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Thursday, October 20, 2016

अरे चीन, पगला गया भइया................

जब से भारतीयों ने चीन और चीनियों को आर्थिक चोट पहुंचाने का संकल्प लेते हुए, अपने सपने साकार करने की कोशिश प्रारंभ की है, तभी से चीन और चीनियों की बौखलाहट सातवें आसमान पर हैं। वे भारत और भारतीयों के बारे में अनाप-शनाप बक रहे हैं। वे कोई भी ऐसी जगह नहीं छोड़ रहे, जहां वे अपनी हरकतों से भारत को नीचा दिखाने की कोशिश न कर रहे हो। दोस्त का दोस्त अपना दोस्त और दोस्त का दुश्मन अपना दुश्मन की कहावत को सार्थक करते हुए, वे पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों पर भी प्यार लूटा रहे है। वे हमारी ही बदौलत आर्थिक शक्ति को बढ़ाए है और हमें ही आंख दिखा रहे है। वे समझते है कि जैसे वे गुंडागर्दी करते हुए 1962 में हमारा बड़ा भू-भाग पर कब्जा कर लिया, तिब्बत पर कब्जा कर लिया। वैसे ही वे बार – बार करते रहेंगे और हम चुपचाप इनकी गुंडागर्दी के आगे नतमस्तक हो जायेंगे, पर उन्हें ये पता नहीं कि आज देश में एक नये युवाओं की टोली का जन्म हुआ है। वह अपने देश भारत को महाशक्ति बनाने के लिए वचनबद्ध है। उसके साथ 125 करोड़ की भारतीय आबादी भी साथ है। आज वह जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान के साथ आगे निकल पड़ा है।
चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स का पागलपन देखिये, वह हर दम हमें धौंस दिखाता है। वह समझ लिया है कि जैसे उसने तिब्बत को कब्जे में कर लिया, जैसे वह समय-समय पर अपने पड़ोसी जापान, ताइवान, विएतनाम, फिलीपीन्स को आंखे दिखाता है, उसी तरह भारत को भी आँख दिखायेगा और भारत उसके चरणों में जाकर झूक जायेगा। हम अच्छी तरह जानते है कि चीन को ये सब करने का मौका हमारी पूर्ववर्ती सरकारों ने दिया है, जिस पर अंकुश लगाने का काम वर्तमान सरकार और यहां की वीर युवाओं की टोली ने प्रारंभ किया है। हम चीन को बता देना चाहते है कि वे गीदड़भभकी दिखाना बंद करें और सच्चाई को समझे।
चीन का यह कहना कि भारत के लोग मेहनती नहीं, सिर्फ हल्ला करना जानते है, माल उससे ही खरीदेंगे तो फिर वो बौखलाहट में क्यों है?, वो हमें गाली क्यों दे रहा है?, जब वह सब कुछ जानता है। हम आपको बता देते है कि चीन समझ चुका है कि भारतीयों ने अब ये पूर्णतः समझ लिया है कि बिना चीन को उसकी औकात बताएं भारत का निर्माण हो ही नहीं सकता। तभी तो देश की करोड़ों जनता ने चीन को उसकी औकात बताने के लिए इस दीपावली में संकल्प कर लिया और चीन को उसकी औकात बतानी शुरु कर दी। पूरे भारत में एक प्रकार का चीनी सामानों के बहिष्कार का लहर है, जिस पर सारी जनता एक है।
