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Sunday, October 23, 2016

प्रभात खबर के लिए बाबू लाल हीरो और रघुवर खलनायक........

रांची से प्रकाशित अखबार प्रभात खबर ने आज बाबू लाल मरांडी को हीरो और रघुवर को विलेन बनाकर जनता के सामने पेश किया है। इसका मूल कारण प्रभात खबर के प्रधान संपादक रह चुके हरिवंश है, जो फिलहाल जनता दल यू से राज्यसभा सांसद है, हालांकि कहनेवाले ये भी कहते है कि हरिवंश प्रभात खबर छोड़ चुके है, पर हमारे पास पुख्ता प्रमाण है कि वे प्रभात खबर छोड़े नहीं है, आज भी वे प्रभात खबर को कस कर पकड़े हुए है। चूंकि नीतीश कुमार ने झारखण्ड मामले में अपनी नीति स्पष्ट कर दी है कि बाबू लाल मरांडी झारखण्ड के नायक है, वे ही उनकी ओर से झारखण्ड के मुख्यमंत्री उम्मीदवार है। तभी से हरिवंश ने उनकी राह आसान बनाने के लिए कमर कस ली है और जब भी मौका मिलता है, वे बाबू लाल के प्रति वफादार बन कर पत्रकारिता को अपने इशारों पर नचा रहे है। जैसे कल ही की बात को ले लीजिये। रांची में कल आदिवासी आक्रोश रैली थी। इस रैली में 42 आदिवासी संगठनों के लोग थे, पर प्रभात खबर ने इस पूरे प्रकरण का हीरो बाबू लाल मरांडी को बना दिया, जबकि उस रैली में कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू, गीताश्री उरांव, झामुमो के पौलुस सुरीन और अन्य नेता भी मंच पर मौजूद थे। यहीं नहीं अपने अखबार में प्रथम पृष्ठ पर इस प्रकार की हेडिंग दे दी कि अगर सामान्य व्यक्ति उस समाचार को पढ़े तो पता लग जायेगा कि यहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास सचमुच में खलनायक है, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।
प्रभात खबर के अनुसार, कल की रैली को रोकने के लिए राज्य सरकार ने कमर कस लिया था, और इसी क्रम में खूंटी में फायरिंग हुई और एक व्यक्ति की मौत हो गयी, जबकि सच्चाई कुछ और ही है। इस सच्चाई को जानने के लिए आपको दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आजाद सिपाही, राष्ट्रीय सागर तथा अन्य अखबारों का रूख करना पड़ेगा।
दैनिक भास्कर ने अपने प्रथम पृष्ठ पर फोटो देते हुए हेडलाइन्स दिया – रांची में रैली, खूंटी में नाकेबंदी से आक्रोश। एएसपी-थानेदार को ढाई घंटे रस्से से बांधकर पीटा, फिर पुलिस फायरिंग में किसान की मौत, लेकिन प्रभात खबर ने इसी घटना को पृष्ठ संख्या 11 पर लिखा – खूंटी में प्रशासन ने एक हजार ग्रामीणों को रोका और पुलिस के साथ होनेवाली हादसे और सेंदरे की बात अपनी ओर से छुपा ली, साथ ही इस घटना को सामान्य दिखाते हुए पुलिस के मुख से लिखवाया, जैसे लगता है कि वहां कोई ऐसी घटना घटी ही नहीं। जबकि सच्चाई यह है कि अगर पुलिस आत्मरक्षार्थ गोली नहीं चलाती तो आज कितने पुलिसकर्मियों के घरों में लाशों के ढेर नजर आते क्योंकि इस रैली में नक्सलियों ने अपनी भूमिका तय कर रखी थी। इस घटना को दैनिक जागरण ने प्रथम पृष्ठ पर हेडिंग्स देते हुए लिखा – खूंटी में उग्र भीड़ पर फायरिंग, एक मरा, पुलिस ने आत्मरक्षार्थ चलाई गोलियां, 8 ग्रामीण घायल और इस हेडिंग्स के माध्यम से दैनिक जागरण ने पत्रकारिता धर्म की रक्षा की, साथ ही आक्रोश रैली को भी प्रमुखता से उठाया, जो उठाना भी चाहिए।
चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने तो परसो से ही ताल ठोक दिया था कि उसे आदिवासी आक्रोश रैली को बेहतर ढंग से पेश करना है और रघुवर दास की सरकार को कील ठोकना है, तो उसने अपने उक्त निर्णयों पर आगे बढ़ते हुए, आज भी वहीं किया। इसलिए हिन्दुस्तान अखबार पर क्या कहना।
अब अपनी बात – ये जो अखबार वाले है न। कोई धर्म या समाज हित में पत्रकारिता के लिए अपना दुकान नहीं खोले है। प्रभात खबर का मालिक प्रभात खबर की आड़ में कहा-कहां माइन्स चला रहा है, क्या किसी को नहीं मालूम। हिन्दुस्तान अखबार के लोग अर्जुन मुंडा के शासन काल में कहा पर गोल्डमाइन्स लिये थे। हमको नहीं मालूम है क्या? यानी ये अखबार वाले अपना धंधा चलाने के लिए आदिवासियों की जमीन लूटे तो सही और दूसरा कोई लूटे तो गलत। अरे गलत है तो सब गलत है, एक गलत और दूसरा सहीं...और दूसरा गलत तो पहला सही कैसे भाई। सच्चाई यह है कि यहां झारखण्ड का हर नेता और हर पत्रकार अपने – अपने ढंग से राज्य की जनता को बरगला रहा है, और भोली-भाली जनता इनके बहकावे में आ रही है। नेताओं और पत्रकारों को तो कुछ नहीं होता, पर जनता हर प्रकार से मारी जाती है। अखबार के मालिकों और संपादकों को क्या है? वे तो पेड न्यूज की आड़ में अपनी गोटी सेंक चुके होते है और उनके प्यादे यानी रिपोर्टर्स उनके इशारे पर वो न्यूज बनाते है, जो उनके आकाओं को पसंद आती है। आज का अखबार देखने से तो यहीं लगता है।
... और अब एक सलाह राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास को, आप कृपा कर किसी भी अखबार के कार्यक्रम में जाये, तो प्लीज ये न कहें कि पत्रकारिता हो तो फंलाने अखबार जैसी। हमारे पास प्रमाण है एक अखबार बार-बार आपका वक्तव्य छापता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने प्रभात खबर की प्रशंसा की। हमें हंसी आती है, जो अखबार हमारे परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के परिवार के साथ धोखा करता है। अमर शहीद की मिट्टी पर राजनीति करता है, उसे आप कैसे कह सकते है कि बहुत ही अच्छा है। प्लीज माफ करें। झारखण्ड की जनता के साथ इँसाफ करें। ये अखबारवाले किसी के नहीं है, न तो देश के और न ही देश के जवानों के। ये तो वीर जवानों के शहीदों का भी व्यवसायीकरण कर देते है। शर्मनाक...

