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Sunday, April 30, 2017

सुकमा का दर्द...........

पिछले कुछ दिनों से सुकमा चर्चा में है। सुकमा में नरपिशाच रुपी नक्सलियों ने पच्चीस सीआरपीएफ के जवानों की नृशंस हत्या कर दी। इसके पूर्व में भी इन नरपिशाचों ने 12 जवानों की हत्या कर दी थी। इन शहीद हुए जवानों के परिवारों के दर्द पर मरहम लगाने के लिए सुप्रसिद्ध अभिनेता अक्षय कुमार और सुप्रसिद्ध क्रिकेटर गौतम गंभीर ने कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाये है, जबकि अन्य धन्नासेठों के लिए सुकमा जैसी घटनाएं कोई महत्वपूर्ण नहीं रखती, वे आज भी अपने धनों की सुरक्षा के लिए तथा अपने नालायक बेटे-बेटियों के लिए धनसंग्रह पर ज्यादा ध्यान दे रहे है।
इधर कश्मीर में आतंकियों और इधर देश के अंदर नक्सली रुपी नरपिशाचों से लड़ने में देश का जवान शहीद हो रहा है और दूसरी ओर इन आतंकियों और नक्सली रुपी नरपिशाचों की सुरक्षा में स्वयं को बुद्धिजीवी कहनेवाला साम्यवादियों का दल इन नरपिशाचों के पक्ष में आकर खड़ा हो गया है। एक वायर रुपी पोर्टल में कुछ अनिल सिन्हा जैसे लोग सवाल उठा रहे है कि भाई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सड़क बनाने की क्या जरुरत है? वह भी तब, जब आदिवासी चाहते ही नहीं कि उनके इलाके में सड़क बने।
ये वहीं लोग है, जो आदिवासी बहुल इलाकों में जब नक्सलियों का दल स्कूल भवनों को उड़ा देता है, तो बहुत ही प्रसन्न होते है, क्योंकि इन स्कूल भवनों के उड़ने से उन साम्यवादी बुद्धिजीवियों या पत्रकारों के बेटे-बेटियों का भविष्य नहीं प्रभावित होता, क्योंकि इनके बेटे-बेटियां तो देश के विभिन्न महानगरों में चलनेवाले प्रतिष्ठित स्कूलों की शोभा बन रहे होते है।
इन दिनों जब से नक्सलियों और आतंकियों के बीच गुप्त समझौते हुए है, नक्सलियों और आतंकियों ने अपना काम और तेजी से बढ़ा दिया है। आंतकियों ने कश्मीर में सेना पर आक्रमण प्रारंभ किये है तो आतंकियों को नैतिक रुप से समर्थन देने के लिए नक्सली रुपी नरपिशाचों ने देश के अंदर तबाही मचाना प्रारंभ कर दिया है।
जैसे...
• कश्मीर में सेना पर आक्रमण करने के लिए, उन पर हमले करने के लिए, उनकी हौसलों को पस्त करने के लिए पत्थरबाजों और पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों ने हाथ मिलाकर सेना और अर्द्ध सैनिक बलों को अपना निशाना प्रारंभ किया है तो नक्सलियों ने देश के अंदर सेना और अर्द्धसैनिक बलों पर हमले करने शुरु कर दिये है ताकि देश पूर्णतः खंडित हो जाये।
• जैसे कश्मीर में सेना और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें जनता की नजरों में गिराया जाता है, ठीक उसी प्रकार ये नरपिशाच रुपी नक्सली देश में रह रहे भोलेभाले आदिवासियों को इनके प्रति नफरत करने का पाठ पढ़ाते है और इसमें इनका मनोबल बढ़ा रहे होते है, वे लोग जो देश के महानगरों में, छोटे-छोटे शहरों में रहकर वैचारिक खाद देकर उन्हें पुष्ट करते है। इसके लिए इन बुद्धिजीवियों और चैनल में कार्य करनेवाले पत्रकारों को मुंहमांगी रकम विदेशों में रहनेवाले भारतविरोधी तत्वों से प्राप्त होते है, इनकी फंडिग इतनी मजबूत होती है कि पूछिये मत, पर दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए ये फटे पुराने थैले और कपडों का इस्तेमाल करते है, ताकि लोग इन्हें गरीबों का हमदर्द समझ सकें।
• ये आतंकवादी और नरपिशाच रुपी नक्सली हिन्दूओं को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझते है, तथा धर्मांतरण के लिए ईसाई मिशनरियों और अन्य भारत विरोधी धार्मिक संगठनों के लिए भी काम करते है। ऐसा वे इसलिए करते है क्योंकि इनका मानना है कि जब तक हिन्दू बहुसंख्यक रहेंगे, भारत को तोड़ना मुश्किल रहेगा।
• कई साम्यवादी विचारधारा के लोग जो पूर्ण रुप से गुंडे होते है, ये पूरे देश को एक न मानकर कई देशों का समूह मानने का प्रचार करते हुए विदेशियों के आगे खिलौने बने हुए है तथा लोगों में भारत और भारतीय संस्कृति के खिलाफ विषवमन करने का प्रयास करते है।