आखिर चीनी सामानों का बहिष्कार क्यों?
1. चीन का सामान भारतीय सामानों की अपेक्षा घटिया होता है।
2. चीन के सामान से प्रदुषण का खतरा होता है।
3. चीन के खाद्य पदार्थों की विश्वसनीयता नहीं के बराबर होता है, वह किन चीजों से बनाकर भारत या अन्य देशों में भेजता है, उसकी विश्वसनीयता ही नहीं होती।
4. चीन कभी भी विश्वसनीय नहीं रहा।
5. चीन सिर्फ अपनी भलाई में ही मग्न रहता है और अपनी भलाई के लिए वह कुछ भी कर सकता है, जैसे दुसरे देश पर चढ़ाई और उसका मान-मर्दन। जैसे उसने तिब्बत पर चढ़ाई कर उस तिब्बत को सदा के लिए बर्बाद कर दिया। भारत का कई हजार वर्गमील उसने अवैध रूप से कब्जा कर रखा है।
6. चीन पाकिस्तान के उन आतंकी समूहों की सराहना और बचाव करता है, जो भारत में आतंक फैलाता है।
7. चीन पाकिस्तान को हर मोर्चें पर मदद करता है, जिससे भारत को नुकसान पहुंचने की शत प्रतिशत गारंटी रहती है।
8. चीन के सैनिक हमेशा भारतीय सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं।
चीन के समर्थक – भारत में चीन के भारत विरोधी और उसकी आक्रमणकारी गतिविधियों का समर्थन यहां के वामपंथी खुलकर करते है। वे अमरीकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगाते है, पर चीन के साम्राज्यवादी नीतियों को खुलकर समर्थन करते है, कई वामपंथी कार्यालयों में चीनी साम्यवादी नेताओं के चित्र और उन पर लदे फूल मालाएं आप स्वयं जा कर देख सकते है।
चीन अब जान चुका है कि भारत और भारत के लोग जाग चुके है, इसलिए वह अपनी भड़ास अब भारत और भारतीयों को गाली देकर निकाल रहा है। बस भारतीय सिर्फ इतना ही करें, अपने लिये संकल्प को पूरा करने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। जहां भी देखे, चीनी सामान उसका बहिष्कार करें। सरकार और यहां के नेता मजबूर हो सकते है, पर हम मजबूर नहीं, चीन को हम औकात बता कर रहेंगे, भारत को आर्थिक महाशक्ति बना कर रहेंगे। हम अपने पैसे से चीन की ताकत नहीं बल्कि चीन की ताकत को मटियामेट करेंगे और अपने जवानों को कहेंगे कि देखों हम तुम्हारे साथ है। डटे रहो सीमा पर। चीन को जवाब दो। हम सब मिलकर भारत की कायाकल्प करेंगे। चीन मुर्दाबाद। उसकी साम्राज्यवादी नीतियां मुर्दाबाद। उसकी भारत विरोधी गतिविधियां मुर्दाबाद। आंतक समर्थक पाकिस्तान समर्थक चीन और चीन की नीतियां मुर्दाबाद। मुर्दाबाद वे अखबार, वे नेता जो भारत में ही रहकर चीन की स्तुति गाते है, मेरा इशारा किस ओर है, आप समझ गये होंगे।