Saturday, September 17, 2016

कौन है पंकज पाठक.................

कौन है पंकज पाठक?
जानिये पंकज पाठक को। पंकज पाठक को 14 दिनों के लिए जेल भेज दिया गया है। उस पर आरोप है कि उसने अडानी पावर लिमिटेड के गोपनीय दस्तावेज बेचे है। किसको बेचे है, किसलिये बेचे है, अब तक पुलिस पता नहीं लगा पाई है। आज के विभिन्न अखबारों को देखने से पता चलता है कि वह रह – रह कर अपना बयान बदल रहा है। हिन्दुस्तान अखबार के अनुसार, उसके बयान है कि अगर वह मुंह खोलेगा तो कई बड़े लोग फंसेंगे। कौन लोग फंसेंगे जाहिर है, जिसका वह नाम लेगा, पर वह जिसका नाम लेगा, वे फंस ही जायेंगे, इस बात में दम नहीं है, क्योंकि जिन्हें उसके नाम लेने से फंसने का डर है, वे जरूर अब तक अपनी सुरक्षा के बड़े-बड़े बांध बना लिये होंगे। फिर भी हमारा पंकज से आग्रह होगा कि वह सत्य के साथ रहे और सत्य का अनुसरण करते हुए, अपनी बात बिना किसी भय के कानून के समक्ष रखे, क्योंकि सत्य में ही सिर्फ ताकत होती है। सत्य ही उसे बचायेगा, बाकी असत्य की क्या भूमिका होती है, वह सब को पता है।
पंकज को मैं अच्छी तरह जानता हूं, अनेक बार उससे मिला हूं। फेसबुक पर भी बाते होती रही है, कई बार फोन पर बात किया हूं। जब वह प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश का पीए हुआ करता था, तब तो ज्यादा ही बाते हुआ करती थी। उसके आलेख बराबर प्रभात खबर के संपादकीय पृष्ठ पर दीख जाया करते थे। एक दो आलेख तो दैनिक जागरण में भी उसके छपे है, वे भी राष्ट्रीय स्तर पर। फेसबुक पर उसके धारदार पोस्ट तो प्रभात खबर में काम करनेवाले संपादकों से लेकर नीचे के कर्मचारियों तक को कमेंट्स करने पर मजबूर कर देते थे, चाहे वे विजय पाठक हो या अभी दूसरे जगहों पर कार्य कर रहे स्वयं प्रकाश, इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उस बच्चे में प्रतिभा है और प्रतिभा के बल पर कई वर्षों तक उसने प्रभात खबर को अपनी सेवा दी।
आखिर प्रभात खबर में शीर्ष पर रहनेवाला पंकज अडानी पावर लिमिटेड में जाते ही अपराध कैसे कर बैठा? ये सवाल रहस्यमय बना हुआ है और इस रहस्य को सुलझाना झारखण्ड पुलिस के लिए बहुत ही जरूरी है, ऐसे तो ये सवाल से पर्दा उसी समय उठ गया, जब पंकज ने यह बयान दिया कि “मुंह खोलूंगा तो फंसेंगे कई बड़े लोग”। भाई पंकज, मुंह खोल ही दो, किसके लिए धर्मसंकट में फंसे हो। उपनिषद कहता है – धर्मों रक्षति रक्षितः।
हां, एक बात के लिए प्रभात खबर को जरुर दाद दूंगा कि उसने तुम्हारी फोटो अभी तक अपने अखबार में इस प्रकरण में नहीं छापी, शायद वह इस बात को आज भी आत्मसात किये हुए है कि तुम वहां कभी काम किये थे, चलो प्रभात खबर ने इतना तो अपना धर्म निभाया, नहीं तो वो कितना धर्म निभाता है, मैं जानता हूं। हमें तो लगता है कि कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ है, जिससे पर्दा उठना चाहिए और ये पर्दा तुम्हीं उठाओगे। ईश्वर सदैव तुम्हारे साथ है, सत्य का साथ कभी मत छोड़ना।

