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Monday, December 30, 2013

हे रामचंद्र कह गये सिया से.............

21वीं सदीं चल रही हैं। माना जाता हैं कि 21वीं सदी भारत की हैं। इस सदी में भारत अपने शीर्ष पर होगा। कभी – कभी अच्छी खबरें अखबारों में पढ़ता हूं अथवा टीवी चैनलों के माध्यम से सुनता हूं तो लगता हैं कि सचमुच देश उसी ओर बढ़ रहा हैं, पर जब कभी ऐसी खबरों पर नजर जाती हैं, जिससे देश रसातल में जा रहा होता हैं तो हमें ही क्या, कई भारतीयों को निराशा हाथ लगती हैं कि क्या ऐसे में भारत आगे बढ़ेगा, या यूं ही ख्बाब, ख्बाब ही रह जायेंगे। इन दिनों भारतीय चैनलों और अखबारों में एक से एक बाबाओं और संतों की पोल खुल रही हैं। ऐसे लोगों की पोल खुलनी भी चाहिए। ताकि पता चल सकें कि इन ढोंगियों ने देश का कितना नुकसान किया हैं और वे अपनी लीलाओं से देश को किस प्रकार गर्त में ले जा रहे हैं, पर क्या इसका असर भारत की सामान्य जनता पर पड़ता हैं, या फिर वे वहीं करते हैं, जो उन्हें करना होता हैं। झूठी मन की शांति के लिए, वे ढोंगियों के आगे सर झूकाते हैं और स्वयं के साथ – साथ देश को भी गर्त में ले जाते हैं। हाल ही में एक फिल्म आयी ‘ओह माई गॉड” हमें लगा कि इस फिल्म का असर दीखेगा, पर फिल्म आयी और चली गयी। जैसे एक सामान्य बच्चा, स्कूल शिक्षक या अपने से बड़ों की अच्छी बातों को एक कान से सुनता है और दुसरी कान से निकाल देता हैं, वहीं बात यहां आमजन के साथ देखने को मिली। इस फिल्म में सभी धर्माचार्यों और पांखंडियों की पोल खोलकर रख दी गयी थी, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यूं न हो, पर मजाल हैं कि हमारे देश के लोगों के कानों पर जूं रेंगी हो। शायद हमारे देश के लोगों के उपर सन् 1970 में बनी फिल्म गोपी का वो सुपरहिट गीत कुछ ज्यादा ही सर चढ़ कर बोल रहा हैं, जिसमें दिलीप कुमार पर्दे पर गा रहे होते हैं। गीत के बोल थे..................
सुनो सिया, कलयुग में काला धन और काले मन होंगे, काले मन होंगे।
चोर, उचक्के नगर सेठ और प्रभु भ्रक्त निर्धन होंगे, निर्धन होंगे।
जो होगा, लोभी और भोगी – 2
वो जोगी कहलायेगा
हंस चुगेगा, दाना तुनका, कौवा मोती खायेगा,
हे रामचंद्र कह गये सिया से...................
अगर इस गीत को ध्यान पूर्वक देखे तो साफ पता चलेगा कि इस गीत के एक – एक बोल आज सही हो रहे है। तथाकथित संतों की हरकते तो साफ बता रही हैं कि वे इस गीत को अक्षरशः सिद्ध करने में ऐड़ी चोटी एक किये हुए हैं। कौन तथाकथित संत कितना धन इक्टठा कर रहा हैं, इसकी अँधी दौड़ चल रही हैं, वे एक दूसरे को पटखनी देने में लगे हैं और यहां की जनता, अँधभक्ति और झूठी सुख शांति के लिए, इनके धनलोलुपता को और बढा रही हैं। कोई तथाकथित संत कृपा लूटा रहा हैं, तो कोई सपने में सोना का खान ढूंढ रहा हैं तो कोई स्वयं गुरु बन कर अपने चेलों को ये कह रहा हैं कि हमारे लिए तुम धरना प्रदर्शन करों ताकि हम जेल से छूट जाये, कोई व्यभिचार में फंस रहा हैं तो कोई मुक्तकंठ से अपने व्यापार को आगे बढ़ाने में लगा हैं। भला संतों का यहीं काम हैं क्या।
तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस को देखिए, अरण्यकांड में श्रीराम और नारद संवाद हैं। जिसमें नारदजी को श्रीराम कहते हैं कि संतो के लक्षण क्या हैं, कैसे आप संत को पहचानेंगे, संत की परिभाषा क्या हैं, किस प्रकार का संत उन्हें अत्यधिक प्रिय हैं, इस मर्म को तुलसीदास ने बड़े ही सरल चौपाई में लिख डाला हैं, बस थोड़ा सा दिमाग लगाईये, आपको भावार्थ समझने में देर नहीं लगेगी, साथ ही अपने मन में सोचिये कि क्या इनमें से एक भी भाव अथवा लक्षण भारत के इन तथाकथित संतों में दिखाई पड़ते हैं।
षट विकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुं देह न गेह।।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहि कुमारग पाऊ।।
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।
जो आजकल टीवी चैनलों पर हर सुबह शाम दीख जाते हैं, या जिनको लेकर हाय तौबा मचायी जा रही हैं, या जिन संतों ने बेड़ागर्क कर रखा हैं, इनमें से ज्यादा संत तो टीवी ब्रांड हैं, जिन्हें समय समय पर टीवी चैनलों ने इन्हें अपने फायदे के लिए जनता के समक्ष रखा हैं, और बाद में जब इन तथाकथित संतों की निकल पड़ी तो इन्होंने टीवी चैनलों को आंख दिखाना शुरु कर दिया, और फिर जब बात बन गयी तो लीजिए, कुछेक संत फिर से टीवी पर दिखाई पड़ने लगे, जिनकी कभी चैनलों ने खिचाई की थी। गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का एक प्रसंग। हनुमान सीता की खोज में लंका पहुंच गये। अचानक उन्हें एक घर से राम – राम की संकीर्तन सुनाई पड़ती हैं। वे आश्चर्य में पड़ते हैं कि लंका में तो निशिचर रहते हैं, यहां सज्जनों का निवास कैसे। पता लगाने के लिए, हनुमान अपना वेष बदलते हैं। पता लगता हैं कि ये तो राम भक्त विभीषण का निवास स्थान हैं। जैसे ही विभीषण की रामभक्ति देखते हैं। हनुमान अपने मूलस्वरुप में आ जाते हैं और अचानक विभीषण जी के मुख से ये बाते निकल पड़ती हैं कि
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहि नहिं संता।।
हे हनुमान जी अब हमें पक्का भरोसा हो गया कि बिना ईश्वरीय कृपा के संत नहीं मिलते। आज हमारे उपर ईश्वरीय कृपा हो गयी। अब जरा बताईये। हनुमान जी की तुलना, बिभीषण संत से कर रहे हैं। क्या हनुमान जी के संत होने पर किसी को संदेह हो सकता हैं। उत्तर होगा – कदापि नहीं। क्योंकि संतों के सारे गुण, सारे लक्षण हनुमानजी में भरें पड़े हैं। संत कैसा होना चाहिए, इसका सुंदर उदाहरण तो हनुमान जी हैं, पर आज के संतों को देख लीजिए। उनमें हनुमानजी का एक भी गुण अथवा लक्षण दिखाई देता हैं, नहीं तो फिर इस प्रकार की नौटंकी क्यों। हमारे यहां संतों की एक परंपरा रही हैं। विशाल परंपरा। न धन की लालच और न पद की महत्वाकांक्षा। सभी का कल्याण हो, एकमात्र यहीं भाव। उठा लीजिये, गुरुनानक, रविदास, समर्थगुरुरामदास, मीराबाई, सुरदास, रसखान, ज्ञानेश्वर जैसे सैकड़ों, हजारों संतों को। इन संतों ने अपने जीवनकाल में अपने लिए क्या किया और समाज के लिए क्या किया। हम ज्यादा दूर नहीं जाना चाहते। एक सवाल पूछना चाहता हूं। देश में एक राजनीतिक संत हुए – महात्मा गांधी। मोहनदास से महात्मा कैसे हो गये। अपने लिए उन्होंने कितने घर बनाये अथवा स्वयं को महिमामंडित करने के लिए कितने आश्रम खोले। उत्तर होगा – नहीं। तो फिर एक छोटी सी बात लोगों के दिलों में क्यूं नहीं समझ आती।
