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Saturday, June 3, 2017

रघुवर की परीक्षा.......

पहले जमशेदपुर, फिर हजारीबाग और अब रांची को अशांत करने की कोशिश, दरअसल जिस राज्य में प्रशासन का भय समाप्त हो जाता है, वहां इस प्रकार की घटनाएं आम बात हो जाती है। मैं महसूस कर रहा हूं कि चाहे हिंदू हो या मुसलमान या ईसाई, इन दिनों बड़ी संख्या में खुराफातियों का जमावड़ा इन समुदायों में हो गया है, इनका काम अपने-अपने समुदायों में रह रहे लोगों का माइन्ड वाश करना है और एक दूसरे से लड़वाने के लिए नाना प्रकार के प्रशिक्षण देना है। इन खुराफातियों का मनोबल इतना बढ़ गया है, कि वे अब किसी से डरते नहीं, पुलिस को ये पाकेट में लेकर चलते है, अब तो ये पुलिस पर ही हमले करते है और पुलिस जान बचाने के लिए इधर – उधर भटक रही होती है, क्योंकि इन खुराफातियों का समाज में रह रहे बड़े-बड़े, स्वयं को संभ्रात कहलानेवाले लोगों का वरदहस्त प्राप्त है, कमाल है कि यहीं दंगे भी भड़काते है, और यहीं दंगा को शांत कराने में, सांप्रदायिक सद्भाव के लिए निकाले जानेवाले जुलूसों में बढ़-चढ़कर भाग भी लेते है, यानी दोनों तरफ से ये मलाई चाभ रहे है।
जमशेदपुर की घटना तो पूर्णतः राजनीतिक और एक समुदाय द्वारा प्रायोजित है, हजारीबाग में जिस प्रकार से एक बस पर हमला किया गया और कल देर रात जिस प्रकार रांची के बड़गाई में बारात पर हमला किया गया, वह साफ बताता है कि इन खुराफातियों ने अपना काम बहुत ही अच्छे ढंग से कर दिया है।
उसका उदाहरण है कल रांची के बडगाई बस्ती में एक बारात पर हुआ हमला। बताया जाता है कि फेसबुक वाल पर, आपत्तिजनक पोस्ट डाले जाने के कारण यह घटना घटी। मेरा सवाल है कि फेसबुक पर जिसने गलत किया, उसको दंडित करोगे, या जिसका फेसबुक से कोई लेना देना नहीं, उन बारातियों पर हमला करोगे, अगर किसी ने फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट डाली तो उसके लिए पुलिस में अपनी आपत्ति दर्ज कराओगे या स्वयं कानून हाथ में ले लोगे। दरअसल सच्चाई यह है कि फेसबुक तो बहाना है, खुराफातियों का दल, शांतिप्रिय लोगों को बताना चाहता है कि तुम्हारी अब खैर नहीं, तुम जिस तरफ से चलोगे, हम तुम्हे अपनी ताकत का ऐहसास करायेंगे। बस बात इतनी सी है।
खुराफातियों ने अपना काम कर दिया है और वे डायरेक्ट राज्य सरकार को चुनौती दे रहे है।
मैं कहूंगा, राज्य सरकार से, रघुवर सरकार से, थोड़ा अपनी शक्ति दिखाइये, किसी की मत सुनिये, बस चाहे वे खुराफाती किसी भी तरफ के क्यों न हो, उन्हें पकड़कर उनकी औकात बताइये। दंगाइयों की फौज कितनी भी विशाल क्यों न हो, उन्हें कानून का मजा चखाइये, फिर देखिये, न तो जमशेदपुर कांड होगा, न हजारीबाग जैसे घटना घटेगी और न रांची के बड़गाई में किसी की हिम्मत होगी कि वह बारात पर हमला करें।
रघुवर जी, बात को समझिये...
गुंडा, गुंडा होता है...
इन खुराफातियों को औकात बताइये...
इन्हें समाज में रहने का कोई हक ही नहीं...
इन्हें इनका उचित स्थान दिलाइये...
फिर देखिये, झारखण्ड कैसे शांत होता है...
इन खुराफातियों ने पूरे झारखण्ड को अशांत करने, बदनाम करने, विकास कार्य को प्रभावित करने का कार्य किया है, हो सकता है कि आपको इस कार्य को सफल बनाने में, राजनीतिक शक्तियां या अपने लोग आपके दुश्मन बन जाये, पर इससे अलग एक कीर्तिमान बनाने का यह समय है, इससे चूकिये मत...
क्योंकि शांतिप्रिय जनता में भय का वातावरण पनप रहा है, वे स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे है, उन्हें सुरक्षित रहने का ऐहसास दिलाना आपका कार्य है, इसमें अपनी भूमिका निभाइये।
नहीं तो, जिस दिन शांतिप्रिय जनता को ये महसूस हो जायेगा कि हम इस सरकार में असुरक्षित है, तो स्थिति भयावह हो जायेगी।
आपकी पुलिस भी जरा सुस्त है, जिसके कारण गुंडे, खुराफाती और असामाजिक तत्व उनसे भी उलझ रहे है, थोड़ा अपनी पुलिस को कहिये कि वे जरा स्वयं को समझे और इन दुष्टों को उनकी औकात बताये।
कानून से बड़ा कोई नहीं होता, कोई भी कानून हाथ में लेगा, उसे दंडित होना पड़ेगा, चाहे कोई भी हो, आशा है, आप जल्द इस पर ठोस निर्णय लेंगे और जल्द ही खुराफातियों का समूह सलाखों के भीतर होगा। ये आपकी अग्नि परीक्षा है, क्या आप इस परीक्षा में उतीर्ण होना चाहेंगे? सवाल जनता की ओर से आया है, आपको इस बार जवाब देना ही होगा...

