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Wednesday, May 3, 2017

मर जवान, मर किसान...........

कभी इसी देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक नारा दिया था – जय जवान, जय किसान। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने वैज्ञानिकों की कर्मठता को देखा तो उस नारे में दो शब्द और जोड़े और फिर हुआ – जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, पर आज देश की क्या स्थिति है? न जवान की जय हो रही है, न किसान की जय हो रही है और न ही विज्ञान की जय हो रही है, तब जय किसकी हो रही है...
जाहिर है...
• नेताओं की, उनकी पत्नियों की और उनके बेवकूफ औलादों की।
• उद्योगपतियों की, उनके उदयोगों की तथा उनके नाजायज संपत्तियों की।
• आईएएस व आईपीएस अधिकारियों की, जो जब तक जिंदा रहे, मस्ती से नौकरी किये और फिर बाद में नेताओं के तलवे चाटकर नेतागिरी में पिल पड़े है।
• नीच पत्रकारों के समूहों की, जो अपना जमीर बेचकर इन तीनों की आरती उतारने में लगा है।
आखिर ये कब तक चलेगा?, जाहिर है जब तक देश का युवा, गरीब, चरित्रवानों का समूह इन्हें लूटने का मौका देगा।
जरा स्थिति देखिये...
देश की गरीब जनता की औलादें, कभी आतंकियों के हाथों सरहद पर, तो कभी देश के अंदर नरपिशाचरुपी नक्सलियों के हाथों मारे जा रहे हैं, और सरकार का काम क्या रह गया है? बस कड़ी निंदा करने की, क्योंकि इनके पास ताकत ही नहीं, ताकत आयेगी भी कहां से, इस देश का नेता तो अपनी बेवकूफ औलादों और अपनी पत्नी तथा प्रेमिकाओं के आगे कुछ जानता ही नहीं।
आखिर देश का जवान क्यों शहीद हो रहा है? उसका कारण जानिये...
• क्योंकि देश के लिए मर-मिटनेवालों में कोई नेता, कोई अधिकारी या कोई उद्योगपतियों का बेटा या बेटी शामिल नहीं होता। इन सभी का मानना है कि उनके औलादों का जन्म केवल मस्ती करने के लिए पैदा हुआ हैं।
• जिन गरीबों के बच्चे जवान बनते है, उन्हें मरने के लिए उन्हें ऐसे ही छोड़ दिया जाता है, न तो उन्हें बेहतर खाना दिया जाता है, न बेहतर पोशाक और न ही आतंकियों और नरपिशाच रुपी नक्सलियों से लड़ने के लिए बेहतर हथियार उपलब्ध कराये जाते है। ये नेता इतने बेहूदे और कमीने होते है कि देश की रक्षा के लिए खरीदे जानेवाले हथियारों की खरीद में भी कमीशन खाते है।
• नरपिशाचरुपी नक्सलियों और आतंकियों के बचाव के लिए मानवाधिकार के नाम पर साम्यवादियों का दल देश के जवानों को ही कटघरें में खड़ा कर देता है।
जिस देश में बेईमान नेता, बेईमान अधिकारी, बेईमान पूंजीपति और बेईमान-लालची किस्म के पत्रकार होते है, उस देश में देश की रक्षा करनेवाला जवान तिल-तिल मरता हैं।