• भारत में कई ऐसे चैनल है, जो पूर्ण रुपेण भारत विरोध के लिए काम करते है और समय-समय पर धर्मनिरपेक्षता की आड़ में भारत की अस्मिता पर गंभीर चोट करते है।
नक्सलीरुपी नरपिशाचों के बढ़ने के कारण और उसका निदान....
• भारत में नेता का बेटा नेता बनता है, अधिकारी का बेटा अधिकारी बनता है, फिल्मी हीरो का बेटा फिल्मी हीरो बनता है, कोई देश का जवान या अर्द्सैनिक बलों में शामिल होना नहीं चाहता, क्योंकि वो जानता है कि इसमें जो भी जाता है, मरने के लिए जाता है, हाल ही में पूर्व में जदयू में शामिल नेता जो आज भाजपा में चला गया, उसका तो बयान ही ऐसा था, पर देखिये थेथरई, राजनीतिज्ञों के, जबकि दूसरे देशों में ऐसा नहीं है। जब तक इस देश में इस प्रकार की मनोवृत्ति रहेगी, इस देश से न तो आतंकवाद खत्म होगा और न ही नरपिशाचों का समूह नक्सली।
• इस देश में देशभक्तों की संख्या कम है, ज्यादातर देशद्रोही है, ये भारतीय परंपरा है, ये कभी खत्म नहीं होगा। भगत सिंह को मरवानेवाला शोभा सिंह, महाराणा प्रताप के समय़ पैदा लेनेवाला मानसिंह, पृथ्वीराज चौहान के समय रहनेवाला जयचंद, महारानी लक्ष्मीबाई को मदद न कर अंग्रेजों के तलवे चाटनेवाला सिंधिया परिवार। ये उदाहरण है, जो बताते है कि भारतीय गद्दार होते है, उन्हें देशभक्ति के नाम पर दूसरे देशों के गद्दारों के तलवे चाटने में ज्यादा आनन्द आता है।
• भारत के राष्ट्रपिता है महात्मा गांधी, पर आप किसी भी साम्यवादी विचारधारावाली पार्टियों के कार्यालय में जाइये, आपको गांधी का चित्र नहीं मिलेगा, पर लेनिन, मार्क्स, स्टालिन, माओ के चित्र और उनकी प्रतिदिन पूजा होते आपको बराबर दीख जाया करेगा।
• भारत में सेना में या अर्द्ध सैनिक बलों में वहीं लोग शामिल होते है, जो सुलेशन से चमड़े साटने का काम करते है, जो खेतों-खलिहानों में काम करते है, जो फटेहाल है, जो कम पढ़े-लिखे है, जो गरीबी में ही जीते रहते है, कोई भी धनी-मानी व्यक्ति का परिवार देश के लिए मरना नहीं चाहता, उसका मानना है कि वो देश को मिट्टी में मिलाने के लिए पैदा हुआ है।
• हमारे देश में जो भी नेता है वह कड़ी निन्दा करने के लिए पैदा होता है, जब वह विपक्ष में होता है तो बड़ी-बड़ी ज्ञान की बातें करता है और जब सत्ता में होता है तो उसकी सारी ज्ञान चरने के लिए चली जाती है।
• हमारे देश में जो जवान देश के लिए शहीद होता है, जो वैज्ञानिक देश की सुरक्षा में, जो जासूस देश के लिए अपना प्राणोत्सर्ग करता है, उनके परिवारों के लिए, यह देश कुछ भी नहीं करता, पर जरा नेताओं को देखिये, एक बार विधायक या सांसद बन गये, उसके बाद विधायक या सांसद रहे या न रहे, जब तक जिंदा है, तब तक पेंशन लेंगे और मर गये तो उनकी बीवी और परिवार पेंशन का आनन्द लेंगे, पर अर्द्ध सैनिक बलों के जवान अगर देश के लिए मर भी जाये तो उनके परिवारों को सामान्य जिंदगी जीने के लिए तरस जायेंगे, उन्हें ये सरकार पेंशन तक नहीं देती। थूकता हूं, ऐसी सरकार पर, जो अपने देश के जवानों के परिवारों का सम्मान नहीं करना जानती।
कुल मिलाकर देखे तो फिलहाल अपना देश हिजड़ों का देश बनने में ज्यादा रुचि दिखा रहा है, अब फिल्में भी बनती है तो हिजड़े बनने का उपदेश दे रही होती है, यानी जवान हो जाओ, लड़की पटाओ, ऐश करो, बच्चे पैदा करो और फिर मर जाओ यानी जिंदगी मिलेगी न दुबारा के तर्ज पर खाओ, पीओ, ऐश करो। जो देश इस तर्ज पर चल रहा होता, वह कभी खड़ा नहीं होता, वहां आतंकियों और नरपिशाचों की ही चल रही होती है, यह देश तो आतंकियों और नरपिशाच रुपी नक्सलियों का आश्रयस्थली बन चुका है, जरा देखिये अपने आस-पास के ही देशों को जो कैसे जी रहे है? अरे ज्यादा दूर मत जाइये, छोटा सा देश भूटान और बड़ा सा देश चीन। आपके बगल में ही है, कैसे आगे बढ़ रहा है? और कैसे स्वयं को मजबूत कर रहा है? आप ही का माल, आप ही को दूसरे रुप में पेश कर रहा है और अपनी आर्थिक और सामरिक शक्ति को मजबूत कर रहा है और आप हिजड़े बनकर उसके आगे नाचने को विवश हो रहे है। शर्म आती है ऐसा परिदृश्य देखकर कि हम किस देश में रह रहे है?