Monday, June 17, 2013

घबराइये नहीं - इस बार बारिश के नक्षत्र दगा नहीं देंगे, खूब बरसेंगे.......................

घबराइये नहीं - इस बार बारिश के नक्षत्र दगा नहीं देंगे, खूब बरसेंगे.......................
जी हां। संदेश तो कुछ इसी प्रकार के दे रहे हैं, ये नक्षत्र। भारतीय मणीषियों ने नक्षत्रों के आधार पर, उनका विश्लेषण करते हुए पूर्व में भविष्यवाणियां किया करते थे, और ये बाते सत्य साबित होती थी। पिछले कई वर्षों से मैंने भी महसूस किया कि ऐसा सहीं हैं। जब - जब नक्षत्रों ने ये संदेश दिया कि इस बार बारिश नहीं होगी तो हुआ भी ऐसा ही बारिश नहीं हुई। जब नक्षत्रों ने सामान्य अथवा मूसलाधार बारिश के संकेत दिये तो उस साल भी इसी प्रकार की घटना घटित हुई। इस बार ये नक्षत्र क्या कह रहे हैं। इसे देखना वर्तमान में जरुरी हैं। बारिश के कई नक्षत्र हैं जो विभिन्न प्रकार से संदेश दे रहे हैं। ये कह रहे हैं कि भारतीय जनता घबराये नहीं, वैज्ञानिक कुछ भी कहें, नक्षत्र इस बार दगा नही देंगे। केवल एक ही नक्षत्र आश्लेषा मे्ं अल्पवृष्टि के संकेत हैं। आइये देखते हैं, नक्षत्रों के दृष्टिकोण में मानसून...................
क. आर्द्रा - 22 जून को दिन 11.41 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
ख. पुनर्वसु - 6 जुलाई को दिन 1.16 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
ग. पुष्य - 20 जूलाई को दिन 2.43 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
घ. आश्लेषा - 3 अगस्त को दिन 2.03 से प्रारंभ - अल्प वृष्टि
ड. मघा - 17 अगस्त को दिन 1.51 से प्रारंभ - सामान्य वृष्टि
च. पूर्वा फाल्गुन - 31 अगस्त को दिन 10.33 से प्रारंभ - वार्युवृष्टिश्च
छ. उत्तरा फाल्गुन - 13 सितम्बर को रा. 4.42 से प्रारंभ - वार्युवृष्टिश्च
ज. हस्त - 27 सितम्बर को रा. 8.06 से प्रारंभ - वार्युवृष्टिश्च
झ. चित्रा - 11 अक्टूबर को दि. 8.35 से प्रांरभ - वार्युवृष्टिश्च
यानी साफ संकेत हैं कि एक नक्षत्र को छोड़, सभी नक्षत्रों से सामान्य से अधिक बारिश होने के संकेत हैं, अंतिम के चार नक्षत्र जैंसे पूर्वा फाल्गुन, उत्तरा फाल्गुन, हस्त और चित्रा तो आँधी-पानी के साथ बरसने के संकेत दे रहे हैं यानी झमाझम बरसेंगे नक्षत्र और लहलायेंगी फसलें................

