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Tuesday, December 13, 2016

नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार...

जी हां, नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार है। संपादक से लेकर पत्रकारिता जगत में चपरासी तक कार्य करनेवालों का जीना मुहाल हो गया है। अपने आकाओं, राजनीतिज्ञों, आइएएस, आइपीएस, थानेदारों, सरकारी जन वितरण प्रणाली दुकानों से कमीशन लेनेवालों के घर में कमीशन के पैसे नहीं पहुंच रहे है। जिसके कारण इनके चेहरों से लाली समाप्त हो गयी, चूंकि डायरेक्ट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने अखबारों के माध्यम से ये गाली नहीं दे सकते, इसलिए इन्होंने इनडायरेक्ट माध्यम को चूना है। वे अपने विशेष पृष्ठों पर ऐसे-ऐसे लोगों को दिखा रहे है, जिनका इस नोटबंदी से कोई लेना – देना नहीं और न ही उनके कारोबार पर कोई असर ही पड़ रहा है, क्योंकि मैं भी भारत के रांची में ही रहता हूं और कोई टाटा-बिड़ला या अडानी-अंबानी के परिवार का सदस्य नहीं हूं, जैसे सामान्य लोग जीते है, उसी तरह मैं भी जीता हूं। मेन रोड स्थित फुटपाथ की दुकान हो या अपर बाजार की कपड़े की दुकान या पंडितजी से पतरा दिखाना हो, या नाई से बाल ही क्यूं न कटवाना हो, या जूता-पालिस ही क्यूं न कराना हो। एक वाक्य में कहें तो जूता सिलाई से लेकर चंडी पाठ तक इसी मेन रोड में होता है, कहीं हाहाकार नहीं हैं, लेकिन कुछ लोगों यानी पत्रकारों को पेट में भयंकर दर्द हो रहा है कि भाई नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी करके उनके पेट पर लात मारा है, क्योंकि कमीशन बंद हो चुकी है, जो इन्हें कमीशन देते थे, रुपयों में, जब उनकी सिट्ठी-पिट्ठी गुम हो गयी है, तो बेचारे को प्रतिदिन का पांच सौ और एक हजरियां कौन देगा...
जब इनके विशेष पृष्ठों से नरेन्द्र मोदी को गरियाने का काम समाप्त हो जाता है, तो वे फेसबुक का सहारा लेते हैं, और जी-भरकर नरेन्द्र मोदी को गरियाते है, तरह-तरह के नरेन्द्र पाठ करते है। एक सज्जन जो एनजीओ भी चलाते है, कभी संपादक भी रहा करते थे, वे नरेन्द्र मोदी को गरियाते – गरियाते अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी सुनाने लगते है। एक तो अखबार नहीं आंदोलन – पंचायती वाले बाबा दांत निपोरते हुए फोटो प्रोफाइल रखे हुए है, वे तो सुबह उठते और रात में सोने के पहले जब तक फेसबुक पर नरेन्द्र मोदी को गरिया नहीं ले, उनका खाना ही नहीं पचता। इसी अखबार में युवा पत्रकारों की भी टोली है, जो नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी अभियान को समर्थन करनेवालों को भक्त कहकर गरियाते है, जबकि वे स्वयं चिरकुटानंद के सहोदर भाई है।
हम भी अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अनुरोध करेंगे कि इन कमीशन खानेवाले पत्रकारों और उन्हें गरियानेवाले इन पत्रकाररूपी बहुरूपियों पर वे थोड़ी कृपा करें, ताकि उनका कमीशन का धंधा बेरोकटोक चलता रहे, लेकिन फिर बात यहीं आती है कि नरेन्द्र मोदी रहे धाकड़ बैट्समैन हमें नहीं लगता कि उन्होंने जो नोटबंदी का शतक बनाने का जो बीड़ा उठाया है, उससे वे पीछे हटेंगे।
इसलिए कमीशन खानेवाले पत्रकारों और एनजीओ चलानेवाले महानुभावों से सादर अनुरोध है कि वे फिलहाल बाजार और आम जनता की ऐसी छवि प्रस्तुत न करें, बल्कि अपना चेहरा जो कमीशन के नहीं मिलने कारण बर्बाद होता दीख रहा है, उसे दिखाने की कोशिश करें, ताकि लोगों को पता चलें कि इस कमीशन के धंधे में कितने संपादक और कितने पत्रकार अब तक मालामाल हो गये...

Friday, December 2, 2016

पत्रकारिता की आड़ में इज्जत लूटना गर सीखना हो, तो कोई इनसे सीखें..........

आजकल हमारे समाज में, ये फैशन और प्रचलन हो गया है कि...
अगर कोई पुलिस है, तो उसे गुंडा मान लिया जाता है...
ये मान लिया जाता है कि वो गलती करें या न करें पर उसकी गलती जरूर होगी...
अगर पत्रकारों को पुलिस से संबंधित एक मामूली सी भी गलती मिल गयी तो लीजिये, ये देखिये उस खबर को कैसे मसालेदार बनाकर अखबारों में स्थान देते है...
पर यह भी ध्यान रखे...
ये आइपीएस अथवा वरीय पुलिसकर्मियों जिनकी धाक कुछ ज्यादा ही चलती है, जो रोबीले है, उनके खिलाफ लिखने या छापने में सबकी नानी और दादी एक साथ याद आती है, पर एक सामान्य पुलिसकर्मी, जिसकी गलती नहीं भी हो तो उससे संबंधित खबर को उसके खिलाफ कैसे समाचार पत्रों में स्थान मिलती है? उसकी एक बानगी है कल रांची के डोरंडा के एजी मोड़ पर घटी घटना, जिसको रांची से प्रकाशित सभी प्रमुख अखबारों ने प्रथम पृष्ठ और अंदर की पृष्ठों में स्थान देकर राई का पहाड़ बना दिया और एएसआई दिनेश ठाकुर की इज्जत का कबाड़ा बना दिया।
घटना क्या है?
तो घटना भी जान लीजिये...
रांची के एजी मोड़ पर तैनात ट्रैफिक एएसआई दिनेश ठाकुर ने बिना हेलमेट पहने वासुदेव को पकड़ा और 100 रुपये का चालान काटा। फिर क्या था? वासुदेव घर गया, अपनी पत्नी पम्मी को इस बात की जानकारी दी, पम्मी अपने साथ 30-40 लोगों का हुजूम लेकर आयी और चप्पल से एएसआई दिनेश ठाकुर की पिटाई कर दी। आश्चर्य इस बात कि भी वहां एएसआई अनिल कुमार टोप्पो, हवलदार अशोक राणा और आरक्षी उमेश उरांव मौजूद है, किसी ने भी एएसआई दिनेश ठाकुर के सम्मान की रक्षा करने की कोशिश नहीं की, बल्कि इस घटना को वहां खड़ा होकर देखते रहे...
यहीं घटना आज रांची के कई अखबारों की सुर्खियां बन गयी...खूब तेल-मसाला लगाकर सभी अखबारों ने इस समाचार को प्रमुखता से छापा है और एएसआई दिनेश ठाकुर की इज्जत की धज्जियां उड़ा दी...
और अब इसी प्रकार का सवाल प्रभात खबर, हिन्दुस्तान और दैनिक भास्कर अखबारों से कल इसी प्रकार की घटना, उन्हीं के यहां काम करनेवाले पत्रकारों के साथ घट जाये तो क्या इसी प्रकार से वे समाचार छापेंगे...
दूसरी बात...
क्या ये सत्य नहीं कि आज भी इन अखबारों में काम करनेवाले ज्यादातर लोग कानून की धज्जियां उड़ाकर, वह भी दादागिरी के साथ बिना हेलमेट के दुपहिये वाहन चलाते है और पुलिस इनकी इस दादागिरी को नजरंदाज कर देती है, नहीं तो इनके ज्यादातर पत्रकारों के दुपहिये वाहन पुलिस थाना की शोभा बढ़ा रहे होते...
तीसरी बात...
एएसआई दिनेश ठाकुर कि सिर्फ यहीं गलती है न, कि उसने बिना हेलमेट के वाहन चला रहे वासुदेव की चालान काट दी, क्या चालान काटना अपराध है?
जब वह वासुदेव का चालान काटा था, तब उसकी पत्नी तो वहां नहीं थी, वासुदेव का घर जाकर पत्नी और अपने 30-40 लोगों को बुलाकर घटनास्थल पर लाना, ये क्या बताता है?
खुद को अखबार नहीं आंदोलन बतानेवाला अखबार प्रभात खबर तो एएसआई दिनेश ठाकुर की इज्जत लूटने में सभी अखबारों से आगे निकल गया, उसने तो दिनेश ठाकुर पर छेड़खानी करने का आरोप लगा दिया, जबकि किसी अन्य अखबार ने ऐसी बातें नहीं लिखी है...सच्चाई क्या है? ये जांच का विषय है।
कल की घटना और आज अखबारों में छपी समाचार से तो यही पता चलता है कि अब शायद ही कोई पुलिसकर्मी, किसी बिना हेलमेट के वाहन चलानेवाले का चालान काटेगा, क्योंकि फिर कोई बिना हेलमेट के वाहन चलानेवाला, चालान कटने के बाद, अपनी पत्नी के साथ हुजूम लायेगा, और चालान काटनेवाले पुलिसकर्मी को अपनी पत्नी से पिटवायेगा और प्रभात खबर के रिपोर्टर को जो बोलेगा, वो रिपोर्टर छापेगा और लीजिये उक्त पुलिसकर्मी की इज्जत की दही हो गयी...
एक ओर मुख्यमंत्री रघुवर दास राज्य में बिना हेलमेट के दुपहियेवाहन चलाने पर प्रतिबंध लगाना चाह रहे है, वे विशेष अभियान चलाने की बात करते है, और लोगों की जान की हिफाजत करना चाह रहे है, पर यहां के लोग क्या कर रहे है? यहां की मीडिया क्या कर रही है? आपके सामने है...
क्या ऐसे में हेलमेट अभियान सफल हो पायेगा...
क्या मीडिया की जिम्मेवारी नहीं बनती...
क्या बात का बतंगड़ बनाना और किसी की इज्जत से खेलना ही पत्रकारिता है...
गर ऐसा है तो मीडिया स्वयं अपनी इज्जत का दही क्यों नहीं बनाती? क्योंकि सर्वाधिक ट्रेफिक कानून की धज्जियां तो ये मीडियावाले ही उड़ाते है...
पता नहीं, यहां के पुलिसकर्मियों को ये दिव्य ज्ञान कब आयेगा?
मैं तो कहता हूं कि जिस दिन राज्य के पुलिसकर्मी मीडियाकर्मियों की सुध लेना शुरु कर दें, उस दिन से किसी की हिम्मत नहीं कि कोई मीडिया हाउस ये कनीय पुलिसकर्मियों की इज्जत से खेल लें...
और एक बात...
ये पत्रकारिता नहीं...
ये सिर्फ और सिर्फ गुंडागर्दी है...

Monday, November 7, 2016

अल कर, बल कर, छठ पर आर्टिकल, लिख चल..........