Sunday, January 22, 2012

जो समाज और जहां की सरकार नपुंसक हो जाती हैं, वहां नरपिशाच राज करते हैं................


जब जीने की तमन्ना, मौत पर हावी हो जाती हैं। जब लोग मौत को गले लगाने को छोड़ जीने की आरजू पाल लेते हैं। जहां लोग साहस छोड़ कायराना हरकतों को तरजीह देते हैं। वहां नरपिशाचों की चल पड़ती हैं। आज झारखंड की राजधानी की सारी अखबारें गढ़वा के भंडरिया में नरपिशाचों (नक्सलियों) द्वारा की गयी, वहशियाना जूल्मों से अटी पटी हैं। ये नरपिशाच (नक्सली) समझते हैं कि विदेशियों के इशारे पर, चल रही उऩकी नीतियों और हरकतों से देश व समाज पर कब्जा कर लेंगे. तो मैं फिर वहीं कहूंगा कि ये उनकी सबसे बड़ी भूल हैं। वे कभी कामयाब नहीं हो सकते हैं, क्योंकि ये चीन नहीं, भारत हैं। यहां कभी वो ही ही नहीं सकता, जो इस देश की मिट्टी में रचा बसा नहीं हैं। जो कहते हैं कि बंदूक की नलियों से सत्ता हासिल होती हैं, शांति पनपता हैं, वे भूल रहे हैं, कि बंदूक सिर्फ मौत दे सकती हैं, जिंदगी नहीं और जो जिंदगी देगा ही नहीं, वो देश व समाज को नयीं दिशा क्या देगा। नरपिशाचों (नक्सलियों) को समर्थन देनेवाले कह सकते हैं कि मैंने नक्सलियों को नरपिशाच क्यों कहा। उनके लिए जवाब यहीं हैं कि गढ़वा में जिस प्रकार से वहां के थाना प्रभारी और ड्राईवर को जिंदा जलाया गया, जैप के जवानों के सर पर गोलियां दागी गयी और राज्य के अन्य इलाकों में जिस प्रकार से ये ग्रामीणों का गला रेंतते हैं, ऐसे में जो भी व्यक्ति, जिसका मानवता में विश्वास हैं, वे नक्सलियों को कभी नक्सली कह ही नहीं सकते। इनके लिए तो नये शब्दों की इजाद करनी होगी, पर मैं इनके लिए पुराने शब्दों में से ही, एक शब्द चुना हैं -- नरपिशाच। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हम भारत में रहते हैं। ये गांधी का देश, राम का देश हैं। लोहिया, जयप्रकाश, महान क्रांतिकारी भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद का देश हैं। जिसे कुछ पथभ्रष्ट राजनीतिज्ञ, पथभ्रष्ट नक्सली समर्थक पत्रकार, पथभ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी, पथभ्रष्ट असामाजिक तत्व जिनकी पैठ, आज हर विभागों में हो गयी हैं। वे इस देश को इऩ नरपिशाचों के हाथ में सौप कर अपने पड़ोसी देश, जो भारत का सबसे बड़ा दुश्मन हैं, उसके हाथों की कठपुतलियां बना देना चाहते हैं।