Friday, August 5, 2016

ले लोट्टा...................

ले लोट्टा, इ त नीतीशवा के दारू कानून के हव्वे निकल गइल भइया...
अरे जादा दिन के बात नइखे, बिहार विधानमंडल में हमार बबुआ नीतीश दारू कानून पेश कइले...
उनकर बुतरूवन बिधयकवन सब खूब दांत निपोरत रहे...
उनकर लटकन पत्तरकार लोग तो झूम झूम के नीतीशायन गावत रहे...
ताड़ी पिये के रिकार्ड तोड़ले लालू भगवान तो नीतीशवा के अपन भक्त बना दिहले,
और कहिले कि कोई यादव और कुरमी भाई अब दारू ना पीहे...
और जो दारू पीहे, तो जइहे काम से...
लेकिन इ का होयल भइया
न दारू कानून पास होते देरी
आउर न उ कानून में छेद होते देरी...
आजे एगो अखबार पटना डेडलाइन से समाचार छपले बा...
समाचार के शीर्षक बा...
पकड़े गये व्यापारियों के ब्लड सैंपल में अल्कोहल नहीं मिला...
इ समाचार में लिखल बा कि
बिहार में शराबबंदी के बाद पटना पुलिस ने होटल पनास से सात व्यापारियों को शराब पीने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा था। फांरेसिक साइंस लेबोरेट्री ने सभी व्यापारियों को क्लीन चीट दे दी।
वाह रे भाई, वाह...
एकरा कहल जाला, कानून तू केतनो बना ल, चलइहे धरती लोक के प्राणिये न...

आउर इ धरतीलोक के प्राणी केतना महान, केतना चरित्रवान होखेला
उ तो लालू भगवान और उनकर बड़ भगत बबुआ नीतीश से ज्यादा कौन जनिहे...
अरे जो दल बदल में माहिर ह,
अरे जो पशु चारा खाए में माहिर ह
और जो काल्हे पशु चारा खाएवाला घोटालेबाज कह कह के, अपना चेहरा चमकवले
और फिर जाके बाद में, ओकरे गोदी में बैठके
आपन दाढ़ी टोवे लगले
उ केतनो कानून बना दी
ओकरा से का होई
हाल ही में एगो केजरिया, खूब ईमानदारी के ढोल पीटले
और आज ओकर सारा ईमानदारी, एक-एक कर काठ के कड़ाही जइसन भो - काटा हो जाता
तो समझ जाइ, कि नीतीशवा के इ दारू कानून के का होई
आज ओकर पहला अध्याय, सामने दिखाई पड़ गइल...
मजा ली बबुआ नीतीश के दारू कानून के...
बबुआ नीतीश के कोई नजर ना लगावे भाई
बड़ काम के हमर बबुआ नीतीश बाड़े...

