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Thursday, May 28, 2015

लालू का दृढ़विश्वास और नेतागिरी के फायदे...........

रांची से प्रकाशित एक नीतीश भक्त अखबार के पिछले पृष्ठ पर एक समाचार पढ़ा, पढ़कर मन अति प्रसन्न हुआ। समाचार लालू प्रसाद से संबंधित था, जिसमें लालू का बयान “जयललिता की तरह मैं भी होउंगा आरोपमुक्त” छपा था। मेरा भी दृढ़ विश्वास हैं कि लालू आरोपमुक्त होंगे, क्योंकि भारत देश में नेता या उसका परिवार कभी अपराधी हो ही नहीं सकता।
उसका प्रमाण हैं कि जिस प्रकार आजादी के पूर्व किसी अंग्रेजों को उसके किये की सजा नहीं मिली, ठीक उसी प्रकार आजादी के बाद देश का कोई भी नेता आरोप सिद्ध होने पर जेल में अपने किये की सजा नहीं काटी। ऐसे भी हमारे देश में एक संत हुए नाम था – गोस्वामी तुलसीदास, जिन्होंने अपने कालजयी पुस्तक श्रीरामचरितमानस में लिखा है “समरथ के नहिं दोषु गोसाईं” अर्थात् सामर्थ्यवानों में दोष नहीं होते, इसलिए इन्हें सजा नहीं मिलती, तो सजा मिलती किसे है। स्पष्ट हैं कि, जो सामर्थ्यवान नहीं है। हमारे देश में आप गर नेता हैं तो आप कितना भी घोटाला या महाघोटाला कर लीजिये, कुछ दिन या वर्षों तक हंगामा होगा, जिस नेता पर आरोप होगा कुछ वर्षों के लिए जेल हो आयेगा, पर अंततः वह दोष मुक्त हो जायेगा, क्योंकि वह नेता है। उसे निचली अदालत गर सजा सुना भी दें, तो उपरि अदालत में वह निश्चित छूट जायेगा, क्योंकि वह नेता है।  उदाहरण अनेक है, पर एक उदाहरण ताजा – ताजा सुनाता हूं, एक अपराध में राजद और लालू के चहेते नेता पप्पू यादव को एक निचली अदालत ने दोषी ठहराते हुए सजा सुना दी और फिर कुछ ही महीनें बाद एक उपरि अदालत ने उन्हें दोष मुक्त कर दिया। इसी प्रकार सीबीआई की एक अदालत ने लालू यादव को दोषी ठहराते हुए सजा सुना दी, पर जरा देखिये वे आराम से कैसे राजनीति कर रहे हैं और अपने शरणागत आये जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के समस्त कष्टों को हरने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दिये हैं। जबकि ये वहीं नीतीश हैं जो लालू के खिलाफ खूब अनाप शनाप बयान देते थे। ये वहीं नीतीश हैं जो लालू को गद्दी से हटाकर सत्तासीन हुए। ये वहीं नीतीश हैं, जो लालू को चारा घोटाले में जेल में सड़ाने के लिए क्या नही किये। ये वहीं नीतीश हैं जो बिहार को जंगल राज से मुक्त करने के लिए बिहार की जनता को आह्वान किया और आज उसी नीतीश को लालू में खुदा का नूर नजर आ रहा हैं। मैं तो ये भी देख रहा हूं कि जो अखबार कल तक लालू का घोर विरोधी था, वह भी नीतीश की भक्ति में आसक्त होकर लालू की खूब वाहवाही कर रहा हैं, अर्थात् इसी को कहते हैं समय अथवा काल। शायद रहिमन ने ऐसे ही लोगों के बारे में ये पंक्तियां लिख डाली हो –“रहिमन चुप हवे बैठिये, देखि दिनन के फेर, जब अच्छे दिन आइहे, बनत न लगिहे देर”। क्या बात हैं लालू जी, समय आपका आ गया हैं कल का नीतीश आपके चरणों को चूम रहा हैं।  कल का आपका विरोधी अखबार और संपादक आपके यशोगान गा रहे हैं। इसका मतलब क्या हैं, जल्द ही आप ने जो सपना देखा हैं –पीएम बनने का, वो भी ख्वाब पूरे हो जायेंगे, क्योंकि आप असली यादव और उसमें भी विशुद्ध नेता है। मुलायम-शरद-लालू की जोड़ी जरुर गुल खिलायेगी। बस बिहार में गजब ढाने की तैयारी को चरम पर ले जाना है।