Saturday, June 15, 2013

नीतीश बदनाम हुआ, मुसलमां तेरे लिए.......

बहुत पहले एक गाना सुना था -- लौंडा बदनाम हुआ, नसीबन तेरे लिए......। ये गीत अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश पर पूरी तरह फिट बैठ रही हैं और वह भी इस प्रकार- नीतीश बदनाम हुआ, मुसलमां तेरे लिए...........,क्योंकि नीतीश सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम वोट के लिए, वो सारे कार्य कर रहे हैं, जो किसी भी राजनीतिज्ञ को शोभा नहीं देता। इन्हें ये लगता हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करके ये पूरे बिहार में मुसलमानों के रहनुमा बन जायेंगे। अकेले बिहार में लोकसभा और विधानसभा में जदयू का परचम लहरा देंगे, तो ये उनकी मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। मुस्लिम मतदाता चाहे वह बिहार का हो या किसी अन्य प्रांत का, हमें नहीं लगता कि वो इतना मुर्ख हैं कि सिर्फ मोदी का विरोध कर देने से, इनके साथ अथवा किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ चिपक जायेगा।बिहार में कभी कांग्रेस, कभी लालू को अपना हीरो चुननेवाली मुस्लिम मतदाता, कल तक नीतीश के साथ थी, पर महराजगंज लोकसभा उपचुनाव ने ये सिद्ध कर दिया कि मुस्लिम मतदाताओं को ज्यादा दिनों तक कोई भी मुर्ख नहीं बना सकता, पर जब कोई मुर्ख बनने को तैयार हैं, अपने घर में आग लगाकर खुद तमाशा देखना चाहता हैं तो उसे किया ही क्या जा सकता हैं। उसे भी अपना घर फूंकने का पूरा अधिकार है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत एक महान देश हैं और बिहार उसमें अनोखा। एक फिल्म में बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा ने डायलाग बोला था। डायलॉग था - बिहार में तो मां के पेट में ही बच्चा राजनीति सीख लेता हैं। तब समझ लीजिये, बिहार में राजनीति कैसे सर चढ़कर बोलता है। फिलहाल बिहार में नीतीश कुमार को, नरेन्द्र मोदी से चिढ़ हैं। उनका कहना हैं कि नरेन्द्र मोदी सांप्रदायिक हैं। उन पर 2002 में गुजरात में हुए दंगे का दाग हैं। उनके इस चिढ़ को उनके आसपास अथवा उनकी कृपा से दिल्ली के राज्यसभा तक पहुंचने वाले चिरकुट नेता शिवानन्द तिवारी अथवा कृषि मंत्नी नरेन्द्र सिंह बढ़ा चढ़ाकर पेश करते हैं और बताते हैं कि नीतीश सर्वाधिक सेक्यूलर नेता है, पर इन नेताओं के चेहरे से तब हवाइंया उड़ने लगती है। जब एक देशभक्त सवाल पूछ देता हैं, वो सवाल हैं............................
क. जब 2002 में गुजरात जल रहा था, उस वक्त नीतीश कुमार केन्द्र में मंत्री थे, उसी समय वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ इतनी उग्रता क्यों नहीं दिखाई, क्यों नही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एक्शन लेने के लिए दबाव बनाया।
ख. आडवाणी सेक्यूलर कैसे हो गये, आडवाणी को वे प्रधानमंत्री बनाने के लिए इतने आतुर क्यों हैं, जबकि उन्हीं की पार्टी के कई नेता अच्छी तरह जानते हैं कि  रामरथ यात्रा निकालकर आडवाणी ने क्या किया था।
ग. भाजपा धर्मनिरपेक्ष नहीं पर कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष कैसे हो गयी, जबकि इंदिरा गांधी हत्याकांड के बाद देश में हुए दंगे के दौरान हजारों सिक्खों का कत्लेआम कर दिया गया। हाल ही में असम में एक बहुत बड़ा नरसंहार हो गया, वहां किस समुदाय के लोग मारे गये, ये नीतीश बहुत अच्छी तरह जानते हैं। यानी भाजपा करे तो दंगे और कांग्रेस व नीतीश की पार्टी करे तो हर हर गंगे।
घ. पूरा बिहार जानता हैं कि नीतीश बिहार के विकास की हवा खड़ा करते हैं, पर स्वयं घोर जातिवादी हैं, ये तो फूट जालो शासन करों में विश्वास रखते हैं, जैसे देखिये दलितों में भी बंटवारा खड़ा कर दिया और एक वर्ग को महादलित घोषित कर दिया, क्या इससे उस समुदाय का कल्याण हो गया।
ड. नीतीश ने विकास का हवा खड़ा कर, सर्वाधिक फायदा उन अपराधियों को पहुंचाया जो इनके दल में शामिल थे, और जो अपराधिक किस्म के नेता दूसरे दलों में थे, उन्हें चून-चूनकर जेलों के अंदर पहुंचाया, ताकि नीतीश का सामना कोई कर ही न सकें।
च. नीतीश ने नीतीश भक्त पत्रकारों को खूब फायदा पहुंचाया।  नीतीश भक्त पत्रकारों ने भी नीतीश को जमकर फायदा पहुंचाया। उसका नमूना देखिये, जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी पटना में तो एक चैनल ने पटना में आयोजित भाजपा कार्यकारिणी की बैठक का समाचार दो मिनटो में खत्म कर दी और नीतीश की एक सभा के समाचार को 21 मिनट स्थान दिया। बाद में जब हमने पता लगाया तो पता चला कि नीतीश के समर्थन में ये पेड न्यूज था।