मैं कहता हूं कि ऐ देश में रहनेवालों गरीबों, वंचितों, भूख से मरनेवालों, क्या देश की सुरक्षा के लिए तुमने ही ठेका ले रखा है? 
मत भेजो, अपने बच्चों को, देश की रक्षा के लिए,  छोड़ दो तुम भी देश को अपने हाल पर, और तुम भी उसी प्रकार जिओ, जैसे तुम्हारा मन करता है, क्यों देश के लिए अपनी औलादों को शहीद करवा रहे हो?
अरे देश के सारे नेता एक ही है, चाहे वह मोदी हो या मनमोहन। सभी एक थैले के चट्टे-बट्टे है, जरा पूछो मोदी से, कि कल जैसे मनमोहन को इसी बात के लिए वह कटघऱे में खड़ा करता था, आज उसकी घिग्घी क्यों बंध गयी है?
पूछो, देश के रक्षा मंत्री अरुण जेटली से कि क्या उसे केवल धन इकट्ठे करने के सिवा, देश की रक्षा कैसे की जाती है? उसको पता है?
कमाल है, देश का रक्षा मंत्रालय प्रभार पर चल रहा है, प्रधानमंत्री मोदी के पास कोई ऐसा आदमी नहीं, जो रक्षा मंत्रालय को संभाल सकें?
देखो, इन नेताओं को अपने लिए पेंशन और हर प्रकार की सुविधा की व्यवस्था कर लिया और आपके बच्चे, जो अर्द्धसैनिक बलों में कार्य कर रहे है, उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया, यहां तक की उसकी पेंशन तक समाप्त कर दी, इन देश के गद्दारों ने। देश को नामर्द बना कर खड़ा कर दिया है, इनलोगों ने।
इसलिए, हम उन सारे लोगों से अपील करते है, खासकर उनसे...
• जो माता-पिता सुलेसन से चमड़े साटकर अपने बच्चों को जवान करते है...
• जो माता-पिता सफाईकर्मी का कार्य करते है...
• जो माता-पिता अट्टालिकाओं में स्वयं को शोषण का शिकार बनाते हुए, अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहे है...
• जो पंडित दो पैसों के लिए, अपने जजमानों के यहां शंख फूंक रहे है।
• जो गली-कुची में छोटी-छोटी दुकानें खोलकर अपनी जिंदगी जी रहे है...
यानी वे सारे लोग, जो किसी भी जाति के क्यों न हो, पर गरीबी से जिनका नाता है, वे अब अपने बच्चों को सिर्फ मरने के लिए सेना या अर्द्धसैनिक बलों में न भेजे, क्योंकि वर्तमान सरकार हो, या पूर्व की सरकार या कोई भी आनेवाले समय में आनेवाली सरकार हो, सभी ने आपके बच्चों को मारने की तैयारी कर रखी है, ऐसे में, आप अपने बच्चों को अपने साथ रखे, भले गरीब रहेगा, पर कम से कम आंखों के सामने तो रहेगा, किसी नेता, किसी अधिकारी या किसी उदयोगपति के शोषण का शिकार तो नहीं बनेगा, नहीं तो सबसे पहले नेता, अधिकारी और उदयोगपतियों के घर की औलादे भी देश के लिए जवान गंवाने के लिए तैयार रहे, क्या देश की सुरक्षा के लिए जान गंवाने का ठेका, यहां के गरीबों ने ही केवल ले रखा है?