अल कर,
बल कर,
छठ पर आर्टिकल, लिख चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर, अलबल बोल चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर रिपोर्टिंग कर चल,
टीवी पर अनाप-शनाप बक चल...
पिछले एक सप्ताह से हमारे आंख-कान दोनों पक गये...
अखबारों और टीवी चैनलों तथा गुगुल पुराणों ने छठ महापर्व की धज्जियां उड़ा दी है...
जितने अखबार, उतनी बुद्धि, जितने टीवी उतनी बक-बक
और सभी ने अपने ज्ञान से छठ की ऐसी-तैसी कर दी...
जिनको छठ के बारे में एबीसीडी नहीं मालूम
वे महाज्ञानी और महापंडित बनकर उपदेश देते नजर आये
और
जो छठ के सर्वज्ञानी है, वे अपने कमरों में बंद होकर पागलों जैसा बुदबुदाते नजर आये...
मैं पिछले एक सप्ताह से देख रहा हूं कि अखबारों और टीवी चैनलों में नये- नये चिरकुटानन्दों की फौज ने धमाल मचा रखा है...
बंदरों जैसी हरकते, गधों जैसी सोच रखे, रिपोर्टरों और अखबार व चैनल के संपादकों ने छठव्रतियों और उनके परिवारों का कीमा बना दिया है...
सच पूछिये, अगर जो नये ढंग से छठ से जुड़ना चाहते है, तो उनके लिए इन महाचिरकुटानंदों ने हर प्रकार के कुसंग से छठ का नाता जोड़ दिया है...
जबकि पूर्व में ऐसा नहीं था...
बच्चे अपनी मां और दादी से छठ की आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को जान लेते...
कल की ही बात है...
एक अखबार और उसके बाद चैनल पर हमारी नजर गयी...
जनाब एक सज्जन, छठि मइया को भगवान भास्कर का पत्नी बता दिये...
एक ने बहन बना दिया
और एक ने क्या कह दिया, उसे खुद पता नहीं...
यहीं नहीं
आजकल वामपंथियों की एक नई फौज जो धर्म को अफीम मानती है, वह भी छठ में साम्यवाद ढुंढती नजर आयी, उन वामपंथियों को छठ के ठेकुएं और केले में कैसे साम्यवाद नजर आ गया, हमारी समझ से परे है...
चोरी से, चीटिंग से मैट्रिक, इंटर, बीए, एमए कर किसी तरह से प्रोफेसर और रीडर बने लंपटों का समूह भी छठ पर आर्टिकल लिख रहा था और उसे अखबार वाले इस कदर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे थे, जैसे लग रहा हो, कि वह महाज्ञानी हो...पर जो लोग छठ के बारे में विस्तृत जानकारी रखते है, उन्हें ये पता लगते देर नहीं लगी कि ये ढोंगी प्रोफेसर चोरी से डिग्री लेकर यहां तक पहुंचा है, जो सारी दुनियां को भरमा रहा है, और इसके माध्यम से संपादकों का समूह अपनी उल्लू सीधी कर रहा है...
यहीं हाल सारे चैनलों के रिपोर्टरों का था...
चूंकि छठ के बारे में नॉलेज तो है नहीं तो बस घिसी पिटी सवाल से फिल्मों में काम करनेवाले असरानी, जगदीप, राजेंद्रनाथ और धूमल जैसे हास्य कलाकारों का रोल अदा कर रहे थे और यहीं हाल टीवी के एंकरों का था...
इन सारी हरकतों को देख, हमें ये जानते देर नहीं लगी कि आनेवाला समय महामूर्खों चिरकूटानंदों का है...यानी जो जितना मूर्ख वो उतना ज्ञानी...जितना अल बल लिखो, उतना बड़ा साहित्यकार और पत्रकार...
पर इसके परे,
एक परिवार को भी देखा...
बुढ़ी माता...छठ कर रही थी...
उनके संग, बहुत सारी औरते थीं, जो बुढ़ी माता को सहयोग कर रही थी...
बच्चे बुढ़ी माता को आजी कहकर पुकार रहे थे...
तभी मैं रह नहीं पाया...
पूछ डाला कि आजी आप अखबार पढ़ती है, टीवी देखती है...
आजी ने कहा – ए बचवा, आग लागे अइसन पढ़ाई के

आउर आग लागे अइसन टीवी दिखाई के
अरे जब भावे नइखे, तो पूजा करके का होई...
हमरा कोई सीखवले बा...
अरे हम अपना घर में बुढ़ परनिया के देखनी और सीख गइनी...
इ तो अखबरवन और टीवीवालन सब बर्बाद करके धर देले बारन सब...
हम तो सोचतानी कि अइसने चलत रही...
त आगे चलके
भीड़ त दीखी पर छठि मइया ना दिखाई दीहे...

Tuesday, September 27, 2016

कमाल है........................

रांची में नकली शक्तिवर्द्धक दवा के करोड़ों के कारोबार से संबंधित समाचार आजकल अखबारों में सुर्खियां बटोर रहे है। प्रतिदिन समाचार आ रहे है कि रांची के चुटिया, लालपुर, सुखदेवनगर आदि इलाकों में औषधि नियंत्रण निदेशालय की ओर से इन दवाओं के कारोबार में लिप्त लोगों पर शिकंजा कसा जा रहा है, इनके खिलाफ छापेमारी भी की जा रही है। छापेमारी के दौरान बड़ी मात्रा में औषधि निर्माण के उपकरण, एलोपैथिक दवाएं, इंप्टी हार्ड जेनेटिक कैप्सूल सेल, लिंग वर्द्धक यंत्र, स्तन वर्द्धक यंत्र आदि बरामद हो रहे है। इस धंधे में लिप्त छह लोगों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज करायी गयी है। औषधि निदेशालय इस धंधे में सलिप्त किसी अलख देव सिंह की तलाशी कर रहा है, पर औषधि निदेशालय उन अखबारों पर शिकंजा नहीं कस रहा, जो इस धंधे को संजीवनी दे रहे है, या इससे सीधा मुनाफा उठा रहे है। हाल ही में जब औषधि निदेशालय ने इन कारोबारियों पर जब अपना शिकंजा कसना शुरू किया तो एक दिव्य ज्ञान प्रदान करनेवाले एक अखबार ने लिखा कि इस धंधे में पोस्टआफिस के लोग शामिल है, पर उसने यह नहीं लिखा कि इस धंधे में अखबार के लोग भी शामिल है, जो विज्ञापन के नाम पर इन कारोबारियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाते है और स्वयं भी लाभान्वित होते है, साथ ही सामान्य जनता को दिग्भ्रमित भी करते है।
सच्चाई यह है कि ये सारे के सारे कारोबारी बिना अखबार को अपने तरफ मिलाए इतने बड़े कारोबार को अंजाम नहीं दे सकते। इसमें अखबार की सबसे बड़ी भूमिका होती है, वे इन कारोबारियों द्वारा मिले विज्ञापन को जमकर छापते है, रांची में कमोबेश सभी बड़े अखबार इस धंधे में लिप्त है और इसके द्वारा अपनी आर्थिक समृद्धि में लगे है। आज भी देख लीजिये – कौन ऐसा अखबार है जो इस धंधे में लिप्त नहीं है। एक अखबार तो अपना वर्गीकृत इसी धंधे को समर्पित कर दिया है। अगर उसके वर्गीकृत विज्ञापन को देखिये तो पता लग जायेगा कि इस धंधे में उसका जोर भी नहीं है, पर बेशर्मी इतनी कि उसे बेशर्म शब्द की परिभाषा से कोई लेना – देना भी नहीं।
आश्चर्य है कि इस धंधे में कौन-कौन लोग है, सभी को पता है, पर क्या मजाल कि इन अखबारों पर कोई भौं भी टेढ़ा कर दें, क्योंकि जैसे ही इन अखबारों पर शिकंजा कसेगा, सत्ता और विपक्ष में बैठे एवं छपास की बीमारी से पीड़ित नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और सम्मान के लालचियों का समूह इन अखबारों के पक्ष में बयानबाजी शुरू करेगा और नकली डायलॉग बोलेगा कि यहां अखबारों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है, लोकतंत्र खतरे में पड़ गया आदि-आदि। यानी कुल मिलाकर, जो इस धंधे में लिप्त है, उनके उपर शनि की वक्र दृष्टि और जो इस धंधेबाजों से अपनी आर्थिक समृद्धि कर रहे है उनके उपर शुक्र की महादृष्टि मजे लीजिये और क्या?

Saturday, September 24, 2016

फर्श पर भोजन........................

रिम्स में एक मनोरोगी लावारिस मरीज को फर्श पर भोजन देने का मामला रांची से प्रकाशित दो प्रमुख अखबारों दैनिक भास्कर और प्रभात खबर ने उठाया। ये ऐसा मामला था जो मानवीय दृष्टिकोण से किसी भी प्रकार से सहीं नहीं ठहराया जा सकता, और जैसा कि पहले से ही पता था कि ये मामला तूल पकड़ेगा और तूल पकड़ा भी...
दो अखबारों ने इस प्रकरण का श्रेय लेने के लिए प्रथम पृष्ठ पर खबर छापा - एक ने लिखा प्रभात खबर की खबर पर पहल तो दूसरे दैनिक भास्कर ने लिखा दैनिक भास्कर ने छापी थी खबर।
राज्य सरकार ने 24 घंटे में ही फैसला लिया और खाना परोसनेवाले कॉन्ट्रेक्ट कर्मचारी चंद्रमणि प्रसाद को बर्खास्त कर दिया। चंद्रमणि ने अपनी बर्खास्तगी पर जो बयान दिया है, वो बयान दैनिक जागरण ने छापा है इस खबर को भी पढ़िये तो पता चलेगा कि आजकल दया करना भी कितना भारी पड़ता है, जिसे इन दोनों अखबारों ने नहीं छापा है। चंद्रमणि कोई टाटा बिड़ला या अडानी समूह का व्यापारी नहीं है, वह भी आदमी जैसा दिखनेवाला ही प्राणी है।
न्यायालय ने भी स्वतः संज्ञान लिया है, अपने अनुसार और कह डाला कि अपराध है फर्श पर खाना परोसना सरकार जवाब दें। ये कथन हालांकि एक भला मानुष भी जानता है कि फर्श पर खाना परोसना अमानवीय है।
एक और बयान आया है कोई रोजी रोटी अधिकार अभियान की संयोजिका है कविता, जिसने कह डाला कि जहां आज भी फर्श पर खाना परोसा जाता है, वहां भारत माता की जय कैसे बोले। कविता का यह कथन बता रहा है कि जैसे लगता है कि भारत माता चंद्रमणि को आकर बोली कि तुम उक्त मनोरोगी महिला को फर्श पर भोजन परोस दो, यानी स्वयं मानसिक रुप से बीमार है और दूसरों को ज्ञान दिये जा रहे है। कविता ने तो इस प्रकरण पर ऐसा बयान दिया कि जैसे भारत माता विलेन हो, खलनायिका हो।
हमारे देश में इस प्रकार की अमानवीय घटनाएं हमेशा इक्के-दूक्के जगह देखने को और सुनने को मिलती है, इसका मतलब ये तो नहीं कि हम भारत माता को ही कटघरे में रख दें। आपकी घटिया सोच और घटिया मनोवृत्ति के लिए भारत माता दोषी कैसे हो गयी, लेकिन जब आप वामपंथी होंगी या वामपंथ में ही भारत का निर्माण दिखेगा तो भारत माता आपकी नजरों में विलेन तो दिखेंगी ही।
इधर रांची में विभिन्न प्रकार का एनजीओ चलानेवाले और स्वयं को गरीबों का मसीहा बतानेवालों का अधिवेशन चल रहा है, ये वो लोग है, जो एनजीओ के माध्यम से राज्य व केन्द्र सरकार की विकासात्मक योजनाओं और गरीबों के लिए चलनेवाली योजनाओं को खुद गड़प कर जाते है, वे डायलागबाजी कर रहे है।
फर्श पर भोजन प्रकरण, कुछ नहीं, हमारी घटिया मानसिकता का घोतक है, हम स्वयं को तो मनुष्य मानते है, पर सामनेवाले को मनुष्य मानने को तैयार नहीं। हर प्रकार का कुकर्म करेंगे और स्वयं द्वारा किये गये कुकर्म को औरों से बेहतर मानेंगे और दोष ठहरायेंगे भारत माता को। वामपंथी बनेंगे, एनजीओ बनायेंगे और अपने बेटे-बेटियों को दूसरे महानगरों में बसायेंगे और कहेंगे कि भारत माता की जय कैसे बोले। लाशों की राजनीति करेंगे, गुंडों, अपराधियों और देशद्रोहियों की मदद करेंगे और बोलेंगे कि भारत माता की जय बोले कैसे। जैसे कल का ही अखबारों में छपा भाकपा माले के महासचिव दीपंकर का वह बयान पढ़ लीजिये, जिसमें उसने कहा कि बुरहान वानी आतंकी नहीं था।
अब आप समझ लीजिये कि कौन इस प्रकार की व्यवस्था के लिए दोषी है। राज्य व केन्द्र सरकार या हमारी घटिया स्तर की सोच। जिसमें हम स्वयं को तो श्रेष्ठ और बाकियों को दो कौड़ी का नागरिक समझते है।

Wednesday, September 21, 2016

शहीदों के नाम पर हिन्दुस्तान अखबार और छपास की बीमारी से पीड़ित नेता.............

