दिनों तक अखबारबाजी और चैनलबाजी होती रही, पर इतने महत्वपूर्ण विषय पर न तो भाजपा, न ही कांग्रेस, न ही झामुमो, न ही आजसू, न ही राजद, न ही झाविमो, न ही भाकपा, न ही माकपा, न ही भाकपा माले के किसी बड़े नेता के बयान आये, सभी ने होठ सील रखे थे, हमें लगता है कि इस पर ज्यादा कुछ लिखने की जरुरत नहीं, आप सभी बुद्धिमान है, समझ लीजिये...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
ध्यान दीजिये, विनय महतो दुनिया से चला गया, पर रांची पुलिस ने ऐसा तरीका निकाला कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। यानी सफायर इंटरनेशनल स्कूल में लग रहे दाग को भी रांची पुलिस ने बचा लिया, जो उसकी प्राथमिकता में थी, जो विनय महतो हत्याकांड प्रकरण में पकड़े गये, जिन पर आरोप है, वे भी जल्दी ही कानूनी पचड़ें से मुक्त हो जायेंगे, क्योंकि हत्याकांड में दो आरोपी नाबालिग है, ऐसे में इन पर जुवेनाइल के तहत मामला चलेगा, जिसमें ज्यादा दिन और कड़ी सजा मिलनी मुश्किल है। शिक्षिका के पति आरिफ पर सबूत मिटाने का आरोप है, जो घटनास्थल पर था ही नहीं, इसी प्रकार का आरोप शिक्षिका नाजिया पर है, यानी हत्या का सीधा मामला नहीं और पूरा परिवार कुछ ही सालों बाद आरोप से मुक्त और लीजिये सारा मामला टायं-टायं फिस्स। सचमुच पैसे में बहुत ताकत होती है...
हाहाहाहाहाहाहाहाहाहा......
पैसे होने पर नेताओं की बोली बंद हो जाती है, पैसे होने पर पुलिस भी आपके समक्ष रामायण गाती है, पैसे होने पर पत्रकारों की टीम भी विज्ञापन धर्म निभाते हुए, आपकी आरती गाती है...
इसलिए, मैं कहता हूं -
पैसा में गुण बहुत है, सदा कमाओ वीर।
क्योंकि पैसा है तो सब है, खाएं मक्खन वीर।।
पैसा से नेता सधे, पैसे से वर्दी चीर।
पैसे से कलम सधे,पैसा बावन बीर।।

Wednesday, December 2, 2015

अरे वाह नीतीश भाई......

अरे वाह नीतीश भाई...
बहुत बढ़िया सरकार चला रहे है...
इसी तरह आप सरकार चलाते रहे, तो बिहार सचमुच बहुत आगे निकल जायेगा...
कल पता चला कि आपको सहयोग दे रहा, आपका बड़ा भाई लालू प्रसाद अपनी पत्नी रावड़ी देवी को विधानमंडल दल का नेता बना दिया है और अपने दोनों बेटों को तो पहले ही मंत्रियों की श्रेणी में लाकर खड़ा दिया, जिसकी अवहेलना करने की आप में ताकत ही नहीं थी...
आज पता चला कि अभी तो आपकी सरकार बने दो हफ्ते भी नहीं हुए और अपराधियों ने अब तक पूरे बिहार में आधे दर्जन बैंक लूट लिए...
कल कटिहार में बंगाल से आये एक मक्का व्यापारी को लूट लिया...
शायद ये लूट का क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक आपके जीते हुए विधायक और मंत्रियों का समूह सामाजिक न्याय नहीं ला देता और इसके तहत अपनी गरीबी नहीं समाप्त कर लेता...
यहीं नहीं अपराधियों ने तो जमुई से भगवान महावीर की अतिप्राचीन और बेशकीमती मूर्ति भी लूट ली...
और
बधाई इसके लिए भी आपके एक विधायक के समर्थकों ने तो भागलपुर के जिला मुख्यालय में तैनात डीएसपी को ही गंगा में फेंक देने की कोशिश की
और राजद के एक विधायक ने तो एक पुलिसकर्मी को ही ठिकाने लगाने की बात कर दी...
बस अब क्या...
सामाजिक न्याय आ गया...
प्रभात खबर के प्रधान संपादक और जदयू के सांसद हरिवंश का सपना साकार हो गया...

Wednesday, November 11, 2015

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...