छ. इसी नीतीश ने अपनी ही पार्टी के टॉप स्तर के नेता को ठिकाने लगाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। जान बूझकर बांका संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से दिग्विजय सिंह का टिकट काटा। अंत में दिग्विजय सिंह खुद निर्दलीय लड़ गये और नीतीश को उसकी औकात बता दी। फिलहाल दिग्विजय सिंह दुनिया में नहीं हैं।
ज. सच्चाई ये हैं कि जदयू कोई राष्ट्रीय पार्टी नहीं हैं, ये क्षेत्रीय पार्टी हैं जो बिहार में भाजपा के वैशाखी पर टिकी है, नीतीश इसके एकमात्र नेता हैं, जो कुर्मी जाति से आते हैं। इस नीतीश ने जदयू को पूरी तरह से हाईजैक कर लिया हैं। शरद यादव तो मुखौटा हैं, उनकी इतनी हिम्मत भी नहीं कि नीतीश के खिलाफ बगावत या आवाज बुलंद कर सकें, क्योंकि उन्हें भी लोकसभा पहुंचना हैं, राजनीति करनी हैं और वे जानते हैं कि नीतीश उन्हें लोकसभा में आराम से पहुंचा सकते हैं, इसलिए ये चाहकर भी राजग गठबंधन को मजबूती नहीं प्रदान कर सकते, ये वहीं करेंगे, जो नीतीश कहेंगे, इसलिए बेचारे शरद यादव पर क्या लिखना और क्या बोलना।
हमारे देश में अल्पसंख्यक का मतलब। बौद्ध, जैन, यहुदी अथवा पारसी नहीं होता। इनके खिलाफ कुछ भी अत्याचार कोई भी कर दे, किसी भी नेता के आंख से आंसू नहीं दिखाई पड़ेंगे पर जैसे ही मुस्लिम या इसाईयों के खिलाफ गर छिटपुट हिंसा भी हो जाये तो फिर देखिये इन घडि़याली नेताओँ के घड़ियाली आंसू, इतने आंसू टपकायेंगे कि पूछिेय मत। ये इसलिए घड़ियाली आंसू टपकाते है, क्योंकि कई विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रो में ये वोटर के रुप में निर्णायक हैं। गर इन्हें पता लग जाये कि मुस्लिम या इसाई वोट अब निर्णायक नहीं रहे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये घडि़याली आंसू क्या ये तो एक बूंद पसीने भी इनके लिए नहीं बहाये। ये हैं हमारे देश के वर्तमान घटियास्तर के नेताओं का चरित्र। विधायक और सांसद बनने के बाद तो ये शपथ लेते है कि वे भारत के संविधान की मर्यादाओं की रक्षा करेंगे पर सच्चाई ये  हैं कि जितना संविधान की धज्जियां ये उड़ाते हैं, उतना कोई नहीं और वोट के लिए तो ये कहीं मुसलमान तो कहीं घोर जातिवादी होने से भी नहीं चूकते। हम कहते हैं कि जब मुस्लिम वोटरों की इतनी ही चिंता हैं तो हमारा सलाह हैं कि नीतीश धर्मपरिवर्तन क्यों नहीं कर लेते। इससे अच्छा तो दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। मुस्लिम भी कहेंगे कि देखो ये नीतीश को, जो इस्लाम कबूल कर लिया, अपने हिंदू धर्म से खुद को अलग कर लिया। नेता हो तो ऐसा हो, जो वोट के लिए अपना ईमान और धर्म भी बदल लिया हैं, इसलिए वोट तो हम नीतीश कुमार जो अब मो.नीतीशुद्दीन बन गये हैं, उन्हें ही देंगे। इससे जदयू भी मजबूत हो जायेगा और सदा के लिए नीतीश बिहार के मुसलमानों में लोकप्रिय और ऐतिहासिक पुरुष हो जायेंगे................

Saturday, August 18, 2012

भारत के मुसलमानों में गुस्सा जायज या नाजायज....................

भारत के मुसलमानों में गुस्सा हैं, वह भी रमजान के महीने में, कहा जाता हैं कि ये महीना बड़ा ही पाक होता हैं। इस महीने में गुस्सा कहीं से भी जायज नहीं हैं, बल्कि ये समय खुदा से नेह लगाने का होता हैं, पर बेचारे क्या करें, वे गुस्से में हैं और इस गुस्से में वे, वो सारे काम कर रहे हैं, जिसकी जितनी भी निंदा की जाय कम हैं। ये मुंबई के आजाद मैदान में इकट्ठे होते हैं और अमर जवान के शिलाखंड को पैरों से रौंदते हैं। मीडिया के ओबी वैन को आग के हवाले कर देते हैं। रांची में ये दुकानों में तोड़ - फोड़ करते हैं तथा यहां के लोगों को भयाक्रांत करते हैं। उत्तर प्रदेश में भगवान महावीर की प्रतिमा को तो़डते हैं और राह चलती महिलाओं के कपड़े फाड़ते हैं और ये सब होता हैं असम में बांगलादेशी घुसपैठियों को समर्थन देने के नाम पर। जब ये कुकर्म कर रहे होते हैं तो इन कांग्रेसशासित अथवा कांग्रेस समर्थित पार्टियों की सरकारें इनका मनोबल बढ़ाने के लिए सहयोग भी करती हैं ताकि सांप्रदायिक सौहार्द बनी रहे। कमाल हैं असम में बांगलादेशी घुसपैठियों ने असम के नागरिकों का जीना मुहाल कर दिया हैं। वे असम के मूल निवासियों को सहीं से रहने नहीं दे रहे,  इसकी चिंता उन्हें नहीं हैं, पर जिस प्रकार से असम के आदिवासी अपने अधिकारों का हनन होता देख, उनका विरोध कर रहे हैं, तब ये उन असमियों पर आग बबूले होकर, पूरे भारत को सांप्रदायिकता की आग में झोंक देना चाहते हैं। वे भारत में रहकर म्यामांर की घटना से भी दुखी हैं साथ ही इसके लिए वे भारतीयों को सबक सीखाने से नहीं चूक रहे...................................