सर्वप्रथम, इन नरपिशाचों की यहां तू ती क्यों बोलती हैं, इस पर विचार करें --------
क. क्योंकि इनके समर्थन में समाज के तथाकथित अपने आपको प्रगतिशील कहलानेवाले अरुंद्धति राय, अग्निवेश जैसे अतिप्रबुद्ध वर्गों की टोली हैं, जो समय समय पर यहां आकर, विभिन्न गोष्ठियां आयोजित कर इनके समर्थन में बहुत कुछ बोलकर, इनका सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाते रहते हैं।
ख. इन नरपिशाचों के समर्थन में बड़े वामपथी पत्रकारों की टोली भी हैं, जो इनका समर्थन करती रहती हैं और समय समय पर दिशा निर्देश करती रहती हैं।
ग. आदिवासी इलाकों में आदिवासियों को उनके मूल धर्म से हटाकर, पथभ्रष्ट करानेवाली अनेक संस्थाएं यहां चल रही हैं, जो चाहती हैं कि यहां इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का बोलबाला रहें ताकि उनके इस आतंक का फायदा उठाकर वे धर्मांतरण का कार्य आसानी से कर सकें। इसी मूल उद्देश्यों को लेकर ये संस्थाएं इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का खुलकर समर्थन करती हैं। आप देंखेंगे कि इन नरपिशाचों (नक्सलियों) का समर्थन करनेवाली गोष्ठियां, इन्हीं संस्थाओं में आयोजित होती हैं।
घ. झारखंड की सभी राजनीतिक पार्टियां और इसमें शामिल राजनीतिज्ञ प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों रुप से इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को आर्थिक मदद करती रहती हैं और समय - समय पर इन्हें अपना भाई - बंधु कहकर इनका मनोबल बढ़ाती रहती हैं। साथ ही ये राजनीतिज्ञ दल जब विकास संबंधी बजट बनाते हैं तो ये ध्यान रखते हैं कि इस बजट का एक हिस्सा, उन्हें इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को भी देना हैं, इसलिए उनका हिस्सा का ये खास ध्यान रखते हैं, और ये राशियां बिना किसी मेहनत के उन नरपिशाचों (नक्सलियों) तक आराम से पहुंचती हैं।
ड. राजनीतिज्ञों की इसी उदारता का ये नरपिशाच विशेष ध्यान रखते हैं और इनके इशारों पर कभी कभी विभिन्न घटनाओं को अंजाम भी देते हैं, जैसे कभी - कभी ये नरपिशाच (नक्सली) चुनाव के समय, बूथ मैनेजमेंट का भी काम कर देते हैं और समय - समय पर किसी व्यक्ति अथवा किसी पिकेट को उड़ाने से भी बाज नहीं आते।
च. यहां खुफिया विभाग पूरी तरह फेल हैं। खुफिया विभाग के अधिकारी तो पत्रकारों की गणेश परिक्रमा करते रहते हैं और जो पत्रकार उन्हें बता देते हैं, उसी पर उनको गुमान हो जाता हैं। सच्चाई ये हैं कि खुफिया विभाग के किसी वरीय अधिकारी या कनीय अधिकारी अथवा कर्मचारी को ताकत नहीं कि वो इन नरपिशाचों (नक्सलियों) के बारे में सही सहीं जानकारी इक्ट्ठी कर लें। पुलिस की तो बात ही दूर हैं। खुफिया विभाग दुरुस्त रहती तो गढ़वा कांड जैसे कांड बार - बार हमें देखने व सुनने को नहीं मिलते। यहीं नहीं यहां के सारे के सारे वरीय पुलिस अधिकारी, राजनीतिज्ञों से सांठ गांठ कर आराम की जगहों पर रहना चाहते हैं, कोई नरपिशाचों (नक्सलियों) को चुनौती देना नहीं चाहता। उनसे लडऩा नहीं चाहता। क्यों - क्योंकि वो जानता हैं कि इन नरपिशाचों (नक्सलियों) पर उनके राजनीतिज्ञ और अन्य वरीय पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों का वरद् हस्त प्राप्त हैं। इसलिए वो सामंजस्य बनाने पर ज्यादा ध्यान देता हैं। और भूले भटके जब कभी ये पुलिस अधिकारी इन नरपिशाचों (नक्सलियों) को पकड़ लेते हैं तो ये इन नरपिशाचों के प्रति आदरसूचक शब्द का प्रयोग करते हैं, जैसे लगता हैं कि उसने देश व समाज को नयीं दिशा देने के लिए अवतरित हुआ हैं।
अर्थात् गर आप चाहे कि इस प्रांत से इन नरपिशाचों को निकाल कर फेंक दें. नहीं फेंक सकते, क्योंकि हर डाल पर उल्लू बैठा हैं, अंजामें गुलिस्तां क्या होगा।