Wednesday, March 27, 2013

होली तो प्यार बांटने का नाम हैं..........................

फिर होली आ गयी। लोग फिर रंग-गुलाल अपने घरों में लायेंगे। एक दूसरे को लगायेंगे। होली हैं....कहकर शोर मचायेंगे। पुए-पकवान खायेंगे। आजकल तो एक नया फैशन भी चला हैं। कई घरों में मुर्गे-मुर्गियां हलाक होंगे। बकरें भी काट दियें जायेंगे, लोग होली हैं..........कहकर इठलायेंगे, बलखायेंगे और लीजिये मन गयी होली...................। क्या सचमुच होली इसी का नाम हैं। बचपन से लेकर आजतक होली के इस रंग ने मेरे मन को व्यथित किया हैं जिसे मैंने कभी स्वीकार ही नहीं किया। क्योंकि भारतीय वांगमय तो सदियों से यहीं कहता आया हैं...........................
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होली तो प्यार बांटने का नाम हैं
होली तो एक दूसरे को गले लगाने का नाम हैं
होली तो स्वीकार्यता का दूसरा नाम हैं
होली तो एक दूसरे में समा जाने का नाम हैं
पर शायद ही ऐसे भाव अब होली के दौरान, देखने को मिलते हो। एक दिन, एक बच्चे ने मेरे पास आकर कहा - भैया, हम होली खेलेंगे। मैंने कहा - हां हां, खेलो होली। वो अपने दोनों नन्हीं-नन्ही हाथों में लाल रंग लगाकर आया और मेरे गालों पर लगाकर, खिलखिलाकर होली हैं-होली हैं, कहता हुआ भाग खड़ा हुआ। मैं कुर्सी से उठा और अचानक आइने के पास पहुंच अपने चेहरे को देखा, तो मुस्कुराएं बिना नहीं रह सका। बच्चे की छोटी छोटी अंगूलियों और हथेलियों से चेहरे पर लगे रंगों के भाव कुछ कह रहे थे।
वाराणसी के विद्वान प्रो. सुधाकर दीक्षित आजकल एक - दो वर्षो से रांची में रह रहे हैं। उनसे कुछ दिन पहले होली क्यों विषय पर लंबी बातचीत की। बातचीत के दौरान, उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारतीय पर्व त्योहार ऐसे ही नये मनाये जाते। ये पर्व त्यौहार केवल खाने-पीने तक ही सिमटे नहीं रहते, बल्कि ये एक सुंदर संदेश भी देते हैं। ये कहकर कि इन संदेशों को आत्मसात करोगे तभी आप पर्व - त्यौहारों के परम आनन्द कौ प्राप्त कर सकते हो, अन्यथा भौतिक आनन्द को ही गर आनन्द आप समझते हो तो फिर कोई बात ही नहीं।
भारतीय वांग्मय कहता हैं कि होली, वहीं मनाता हैं, जो अपने से दीन-हीन अवस्था में रह रहे, अपने समाज के लोगों को आज के दिन आत्मसात करता हैं। जो समाज व देश के प्रति प्रेम का रंग अपने हृदय में भरता हैं। जिसके हृदय में लेशमात्र भी कटुता का भाव प्रकृति व सत्य के प्रति नहीं रहता। जरा हिरण्यकशिपु को देखिये वो सत्य के प्रतीक प्रह्लाद को मिटा देना चाहता हैं। वो इसके लिए अपनी बहन होलिका का सहारा भी लेता हैं। इसी दौरान होलिका जलकर मर भी जाती हैं, फिर भी उसका दंभ नहीं मिटता, पर प्रह्लाद तो प्रह्लाद हैं, उसके कण-कण में आह्लाद हैं, भला, उसके आह्लाद को कौन मिटा सकता हैं। सत्य अंततः जीतता हैं, क्या इस सत्यरुपी रंग को असत्य कभी मिटा सकता हैं। उत्तर होगा - नहीं। तब ऐसे हालात में असत्य को धारण कर, राक्षसी प्रवृत्तियां अपना कर लोग किस प्रकार का आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।
एक उदाहरण, जो फिलहाल होली के दौरान ही दीख रहा हैं। मार्च का महीना हैं। संभवतः 31 मार्च को क्लोजिंग डेट भी होता हैं। मैंने कई लोगों को देखा हैं, अभी से ही दिमाग लगा रहे हैं कि इस बार आयकर के रुप में उनके कमाई की राशि नहीं कटे। असत्य का सहारा भी उन्होंने जमकर लिया हैं। संभव हैं, ये पकड़े भी नहीं जायेंगे, पर हृदय के किसी कोने में बैठा परमेश्वर अथवा सत्य, उसे इस गलत कार्यों के लिए, क्षमा करेगा या वो इस गलत कार्यों में संलिप्तता होने के बावजूद आनन्द की प्राप्ति कर पायेंगे। उत्तर होगा - नहीं। क्योंकि आनन्द तो सिर्फ सत्य के पास होता हैं। असत्य को आनन्द कहां। जो देश के लिए अपनी आय की राशि का एक हिस्सा ईमानदारी से नहीं दे सकता। वो देश के लिए तन और मन को कैसे उत्सर्ग करेगा। जो ऐसा नहीं कर पायेगा। वो होली कैसे मनायेगा। होली तो मनाया कबीर ने, ये कहकर..............
मन लागा मेरा यार फकीरी में,
जो सुख पाउं राम भजन में,
वो सुख नाहीं अमीरी में,
भला बुरा सबका सुन लीजै
कर गुजरान,गरीबी में
मन लागा, मेरा यार फकीरी में..................
अर्थात, जो सत्य को धारण करेगा, उसे ही सुख प्राप्त होगा, उसे ही राम मिलेंगे, असत्य को प्राप्त कर न तो राम मिलेंगे और न ही कोई परम आनन्द को प्राप्त कर पायेगा। परम आनन्द को प्राप्त करने का नाम ही होली हैं। स्वयं को परमात्मा के अधीन कर, सत्य का आश्रय ले, सब को परम आनन्द देने का नाम ही होली हैं................................