Saturday, June 25, 2016

ये है हमारे नेता, हमारे उद्धारकर्ता, आधुनिक जयचंद.........

ये आधुनिक जयचंद है, जो भारत की इस असफलता पर अट्टहास कर रहे है...
आइये हम आपको एक कहानी सुनाते है। ये कहानी भारत की ही है। जब पृथ्वी राज चौहान ने संयोगिता के साथ विवाह रचाया तो जयचंद ने इसे अपना अपमान समझा। इस अपमान के बदले में उनसे मुहम्मद गोरी का साथ देने का निश्चय किया। पृथ्वी राज चौहान की हार हुई, मुहम्मद गोरी जीत गया, पर ऐसा नहीं कि जयचंद को उससे फायदा हुआ, हुआ यह कि भारत एक बार फिर विदेशियों के हाथों पराजित हुआ, मानमर्दित हुआ।
दूसरी कहानी सुनिये...
महारानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों को धूल चटा रही थी और ग्वालियर नरेश अंग्रेजों के तलवे चाट रहे थे। ज्यादा जानकारी के लिए भारत की ही सुप्रसिद्ध कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ लीजिये –
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी
खुब लड़ी मर्दानी वो तो झांसीवाली रानी थी
जब भगत सिंह भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, सोते हुए भारतीयों को जगाने का काम कर रहे थे तो उस वक्त सुप्रसिद्ध दिवगंत पत्रकार खुशवंत सिंह का पिता शोभा सिंह भगत सिंह को फांसी के तख्ते पर पहुंचाने में मुख्य भूमिका निभा रहा था।
ऐसी एक नहीं, अनेक सच्ची कहानियां है, जो बताती है कि हम भारतीय चाहे शांत हो या गुस्से में हो, वहीं काम करते है, जिससे भारत का नुकसान हो जाय, भारत बर्बाद हो जाये...
ये हमारी फितरत है, हम सुधर नहीं सकते। हम सच्चे देशभक्त नहीं, क्योंकि पूरे विश्व में हम एकलौते देश है, जो आजादी की लड़ाई का भी कीमत वसूलते है, स्वतंत्रता सेनानी का वेतन लेकर, अब तो 1974 के जेपी आंदोलन का भी पैसा वसूल रहे है, जैसे लगता है कि आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे...
मैंने कहा न, ये हमारी फितरत है, हम सुधरेंगे ही नहीं...
हम जानते है कि 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया...हमारे हजारों रणबाकुड़ें मार डाले...हजारों वर्ग किलोमीटर भू-भाग को कब्जा कर लिया...पर आज भी हम उसकी आर्थिक समृद्धि के लिए वे सभी सामान खरीदते है, जो हमारे लिए जरूरी है, और वह चीन, हरदम हमारे सीने पर, तो कभी पीठ पर खंजर भोकता है...
हम हैं भारतीय, जो कभी नहीं सुधरेंगे...
आज ही देखिये,
अखबारों में पढ़ा कि भारत एनएसजी का सदस्य नहीं बना, क्यों नहीं बना तो चीन ने उस पर अड़ंगा लगा दिया...क्या भारत को एनएसजी का सदस्य नहीं बनना चाहिए।
हमारा उत्तर होगा – बनना चाहिए,
क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एनएसजी की सदस्यता के लिए जो प्रयास किये, वो गलत था...
एक दूसरे देश का सामान्य नागरिक भी होगा तो वह यहीं कहेगा कि मोदी का यह प्रयास सही था, पर जरा भारत के विभिन्न दलों में रह रहे जयचंदों को देखिए, बहुत खुश है। अनाप-शनाप बयान दिये जा रहे है। मोदी को कोस रहे है।
जरा केजरीवाल के स्टेटमेंट को देखिये – यह मूर्ख क्या कह रहा है – कह रहा है कि पीएम मोदी विदेश नीति के मोर्चे पर फेल रहे है, उन्हें यह बताना होगा कि वे विदेश यात्राओं में क्या करते रहे।
जरा कांग्रेस को देखिये वो कह रही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को और भारत को तमाशा बना दिया। लालू और नीतीश की तो बात ही छोड़ दीजिये, ये तो नमूने है। इनसे देशप्रेम की आशा करना तो अव्वल दर्जे के मूर्ख होने का प्रमाण पत्र स्वीकार करना है।
ये है हमारे नेता, हमारे उद्धारकर्ता, आधुनिक जयचंद।
अब कांग्रेसियों से कुछ सवाल...
कांग्रेसियों तुम्हे पता है कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्वकाल में कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में उस वक्त के विपक्ष में रह रहे, जो विपक्ष के नेता भी नहीं थे, अटल बिहारी वाजपेयी ने क्या भूमिका निभाई थी, अगर नहीं पता तो मूर्खों ज्यादा दिन नहीं हुआ, इतिहास पढ़ो...
अरे कमबख्तों, कम से कम देश के मुद्दे पर तो एक हो जाओ...
क्या जयचंद बनने में, ज्यादा जोर लगा रहे हो...
अरे भारतीयों, अब भी चेतो...
अरे सरकार मजबूर है, विपक्ष घटियास्तर का है, पर तुम तो देशभक्त हो...
बहिष्कार करो, चीनी सामानों का...
बहिष्कार करो, चीनी नेताओं का...
बहिष्कार करो, चीनी सोच का, जो वामपंथियों ने भारत में फैला रखा है...
बहिष्कार करो, उन हर नेताओं को जो देश में रहकर विदेशी ताकतों को मजबूत कर रहे है...
उन वीर भारतीयों का हौसला बुलंद करों,
जो विपरीत परिस्थितियों में चीन को नाक में दम कर रखे है...
उन वीर वैज्ञानिकों का हौसला आफजाई करों, जो भारत को शक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे रहे है...
आखिर कब चेतोगे...
तुम्हारे देश के ज्यादातर नेता गद्दार है, ये याद रखो...
ये तुम्हारे बीच, जातिवाद फैलाते है, और इस जातिवाद की आड़ में अपने जोरु, अपने बेटी-बेटे, दामाद-बहु का आंगन क्लियर करते है...
जागो भारतीय जागो, पर तुम जागोगे, इसकी संभावनाएं हमें कम है...
क्योंकि विश्व में एकमात्र भारत ही ऐसा देश है, जो सर्वाधिक गुलामी का दंश झेलने का रिकार्ड अपने पास सुरक्षित रखा है...