धिक्कार, उन कलमों को...उन चैनलों को...
जो बिहार चुनाव परिणाम का सही विश्लेषण न कर सकें...
• जीत कर भी हार गये नीतीश...
(संदर्भ – बिहार चुनाव परिणाम)
आइये हम आपको एक कहानी सुनाते है। दो बिल्लियां थी। उन्हें कहीं से एक रोटी मिली। एक रोटी के टूकड़े में अधिक हिस्से पाने को, वे आपस में लड़ पड़ी। दो बिल्लियों को आपस में लड़ता देख, कहीं से आए वानर ने कहां कि लाओ इस रोटी को, हम तुम दोनों के बीच में बराबर – बराबर बांट दें, फिर क्या था? बिल्लियों ने हामी भर दी और वह चालाक वानर इन दोनों बिल्लियों को मूर्ख बनाकर सारा रोटी हजम कर गया.........
बिहार चुनाव परिणाम के संदर्भ में बचपन में सुनी इस कहानी में, आप दो बिल्लियों में एक को जदयू और दूसरे को भाजपा के रुप में रख सकते है। हालांकि बहुत सारे लोगों को ये कहानी बिहार संदर्भ चुनाव में गले से नहीं उतरेगी। उतरना भी नहीं चाहिए, क्योंकि बहुत सारी ऐसी कहानियां है, जो गले में तब उतरती है, जब कोई घटना का बहुत बुरा अंजाम सामने आता है...क्योंकि कहानियां समझ में आ जाये और उस अनुरुप हम कार्य करें, ऐसा होता भी नहीं......
बिहार के चुनाव परिणाम बताते है कि नीतीश की लालू भक्ति की वजह से लालू यादव एक बार फिर किंग मेकर बने है और नीतीश स्वयं फिसड्डी। नीतीश जानते थे कि लालू कृपा बिना इस बार वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकते, इसलिए उन्होंने अपने सारे अहं का त्याग कर लालू कृपा पाने के लिए वे लालू के चरणों में लोट गये...हुआ वहीं, यादवों के नेता लालू ने, कुर्मियों के नेता नीतीश को गले लगाया और कहा कि तुम चिंता क्यों करते हो?, हम यादव नेता, तुम कुर्मी के नेता और बचा मुसलमान...तो मुसलमानों का सबसे बड़ा शत्रु कौन है, तो वह हैं भाजपा....। मुसलमानों का नारा क्या होता है?...बस वहीं वोट उसी को जायेगा, जो भाजपा को हरायेगा....और जब हमारा कंबिनेशन बनेगा तो वो जायेगा कहां...उसका वोट इधर ही आयेगा....और हुआ वहीं....यादव, मुस्लिम और कुर्मी तीनों मिल गये और भाजपा धराशायी..........
सच्चाई यहीं है... इसमें कोई अरंतु-परंतु नहीं, ये अलग बात है कि नीतीश-लालू भक्ति और इन दिनों मोदी से परेशान मीडिया का एक बहुत बड़ा वर्ग इस परिणाम के बाद लंबा-चौड़ा संपादकीय दिये जा रहा है...
हम आपको एक और कहानी सुनाते है.........
बिहार के एक मुख्यमंत्री थे – कर्पूरी ठाकुर। वो बराबर कहा करते थे। आप कितना भी विकास कर लो, बिहार में विकास के नाम पर वोट थोड़े ही पड़ता है। यहां तो सिर्फ कंबिनेशन चलता है...ये कंबिनेशन हमेशा से रहता है, ये अलग बात है कि इसका फायदा कोई – कोई, कभी – कभी उठाता है और कोई हमेशा उठाता रहता है....
नीतीश ने कम दिमाग नहीं लगाया था...वो मीडिया के महत्व को भी जानता था। इसलिए उसने प्रभात खबर के प्रधान संपादक पर डोरे डाले, पता चला कि ये तो राज्य सभा भेजने में ही गदगद हो जायेंगे, उसे राज्य सभा भेज दिया। फिर देखा कि एनडीटीवी को भी उपकृत करना चाहिए, पता चला कि रवीश का भाई चुनाव लड़ना चाहता है, नीतीश ने बहुत बड़ा त्याग किया। निरंतर जदयू की सीट रहनेवाली गोविंदगंज की सीट रवीश के भाई को थमा दी, कांग्रेस के टिकट पर रवीश का भाई लड़ा, ये अलग बात है कि वह चुनाव हार गया, पर कशिश चैनल के मालिक ने तो बेनीपुर में जदयू के टिकट पर आखिरकार झंडा बुलंद कर ही दिया। यानी नीतीश ने राजनीति के साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई और वो चीजें पाई, जिसको लेकर वो ज्यादा सक्रिय था.....
पर नीतीश को भी मालूम है कि सरकार तो उसकी बनी पर उसके क्या परिणाम निकले....कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा। याद करिये, चुनाव परिणाम के बाद का नीतीश, लालू और अशोक का संयुक्त प्रेस काँफ्रेस। जो शारीरिक विज्ञान को जानते है, उन्हें ज्यादा दिमाग लगानी नहीं पड़ेगी, जो बयानों की तकनीक को जानते है, उन्हें भी ज्यादा दिमाग लगाना नहीं पड़ेगा। नीतीश ने चुनाव परिणाम की बारीकियां समझी और उसी के अनुसार बयान दिया, ज्यादा आक्रामकता नहीं दिखाई, चेहरे पर भी जीत का भाव नहीं दिखा, एक संशय जरुर दिखा...जबकि इसके विपरीत लालू गदगद, वो सारी बाते लालू ने कहीं, जो उनके स्वभाव में है, इस प्रेस कांफ्रेस में भी, उन्होंने उनलोगों को चेता ही दिया कि जो वोट उन्हें नहीं दिये, वे संभल जाये... यानी इशारा किस ओर था, इशारों को समझने वाले जान गये है...
अब दूसरी बात..........
नीतीश से कुछ सवाल, जो उनके भक्त पत्रकार उनसे नहीं पूछ सकते या उनसे अनुप्राणित मीडिया का वर्ग, या उनके जाति के पत्रकार नहीं पूछ सकते.....
क्या नीतीश-लालू बता सकते है, कि जब उनका गठबंधन इतना ही लोकप्रिय था और जब कुर्मी, यादव और मुस्लिमों का इतना बड़ा गठजोड़ था तो फिर वे कुर्मी, यादव और मुसलमान बहुल राजधानी पटना के पटनासिटी, कुम्हरार, दीघा, बांकीपुर और दानापुर की सीट पर बुरी तरह से क्यों हार गये?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब उनका शासन बहुत ही लोकप्रिय था तब उनकी सीटे लालू से भी कम क्यों आयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि जब चुनाव परिणाम आ रहा था तो राजधानी पटना के व्यवसायियों और अन्य प्रबुद्ध वर्गों में भय क्यों व्याप्त हो रहा था?
क्या नीतीश बता सकते है कि उनके स्पीकर और अन्य मंत्रियों की करारी हार कैसे हो गयी?
क्या नीतीश बता सकते है कि इतनी बड़ी जीत के बाद भी, उन्हीं के द्वारा आयोजित प्रेस कांफ्रेस में उनके चेहरे का रंग उतरा हुआ क्यों था?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने इस चुनाव में प्रधानमंत्री के खिलाफ निम्नस्तरीय शब्दों का प्रयोग नहीं किया?
क्या नीतीश दावे के साथ कह सकते है कि उन्होंने मीडिया जगत के लालची पत्रकारों और लालची मालिकों को खुश करने के लिए वे सारे हथकंडे नहीं अपनाए, जो भाजपा ने अपनाए थे?
ये सारे सवाल सिर्फ नीतीश से पूछना चाहिए, क्योंकि वे सुशासन बाबू है, लालू से तो पूछने का सवाल ही नहीं है...क्योंकि वे खुद ही बता चुके है, इस चुनाव में कि वे क्या है?
नीतीश जी, ये याद रखिये.....जब कोई जीतता है तो उसके जीत का कारण कोई नहीं पूछता, हां जो हारता है, उसके हार के कारण गिनाएं जाते है.....
मैं जानता हूं कि बहुत सारे अखबार और मीडिया हाउस में भी जातिवादी पत्रकारों और लालची पत्रकारों का समूह पैदा हुआ है, जो कभी कांग्रेस, तो कभी भाजपा और आज आपका गुणानवाद कर रहा है, पर इससे नुकसान किसका हो रहा है। आप ये जानकर भी अनजान है....नुकसान उन बेवकूफों का हो रहा है, जो नहीं जानते कि पिछले पच्चीस और अब आज से तीस सालों तक वे अभी सड़कों, बिजली और पानी पर ही अटके हैं जबकि अन्य राज्य इन सबसे कहीं बहुत दूर निकल चुके है.....
ये बेवकूफ बन रहे लोग नहीं जानते कि उनके बच्चे विकसित होते कई राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रह रहे हैं और उनकी औकात सिर्फ कुली, पोछा लगानेवाले से ज्यादा कुछ भी नहीं...
आप में जितना अहं हैं, हमें नहीं लगता कि केन्द्र और राज्य के बीच कोई मधुर संबंध रहेगा और आप बिहार को इन परिस्थितियों में जबकि राजद आपसे बीस है, कोई राज्यहित में स्वतंत्र रुप से निर्णय ले लेंगे.....
• नीतीश भक्ति और प्रभात खबर...........
सभी जानते है कि जैसे ही बिहार चुनाव की घोषणा हुई, दिल खोलकर प्रभात खबर ने लालू यादव, नीतीश कुमार, सोनिया गांधी और उनके लाडले राहुल की भक्ति में स्वयं को अनुप्राणित करना शुरु कर दिया....ऐसा होना भी चाहिए था क्योंकि नीतीश कुमार ने बिना एक पैसे प्रभात खबर से लिये, इसके प्रधान संपादक को राज्य सभा में पहुंचा दिया था....
प्रभात खबर की भूमिका देखिये, उसकी महागठबंधन भक्ति देखिए........
उसके लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत नहीं, बस 9 नवम्बर का अखबार कहीं से उठा लीजिये और सबसे पहले प्रथम पृष्ठ पर नजर दौड़ाइये...उसने भाजपा के हार के कारण गिनाएं है, लिखा है...भाजपा के हार के प्रमुख कारण, निम्नलिखित है....
• आरक्षण पर संघ प्रमुख भागवत का बयान
• नीतीश के डीएनए पर सवाल उठाना
• गोमांस को लेकर अनावश्यक बयानबाजी
• लालू को शैतान कह कर हमला करना
• नीतीश पर बिना तथ्यों के हमला करना
• प्याज, दाल की कीमतों में भारी वृद्धि
• नीतीश के मुकाबले राज्य में एनडीए के पास कोई दमदार चेहरा का न होना
• नीतीश सरकार के कामकाज के प्रति लोगों की सकारात्मक राय
यानी हार के 8 कारणों में नीतीश व लालू की भक्ति में पांच कारण जोड़ दिये गये....
यहीं नहीं प्रथम पृष्ठ पर लिख दिया लालू प्रसाद के बेटों तेज प्रताप व तेजस्वी को छोड़ कर सभी नेतापुत्रों को मिली हार, जबकि खुद पृष्ठ संख्या 13 पर शिवानंद तिवारी के बेटे को भी जीत दिखलाता है, सच्चाई क्या है? प्रभात खबर ही बेहतर बता सकता है....
इस अखबार में नीतीश के प्रशसंकों के कई आलेख भी छपे है...
पृष्ठ संख्या 13 पर प्रंजॉय गुहा ठकुराता के आलेख है – सांप्रदायिकता की राजनीति की पराजय। सवाल - ठकुराता से। 2005 व 2010 में जब नीतीश भाजपा का बांह पकड़कर सत्ता में आये थे तो उस वक्त क्या सांप्रदायिकता की राजनीति की जय हुई थी?
पृष्ठ 14 पर संपादकीय में तो नीतीश भक्ति के सिवा कुछ भी नहीं, अभिमत में रविभूषण जो वामपंथी पत्रकार है, विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी है, इनके कलम से मैंने आज तक भाजपा व संघ की प्रशंसा में दो शब्द नहीं देखे तो आज कैसे देख पाउंगा...हां पत्रकार को कभी भी किसी का सदा के लिए विरोधी या सदा के लिए प्रेमी नहीं होना चाहिए...पत्रकार को तटस्थ होना चाहिए.......
पृष्ठ संख्या 15 तो भगवान नीतीश को समर्पित है...हल्की दाढ़ीवाले बाबा नीतीश का बहुत बड़ा फोटो और उनका चरित्र वर्णन है...ये आम तौर पर होता है, जब कोई सत्ता में आता है तो उसके लिए एक विशेष पेज होता है...इस पर हमें कोई टिप्पणी नहीं करनी है.......
पृष्ठ संख्या 18 पर चरणवार भाजपा की हार का मनगढंत विश्लेषण और अजय कुमार व एमएन कर्ण का संपादकीय आधारित आलेख है, जिसमें नीतीश व लालू को भगवान का दर्जा दे दिया गया है।
और अंतिम पृष्ठ पर भाजपा व संघ का दुश्मन व जब तक जीवित रहेगा दुश्मन बना रहेगा...नाम बता देता हूं, उर्मिलेश का आलेख है। ये वहीं उर्मिलेश है, जिसे चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू में सामाजिक न्याय नजर आता है और नीतीश में शासन के सर्वगुण संपन्न होने के गुण...ये पत्रकार जहां भी भाजपा का विरोध हुआ देखता है, पुलकित हो जाता है, और जहां अपनी जाति के लोगों को जीत देखता हैं, प्रसन्न होकर उसकी स्तुति करता है....इन दिनों प्रभात खबर का चहेता बना हुआ है... इसके आलेख है........
यानी गर आप नीतीश के कट्टर समर्थक है, भाजपा का विरोध करना जानते है, तो हरिवंश को पकड़िये, प्रभात खबर से जूड़िये और कल तक खलनायक थे, तो नायक बन जाइये.........
अपनी बात.......
नीतीश के जीत के कारण...
एकमात्र जीत का कारण – जातिवादी लहर को फैलाना, लोगों को उनकी जाति का हवाला देना, यादववाद, कुर्मीवाद और अंत में मुस्लिमों के अंदर ये बात फैलाना कि भाजपा आई तो उनकी खैर नहीं........
भाजपा के हार के कारण.....
• जातिवाद लहर के आगे संप्रदायवाद की हवा निकल जाना।
• बेवजह असहिष्णुता का बवंडर विपक्षियों द्वारा अपने शुभचितकों, लेखकों, फिल्मकारों साहित्यकारों द्वारा खड़ा करना, ताकि मोदी सरकार को अल्पसंख्यक विरोधी और हिंदूवादी बताया जाय।
• भाजपा के कई नेताओं द्वारा विषवमन करना।
• भाजपा के अंदर शत्रुघ्न सिन्हा जैसे जयचंदों का बराबर अपनी ही पार्टी के खिलाफ विषवमन करना और नीतीश व लालू का प्रशंसा करना।
• भाजपा के एक नेता साक्षी महराज द्वारा दूसरे चरण के बाद भाजपा की हार स्वीकार करनेवाले बयान को जारी करना।
• एकमात्र मोदी के भाषण पर ही ध्यान टिका कर, अन्य चुनाव प्रचारों व सशक्त जनसमर्थन जुटाने पर ध्यान का न होना।
• सामान्य वर्ग द्वारा बढ़ती महंगाई के खिलाफ गुस्सा।
• प्रधानमंत्री द्वारा पूर्व में दिये गये बयान कि काला धन वापस लायेंगे, पर अभी तक उस पर कोई प्रगति का न होना, जबकि कोई भी सरकार आये, ये इतना जल्द संभव भी नहीं, पर आम जनता को लगा कि सरकार अपने इस वायदे को पूरा करने में सफल नहीं रही।
• मीडिया के एक बहुत बड़े वर्ग द्वारा नीतीश को खुलकर समर्थन करना और उसे बिहार की जनता के बीच एक महान शख्सियत के रुप में पेश करना, जैसे ये दीने इलाही अकबर हो।
• नीतीश द्वारा अनुप्राणित अखबार जैसे प्रभात खबर और कुछ चैनलों द्वारा खुलकर नीतीश भक्ति में डूब जाना।
चुनाव परिणाम के प्रभाव............
• अब नीतीश कुमार गर चाह लें कि वे स्वतंत्र रुप से बिहार के लिए कोई निर्णय कर लें, ये अब संभव नहीं है, उन्हें हर बात के लिए लालू की शरण में जाना होगा और लालू वहीं करेंगे, जो उनके हित में होगा।
• लालू सर्मथकों का स्थानीय प्रशासन पर बोलबाला रहेगा, गुंडों की जमात स्थानीय शासन पर हावी रहेगी और व्यापार में बिहार पिछड़ता चला जायेगा।
• ऐसे ही बिहार की नकारात्मक छवि पूरे देश में है, अब इसकी छवि और पुष्ट होगी, कोई भी उदयोग जगत का व्यक्ति यहां उद्योग लगाने से हिचकेगा, जो अब बचा भी होगा तो यहां से दूसरे जगहों पर वो सिफ्ट करेगा।
• ऐसे ही अहंकार में डूबे नीतीश को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नहीं बनती, ऐसे में विकास को लेकर बिहार में संशय की स्थिति बनी रहेगी।
• पन्द्रह साल लालू-रावड़ी और दस साल नीतीश और अब फिर लालू-नीतीश मतलब एक बार फिर रोजगार की तलाश में जाने को मजबूर बेरोजगार युवकों की फौज बिहार को छोड़ अन्य राज्यों में जाने को मजबूर होगी।
• एक बार फिर बिहार के ये युवा महाराष्ट्र, असम, कर्णाटक आदि राज्यों में दोयम दर्जें के नागरिक बन कर रहने को विवश होंगे और समय-समय पर जलील होंगे, पिटाई खायेंगे...क्या नीतीश व लालू बता सकते है कि महाराष्ट्र व गुजरात से कितने युवा बिहार में रोजगार के लिए आते है।
• एक बार फिर बिहार के लोग अच्छी स्वास्थ्य सेवा के लिए बिहार से दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होंगे।
• एक ओर जहां आंध्र प्रदेश अपनी नई राजधानी अमरावती को बसाने के लिए ठोस प्रयास कर रहा होगा, तो बिहार की जनता अपनी जातिवाद पहचान के लिए संघर्ष करती नजर आयेगी।
• एक साल में झारखंड व्यापार सुगमता सूचकांक में भारत के प्रमुख विकसित राज्यों में तीसरा स्थान बना लिया और तेजी से बढ़ते राज्यों में चौथा स्थान प्राप्त कर लिया और बिहार सबसे नीचे रहने के लिए स्थान बनाने को व्याकुल रहेगा।
• प्रभात खबर के प्रधान संपादक एक बार फिर राज्यसभा में जाने के लिए नीतीश कुमार की द्यादृष्टि पाने के लिए लालायित रहेंगे और सामान्य जनता इस बात के लिए व्याकुल रहेगी कि उसके घर से निकली बेटियां सही सलामत घर लौटेंगी भी या नहीं।
कौन कहता है कि बिहार में विकास व सुशासन की जीत है, मैं कहता हूं कि ये पूर्णतः जातिवाद की जीत है...जैसे सांप्रदायिकता बुरी है, वैसे ही जातीयता बुरी है, पर कुछ पत्रकार, कुछ बुद्धिजीवी जातीयता का तो समर्थन करते है, पर सांप्रदायिकता की आलोचना...ठीक उसी प्रकार जैसे पाकिस्तान भारत प्रायोजित आतंकवाद का तो समर्थन करता है, पर अन्य जगहों पर होनेवाले आतंकवाद की कड़ी भर्त्सना करता है...ये दोगली सोच बिहार को बर्बाद कर डालेगी...पता नहीं, बिहार की जनता को अक्ल कब आयेगी?
हमें लगता है कि एक दिन अक्ल जरुर आयेगी...पर तब तक बहुत देर हो चुका होगा...और कुछ लोग गाने गायेंगे...सब कुछ लूटा के होश में आए तो क्या किया....