Friday, November 9, 2012

मेरे राम को कुछ भी बोलो, मेरे राम को कोई फर्क नहीं पड़ता...........................

मेरे राम को कुछ भी बोलो, मेरे राम को कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही फर्क पड़ता हैं, राम पर विश्वास करनेवालों को, क्योंकि उनके लिए राम तो राम हैं, जिसके बिना उनका जीवन कभी सफल हो ही नहीं सकता और न ही ये दुनिया उनके बिना चल ही सकती हैं। जो राम पर विश्वास करते हैं, उनका विश्वास किसी जेठमलानी के बयान का मोहताज नहीं होता। दुनिया में राम जेठमलानी कोई पहले व्यक्ति नहीं, जिसने राम को बुरा कहा। ऐसे लोगों की संख्या तो बहुतायत में हैं, जिनकी दिन की शुरुआत ही राम की निंदा और रात का समापन राम की निंदा से ही होता हैं। ऐसे भी राम को समाप्त करने का बीड़ा कई बार अनेक राजनीतिक दलों और अन्यान्य धार्मिक व कई सामाजिक संगठनों ने किया हैं, पर राम को क्या फर्क पड़ा। वो तो आज भी वाल्मीकि के श्लोंकों में, मीरा और रविदास के भजन में, कबीर के दोहों में, तुलसी के चौपाईयों में और देश-विदेश के अनन्य कवियों के कंठाग्रों में शोभायमान हैं। राम तो ऐसे हैं कि वे अपने निंदकों और अपने चाहनेवालों पर भी समभाव रखते हैं, नहीं तो वनवास से लौटने के बाद वे कैकयी और मंथरा पर अपना असीम अनुराग नहीं लूटाते। ऐसे भी राम को जानने के लिए, आपको राम जेठमलानी जैसे नेताओं के पास जाना पड़े तो ये आपकी मूर्खता हैं, राम को जानने के लिए आपको वाल्मीकि, मीरा, रविदास, कबीर और तुलसी का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा।
जरा रविदास जी को देखिये, क्या कहते हैं...........................
जब रामनाम कहि गावैगा
तब भेद अभेद समावैगा
जो सुख हवैं या रस के परसे
सो सुखका कहि गावैगा
जरा रविदास जी की परम शिष्या श्रीकृष्ण की अनन्य भक्तवत्सला मीरा क्या कहती हैं.............
पायोजी मैंने राम रतन धन पायो
वस्तु अमोल दियोजी मेरे सदगुरु, किरपा कर अपनायो, पायोजी मैंने.....
खरच न खूटै, चोर न लूटे, दिन - दिन बढ़त सवायो, पायो मैंने................
कबीर के राम को देखिये.......................
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूढें बन माहि
ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनिया दिखैं नाहि
और तुलसी का तो जवाब नहीं, उन्होंने तो साफ कह दिया
नाना भांति राम अवतारा।
रामायण सत कोटि अपारा।।
ये महान संतों के उद्गार बताते हैं कि राम क्या हैं। राम को व्यक्ति विशेष मानना, और उन्हें व्यक्ति विशेष मानकर, अपने ढंग से उन पर प्रतिक्रिया दे देना, आपकी मजबूरी हो सकती हैं पर इससे राम को क्या.........। पर जिन्होंने राम को जान लिया, वे अनन्त सुख को प्राप्त कर, अपना और इस राष्ट्र दोनों का भला किया। राम का जीवन ही जीने का आधार हैं, अनन्त व परमसुख प्राप्त करने के लिए, राम को तो जानना ही होगा, पर राम को आप जानेंगे कैसे।
वेद कहता हैं, जीवेद शरदः शतम्। सौ वर्ष तक जियो, पर सौ वर्षों तक कैसे जियोगे। धन कमाने की लालसा तो आपको धनपशु बना दी हैं, और इसी धन में आप सुख प्राप्त करने की जिजीविषा लेकर स्वयं को समाप्त कर लेते हो, और कहते हो कि राम को मैं नहीं मानता, ये तो वहीं बात हुई कि कोई मूर्ख कहें कि मैं सूरज के अस्तित्व को नहीं मानता, मैं दिन व रात के अस्तित्व को नहीं मानता, मैं हवा को भी नहीं मानता। तो इससे सूरज, दिन, रात व हवा को क्या फर्क पड़ता हैं, क्या वो अपना काम करना बंद कर देगी या उक्त व्यक्ति से क्रोधित होकर उसके साथ बुरा बर्ताव करेगी।
मैं तो पहले भी कहा था, आज भी कह रहा हूं कि कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या को होनेवाली दीपावली सिर्फ यहीं संदेश देती हैं कि हे प्रकाश की कामना करनेवाले मनुष्यों, तुम सत्य मार्ग पर चलों। जैसे ही तुम सत्यमार्ग पर चलोगे, राम तुम्हारे साथ होंगे। जब राम तुम्हारे साथ होंगे तो तुम मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाओगे और एक मर्यादा पुरुषोत्तम व्यक्ति के लिए, संसार में कोई भी कार्य असंभव नहीं। ऐसे में एक भारतीय के लिए, जिसके लिए कोई कार्य असंभव नहीं हैं, उस भारतीय और भारत की ऐसी दशा क्यो। सभी भ्रष्टाचार - भ्रष्टाचार चिल्ला रहे हैं, एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं, पर सच यहीं हैं कि सभी किसी न किसी प्रकार से अपने आचरण को भ्रष्ट जरुर किये हुए हैं, ऐसे में सत्यमार्ग पर चलना और स्वयं राम बनना दोनों असंभव है। सच यहीं हैं कि अपने देश से राम बहुत दूर चले गये हैं। जरुरत हैं, उस राम को, चरित्र रुपी राम को अपने अंदर बैठाने की ताकि हम हर दिन दीपावली मना सकें ताकि हम हमेशा स्वयं को प्रकाशित कर सकें। उस वक्त हमें ये बोलने की आवश्यकता ही न पड़े कि हमें असत्य से सत्य की और अंधकार से प्रकाश की ओर या मृत्यु से अमरता की ओर चले, बल्कि हम इसे अपने कर्म द्वारा सत्यापित कर रहे होंगे।

Thursday, June 16, 2011

नक्षत्रों की दृष्टिकोण में मानसून........