Tuesday, May 10, 2016

प्रभात खबर की लीला, प्रभात खबर ही जाने...

7 मई 2016
प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश के प्यारे, अनुज का डॉ. के. के. सिन्हा पर केन्द्रित दो पृष्ठों का आलेख छपा है। इन दो पृष्ठों में डॉ. के के सिन्हा की जमकर आरती उतारी गयी है। उन्हें इस प्रकार से पेश किया गया है, जैसे वे साक्षात् मुक्तिदाता – मोक्षदाता हो। जिनके दर्शन मात्र से सारे रोग भाग खड़े होते है। आलेख की शुरूआत होती है – जब नहीं दिखती कहीं कोई उम्मीद, तब याद आते है डॉ. के के सिन्हा। इस आलेख में क्या खास है, सर्वप्रथम उसे जानिये –
1. डॉ. के के सिन्हा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को ठीकठाक बताया है, पर झारखण्ड के अन्य 90 प्रतिशत राजनीतिज्ञों को बेवकूफ बताया है।
2. जो लोग डाक्टर को भगवान का दूसरा रूप मानते है, उन्हें डॉ. के के सिन्हा अनपढ़ और बेवकूफ बताता है। वह उन हिन्दुस्तानियों को भी बेवकूफ मानता है, जो पूजा करते है। उसके अनुसार इन हिन्दुस्तानियों के पास दूसरा कोई चारा नहीं है, साधन भी नहीं है, इसलिए वे भगवान के आगे हाथ जोड़ते है, लेकिन वह भगवान को नहीं मानता, इसलिए उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
3. डॉ. के के सिन्हा अपने बयान में भारतीयों को यह भी कहा है कि भारतीय भिखारियों की तरह खाना खाते हैं।
4. वह यह भी कहता है कि जवाहर लाल नेहरू में कुछ कमियां थी, हिन्दुस्तान का बंटवारा नहीं होता, अगर नेहरू प्रधानमंत्री बनने की इच्छा नहीं रखते। वह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दूबे और जगन्नाथ मिश्र के खिलाफ भी अनाप-शनाप बयान दिया है।
और अब अपनी बात...
आम तौर पर इस प्रकार के आलेख तभी छपते है, जब कोई विशेष दिन हो या कोई विशेष क्षण...
आखिर इस प्रकार के किसी व्यक्ति विशेष को महिमामंडित करने के आलेख छापने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी? कुछ न कुछ तो बात जरुर होगी, क्योंकि बिना आवश्यकता के तो प्रभात खबर कुछ छापता ही नहीं और ऐसे भी 7 मई को कोई डाक्टर दिवस या मरीज दिवस तो था ही नहीं, फिर इसकी जरुरत क्यों पड़ गयी? हो सकता है कि प्रभात खबर के किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को के के सिन्हा से दिखाने की जरूरत पड़ गयी हो या हो सकता है कि प्रभात खबर ये देख रहा हो कि के के सिन्हा नामी गिरामी डाक्टर हैं, उनसे ऐसा संबंध बनाया जाय कि आराम से एक फोन घुमाने पर ही उनका नंबर मिल जाये, जैसा कि अनुज ने महिमामंडित करने में लिखा है कि इनका नंबर मिलने में 6-6 महीने लग जाते है।
हो सकता है कि के के सिन्हा के मन में ये बात उठी हो कि भाई अशोक भगत और सिमोन उरांव जैसे लोग पद्मश्री ले रहे है तो भाई हमारे में क्या कमी है?, हमे भी मिल जाये। इसलिए उसने सोची समझी रणनीति के तहत राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री की झूठी तारीफ और बाकी को बेवकूफ बता दिया हो या और कुछ न कुछ अंदर खिचड़ी जरूर पक रहा हो, जहां तक मेरा ध्यान नहीं गया हो...
अब कुछ सवाल प्रभात खबर से...
आप इस प्रकार के आलेख लिखकर क्या साबित करना चाहते हो?
क्या आप बता सकते हो...
कि जनाब के फीस कितने है?
और जितने का वो इलाज करते है, कभी ईमानदारी से उसका आयकर भी चुकाया हैं, हमारे पास तो इतने लोग आये है, इनके पास से इलाज कराकर, कि उनके पैड पर केवल उनके दवा के नाम होते है, पर निबंधन संख्या होता ही नहीं, आखिर बिना निबंधन वाले पैसे कहा जाते है।
इसी रांची में डॉ. एस पी मुखर्जी है, जिनकी फीस मात्र 5 रुपये है, और वहां डॉ. के के सिन्हा से ज्यादा मरीज दर्द लेकर आते है और मुस्कुराते हुए जाते है...
इसी रांची में डॉ. पी आर प्रसाद हुए, जो आज दुनिया में नहीं है, उनकी फीस मात्र 100 रुपये थी और उनके यहां इलाज कराकर बहुत सारे लोग खुश थे। उनके निधन पर बहुत लोगों को दर्द हुआ था, शायद आपको नहीं मालूम...आप जिस प्रकार से इस व्यक्ति को पेश किया उसे हम पत्रकारिता नहीं कहते, क्या कहते है, वो आप खुद ही जान लो...
और ये भी जान लो कि हमारे देश में तो जिसका चल जाता है, तो चल जाता है...
जैसे एक लोकोक्ति है, जो बिहार में खूब चलता है,
वो क्या कहते है...
नामी ..... का, ....बिकाता है
अंततः
हे भगवान, ऐसे कभी डाक्टर मत देना, जिसकी फीस दो हजार हो...
हे भगवान, ऐसे कभी डाक्टर मत बनाना, जो स्वयं को महान और दूसरे को, खासकर सामान्य जन को जाहिल समझता हो...
क्योंकि जो दूसरे को जाहिल समझेगा, वह उसके साथ क्या सलूक करेगा...
आपसे बेहतर कौन जान सकता है...