नरपिशाचों (नक्सलियों) के उद्देश्य -------
जब कभी ये नरपिशाच (नक्सली) अथवा इनके समर्थक मिल जायेंगे तो ये कहेंगे कि वे व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका मूल उद्देश्य भ्रष्टाचार मुक्त समता मूलक समाज बनाना हैं पर सच्चाई ये हैं कि ये शत प्रतिशत एक पड़ोसी देश के इशारों पर काम कर रहे हैं, इनके मधुर संबंध तो कहा जाता हैं कि पाकिस्तान के आईएसआई से भी हैं, जो देश में आतंक फैलाकर भारत को विनाश के कगार पर ला खड़ा करना चाहता हैं। ये व्यवस्था परिवर्तन नहीं, बल्कि पूरी तरह से भारत को एक साम्राज्यवादी पड़ोसी देश का गुलाम बना देना और उसके एवज में अपना ऐशो आराम चाहते हैं ताकि वे अपनी मनमर्जी से मार काट मचा सकें। ये भारत में लोकतंत्र नहीं बल्कि चीन का शासन चाहते हैं, जहां किसी को बोलने की इजाजत ही नहीं।
ये नरपिशाच गांव के भोले भाले ग्रामीणों और वहां के युवाओं के हाथों में तो एके 47 थमा देना चाहते हैं पर अपने पारिवारिक सदस्यों को देश के महानगरों में या विदेशो में पढ़ने अथवा जीवन यापन के लिए भेजते हैं। गांव की लड़कियों और महिलाओं की क्या स्थिति हैं, जहां इनका दबदबा चलता हैं। ये यहां लिखने की जरुरत नहीं, बस एक बार इन गांवों में केवल घूम लेने की जरुरत हैं, पता लग जायेगा। गर आपसे इनकी दुश्मनी हो गयी तो बस आपको पुलिस का मुखबिर बताकर गला काट देंगे। गर आप इनके प्रभावित क्षेत्रों में घूमने निकलेंगे तो आपको इसकी इजाजत नहीं होगी, गर आपने इनकी इजाजत के बिना घूमा या किसी से बातचीत की, तो आपकी खैर नहीं, आपको अपने जान से हाथ धोना पड़ेगा। पूरी तरह से तालिबानी हुकुमत हैं यहां।
इन नरपिशाचों (नक्सलियों) की यहां क्यों चल पड़ी --------
क. इसलिए चल पड़ी, क्योंकि गांवों में संभ्रांत और सज्जन लोगों ने अपनी भूमिका सीमित कर दी और विकासात्मक कार्यों और सामाजिक कार्यों में अपनी निष्क्रियता शुरु कर दी। नतीजा समाज के भ्रष्ट और असामाजिक तत्व सक्रिय हो गये।
ख. भ्रष्ट राजनीतिज्ञों, भ्रष्ट पत्रकारों तथा भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारियों के तिकड़ियों ने गांव की सामाजिक संरचनाओं को बिगाड़ना शुरु कर दिया, और गांव के प्रत्येक घर में एक दूसरे के खिलाफ ऐसी विषवमन कर दी कि गांव के लोग आपस में ही लड़ने शुरु कर दिये और इऩ भ्रष्ट तिकड़ियों की चल पड़ी। जब नरपिशाचों (नक्सलियों) का ऐसे में इऩ गांवों में आगमन हुआ तो उन्होंने इस विधि को अपने ढंग से लेना शुरु किया, नतीजा सामने हैं।