सदैव अश्लील व अनैतिक विज्ञापनों को प्रकाशित करनेवाला तथा बच्चों में मानसिक विकृतियों का जन्मदाता हिन्दुस्तान अखबार के हृदय में 20 सितम्बर को देशभक्ति का ज्वार फूंटा। उसने अपने विशेष माध्यम से लोगों को उड़ी की याद दिलाई और लोगों से कैंडल मार्च में शामिल होने का अनुरोध कर डाला, चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने अनुरोध किया तो जितने भी छपास की बिमारी से पीड़ित नेता (चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो) और विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग उनके कार्यक्रम में आ धमके, खूब फोटो सेशन कराया, हंसा – हंसाया और फिर रोजमर्रा के कामों में जूट गये। इन्हें न तो देशभक्ति से मतलब था और न ही उड़ी की घटनाओं से, चूंकि अखबार को आदमी चाहिए थे, अपने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए, उन्हें आदमी मिल गये और जिन्हें चेहरे चमकाने थे, उनके चेहरे चमक गये, पर जिन्होंने उड़ी के नाम पर ये सब किया, उनसे कुछ सवाल तो मैं जरुर पूछना चाहुंगा।
सवाल नं. 1 – क्या उड़ी में शहीद हुए सैनिकों की आत्मा या उनके परिवार के लोगों ने उनसे ऐसा कार्यक्रम आयोजित करने को कहा था, क्या?
सवाल नं. 2 – क्या कोई बता सकता है, कि जो लोग इस कार्यक्रम में शामिल थे, उनके परिवार के कितने लोग सेना या केन्द्रीय अर्द्ध सैनिक बलों में कार्यरत है?
सवाल नं. 3 – क्या जिस प्रकार का ये फोटो सेशन कराये हैं और इस मर्माहत होनेवाली घटनाओं में दांत निपोड़ें है, उनके घरों में भी ऐसी हादसा होने पर, वे इसी प्रकार दांत निपोड़ा करते है क्या?
सवाल नं. 4 – क्या इस प्रकार के आयोजन से माइलेज लेने की जो नई प्रवृत्ति का जन्म हुआ है, उससे पता नहीं चलता कि लोगों में संवेदनशीलता समाप्त हो गयी और लोग इस शहादत का भी व्यवसायीकरण करने में लग गये, ये कहकर कि लोग जाने कि हिन्दुस्तान अखबार का जवाब नहीं और जब अखबार में काम करनेवाले लोगों में संवेदनशीलता है ही नहीं तो इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने के मायने क्या है?
आप पूछेंगे कि ये सब लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी, आवश्यकता है, हमारे पास प्रमाण है कि इस दुख भरी घटना में, जहां सारे देश में उबाल है, एक नेता मुस्कुरा रहा है, और अगर यह दृश्य देखना है तो धनबाद से प्रकाशित हिन्दुस्तान का पृष्ठ संख्या 3 देखिये, जिसमें भाजपा सांसद पी एन सिंह मुस्कुराते हुए फोटो खींचा रहे है, जैसे लग रहा है कि फोटो सेशन चल रहा है, यहीं भाजपा समर्थित एक मेयर भी है, उसके चेहरे को भी पढ़ने की कोशिश कीजिये, कैसे वह फोटो सेशन में स्वयं को समाहित कर रहा है और पृष्ठ संख्या 4 देखियेगा तो आपको सब कुछ क्लियर हो जायेगा, कि हिन्दुस्तान अखबार का बैनर लेकर लोग कैसे आनन्दित हो रहे है, मुस्कुरा रहे है, जैसे लगता है कि देश में कोई जश्न का माहौल हो...यहीं नहीं इस अखबार में काम करनेवाले कई कर्मचारियों ने तो गजब कर डाला है, फोटो खिंचवाया तो खिंचवाया, उसे बड़े शान से सोशल साइट्स पर भी डाल दिया। लीजिये देखिये, हिन्दुस्तान अखबार के कारनामे, फोटो सब कुछ क्लियर कर दे रहा है...

Saturday, September 17, 2016

कौन है पंकज पाठक.................

कौन है पंकज पाठक?
जानिये पंकज पाठक को। पंकज पाठक को 14 दिनों के लिए जेल भेज दिया गया है। उस पर आरोप है कि उसने अडानी पावर लिमिटेड के गोपनीय दस्तावेज बेचे है। किसको बेचे है, किसलिये बेचे है, अब तक पुलिस पता नहीं लगा पाई है। आज के विभिन्न अखबारों को देखने से पता चलता है कि वह रह – रह कर अपना बयान बदल रहा है। हिन्दुस्तान अखबार के अनुसार, उसके बयान है कि अगर वह मुंह खोलेगा तो कई बड़े लोग फंसेंगे। कौन लोग फंसेंगे जाहिर है, जिसका वह नाम लेगा, पर वह जिसका नाम लेगा, वे फंस ही जायेंगे, इस बात में दम नहीं है, क्योंकि जिन्हें उसके नाम लेने से फंसने का डर है, वे जरूर अब तक अपनी सुरक्षा के बड़े-बड़े बांध बना लिये होंगे। फिर भी हमारा पंकज से आग्रह होगा कि वह सत्य के साथ रहे और सत्य का अनुसरण करते हुए, अपनी बात बिना किसी भय के कानून के समक्ष रखे, क्योंकि सत्य में ही सिर्फ ताकत होती है। सत्य ही उसे बचायेगा, बाकी असत्य की क्या भूमिका होती है, वह सब को पता है।
पंकज को मैं अच्छी तरह जानता हूं, अनेक बार उससे मिला हूं। फेसबुक पर भी बाते होती रही है, कई बार फोन पर बात किया हूं। जब वह प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश का पीए हुआ करता था, तब तो ज्यादा ही बाते हुआ करती थी। उसके आलेख बराबर प्रभात खबर के संपादकीय पृष्ठ पर दीख जाया करते थे। एक दो आलेख तो दैनिक जागरण में भी उसके छपे है, वे भी राष्ट्रीय स्तर पर। फेसबुक पर उसके धारदार पोस्ट तो प्रभात खबर में काम करनेवाले संपादकों से लेकर नीचे के कर्मचारियों तक को कमेंट्स करने पर मजबूर कर देते थे, चाहे वे विजय पाठक हो या अभी दूसरे जगहों पर कार्य कर रहे स्वयं प्रकाश, इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उस बच्चे में प्रतिभा है और प्रतिभा के बल पर कई वर्षों तक उसने प्रभात खबर को अपनी सेवा दी।
आखिर प्रभात खबर में शीर्ष पर रहनेवाला पंकज अडानी पावर लिमिटेड में जाते ही अपराध कैसे कर बैठा? ये सवाल रहस्यमय बना हुआ है और इस रहस्य को सुलझाना झारखण्ड पुलिस के लिए बहुत ही जरूरी है, ऐसे तो ये सवाल से पर्दा उसी समय उठ गया, जब पंकज ने यह बयान दिया कि “मुंह खोलूंगा तो फंसेंगे कई बड़े लोग”। भाई पंकज, मुंह खोल ही दो, किसके लिए धर्मसंकट में फंसे हो। उपनिषद कहता है – धर्मों रक्षति रक्षितः।
हां, एक बात के लिए प्रभात खबर को जरुर दाद दूंगा कि उसने तुम्हारी फोटो अभी तक अपने अखबार में इस प्रकरण में नहीं छापी, शायद वह इस बात को आज भी आत्मसात किये हुए है कि तुम वहां कभी काम किये थे, चलो प्रभात खबर ने इतना तो अपना धर्म निभाया, नहीं तो वो कितना धर्म निभाता है, मैं जानता हूं। हमें तो लगता है कि कुछ न कुछ जरूर गड़बड़ है, जिससे पर्दा उठना चाहिए और ये पर्दा तुम्हीं उठाओगे। ईश्वर सदैव तुम्हारे साथ है, सत्य का साथ कभी मत छोड़ना।

Thursday, September 15, 2016

चूंकि प्रभात खबर कह रहा है, तो मान लीजिये...............

चूंकि प्रभात खबर कह रहा है, तो मान लीजिये कि आज अनन्त चतुर्दशी नहीं, बल्कि आज ऋषि पंचमी है...
हां, भाई हां...
आज अनन्त चतुर्दशी नहीं, बल्कि आज ऋषि पंचमी है, क्योंकि झारखण्ड का सर्वाधिक प्रसारित हिन्दी दैनिक प्रभात खबर के अनुसार आज अनन्त चतुर्दशी नहीं, बल्कि ऋषि पंचमी है, इसलिए आज सभी ऋषि पंचमी व्रत करें, क्योंकि प्रभात खबर कभी झूठ नहीं बोलता।
हमारे राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास तो कई जगहों पर बोल चुके है कि पत्रकारिता हो तो प्रभात खबर जैसी, नहीं तो पत्रकारिता हो ही नहीं। वे तो प्रभात खबर पर इतने खुश रहते है कि वे मुक्त कंठ से उस पर जमकर अर्थ लूटाते रहते है, उस अखबार के संपादक या प्रबंधक या मालिक के एक इशारे पर उनके कार्यक्रमों में लाख व्यस्तताओं के बावजूद दिखाई पड़ जाते हैं...
इसलिए मैं कह रहा हूं कि सभी लोग प्रेम पूर्वक आज ऋषि पंचमी व्रत मनाएं...
एक बात और
अगर कोई पूछे कि आज कौन सा दिन है...
तो भूल कर भी आज वृहस्पतिवार है, ऐसा न कहें...
प्रेम से हृदय में प्रभात खबर अखबार को रखकर बोले कि आज मंगलवार है...
क्योंकि आज प्रभात खबर ने अपने रांची संस्करण में पृष्ठ संख्या 3 जो सिटी फर्स्ट के नाम से जानी जाती है, उसमें आज का पंचांग में स्पष्ट रूप से उद्धृत किया है कि आज पंचमी तिथि है जो रात्रि के 8.42 तक रहेगी और उसके उपरांत षष्ठी तिथि है। प्रभात खबर के इस दिये पंचांग के अनुसार आज वृहस्पतिवार नहीं, बल्कि मंगलवार है, उसने आज पर्व त्यौहार में लिखा है कि आज ऋषि पंचमी व्रत और रक्षा पंचमी है।
यानी ये वहीं बात हो गयी...
मैं चाहे, वो करूं, मैं चाहे जो करूं
मेरी मर्जी...
यानी बेशर्मी की सारी सीमा पार कर दी है, इस अखबार ने, पर कोई बोलनेवाला नहीं, सभी चुप्पी साधे हुए हैं...
शर्मनाक...

Friday, August 19, 2016

हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं..................