पर इन मुसलमानों को इस पर दुख नहीं होता और न ही गुस्सा आता कि
क. कैसे पाकिस्तान में हर महीनें 25-30 हिंदू समुदाय की लड़कियों का बलात्कार और अपहरण किया जा रहा हैं।
ख. कैसे हर महीने हिंदू और सिक्खों की लड़कियों का अपहरण कर उन्हें जबरन हिंदू से मुसलमान बनाया जा रहा हैं जिसका सीधा प्रसारण पाकिस्तान के चैनलों द्वारा किया जा रहा हैं।
ग. कैसे हर दिन पाकिस्तान से हिंदू और सिक्खों की टोली वहां हो रहे अत्याचार से भयभीत होकर भारत लौट रही हैं,  याद रहे हाल ही में 250 हिंदू परिवार पाकिस्तान से भारत लौट आये हैं।
घ. कैसे पाकिस्तान के चैनलों में कार्यरत एंकर और उनके गेस्ट हिंदूओं के खिलाफ एक से एक मुहावरों का प्रयोग करते हैं और हिंदूओं को दोयम दर्जे का अछूत समझते हुए काफिर कहकर पुकारते हैं।
ड. कैसे भारत के ही कश्मीर घाटी में वहां से चुन चुन कर हिंदूओं को निष्कासित कर दिया और आज ये हिंदू भारत के विभिन्न कोने में मारे मारे फिर रहे हैं।
बात अब यहां ये हैं कि पाकिस्तान से मार खाकर हिंदू भारत आ गये, कश्मीर से मार खाकर भारत के हिंदू बहुल क्षेत्रों में जीवन बसर कर रहे हैं, कल ये हिंदू जब अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जायेंगे तो फिर ये कौन से मुल्क में जाकर बसेंगे, जब यहां के मुसलमान, इन हिंदूओं पर अत्याचार करना शुरु करेंगे। आज हिंदू बहुसंख्यक इलाकों में इनके तेवर ऐसे हैं, तो जब ये बहुसंख्यक होंगे तो ये क्या करेंगे। जिस बांगलादेश को भारत ने स्वतंत्र कराया, वहीं बांगलादेश अब भारत को निगलने के लिए तैयार हैं। वहां हो रहे जनसंख्या विस्फोट से भारत के अनेक राज्य प्रभावित हैं तो जब भारत में जनसंख्या विस्फोट होगा, उसका क्या होगा।
संसद में असम को लेकर चर्चाएं हुई हैं, उस चर्चा में लालू प्रसाद यादव जैसे घटिया स्तर के नेता की बातें मसखरें टाइप होती हो और जहां ऐसे ऐसे मसखरों की फौज असम समस्या को नहीं समझ पा रही हो तो हम कैसे समझे कि ये बिहार के मसखरे नेता अपने ही प्रदेश यानी बिहार में जो पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, अररिया, सहरसा में बांगलादेशियों ने जो हालात पैदा कर दिये हैं, उससे निजात दिलायेंगे, ये तो अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए पैदा हुए हैं,  इन्हें देश से क्या मतलब। पत्नी को मुख्यमंत्री बनवायेंगे और सारी गलतियों के लिए एक कुड़ादान हैं ही -- भाजपा। उसके मत्थे सब पटक देंगे। बिहार तरक्की कर रहा हैं तो इसके लिए लालू यादव और बिहार विनाश के कगार पर तो बस इसके लिए भाजपा।
आश्चर्य इस बात की हैं कि ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर जो नेता या पार्टी देशहित नहीं देखती उसके लिए हम कौन सा शब्द इस्तेमाल करें। समझ में नहीं आ रहा। वोटबैंक की राजनीति ने तो देश को वो कबाड़ा किया हैं कि देश उसका दंश लगता है कि स्वतंत्रता के बाद से आज भी झेल रहा हैं और ये लगता हैं कि जब तक ये देश फिर से गुलाम नहीं हो जाता ये चलता रहेगा। हमें लगता हैं कि देश को गर स्वतंत्र कराने का श्रेय कांग्रेस को जाता हैं तो विनाश का श्रेय भी कांग्रेस को ही जायेगा, क्योंकि जो स्थितियां व परिस्थितियां कांग्रेस ने पैदा कर दिये हैं, उसकी जितनी भी निंदा की जाय कम हैं.