भारत का ध्येयवाक्य हैं –
सत्यमेव जयते।
भारत का प्राण बसता हैं –
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दुख भागभवेत।।
हमें नही लगता कि इससे अधिक की जानकारी की आवश्यकता हैं। संत चरित्र निर्माण करता हैं। संत व्यक्तित्व निर्माण करता हैं। संत समाज व देश का निर्माण करता हैं। संत समस्याओं का समाधान कर देता हैं। संत खुद ही समस्या नही बन जाता, जो संत समस्या बन जाये, वो खुद एक भयानक रोग के समान हो जाता हैं, जिससे देश और समाज को नुकसान के सिवा कुछ नहीं मिलता। फिलहाल मेरे देश में कुछ संतों को छोड़ दिया जाय तो ज्यादातर इस देश में ऐसे तथाकथित संत हो गये, जो चैनलों व कुछ अखबारों की आड़ में स्वहित देखते हुए, देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं। पर वे भूले नहीं, कि अंततः सत्य की विजय होती हैं, वे कितना भी धूर्त क्यों न बन जाये। देश उन्हें अपने ढंग से सजा अवश्य दे देगा।

Sunday, March 25, 2012

मीडिया से देश को खतरा -------------------------


ये बात जो लोग मीडिया में हैं। उन्हें अटपटा सा लगे, या वो मानने को तैयार न हो, पर सच्चाई यहीं हैं कि आज मीडिया से देश को खतरा उत्पन्न हो गया हैं, ऐसे में जरुरी हैं कि सरकार मीडिया पर लगाम लगाये, उन्हें नियंत्रित करें अथवा कुछ ऐसे उपाय ढूढें ताकि देश व समाज को मीडिया की खतरों से बचाया जाये। मीडिया से देश व समाज को कैसे खतरा उत्पन्न हो गया हैं। उसका एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। जिस पर मीडिया के लोगों को ही खुद आत्ममंथन करने की जरुरत हैं।ज्वलंत उदाहरण -- आज ज्यादातर राष्ट्रीय चैनल, अपनी महत्वाकांक्षा को पाने के लिए, एकमात्र लक्ष्य रुपये कमाने के लिए आधे घंटे का या रुपये पर जितना मन चाहे, उतने घंटे का स्लॉट बेच दे रहे हैं और इन स्लॉटों में क्या होता हैं। आप खुद देखिये। एक ठग आता हैं। अपने को बाबा कहता हैं। और ठग विद्या द्वारा पूरे देश में अपना जादू चलाकर, खुद को प्रतिष्ठित कर लेता हैं। यानी कल तक जिस व्यक्ति को कोई नहीं जानता हैं,वो व्यक्ति पल भर में ही, पूरे देश में इस प्रकार अपनी धर्मसत्ता स्थापित कर लेता हैं कि, इन राष्ट्रीय चैनलों को मुंहमांगी रकम देकर, वो बाबा अपनी जयजयकार करवाता हैं। फिलहाल देश में दो बाबाओं ने ऐसी कमाल दिखायी हैं कि एक बाबा तो बनिये की दुकान से लेकर, चैनल और दवाओं की दुकान तक खोल दी हैं, जबकि दुसरा बाबा अपना थर्ड आई खोलकर, पल भर में अनारक्षित रेलवे टिकट को कन्फर्म तक करा देता हैं, यहीं नहीं खानेवाले बिस्कुट का कारोबार करने वाले व्यक्ति को वो सोने का बिस्कुट का कारोबार तक करनेवाला बनाने का दावा कर देता हैं, यहीं नहीं इस बाबा ने तो हद कर दी हैं.........