Thursday, November 5, 2015

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........

लालू यादव ब्राह्मणों को अच्छी गाली दे लेते है...........
बिना ब्राह्मणों को गाली दिये, लालू का भोजन पचता भी नहीं.......
लालू यादव दुनिया के पहले नेता नहीं जो ब्राह्मणों को गाली देता है, ऐसे कई नेता है जो ब्राह्मणों को गाली देना शान समझते है, इससे उन्हें वोटों में बढ़ोत्तरी होती है और उनके दल का प्रचार – प्रसार भी हो जाता है। कंस की परंपरा को वर्तमान युग में भी ले चलने की उनकी सोच बहुत ही निराली है। स्थिति ऐसी है कि एक समय उनके घोर विरोधी माने जानेवाले अखबार के प्रधान संपादक भी, अपने अखबार में उनके दिव्य फोटो छापने से अब परहेज नहीं करते, क्योंकि उनके प्रिय नेता नीतीश कुमार के बड़े भाई के नाम से आजकल लालू यादव विख्यात हो रहे है.......अपने प्रिय नीतीश को वे भला निराश कैसे कर सकते है...। कुछ लोग कहते है कि शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे ब्राह्मण लालू की पार्टी में है, तो भाई मेरे रावण को भी कुछ लोग ब्राह्मण कहा करते है, तो ऐसे में क्या हम शिवानंद तिवारी और मनोज झा जैसे लोगों को इसलिए हम ब्राह्मण मान लें कि उसने ब्राह्मण कुल में जन्म ले लिया। जो लालू यादव जैसे ब्राह्मण द्रोही की शरण में बैठकर, उसके भ्रष्टवाणियों को सुने, जो पशुओं के चारा खा जानेवाले भ्रष्ट नेताओं की आरती उतारे वह किसी जिंदगी में ब्राह्मण नहीं हो सकता....। उसके हाथ से तो जल ग्रहण करना या अपने बच्चों पर आशीर्वाद के रुप में पुष्प-अक्षत छिड़कवाना भी महापाप है....जो भी ब्राह्मण लालू यादव अथवा उसकी पार्टी या उसके समर्थकों का गुणगान करता है, वह महापातक है, उसे तो नर्क में भी जगह नहीं मिले....जो गोमांस का समर्थन करे, वह गोपालक कैसे हो सकता है, वह गोसंहारक है..........
सही मायनों में अभी लालू यादव को ब्राह्मण से भेंट ही नहीं हुआ है, जिस दिन भेंट हो जायेगा, उन्हें पता चल जायेगा, कि ब्राह्मण क्या होता है?, वे मनोज झा और शिवानंद तिवारी जैसे ब्राह्मण, जो उनकी चरणवंदना करते है, वे समझ लेते है कि बस अब ब्राह्मणों की यहीं औकात है...अरे लालू जी, जिस दिन ब्राह्मण अपने तेज को पहचान लिया तो फिर आप कहां रहोगे, आपको पता ही नहीं चलेगा...
हां एक बात और, आपको आपके किये का फल ब्याज समेत ईश्वर दे रहा है, फिर भी आपको शर्म नहीं...शर्म आयेगी भी कैसे, शर्मवालों को न शर्म होता है...आप तो विशुद्ध रुप से बेशर्म है....बोलने की तो आपको तमीज है नहीं और न ही आप बोलने की तमीज सीखेंगे, क्योंकि आप नमूने जो ठहरें, हमें तो लगा था कि बिहार की सत्ता से दस साल बेदखल होने के बाद आपको बुद्धि आ गयी होगी, पर आप तो वहीं है, न सुधरे थे, न सुधरे है, न सुधरेंगे........
खुब गाली दीजिये ब्राह्मणों को, हो सके तो सारे चैनलों पर संतों की तरह प्रातः का एक बुलेटिन बुक करवा लीजिये, और जी भरकर ब्राह्मणों को गाली दीजिये, क्योंकि जब तक आप ब्राह्मणों को गाली नहीं दीजियेगा, तब तक आपका और आपके दल का उद्धार कैसे होगा.....वोट कैसे मिलेगा, आप धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील कैसे कहलाइयेगा....हां आप ही के एक दल में एक नेता है, शायद उसका नाम रघुवंश प्रसाद सिंह है। उससे ज्ञान भी अर्जन करिये, वो बतायेगा कि गोमांस कब और कैसे खाया जाता है?, कौन- कौन ऋषि गोमांस खाकर भगवान को प्राप्त कर लेते थे? इससे एक नये समाज का जन्म होगा। सुबाहुवाद और मारीचवाद बिहार के कण-कण में फैलेगा, तब परिकल्पना कीजिये....अपना बिहार कितना सुंदर दीखेगा....जब सब बिहारी भाईयों के हाथों में गोमांस होगा....और जोरदार नारा लगायेंगे, नारा इस प्रकार होगा.....
गोमांस हम खायेंगे,
लालू के संग जायेंगे....
धन्य – धन्य बिहार प्रदेश,
जहां मिले गोमांस अनेक....
यादव-मुस्लिम भाई-भाई
गोमांस से करो कमाई....
भाईचारा तभी आयेगा,
जब गोमांस सब खायेगा....
शाकाहारी मुर्दाबाद,
मासांहारी जिन्दाबाद.....
शाक-सब्जी नहीं खायेंगे
केवल गोमांस घर लायेंगे.....
रोज सबेरे, एक ही काम
ब्राह्मणों का, कर दो काम तमाम....
और लालू जी आपके लिए एक और काम की बात....सारे बिहार के लोगों को बता दीजिये कि कैसे कश्मीर से सारे कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया और आज वहां केवल मुस्लिमों की आबादी शान से रह रही है....इसलिए बिहार में भी ब्राह्मणों को हटाने के लिए नीतीश कुमार के साथ एक व्यापक आंदोलन चलाईये ताकि बिहार से ब्राह्मणों का सदा के लिए सफाया हो जाय और आप माई समीकरण के तहत जब तक जिंदा रहे राज करें.....फिर आपके बेटे-बेटियां राज करें....कालांतराल के बाद जब मुस्लिमों की जनसंख्या बढ़ जाये तो फिर आप के खानदान के लोग सदा के लिए उन्हें सत्ता सौंप दें....बाद में आपकी आनेवाली पीढ़ी खुद भी यह कहकर धर्मांतरण कर लें कि उन्हें लोकतंत्र में गहरी आस्था है..........