पिछले दो तीन दिनों से पूरे देश में एक एसएमएस ने ऐसा आतंक मचाया हैं कि उससे पूरे ऩार्थ ईस्ट के हमारे भाई बहन परेशान हैं। देश में नासुर बन चुके कुछ पाकिस्तानी और पाकिस्तान बांगलादेशी आंतकी संगठनों ने जो धर्म के नाम पर कोहराम मचाया हैं, उससे पूरा देश आंतकित हैं कि यहां क्या हो रहा हैं। मेरे देश में। पर हमारी कांग्रेस व मनमोहन और उनका समर्थन कर रही अन्य पार्टियों को उससे क्या मतलब। ऐसे हालात में भी ये वोटबैंक की राजनीति से बाज नहीं आ रही है। उन्हें 2014 का लोकसभा चुनाव दीख रहा हैं और इसमें कैसे सफलता मिलनी हैं, उसके लिए ये इस पूरी घटनाओं को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं और इसमें आहुति सामग्रियां बना दी हैं -- नार्थ ईस्ट के लोगों को। ऐसे में यहां की देशभक्त जनता को उठना आवश्यक हो गया हैं। सभी को चाहिए कि मिल जूलकर नार्थ ईस्ट के भाई बहनों को बचाने के लिेए आगे आये। उनकी सम्मान की रक्षा के लिए आगे आये और जो इनका विरोध कर रहे हैं या सबक सीखाने की बात कर रहे हैं, उन्हें गांधीवादी तरीके से बतायें कि उनका विरोध करने का तरीका, बहुत ही गलत हैं, इससे अंत में उनका ही बुरा होगा और देशवासियों के नजरों में वे खुद शक की निगाहों से देखे जायेंगे।
भारत जैसे देश में हिंसा का कोई स्थान नहीं, विरोध का तरीका सिर्फ गांधीवादी होना चाहिए ये राम, कृष्ण और बुद्ध की धरती हैं, इस धरती पर हिंसा का कोई स्थान हो ही नहीं सकता और वह भी भारतीयों का भारतीयों के विरोध में............शर्मनाक...शर्मनाक..शर्मनाक। जरुरत हैं देश में करोंड़ों की संख्या में रह रहे सत्यनिष्ठ मुस्लिमों को आगे आने की और इनके द्वारा ऐसे माहौल बनाने की,ताकि देश की बहुसंख्यक हिंदूओं को लगे कि मुट्ठी भर सिरफिरे मुसलमानों के इस आतंकी तेवर से उनका कोई लेना देना नहीं............हम भारतीय हैं और भारतीय ही रहेंगे.....................।


Saturday, November 26, 2011

पता नही पाकिस्तान भारत और हिन्दूओं से इतनी नफरत क्यों करता है...........

पाकिस्तान में बनी फिल्म बेदारी से लेकर आज के जमाने में बनी फिल्म खुदा के लिए तक में भारत और भारत में रहनेवाले हिंदुओं के प्रति इतनी ऩफरत क्यों भरी रहती हैं। हमें आज तक समझ में नहीं आया, जबकि जन्म से लेकर आज तक मैंने कोई ऐसी भारतीय फिल्में नहीं देखी या ऐसी भारत में कोई पुस्तकें नहीं देखी या पढ़ी जो पाकिस्तान से नफरत का पाठ पढ़ाती हो। पता नहीं क्यों पाकिस्तानी फिल्मों में भारत और हिंदुओं के प्रति नफरत क्यों भर दी जाती हैं, कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत और हिंदुओं का विरोध, वहां फिल्में हिट होने का आधार होती हैं, गर ऐसा हैं तो हम ये कह सकते हैं कि ये ऩफरत पाकिस्तान को और नर्क बना देगा। जरुरत हैं ऩफरत की जगह प्यार का पाठ याद करने और इसे सींचने की। हम अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में भी ऐसे लोगों की संख्या हैं जो पाकिस्तान से शत्रुता रखते हैं और पाकिस्तान में भी ऐसे लोग हैं जो भारत से शत्रुता रखते हैं, पर क्या इन दोनों देशों में एक दूसरे से शत्रुता रखनेवालों की संख्या इतनी अधिक हैं, जो प्रेम शब्द को ही मिटा दें। गर प्रेम शब्द ही मिटा दोगे तो काहे का हिंदु और काहे का मुसलमान। तब तो, तुम दोनों से अच्छे तो वो जाहिल हैं, जो मंदिर और मस्जिद दोनों के दरवाजे पर बैठकर, भीख मांगकर, अपनी दुनिया चला रहे होते हो, एक तरह से सीख भी देते हैं कि जिंदगी क्या हैं.........................।
ऩफरत कैसे भरी जा रही हैं -- पाकिस्तान में उसकी बानगी देखिये।