पूरे देश में मानसून की चर्चा हैं, वैज्ञानिकों की मानें तो इस बार मानसून अच्छा रहेगा। भारतीय विद्वानों का समूह जो नक्षत्रों की भाषा समझता और जानता है, उसका भी मानना हैं कि इस बार नक्षत्र चमत्कार दिखायेंगे, पिछली बार इन नक्षत्रों ने भी दगा दिया था, पर इस बार ज्यादातर नक्षत्रों का समूह अच्छी वृष्टि की संकेत दे रहे हैं, आखिर ये नक्षत्र कब आयेंगे और इनका क्या लक्षण होगा। इस पर हमें विचार करना चाहिए। आज भले ही, आप मौसम विभाग के चक्कर काट लें और मौसम विभाग जिस प्रकार से आपको अपनी बात कह दें, आप उसे मानने को तैयार हो जायेंगे, ये कहकर कि, उसका वैज्ञानिक आधार हैं, पर आज से लेकर सैकड़ों साल पहले, ऐसी बात नहीं थी। किसानों और मानसून के बारें में जानने की इच्छा रखनेवाले लोगों का समूह, पंडितों और विद्वानों के पास पहुंचता था कि आखिर इस बार नक्षत्र क्या संकेत दे रहे हैं। पंडितों और विद्वानों का समूह इन नक्षत्रों की दशा और दिशा देखकर बता देता कि इस बार मानसून दगा देगा या अच्छी बारिश होगी, ये तो रही कल की बात पर, आज भी कमोवेश स्थिति यहीं हैं, जिन्हें थोड़ा बहुत भी नक्षत्रों की जानकारी है, वे पंडितों से पूछ ही देते हैं कि आखिर इस बार मानसून अथवा बारिश कैसी रहेगी। हमनें भी इन पंडितों से पूछने की कोशिश की है, उनका कहना हैं कि इस बार बारिश अच्छी होगी और उसके संकेत नक्षत्र दे चुके हैं। एक दो नक्षत्रों को छोड़, बाकी सारे नक्षत्र इस बार अच्छी वृष्टि के संकेत दे रहे है।
क. आद्रा -- 22 जून की रात 9.11 से प्रारंभ -- सुवृष्टि योग
ख. पुनर्वसु -- 6 जुलाई की रात 10.45 से प्रारंभ -- सामान्यवृष्टि योग
ग. पुष्य -- 20 जुलाई की रात 12.15 से प्रारंभ -- सुवृष्टि योग
घ. आश्लेषा –- 3 अगस्त की रात 12.53 से प्रारंभ -- सृवृष्टि योग
ङ. मघा – 17 अगस्त की रात 12.09 से प्रारंभ -- सामान्य वृष्टि
च. पूर्वाफाल्गुन - 31 अगस्त से की रात 9.30 से प्रारंभ -- सुवृष्टि योग
छ. उत्तराफाल्गुन - 14 सितम्बर को दिन में 3.59 से प्रारंभ – सुवृष्टि योग
ज. ह्स्त –- 28सितम्बर को प्रातः 7.15 से प्रारंभ –- स्वल्पवृष्टि योग
झ. चित्रा --- 11 अक्टूबर को रात्रि 7.38 से प्रारंभ –- स्वल्पवृष्टि योग

यानी हस्त जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा में हथिया नक्षत्र कहते हैं, इस बार इस नक्षत्र में भारी बारिश या सामान्य बारिश की अपेक्षा कम बारिश होने की संभावना हैं, जबकि लोग बताते है कि हथिया की बारिश में तबाही हो जाया करती थी। इसी प्रकार उत्तरा नक्षत्र को कनवा नक्षत्र कहकर भी लोग संबोधित करते है। हमारे जनकवियों ने भी बारिश के बारे में खुलकर विचार दिया हैं और उनके विचार आज भी प्रासंगिक है......................... घाघा कवि को ले लीजिए, उन्होंने कहा हैं कि---
रेवती रवे मृगशिरा तपे,
कछु दिन आदरा जाये,
कहे घाघा जिन से,
श्वान भात न खाये.
यानी जिस कालखंड में रेवती रव गया और मृगशिरा नक्षत्र तप गया समझ लीजिये आदरा ऐसा झमझमाएगा और फसल इतनी अच्छी होगी कि कौआ भी अघा जायेगा। ये है हमारी संस्कृति और मानसून की सांकेतिक दृष्टिकोण और हमारे पूर्वजों की भाषा.

Sunday, August 15, 2010

स्वतंत्रता के मायने...