Sunday, January 22, 2012

जो समाज और जहां की सरकार नपुंसक हो जाती हैं, वहां नरपिशाच राज करते हैं................


जब जीने की तमन्ना, मौत पर हावी हो जाती हैं। जब लोग मौत को गले लगाने को छोड़ जीने की आरजू पाल लेते हैं। जहां लोग साहस छोड़ कायराना हरकतों को तरजीह देते हैं। वहां नरपिशाचों की चल पड़ती हैं। आज झारखंड की राजधानी की सारी अखबारें गढ़वा के भंडरिया में नरपिशाचों (नक्सलियों) द्वारा की गयी, वहशियाना जूल्मों से अटी पटी हैं। ये नरपिशाच (नक्सली) समझते हैं कि विदेशियों के इशारे पर, चल रही उऩकी नीतियों और हरकतों से देश व समाज पर कब्जा कर लेंगे. तो मैं फिर वहीं कहूंगा कि ये उनकी सबसे बड़ी भूल हैं। वे कभी कामयाब नहीं हो सकते हैं, क्योंकि ये चीन नहीं, भारत हैं। यहां कभी वो ही ही नहीं सकता, जो इस देश की मिट्टी में रचा बसा नहीं हैं। जो कहते हैं कि बंदूक की नलियों से सत्ता हासिल होती हैं, शांति पनपता हैं, वे भूल रहे हैं, कि बंदूक सिर्फ मौत दे सकती हैं, जिंदगी नहीं और जो जिंदगी देगा ही नहीं, वो देश व समाज को नयीं दिशा क्या देगा। नरपिशाचों (नक्सलियों) को समर्थन देनेवाले कह सकते हैं कि मैंने नक्सलियों को नरपिशाच क्यों कहा। उनके लिए जवाब यहीं हैं कि गढ़वा में जिस प्रकार से वहां के थाना प्रभारी और ड्राईवर को जिंदा जलाया गया, जैप के जवानों के सर पर गोलियां दागी गयी और राज्य के अन्य इलाकों में जिस प्रकार से ये ग्रामीणों का गला रेंतते हैं, ऐसे में जो भी व्यक्ति, जिसका मानवता में विश्वास हैं, वे नक्सलियों को कभी नक्सली कह ही नहीं सकते। इनके लिए तो नये शब्दों की इजाद करनी होगी, पर मैं इनके लिए पुराने शब्दों में से ही, एक शब्द चुना हैं -- नरपिशाच। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हम भारत में रहते हैं। ये गांधी का देश, राम का देश हैं। लोहिया, जयप्रकाश, महान क्रांतिकारी भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद का देश हैं। जिसे कुछ पथभ्रष्ट राजनीतिज्ञ, पथभ्रष्ट नक्सली समर्थक पत्रकार, पथभ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी, पथभ्रष्ट असामाजिक तत्व जिनकी पैठ, आज हर विभागों में हो गयी हैं। वे इस देश को इऩ नरपिशाचों के हाथ में सौप कर अपने पड़ोसी देश, जो भारत का सबसे बड़ा दुश्मन हैं, उसके हाथों की कठपुतलियां बना देना चाहते हैं।