आपके इसी सोच पर लगता हैं कि भारत के कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने अपनी नौकरियां छोड़कर नेता बनने में ज्यादा रुचि दिखाई, क्योंकि उन्होंने अपने अनुभवों से पाया कि जो जितना बड़ा नेता, वो उतना बड़ा चोर अथवा घोटालेबाज और उसकी चोरी अथवा घोटाले को सिद्ध कर पाने में ताउम्र अधिकारी लगा दें, सिद्ध नहीं कर पायेंगे गर किसी ने सिद्ध कर भी दिया तो न्यायालय से वे बचकर निकल जायेंगे। ऐसे में आईएएस व आईपीएस की नौकरी गयी तेल लेने। नेता बनो, माल कमाओ। देश का विकास जाये भाड़ में, अपने खानदान के लिए आठ पुश्त तक ऐसा जुगाड़ कर लो कि कोई बाल बांका न कर सकें और ऐसा करने में कुछ हो भी गया तो क्या फर्क पड़ता हैं। थोड़े ही फांसी की सजा होगी या कुछ हो जायेगा, क्योंकि नेता तो नेता होता हैं, उसे अधिकार हैं, सब कुछ करने का, और नेता कभी गलत नहीं होता, नेता कभी दोषी नहीं होता, नेता तो प्रकृति का पैदा किया हुआ वो शूरमा हैं, जिसके बारे में स्वर्ग में बैठा भगवान भी उसके खिलाफ फैसला नहीं ले सकता। तभी तो मैं देख रहा हूं कि झारखंड में भी कई आईएएस और आईपीएस अधिकारी नेता बन गये। अखबार वाले भी नेता बन गये। गुंडे और अपराधी तो पहले से ही लाइन में हैं, क्योंकि वे नेता के असली आदर्शों को खूब समझते हैं। हां एक चीज जरुर देखने को मिल रही हैं कि अब समाज के कई चालाक लोगों ने नेता के इस अद्भुत गुणों को देख, अब खुद को भी नेतागिरी में फिट करने की जुगत लगा दी हैं।

Thursday, May 16, 2013

पटना की परिवर्तन रैली, नीतीश और लालू दोनों के लिए एक संदेश हैं, जनता की भावना को समझिये.....

15 मई को पटना में लालू की परिवर्तन रैली बहुत कुछ कह रही हैं। ये लालू के लिए भी सबक हैं और नीतीश के लिए भी। नीतीश के लिए ये कि उनके पास खोने के सिवा कुछ नहीं और लालू के लिए ये कि उन्होंने जनता द्वारा मिली सत्ता का जिस प्रकार दुरुपयोग किया, जनता आज तक वो भूली नहीं, यानी कहीं न कहीं वो दर्द जनता के बीच आज भी विद्यमान हैं। ये अच्छी बात हैं कि लालू ने इस परिवर्तन रैली के दौरान कोई ऐसी बात नहीं की, जो जनभावनाओं को ठेस पहुंचाये। ये अलग बात हैं कि वे अपने विरोधियों की तुलना कुत्तों से करने से नहीं चुके। लालू प्रसाद को मालूम होना चाहिए कि अपने विरोधियों को भी सम्मान करना, बिहार की संस्कृति रही हैं। गर आप इस प्रकार की संस्कृति को तिलांजलि दे, जब ये कहते हैं कि आप बिहार के सम्मान को बरकरार रखेंगे तो आम जनता को शक होने लगता हैं।
जब कोई राजनीतिक दल सत्ता से दूर रहे, तो उसे आत्ममंथन करना चाहिए। वो आत्ममंथन तब तक करना चाहिए, जब तक वो समस्याओं को न जान लें, कि किन कारणों से उसे सत्ता से वंचित रहना पड़ा हैं और जब समस्या मालूम हो जाये तो उसका समाधान करना चाहिए। हमें लगता है कि लालू जी ने अभी भी, इस ओर ध्यान नहीं दिया, गर ये ही हाल रहा तो नीतीश भले ही अपनी कुछ सीटे गवां दे, पर बहुमत उन्हें ही मिलेगी। ये लालू जी को मालूम होना चाहिए, जबकि सच्चाई ये हैं कि नीतीश विकास - विकास का हौवा खड़ाकर, इतने अहं में डूब गये हैं कि उन्हें अपने सामने सभी लोग जीरो दिखाई दे रहे हैं। जिसका फायदा लालू को उठाना चाहिए, पर लालू इसका फायदा उठा पायेंगे, इस पर हमें संदेह हैं। वह भी तब जबकि लालू को आज भी बिहार का एक बड़ा वर्ग अपना नेता मानता हैं। ऐसे में लालू जी को चाहिए कि वे स्वयं को पहचाने।