भारतीय स्वतंत्रता दिवस की धूम हैं, पर स्वतंत्रता के क्या मायने हैं, शायद हम आज तक सीख नहीं पाये हैं और न ही सीखने की कोशिश की। हमारी केन्द्र और राज्य की सरकार का भी ध्यान इस ओर नहीं गया। जो काम अंग्रेज अपनी शासन के दौरान नहीं कर सकें, आजादी के बाद उन अंग्रेजों के सपनों को हमने अपने हाथों से पूरा करने का, ऐसा लगता हैं कि हमने मन बना लिया हैं। हमें आज की परिस्थितियों को देख लगता हैं कि गर अंग्रेज नहीं होते, तो हम शायद सभ्य भी नहीं बन पाते, क्योंकि आज भारतीयों में होड़ लगी हैं कि कौन सर्वाधिक भोगवादी प्रवृत्तियों को अपनाने में सबसे आगे हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन के समय हमारे नेता व जनता दोनों इस बातों को लेकर सजग थे कि वे किसी भी हालात में विदेशी वस्तुओं को स्वीकार नहीं करेंगे, पर आज क्या हैं, खुद सरकार ही भारत को विदेशी वस्तुओं का बाजार बना दी हैं और जनता इसमें डूबकी लगाते जा रही हैं, आज हमारा पड़ोसी चीन, पूरे भारत में अपनी वस्तुओं को ठेल रखा हैं, इन घटिया चीनी वस्तुओं को भारतीय खरीद कर स्वयं को धन्य धन्य कर रहे हैं, और भारतीय लघु उद्योग दम तोड़ता चला जा रहा हैं। शायद आज की पीढ़ी को पता नहीं या बताने की कोशिश नहीं की गयी कि आखिर पूर्व में अंग्रेजों ने भारत को अपना उपनिवेश क्यों बनाया।
इंगलैंड में औद्योगिक क्रांति होने के बाद अंग्रेजों को एक बाजार की जरुरत थी, जहां वे अपने सामानों को आराम से बेच सकें, और इसके लिए जरुरत थी, दूसरे देशों को अपने हाथों में लेने की, हमारी अंदरुनी कमजोरी, अलगाववाद की प्रवृत्ति का उन्होंने फायदा उठाया और एक एक कर रियासतों को उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया, पर जैसे ही हमारे नेताओं को इसका आभास हुआ, उन्होंने जनता तक अपनी बात पहुंचायी और देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन उसके बाद की स्थिति क्या हैं। जिस गांधी ने ग्राम स्वराज्य की बात कहीं थी, लघु कुटीर उद्योग के माध्यम से देश को नयी दिशा देने की बात कहीं थी, एक बहुत बड़ी जनसंख्या को इसके द्वारा ही रोजगार देकर आत्मनिर्भर बनाया जा सकता था। आजादी के बाद महात्मा गांधी के इन सपनों को खुद कांग्रेस ने ही हत्या कर दी और भारत को पश्चिमी ढर्रें पर ले चलने की ठान ली। उसके क्या परिणाम हुए, जरा खुद देखिये भारत की क्या स्थिति हैं, दस प्रतिशत लोग अमीर बन गये और 90 प्रतिशत लोग इन दस प्रतिशत लोगों के आगे हाथ फैलाकर भीख मांगने को विवश हैं।
देश की संसद पर करोड़पतियों और कारपोरेट जगत् के लोगों ने कब्जा जमा लिया हैं, जो विदेशियों के आगे कठपुतली बने हुए हैं। चीन हमारे हजारों वर्ग मील भू –भाग को कब्जा जमा कर बैठा हैं, बांगलादेश जिसे हमने ही पैदा किया, उसके आतंकी हमारे देश के सभी भागों में तरह तरह के हथकंडे अपनाकर हमे तबाह कर रहे हैं, बर्मा, नेपाल, मालदीव, श्रीलंका जैसे देश हमारी बात मानने को तैयार नहीं है, बल्कि चीन से इनकी दोस्ती कुछ ज्यादा ही कारगर हो रही हैं, पाकिस्तान की तो बात ही छोड़ दीजिये, इनकी तो पैदाइश ही भारत की छाती पर मूंग दलने के लिए हुई हैं, इसलिए इनसे दोस्ती की बात ही बेमानी हैं, या सुधरेंगे, कहना मुश्किल हैं।