Thursday, October 29, 2015

अरविंद, लालू, ममता और नीतीश को मिलकर गोकशी दल बनाना चाहिए, तभी राजनीतिक महत्वाकांक्षा सधेगी...........

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी, बीफ खाने व खिलाने को आमदा राजद नेता लालू प्रसाद यादव और उनके गो भक्षण को व्याकुल राजपूत कुलभूषण रघुवंश प्रसाद सिंह को मिलकर गोकशी दल बना लेना चाहिए।
इसके अनेक फायदे हैं.........
1. आरएसएस व भाजपा, साथ ही भारत की उन बहुसंख्यक आबादी को बार-बार चिढ़ाने का मौका मिलेगा, जो गोमांस से परहेज करते है।
2. बहुसंख्यक जमात के दिलों को भले ही ठेस लगे, वो बोल नहीं सके, पर खुद को अल्पसंख्यक कहलाने में गौरव महसूस करनेवाले मुस्लिमों व ईसाईयों का वोट सदा के लिए उन्हीं का होकर रह जायेगा।
3. किसी को बुरा लगे तो लगे, जैसे बकरे कटते हैं, मुर्गियां कटती हैं, ठीक उसी प्रकार हर मुहल्ले में गोकशी केन्द्र बनना चाहिए ताकि लोग आराम से गो मांस खाकर स्वयं को सुबाहु व मारीच समझ सके, इससे देश में लाल-क्रांति हो जायेगी। गो की जनसंख्या का नियंत्रण भी हो जायेगा और वैज्ञानिक हल भी।
4. अंग्रेजों के फूट डालो शासन करो की नीति का फायदा, आजादी के बाद भी गोहत्या के द्वारा ही सिर्फ उठाया जा सकता है, ये देश के सभी राजनीतिक दलों को बता देना चाहिए, ताकि गोकशी दलों में आपसी भाईचारा बनी रहे।
5. गो हत्या के संबंध में सुबाहु-मारीच ने जो कहा था, ऐसे विद्वानों की वाणी को जन-जन तक पहुंचाना चाहिए, ताकि महर्षि कण्व, कणाद की यह भूमि सुबाहु व मारीच जैसे लोगो के कारण जानी जाये, इससे फायदा यह होगा कि ब्राह्मणवाद भी खत्म होगा और सुबाहुवाद-मारीचवाद की नयी परंपरा जागृत होगी, इससे देश में सही रुप से समाजवाद आयेगा।
6. रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे राजद नेताओं को जयचंद व मानसिंह जैसे महान शख्सियतों के पद चिह्नों पर चलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने विदेशी आक्रांताओं व लूटेरों के साथ एक बेहतर संबंध बनाए। महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान तो मूर्ख थे, इसलिए हमारा रघुवंश प्रसाद सिंह को सुझाव होगा, कि गांव – गांव में जयचंद व मानसिंह स्मारक समिति बनाकर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सौहार्द उत्सव मनाते हुए जनजागृति चलाए और इस आयोजन में गोमांस अवश्य खिलवाएं, ताकि सुबाहू – मारीच के सपने पूरे हो सके, ताकि महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की आत्माएं सिसककर रोती रहे और मानसिंह व जयचंद की आत्माएं गौरवान्वित महसूस करें। लक्ष्य एक ही रखे - देश भाड़ में जाय, संस्कृति भाड़ में जाये, पर सुबाहु व मारीच के सपनों का भारत हम जरुर बनायेंगे और आनेवाले पीढ़ी को बताएंगे कि तुम राम और कृष्ण के वंशज नहीं, बल्कि तुम सुबाहु व मारीच की संतान हो, तुम्हें अकबर और मुहम्मद गोरी जैसे लोगों के लिए जीना है, जैसे ही देश में कोई ब्राह्मण जाति का टीका लगाये हुए व्यक्ति या गाय मिले, उसका सर कलम कर दो, क्योंकि उसे जीने का अधिकार ही नहीं, जीने का अधिकार सिर्फ रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे कुलभुषणों का हैं...........
7. हर सप्ताह एक बैनर लगाकर, जैसा कि आजकल फैशन चल गया है, गोकशी दलों में शामिल लोगों को गोमांस खाओ आंदोलन चलाना चाहिए, ताकि देश से सारी गाये ही समाप्त हो जाय, क्योंकि बच्चों को दूध-मक्खन-घी नहीं बल्कि मांस यत्र-तत्र-सर्वत्र उपलब्ध होना ही चाहिए।
8. गोकशी दलों को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि गर किसी मां के छाती से दूध न निकले तो डाक्टरों द्वारा प्रचारित व प्रसारित कि बच्चों को गाय का दूध पिलाये, ऐसे डाक्टरों को दंडित कर दिया जाय। ये सुनिश्चित किया जाय कि भारत में जो भी बच्चे पैदा होंगे, वे सुबाहु व मारीच की तरह गाय का दूध के बदले गाय का रक्त और फिर बड़ा होते ही गोमांस खायेंगे। इससे देश बहुत ही तरक्की करेगा............
9. जो भी व्यक्ति या दल या संस्थान गोरक्षा अभियान चलाए, उसे तत्काल फांसी पर लटकाने का भी प्रबंध होना चाहिए, क्योंकि ये माना जाये कि गोरक्षा अभियान चलाने वाले देश के सबसे बड़े शत्रु है और ये खाने की स्वतंत्रता का हनन करते है।
10. गोकशी दलों को विभिन्न मीडिया चैनलों के माध्यम से भी गोहत्या कराने को प्रेरित करना चाहिए, ताकि मीडिया में शामिल उनके भाई-बंधु-बहनें भी अनुप्राणित हो सके। मीडिया में शामिल सभी पत्रकारों और मीडिया के मालिकों को किसने कितनी गो हत्याएं की या करवायी, उस पर एक प्रतियोगिता भी रखनी चाहिए, ताकि लोग सारे काम – धाम छोड़कर गोहत्या प्रतियोगिता में शामिल होकर, देश का मान बढ़ा सके.......
11. गोकशी दलों को ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जो लोग गोमांस खा रहे है, वे अपने गर्दन में एक आईकार्ड जरुर रखे, जिसमें लिखा हो, हमें गर्व है कि हम गोमांस खाये हैं, ताकि दूसरे लोग समझ ले कि सामनेवाला व्यक्ति प्रगतिशील और वह निहायत मूर्ख है।
12. गोमांस खाने के बाद गर किसी को मनुष्य के मांस खाने की आदत हो जाये, तो इसकी भी विशेष व्यवस्था करने के लिए गोकशी दल को तैयार रहना चाहिए क्योंकि खाने की स्वतंत्रता तो हर हाल में एक सामान्य व्यक्ति को होना ही चाहिए।
क्यों कैसी रहीं............
जनहित में जारी.........
खासकर बिहार के दाढ़ीवाले बाबा रघुवंश को सादर समर्पित...........