Sunday, February 21, 2016

एनडीटीवी ने अपना नकाब उतारा.........

भारतीय संस्कृति में एक वाक्य बार-बार सुनने को मिलता है...
जो होता है, अच्छे के लिए होता है...
जेएनयू की घटना ने भी बहुत सारे लोगों के चेहरे पर से नकाब उठा दिया है...
नकाब उठने के बाद, क्या होता है...आप सभी जानते है , फिर सामने वाले से शर्म और हया सब खत्म...
एनडीटीवी ने स्पष्ट कर दिया कि वह विशुद्ध रुप से वामपंथी है...न तो उसे कांग्रेस से मतलब है और न ही भाजपा या उसके अन्य आनुषांगिक संगठन से...
उसने यह भी दावा ठोक दिया कि जो वामपंथ से टकरायेगा तो फिर एनडीटीवी भी उसे नहीं छोड़ पायेगा...
ऐसे तो सारा बुद्धिजीवी वर्ग जानता था कि ये चैनल वामपंथी चैनल है, पर सामान्य जनता नहीं जानती थी, आज सामान्य जनता जान गयी है...
वो अगर सारे चैनलों की सूची बनायी है कि कौन चैनल किस पार्टी का भोंपू है,तो एनडीटीवी के लिए भी उसने सूची दर्ज कर ली कि ये विशुद्ध वामपंथी चैनल है...
इसका भी मकसद कश्मीर को पाकिस्तान के हाथों सौंप देना, अमरीका को साम्राज्यवादी बताना और चीन को अपना दोस्त बताना, हिन्दूओं को गाली देने का तो उसकी पुरानी आदत है, जरा देखिये एनडीटीवी के संपादक ने क्या शिगुफा छोड़ा है, जिस शिगुफे को आजकल वामपंथी नेता छाती से लगाकर फेसबुक पर शेयर किये जा रहे है...वो है...
एनडीटीवी इंडिया के संपादक ऑनिंद्यो चक्रवर्ती के मुताबिक यह जेएनयू बनाम जनेऊ की लड़ाई है...ये महापंडित ऑनिंद्यो चक्रवर्ती, तोगड़िया टाइप भाषण तो लिख दिया पर उसे पता हैं कि गांव में रहनेवाले उन लाखों गरीबों पर क्या गुजरेगी...जब उसके इस भाषण टाइप का इस्तेमाल करना वामपंथी गुंडे शुरु कर देंगे...
जैसा कि केरल के कन्नूर जिले में हुआ वामपंथी गुंडों ने सुजीत की हत्या उसके माता-पिता के सामने ही निर्ममता से कर दी...
ऐसे हम आपको बता दें कि एनडीटीवी के भी कई संवाददाता और कैमरामैन कोई दुध के धुले नहीं, बल्कि ये भी एक नंबर के बदमाश है...और इसकी जानकारी प्राप्त करनी हो तो हमसे संपर्क करें...हम आपको प्रमाण के साथ बतायेंगे...