सर्वप्रथम, इन नरपिशाचों की यहां तू ती क्यों बोलती हैं, इस पर विचार करें --------
क. क्योंकि इनके समर्थन में समाज के तथाकथित अपने आपको प्रगतिशील कहलानेवाले अरुंद्धति राय, अग्निवेश जैसे अतिप्रबुद्ध वर्गों की टोली हैं, जो समय समय पर यहां आकर, विभिन्न गोष्ठियां आयोजित कर इनके समर्थन में बहुत कुछ बोलकर, इनका सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाते रहते हैं।
ख. इन नरपिशाचों के समर्थन में बड़े वामपथी पत्रकारों की टोली भी हैं, जो इनका समर्थन करती रहती हैं और समय समय पर दिशा निर्देश करती रहती हैं।
ग. आदिवासी इलाकों में आदिवासियों को उनके मूल धर्म से हटाकर, पथभ्रष्ट करानेवाली अनेक संस्थाएं यहां चल रही हैं, जो चाहती हैं कि यहां इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का बोलबाला रहें ताकि उनके इस आतंक का फायदा उठाकर वे धर्मांतरण का कार्य आसानी से कर सकें। इसी मूल उद्देश्यों को लेकर ये संस्थाएं इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का खुलकर समर्थन करती हैं। आप देंखेंगे कि इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का समर्थन करनेवाली गोष्ठियां, इन्हीं संस्थाओं में आयोजित होती हैं।
घ. झारखंड की सभी राजनीतिक पार्टियां और इसमें शामिल राजनीतिज्ञ प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रुप से इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को आर्थिक मदद करती रहती हैं और समय - समय पर इन्हें अपना भाई - बंधु कहकर इनका मनोबल बढ़ाती रहती हैं। साथ ही ये राजनीतिज्ञ दल जब विकास संबंधी बजट बनाते हैं तो ये ध्यान रखते हैं कि इस बजट का एक हिस्सा, उन्हें इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को भी देना हैं, इसलिए उनका हिस्सा का ये खास ध्यान रखते हैं, और ये राशियां बिना किसी मेहनत के उन नरपिशाचों (नक्सलियों) तक आराम से पहुंचती हैं।
ड. राजनीतिज्ञों की इसी उदारता का ये नरपिशाच विशेष ध्यान रखते हैं और इनके इशारों पर कभी कभी विभिन्न घटनाओं को अंजाम भी देते हैं, जैसे कभी - कभी ये नरपिशाच (नक्सली) चुनाव के समय, बूथ मैनेजमेंट का भी काम कर देते हैं और समय - समय पर किसी व्यक्ति अथवा किसी पिकेट को उड़ाने से भी बाज नहीं आते।
च. यहां खुफिया विभाग पूरी तरह फेल हैं। खुफिया विभाग के अधिकारी तो पत्रकारों की गणेश परिक्रमा करते रहते हैं और जो पत्रकार उन्हें बता देते हैं, उसी पर उनको गुमान हो जाता हैं। सच्चाई ये हैं कि खुफिया विभाग के किसी वरीय अधिकारी या कनीय अधिकारी अथवा कर्मचारी को ताकत नहीं कि वो इन नरपिशाचों (नक्सलियों) के बारे में सही सहीं जानकारी इक्ट्ठी कर लें। पुलिस की तो बात ही दूर हैं। खुफिया विभाग दुरुस्त रहती तो गढ़वा कांड जैसे कांड बार - बार हमें देखने व सुनने को नहीं मिलते। यहीं नहीं यहां के सारे के सारे वरीय पुलिस अधिकारी, राजनीतिज्ञों से सांठ गांठ कर आराम की जगहों पर रहना चाहते हैं, कोई नरपिशाचों (नक्सलियों) को चुनौती देना नहीं चाहता। उनसे लडऩा नहीं चाहता। क्यों - क्योंकि वो जानता हैं कि इन नरपिशाचों (नक्सलियों) पर उनके राजनीतिज्ञ और अन्य वरीय पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों का वरद् हस्त प्राप्त हैं। इसलिए वो सामंजस्य बनाने पर ज्यादा ध्यान देता हैं। और भूले भटके जब कभी ये पुलिस अधिकारी इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को पकड़ लेते हैं तो ये इन नरपिशाचों के प्रति आदरसूचक शब्द का प्रयोग करते हैं, जैसे लगता हैं कि उसने देश व समाज को नयीं दिशा देने के लिए अवतरित हुआ हैं।
अर्थात् गर आप चाहे कि इस प्रांत से इन नरपिशाचों को निकाल कर फेंक दें. नहीं फेंक सकते, क्योंकि हर डाल पर उल्लू बैठा हैं, अंजामें गुलिस्तां क्या होगा।