Thursday, June 6, 2013

बिहार ने लालू की लालटेन की लौ बढ़ाई, जबकि नीतीश के तीर भोथर किये.................

बिहार में महराजगंज लोकसभा के उपचुनाव के परिणाम आ गये। राजद के प्रभुनाथ सिंह 1 लाख 37 हजार से भी अधिक मतों से जीते। जदयू के पी के शाही दूसरे नंबर पर रहे, जबकि कांग्रेस की जमानत तक जब्त हो गयी। लालू की बल्ले - बल्ले है। चुनाव परिणाम के पहले चक्र की मतगणना के बाद ही वे दहाड़ रहे थे। टीवी पर उनका बयान आ रहा था, कह रहे थे कि प्रभुनाथ लालटेन लेकर दौड़ रहा हैं। नीतीश का हाल क्या होगा - गइल गइल भइसिया पानी में। ब्रह्मर्षि समाज की जय जयकार कर रहे थे, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि इस बार ब्रह्मर्षि समाज के लोगों ने दिल खोलकर उनका साथ दिया हैं और हुआ भी ऐसा ही। बेचारे पी के शाही जिस नीतीश के विकास का तीर लेकर महराजगंज में खूंटा गाड़ने का प्रयास कर रहे थे, उनका खूंटा प्रथम चक्र की मतगणना के बाद ही उखड़ गया। उन्होंने बयान दे डाला कि कार्यकर्ताओं का उत्साह व जोश नहीं था और पार्टी के अंदर चल रही भीतरघात और गठबंधन धर्म के ठीक से निर्वहन नहीं होने के कारण उनकी हार हो गयी। इधर लालू दहाड़ रहे थे, और दिल्ली में नीतीश, छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमण सिंह से गुफ्तगूं कर रहे थे। टीवी पर ये भी दिखा कि जब नीतीश, रमण सिंह से बातें कर रहे थे, तब छायाकारों का समूह, इनकी छवि को अपने कैमरे में कैद कर रहा था, पर ये क्या जैसे ही नरेन्द्र मोदी उधर से निकले छायाकारों का समूह मोदी की ओर दौड़ पड़ा। 
पांच जून को देश के कई हिस्सों में हुए लोकसभा और विधानसभा के चुनाव परिणामों ने सभी पार्टियों को सबक सिखायी हैं, पर सच्चाई ये हैं कि किसी भी दल ने इस सबक को सीखने की कोशिश नहीं की।
गुजरात में चार विधानसभा सीटों और दो लोकसभा सीटों पर भाजपा को मिली भारी जीत, इस बात का संकेत हैं कि गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को छोड़ना नहीं चाहती, उसे लगता हैं कि नरेन्द्र मोदी के हाथों में ही गुजरात का भविष्य हैं। जनता का फैसला शिरोधार्य होना भी चाहिए। पर बिहार में क्या हो रहा हैं। लगातार नीतीश के विकास का हव्वा खड़ा करनेवाले नीतीश के चाटूकारों की हवा निकल गयी हैं। बोलती बंद हैं। कल तक नीतीश - नीतीश जपनेवाले और इसी दरम्यान भाजपा की वैशाखी पर सरकार चलाते हुए भाजपा को ही आंख दिखानेवाले, मौसमी शेर गायब दीखे। महराजगंज की हार ने, उनकी सारी हेकड़ी निकाल दी हैं। जदयू के इन छुटभैयें नेताओं को लगता था कि बिहार की जनता नीतीश के आगे नतमस्तक हैं। जो नीतीश बोलेंगे, वो मानेगी। नीतीश का विकास, बिहार में सर चढ़कर बोल रहा हैं। ये हवाई किले बनानेवाले को पता नहीं कि विकास कोई सड़क बनाने और बिजली का खंभा खड़ा करने का ही नाम नहीं, उसके आगे रोजगार उपलब्ध कराने का भी नाम हैं। हद तो तब हो गयी कि आज भी बिहार के सुदुरवर्ती गांवों के लोग महाराष्ट्र और गुजरात में रोजी - रोटी कमाने के लिए जा रहे हैं, पर इन्हें रोकने के लिए बिहार सरकार ने कोई योजनाएँ नहीं बनायी। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के चिरकुट नेता बिहारियों को गाली देते थे और उसी महाराष्ट्र में जाकर नीतीश मनसे की जी हुजूरी करते दीखे। शायद बिहार की जनता इस दोहरे चरित्र को भूल गयी, उन्हें लगता होगा और जिस गुजरात ने आजतक बिहार की जनता के बारे में एक शब्द भी नहीं बोला, उस गुजरात की जनता का अपमान, इस नीतीश ने बार - बार किया, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विषवमन कर। नीतीश को लगता हैं कि दुनिया की सारी खूबियां इन्हीं में हैं। खुब अहं में डूबे हैं। विज्ञापन के चाबूक से अखबार और इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों को हांक रहे हैं, समझते हैं कि सम्राट अशोक हो गये, पर उन्हें नहीं मालूम कि बिहार की जनता तो असल में बिहार की जनता हैं। सबसे अनोखी। यहां जातिवाद सर चढ़कर बोलता हैं। लालू ने जातिवाद की सीढ़ी चढकर महराजगंज की लहलहाती फसल दुबारा काटी हैं। राजपूत -यादव तो उसके परंपरागत वोट हैं, भला वो मतदाता राजद से छिटके कब थे, छिटके तो मुस्लिम थे, फिर ससर गये, और लालू के लालटेन की जीत पक्की। रही बात भूमिहार जाति की, तो ये जाति अभी नीतीश से बिदकी हैं ही, ब्याज समेत इसने अपना किराया वसूल लिया और पी के शाही की तीर को भोथर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
हमें याद हैं कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कर्पूरी ठाकुर ने सामान्य बातचीत के दौरान कहा था कि भला बिहार में विकास के नाम पर वोट मिलता हैं क्या। यहां तो जातिवाद और बयार पर वोट मिलता हैं। जनता को जातीयता का बीयर पिलाते रहिए, अपना उल्लू सीधा करते रहिए और जब जीत जाईये तो अपने अनुसार उसका अर्थ निकालिये। ये हैं हमारा बिहार। उसे कभी तीर तो कभी लालटेन और कभी कमल खिलाने में आनन्द आता हैं पर वो भी जाति के आधार पर, धर्म के आधार पर। बेचारी कांग्रेस जो कल तक इसी के सहारे राज करती थी, आज सारी जातियां उससे बिदक गयी हैं, देखते हैं, ये बिदकी जातियां कब कांग्रेस की ओर आती हैं  या कांग्रेस इसी तरह पिछलग्गू बनकर, बिहार में अपना काम चलाती रहेगी। फिलहाल बिहार की जनता ने लालू और उसकी पार्टी को च्यवनप्राश खिलाया हैं, ताकत दी हैं। ताकत मिलते ही, लालू अपनी आदत से लाचार हैं ही, फिर से शुरु कर दिया हैं दहाड़ना। देखते हैं कब तक दहाड़ते हैं, रही बात नीतीश की, तो मैं कहूंगा, कि अब भी वक्त हैं, अहं त्यागे और किसी की आलोचना व किसी के खिलाफ विषवमन करने से अच्छा हैं, बिहार की जनता का सम्मान बरकरार रखने में ध्यान लगाये। यहीं उनके लिए और उनकी पार्टी की सेहत के लिए बेहतर होगा।

Thursday, May 16, 2013

पटना की परिवर्तन रैली, नीतीश और लालू दोनों के लिए एक संदेश हैं, जनता की भावना को समझिये.....