Saturday, January 16, 2016

प्रभात खबर की हालत पस्त, बलमदीना का अभुतपूर्व स्वागत अर्थात् अलबर्ट एक्का को हृदय से सम्मान...

आज रांची से प्रकाशित होनेवाले प्रभात खबर को छोड़कर सभी अखबारों ने हृदय को आह्लादित व भावविभोर कर देनेवाली खबर, प्रथम पृष्ठ पर छापी है। खबर है – 44 साल बाद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना, वीर शहीद की मिट्टी ला रही है। रांची के कई सामाजिक संगठनों ने उक्त मिट्टी का तहेदिल से स्वागत करने का फैसला ही नहीं लिया, बल्कि स्वागत करने के लिए निकल पड़े है, भारतीय सेना का तो जवाब ही नहीं, त्रिपुरा में जिस प्रकार से भारतीय सेना ने बलमदीना और उनके साथ गयी टीम का स्वागत किया। वह अदभुत है। बलमदीना का तो त्रिपुरा के मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने जिस प्रकार से स्वागत किया। उस स्वागत के संस्मरण से आज प्रभात खबर को छोड़कर सारे अखबार पटे हुए है, पर प्रभात खबर में इस खबर को वो तवज्जो नहीं मिली है। शायद प्रभात खबर को लगता है कि यह खबर उनके लिए उतनी कोई मायने नहीं रखती। मायने रखेंगी भी कैसे?, क्योंकि उसे लगता है कि गर ये खबर छापेंगे तो उसकी पोल खुल जायेंगी, जबकि सच्चाई ये है कि प्रभात खबर ये खबर छापे या न छापे, उसकी पोल व कलई एक तरह से झारखण्ड की समस्त जनता के सामने खुल गयी है कि वो कैसा अखबार है?
हम आपको बता दें कि जिस प्रकार का घमंड आज प्रभात खबर ने पाल रखा है, ठीक इसी प्रकार का घमंड कभी बिहार से प्रकाशित होनेवाली अखबार आर्यावर्त को भी था, पर आज आर्यावर्त कहां चला गया, सभी को पता है। हम आज दावे के साथ कह सकते है कि जिस प्रकार आर्यावर्त अखबार का सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया, ठीक इसी प्रकार प्रभात खबर का भी सूर्य अब सदा के लिए अस्त होने चला है...
हम इस अवसर पर दैनिक भास्कर अखबार का तहेदिल से स्वागत करना चाहेंगे, जिसने शुरुआत से ही प्रभात खबर की झूठी खबर और उसकी ढोंग का वो आपरेशन किया, जिस आपरेशन से प्रभात खबर की बची-खुची सम्मान भी समाप्त हो गयी। प्रभात खबर ने परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के नाम पर 3 दिसम्बर 2015 को किस प्रकार का ढोंग व पाखंड किया। उस ढोंग व पाखंड को मैंने भी उजागर किया था। इसे आप मेरे ही फेसबुक पर या www.vidrohi24.blogspot.in पर पढ़ या देख सकते है। अब तो एक तरह से स्पष्ट हो गया कि प्रभात खबर ने अमर शहीद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के नाम पर किस प्रकार झारखण्ड के लोगों का भावनात्मक शोषण किया और अमर शहीद का अपमान किया। सवाल एक बार फिर क्या प्रभात खबर को उसके इस हरकत के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए? इस सवाल पर मेरा उत्तर होगा – इसकी सजा, उसे ईश्वर देगा, जो उसकी सजा पर निर्णय कब का सुना चुका है।
हम तहेदिल से मुख्यमंत्री रघुवर दास का भी अभिनन्दन करना चाहेंगे, जिन्होंने प्रभात खबर की बातों में न आकर, बिना देर किये, त्वरित निर्णय लिया और अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना की भावनाओं का कद्र करते हुए, एक टीम गठित कर, वो कर दिखाया कि आज दूध का दूध, पानी का पानी हो गया। ऐसे ही मुख्यमंत्री की झारखण्ड को जरुरत है, जो अखबार के इशारों पर न चलकर, स्वविवेकानुसार निर्णय करता है, यहीं नहीं अमर शहीद के परिवारों का सम्मान ही नहीं, बल्कि उसके आदेश को सर माथे लगाता है...
रघुवर दास जी, सचमुच आप प्रशंसा के पात्र है...
आपने वो कार्य कर दिखाया, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती...
आपने एक अखबार के ढोंग व पाखंड को भी उजागर कर दिया...
सही मायनों में आपने झारखण्ड का सम्मान रखा है...
उन वीर पुत्रों की मां, पत्नियां, बेटे- बेटियां आपको जरुर दुआएं देंगी, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व खो दिया...
या देश के लिए आज भी सर्वस्व खोने को तैयार हैं...