कुछ सवाल आज भी लालू से हैं कि जब आप रेलमंत्री बनते हैं और रेल मंत्रालय को नई दिशा दे देते है, तब आपने 15 सालों में बिहार का कबाड़ा क्यूं बनाया, और इसके लिए आप बिहार की जनता से क्यूं क्षमा नहीं मांगते। क्षमा तो अच्छे - अच्छे पालिटिशयनों ने मांगा हैं, अपनी गलतियों का पश्चाताप करते हुए, जनता से माफी मांगना कोई बुराई नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि हैं। फिर जनता को विश्वास दिलाना कि वे उनकी विकास को लेकर चिंतित हैं, ये भी जनता को दिखाना होगा, पर आप कर क्या रहे हैं, अपने बेटे और बेटियों को लांच कराने में लगे है, यानी पत्नी और ससुराल से शुरु करते हुए अब बेटे और बेटियों तक पहुंच गये। लालू जी, आप ये जान लीजिये, जिसमें नेतृत्व करने की क्षमता होती हैं, वहीं नेता होता हैं, आप लाख अपने बेटे - बेटियों को लांच कर ले, गर उनमें क्षमता होगी तो खुद ब खुद टाप के राजनीतिज्ञ हो जायेंगे। आपने तो एक बेटे को क्रिकेटर बनाने की सोची, क्या वो धौनी बन गया। ये छोटी सी बात आपको क्यों नहीं समझ आती। अरे लालूजी आपको ईश्वर ने बिहार की जनता की सेवा करने को बनाया हैं, आपके परिवार की सेवा के लिए आपको नहीं बनाया। आप परिवार को छोड़िये, जनता के बीच जाइये। सारी जनता को अपना परिवार समझिये। उनके दर्द को समझिये, फिर देखिये। नीतीश क्या, सारे के सारे लोग आपके पीछे रहेंगे, पर ऐसा कर पायेंगे। हमें संदेह हैं.......................................

Sunday, August 22, 2010

इस हमाम में सभी नंगे हैं, जनता भ्रमित न हो, सतर्क रहे...!

संस्कृत में एक श्लोक हैं ---------
शायद देश के नेता व पत्रकार इस श्लोक को नहीं पढ़े होंगे
अधमा: धनम् इच्छन्ति,
धनं मानम् च मध्यमाः।
उतमा: मानम् इच्छन्ति,
मानो हि महतां धनम्।।
अर्थ -- जो दुष्ट होता हैं वो सिर्फ धन की कामना करता हैं, जो मध्यम वर्गीय लोग हैं वे धन और मान दोनों की इच्छा रखते हैं, पर जो सर्वोत्तम व्यक्ति हैं वो धन की कामना नहीं, बल्कि सिर्फ सम्मान की इच्छा रखता हैं, क्योंकि उसके लिये सम्मान ही सर्वोत्तम धन हैं।
क्या कोई बता सकता हैं कि इस देश में जन्मे महात्मा गांधी का स्वनिर्मित घर कहां हैं, कुछ लोग उनके पैतृक निवास जो पोरबंदर में हैं, उसे बतायेंगे, पर सच्चाई ये हैं कि जो दूसरे का घर निर्माण करने में, देश का घर निर्माण करने में लगा हो, भला उसे अपने घर बनाने की फुर्सत कहां हैं। यहीं सवाल भाजपाईयों से क्या वे बता सकते हैं कि एकात्ममानववाद के प्रणेता दीन दयाल उपाध्याय के मरने के समय उनके पास कितना धन था और यहीं सवाल समाजवादी नेताओं से कि वे बताये कि राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के यहीं आदर्श थे क्या?