नरपिशाचों (नक्सलियों) के उद्देश्य -------
जब कभी ये नरपिशाच (नक्सली) अथवा इनके समर्थक मिल जायेंगे तो ये कहेंगे कि वे व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका मूल उद्देश्य भ्रष्टाचार मुक्त समता मूलक समाज बनाना हैं पर सच्चाई ये हैं कि ये शत प्रतिशत एक पड़ोसी देश के इशारों पर काम कर रहे हैं, इनके मधुर संबंध तो कहा जाता हैं कि पाकिस्तान के आईएसआई से भी हैं, जो देश में आतंक फैलाकर भारत को विनाश के कगार पर ला खड़ा करना चाहता हैं। ये व्यवस्था परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरी तरह से भारत को एक साम्राज्यवादी पड़ोसी देश का गुलाम बना देना और उसके एवज में अपना ऐशो आराम चाहते हैं ताकि वे अपनी मनमर्जी से मार काट मचा सकें। ये भारत में लोकतंत्र नहीं बल्कि चीन का शासन चाहते हैं, जहां किसी को बोलने की इजाजत ही नहीं।
ये नरपिशाच गांव के भोले भाले ग्रामीणों और वहां के युवाओं के हाथों में तो एके 47 थमा देना चाहते हैं पर अपने पारिवारिक सदस्यों को देश के महानगरों में या विदेशो में पढ़ने अथवा जीवन यापन के लिए भेजते हैं। गांव की लड़कियों और महिलाओं की क्या स्थिति हैं, जहां इनका दबदबा चलता हैं। ये यहां लिखने की जरुरत नहीं, बस एक बार इन गांवों में केवल घूम लेने की जरुरत हैं, पता लग जायेगा। गर आपसे इनकी दुश्मनी हो गयी तो बस आपको पुलिस का मुखबिर बताकर गला काट देंगे। गर आप इनके प्रभावित क्षेत्रों में घूमने निकलेंगे तो आपको इसकी इजाजत नहीं होगी, गर आपने इनकी इजाजत के बिना घूमा या किसी से बातचीत की, तो आपकी खैर नहीं, आपको अपने जान से हाथ धोना पड़ेगा। पूरी तरह से तालिबानी हुकुमत हैं यहां।
इन नरपिशाचों (नक्सलियों) की यहां क्यों चल पड़ी --------
क. इसलिए चल पड़ी, क्योंकि गांवों में संभ्रांत और सज्जन लोगों ने अपनी भूमिका सीमित कर दी और विकासात्मक कार्यों और सामाजिक कार्यों में अपनी निष्क्रियता शुरु कर दी। नतीजा समाज के भ्रष्ट और असामाजिक तत्व सक्रिय हो गये।
ख. भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पत्रकारों तथा भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों के तिकड़ियों ने गांव की सामाजिक संरचनाओं को बिगाड़ना शुरु कर दिया, और गांव के प्रत्येक घर में एक दूसरे के खिलाफ ऐसी विषवमन कर दी कि गांव के लोग आपस में ही लड़ने शुरु कर दिये और इऩ भ्रष्ट तिकड़ियों की चल पड़ी। जब नरपिशाचों (नक्सलियों) का ऐसे में इऩ गांवों में आगमन हुआ तो उन्होंने इस विधि को अपने ढंग से लेना शुरु किया, नतीजा सामने हैं।

भविष्य ---------
भारत का भविष्य सुखद हैं। हिंसा से कभी भी, इस देश में क्रांति नहीं आयी हैं। जिस देश में हिंसा से क्रांति हुई हैं और व्यवस्था परिवर्तन होता दिखा तो वहां व्यवस्था चिरस्थायी नहीं रही। भारत एक महान देश हैं और ऐसे देश में इन नरपिशाचों की नहीं चलेगी। आप मानकर चलिये, क्योंकि जब देश में पंजाब और असम से आतंक खत्म हो गया। कश्मीर में अलगाववादियों और देशद्रोहियों की नहीं चल पायी तो फिर नरपिशाचों (नक्सलियों) की भी यहां नही चलेगी। आप मानकर चलिये। चाहे इनका नेटवर्क आपके घर में भी क्यों न पहुंच गया हो, इनका नेटवर्क काम नहीं करेगा, क्योंकि हर घर में राम और गांधी बसते हैं। यानी सत्य और अहिंसा बसती हैं।
एक बात और कुछ लोग कहते हैं कि नक्सली गतिविधियां इसलिए बढ़ी, क्योंकि गांवों में विकास कार्य नहीं हुए। ये कहनेवाले को मैं बता देना चाहता हूं कि गरीबी और निरक्षरता -- हिंसा नहीं सिखाती। गर ऐसा होता तो इस देश की जो दशा हैं, ऐसे में हर घर में नक्सली होता, नरपिशाच होते। पर ऐसा हैं नहीं। हमारे देश में तो कई संत मुफलिसी में गुजार दिये। कबीर की वो पंक्ति नहीं पढ़ी क्या -------- मन लागा, मेरा यार फकीरी में.......................।