भविष्य ---------
भारत का भविष्य सुखद हैं। हिंसा से कभी भी, इस देश में क्रांति नहीं आयी हैं। जिस देश में हिंसा से क्रांति हुई हैं और व्यवस्था परिवर्तन होता दिखा तो वहां व्यवस्था चिरस्थायी नहीं रही। भारत एक महान देश हैं और ऐसे देश में इन नरपिशाचों की नहीं चलेगी। आप मानकर चलिये, क्योंकि जब देश में पंजाब और असम से आतंक खत्म हो गया। कश्मीर में अलगाववादियों और देशद्रोहियों की नहीं चल पायी तो फिर नरपिशाचों (नक्सलियों) की भी यहां नही चलेगी। आप मानकर चलिये। चाहे इनका नेटवर्क आपके घर में भी क्यों न पहुंच गया हो, इनका नेटवर्क काम नहीं करेगा, क्योंकि हर घर में राम और गांधी बसते हैं। यानी सत्य और अहिंसा बसती हैं।
एक बात और कुछ लोग कहते हैं कि नक्सली गतिविधियां इसलिए बढ़ी, क्योंकि गांवों में विकास कार्य नहीं हुए। ये कहनेवाले को मैं बता देना चाहता हूं कि गरीबी और निरक्षरता -- हिंसा नहीं सिखाती। गर ऐसा होता तो इस देश की जो दशा हैं, ऐसे में हर घर में नक्सली होता, नरपिशाच होते। पर ऐसा हैं नहीं। हमारे देश में तो कई संत मुफलिसी में गुजार दिये। कबीर की वो पंक्ति नहीं पढ़ी क्या -------- मन लागा, मेरा यार फकीरी में.......................।

Monday, October 4, 2010

अरे ये तो चीन व पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं........!