हर प्रश्न का उटपुटांग जवाब देकर, स्वयं को प्रतिष्ठित कर देता हैं। ऐसे में इन बाबाओं को देख, गोस्वामी तुलसीदास की वो पंक्ति याद आ जाती हैं, वो पंक्ति जो श्रीरामचरितमानस में लिखा हैं -- पंडित वो हि सो गाल बजावा। यानी कलयुग में जो जितना गाल बजायेगा, वो उतना बड़ा ज्ञानी कहलायेगा। एक नहीं कई चैनल हैं -- जो इस प्रकार के गोरखधंधे में शामिल हैं, पर सरकार इन पर कार्रवाई नहीं करती। कमाल हैं इन बाबाओं ने इन चैनलों की टीआरपी भी बढ़ा दी हैं, यानी एक पंथ दो काज। पहला की बाबा से रुपये भी मिल गये और टीआरपी भी मिल गयी। जबकि ये चैनल, रजिस्ट्रेशन कराने के समय़ सिर्फ न्यूज चलाने की बात करते हैं, पर न्यूज के नाम पर ये क्या कर रहे हैं, सभी को पता हैं। आज देश के विभिन्न गांवों और शहरों में देश के महान संत -- कबीर, नानक, रविदास, नामदेव, तुकाराम, तुलसीदास, मीराबाई, नरसीमेहता, सुरदास, रसखान आदि के चित्र नहीं बिकते या इन्हें जाननेवाले लोगों की संख्या नगण्य हैं, पर टीवी वाले ठग बाबा के फोटो खूलेआम बिक रहे हैं, उन्हें लोग जानते हैं। हमारे देश में जितने भी संत हुए, उन्होंने देश को सिर्फ दिया, क्योंकि संत केवल देता हैं, वो देश से लेता नहीं। ठीक उसी प्रकार जैसे गंगा बहती रहती हैं, वो हमेशा उपकार करती हैं, चाहे लोग उसमें मैला बहाये अथवा उससे खुद को तृप्त करने का कार्य करें। ऐसे होते हैं संत। पर आज के संत को देखिये, बाबाओं को देखिये। ये बाबा टेंट - मार्चेंट के कारोबारियों से शादी में लगनेवाले एक कुर्सी पर बैठता हैं, तीन तसिया का जो खेल होता हैं, ठीक उसी प्रकार दस - बीस लोगों को जूगार करता हैं। जो बाबा के ट्रिक के अनुसार सवाल करता हैं और बाबा भी उसी प्रकार ट्रिक के अनुसार जवाब देता हैं, और इसी ट्रिक के जाल में, टीवी देख रहा, आम आदमी फंस जाता हैं, और अपनी जिंदगी के, मेहनत के सारे पैसे, इन ठगों पर लूटा देता हैं, वह भी जयजयकार कर। मैं जहां रहता हूं, वहां एक महिला रहती हैं, वो अपने माता - पिता को कभी सम्मान नहीं देती और न ही पति को सम्मान करती हैं, पर जरा देखिये इन्हें, जैसे ही सुबह होता हैं, ये टीवी खोलकर, उक्त ठग को देखने के लिए, सुनने के लिए दोनों हाथ जोड़कर बैठ जाती हैं। ये तो आजकल टीवी वाले इस ठग की प्रचार प्रसार भी कर रही हैं। एक दिन मेरी पत्नी ने कहा कि टीवी वाले थर्डआई वाले बाबा ने कहा है कि घर में शिवलिंग नहीं रखना चाहिए, जिसे सुनकर सभी टीवी देखनेवाले लोगों ने अपने घर के शिवलिंग मंदिर में रख दिये। मैंने अपनी पत्नी से पूछा - तुम्हारा क्या विचार हैं। उनका कहना था कि जब एकलव्य, द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर, स्वंय को प्रतिष्ठित करा लेता हैं, तो भला मैं, इस एकलव्य की गुणग्राही बातों को त्याग, एक ठग की बात पर क्यूं जाउं। मेरा हृदय प्रसन्न हो गया। चलों कोई तो हैं, जो इन ठगों से खुद को अलग कर रहा हैं, पर ऐसे लोगों की संख्या कितनी हैं। सवाल तो ये हैं......................।