Monday, January 4, 2016

वाह रे ढुलू, तेरी तो निकल पड़ी...............

आज रांची से प्रकाशित “प्रभात खबर” ने पृष्ठ संख्या 7 पर “ढुल्लू पर मुकदमा
वापसी के फैसले पर उठे सवाल” नामक शीर्षक से जो आलेख प्रकाशित करते हुए एक विशेष पेज दिया है। उनमें जितने भी सवाल उठाये गये। उन सवालों को मैंने अपने फेसबुक और ब्लॉग के माध्यम से 30 अक्टूबर को ही उठा दिया था, जो आज भी मेरे फेसबुक और ब्लाग www.vidrohi24.blogspot.in पर मौजूद है। मैंने 30 अक्टूबर को लिखा था “कानून को ठेंगा दिखानेवाले विधायक ढुलू महतो को बचाने का प्रयास...
मनमुताबिक मंतव्य लेने के लिए, लोक अभियोजक का तबादला...
प्रभार लेने के पूर्व ही, सरकार के मनमुताबिक रिपोर्ट, धनबाद डीसी को भेजा ए के सिंह-2 ने...”
गर उस आलेख को ध्यान से देखें अथवा पढ़े तो सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा...
चलिये सवाल किसी ने भी उठाया हो, वो सवाल पहले उठाया गया अथवा बाद में...यह महत्वपूर्ण नहीं...
गर सवाल में ताकत है तो उसका जवाब सरकार की ओर से आनी ही चाहिए, क्योंकि सरकार ने कई बार कहा है कि वह भ्रष्टाचार मुक्त झारखंड बनाना चाहती है...
अब सरकार ही बताये...
कि जो व्यक्ति अथवा विधायक
1. पुलिस की वर्दी फाड़ दे...
2. संभ्रांत नागरिकों को चोर – चुहाड़ बोले...
3. जिसके भय से डीएसपी कांपने लगे...
4. जिसके भय से बीसीसीएल के वरीय अधिकारी इस्तीफा देने की पेशकश करें...
5. जो स्थानीय पुलिस के समानान्तर एक टाइगर सेना बना लें...
6. जो अपने विरोधियों को भगवान के पास भेजने का बयान जारी करें...
और ऐसे लोगों को सरकार बचाने का प्रयास ही नहीं, बल्कि उसे बचा लें तो क्या ऐसे में झारखंड भ्रष्टाचार मुक्त बनेगा...

Tuesday, December 29, 2015

यहां तो हर जगह विभीषण ही दिखता है भाई...