1954 में भारत में एक फिल्म बनी जागृति। जिसके गीत लिखे थे - पं. प्रदीप ने। उनके ये गीत आज भी अमर हैं और भारतीय स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस, सभी में ये खूब गाये और गंवाये जाते हैं। शायद ही कोई भारतीय हो, जो इस दिन इनके गाने न सुन पाये हो। मैं इनके ज्यादातर गीतों को यहां उदाहरण बनाना नहीं चाहता, पर एक गीत का उदाहरण जरुर देना चाहुँगा। एक गाना था जागृति में जिसके अंतरा थे -- आराम के तुम भूल भूलैंया में न भूलों, सपनो के हिंडोंले में मगन होके ना झूलो, अब वक्त आ गया मेंरे हंसते हुए फूलों, उठो छलांग मार के आकाश को छूलो, आकाश को छूलो, तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। इस फिल्म में जिस बालकलाकार ने काम किया था, उसका नाम था रतन कुमार, जो मुस्लिम बाल कलाकार था। बाद में ये पाकिस्तान का रुख किया और इसनें 1957 में बेदारी बनायी, वहां जाकर उसने गीत का क्या पोस्टमार्टम कराया जरा सुनिये -- लेना हैं ये कश्मीर तुम ये बात न भूलो, ये बात न भूलों, कश्मीर में लहराना हैं झंडा उछाल के, इस मुल्क को रखना मेरे बच्चों संभाल के। यहीं नहीं -- दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल के तर्ज पर मो. अली जिन्ना के शान में इसनें गाना गाया -- यू दी हमें आजादी की दूनिया हुई हैरान, ऐ कायदे आजम तेरा अहसान हैं अहसान। इस गीत के माध्यम से गांधी को जिन्ना के सामने बौना और बेवकूफ दिखाने की कोशिश की गयी थी। कहां गांधी और कहां जिन्ना। गांधी आज विश्वव्यापी हो चुके और जिन्ना क्या हैं वो पाकिस्तान के लोग ही बेहतर बता सकते हैं। आज गांधी के जन्मदिवस पर पूरा विश्व 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाता हैं, क्यों मनाता हैं, हमें लगता हैं बताने की जरुरत नहीं। आकाश की ओर हम थूंकेंगे तो वह थूक मेरे उपर ही आकर गिरेगा। ये जान लेना चाहिए। ये उदाहरण इसलिए मैं दे रहा हूं कि एक पं. प्रदीप हैं जो अपने गीतों के माध्यम से अपने बच्चों में संस्कार डाल रहे हैं और कह रहे हैं कि भारत को कहां ले जाना हैं और पाकिस्तान की सोच देखिये वो सिर्फ कश्मीर पर ही आकर अटक जाता हैं, अरे कश्मीर तक अटकोगे तो कैसे अपने देश को आगे बढ़ाओंगे। पूरी दुनिया में अपना नाम और चरित्र दिखाओ ताकि तुम्हें लोग कहें कि हां एक पाकिस्तान की सोच कुछ विशेष प्रकार का हैं।
यहीं नहीं एक फिल्म देखी तेरे प्यार में, जिसमें पाकिस्तानी अभिनेता एक भारतीय सैनिक के केवल हाथ नहीं मिलाने पर पूरे भारत के हिदुओं पर ही गंदी टिप्पणी करते हुए कहता हैं कि पता नहीं कैसे यहां मुसलमान रहते होंगे, इस दोजख में। क्या एक भारतीय सैनिक किसी पाकिस्तानी नागरिक से हाथ नहीं मिलायेगा तो क्या पूरे देश के सौ करोड़ हिंदु गलत हो गये। इसी तरह इस फिल्म में तिरंगे का अपमान करते हुए दिखाया जाता हैं। और अब बात हाल ही में बनी फिल्म खुदा के लिए में, जिसमें इसी अभिनेता से एक विदेशी अभिनेत्री पूछ रही होती हैं कि पाकिस्तान कहां हैं। ये अभिनेता पाकिस्तान की चौहद्दी बताकर बता रहा होता हैं कि पाकिस्तान कहां हैं, पर जैसे ही वह भारत का नाम लेता हैं। वो विदेशी अभिनेत्री कहती हैं कि ओह इंडिया नेवर, आई लाईक इंडिया, हेयर इज ताजमहल। अभिनेता बोलता हैं कि यू नो, हू मेड ताजमहल। विदेशी अभिनेत्री पूछती हैं - हू। पाकिस्तानी अभिनेता बोलता हैं कि शाहजहां, जस्ट लाईक मी। ही वाज मुस्लिम। देन पाकिस्तान ऐंड इंडिया आर वन। शर्म आती हैं ऐसी सोच पर। शर्म आनी चाहिए, ऐसे संवाद लिखनेवाले लेखक, और फिल्म निर्माताओं पर। क्या एक मुस्लिम होने से सब कुछ ठीक हो जाता हैं और हिंदु हो जाने से सब कुछ गलत हो जाता हैं। ये कुछ उदाहरण हैं जो पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट़ीज में काम करनेवाले लोगों की सोच को दर्शाता हैं और जब ऐसी सोचवाली फिल्में वहां बनेंगी तो वहां का समाज कैसा बनेगा। आप सोच सकते हैं. यहां के बुद्धिजीवियों की कैसी सोच हैं।
ये तो रही फिल्मों की बात, आये दिन पाकिस्तानी समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में, तथा विदेशी समाचार जगत में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर किस प्रकार का अत्याचार होता हैं। पटी रहती हैं। पाकिस्तान में हाल ही में बाढ़ आया और उस बाढ़ में हिंदु बाढ़पीड़ितों को गोमांस परोस दिया गया, जब हिंदु भड़के तो सरकार और सरकार के नुमांइदों ने अपनी गलती स्वीकारी। यहीं नहीं पाकिस्तानी हिंदुओं की बेटियों का अपहरण करना, और उन्हें जबरन मुस्लिम बनाकर, उनसे शादी करना तो वहां आम बात हैं और अगर आपने उसका विरोध किया तो बस हो जाईये, उपर जाने के लिए तैयार। क्योंकि वहां की अदालत भी, आपको ठोकर ही मारेगी। पाकिस्तान में मंदिरों की क्या स्थिति हैं, वहां के अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति हैं, ये जानना हैं तो हाल ही में पर्यटन के नाम पर पाकिस्तान से लौटे सैकड़ों हिदु परिवार जो अब पाकिस्तान लौटना नहीं चाहते, उनके बयान सुन और पढ़ लीजिये पता लग जायेगा कि आखिर वे अपने वतन क्यों नहीं लौटना चाहते। पाकिस्तान बताये कि उसके देश में अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति हैं, अब तक कितने लोग राष्ट्रपति अथवा पाकिस्तान के सर्वोच्च पदों पर पहुंचे हैं और हम बताते है कि जिन मुसलमानों की वो बात करते हैं और उनके दुख दर्द पर बेवजह चिल्लाते हैं, हम बताते हैं कि भारत में मुसलमानों की क्या स्थिति हैं। हमें तो बताने की जरुरत भी नहीं, पूरा विश्व जानता हैं कि भारत में अल्पसंख्यक किस प्रकार रह रहे हैं। यहां के अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में वृद्धि हो रही हैं, पर पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या में लगातार गिरावट क्यों। कमाल हैं चलनी दूसे, सूप के, जिन्हें बहतर छेद।
पाकिस्तान के लोगों को जान लेना चाहिए कि नफरत से नफरत बढ़ती हैं, प्यार की सीख, सर्वाधिक जरुरी हैं। इसलिए प्यार करना सीखे और सीखाएँ, और भारत से ज्यादा प्यार करें, क्योंकि हम आपके सर्वाधिक निकट हैं, हमारे पुरखे और आपके पुरखे एक ही हैं, वेवजह खून की नदियां बहाने का ख्वाब पालकर कोई आप तीस मारखां या हम तीसमारखां नहीं बन जायेंगे।
और अगर आप ये सोचते हैं कि पूरे पाकिस्तान से हिंदुओं को मिटाकर या अल्पसंख्यकों का नामोनिसां मिटाकर आप महान बन जायेंगे तो ये आपकी सोच, आपको मुबारक। नफरत की आंधी में जन्म लेकर, आपने क्या पाया। आपने कभी सोचा। हमने क्या गंवाया और हमें क्या मिला, आपने सोचा, नहीं सोचा और आप सोचना भी नहीं चाहते, क्योंकि बस आपको तो हिंदुओं से नफरत हैं। हिंदुओं को गला काटने, उन्हें जबरत धर्मांतरण कराने, उनके बहु-बेटियों को बलात, अपहरण करने और उन्हें बलात्कार करने में बड़ा मजा आता हैं। वे भी बेचारे हिंदु क्या करेंगे, अदालत जायेंगे, कोई मुल्ला मौलवी आयेगा, बोल देगा कि वो तो अल्पसंख्यक थी, हिंदू थी। वो मुसलमान बना दी गयी, अदालत भी चुप। क्या बनाया हैं आपने पाकिस्तान को। ये मै इसलिए नहीं कह रहा हूं कि किसी ने हमें बोल दिया। अरे जनाब, दुनिया इंटरनेट की जगह पर बहुत छोटी हो गयी हैं। आप ही के यहां का आजाद चैनल और जियो चैनल में जो बहस होती हैं, और वो बहस कोई शख्स यू टूयब पर डाल देता हैं, मैं देख कर प्रतिक्रिया दे रहा हूं। आपके जिन्ना और अल्लामा इकबाल ने पाकिस्तान बनाया था, वो भी धर्मनिरपेक्ष और आपने उनकी मौत के बाद, वहां का राष्ट्रीय धर्म ही बना डाला - इस्लाम। और इस्लाम के नाम पर खुदा के नाम पर, आपने जो किया या कर रहे हैं, वो तो जियो के निर्माताओं ने फिल्म खुदा के लिए में दिखा ही दिया, कि आप किस पाकिस्तान में जी रहे हैं और अपने पाकिस्तान को कहां ले जाना चाहते हैं। पर मैं अपने हिंदुस्तान को वो हिंदुस्तान बनाना चाहता हूं, जहां सारे मजहब के लोग मिलकर रहे, खुश रहे, किसी को किसी से वैर न रहे। हमारे यहां भी कुछ सिरफिरे हैं, पर उनके लिए कानून अपना काम कर रहा हैं, उन्हें सजा भी मिलती हैं। सजा मिल भी रही हैं। ऐसा नहीं कि कोई पंडित या मुल्ला कह देगा तो कानून अपना काम करना बंद कर देगा। जो सपने हमारे पूर्वजों और देशभक्त नेताओं ने देखे हैं हमें खुशी हैं कि चाहे हमारे यहां किसी की सरकार आये, हिम्मत नहीं कि धर्मनिरपेक्षता की दीवार को दरकाने की कोशिश करे।
और अब आप हमसे 14 अगस्त 1947 को अलग हो गये, हमसे अलग होकर आपको क्या मिला और हमें क्या मिला, जरा गौर फरमाये ----------------
क. आपके यहां लोकतंत्र हमेशा मरता हैं और कभी - कभी ही दिखाई पड़ता हैं। इस लोकतंत्र को और कोई नहीं कभी पाक सेना का सेनाध्यक्ष जिया उल हक तो कभी परवेज मुशर्रफ गला घोंट देता हैं, जबकि हमारे यहां 15 अगस्त 1947 से लोकतंत्र जीवित हैं और प्रत्येक आमचुनाव में और मजबूत होकर निकलता हैं, गर आपको नहीं विश्वास हो तो याद करिये, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार, जो एक वोट से गिर गयी, फिर लोग जनता के बीच गये, और जनता ने एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी को जनादेश दिया। सारा विश्व देख रहा हैं कि भारत में लोकतंत्र कैसे दिन प्रतिदिन मजबूत होता जा रहा हैं। यहीं नहीं आपका राष्ट्राध्यक्ष, राष्ट्राध्यक्ष पद से हटने के बाद इतना पाकिस्तान से डरता हैं कि वो विदेश में शरण ले लेता हैं, जबकि अपने देश में आज तक ऐसा देखने को नहीं मिला। आज भी देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति पद पर शोभायमान बड़े बड़े शख्स भारत में ही रहकर, अपने जीवन को धन्य कर रहे हैं।