यहीं नहीं एक दक्षिण के चैनल से बाबा आते हैं, शनि के नाम पर खूब डराते हैं। पहले वे दिल्ली के राष्ट्रीय चैनलों पर आकर आम जनता को खूब डरा चुके हैं, पर हमारे घर के बच्चे, इनसे नहीं डरते। जैसे ही चैनल पर आते हैं। हमारे बच्चे, हमें बुलायेंगे, बाबा आ गये, देखिये- सुनिये और हंसते हंसते लोट पोट हो जाईये। सचमुच में, ये बाबा के हाव - भाव, फिल्मों में काम करनेवाले हास्य कलाकार, जगदीप, असरानी, धूमल व राजेन्द्रनाथ जैसे लगते हैं, और बात भी वहीं। यानी पूरे देश में आजकल टीवी चैनलों का एक ही कार्यक्रम बन गया हैं। देश व समाज भाड़ में जाये, पैसे कैसे कमाये जाये। ये ध्यान में रखकर स्लॉट बेचो, और अपने देश में धर्म कुछ ज्यादा ही बिकता हैं, और गर हिंन्दु हैं तो कहना ही नहीं, क्योंकि अन्य धर्मों में बाबाओं की उतनी पूछ नहीं, पर हिन्दुओं में बाबाओं की फौज हैं, किसी को पकड़ लो, पैसे ले लो, पूरे देश में बिकवाने का जिम्मा ले लो और शुरु हो जाओ। अभी तो थर्ड आई वाले बाबा खूब दिखाई पड़ रहे हैं, कल फोर्थ आई और फाइव तथा सिक्स आई वाले बाबा भी दिखाई पड़ जाये। तो इसे अतिश्योक्ति न समझेंगे। यहीं नहीं, आजतक हमें ये समझ में नहीं आया कि ये बाबाओं की फौज, शादी करा देती हैं, रेलवे टिकट कन्फर्म करा देती हैं, रोजगार दिला देती हैं, पर एक साधारण आदमी को प्रधानमंत्री क्यों नही बना देती। पूरे देश में जो गरीबी हैं, उसे फूंकमार कर दूर क्यों नहीं कर देती, देश में अशिक्षा जो फैली हैं, उसे फूंकमारकर दूर क्यों नहीं कर देती, या देश में जो भ्रष्टाचार पनपा हैं, उसे दूर क्यों नहीं करती और जब सारे समस्याओं का हल इन बाबाओं के पास हैं और टीवी वाले जो दिखाते हैं, वे टीवी वाले और बाबा इस समस्यारुपी शब्द को ही फूंकमार सदा क लिए क्यों नहीं मिटा देती। और जब ये ऐसा नहीं कर सकते तो समझ लीजिये कि पूरी दाल काली हैं। इसका मतलब हैं कि मीडिया, देश के लिए खतरा बन चुकी हैं और इन खतरों से देश की युवाओं को, दो दो हाथ करने के लिए तैयार रहनी चाहिए।आज से कोई बीस साल पहले, कोई जर्नलिज्म की डिग्री लेने के लिए हाय तौबा नहीं मचती थी, पर आज देश के युवा मीडिया में जाने को कुछ ज्यादा ही आतुर हैं। टीवी के ग्लैमर ने इन्हें मीडिया की ओर ज्यादा झूकाया हैं और जहां ग्लैमर होता हैं, वहां गंदगी होती ही हैं, क्योंकि ये देश व समाज की रक्षा के लिए आये ही नहीं, ये तो आये हैं - ग्लैमर के लिए। तो ग्लैमर आयेगा कहां से। पैसों से। और पैसे आयेंगे कहां से। इन्हीं ठगों से, जिन्हें हम आजकल टीवी वाले बाबा के नाम से जानते हैं। अब तो हम ईश्वर से यहीं प्रार्थना करेंगे, कि हे ईश्वर, अपने देश व समाज को, आसन्न मीडिया के खतरों से बचाओं, नहीं तो देश बनने से रहा। चीन और पाकिस्तान को क्या जरुरत हैं - भारत पर हमले की। भारत को खोखला करने के लिए यहां की मीडिया और ठग बाबाओं की गाढ़ी दोस्ती काफी हैं, इस देश को धूल में मिलाने के लिए, देश के मानमर्दन के लिए।

Wednesday, October 26, 2011

जहां राम वहीं अयोध्या, और जहां अयोध्या वहीं दीपावली.....