और यहीं सवाल आज के देश की राजधानी में बैठे व अन्य जगहों पर स्थापित पत्रकारों से क्या वे बता सकते हैं कि इसी देश में गणेश शंकर विद्यार्थी और पड़ारकर ने जन्म लिया, उन्होंने धन के लिए पत्रकारिता की या मान के लिए।
देश की जनता महंगाई से त्रस्त हैं, देश में कहीं अकाल हैं तो कहीं बादल फटने से ऐसी तबाही की पूछिये मत, पर संसद में बैठनेवाले ज्यादातर नेता, जो अपने को जनता का प्रतिनिधि कहते हैं, वे अपने वेतन को लेकर चिंतित हैं, हालांकि उन्हें वेतन की जरुरत ही नहीं क्योंकि उनको वेतन से ज्यादा इतनी भारी भड़कम राशि उनके पूंजीपति साथियों से चंदे और अन्य रुपों में इतनी आसानी से मिल जाती हैं, जिसकी परिकल्पना नहीं की जा सकती, जिसकी जानकारी आम तौर पर जनता को हैं, पर ये अलग हैं कि इस बात को आजकल मीडिया ने जबर्दस्त रुप से उछाला हैं, ये वे मीडिया के लोग हैं, जिनकी भूख ये नेता शांत करते हैं, पेड न्यूज के रुप में, तथा मुंहमांगी मुराद पुरी करके। कैसे करते हैं इस बात की ज्यादा जानकारी लेनी हो तो हरिशंकर परसाई की भेड़ और भेड़िये पढ़िये। जिन लोगों को मीडिया की इस खबर से नेताओं को गाली देने का मन कर रहा होगा, वो जनता ये भी जान ले कि मीडिया में भी बहुत सारे ऐसे पत्रकार मिलेंगे, जो पहले से ही इन नेताओं के आगे जमीर बेच चुके हैं, और वे भी इसी प्रकार से बेतहाशा रकम कमाकर परम सुख का आनन्द ले रहे हैं, ये अलग बात हैं कि इनकी बात जनता के सामने नहीं आती और आयेगी भी कैसे, क्योंकि दिखलाना और बताना इन्हें ही हैं, ये वहीं दिखलायेंगे और बतायेंगे, जो इनके हित में हो। कैसे पत्रकार या मीडिया प्रबंधन के लोग नेताओं से उपकृत होकर राज्यसभा में पहुंच रहे हैं, परम सुख का आनन्द ले रहे हैं, जनता सब जानती हैं, इसलिए इस प्रकार की खबरों से वो उद्वेलित नहीं होती, जितना की 1977 और 1977 के पहले तक उद्वेलित होती थी, क्योंकि जनता जानती हैं कि इस हमाम में सभी नंगे हैं, बस आज मन आ गया वे नेताओं को अपमानित करनेवाले शब्द लेकर आ गये हैं, और जब नेताओं की बारी आयेगी तो वे पत्रकारों को भी जो करना होगा, साम दाम दंड भेद करके समझा देंगे, पत्रकार चूंकि बुद्धिजीवी होते हैं, जल्द ही समझ जायेंगे, गर नहीं समझेंगे तो प्रबंधन और उनके मालिक तो, उनके हाथ में हैं ही। अब जरा लालू प्रसाद को देख लीजिये, ये तो आज के नेता थोड़े ही हैं, ये अपने बयानों और अन्य कारनामों से काफी लोकप्रिय रहे हैं, ऐसे में नेताओं के वेतन की बात में कैसे चुप रहेंगे, इसलिए शुरु हो गये और चूंकि इसमें सभी सांसदों को फायदा हैं, इसलिए क्या वामपंथ और क्या दक्षिणपंथ और क्या कांग्रेसी सभी – मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा गीत सस्वर गाने में लगे हैं, इसलिए इस पर कुछ भी बोलना या लिखना, हमे लगता है कि बेकार हैं। नेताओं को वेतन की भूख जगी हैं। इस भूख में सभी सांसद और विधायक शामिल हैं, ये अलग बात हैं कि इस मुद्दे पर खुलकर वे लालू की भाषा नहीं बोल रहे पर चुपके – चुपके वे लालू के सुर में सुर अवश्य मिला रहे हैं, याद करिये जो काम इस साल बजट सत्र के दौरान झारखंड विधानसभा में राजद के देवघर विधायक सुरेश पासवान ने किया, वहीं काम इन्हीं की पार्टी के सुप्रीमो लालू यादव ने संसद में किया, इनका कहना हैं कि सांसदों का वेतन बहुत ही कम हैं, वे जनसेवक हैं, इसलिए फिलहाल जो वेतन उन्हें मिल रहा हैं, वो बहुत ही कम हैं, इसे 16 हजार से बढ़ाकर 80,001 रुपये कर देना चाहिए, इनका ये भी कहना हैं कि उन्हें सचिव स्तर के अधिकारी से भी बढ़ा हुआ वेतन चाहिए क्योंकि जो सांसद होता हैं वो प्रोटोकाल के अनुसार इससे भी बड़ा होता हैं। जबकि लोकतंत्र में जनता का मत ही देखा जाता हैं, सांसदों के वेतन बढ़ाने के मुद्दे पर गर आम जनता की राय ली जाये तो 90 प्रतिशत से भी ज्यादा जनता, सांसदों के वेतन बढ़ाये जाने के खिलाफ हैं, पर इन नेताओं को जनता की बात कानों तक नहीं पहुंच रही और वेतन बढ़ाने के मुद्दे पर फिलहाल वे सब एक हैं।