पटना से प्रकाशित भटियारे अखबारों ने आज भी अपना भटियारापन जारी रखा...
जी हां, पटना से प्रकाशित कुछ भटियारे अखबारों ने आज भी अपना भटियारापन जारी रखा। भटियारेपन का खिताब जीत चुका पटना से प्रकाशित अखबार “हिन्दुस्तान” ने आज मुख पृष्ठ पर हेडिंग दिया...
“प्रशासन ने माना, शराब से ही हुई 17 लोगों की मौत” – यानी “हिन्दुस्तान” अखबार मानता है कि जिन लोगों की मौत हुई वह शराब से नहीं बल्कि उसके कल के कथनानुसार कै-दस्त से ही हुई।
नीतीश को समर्पित परमभक्त अखबार “प्रभात खबर” ने जो कल यह हेडिंग दिया था कि “गोपालगंज में मरनेवालों की संख्या 14 पहुंची, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नहीं मिला अल्कोहल का अंश”। आज हेडिंग दिया है – “गोपालगंज नगर थाने की सभी 15 पुलिसकर्मी निलंबित” और लगे हाथों जमकर नीतीशायन गाया है।
कल तक जो “दैनिक जागरण” अपने हेडिंग के माध्यम से सही समाचार लिखने का प्रयास करते हुए अपनी गरिमा बचाने का प्रयास किया था, आज उसकी हेडिंग देखिये तो पता चलेगा कि उसने आज नीतीशायन की ओर कदम बढ़ाया है।
दैनिक जागरण का आज का हेडिंग है...
“बख्शे नहीं जायेंगे शराब के धंधेबाज
इस्पेक्टर सहित 25 पुलिसकर्मी निलंबित”
दूसरी ओर “दैनिक भास्कर” ने आज एक बार फिर नीतीश की बैंड बजा दी है। हेडिंग दिया है – “तीन और की मौत, इसंपेक्टर समेत 25 पुलिसकर्मी सस्पेंड”
अब अपनी बात...
क्या पत्रकारिता सत्ता में बैठे मठाधीशों की सुरक्षा और उनकी आरती गाने के लिए होती है या जनता की आवाज बनने के लिए?
जनता इन अखबारों के संपादकों-मालिकों से पूछे कि वे अखबार खोलकर सत्ता में बैठे लोगों के तलवे क्यूं चाटते है?, इससे अच्छा है कि वे कोठा खोल लें...
फिलहाल गोपालगंज शराबकांड में जिस प्रकार से पटना से प्रकाशित अखबारों ने पत्रकारिता धर्म का पालन न कर, सत्ता में बैठे लोगों का महिमामंडन करने का कार्य किया है, हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं...

Thursday, August 18, 2016

अखबारों का भटियारापन...............

मौत गरीबों का और पटना से प्रकाशित एक-दो अखबारों को छोड़कर सभी अखबारों ने आज गरीबों के मौत का मजाक उड़ाया हैं और नीतीश भक्ति से स्वयं को अलंकृत कर लिया है। भटियारापन दिखाने में इस बार पटना से प्रकाशित हिन्दुस्तान अखबार ने बाजी मार ली है, इस बार हिन्दुस्तान प्रथम स्थान पर और प्रभात खबर दूसरे स्थान पर है, जबकि दैनिक जागरण ने अपनी गरिमा बचाने में कुछ हद तक सफलता पायी, वहीं दैनिक भास्कर ने सही खबरें प्रकाशित कर गरीबों के मौत पर मरहम और नीतीश को डायरेक्ट चुनौती दे दी है।
जरा खबर क्या है, उसे जानिये – खबर यह है कि जहरीली शराब पीने से गोपालगंज में 15 लोगों की मौत हो गयी, प्रशासन मानने को तैयार ही नहीं कि यह मौत जहरीली शराब पीने से हुई है, जबकि जिनके घर में ये घटना घटी, वे चीख-चीखकर कह रहे हैं कि यह मौत जहरीली शराब के कारण हुई, पर बेशर्म अखबारों को देखिये, क्या हेडिंग बनायी है...
सबसे पहले पटना से प्रकाशित हिन्दुस्तान को देखिये...
हेंडिग बनाई है...
“गोपालगंज में कै दस्त से 14 मरे”
प्रभात खबर को देखिये, ये हेंडिग बनाया है
“गोपालगंज में मरनेवालों की संख्या 14 तक पहुंची”
दैनिक जागरण ने हेडिंग दिया
“जहरीली शराब से 14 मरे”
दैनिक भास्कर ने हेडिंग दिया
“पहले आंखों की रोशनी गई, फिर जान, जहरीली शराब से 15 लोगों की मौत”
ये हैं कुछ अखबारों का दोगला चरित्र और नीतीशायण गाने की प्रतियोगिता...
और अब अपनी बात...
जो लोग हमारे फेसबुक से जुड़े है, और हमारा फेसबुक पढ़ते है। वे जानते होंगे कि मैंने 4 अगस्त 2016 को क्या लिखा था, पर जो नहीं पढ़े है, उनके लिए मैं पुनः उद्धृत कर रहा हूं, वो यह हैं...
“बिहार के बबुआ नीतीश को समर्पित...
ए भाई इ देश में दहेज के खिलाफ कानून बना है...भ्रष्टाचार रोकने के खिलाफ भी कानून बना है...कम उम्र में शादी रोकने का भी कानून बना है...चोरी, बलात्कार, गुंडागर्दी रोकने के लिए भी कानून बना है...लगे हाथों एक और भी कानून बन गया, क्या कहते है दारु पीने से रोकने का कानून...हम सभी का स्वागत करते है...जैसे पहले के कानून का किया...जैसे आज भी दहेज लेते है, भ्रष्टाचार का सारा रिकार्ड अपने नेता जी अपने पास रखते है, कम उम्र में शादी भी करते और करा देते है, चोरी, बलात्कार और गुंडागर्दी तो नेताओं के आभूषण ही है...इसलिए दारु के बारे में क्या कहना हैं, नई - नई दुल्हन बनी है, देखते है आगे कितने लोग इसका घूंघट उठाते है...”
ये लिखने का अभिप्राय यहीं था कि आप कुछ भी कर लो, जो गलत लोग है, जो चरित्रहीन लोग है, वे अपनी कलाबाजी दिखायेंगे ही, उन्होंने अपनी कलाबाजी आज दिखा दी...
पर इससे हुआ क्या?
मरा कौन गरीब, मरा कौन था गरीब और मरेगा कौन गरीब
और इस पर मजा लूटेगा कौन, वहीं हिन्दुस्तान, वहीं प्रभात खबर जो दांत निपोड़ कर फिलहाल नीतीशभक्ति में सर से पांव तक डूबा है...
बेशर्म है ये लोग, पत्रकारिता क्या करेंगे...
ये तो नीतीशायन गायेंगे और गरीबों के शव पर ठुमके लगायेंगे...
हम ऐसी पत्रकारिता पर थूकते हैं...

Monday, May 23, 2016

।। अथ चपलकांत कथा ।।

बहुत दिनों की बात है...
जंगलों से आच्छादित एक भूखण्ड प्रदेश था...
जहां चपलकांत नामक एक सियार पत्रकार था...
उसकी धूर्त बातों से अनभिज्ञ जंगलों के अन्य जीव-जंतु उसे महान बुद्धिजीवी समझते और चपलकांत उस भूखण्ड प्रदेश में सारे जीव-जंतुओं को बेवकूफ बनाकर राज किया करता था। उसकी धूर्तता से अनभिज्ञ उसके ज्ञान के कायल सत्तापक्ष और विपक्ष के लोग भी थे। उसकी पत्रकारिता से भय खा कर कई प्रशासनिक अधिकारी उसकी सेवा में लगे रहते, और उसे अपने – अपने विभागों की सुंदर-सुंदर कॉटेजों और अतिथिगृहों में आनन्द की सारी सामग्रियां उपलब्ध किया करते। चपलकांत अपनी प्रिय पत्नी और बच्चों के साथ परम आनन्द की प्राप्ति करता, साथ ही अगर सेवा के दौरान कुछ गड़बड़ियां दीख जाती तो वह पत्रकारिता का धौंस दिखाकर जंगल के छोटे-छोटे कर्मचारियों को अपना भय दिखाना नहीं भूलता...
उसकी इस धौंस और धूर्तता से धीरे-धीरे भूखण्ड प्रदेश के सभी वन्य प्राणी परेशान होने लगे...
पर सत्ता के सर्वोच्च सिंहासनों तक उसकी धौंस और उसकी पत्नी के भी एक न्यूज पोर्टल के संपादक बन जाने से सभी की नींद उड़ गयी थी, कि अब क्या होगा...क्योंकि वह नाना प्रकार के कुटिल हरकतें करता और पुरस्कार के लालचियों और घटियास्तर के भ्रष्ट लोगों को श्रेष्ठनायक का पुरस्कार देकर अपने आपको और मजबूत करता चला जाता...
यहीं नहीं भूखण्ड प्रदेश में कार्यरत सत्तावचन प्रसारित भवन में भी उसकी धमक रहती और वह इसका फायदा उठाने में कोई कोताही नहीं बरतता...
उसकी इस हरकत से धीरे-धीरे उस भूखण्ड प्रदेश की पत्रकारिता की छवि धूमिल होने लगी। भूखण्ड प्रदेश के कई बुद्धिजीवियों ने भूखण्ड प्रदेश में रहनेवाले सभी जीव-जंतुओं को उससे सावधान करने का मन बनाया...
तभी भूखण्ड प्रदेश में चल रहे एक महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान में एक भयंकर ज्ञान-विस्फोट हुआ, जिसमें उसकी हवा निकल गयी, यहीं उसे पहला झटका मिला...फिर भी उसे लगा कि जब वह चपलकांत ही है, तो इस प्रकार की झटकों से उसके सम्मान को कुछ नहीं होता, क्योंकि सारे संसार में उसके जैसे लोग भरे पड़े हैं, ऐसे भी उसका जन्म ही इसी प्रकार की हरकतों को करने के लिए हुआ है...
इसलिए वह हर प्रकार के हथकंडों में निपुण होता जाता...कभी वो गायक बन जाता, तो कभी साहित्यकार, तो कभी प्रोफेसर तो कभी विद्यार्थी, यानी जब जैसा तब तैसा...पत्रकार तो था ही...
इसी चक्कर में उसने सर्वश्रेष्ठ धनपशु बनने का लालसा पा लिया...
इस लालसा को पा लेने के बाद उसे परमज्ञान हुआ कि ये तो भूखण्ड प्रदेश है...
यहां तो सारे के सारे नेता और अधिकारी गधे और मूर्ख है...एक सबसे ज्यादा तेज तो वहीं हैं, जिसकी ज्ञान से भूखण्ड प्रदेश के सारे जीव-जंतु हैरान है...
इसलिए, उसने एक स्वज्ञान आधारित एक स्मारिका निकालने की सोची, जिससे उसे अपार धन हासिल हो...उसने भूखण्ड प्रदेश के सारे नेताओं, मंत्रियों और अधिकारियों के आगे नाचना शुरू किया...जिससे उसकी रही-सही इज्जत भी धूल में मिल गयी, साथ ही उसके परम मित्रों में भी जो सम्मान बचा था, वह भी धुल गया...
पर उसकी धन कमाने की लालसा नहीं गयी...
वह धन कमाने के चक्कर में अपने छोटे-छोटे बच्चों को भी तथाकथित धूर्तनिष्ठ पत्रकारिता का चरणामृत चखा दिया...
जिससे बच्चे बड़ी तेजी से उसके कुकृत्यों के शिकार होने लगे...
वो कहावत है न
बाढ़हु पुत पिता के धर्में, खेती उपजे अपना कर्मे
जब पिता के धर्म पर पुत्र आगे बढ़ सकता है, तो पिता के कुकर्म पर बच्चे नीचे जायेंगे ही।
उस चपलकांत सियार के बच्चे सत्यनिष्ठ बनना तो दूर, धूर्तनिष्ठ होने लगे...
पर सर्वश्रेष्ठ धनपशु बनने के चक्कर में चपलकांत सियार नामक पत्रकार इतना खो गया कि उसे पता ही नहीं चला कि उसका सारा तेज धीरे – धीरे कुकर्मों से युक्त होकर धूमिल होता जा रहा है...
एक दिन वह भूखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके मातहत अधिकारियों को अपने ज्ञान का स्वाद चखाने के लिए ताना-बाना बुना, पर उसकी चालाकी को जान लेने के बाद भूखण्ड प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके मातहत काम करनेवाले अधिकारियों ने उसकी एक न सुनी और उस धनपशु चपलकांत को औकात बता दी और कहा कि वह ज्यादा काबिल न बने, नहीं तो उसे लेने के देने पड़ जायेंगे...
बेचारा चपलकांत, उसकी रही-सही बुद्धि भी खत्म हो गयी...
और शीर्ष पर रहनेवाला चपलकांत धड़ाम से जमीन पर आकर गिर पड़ा...
शिक्षा – क. पत्रकारिता में ईमानदारी अवश्य बरतनी चाहिये...
ख. आपके किये कुकर्म आपको उपर नहीं, बल्कि नीचे ले जाते हैं...
ग. चरित्रवान होना, सारी सफलता की कुंजी है, इससे ईश्वर प्रसन्न होते हैं...

