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Wednesday, December 28, 2016

मेरे प्यारे बच्चों...........

मेरे प्यारे बच्चों,
तुम लोगों से मोबाइल पर बातचीत हो जाती है, तो आनन्द आ जाता है। मैं जानता हूं कि तुम विपरीत परिस्थितियों में सीमा पर तैनात हो, फिर भी हमें हंसाने और खुश रखने के लिए हंसकर-मुस्कुराकर बातें करते हो। हम जानते और महसूस करते है कि आनेवाले समय में देश की जो स्थिति है, वो बेहतर नहीं होने जा रही है, क्योंकि इस देश के 98 प्रतिशत नेता अपने देश से प्यार नहीं करते, वे तो जिनकी बातें कर राजनीति करते है, उन्हें भी धोखा देते है और सिर्फ अपनी पत्नी और प्रेमिकाओं के प्यार में डूबे होते है। ऐसे में, देश का क्या हाल होगा?, हमें समझना होगा। हम अपने प्यारे देश को इन चिरकूट नेताओं और उनके घटियास्तर के बेटे-बेटियों और उनकी पत्नियों और प्रेमिकाओं के हवाले नहीं छोड़ सकते।
मैं जानता हूं कि तुमलोग छुट्टियों के लिए संघर्ष करते हो, पर छुट्टियां नहीं मिलती, गर छुट्टियां मिलती भी है तो समय पर नहीं मिलती। कहने को सरकारें बहुत कुछ कहती है और चिरकूट टाइप के नेता कहा करते है कि सीमा पर कार्य कर रहे जवानों के लिए हम बहुत कुछ कर रहे है, पर सच्चाई हमसे नहीं छुपी है, फिर भी तुमलोग अपने देश के प्रति और अपने कार्य के प्रति ईमानदार हो, ये देखकर हमें गर्व होता है।
तुम तो जानते हो और देखे भी होगे कि यहां के लोग भी महान है, वे शहीद हो गये जवानों के बेजान शरीरों पर फूल और मालाएँ डालने के लिए भीड़ इकट्ठी कर लेते है, पर जीवित जवानों (जो सीमा पर से लौटकर अपने घर-परिवार से मिलने आ रहे होते है) उन्हें अपनी सीटों पर बैठने तक को नहीं कहते और न ही बैठने देते है, सीट रहने पर भी कई लोगों को पैर-पसार कर अनारक्षित सीटों पर हमने सोते देखा है। मैंने अपनी इन्हीं आंखों से देखा है कि कई जवान ट्रेनों में जैसे-तैसे नीचे सोकर-बैठकर पशुओं की तरह अपने घर-परिवार से मिलने जाते है। ये सूरत कभी बदलनेवाली नहीं, चाहे सरकार किसी की भी आ जाय, ये तो चरित्र और संस्कार से जुड़ा मसला है, जिसकी दवा किसी के पास नहीं।
मैं तो तुम्हें कल भी कहता था, आज भी कह रहा हूं...
योग का अर्थ है – आत्मा का परमात्मा से मिलन।
योग 4 प्रकार का होता है – कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और हठयोग।
दुनिया का सबसे बड़ा योग कर्मयोग है। भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कर्म की प्रधानता और उसके गूढ़ रहस्य के बारे में बताया है। समय मिले तो श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ लेना। गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्रीरामचरितमानस में लिखा है...
कर्म प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करहिं तस फल चाखा।।
हम जो भी आज है, वो कर्म के कारण है, आगे हम जो बनेंगे, उसमें भी कर्म की ही प्रधानता रहेगी, आज जो तुम्हें मिला है, या जो तुम्हें प्राप्त हो रहा है, उसमें तुम कहीं नहीं हो, वो सब ईश्वर कर रहा है और करा रहा है...
बस तुम्हें करना क्या है? कि स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर, कर्म करते जाना है, फल की चिंता नहीं करनी है...फल तो तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा। इसके लिए उदाहरण कई है, पर मैं अपना उदाहरण तुम्हारे समक्ष रखता हूं, क्योंकि तुम मेरे बेटे हो, तुमने हमें नजदीक से देखा है, मैं तुम्हारे सामने हूं, मेरा कर्म तुम्हारे सामने है, मैं आज कहा हूं, कल कहां था, और कल कहां रहूंगा, उसका सूक्ष्म विवेचना कर लो।
एक बात और...
हम इस दुनिया में क्यों आये है?
इसे भी जानो...