जब से रघुवर दास झारखंड के मुख्यमंत्री क्या बने ? भाजपा के वरिष्ठ नेता, स्वयं को भाजपा के थिंक टैंक कहनेवाले, नीतीश भक्त सरयू राय की नींद ही गायब है। कोई ऐसा समय ये नहीं चूकते, जिसमें वे रघुवर सरकार को कटघरे में न रखते हो। अब लीजिये कल की ही बात है। मुख्यमंत्री रघुवर दास अपने आवास में अपना वार्षिक प्रगति रिपोर्ट पेश कर रहे थे और राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय जमशेदपुर में सिसक रहे थे, वे बता रहे थे कि राज्य में अभी तक कुछ नहीं हुआ, ये इस प्रकार बोल रहे थे, जैसे लगता हो कि अगर ये मुख्यमंत्री होते तो राज्य में निश्चय ही राम राज्य आ चुका होता...
भाई मुख्यमंत्री बनने का सपना देखना, कोई गलत बात नहीं, देखना चाहिए...। पर इससे भी अच्छा रहता कि जो आपको काम मिला, उसमें आप कार्य कर सिद्ध करते कि आप सबसे बीस हैं, उन्नीस नहीं। यहां तो काम न धाम और चले बाबाधाम वाली कहावत सिद्ध हो रही है। सरयू राय दिन प्रतिदिन इस बात को लेकर घूलते जा रहे है कि भाई छतीसगढ़ का आदमी झारखंड का मुख्यमंत्री और बिहार से आनेवाले तीव्रबुद्धि का आदमी, क्षत्रियकुलभूषण खाद्य आपूर्ति मंत्री, ये तो बड़े ही शर्म की बात है...
सच पूछिये तो कोई भी व्यक्ति तभी बड़ा बनता है, जब उसे कोई जिम्मेवारी दी जाती है और वो जिम्मेवारी को ईमानदारी पूर्वक निर्वहण करता है, यहां तो जिम्मेवारी का निर्वहण तो दूर, बस एक ही काम करना है, सरकार में रहकर सरकार को ही खोदते रहना है...कि ये नहीं किया, वो नहीं किया...और खुद कुछ नहीं करना है...
सच्चाई यह है कि राज्य में एक समय था कि श्रम मंत्री को कोई जानता नहीं था और न ही इस विभाग में दिलचस्पी लेता था, पर आज देखिये झारखंड का श्रम मंत्रालय का तू-ती बोल रहा है। विश्व बैंक ने संपूर्ण भारत में झारखंड के इस श्रम विभाग को पहले स्थान पर रखा है...बधाई दीजिये श्रम मंत्रालय संभाल रहे नवोदित युवा मंत्री राज पालिवार को जिसने वो कर दिखाया, जो कूबत किसी में नहीं थी...पर जरा सरयू राय के विभाग का हाल देखिये...100 प्रतिशत फिसड्डी। गर आज का प्रमुख अखबार पढ़िये तो पता लग जायेगा कि सरयू राय ने जो विभाग संभाला है, उसकी सही स्थिति क्या है?
मेरा मानना है कि आखिर जो गलत कार्य आप कर रहे हैं, जिसके कारण राज्य सरकार की छवि खराब हो रही है, उसकी जिम्मेवारी मुख्यमंत्री या सरकार पर न देकर खुद इसे स्वीकार करते हुए, सरयू राय को मंत्रिमंडल से अलग हो जाना चाहिए और नीतीश की पार्टी में शामिल होते हुए, जदयू को मजबूत करना चाहिए...क्योंकि ऐसे भी जदयू में बहुत सारे पद झारखंड के लिए खाली है। नीतीश ऐसे भी सरयू राय को बहुत मानते है, प्यार करते है, जरुर ही कृपा लूटायेंगे, ठीक उसी प्रकार जैसे क्षत्रियकुलभूषण, प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश पर लूटाया...तो सरयू देर क्यों कर रहे है... हमें समझ में नहीं आ रहा...यही मौका है मुख्यमंत्री बनने के लिए सही निर्णय लेने का।

Tuesday, November 24, 2015

लालू-नीतीश भजन..............

(लालू-नीतीश भजन...
इस भजन को सुबह-शाम गाने से भक्त इस लोक में सुख पाकर, अंत में लालू व नीतीश लोक में चला जाता है, जहां उसे परम् आनन्द की प्राप्ति होती है...इस भजन में उन महान संतों के भी नाम है, जिन्होंने लालू व नीतीश भगवान को अपने हृदय में रखकर इस लोक में सुख पा रहे है और परलोक को भी सुधारने में लगे है...बोलिए प्रेम से इस लोक के महाभगवान सामाजिक न्याय के पुरोधा, भक्त वत्सल लालू नीतीश भगवान की जय...)
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्
यादव भजे
लालू नीतीशम्
कुर्मी भी भजे
लालू नीतीशम्
मुसलमां भजे
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
हरिवंश भजे
लालू नीतीशम्
ज्ञानू भी भजे
लालू नीतीशम्
शैबाल भजे
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
माखनचोरम्
यदृश्म् यदृश्म्
चारा चोरम्
पत्नी भक्तम्
बेटा भक्तम्
बेटी भक्तम्
सजायाफ्ता भये
लालू श्रीमन्नम्
सर्व गुण संपन्न
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्.............
प्रभात खबरम्
हृदयम् राखम्
नीतीश गौरवम्
हरदम गायम्
लालू चरणम्
लोटे हरदम्
प्रभात खबरम्
प्रभात खबरम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
शिवानंद प्रियम्
लालू नीतीशम्
पवनम् प्रियम्
लालू नीतीशम्
मनोज प्रियम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
एक तीर भोकम्
दूजे लालटेन धड़म्
तीजे हाथ साफ
हरदम करतम्
ऐसे है, प्रियम्
महागठबंधनम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
जो ले चलम्
बिहार हरदम्
पृष्ठम् पृष्ठम्
पृष्ठम्, पृष्ठम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्......
जातिवाद बढ़म्
हरदम् हरदम्
यादववाद बढ़म्
हरदम् हरदम्
सबको मार चलम्
धूआधारम्
गाली देत चलम्
धूआधारम्
और बोल चलम्
सामाजिक न्यायम्
लालू नीतीशम्
लालू नीतीशम्