Monday, March 21, 2016

रांची के कुछ अखबारों के संपादकों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए.................

रांची के कुछ अखबारों के संपादकों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए...
BUT
थैंक यू “आजाद सिपाही”
जी हां, रांची के अखबारों के संपादकों को चुल्लू भर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए, ऐसा इसलिए कि इन अखबारों ने पाठकों तक सही समाचार नहीं पहुंचाने का संकल्प ले रखा हैं...। ये अखबार गुंडों और अपराधियों की मदद करते हैं। अखबार की आड़ में अपनी संतानों का भविष्य सुरक्षित करते हैं और नेताओं के चरणोदक पीकर, स्वयं को कृतार्थ करते हैं...
आखिर मैंने ऐसा क्यूं कहां...
आइये हम आपको विस्तार पूर्वक बताते हैं...
कल यानी 20 मार्च को चुटिया के महादेव मंडा के पास एक हृदय विदारक घटना घटी। कल बंद समर्थकों ने चंद्रशेखर ठाकुर नामक युवक को जिंदा जलाने का प्रयास किया, पर वह युवक दैव कृपा से बच गया और अपनी जान बचाते हुए, स्वयं चुटिया थाने के ठीक सामने आर पी फार्मा यानी विक्की सिंह के दुकान पर पहुंच गया। जहां विक्की सिंह और उनके भाई जो डाक्टर भी है, उक्त युवक की बिना किसी शुल्क लिये, अपनी सेवा दी और उसकी जान बचाई, पर रांची के किसी अखबार ने आजाद सिपाही को छोड़कर सही खबरे नहीं दी...
आश्चर्य इस बात की है कि आर पी फार्मा के ठीक सामने चुटिया थाना है, पर चुटिया थाने के किसी भी पुलिसकर्मी ने आर पी फार्मा आकर वस्तुस्थिति को जानने की कोशिश नहीं की...। जब इलेक्ट्रानिक मीडियाकर्मियों का दल वहां पहुंचा, तब भुक्तभोगी युवक आर पी फार्मा में इलाजरत था, पर चुटिया पुलिस कहां थी, किसी को पता नहीं था।
इधर, बंद समर्थकों द्वारा चंद्रशेखर ठाकुर को जिंदा जलाने का प्रयास हुआ, उसकी हत्या करने की कोशिश की गयी, पर जरा देखिये, रांची से प्रकाशित निर्लज्ज अखबारों को, क्या छाप रहे है...
सबसे पहले प्रभात खबर को देखिये...
इसने आज के अखबार में पृष्ठ संख्या 4 पर बंद से संबंधित खबरें छापी है...जिसमें लिखा है कि “कहीं से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं” जरा सोचिये, जहां एक युवक को जिंदा जलाने का प्रयास किया जाता हो, वहां यह अखबार लिख रहा है कि “कहीं से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं”...इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या हो सकती है...यहीं नहीं इसी पृष्ठ पर यह अखबार लिखता है कि “बंद समर्थकों से धक्का-मुक्की, आग पर गिरा युवक” साथ ही उक्त युवक का वह फोटो भी दे रहा है और गोल मटोल झूठी समाचार छाप कर, इस घटना का इतिश्री कर दिया।
और अब बात हिन्दुस्तान अखबार की...
इस अखबार ने तो झूठ का रिकार्ड ही तोड़ दिया...। पृष्ठ संख्या 5 पर “आगजनी की चपेट में आया युवक” नाम से छपे समाचार में इस अखबार ने सिर्फ झूठ ही लिखा है और झूठ के सिवा कुछ भी नहीं...जरा देखिये क्या लिखा है इसने – कुछ बंद समर्थकों ने ही चंद्रशेखर को बचाया, फिर उसे गुरुनानक अस्पताल भेजा, जबकि सच्चाई यह है कि हिन्दुस्तान अखबार जो खुद उस युवक का फोटो छापा है, वह फोटो विक्की सिंह के दुकान की है, जहां उक्त युवक की इलाज हुई...युवक को न तो बंद समर्थकों ने विक्की सिंह के दुकान पर लाया था और न ही युवक गुरु नानक अस्पताल गया...इस अखबार ने तो बंद समर्थकों को ऐसी आरती उतारी कि पूछिये मत...
अब देखिये दैनिक भास्कर ने क्या लिखा...
दैनिक भास्कर ने पृष्ठ संख्या 3 में इस प्रकार इस खबर को दिया, जैसे लगता है कि ये कोई मामूली घटना हो...। शीर्षक है – बंद समर्थकों ने युवक के साथ मारपीट की।
और दैनिक जागरण
इस अखबार ने पृष्ठ संख्या 2 पर इस खबर को इस प्रकार छापा, जैसे लगता है कि ये कोई घटना ही नहीं, पर इस अखबार को हम एक बात के लिए दाद देंगे कि इसने इस घटना की सच्चाई को कम से कम छूने की कोशिश की...
और आजाद सिपाही
आजाद सिपाही ने तो कमाल ही कर दिया...
पृष्ठ संख्या एक पर सही - सही छाप दिया कि चुटिया के महादेव मंडा में किस प्रकार एक युवक को जलाने की कोशिश की गयी, वह भी बंदी के नाम पर...
और अब बात हेमंत सोरेन की...
हेमंत जी आपको बधाई...आप तो बाहरियों के लिए तीर – धनुष उठाने और डंडा उठाने की बात कह रहे थे। यहां के आदिवासियों और मूलवासियों ने आपसे एक कदम और बढ़ने का संकल्प ले लिया। हाथ में पेट्रोल बम पकड़ लिया है। कल एक युवक को जिंदा जलाने की कोशिश हुई...पर वह संयोग से बच निकला। आनेवाले समय में हो सकता है कि ये घटना की पुनरावृत्ति हो, यह भी हो सकता है कि बार – बार की इस घटना में कोई युवक इस आगजनी का शिकार भी हो जाय...सचमुच आप महान है, क्योंकि आप जैसे नेता ही तो झारखण्ड की शान है...ऐसे ही बयान देते रहिये, ताकि झारखण्ड का नाम रौशन होता रहे...
और वाह रे रांची की पुलिस...
चुटिया थाना की पुलिस तो महान है...। चंद्रशेखर चुटिया थाना के सामने इलाज करा रहा था और चुटिया थाना पुलिस कहां सोई थी, पता ही नहीं चला, जबकि मिनटों में ही इलेक्ट्रानिक मीडिया के संवाददाता आर पी फार्मा, विक्की सिंह के दुकान पर पहुंच गये और अपने कार्य को गति दे दी...। हालांकि कई इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपने धर्म का निर्वहन नहीं किया।
बधाई राज्य सरकार को भी...
एक समय था, जब आदिवासी-मूलवासी डोमिसाइल के नाम बंद करते थे, तो एक प्रकार की दहशत हो जाया करती थी, पर अब वो दहशत का माहौल नहीं होता...। पर दहशत का माहौल करने की कोशिश की जा रही है...। हमारा राज्य सरकार से अनुरोध होगा कि वह पुलिस व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करें, नहीं तो स्थिति भयावह करने की पुरजोर कोशिश विपक्षियों द्वारा की जा रही है...। हालांकि गलती करेंगे और करायेंगे विपक्षी, पर ठीकरा फोड़ेंगे सरकार पर...। ये रघुवर सरकार को भूलना नहीं चाहिए।

Friday, February 26, 2016

क्या आप जानते हैं..............

क्या आप जानते है, कि भारत में कौन सा अखबार या चैनल किस पार्टी या दल का आरती उतारता है/या भोपू है...गर नहीं जानते तो आज ही जानिये...ये देश के लिए और आपके लिए अत्यंत आवश्यक है....
जानिये अपने अखबारों और चैनलों को, वे कितने गिरे हुए हैं और किस पार्टी/दल की भक्ति में लग कर, भारत की एकता व अखंडता को चोट पहुंचा रहे हैं, अपने बच्चों को भी बताइये...क्योंकि ये बच्चे बहुत ही कोमल है, जो आज सीखेंगे, वहीं युवा होकर देश को देंगे...बच्चों पर किसी भी दल के विचार को मत थोपिये, उन्हें जो अच्छा लगे, करने दें, बस उनका मार्गदर्शन करते रहे...उन्हें वामपंथी बनना है, या दक्षिणपंथी बनना है, या विशुद्ध रुप से मानवीय मूल्यों को आत्मसात करना है...उन्हें इसकी खुली छूट दीजिये...हालांकि वामपंथी गुंडों का एक दल नहीं चाहता कि देश में समरसता रहे, इसके लिए हर प्रकार के छल -प्रपंच का वो शुरुआत कर चुका है...उसके बाद भी अब देखिये....
1. हिन्दुस्तान - ये अखबार अपने स्थापना काल से कांग्रेस प्रेम के लिए प्रसिद्ध है, ये आज भी कांग्रेस का गुण गाता है...उदाहरण 25 फरवरी का अखबार देख लीजिये... ज्यादातर अखबार स्मृति ईरानी के धुंआधार भाषण से पटा है, पर ये ज्योतिर्दित्य सिंधिया में देश ढूंढ रहा है...इसके मालिक कई बार कांग्रेस से उपकृत होकर राज्यसभा सदस्य भी बन चुके है...इसलिए कांग्रेस इसकी पहली पसंद और दूसरे में नीतीश और लालू को ये अपना सब कुछ समझता है...
2. प्रभात खबर - ये अखबार जदयू का खास अखबार है... इसे नीतीश कुमार में भगवान नजर आता है...इसका प्रधान संपादक हाल ही में जदयू का सांसद बना है...इसके अखबारों में जदयू के नेताओं व सांसदों के वैचारिक आलेख खुब छपते है, फिलहाल लालू व राहुल भक्ति में आकंठ डूबा है, भाजपा से इसकी नहीं पटती...
3. दैनिक जागरण - विशुद्ध रुप से भाजपाई अखबार है, इसके मालिक भाजपा से उपकृत होकर कभी सांसद भी बन चुके है...ये भाजपा के खिलाफ सुनने को तैयार नहीं, पूर्णतः पत्रकारिता को व्यवसाय मानकर ये चलता है...मिशन इसके लिए कुछ भी नहीं....
4. दैनिक भास्कर - ये अखबार पूर्णतः कांग्रेस और भाजपा का सम्मिश्रण है...समयानुसार कभी मिशन तो कभी व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाता है...इसके लिए अखबार ही सब कुछ है...जनता का मिजाज भांपता है, वहीं दृष्टिकोण अपनाता है...यानी जस जैसा, तस तैसा...हर जगह इसकी पकड़ है, हर वर्ग के नेताओं की यह जय जय करता है, ताकि जब कभी किसी की सत्ता आये तो उसका व्यवसायिक लाभ ये उठा सकें...