क्या हम आइएएस, आइपीएस, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, अधिकारी-कर्मचारी, चिकित्सक आदि बनने आये है? उत्तर होगा – नहीं।
तो हम दुनिया में आये है किसलिये...
क्या हम भोजन करने, मल-मूत्र परित्याग करने, बच्चे पैदा करने आये है?
अगर हम ऐसा करने आये है तो ऐसा तो पशु भी करते है।
ऐसे हालात में हम पशु से कैसे भिन्न हुए?
हमें यह मालूम होना चाहिए कि हम पशु नहीं, मनुष्य है और मनुष्य का जन्म प्रारब्ध, प्रार्थना और प्रयास के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। वर्तमान में प्रारब्ध पर तुम्हारा अधिकार नहीं। आज का कर्म, कल प्रारब्ध में बदल सकता है, तुम्हारा वर्तमान में अधिकार सिर्फ प्रार्थना और प्रयास पर है, प्रतिदिन प्रार्थना करो और जो काम मिले, उसमें ईमानदारी बरतते हुए कार्य करो। मैं जानता हूं कि तुम अपने कार्यों में ईमानदारी बरतते हो, सेवा कार्य में कोई भी ढिलाई तुम बर्दाश्त नहीं करते, फिर भी पिता हूं, बताना चाहता हूं, जब तक जीवित रहूंगा, बताता रहूंगा। पिता का यह धर्म भी है। प्रार्थना के विषय में महात्मा गांधी का उल्लेख मैं करना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि मैने ऐसी कोई प्रार्थना नहीं कि, जिस प्रार्थना को ईश्वर ने सुना नहीं हो। कमाल है महात्मा गांधी किस प्रकार की प्रार्थना करते थे कि ईश्वर ने उनकी सारी प्रार्थना को सुना। ये चिंतन का विषय है। आखिर महात्मा गांधी ने क्या कर लिया था? कि ईश्वर उनकी हर बातों को मान लेते थे। उसका सुन्दर उदाहरण है। महात्मा गांधी का सत्य से जुड़ाव। जिस दिन उन्होंने स्वयं को सत्य से जोड़ लिया, वे असाधारण हो गये। सत्य क्या है? इसका सुंदर विश्लेषण तैत्तरीयोपनिषद् में है, पर मैं तुम्हें बता देना चाहता हूं कि सत्य ही ईश्वर है। ईश्वर को खोजना, बहुत आसान है, जब तुम सत्य पर होते हो तो जान लो कि ईश्वर के सन्निकट होते हो।
मैं जिस अवस्था में हूं, वहां तुम विश्वास नहीं करोगे, प्रतिदिन ईश्वर से मुलाकात होती है, मैं उन्हें महसूस करता हूं, मेरा सारा कार्य आसान होता चला जा रहा है। इसलिए मैं तुम सब को आशीर्वाद प्रदान कर रहा हूं, मस्ती में रहो, देश की सेवा करो, आनन्दित रहो, आनन्द न तो सरकार देती है और न अधिकारी। आनन्द तो सिर्फ ईश्वर देता है। वो कहीं भी किसी रूप में दे सकता है। मैने तो कई लोगों को भौतिक सुखों में घिरे रहने के बावजूद बिलखते देखा है, और कई को भौतिक सुखों के अभाव में भी परम आनन्द की प्राप्ति में स्वयं को आनन्दित होते हुए देखा है...
सच पूछो, तो तुमसब हमारे लिए ईश्वर का वरदान हो...
आनन्द लूटो, परम आनन्द की ओर बढ़ो...
जो हमने सिखाया है, उस मार्ग पर अडिग रहना...
मत झूकना, असत्य के आगे...
सत्य पर रहना, देश तुम्हारा, हम तुम्हारे, डर किस बात की...
वेद कहता है...
ऐ मन तू मत डर, जैसे सूर्य और चंद्र नहीं डरा करते...
ऐ मन तू मत डर, जैसे दिन और रात नहीं डरा करते...
आज कुछ ज्यादा लिख दिया हूं...वार्ता के क्रम में...
क्या करें? तुमलोग पास में रहते हो...तो खूब बाते होती है, और जब दूर हो तो फेसबुक में ही आराम से लिख देता हूं...पढ़ लो, और हमें आनन्द दे दो...
अरे अब तो मुस्कुराओं, दांत दिखाओ, देखो मैं पास में ही खड़ा हूं और तुम्हें देख रहा हूं...