15 मई को पटना में लालू की परिवर्तन रैली बहुत कुछ कह रही हैं। ये लालू के लिए भी सबक हैं और नीतीश के लिए भी। नीतीश के लिए ये कि उनके पास खोने के सिवा कुछ नहीं और लालू के लिए ये कि उन्होंने जनता द्वारा मिली सत्ता का जिस प्रकार दुरुपयोग किया, जनता आज तक वो भूली नहीं, यानी कहीं न कहीं वो दर्द जनता के बीच आज भी विद्यमान हैं। ये अच्छी बात हैं कि लालू ने इस परिवर्तन रैली के दौरान कोई ऐसी बात नहीं की, जो जनभावनाओं को ठेस पहुंचाये। ये अलग बात हैं कि वे अपने विरोधियों की तुलना कुत्तों से करने से नहीं चुके। लालू प्रसाद को मालूम होना चाहिए कि अपने विरोधियों को भी सम्मान करना, बिहार की संस्कृति रही हैं। गर आप इस प्रकार की संस्कृति को तिलांजलि दे, जब ये कहते हैं कि आप बिहार के सम्मान को बरकरार रखेंगे तो आम जनता को शक होने लगता हैं।
जब कोई राजनीतिक दल सत्ता से दूर रहे, तो उसे आत्ममंथन करना चाहिए। वो आत्ममंथन तब तक करना चाहिए, जब तक वो समस्याओं को न जान लें, कि किन कारणों से उसे सत्ता से वंचित रहना पड़ा हैं और जब समस्या मालूम हो जाये तो उसका समाधान करना चाहिए। हमें लगता है कि लालू जी ने अभी भी, इस ओर ध्यान नहीं दिया, गर ये ही हाल रहा तो नीतीश भले ही अपनी कुछ सीटे गवां दे, पर बहुमत उन्हें ही मिलेगी। ये लालू जी को मालूम होना चाहिए, जबकि सच्चाई ये हैं कि नीतीश विकास - विकास का हौवा खड़ाकर, इतने अहं में डूब गये हैं कि उन्हें अपने सामने सभी लोग जीरो दिखाई दे रहे हैं। जिसका फायदा लालू को उठाना चाहिए, पर लालू इसका फायदा उठा पायेंगे, इस पर हमें संदेह हैं। वह भी तब जबकि लालू को आज भी बिहार का एक बड़ा वर्ग अपना नेता मानता हैं। ऐसे में लालू जी को चाहिए कि वे स्वयं को पहचाने।
कुछ सवाल आज भी लालू से हैं कि जब आप रेलमंत्री बनते हैं और रेल मंत्रालय को नई दिशा दे देते है, तब आपने 15 सालों में बिहार का कबाड़ा क्यूं बनाया, और इसके लिए आप बिहार की जनता से क्यूं क्षमा नहीं मांगते। क्षमा तो अच्छे - अच्छे पालिटिशयनों ने मांगा हैं, अपनी गलतियों का पश्चाताप करते हुए, जनता से माफी मांगना कोई बुराई नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि हैं। फिर जनता को विश्वास दिलाना कि वे उनकी विकास को लेकर चिंतित हैं, ये भी जनता को दिखाना होगा, पर आप कर क्या रहे हैं, अपने बेटे और बेटियों को लांच कराने में लगे है, यानी पत्नी और ससुराल से शुरु करते हुए अब बेटे और बेटियों तक पहुंच गये। लालू जी, आप ये जान लीजिये, जिसमें नेतृत्व करने की क्षमता होती हैं, वहीं नेता होता हैं, आप लाख अपने बेटे - बेटियों को लांच कर ले, गर उनमें क्षमता होगी तो खुद ब खुद टाप के राजनीतिज्ञ हो जायेंगे। आपने तो एक बेटे को क्रिकेटर बनाने की सोची, क्या वो धौनी बन गया। ये छोटी सी बात आपको क्यों नहीं समझ आती। अरे लालूजी आपको ईश्वर ने बिहार की जनता की सेवा करने को बनाया हैं, आपके परिवार की सेवा के लिए आपको नहीं बनाया। आप परिवार को छोड़िये, जनता के बीच जाइये। सारी जनता को अपना परिवार समझिये। उनके दर्द को समझिये, फिर देखिये। नीतीश क्या, सारे के सारे लोग आपके पीछे रहेंगे, पर ऐसा कर पायेंगे। हमें संदेह हैं.......................................

Wednesday, December 5, 2012

रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया...................

आपने एक लोकोक्ति जरुर सुनी होगी - रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया। ये लोकोक्ति बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व राजद सुप्रीमो तथा मसखरी मे प्रवीण लालू प्रसाद यादव पर फिट बैठती हैं। बिहार की सत्ता से बेदखल होने के बाद, मुझे लगा था कि ये सुधरेंगे। मसखरी छोड़ेंगे, थोड़ी बुद्धिमानी दिखायेंगे, पर वो कहते हैं न कि नेचर और सिंगनेचर कभी बदलते नहीं। इस कहावत को भी सही कर दिखाया हैं -- माननीय फूहड़, श्री लालू प्रसाद यादव ने। मैंने फूहड़ शब्द का प्रयोग इसलिए इनके लिए किया, क्योंकि आज ही एफडीआई पर संसद में हो रही बहस के दौरान, एक सांसद को धमकी देने के क्रम में, इन्होंने खुद ये कह डाला कि वे उक्त सांसद से ज्यादा फूहड़ हैं। क्यों नहीं लालू जी, आप फूहड़ ही नहीं बहुत कुछ हो सकते हैं। आपने तो कई कीर्तिमान बनाये हैं, बिहार में। देश में। क्या - क्या कीर्तिमान बनाये हैं, जरा आप खुद देखे।
1.  आप देश के कई युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। मेरे कई मित्र जो पत्नी भक्त हैं, उन्हें मैं बार - बार कहता हूं कि तुम क्या पत्नी भक्त होगे, जो हमारे लालू जी हैं। उन्होंने अपनी पत्नी को बिहार का मुख्यमंत्री तक बना दिया, तुमने अपनी पत्नी के लिए क्या किया। इसलिए पत्नी भक्ति में आपसे बेहतर दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
2. जो लोग स्वयं को संकल्पित जीवन व्यतीत करने का दावा करते हैं, उन्हें मैं तो आपका ही प्रमाण देता हूं कि लालू जी जो कहते हैं, वो करते भी हैं, जैसे उन्होंने कहा था कि बिहार उनके जीवित रहते कभी बंट ही नहीं सकता, उनकी लाश पर बनेगा झारखंड। पर जैसे ही आपकी कुर्सी हिलने को दिखी, और बिहार की जनता ने थोड़ी सीट आपकी झोली में कम कर दी,  आपने झारखंड बनवा दिया और बिहार का नक्शा, इतना छोटा हो गया कि हम क्या कहें। ये श्रेय भी, मैं आपको देना चाहता हूं।
3. जब आप सत्ता में थे, तो आपकी कृपा से, आपका अनुग्रह पाकर आपके पशु भी, विभिन्न प्रकार के शो में, प्रथम हो जाया करते थे। चाहे वो डॉग शो हो या हार्स शो।
4. बिहार में लाख आप नीतीश को गाली दे, पर इतना तो नीतीश ने जरुर किया कि कम से कम बिहार की जनता उनके ससुराल और उनके शालों को तो नहीं ही जानती, जैसा कि आप के ससुराल के बारे में जानती हैं।
5. आप जिस संसदीय दल में शामिल होकर पाकिस्तान गये थे, और पाकिस्तान के बाजार में आलू का मॉडल देख रहे थे, वहीं पाकिस्तान और वहां की जनता, नीतीश के शासन की तुलना आपके शासन की तुलना से कर, नीतीश को बेहतर शासक के रुप में प्रोजेक्ट कर रही हैं, जबकि आप की थू - थू हो रही हैं, ज्यादा जानकारी के लिए, आपसे संबंधित रिपोर्ट यूट्यूब पर भरी पड़ी हैं, पाकिस्तान के किसी भी चैनल के टीवी समाचार रिपोर्ट को आप देख लें अथवा पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की बिहार पर इंटरव्यू देख लें।
6. कल तक जिस मीडिया को आप कोसते नहीं थकते थे, सुनने में आ रहा हैं कि मीडिया के भाईयों और मीडिया के मालिकों को धन देकर, आप अपनी सभा की सीधी लाईभ शो करवा रहे हैं, और कुछ प्रिंट मीडिया के लोगों को उपकृत कर, अपनी तारीफ के पूल बंधवाने का कार्य आपने प्रारंभ किया हैं।
ये कुछ उदाहरण हैं, जो मैंने आपकी तारीफ में लिखे हैं। ऐसे भी आपने जो जातिवाद का बीज बिहार में बोया हैं, वो कभी मिट ही नहीं सकता। आज आप जो नकली ब्राह्मण प्रेम दिखा रहे हैं। आपने ब्राह्मणों को कितनी गालियां दी हैं, वो पटना जंक्शन पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु की प्रतिमा ही बतायेगी। जब आप एक सशक्त नेता बिहार के गिने जाते थे, तब आपने, देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की प्रतिमा पर उनके जन्मदिन के दिन माल्यार्पण करना, अपनी शान के खिलाफ समझा था और आज सोनिया व राहुल की गणेश परिक्रमा बारंबार करने के बाद, बिहार की गलियों में घूम घूमकर ब्राह्मणों का आशीर्वाद मांग रहे हैं। मैं बिहार का ही रहनेवाला हूं। आपने किस प्रकार से बिहार के विकास में अहम योगदान देनेवाले लोगों व जातियों का आपने शासनकाल में अपमान किया हैं, वो मुझसे बेहतर कौन जान सकता हैं। आपने अपने शासन के दंभ में, कितने लोगों को सताया हैं, अपमानित किया हैं, केवल इसका पश्चाताप कर लें, तो बिहार की जनता आपको माफ कर दें, पर आपको पश्चाताप करना भी नहीं आता। आप तो स्वयंभू मसखरे हैं, आपको मसखरी करने से फूर्सत कहा हैं। मसखरी के चक्कर में आपने आज एफडीआई पर हो रही विशेष बहस के दौरान संसद में वो कह डाला, जिससे बिहार की जनता की बदनामी हो गयी। आपने भाजपा को जमूरा बता दिया, जबकि सबसे बड़ा जमूरा तो आप ही हैं। ये अलग बात है कि आपने भाजपा से इसके लिए माफी मांग ली। प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने संसद में आप पर ठीक ही टिप्पणी की -- आपको गाठें खोलना नहीं आता और मसखरी के अलावा कुछ बोलना नहीं आता। आप संसद में कहते हैं कि गर गलत हुआ तो राजद के लोग सारे दुकानों में आग लगा देंगे। आपको आग लगाने का मौका भी ये एफडीआई देगा, अरे आपने अपने ही चिराग से देश के कई घरों में आग लगा दी। आपको क्या पता कि एफडीआई से देश को क्या नुकसान होने जा रहा हैं। आप को तो सिर्फ सीबीआई की चिंता सता रही हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं कि अभी सत्ता कांग्रेस के हाथों में हैं, और सीबीआई की चाबी केन्द्र सरकार के हाथों में है। आप चारा घोटाले में बुरी तरह फंसे हैं। इसलिये सोनिया -  राहुल की परिक्रमा करने के सिवा आपके पास दूसरा कोई चारा नहीं हैं। बस इनकी परिक्रमा करते रहिए, समय - समय पर मसखरी कर, इनका दिल बहलाते रहिए, देश भाड़ में जाय, आपको क्या मतलब। आपको और आपके परिवार को बस समय - समय पर सत्ता का रसास्वादन करने का मौका मिल जाय, बस इतना ही आपके लिए काफी हैं। ऐसे भी बिहार में आपने जातीयता का ऐसा बीज बोया हैं कि उसका फायदा, देर सबेर आप जब तक जीवित रहेंगे आपको छोड़ दूसरे को थोड़े ही मिलने जा रहा। जातीयता के घोड़े पर सवार होकर, जमकर बिहार व देश को बर्बाद करते रहिए, आम जनता को धोखा देते रहिए। इससे ज्यादा यहां की जनता को आपसे आशा भी नहीं हैं।

Tuesday, November 9, 2010

दस वर्ष झारखंड निर्माण के...