पाकिस्तान तो अपने जन्म से ही कश्मीर पर अपना हक जताता रहा है, वहीं चीन ये मानने को तैयार ही नहीं कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इधर इस साल से वो कश्मीरियों के लिए अलग प्रकार के वीसा जारी कर अपना इरादा भी जाहिर कर दिया है और चीन के इस हरकत को हवा दी है, भारत में ही रह रहे वो लोग जो अपने आपको बुद्धिजीवी मानते हैं, जो अपने आप को वामपंथ की मुख्यधारा में रहने की बात करते हैं, जो खाते पीते भारतीय भूभाग पर हैं पर दिलों दिमाग से चीन व पाकिस्तान के ज्यादा निकट हैं। आश्चर्य है कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उस हर प्रकार की राष्ट्रविरोधी हरकतें करते हैं, जिससे भारत की संप्रभुता को चोट पहुंचती है, पर भारत सरकार इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती।
हाल ही में अखबारों और मीडिया के माध्यम से एक बयान पढ़ने और सुनने को मिला कि अपने बयानों से हमेशा चर्चा में रहनेवाली एक महिला बूकर पुरस्कार विजेता अरुंधती राय मानती है कि कश्मीर भारत का कभी अभिन्न अंग नहीं रहा, ठीक इसी प्रकार लादेन की भाषा में नक्सली नेता किशन का कहना था कि कश्मीर को आजाद कर दिया जाय, साथ ही गर वहां भारतीय सेना कश्मीर में कुछ करती है तो वह ऐसे मुद्दे पर नक्सली, मुसलमानों का साथ देंगे, अरे तुम किसी का साथ दो, देश को और देशभक्तों को क्या फर्क पड़ता हैं, वो तुम जिसके लिए लड़ने की बात करते हो, उसका तुम कितना भला कर रहे हो, वो तो भारत की आत्मा और भारतीय जनता खूब जान रही हैं।
कमाल है ये अरुंधती राय और किशन जैसे नक्सली को, जब कश्मीर में हिंदूओं का कत्लेआम होता हैं, जब इस्लाम के नाम पर सिक्खों को धमकी दी जाती हैं कि वे इस्लाम कबूल करें तो ये दोनों उस वक्त वामपंथी किताबों में उलझे रहते हैं, लेकिन जैसे ही इस्लाम, पाकिस्तान और चीन की बात आती हैं तो ये दरवे से निकल कर पाकिस्तान और चीन जैसे देशों तथा इस्लाम के साथ होने की बात करते हैं।
ये नक्सली क्या कर रहे हैं, इससे देश रोज दो चार हो रहा हैं। खूलकर नक्सलियों और उनके गतिविधियों को समर्थन करनेवाली अरुंधती राय को जब ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस उड़ायी जाती है और निर्दोष रेलयात्रियों की लाशों से पुरा इलाका पट जाता हैं तो उसमें उन्हें इंसानियत नष्ट होता नहीं दीखता। जब आतंकी पूरे कश्मीर से हिंदूओं को एक कर निकाल बाहर कर रहे होते हैं तो इनकी छाती नहीं पसीजती, पर जब देश के स्वाभिमान की रक्षा, एकता और अखंडता को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय सेना अपनी जान गवां रही होती हैं और देशद्रोहियों व आतंकियों को उनकी औकात बताती हैं, तो इनकी छाती फटने लगती हैं, इनकी क्यों छाती फटती हैं, भारतीय जनता अब खूब जान रही हैं।
सदियों से शांति व प्रेम का संदेश देनेवाले भारत में ये लोग बंदूक की गोली से शांति व प्रेम फैलाना चाहते हैं। इनका मानना हैं कि बंदूक की निकली गोली से ही शांति और विकास का द्वार खुलता हैं, क्योंकि ये जिनके आदर्शों पर चलने की बात करते हैं, इनके आका कभी भारत से जुड़े ही नहीं, और न ही उनकी भारतीय आदर्शों में दिलचस्पी थी, ये तो मार काट की ही भाषा समझते थे और है, और जो उनकी ये भाषा नहीं समझता या उनके विचारों को नहीं मानता, उसे सदा के लिए मौत की नींद सुला देते ताकि इनके खिलाफ दूसरा कोई विचार जन्म ही न ले। गर किसी को लगता हैं कि ये लिखे हुए शब्द गलत हैं तो चीन के थ्येन मन चौक की घटना याद कर लें।
इस अरुंधती और किशन को कश्मीर पर बोलना बहुत अच्छा लगता हैं और जो चीन तिब्बत पर बल पूर्वक कब्जा कर बैठा हैं, जहां के लाखों तिब्बती दूसरे देशों में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उनके पक्ष में बोलने में इनका गला सूखता हैं कारण कि उन्हें अपने आका चीन के खिलाफ बोलने में शर्म महसूस होती हैं, वहां उन्हें चीन की ये गंदी हरकतें बहुत अच्छी लगती है, क्यों आप खूद समझिये। हर बात को समझाने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं, बल्कि इनकी हरकतों, इनके विचारों, जहां ये बोलते हैं, केवल उस पर ध्यान दीजिए।
मेरा रांची से 25 सालों का संबंध रहा है, पर मैने निकट से देखा हैं कि जितने भी जनवादी कार्यक्रम होते हैं, या इस प्रकार के वामपंथी चिंतक, देशतोड़क बयान देनेवाले लोग आते हैं, उनके कार्यक्रम इसाई मिशनरी इलाकों में ही होते हैं, मिशनरी प्रेक्षागृहों में ही होती हैं, आज तक इनके कार्यक्रम मैंने सार्वजनिक जगहों पर होते नहीं देखा। ये धर्म को अफीम मानते हैं, पर सच्चाई ये हैं कि हिंदू धर्म के खिलाफ बोलने, उनके खिलाफ गाली देने में ये शान समझते हैं और चूंकि इस प्रकार के गाली देनेवाले शब्द, देश तोड़क बयान सिर्फ मिशनरीज इलाकों में आराम से बोले जा सकते हैं, कार्यक्रम आयोजित होते हैं। एक बार मैंने इन्हीं मुददों पर एक वामपंथी नेता से पूछा कि आखिर इस प्रकार के आयोजन मिशनरीज इलाकों अथवा मिशनरीज संगठनों के बीच क्यों, अन्य जगहों पर क्यों नहीं, तब इनका कहना था कि ऐसा संभव ही नहीं। आज भी नक्सल प्रभावित इलाकों में मिशनरीज धर्म प्रचार कर आदिवासियों का बलात् धर्म परिवर्तन कर रहे हैं और उनके मूल धर्म और मूल पहचान से अलग कर रहे हैं, किसके इशारे पर ये सब हो रहा हैं। शायद इसका जवाब भी अरुंधती और किशन के पास नहीं होगा। क्या कारण हैं कि विदेशों में लोग भारतीय धर्म के प्रति सहानुभूति रखते हैं पर अपने देश में केवल पेट के लिए लोग धर्म परिवर्तन कर ले रहे हैं।
आजकल इन्हें बहुत अच्छा बहाना मिल गया हैं नक्सलियों को समर्थन देने का कि केन्द्र और राज्य सरकार खनन के नाम पर, कल-कारखाने लगाने के नाम पर पूंजीपतियों को जमीन देने के लिए, जमीन हड़पने के लिए एमओयू कर रही हैं, ग्रीन हंट चला रही हैं। मैं भी मानता हूं कि इसमें कुछ सच्चाई हैं पर ये कौन सी बात हो गयी कि आप इसकी आड़ में देश को तोड़ने पर आमदा हो जाओ, कह दो कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है। ये बोलने का अधिकार किसने आपको दे दिया, आखिर चीन और पाकिस्तान के साथ आपको इतनी हमदर्दी हैं तो फिर भारत में रहने का क्या मतलब हैं, इसे भी तो यहां की जनता को बताओ पर आप ऐसा करोगे, हमें नहीं लगता, क्योंकि आप क्या हो, आज जनता जान चुकी हैं।