5. बीबीसी - इसका सारा समाचार भारत विरोध से शुरु होता है और भारत विरोध पर ही खत्म हो जाता है....
6. द टेलीग्राफ - कट्टर वामपंथ समर्थक...
7. द टाइम्स आफ इंडिया - कांग्रेस और वामपंथ समर्थक....
8. हिन्दुस्तान टाइम्स - कट्टर कांग्रेस समर्थक...
9. हिन्दु - कट्टर भाजपा आलोचक/वामपंथ समर्थक...
7. आनन्द बाजार पत्रिका - कट्टर वामपंथ समर्थक....
8. एनडीटीवी - कट्टर भाजपा आलोचक, इसका वश चले तो भाजपाइयों को देखते ही गोली मार दें...कट्टर वामपंथी....उसका उदाहरण देख लीजिये...24 फरवरी को स्मृति ईरानी संसद में विपक्षी दलों का जवाब दे रही थी...भाजपा के कट्टर विरोधी होने के कारण ये स्मृति ईरानी का लाइभ की जगह इंटरनेशनल एजेंडा दिखा रहा था, जबकि सारे चैनल अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर स्मृति ईरानी का लाइभ दिखा रहे थे...देश में किसानों ने आत्महत्या की...देश में भ्रष्टाचार का कई मुद्दा छाया रहा, जिससे देश के सम्मान में बट्टा लगा...इसे शर्म नहीं आयी...पर जैसे ही एक कन्हैया की गिरफ्तारी हुई...इसने भाजपा विरोध के नाम पर, वामपंथियो के समर्थन के नाम पर अपना मुंह काला करते हुए अपना प्रसारण कुछ समय के लिए ब्लैक कर दिया...इसका एकमात्र सिद्धांत वामपंथ को भारत में स्थापित करना और दिल्ली के लाल किले पर लाल झंडा लहराता हुआ देखना है....
9. आजतक - कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समर्थक....
10. एबीपी - कट्टर कांग्रेसी और वामपंथी समर्थक...
11. आईबीएऩ 7 - भाजपा समर्थक...
12. टाइम्स नाउ - न्यूट्रल....
13. जीटीवी - विशुद्ध भाजपाई....
14. ईटीवी - इन दिनों भाजपा के समर्थन में....
15. इंडिया टीवी - भाजपा समर्थक...
जो देश में रहकर, देश के लिए पत्रकारिता नहीं करता हो...वो ज्यादा देशद्रोही है...जो एक दल के प्रति समर्पित रहता है...वो ज्यादा देशद्रोही है...पत्रकार किसी दल का नहीं होता...अखबार/चैनल किसी दल का नहीं होता...उसे तो पूर्णतः निरपेक्ष होते हुए, सत्य का आश्रय लेना चाहिए...पर यहां तो कोई भाजपाई तो कोई कांग्रेसी तो कोई वामपंथी पायजामा पहन कर दिये जा रहा है....ऐसे लोगों की हम कड़ी भर्त्सना करते हैं.....

Sunday, January 17, 2016

प्रभात खबर की गलथेथरई.......

अमर शहीद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पवित्र मिट्टी झारखण्ड पहुंच चुकी है। 44 साल बाद अपने वीर सैनिक की मिट्टी को देख सभी अभिभूत है, सभी ने मिलकर स्वागत किया है। राज्य के सारे अखबार (प्रभात खबर को छोड़कर) प्रसन्न है, इस अवसर पर विशेष पृष्ठ दिये है। राज्य सरकार के अधिकारी व राज्य सरकार संतुष्ट है, जिसने अपना पति गवांया, वो बलमदीना खुशी से फूली नहीं समा रही, अलबर्ट एक्का का सारा परिवार आनन्दित है, जो लोग मिट्टी लाने के लिए त्रिपुरा गये थे, उस टीम में शामिल सभी लोगों की आंखे, इस खुशी के पल को देखकर छलक रही हैं पर प्रभात खबर को प्रमाणिक दस्तावेज चाहिए कि ये जो मिट्टी आयी है, उसका क्या सबूत है कि ये मिट्टी अलबर्ट एक्का की ही है...
प्रभात खबर ने टीम में शामिल एक सदस्य से ऐसे – ऐसे सवाल पूछे है, जिसे पढ़कर आपको उस अखबार की घटिया मानसिकता का पता चल जायेगा...
अखबार ने बलमदीना के आंचल में पड़े शहीद की मिट्टी के प्रमाणिक दस्तावेज के बारे में पूछा है...
जबकि सारे लोग जानते है, वो अखबार खुद जानता है कि जहां युद्ध होते है, वहां वीरों के शव को किस प्रकार सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाता है, पर प्रभात खबर को दस्तावेज चाहिए...
जबकि वो अखबार अच्छी तरह जानता है कि ढुलकी गांव के सारे लोग, वो व्यक्ति भुवन दास जिसने वीरों के शव को दफनाया था, कहा है कि यहीं वह जगह हैं, जहां उसने दफनाया था, जहां आज एक मकान बन गया है, जो मकान गोपाल चंद्र दास का है, गोपाल चंद्र दास अपने मकान के आंगन को खुद ही अपने हाथों से खोद डालते है और विन्सेंट एक्का अपनी मां के आंचल में वो पवित्र मिट्टी डाल देता है...इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है...
और जो प्रभात खबर मिट्टी मंगवाया था, वहां से 100 मीटर की दूरी से लाई गयी मिट्टी थी...यानी गलत पर गलत प्रभात खबर किये जा रहा है और ढिठई से खुद को औरो से बेहतर बताने की असफल कोशिश किये जा रहा है। जिसके कारण उसकी लगातार जगहंसाई होती जा रही है...
पर बेशर्म को शर्म कहां...वाली कहावत बार बार उसके साथ चरितार्थ हो रही है...
आज एक बार फिर दैनिक भास्कर ने प्रभात खबर की पत्रकारिता पर ही सवाल उठा दिया है, जो सही भी है...
प्रभात खबर बताये कि क्या एक शहीद की मिट्टी इसी तरह लायी जाती है, जैसा कि उसने लाकर किया...अरे एक सामान्य व्यक्ति की मौत हो जाने पर भी उसके परिवार वाले भी उसके मिट्टी को इस प्रकार नहीं लाते और न ले जाते है, जैसा कि प्रभात खबर ने किया...प्रभात खबर को इस कुकर्म के लिए अविलम्ब सारे झारखण्डवासियों से माफी मांगनी चाहिए...पर वो माफी क्यूं मांगेगा, उसे तो लगता है कि दुनिया की सारी अच्छाइयां उसी में समायी हुई है...
जरा प्रभात खबर से पूछिये कि 3 दिसम्बर को उसी के द्वारा आयोजित रथ को रांची के अलबर्ट एक्का चौक से प्रस्थान करने वक्त उसके कितने लोग मौजूद थे...वो तो पुष्प वृष्टि कराने का निवेदन भी किया था...पर निवेदक की पूरी टीम पुष्पवृष्टि के समय ही गायब थी, जिसका वर्णन में पूर्व के एपिसोड में कर चुका हूं...
चलिए...अब तो जगजाहिर हो चुका है...कि प्रभात खबर क्या है? उसे गलथेथरई करने दीजिये...क्योंकि गलथेथरई में उसे महारत हासिल है...
प्रभात खबर ने ओछेपन में सवाल भी दागे है, वो क्या है, जरा देखिये...
प्रभात खबर के अनुसार...
अनुत्तरित सवाल
रतन तिर्की ने 30 नवंबर को संवाददाता सम्मेलन कर मिट्टी पर सवाल उठाते हुए मिट्टी की जांच की मांग की थी, तो क्या इस बार मिट्टी की जांच कर उसे लाया गया है. क्या यह संभव है कि जमीन से छह-आठ फीट खुदाई कर मिट्टी ली जाये.
अंतत:
प्रभात खबर का मानना है कि ऐसे सवालों का कोई अंत नहीं है. यह पवित्र मिट्टी है. जिसमें अलबर्ट एक्का के परिवार की आस्था हो, जो वे चाहते हैं, वही होना चाहिए, राजनीति नहीं. बेहतर है सब मिट्टी मिला कर उनके गांव में समाधि बने, ताकि परमवीर अलबर्ट एक्का के प्रति श्रद्धा और बढ़े.
प्रभात खबर को हमारा जवाब...
रतन तिर्की ने 30 नवंबर को संवाददाता सम्मेलन कर, प्रभात खबर द्वारा लायी गयी मिट्टी पर सवाल उठाकर, जांच की मांग कर यह पूछने की कोशिश की थी कि आखिर कैसे ये मान लिया जाय कि ये जो मिट्टी लाई गयी है, वो अलबर्ट एक्का की कब्र की है, इसका उत्तर उस वक्त न तो प्रभात खबर के पास था और न ही अन्य के पास...
लेकिन आज जो मिट्टी आयी उसका जवाब सभी के पास है...
वो व्यक्ति जिसने दफनाया यानी भुवन दास साफ बताया कि गोपाल चंद्र दास का जहां मकान बना है, वहीं दफनाया गया और डेढ़ महीने जो पहले मिट्टी लाई गयी थी, वो उस जगह की है ही नहीं...तो फिर ये अनुत्तरित सवाल कैसे रहा...ये तो वहीं बात हुई कि रस्सी जल गई पर बल नहीं गया...
अंततः अरे जब बलमदीना संतुष्ट है, पूरा झारखण्ड संतुष्ट है तो प्रभात खबर के चीखने – चिल्लाने से क्या होगा? उसके चीखने – चिल्लाने से झूठ सच थोड़े ही हो जायेगा...चीखते रहो भाई प्रभात खबर...
इतिहास लिखा गया...
कि 44 साल बाद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की मिट्टी 16 जनवरी 2016 को रांची लाई गयी थी, जिसका सभी ने शानदार स्वागत किया और प्रभात खबर ने परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के मिट्टी लाने के नाम पर डेढ़ माह पहले झारखण्ड की जनता की आंखों में धूल झोकने की कोशिश की थी, जिस पर परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना ने सदा के लिए विराम लगा दिया।
ये घटना उन पत्रकारों और अखबारों के लिए सबक भी है, जो खुद को सर्वश्रेष्ठ बनाने के चक्कर में गलत पर गलत करते चले जाते है...प्रभात खबर को मानना होगा कि उसने अलबर्ट एक्का की मिट्टी लाने के प्रकरण पर अपनी सारी प्रतिष्ठा पूरी तरह से गंवा चुकी है...

Saturday, January 16, 2016

प्रभात खबर की हालत पस्त, बलमदीना का अभुतपूर्व स्वागत अर्थात् अलबर्ट एक्का को हृदय से सम्मान...