झारखंड बने दस वर्ष हो गये, पर ये प्रांत जितना भ्रष्टाचार के लिए जाना गया, उतना किसी भी चीज के लिए नहीं। भ्रष्टाचार और झारखंड एक दूसरे के गर पर्याय हैं तो ये कहना अतिश्योक्ति भी नहीं होगी। झारखंड अलग राज्य के निर्माण की लड़ाई की बात हो या झारखंड के विकास की बात, सभी स्तर पर यहां के राजनीतिज्ञों ने अपने आचरण में गिरावट ही दिखायी, आचरण में शुद्धता तो कहीं दिखी ही नहीं। जिसका खामियाजा आज भी झारखंड भुगत रहा है। गर हम झारखंड निर्माण से पूर्व की बात करें तो पता चलता हैं कि झारखंड अलग राज्य के निर्माण की लड़ाई लड़नेवाले ज्यादातर नेता पदलोलुपता में आकर अपने जीवन भर की पूंजी व आंदोलन को कांग्रेस पार्टी के हाथों गिरवी रखा, या अपने पार्टी का विलय ही करा दिया, नतीजा न तो खुद रहे और न ही झारखंड आंदोलन की साख ही बची। ज्यादातर झारखंडी नेता व कार्यकर्ता एक नारा लगाते हैं कि कैसे लिया झारखंड, लड़ के लिए झारखंड। पर सच्चाई क्या हैं, जो लोग झारखंड के निर्माण के साक्षी है, जानते हैं। सच्चाई यहीं हैं कि -- भाजपा बिहार के कुछ पार्टस को अलग कर वनांचल प्रांत बनाने की मांग पर अडिग थी, ( जबकि झामुमो जैसी अनेक झारखंडी पार्टियां बंगाल, उड़ीसा और मध्यप्रदेश के कुछ पार्टस को भी इसमें मिलाकर झारखंड बनाने की मांग करती थी, जो संभव ही नहीं था) सन् 2000 में बिहार में राजद को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, जो कि झारखंड के निर्माण का कड़ा विरोध कर रही थी। लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के आरोप में इतने घिरे थे, कि किसी भी हालत में वे बिहार का शासन छोड़ना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने भी हामी भर दी और संयोग ऐसा हुआ कि झारखंड बन गया। इसे कोई जबर्दस्ती झूठलाने की कोशिश करें तो अलग बात हैं, और जब झारखंड बना तो क्या हुआ, स्थिति ऐसी हैं कि कोई भी झारखंडी खुद को झारखंडी कहलाने में गर्व महसूस नहीं करता। झारखंड एकमात्र प्रांत है – जहां निर्माण से लेकर आज तक, जितने भी मुख्यमंत्री हुए, सब के सब आदिवासी, जिनके बारे में कहा जाता हैं कि आदिवासी सरल, सहज और दिल के साफ होते हैं, पर इन मुख्यमंत्रियों के क्रियाकलापों पर नजर डाले, तो ये आदिवासियों को ही कटघरे में खड़ा कर देंगे, और लोगों की आदिवासियों के बारे में जो धारणाएं हैं, वो बदलती नजर आयेगी। सर्वप्रथम बिहार से अलग होने के बाद बने नवोदित झारखंड के मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की बात करें। इसमें कोई दो मत नहीं कि इस शख्स से राज्य को बेहतर दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, आधारभूत संरचनाओं को ठीक करने में समय लगाया, उर्जा, सड़क और शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर, राज्य ही नहीं पूरे देश में नाम कमाया और देश में सबसे अच्छा काम करनेवाले तीसरे मुख्यमंत्री के रुप में लोकप्रिय हो गये। राज्य में जितनी योजनाएं हैं, उन्हीं के समय की हैं, जिसे लेकर, लोग अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, चाहे वो बालिकाओं को स्कूल से जोड़ने के लिए साईकिल देने की बात हो, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना हो, या आदिवासियों के बेहतर विकास की बात हो, इन्हीं के समय में पूरे राज्य में सीबीएसई पैटर्न पर माध्यमिक शिक्षा को लागू किया गया, पर जदयू के उस समय के भ्रष्ट मंत्रियों ने इनकी एक न चलने दी और उर्जा तथा खनन मामलों में इन नेताओं ने बाबूलाल को ऐसी पटखनी दी, कि बेचारे कहीं के नहीं रहे, जिस अर्जुन को वे भरत मानकर अपना उतराधिकारी बना रहे थे, वो अर्जुन ही बाद में ऐसी पट्टी पढ़ाई की बेचारे भाजपा से अलग होकर आज खुद की नयीं पार्टी बना कर भाजपा के जड़े में मट्ठा डालकर भाजपा को समूल नष्ट करने पर तूले हैं, पर इसमें वे कितना सफल होंगे, समय बतायेगा, पर सच्चाई ये ही हैं कि यहीं से भ्रष्टाचार के वटवृक्ष का बीज झारखंड की राजधानी रांची में बोया गया, जो इस दस साल में एक विशाल वृक्ष बनकर सभी भ्रष्टाचारियों को आश्रय दे रहा हैं।
हम कहां की बात करें, कौन ऐसा क्षेत्र हैं, जहां भ्रष्टाचार नहीं हैं। सीबीआई की तो ज्यादातर कार्य झारखंड में ही हैं, लगता हैं कि सीबीआई का निर्माण हमारे पूर्व के राजनीतिज्ञों ने झारखंड को देखते हुए ही किया था। जरा देखिये लालू के चारा घोटाला की बात हो या मधु कोड़ा से जुड़ा मामला सभी का केन्द्र बिन्दु झारखंड ही हैं। पर इनकी बात करने के पूर्व हम झारखंड के विधानसभा की बात कर लें तो ज्यादा बेहतर होगा। यहां अब तक जितने भी विधानसभाध्यक्ष हुए, अपने ढंग से नियुक्तियां की, और यहां पर नियुक्ति घोटाला हो गया, कौन सा मापदंड रखा गया, कैसे बहाली हुई, इस पर गर बात करें तो रामचरितमानस से भी बड़ा महाकाव्य तैयार हो जायेगा। आश्चर्य इस बात की हैं कि इसे लेकर किसी भी विधानसभाध्यक्ष ने अपनी गलती नहीं मानी हैं और न ही शर्मिदंगी दिखायी।
जरा इस विवरणिका को देखिये तो पता लग जायेगा कि अपने यहां विधायकों और दूसरे जगहों के विधायकों की संख्या कितनी और इसे देखते हुए स्टाफों की संख्या कितनी हैं और उस पर राशि कितनी खर्च हुई हैं -----------------------
राज्य-------विधायकों की संख्या----स्टाफ------वार्षिक खर्च करोड़ रुपये में
छत्तीसगढ़ -------91------------255 -----5.60
उत्तराखंड -------70 ------------190 -----4.25
बिहार --------243-------------630 -----7.25
झारखंड---------81 ------------960 ----16.81
कमाल इस बात की हैं कि विधानसभा को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता हैं और इस मंदिर में आवश्यकता से अधिक अयोग्य लोगों की बहाली, वो भी अपने चहेतों को नौकरी दिलाकर विधानसभाध्यक्षों ने कर दी, क्या ये शर्मनाक नहीं।
कमाल हैं दस साल बने हो गये, झारखंड के इसी बीच सात सरकारें आयी और चली गयी, दो – दो बार राष्ट्रपति शासन लगा, आठवी सरकार भी कैसे बनी, इसको लेकर तरह तरह की अटकलें लगायी गयी हैं, कहनेवाले तो कह भी चुके हैं कि इस सरकार को बनाने में कारपोरेट जगत के लोगों ने रुचि ली हैं, जिसके एवज में इस सरकार ने उन्हें उपकृत करने की योजना पर काम भी शुरु कर दिया हैं। कमाल इस बात की भी कि राज्य को बने दस साल हुए और इससे ज्यादा बार विकास आयुक्त बदले जा चुके हैं, छह – छह बार पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता का बदलाव हो चुका हैं, औसतन हर दस बाहर महीने में सचिवों का तबादला हो जाता हैं। भ्रष्टाचार का आलम तो ये हैं कि यहां स्थानांतरण उद्योग भी चलता हैं, और वसूली भी की जाती है।
भ्रष्टाचार का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता हैं कि इस राज्य का अपना विधानसभा भवन नहीं, सचिवालय नहीं, जबकि इन्हीं पर करीब दो सौ करोड़ रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं। राष्ट्रीय खेल अब तक नहीं हो पाये है। इन मंत्रियों और अधिकारियों की करतूतों को देखिये अपने चहेतों को किस प्रकार झारखंड लोक सेवा आयोग के माध्यम सें शानदार नौकरियां दिलवा दी, ये अलग बात हैं कि पूरे मामले की जांच हो रही हैं, और कुछ लोग इस मामले में जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं। यहीं नहीं शायद देश का ये पहला राज्य हैं जहां पर भ्रष्टाचार मामले में ही एक निर्दलीय व्यक्ति जो मुख्यमंत्री बना, अपने रिकार्ड भ्रष्टाचार के कारण, रांची और दिल्ली की जेलों में रहकर झारखंड की मान को गिरवी रख दिया है। यहीं नहीं इनके शासनकाल में ही मंत्री रहे, कई मंत्रियों पर सीबीआई की पकड़ हैं और ये भी फिलहाल विभिन्न जेलों में बंद रहकर अपनी जिंदगी को नारकीय बना रखा हैं। आश्चर्य इस बात की भी हैं कि भ्रष्टाचार के आरोप में बंद इन मंत्रियों और नेताओं के रिश्तेदारों को उनके दैनिक जीवन में कोई दिक्कत नहीं आ रही, बल्कि वे इसका फायदा भी उठा रहे हैं और विधानसभा तक पहुंच जा रहे हैं, यहीं नहीं जेल में रहकर ये लोकसभा के चुनाव तक जीते हैं, ऐसे में यहां की जनता की सोच पर स्वतः प्रश्न चिह्न लग जाता हैं कि क्या वो भ्रष्टाचार को सदाचार की ताबीज मान चुकी हैं, गर नहीं मानती तो भ्रष्टाचार मामलों में बंद ये नेता और उनके रिश्तेदार चुनाव में तो कम से कम नहीं ही जीतते, पर इनकी जीत बताती हैं कि जनता के सोच में भी बदलाव आया हैं और यहां की जनता फिलहाल भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा नहीं मानती, तभी तो सभी मस्त हैं नहीं तो भ्रष्टाचार पर आज तक अंकुश क्यों नहीं लगा, ये तो और पनपता जा रहा हैं, भस्मासुर की तरह।