पूरा देश भ्रष्टाचारियों के कब्जे में हैं, खेत-खलिहानों, कल – कारखानों में काम करनेवाले खेतिहर मजदूरों की फटेहाल जिंदगी पर किसी का ध्यान नहीं हैं, पर अपना पेट भरने के लिए सांसदों और विधायकों की टोली पांच गुणा से भी अधिक वेतन बढ़ाने को तैयार हैं। देश की जनता पर इसका अतिरिक्त बोझ बढ़ता हैं तो इनकी बला से। लोकतंत्र के चौथा स्तंभ कहेजाने वाले मीडिया का भी बूरा हाल हैं, वे राजनीतिज्ञों के चंवर डूलाने और उनकी चाटुकारिता में लगे हैं. ऐसे में देश का क्या हाल होगा, समझा जा सकता हैं।
देश की स्थिति ये हैं कि चुनाव के वक्त अपनी आर्थिक स्थिति को दर्शानेवाले व्यक्ति ये कहता हैं कि उसके पास मात्र 15 लाख की चल अचल संपत्ति हैं, विधायक बनते ही, बंदर की तरह उछलकूद मचाते हुए, जब मंत्री बन जाता हैं तो इसी दौरान अपनी बेटी की शादी में केवल सजावट में चार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर बैठता हैं, आखिर ये सब कैसे हो जाता हैं। कोई व्यक्ति विधायक और सांसद बनते ही, इतना धनाढ्य कैसे हो जाता हैं क्या उसे कूबेर के घर नौकरी लग जाती हैं अथवा उसे अलादीन का चिराग मिल जाता हैं। सच्चाई ये हैं कि जब कोई व्यक्ति अपना चरित्र ही बेच दें तो उसे क्या कहेंगे। इन्हें गांधी और शास्त्री बनना नहीं हैं, इन्हें तो पेटू बनना हैं, इसलिए पेटू बनते जा रहे हैं और अपने पेट में देश की करोड़ों जनता का धन जमा करते जा रहे हैं पर शायद इन्हें नहीं पता कि कबीर ने इन्हीं जैसे लोगों के बारे में लिखा हैं कि -------
निर्बल को न सताईये, जाकी मोटी हाय
मरे मृग के छाल से लौह भस्म हो जाय।।
पर मैं सोचता हूं कि शायद अब कबीर की ये पंक्ति भी फेल हो जा रही हैं क्योंकि आजादी के पूर्व में किसी अंग्रेज को न्यायालय के द्वारा सजा मिली हो, हमने नहीं देखा और न सुना। जिस अंग्रेज जनरल डायर ने सन् 1919 में जालियावाला बाग हत्याकांड कराया, वो अंग्रेज को भी सजा नहीं मिली, ये अलग बात हैं कि उसे उसकी सजा देश के एक युवा उधम सिंह ने इंग्लैंड जाकर, दी। पर क्या कोई बता सकता है कि आजादी के बाद किस न्यायालय ने यहां के किसी भी राजनीतिज्ञ को सजा दी, हो और वो सजा मुकर्रर हो जाने के बाद किसी राजनीतिज्ञ ने अपनी पूरा सजा जेल में काटी हो। अरे जनाब, यहां तो न्यायालय भी उसे सजा देती हैं जिनकी कहीं कोई औकात नहीं हैं। ऐसे भी गोस्वामी तुलसीदास ने भी श्रीरामचरितमानस में एक तरह से कह ही दिया हैं कि ---
समरथ के नहि दोषु गोसाई
सामर्थ्यवानों के दोष नहीं देखे जाते, शायद इसी ढरें पर अपना देश चल रहा हैं, और अपने ऋषियों और मणीषियों को मानमर्दन कर गौरवान्वित हो रहा हैं। हम अब ज्यादा कुछ नहीं कहेंगें। हाल ही में चीन ने अपने यहां ओलपिंक कराया और दक्षिण अफ्रीका ने अपने यहां फुटबाल मैच कराये, दोनों ने अपने देश का मान बढ़ाया, अपने यहां राष्ट्रमंडल खेल होनेवाले हैं, और अपने देश का सम्मान किस प्रकार यहां के राजनीतिज्ञ और प्रशासनिक अधिकार, दूसरे देशों के सामने उछाल रहे हैं, इस खेल में किस प्रकार भ्रष्टाचार का बोलबाला हैं, कैसे भारत की नाक कट रही हैं, शायद हम भारतीयों को नहीं हैं, शायद हमने स्वीकार कर लिया हैं कि हमारी नियति ही यहीं हैं, कि हम नहीं सुधरेंगे। पूर्व में जो हजारों वर्षों तक गुलाम रहने की प्रवृत्ति हमारी हैं, उससे कभी छुटकारा नहीं पायेंगे, क्योंकि हमारी जिंदगी क्या हैं, जब तक रहो मस्ती में रहो, खाओ-पीओ मौज करों, मरने के बाद कोई देखने थोड़े ही आ रहा हैं, मूर्ख हैं वे जो देश और समाज के लिए सोचते हैं, हमारी तो पैदाईश सिर्फ राजभोगने के लिए हुई हैं, चाहे गुलामी का मार्ग ही क्यों न हो।