आज रांची से प्रकाशित होनेवाले प्रभात खबर को छोड़कर सभी अखबारों ने हृदय को आह्लादित व भावविभोर कर देनेवाली खबर, प्रथम पृष्ठ पर छापी है। खबर है – 44 साल बाद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना, वीर शहीद की मिट्टी ला रही है। रांची के कई सामाजिक संगठनों ने उक्त मिट्टी का तहेदिल से स्वागत करने का फैसला ही नहीं लिया, बल्कि स्वागत करने के लिए निकल पड़े है, भारतीय सेना का तो जवाब ही नहीं, त्रिपुरा में जिस प्रकार से भारतीय सेना ने बलमदीना और उनके साथ गयी टीम का स्वागत किया। वह अदभुत है। बलमदीना का तो त्रिपुरा के मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने जिस प्रकार से स्वागत किया। उस स्वागत के संस्मरण से आज प्रभात खबर को छोड़कर सारे अखबार पटे हुए है, पर प्रभात खबर में इस खबर को वो तवज्जो नहीं मिली है। शायद प्रभात खबर को लगता है कि यह खबर उनके लिए उतनी कोई मायने नहीं रखती। मायने रखेंगी भी कैसे?, क्योंकि उसे लगता है कि गर ये खबर छापेंगे तो उसकी पोल खुल जायेंगी, जबकि सच्चाई ये है कि प्रभात खबर ये खबर छापे या न छापे, उसकी पोल व कलई एक तरह से झारखण्ड की समस्त जनता के सामने खुल गयी है कि वो कैसा अखबार है?
हम आपको बता दें कि जिस प्रकार का घमंड आज प्रभात खबर ने पाल रखा है, ठीक इसी प्रकार का घमंड कभी बिहार से प्रकाशित होनेवाली अखबार आर्यावर्त को भी था, पर आज आर्यावर्त कहां चला गया, सभी को पता है। हम आज दावे के साथ कह सकते है कि जिस प्रकार आर्यावर्त अखबार का सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया, ठीक इसी प्रकार प्रभात खबर का भी सूर्य अब सदा के लिए अस्त होने चला है...
हम इस अवसर पर दैनिक भास्कर अखबार का तहेदिल से स्वागत करना चाहेंगे, जिसने शुरुआत से ही प्रभात खबर की झूठी खबर और उसकी ढोंग का वो आपरेशन किया, जिस आपरेशन से प्रभात खबर की बची-खुची सम्मान भी समाप्त हो गयी। प्रभात खबर ने परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के नाम पर 3 दिसम्बर 2015 को किस प्रकार का ढोंग व पाखंड किया। उस ढोंग व पाखंड को मैंने भी उजागर किया था। इसे आप मेरे ही फेसबुक पर या www.vidrohi24.blogspot.in पर पढ़ या देख सकते है। अब तो एक तरह से स्पष्ट हो गया कि प्रभात खबर ने अमर शहीद परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के नाम पर किस प्रकार झारखण्ड के लोगों का भावनात्मक शोषण किया और अमर शहीद का अपमान किया। सवाल एक बार फिर क्या प्रभात खबर को उसके इस हरकत के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए? इस सवाल पर मेरा उत्तर होगा – इसकी सजा, उसे ईश्वर देगा, जो उसकी सजा पर निर्णय कब का सुना चुका है।
हम तहेदिल से मुख्यमंत्री रघुवर दास का भी अभिनन्दन करना चाहेंगे, जिन्होंने प्रभात खबर की बातों में न आकर, बिना देर किये, त्वरित निर्णय लिया और अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना की भावनाओं का कद्र करते हुए, एक टीम गठित कर, वो कर दिखाया कि आज दूध का दूध, पानी का पानी हो गया। ऐसे ही मुख्यमंत्री की झारखण्ड को जरुरत है, जो अखबार के इशारों पर न चलकर, स्वविवेकानुसार निर्णय करता है, यहीं नहीं अमर शहीद के परिवारों का सम्मान ही नहीं, बल्कि उसके आदेश को सर माथे लगाता है...
रघुवर दास जी, सचमुच आप प्रशंसा के पात्र है...
आपने वो कार्य कर दिखाया, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती...
आपने एक अखबार के ढोंग व पाखंड को भी उजागर कर दिया...
सही मायनों में आपने झारखण्ड का सम्मान रखा है...
उन वीर पुत्रों की मां, पत्नियां, बेटे- बेटियां आपको जरुर दुआएं देंगी, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व खो दिया...
या देश के लिए आज भी सर्वस्व खोने को तैयार हैं...

Saturday, September 26, 2015

वे पत्रकार हैं..............

वे पत्रकार हैं...
पर बहुरुपिए हैं...
आवश्यकतानुसार रुप बदलते हैं...
कभी सांसद तो कभी नेता बन जाते हैं...
टीवी पर प्रवचन भी करते हैं...
वामपंथी बनकर खुब दहाड़ते हैं...
पर वामपंथ से कोसो दूर हो...
लाखों-करोड़ों में खेलते हैं...
वेतन तो दिखावा है...
असली माल तो घर पर इनके चाहनेवाले पहुंचा देते हैं...
जिंदगी में कभी इन बदमाशों ने किसी गरीब को एक पाव दूध भी नहीं पिलाया होगा...
पर गरीबी पर आलेख खूब लिखते हैं...
इन्कम टैक्स, प्रोफेशनल टैक्स चोरी करने में उस्ताद हैं...
पर नेताओं को गरियाने, अधिकारियों को फंसाने में सबके बाप हैं...
कहीं नौकरी नहीं मिली...
बन गये पत्रकार...
पर आज तक इंसान बनने की कोशिश नहीं कर पाये हैं...
दाढ़ी बढ़ाकर, वामपंथी बनने का किस्सा था पुराना...
अब सफाचट, मंहगे वस्त्र पहन, मेकअप खूब करवाते हैं...
अंदाजे बयां, ऐसा कि पंचतंत्र का लोमड़ी भी शरमा जाय...
पता नहीं कौन-कौन से टीवी में खुब धूम मचाते हैं...
इनके छुटभैये, अन्य हिस्सों में...
सबको पानी पिलवाते हैं...
कैमरा चमका और बूम दिखाकर...
लूट-लूट, डंस जाते हैं...
अरे टीवी, अखबारों के दल्ले...
तू क्या ज्ञान बघारेगा...
जिस दिन जनता जगेगी...
तेरा नामोनिशां न रह पायेगा...
ऐसे भी तू मरा हूआ हैं...
अब तू क्या कर सकता हैं...
कहीं मरा हुआ कोई जीव कभी...
किसी का भाग्य बदल वो सकता हैं...

Monday, September 21, 2015

दैनिक भास्कर के अनुसार पुलिसकर्मियों को डांस करने का अधिकार नहीं........

19 सितम्बर को रांची से प्रकाशित दैनिक भास्कर ने प्रथम पृष्ठ पर विभिन्न शीर्षकों से कई खबरें छापी। खबर थी – ये है पुलिस की विश्वकर्मा पूजा, डांसरों संग ठुमके लगाए, नोट उड़ाए, वर्दी का मान भी नहीं रखा, वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें – www.dainikbhaskar.com आदि-आदि।
सवाल दैनिक भास्कर से
क्या जिस जमाने में ABCD या ABCD 2 जिसका अर्थ ही होता है एनीबडी कैन डांस - फिल्में बनती हो, वहां पुलिसकर्मियों पर डांस पर रोक लगाने की बात हास्यास्पद या बेमानी नहीं है।
क्या पुलिस इंसान नहीं होते, उनका दिल नहीं होता, क्या उन्हें अपनी जिंदगी में रस घोलने का अधिकार नहीं...
क्या पुलिस केवल अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए ही बने है, कानून-व्यवस्था के लिए ही बने है, क्या उन्हें अपने परिवार के साथ हंसने-खेलने या वो करने का अधिकार नहीं, जो एक पत्रकार या उनके परिवार या दैनिक भास्कर के संपादक या किसी अखबार के संपादक किया करते है...
क्या दैनिक भास्कर बता सकता है कि भारतीय फिल्मों में ज्यादातर गाने पुलिस पर ही क्यूं बने है, साथ ही जैसे –
क. फिल्म दुश्मन – बलमा सिपहिया, हाय रे तेरे तंबूक से डर लागे, लागे रे जियरा धक धक धक धक जोर से भागे, बलमा सिपहिया......
ख. फिल्म कर्तव्य – छैला बाबू, तू कैसा दिलदार निकला, चोर समझी थी, मैं थानेदार निकला, चोर समझी थी मैं थानेदार निकला......
ग. फिल्म कालका – दारोगा जी से कहियो, सिपहिया करे चोरी...
घ. फिल्म दबंग – 1. पांडे जी., 2. मुन्नी बदनाम हुई, 3. फेविकोल से
आदि बहुतेरे गाने में क्या हो रहा है, नहीं तो एक बार फिर भारतीय फिल्मों पर नजर डाले...
फिल्में भारतीय समाज की दर्पण है, ये बताती है कि आज समाज में क्या हो रहा है...पर अखबार और उसमें काम करनेवाले लोगों की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया। वे समझ रहे हैं कि वे जो सोचते हैं, वे जो लिखते हैं, वहीं ब्रह्म वाक्य है पर वे नहीं जानते कि एक घटियास्तर की सोच पूरे समाज को प्रभावित कर डालती है और फिर उससे समाज का जो नूकसान पहुंचता है, उससे समाज को उबरने में काफी वक्त लग जाता है...
हे ईश्वर, अखबार के संपादकों व मालिकों को आप सद्बुद्धि दें ताकि वे समाज का हित कर सकें...नहीं तो ये समाज को बर्बाद करके रख देंगे...

Friday, August 14, 2015

एकश्चन्द्र तमो हन्ति ना च तारा शतैरपि.......

आप 31 के हो जाएं,
या 62 के,
क्या फर्क पड़ता है राज्य अथवा देश को,
जब आपने औरों की तरह चरित्रहीनता का लबादा ओढ़ लिया,
ये सच हैं कि,
आप पहले एक स्थान से छपते थे,
पर आपका सम्मान था,
आज, अब कई जगहों से छप रहे हैं,
पर यकीन मानिये,
आपने वो मुकाम खो दिया,
जो आम जनता के दिल में,
आपके लिए विशेष तौर पर पनपा था,
हां, आपने वो मुकाम खुद बनाया था,
पर आपने उसे अपने ही हाथों से मिटाया,
आप तो ये भी कह सकते हैं
तो क्या हुआ,
हां, क्या हुआ,
पर सम्मान वाले को सम्मान की चिंता होती हैं न,
आप तो सम्मान को ही ऐसी जगह बैठा दिया,
कि बेचारी नीलाम हो गयी,
चले थे, मशाल लेकर,
अधेरे को चीरने,
पर अंधेरे ने ही आपको निगल लिया,
आपको क्या,
आप उस मां से पूछिए,
जिसने आपके लिए अपना बेटा खो दिया,
उस पत्नी से पूछिए,
जिसने आपके लिए अपना पति खो दिया,
आपके लिए तो सुभाषित की एक पंक्ति ही काफी हैं,
समझना हैं तो समझिए,
नहीं समझना हैं, तो मत समझिए,
आप तो ऐसे भी कई जगह से छपने शुरु कर दिए हैं,
वो कहते हैं न कि कनगोजर को एक पैर टूट गया,
तो क्या हुआ,
ठीक हैं भाई, ऐसा ही सोचिए,
पर जाते – जाते एक सुभाषित की पंक्ति आपके लिए,
एकश्चन्द्र तमो हन्ति ना च तारा शतैरपि.......

Wednesday, July 22, 2015

अब इन मूर्खों को कौन समझाएं............