Tuesday, May 11, 2010

भुत पिशाच निकट नहीं आवे-----विद्रोही

भुत पिशाच निकट नहीं आवे-----विद्रोही

नक्सली कभी निकट नहीं आये, महावीर जब नाम सुनाये
एक फिल्म का सुपर हिट गीत है ------
जो तुमको, हो पसंद, वो ही बात करेंगे.
तुम दिन को कहो रात, तो हम रात कहेंगे.
ये गीत फिलहाल झारखण्ड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन पर फिट बैठता है. क्योकि जो -जो नक्सली कह रहे है, वे करते चले जा रहे है. उदार इतने है की वे नक्सलियों को अपना भाई-बंधू कहने से नहीं चुकते. ऑपरेशन ग्रीन हंट के सम्बन्ध में जब कोलकाता में मीटिंग होती है तब बीमारी का बहाना बनाकर अपोलो के बेड पर जाकर लेट जाते है. प्रखंड विकास पदाधिकारी का अपहरण होता है और वे इसे छोटो-मोटी घटना कहकर टाल जाते है. नक्सली जब उन्हें प्रेस कांफ्रेंस कहने को करते है तो वे प्रेस कांफ्रेंस तक कर डालते है. वाह देश के विभिन्न राज्यों में ऐसा सुंदर छवि और बुद्धिमान कोई मुख्यमंत्री है. इस सवाल का जवाब शिबू सोरेन ही दे तो अच्छा रहेगा.
झारखण्ड में धालभूमगढ़ के प्रखंड विकास पदाधिकारी का अपहरण, नक्सलियों के मांग के बाद पल पल में नक्सलियों के अनुरूप वरीय पुलिस पदाधिकारी रेजी डुंगडुंग का बदलता बयान, ऑपरेशन कोबरा पर लगी रोक और अंत में यहाँ के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का बयान साफ़ जाहिर करता है हमारा मुख्यमंत्री नक्सलियों के आगे कितना असहाय हो जाता है. देश में इस राज्य के मुख्यमंत्री ही है जो गुरूजी नाम से जाने जाते है. पर धालभूमगढ़ प्रकरण ने साफ़ कर दिया की यहाँ असली गुरु कौन है. यहा शासन किसकी चलती है.
इस प्रकरण ने बहुत सारे सवाल भी उठाये है. वरीय पुलिस पदाधिकारी रेजी डुंगडुंग का ये कहना की जियां और आस्ति गाव से पकडे गए लोग नक्सली नहीं थे, गर वे नक्सली नहीं थे फिर पुलिस ने उन्हें पकड़ा क्यों, ये तो और शर्मनाक है, आखिर झारखण्ड पुलिस किस ओर कदम बढ़ा रही है, ऐसे में नक्सलियों ने जो सहानुभूति उन ग्रामीणों से बटोरी, उसका लाभ किसे मिलेगा, पुलिस को या नक्सली को. यहाँ के DGP को खुद चिंतन करना चाहिए.
कमाल है सरकार के गठन हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए पर सरकार नक्सालियों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है या ये भी कह सकते है की नक्सलियों की गणेश-परिक्रमा कर रही है. आखिर ये सरकार काम कब करेगी. धालभूमगढ़ प्रकरण ने सिद्ध कर दिया की यहाँ सरकार नाम की कोई चीज नहीं है, इसलिए आम जनता शिबू के आगे न झुक कर नक्सलियों के आगे झुके तभी उनका कल्याण है अन्यथा नहीं. ये घटना यहाँ के प्रशासनिक अधिकारीयों को भी शायद अहसास करा दी है की उनकी सुरक्षा का भार किस पर है. इसलिए इनका जहाँ पदस्थापना होगा तो ये सरकार की कम और नक्सलियों की ज्यादा सुनेगे. ऐसे भी यहाँ के प्रशासनिक और पुलिसकर्मी अपने क्षेत्र में हनुमान चालीसा कुछ ज्यादा ही पढने लगे है. तुलसी की इस चालीसा में सिर्फ एक ही परिवर्तन हुआ है. भूत-प्रेत की जगह -- नक्सली जुट गया है. जैसे एक पंक्ति है ---- भूत-पिशाच निकट नहीं आये, महावीर जब नाम सुनाये. अब हो गया, नक्सली कभी निकट नहीं आये, महावीर जब नाम सुनाये।