ख. भारत 15 अगस्त 1947 को जिस स्थिति में था, उसी स्थिति में हैं, लेकिन आपको कश्मीर से इतर नहीं सोचने की सनक ने आपके एक बहुत बड़े क्षेत्रफल को ही लील लिया। नहीं याद हैं तो मैं आपको बता देता हूं, पूर्वी पाकिस्तान आज बांग्लादेश हैं।
ग. भारत की संप्रभुता को कोई चुनौती नहीं दे सकता, पर आपकी संप्रभुता को कौन कौन देश चुनौती दे रहा हैं, वो शायद आपको भी मालूम हैं, पर नहीं मालूम होने का बहुत अच्छा नौटंकी कर लेते हैं। अमरीकन सेना ने आपके घर में घुसकर ऐबटाबाद में क्या किया। पूरा विश्व देखा, पर शर्म नहीं आती। आज आपके यहां से कोई विदेश जाता हैं तो उसे भारतीय कहना पड़ रहा हैं, क्योंकि वो जानता हैं कि विदेश में रहने पर पाकिस्तानी बोलने पर सम्मान नहीं मिलेगा।
घ. आज भारतीय हर क्षेत्र में अपनी लोहा मनवा रहे हैं, पर आपको शेखी बघारने, भारत के खिलाफ विषवमन करने में ज्यादा आनन्द आता हैं। आप खुद देखिये भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की पूरी दुनिया में क्या बिसात हैं और आप के यहां की क्या बिसात हैं। एक उदाहरण दे देना चाहता हूं आप खुद देखिये संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के वोट से आप कैसे अस्थायी सदस्य के रुप में नियुक्त हो गये, पर उसके बदले में आप क्या दे रहे हैं भारत को।
ड़. हमारे राजनीतिज्ञ, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान के साथ विकसित भारत बनाने का सपना लेकर आगे बढ़ रहे हैं, पर आप अभी तक वहीं अटके हैं, जहां से चले थे, हमे लगता हैं कि आप इससे उपर जाना भी नहीं चाहते, ऐसे में आपको क्या मिला। आपने मंदिर भी तोड़े और खुद उस मस्जिद में भी सेना भेजकर, वहां गोले बरसाये, जहां आपने कभी नमाज पढ़ी थी, उसका कारण क्या हैं, ये विचार करने की जरुरत हैं। धर्मांध बनने से काम नहीं चलेगा। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस्लाम कभी किसी दूसरे की हत्या करने, उन्हें बर्बाद करने, दूसरे धर्म के लोगों को इज्जत लूटने की सीख नहीं देता, पर क्या किया जाये, जो आप सीखेंगे, वो खुद पर भी आजमायेंगे ही। पूरा विश्व आपको किस नजर से देख रहा हैं, इसकी भी चर्चा, आपके इलेट्रानिक मीडिया के लोग बखूबी कर रहे हैं, उसे भी देखिये।
च. आपकी खासियत हैं कि आपके यहां जो जाता हैं, आप उसका खातिरदारी खूब करते हैं, आप इसकी शान भी दिखाते हैं, खासकर फिल्मों में। हमारे यहां से भी जो लोग जाते हैं, आपके यहां. वे बताते हैं कि जब उन्होंने कहा कि वे हिंदुस्तान से आये हैं तो कई होटलवालों ने खाने - पीने के पैसे नहीं लिये। उसका प्रमाण मेरे यहां भी हैं, जब प्रभात खबर के हरिवंश जी और रांची एक्सप्रेस के बलबीर दत्त आपके यहां गये तो वहां से लौटने के बाद, इन दोनों हस्तियों ने आपकी खुब प्रशंसा की। बलबीर दत्त जी ने तो आपके यहां का मिला मानचित्र ही हु ब हु छाप दिया था, बाद में रांची एक्सप्रेस ने गलती सुधारकर छापना शुरु कर दिया। ऐसे हैं आप। पर हम भी, आप से कम नहीं - खातिरदारी में। आप एक मौका तो दें, पर क्या करें, जब भी आप आयेंगे, कश्मीर का राग अलापेंगे, हिंदुओं को काफिर और पता नहीं क्या क्या कहकर संबोधित करेंगे, ऐसे में, हम आपकी खातिरदारी कैसे करें। कुछ तो आपके यहां से इस प्रकार आते हैं कि एक जनाब मुबंई के जेलों में बंद हैं, वो नाम आपने सुना ही होगा -- कसाब का।
चलिए, बहुत कुछ हुआ, थोड़ा आप गिले शिकवे दूर करें, थोड़ा हम गिले शिकवे दूर करें, चलिये भाईयों की तरह नहीं तो कम से कम एक अच्छे पड़ोसी की तरह तो रहे, ताकि दुनिया कह सकें कि ये पाकिस्तान हैं और ये भारत, दोनों में कितना प्यार हैं, पर क्या करें, वो दिन आ पायेगा भी नहीं, इसका हमें बेसब्री से इंतजार रहेगा।