एक ईमानदार भारतीय नागरिक राजकीय अथवा केन्द्रीय सेवा में काम करते करते अपना जीवन बिता देता हैं पर उसकी आमदनी पांच सालों में तीन सौ प्रतिशत नहीं बढ़ती, पर हमारे देश के नेता मात्र पांच सालों में ही अपनी आमदनी तीन सौ प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा लेते हैं, वो भी महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल, पं. दीन दयाल उपाध्याय, राम मनोहर लोहिया तथा जयप्रकाश नारायण के अनुयायी होने का दंभ भरनेवाले नेता। कांग्रेस जो बापू का नाम लेते नहीं अघाती, सबसे पहले उनके नेता के आदर्शों को देखे ---2004 में कांग्रेसी सांसदों की वस्तुस्थिति या आमदनी -----------------
राहुल गांधी --- 4,527,880 रुपये
कमल नाथ --- 51,839,379 रुपये
सचिन पायलट --- 2,51,19000 रुपये
मणि शंकर अय्यर --- 19,391,699 रुपये
और इन्हीं सांसदों की आमदनी अप्रत्याशित रुप से मात्र पांच सालों यानी 2009 में इतनी बढ़ गयी कि पूछिये मत --------------
राहुल गांधी --- 23,274,706 रुपये यानी 414 प्रतिशत
कमल नाथ --- 141,770,037 रुपये यानी 173 प्रतिशत
सचिन पायलट --- 46,489,558 रुपये यानी 1746 प्रतिशत
मणि शंकर अय्यर --- 72,014,689 रुपये यानी 271 प्रतिशत बढ़ गयी
अब जरा अपने को समाजवादी, एकात्ममानववादी तथा किसानों व मजदूरों के हितैषी कहनेवाले दीनदयाल उपाध्याय, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण के सिद्धांतों पर चलने का दंभ भरनेवाले नेताओं के आमदनी पर एक नजर डालिये ---------------------------
2004 में इनकी आमदनी
लाल कृष्ण आडवाणी --- 13,042,443 रुपये
लालू प्रसाद यादव --- 86,69,342 रुपये
अखिलेश यादव --- 23,142,705 रुपये
अजीत सिंह ---- 13,423,683 रुपये
राम विलास पासवान ---- 8,332,433 रुपये
और इन्हीं सांसदों की 2009 की स्थिति देखिये ------------
लाल कृष्ण आडवाणी --- 35,543,172 रुपये यानी 172 प्रतिशत
लालू प्रसाद यादव --- 3,17,0269 रुपये यानी 266 प्रतिशत
अखिलेश यादव --- 48,582,202 रुपये यानी 110 प्रतिशत
अजीत सिंह ---- 58,232,462 रुपये यानी 334 प्रतिशत
राम विलास पासवान ----11,838,791 रुपये यानी 42 प्रतिशत बढ़ गयी।
कमाल हैं अभी तक ये 16 हजार मासिक वेतन उठा रहे थे, ये जनप्रतिनिधि हैं, इनका कोई दूसरा काम भी नहीं हैं, तो ये नेता बताये कि इतने रुपये कहां से इनके पास आ गये, कैसे इनकी आमदनी तीन सौ प्रतिशत से ज्यादा केवल पांच वर्षों में बढ़ गयी, क्या इन्हें कुबेर का खजाना मिल गया, अथवा अलादीन का चिराग। गर अलादीन का चिराग अथवा कुबेर का खजाना इन्हें राजनीति के द्वारा मिल जाता हैं तो इसका फायदा आम जनता को क्यों नहीं मिल जाता। आम जनता भी तो अलादीन के चिराग या कुबेर के खजाने से कुछ प्राप्त करें। इस देश की विडम्बना हैं कि आजादी के तुरंत बाद महात्मा गांधी और पटेल जैसे नेता ज्यादा दिनों तक नहीं रहे, जो रहे भी उनकी इन नेताओं ने कुछ मानी नहीं, उनके आदर्शों पर चलने से इनकार कर दिया। ऐसे में हरिशंकर परसाई की कहानी भेड़ और भेड़िये के तर्ज पर चल रही इस व्यवस्था पर अब ज्यादा कुछ कहना नहीं हैं, क्योंकि जनता अंग्रेजों के समय भी मर रही थी, आज भी मर रही हैं, उसके पास कोई विकल्प ही नहीं हैं क्योंकि नेता तो पैदा हुए ही हैं, सुख भोगने के लिए और आम जनता पैदा ही ली हैं, रोटी की तलाश में दर दर भटकने के लिए।

Monday, August 9, 2010

लो आया मौसम दल बदलने का......................... !