Monday, August 9, 2010

लो आया मौसम दल बदलने का......................... !


बिहार विधान सभा के चुनाव की विधिवत् घोषणा अब तक नहीं हुई, लेकिन विभिन्न पार्टियों के नेता अब दल बदलने को लेकर उत्सुक हैं, कोई दल बदल चुका हैं, कोई दल बदलने की तैयारी में हैं और इस दल बदल के चक्कर में इन दलबदलू नेताओं ने सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया हैं, बड़बोलेपन के चक्कर और जातीय दंभ में स्वयं की जाति को इन्होंने उस पादान पर लाकर खड़ा कर दिया हैं कि जैसे इनकी ही जातियों के लिए सिर्फ और सिर्फ बिहार बना हैं, बाकी जातियां इनके चरणवंदन और चरणधूलि पाने के लिए हैं। ये स्थिति एक पार्टी की नहीं, बल्कि कमोबेश सभी पार्टियों की हैं। तीन चार साल पहले की बात हैं। जब मैं धनबाद में था, तो एक बिहार के ही बड़बोले नेता आनन्द मोहन ने एक संवाददाता के प्रश्न के जवाब में कहा था कि जब पत्रकार अपने बेहतर कैरियर के लिए, संस्थान बदल देते हैं तो उनके जैसा नेता, बेहतर कैरियर के लिए पार्टी अथवा दल क्यों नहीं बदले। ऐसे हैं हमारे बिहार के नेता। ऐसी हैं इनकी सोच। इसलिए प्रभुनाथ सिंह जैसे नेता, नीतीश का दामन छोड़, लालू का दामन पकड़ लें और कहें कि हे लालू जी आप ही मेरे कैरियर निर्माता हो, मेरी कैरियर पर ध्यान दो। लालू भी – प्रभुनाथ को कहें, कि एवमस्तु तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी, तो क्या गलत हैं।
पर प्रभुनाथ सिंह का ये कहना कि उनके आने से बिहार में एक नया समीकरण बनेगा, पीएमआरवाई का, तो ये उन्हें कहने की इजाजत किसने दे दी। पीएमआरवाई का मतलब – कोई बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री रोजगार योजना नहीं समझ लें। प्रभुनाथ सिंह के शब्दों में पी का मतलब पिछड़ा, एम का मतलब मुस्लिम, आर का मतलब उनकी जाति राजपूत, जिससे वे आते हैं और वाई का मतलब यादव। क्या इन्हीं पीएमआरवाई से वे बिहार विधान सभा में स्थिति मजबूत कर लेंगे। क्या जिन अक्षरों का इन्होंने उपयोग किया हैं, वो पिछले लोकसभा और पांच साल पहले के विधानसभा चुनाव में किसी दूसरे जगह छिटक गये थे क्या।
क्या इन जातियों का प्रभुनाथ सिंह जैसे लोगों ने ठेका ले रखा हैं और मान लिया कि इन जातियों और समुदाय का ठेका ले रखा हैं तो भी बाकी जातियां और समुदाय, इनके आगे पानी भरेंगे क्या। लालू और पासवान जैसे नेताओं से बिहार में एकता की बातें करना ही बेमानी हैं, लोग ठीक ही कहते हैं कि इस देश व राज्य को गर किसी ने बर्बाद किया हैं तो वे राजनीतिज्ञ हैं जो विशुद्ध रुप से राजनीतिबाज बनकर पूरे देश व राज्य में रहनेवाले, विभिन्न समुदायों को इतने टुकड़ों में बांट देना चाहते हैं कि देश व राज्य बर्बाद हो जाये और इनकी राजनीतिक कैरियर हमेशा हिट रहे, ताकि ये आराम से अपना और अपने आनेवाले पीढ़ियों का उद्धार कर सकें, लेकिन ये नहीं जानते कि अंधकार का साम्राज्य ज्यादा दिनों तक नहीं होता। मैं लालू प्रसाद से पूछना चाहता हूं कि जिस जय प्रकाश आंदोलन के वे प्रोडक्ट हैं, वे जयप्रकाश संपूर्ण क्रांति की बात किया करते थे, क्या प्रभुनाथ सिंह जैसे नेताओं के बयान से और उनकी पार्टी में ऐसे नेताओं के आने से संपूर्ण क्रांति हो जायेगी क्या। ऐसे भी लालू प्रसाद का पूरा कैरियर देखा जाये तो ये भी माई समीकरण की बात कुछ ज्यादा ही करते थे, ऐसे में गर प्रभुनाथ ने उसमें पीआर मिला दिया तो क्या हुआ, लालू प्रसाद को तो इससे और मजबूती ही मिलेगी, वे समझ रहे होंगे कि अब बिहार विधानसभा में उनकी वापसी तय हैं, लेकिन वे भूल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में भी कमोबेश जाति की राजनीति करनेवाले बिहार के सारे के सारे नेता उनकी तरफ हो गये थे पर परिणाम कुछ दुसरा ही आया।
रही बात नीतीश की, तो ये भी कोई दुध के धूले नहीं हैं। थोड़ा बहुत अंहकार इनमें भी आ गया हैं, ये समझ रहे है कि बस अगली पारी भी इन्हीं की होगी, और इसी चक्कर में वे बहुत सारे ऐसे भी गलत निर्णय कर रहे हैं, जिनका खामियाजा वे भुगतेंगे ही। इनके पार्टी में भी बहुत सारे दुसरे दलों के नेता आने के चक्कर में हैं और कुछ इनकी पार्टी से जाने के चक्कर में हैं, क्योंकि जब जब चुनाव आते हैं तो बिहार क्या पूरे देश में ऐसे दृश्य दिखाई पड़ जाते हैं, पर इसके कारण बिहार की मर्यादाएं और सामाजिक माहौल न बिगड़ जाये, इसका ध्यान यहां के राजनीतिज्ञों को रखनी चाहिए, क्योंकि जो काम राजठाकरे महाराष्ट्र में कर रहे हैं, वो ही काम ये कमोबेश बिहार में कर रहे हैं, चाहे वो लालू हो या प्रभुनाथ या कोई अन्य। अंतर ये हैं कि राज ठाकरे अपनी राजनीति चमकाने के लिए, मराठी और गैर मराठी विवाद उछाल रहे हैं और बिहार के नेता पीएमआरवाई बनाम गैर पीएमआरवाई का मुद्दा उठा रहे हैं। दोनों में कोई अंतर नहीं हैं, बस समझ की फेर हैं, सभी देश को बर्बाद करने में तुले हैं. जरुरत हैं बिहार में रह रहे उन युवाओं को, आगे बढ़ने की जो बिहार को एक नयी दिशा देना चाहते हैं, वे आगे बढ़े और इस चुनाव में जन जन तक जाकर बतायें कि वे वोट किसी को भी दें, पर दे जरुर, पर ध्यान रहे कि बिहार की मर्यादा और सामाजिक माहौल न बिगड़ने पाये, क्योंकि बिहार के नेताओं ने अपनी घटिया स्तर की राजनीति शुरु कर दी हैं, मैं देख रहा हूं वे सब कुछ करने पर आमदा हैं – हो सकता हैं कि वे अपराधियों तक का शरण लें और कहें कि ये ही बिहार को नयी दिशा देंगे, इसलिए पीएमआरवाई के तहत इन्हें ही वोट दें। इसलिए बिहार के युवाओं का जगना बहुत जरुरी हैं।