हजारीबाग की खबर, आज चर्चा में है, सूर्खियों में हैं, जितने लोग, उतनी ही चर्चाएं, इस चर्चा से लोगों की बुद्धिमता, और यहां के संपादकों/पत्रकारों/छायाकारों के विशाल ज्ञान भंडार का भी पता चल गया है। रांची से प्रकाशित सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने एक खबर फोटो के साथ लगायी है। जिसमें राज्य की मानव संसाधन मंत्री नीरा यादव हजारीबाग के एक स्कूल में पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम के चित्र पर जीते जी माला पहना दी, श्रद्धांजलि दे दी। अखबारों ने ये भी लिख दिया कि ऐसा कार्य संवैधानिक पद पर बैठे हुए, व्यक्ति ने की हैं। उनका इशारा इस ओर है कि माननीय मानव संसाधन मंत्री नीरा यादव को ऐसा नहीं करना चाहिए था। कुछ अखबारों ने नीरा यादव के बयान भी छापे है, बयान इस प्रकार है कि जैसे लगता हो कि नीरा यादव को भी लगता हैं कि उन्होंने ऐसा कर कुछ गलत कर दिया। जब मन में पछतावा का बोध हो, तो इसे प्रायश्चित के रुप में देखा जाना चाहिए, यानी संबंधित व्यक्ति को लगता हैं कि उसने ऐसा कर गलत किया है.....
पर माननीय मानव संसाधन मंत्री नीरा यादव जी, और यहां के महान अखबारों के महान संपादकों आज मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं, शायद वो कहानी आप सुने भीं होंगे, पर आज आर्थिक उदारीकरण की बहाव में आप इतना बह गये कि आपको पता ही नहीं चल रहा हैं कि आप कहां हैं, भारत या विदेश में। इसमें आपकी भी गलती नहीं, ये सब समय का कुचक्र हैं, ये अभी चलेगा........
वो कहानी इस प्रकार है.......
एकलव्य नामक एक भील बालक था। उसे पता लगा कि द्रोणाचार्य कौरवों और पांडवों को धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे हैं। वह भील बालक द्रोणाचार्य के पास गया और उसे भी धनुर्विद्या की शिक्षा मिले, इसकी प्रार्थना की, पर द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या की शिक्षा देने से मना कर दिया। उस भील बालक एकलव्य ने संकल्प किया, कि वह जैसे भी हो, धनुर्विद्या सीखेगा। उसने वन में जाकर द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनायी और उसे गुरु मान लिया। प्रतिदिन उस प्रतिमा पर जाकर माल्यार्पण करना, उसका पूजन करना, उसका दिनचर्या बन गया, और इस प्रकार स्वयं धनुर्भ्यास करने लगा। एक दिन द्रोणाचार्य को उसके दिव्य धनुर्ज्ञान का पता चला। वे अपने शिष्यों के साथ उस भील बालक एकलब्य को ढूंढने निकले। वह रास्ते में ही मिला। द्रोणाचार्य को देख, एकलव्य ने प्रणाम किया। द्रोणाचार्य को समझते देर नहीं लगी, कि ये वहीं बालक एकलव्य हैं, जिसके धनुर्ज्ञान ने उन्हें यहां तक ले आया है। द्रोणाचार्य ने पूछा-बालक एकलव्य तुम्हारे गुरु कौन है, जिन्होंने ऐसी दिव्य शिक्षा दी। एकलव्य ने बड़ी ही विनम्रता से कहा - वो गुरु आप ही हैं महाशय। द्रोणाचार्य आश्चर्य में पड़ गये। द्रोणाचार्य ने कहा - कैसे। एकलव्य ने कहा कि मैं प्रतिदिन आपकी प्रतिमा के समक्ष, आपको प्रणाम कर, आदर देकर, मैं धनुर्भ्यास करता हूं, जिसके बल पर आज मैं धनुर्धर बन सका। द्रोणाचार्य आश्चर्य में पड़ गये और जब उन्होंने फूल-मालाओं से लदी अपनी प्रतिमा देखी, तो वे और आश्चर्य में पड़ गये। अंत में द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा के रुप में एकलव्य का अगूंठा ले लिया, पर गुरुभक्ति और सर्वश्रेष्ठ धनुर्धऱ के रुप में एकलव्य आज भी जिंदा हैं।
ये जीवंत कथा, बहुत कुछ बता देती है कि जीवित व्यक्ति को पूजा जाना चाहिए या नहीं.......गर नहीं समझ में आ रहा तो और मैं इसे विस्तार से बता देता हूं। एकलव्य जब गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा का प्रतिदिन पूजा करता था, उस वक्त द्रोणाचार्य मरे नहीं थे, वे शारीरिक वेश में सभी के सामने मौजूद थे। ये आज के संपादकों/पत्रकारों/छायाकारों को जान लेना चाहिए। साथ ही अपराधबोध से ग्रसित मानव संसाधन मंत्री को भी जान लेना चाहिए। अपने यहां गुरु को देव से भी बड़ा माना गया हैं, उच्च स्थान दिया गया है। जरा इस पँक्ति को देखिये...
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपनो, जो गोविंद दियो बताय।।
तैतरियोपनिषद् कहता है.....
मातृदेवो भव
पितृदेवो भव
गुरु देवो भव
अतिथिदेवो भव
यानी तीसरा स्थान गुरु का है, इस कारण भी हृदय में देव भाव रखकर, जिन गुरु के प्रति आप सम्मान प्रकट कर रहे है और वे गुरु जब आपके समक्ष किसी कारण से जीवित रहने के बावजूद मौजूद नहीं हो, तब भी उनके चित्र पर माल्यार्पण करना, उनकी आरती तक उतारने में कोई बुराई नहीं। हां बुराई तब है, जब वो गुरु जीवित हो या मृत, पर आपके मन में उनके प्रति श्रद्धा नहीं, ऐसे हालात में आप क्या है - मनुष्य या पशु, स्वयं समझ लीजिये। हमें लगता हैं कि सभी लोगों के मन में ये बात स्पष्ट हो गयी होगी, कि मंत्री नीरा यादव ने एपीजे अब्दुल कलाम के चित्र पर माल्यार्पण कर, या उन्हें तिलक लगाकर कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिससे उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ें। हां शर्मिंदगी उन्हें उठानी चाहिए, जो स्वयं को बहुत बड़े शंकराचार्य मानकर, अखबारों में बेवजह इस प्रकार की फोटो डालकर, बेवजह का समाचार बनाकर, पूरे प्रदेश के नागरिकों में भ्रांति फैला दी.............

Sunday, May 5, 2013

क्यों न इस मीडिया कप का नाम गुंडा कप रख दिया जाय..........................

..................और एक बार फिर पत्रकारिता की आड़ में वो सब हुआ। जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। पत्रकारों ने वो कार्य किया, जिसकी जितनी निंदा की जाय कम है। वो भी अपने संपादक के नेतृत्व में, गुंडागर्दी की। अंपायरों की धुनाई की। अंपायरों को भद्दी - भद्दी गालियां दी। अंपायरों को धमकियां दे दी। वो भी सिर्फ एक मैच जीतने के लिए। कहां जाता हैं कि क्रिकेट संभ्रांतों का खेल हैं, पर जिस प्रकार से इस क्षेत्र में येन केन प्रकारेन केवल जीत का रसास्वादन करनेवाले लोग शामिल हो रहे हैं। मैं कह सकता हूं कि ये अब गुंडों का खेल हो गया हैं। यानी अब आप जब भी क्रिकेट खेलने जाइये तो गुंडे और असामाजिक तत्वों को अपने साथ अवश्य रखे, अच्छा रहेगा कि क्रिकेटर के रुप में हाथ - पांव से मजबूत गूंडों को ही क्रिकेटर बनाइये। इससे फायदा ये रहेगा कि गर आप हार गये तो इन गुंडों से असली काम लेते हुए, आप अपनी टीम को जीत दिलवा सकते हैं।
मैं ये बाते आज खुश होकर नहीं लिख रहा। दरअसल रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन ने स्व. शशिकांत पाठक मेमोरियल क्रिकेट मीडिया कप का आयोजन किया हैं। जिसमें पत्रकारों में क्रिकेट के प्रति उऩकी सोच को रेखांकित करने, खेल भावना को पुष्ट करने का संकल्प निहित हैं, पर जिस प्रकार से इस मीडिया कप में कुछ अखबारों की टीम शामिल हो रही हैं, और सिर्फ जीत का स्वाद चखने के लिए, मैदान में उतर रही हैं, उससे यहीं लगता हैं कि शायद ही ये मैच खेल भावना को पुष्ट कर रहा हैं। 
कुछ दिन पहले प्रभात खबर के संपादक विजय पाठक ने कशिश और प्रभात खबर के बीच चल रही क्रिकेट मैच के दौरान, मैदान में जाकर अंपायर को धमकाया था और आज रही सही कसर पूरी कर दी, दैनिक भास्कर ने। दैनिक भास्कर के लोगों ने अपने संपादक के नेतृत्व में वो हरकतें की, जिसकी जितनी भर्त्सना की जाय कम हैं। मैच कोई जीते, कोई हारे। कहां जाता हैं कि क्रिकेट नहीं हारना चाहिए, पर यहां क्रिकेट हारा। आइये हम आपको बता देते है कि क्या हुआ। दरअसल हेहल के ओटीसी ग्राउंड में कशिश और दैनिक भास्कर के बीच मैच था। कशिश की टीम पहले खेलते हुए 20 ओवरों में 6 विकेट खोकर 120 रन बनाये। जवाब में दैनिक भास्कर की टीम 20 ओवर में 120 रन बनाकर आल आउट हो गयी। नियम के मुताबिक मुकाबला बराबर रहा। मैच का परिणाम सुनिश्चित करने के लिए, नियम के मुताबिक अंपायरों ने एक - एक ओवर दोनों टीम से खेलने को कहा। दैनिक भास्कर की टीम पहले खेलते हुए एक ओवर में सात रन बनाये, जवाब में कशिश की टीम को उतरना ही था कि दैनिक भास्कर की टीम अंपायरों से उलझ गयी। भद्दी - भद्दी गालियां, अपमानजनक शब्दों का प्रयोग, धक्का - मुक्की ये अंपायरों के साथ करने लगे। इनकी हरकतें ऐसी थी कि वहां मैच देख रहे लोग भी भौचक्के रह गये। वहां बच्चे भी थे, जो इनकी हरकतों को देख रहे थे। ये वे लोग थे, जो नित्य प्रतिदिन देश व समाज को देवदर्शन और चरित्र का पाठ कराते हैं, पर खुद आज वे वो कार्य कर रहे थे, वो भी अंपायरों के साथ, जिसे देख एक सामान्य आदमी शर्मिंदा हो जाये, पर इन्हें शर्म नहीं आ रही थी। जमकर तमाशा किया। वो हर हाल में जीतना चाहते थे, पर अंपायरों का कहना था नियमानुसार ही जीत - हार का फैसला होगा। अंपायरों ने जब देखा कि दैनिक भास्कर, खेलने को तैयार नहीं हैं, तो उसने कशिश को जीत दे दी, पर दैनिक भास्कर के लोगों को गुस्सा इतना था कि वो कुछ भी सुनने और मानने को तैयार नहीं थे। अंपायर के इस फैसले से वे और आग बबुला हो गये। फिर अंत में फैसला ये हुआ कि मामला रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन के पास जायेगा और रांची जिला क्रिकेट एसोसिएशन फैसला करेगी कि कौन जीता और कौन हारा।
नियम तो यहीं हैं कि अंपायर का डिसीजन अंतिम होता हैं। नियम तो ये हैं कि गर आप खेलते नहीं हैं तो दूसरी टीम को जीत करार देने का अंपायर को हक हैं, पर आप नियम का पालन नहीं करेंगे और न किसी और को करने देंगे। हमेशा जीत का ही स्वाद चखना चाहेंगे, तो ये तो साफ-साफ गुंडागर्दी हैं। इसलिए हम तो चाहेंगे कि इस मीडिया कप का नाम बदलकर गुंडा कप रख दिया जाये। जो जितना बड़ा गुंडा, जिसकी जितनी बड़ी गुंडागर्दी, उसका कप पर कब्जा। बताइयें कैसी रही..................................