बिहार विधान सभा के चुनाव की विधिवत् घोषणा अब तक नहीं हुई, लेकिन विभिन्न पार्टियों के नेता अब दल बदलने को लेकर उत्सुक हैं, कोई दल बदल चुका हैं, कोई दल बदलने की तैयारी में हैं और इस दल बदल के चक्कर में इन दलबदलू नेताओं ने सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया हैं, बड़बोलेपन के चक्कर और जातीय दंभ में स्वयं की जाति को इन्होंने उस पादान पर लाकर खड़ा कर दिया हैं कि जैसे इनकी ही जातियों के लिए सिर्फ और सिर्फ बिहार बना हैं, बाकी जातियां इनके चरणवंदन और चरणधूलि पाने के लिए हैं। ये स्थिति एक पार्टी की नहीं, बल्कि कमोबेश सभी पार्टियों की हैं। तीन चार साल पहले की बात हैं। जब मैं धनबाद में था, तो एक बिहार के ही बड़बोले नेता आनन्द मोहन ने एक संवाददाता के प्रश्न के जवाब में कहा था कि जब पत्रकार अपने बेहतर कैरियर के लिए, संस्थान बदल देते हैं तो उनके जैसा नेता, बेहतर कैरियर के लिए पार्टी अथवा दल क्यों नहीं बदले। ऐसे हैं हमारे बिहार के नेता। ऐसी हैं इनकी सोच। इसलिए प्रभुनाथ सिंह जैसे नेता, नीतीश का दामन छोड़, लालू का दामन पकड़ लें और कहें कि हे लालू जी आप ही मेरे कैरियर निर्माता हो, मेरी कैरियर पर ध्यान दो। लालू भी – प्रभुनाथ को कहें, कि एवमस्तु तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी, तो क्या गलत हैं।
पर प्रभुनाथ सिंह का ये कहना कि उनके आने से बिहार में एक नया समीकरण बनेगा, पीएमआरवाई का, तो ये उन्हें कहने की इजाजत किसने दे दी। पीएमआरवाई का मतलब – कोई बुद्धिजीवी प्रधानमंत्री रोजगार योजना नहीं समझ लें। प्रभुनाथ सिंह के शब्दों में पी का मतलब पिछड़ा, एम का मतलब मुस्लिम, आर का मतलब उनकी जाति राजपूत, जिससे वे आते हैं और वाई का मतलब यादव। क्या इन्हीं पीएमआरवाई से वे बिहार विधान सभा में स्थिति मजबूत कर लेंगे। क्या जिन अक्षरों का इन्होंने उपयोग किया हैं, वो पिछले लोकसभा और पांच साल पहले के विधानसभा चुनाव में किसी दूसरे जगह छिटक गये थे क्या।
क्या इन जातियों का प्रभुनाथ सिंह जैसे लोगों ने ठेका ले रखा हैं और मान लिया कि इन जातियों और समुदाय का ठेका ले रखा हैं तो भी बाकी जातियां और समुदाय, इनके आगे पानी भरेंगे क्या। लालू और पासवान जैसे नेताओं से बिहार में एकता की बातें करना ही बेमानी हैं, लोग ठीक ही कहते हैं कि इस देश व राज्य को गर किसी ने बर्बाद किया हैं तो वे राजनीतिज्ञ हैं जो विशुद्ध रुप से राजनीतिबाज बनकर पूरे देश व राज्य में रहनेवाले, विभिन्न समुदायों को इतने टुकड़ों में बांट देना चाहते हैं कि देश व राज्य बर्बाद हो जाये और इनकी राजनीतिक कैरियर हमेशा हिट रहे, ताकि ये आराम से अपना और अपने