बचपन में दीपावली पर निबंध जब लिखने को कहां जाता, तो अनायास राम की चर्चा हो जाती। दीपावली पर ये प्रसंग मैं लिखना नहीं भूलता कि जब राम 14 वर्ष के वनवास को पूरा करने के बाद अयोध्या लौटें तौ अयोध्यावसियों ने राम का स्वागत दीपावली मना कर की थी, अर्थात् अपने घरों, चौक चौराहों, सड़कों, विद्यालयों और प्रशासकीय भवनों को दीपों से ऐसा सुसज्जित किया कि उस दिन से चली आ रही ये परंपरा आज भी जीवित हैं. दीपावली हम मनाते जा रहे हैं, पर दीपावली मनाने के क्रम में ये भूल जाते हैं कि जहां राम वहीं अयोध्या और जहां अयोध्या नहीं वहां दीपावली कैसी। राम का मतलब क्या, क्या राम एक व्यक्ति हैं या चरित्र, गर राम एक व्यक्ति हैं तो हमे नहीं लगता कि वनगमन के समय, सुमित्रा लक्ष्मण को ये कहती कि---
तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भांति सनेही।।
अवध तहां जहं राम निवासू। तहंइं दिवसु जहं भानू प्रकासू।।

गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्याकांड में साफ कहा, कि जब लक्ष्मण को पता चला कि श्रीराम को वनगमऩ का आदेश मिला हैं, वे भी श्रीराम के साथ निकलना चाहते हैं, वे अपनी माता सुमित्रा से आदेश मांगते हैं कि माता सुमित्रा सहर्ष श्रीराम के साथ वनगमन का आदेश दे। सुमित्रा भी तनिक मन में पुत्रमोह नहीं रखती और लक्ष्मण से कह बैठती हैं जो मैंने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस से उद्धृत चौपाईयों को उपर में लिखा हैं। आजकल सामान्य जन से पूछिये कि दीपावली क्या हैं, बतायेंगे -पर्व हैं, दीये जलायेंगे, गणेश लक्ष्मी की पूजा करेंगे, मिठाईयां खायेंगे - खिलायेंगे और जितनी जेब जवाब दे, उतने का पटाखा छोड़ देंगे, दीपावली संपन्न हो जायेगी, पर दीपावली तो इन सबसे दूर चरित्र की पूजा का पर्व हैं, जो हम सबसे दूर छूटता जा रहा हैं और जहां चरित्र ही नहीं वहां ज्ञान अर्थात् गणेश का प्रादुर्भाव कैसे होगा, और जब गणेश नहीं होंगे तो सत्य मार्ग से लक्ष्मी अर्थात् धन कैसे प्राप्त होगी और जब सत्यमार्ग से लक्ष्मी आयेगी ही नहीं तो फिर संपन्नता कैसे होगी। कोई भी पर्व हमारे यहां जो आदिकाल से चला आ रहा हैं, वो ऐसे ही नहीं बन गया, उसके आधार हैं पर सच्चाई ये हैं कि हम उन आधारों को छोड़ बाह्याडंबरों और आधुनिकता में इस प्रकार खोते चले जा रहे हैं कि उसका प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर पड़ता जा रहा हैं और सब कुछ होते हुए भी हम बावले होकर, सपरिवार समूल नष्ट होते जा रहे हैं, समय आज भी बीता नहीं हैं, सब कुछ वहीं हैं, पर आज भी राम के चरित्र को हम अपने में समाहित कर लें तो फिर दिक्कत कहा हैं। हमारे प्राचीन मणीषियों ने तो बार - बार कहा कि -
असतो मा सदगमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योरमा अमृतंगमय
आखिर, सबसे पहले उन्होने असत्य से सत्य की और जाने की बात क्यों कहीं, इसलिए कहीं कि, कहा गया हैं - सत्य धारयति धर्मः। यानी धर्म सिर्फ सत्य को धारण करता हैं, असत्य को नहीं। फिर दूसरी पंक्ति आयी - अंधकार से प्रकाश की ओर चले। अंधकार से प्रकाश की ओर कौन जायेगा, जो सत्य को धारण करेगा, फिर हैं मृत्यु से अमरता की ओर चले, यानी मृत्यु पर विजय कौन पायेगा, जो सत्य से प्रकाशित होगा। दीपावली इसी सत्य को प्राप्त कर, स्वयं को प्रकाशित और दूसरों को प्रकाशित करने का पर्व हैं, गर आपने ऐसा कर दिया तो दीपावली मना रहे हैं, अन्यथा आप क्या मना रहे हैं, स्वयं सोच लीजिये। मैं कह ही क्या सकता हूं। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि श्रीराम वनगमऩ से लौट रहे हैं, उनके साथ सारे लोग मौजूद हैं जो रावण पर विजय प्राप्त करने के समय हृदय से सहयोग किया, वे उन्हें संबोधित कर रहे हैं, कहते हैं ------
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोउं। यह प्रसंग जानई कोउ कोऊ।।
अर्थात अवधपुरी जैसा प्रिय उन्हें कोई नहीं, और ये प्रसंग बहुत कम ही लोग जानते हैं, आखिर त्रेतायुग के इस अवधपुरी में क्या था, बस चरित्र था, और इसी चरित्र से सभी अवांछित तत्व कांपते थे, पर क्या आज वो चरित्र हमारे पास हैं, गर नहीं तो इस दीपावली को क्यों नहीं हम एक आदर्श दीपावली मनाने के लिए एक पग बढ़ाये।