आनेवाले पीढ़ियों का उद्धार कर सकें, लेकिन ये नहीं जानते कि अंधकार का साम्राज्य ज्यादा दिनों तक नहीं होता। मैं लालू प्रसाद से पूछना चाहता हूं कि जिस जय प्रकाश आंदोलन के वे प्रोडक्ट हैं, वे जयप्रकाश संपूर्ण क्रांति की बात किया करते थे, क्या प्रभुनाथ सिंह जैसे नेताओं के बयान से और उनकी पार्टी में ऐसे नेताओं के आने से संपूर्ण क्रांति हो जायेगी क्या। ऐसे भी लालू प्रसाद का पूरा कैरियर देखा जाये तो ये भी माई समीकरण की बात कुछ ज्यादा ही करते थे, ऐसे में गर प्रभुनाथ ने उसमें पीआर मिला दिया तो क्या हुआ, लालू प्रसाद को तो इससे और मजबूती ही मिलेगी, वे समझ रहे होंगे कि अब बिहार विधानसभा में उनकी वापसी तय हैं, लेकिन वे भूल रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में भी कमोबेश जाति की राजनीति करनेवाले बिहार के सारे के सारे नेता उनकी तरफ हो गये थे पर परिणाम कुछ दुसरा ही आया।
रही बात नीतीश की, तो ये भी कोई दुध के धूले नहीं हैं। थोड़ा बहुत अंहकार इनमें भी आ गया हैं, ये समझ रहे है कि बस अगली पारी भी इन्हीं की होगी, और इसी चक्कर में वे बहुत सारे ऐसे भी गलत निर्णय कर रहे हैं, जिनका खामियाजा वे भुगतेंगे ही। इनके पार्टी में भी बहुत सारे दुसरे दलों के नेता आने के चक्कर में हैं और कुछ इनकी पार्टी से जाने के चक्कर में हैं, क्योंकि जब जब चुनाव आते हैं तो बिहार क्या पूरे देश में ऐसे दृश्य दिखाई पड़ जाते हैं, पर इसके कारण बिहार की मर्यादाएं और सामाजिक माहौल न बिगड़ जाये, इसका ध्यान यहां के राजनीतिज्ञों को रखनी चाहिए, क्योंकि जो काम राजठाकरे महाराष्ट्र में कर रहे हैं, वो ही काम ये कमोबेश बिहार में कर रहे हैं, चाहे वो लालू हो या प्रभुनाथ या कोई अन्य। अंतर ये हैं कि राज ठाकरे अपनी राजनीति चमकाने के लिए, मराठी और गैर मराठी विवाद उछाल रहे हैं और बिहार के नेता पीएमआरवाई बनाम गैर पीएमआरवाई का मुद्दा उठा रहे हैं। दोनों में कोई अंतर नहीं हैं, बस समझ की फेर हैं, सभी देश को बर्बाद करने में तुले हैं. जरुरत हैं बिहार में रह रहे उन युवाओं को, आगे बढ़ने की जो बिहार को एक नयी दिशा देना चाहते हैं, वे आगे बढ़े और इस चुनाव में जन जन तक जाकर बतायें कि वे वोट किसी को भी दें, पर दे जरुर, पर ध्यान रहे कि बिहार की मर्यादा और सामाजिक माहौल न बिगड़ने पाये, क्योंकि बिहार के नेताओं ने अपनी घटिया स्तर की राजनीति शुरु कर दी हैं, मैं देख रहा हूं वे सब कुछ करने पर आमदा हैं – हो सकता हैं कि वे अपराधियों तक का शरण लें और कहें कि ये ही बिहार को नयी दिशा देंगे, इसलिए पीएमआरवाई के तहत इन्हें ही वोट दें। इसलिए बिहार के युवाओं का जगना बहुत जरुरी हैं।