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Thursday, May 25, 2017

रघुवर दास का आम जनता के बीच अलोकप्रिय होने के प्रमुख कारण...

झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का आम जनता के बीच अलोकप्रिय होने के प्रमुख कारण...
1. राज्य में कनफूंकवों के शासन की शुरुआत।
2. रघुवर शासन में लड़कियों और महिलाओं पर अत्याचार का बढ़ना, स्वयं जहां मुख्यमंत्री जन संवाद केन्द्र चलता है, वहां की लड़कियों ने राज्य महिला आयोग को पत्र लिखा कि यहां कार्यरत महिला संवादकर्मियों के साथ बराबर दुर्व्यवहार होता है। इन संवादकर्मियों को न्याय दिलाने के बजाय, इस पूरे मामले को ही मुख्यमंत्री जन संवाद केन्द्र चलानेवाले लोगों ने, मुख्यमंत्री रघुवर दास के साथ मिलकर उन लड़कियों का आवाज सदा के लिए दबा दिया। यहां तक कि राज्य महिला आयोग ने उन लड़कियों के द्वारा भेजे गये पत्र का संज्ञान तक नहीं लिया। यहीं नहीं ये लड़कियां सीएमओ तक गयी, सब ने कहां न्याय मिलेगा, पर न्याय तो दूर, उन लड़कियों की आवाज ही सदा के लिए दबा दी गयी।
3. एक पीड़ित पिता जब मुख्यमंत्री रघुवर दास से मिला तब मुख्यमंत्री ने उसे भरी सभा में बेईज्जत कर दिया, इसका फूटेज आज भी बहुत लोगों के पास है, जिसे जब चाहे देखा जा सकता है।
4. अयोग्यों और बेवकूफों को सम्मान और योग्य तथा विद्वानों को अपमान करने की परंपरा की शुरुआत।
5. आम जनता की बात को दरकिनार कर जबर्दस्ती सीएनटी-एसपीटी कानून को जमीन पर उतारने की कोशिश।
6. निकम्मे अफसरों पर नकेल नहीं कसना और छोटे-छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराने की शुरुआत।
7. झारखण्ड लोक सेवा आयोग में भ्रष्टाचार चरम पर।
8. स्पष्ट नीति का अभाव, कई नीतियां बनी पर जमीन पर उतराने में नाकाम।
9. नक्सलियों को महिमामंडन करने की परंपरा की शुरुआत।
10.  डोभा निर्माण और वन लगाओं अभियान में बड़े पैमाने पर लूट।
11.  ठेकेदारों, अभियंताओं को लूट की छूट और आम जनता को अपमानित करने का काम प्रारंभ।
12.  आम जनता के प्रति मुख्यमंत्री रघुवर दास का नजरिया ठीक नहीं होना। जब सामान्य जनता इनसे मिलने की कोशिश करती है तो ये उससे इस प्रकार बाते करते  है, ऐसा इनका बॉडी लेग्वेंज होता है कि उनसे बात करनेवाला सामान्य नागरिक खुद को अपमानित महसूस करता है।
13.  भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ मुख्यमंत्री रघुवर दास का रवैया ठीक नहीं होना। स्थिति ऐसी है कि कोई भी भाजपा कार्यकर्ता आज की स्थिति में रघुवर दास को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।
14.  संघ के स्वयंसेवकों से बढ़ती दूरियां। संघ के बड़े अधिकारियों ने मुख्यमंत्री की अक्षमता और स्वयंसेवकों के प्रति इनके द्वारा उठाये जा रहे कठोर रवैये की सूचना नागपुर और दिल्ली तक पहुंचाई।
15.  अपने विरोधियों के साथ दमनात्मक रवैया, तथा विपक्षी दलों के प्रमुख और शीर्षस्थ नेताओं को अपमानित करना।
16.  परिवारवाद को बढ़ावा देना।
17.  आत्मप्रशंसा के लिए अयोग्य कंपनियों पर करोड़ों लूटाना, उन कंपनियों पर जो राज्य के एक मंत्री अमर कुमार बाउरी को अमर कुमारी बना देता है, जो राज्य के नक्शे के साथ खिलवाड़ कर देता है और उस पर एक्शन तक नहीं लिया जाता, बल्कि उसे और बढ़ावा दिया जाता है।
18.  राज्य में आधारभूत संरचना का बुरा हाल। पूरे राज्य में अभूतपूर्व बिजली संकट, पेयजल संकट और सड़कों का बुरा हाल।
19.  झूठ बोलने की कला में माहिर। बोकारो के एक दो पंचायत को कैशलेस बनाने की घोषणा कर देना और बाद में पता चलता है कि वह पंचायत तो कैशलेस हुआ ही नहीं है।
20.  स्वच्छता अभियान की हवा निकल जाना।
21.  मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर करोड़ों का खेल करना और उसका फायदा झारखण्ड को न के बराबर मिलना।
22.  दीपावली के दिन चीनी सामानों का विरोध और बाद में चीन तथा अन्य देशों के व्यापारियों को झारखण्ड बुलाकर उनकी आरती उतारने की शुरुआत।
23.  आत्ममुग्धता में बहने के कारण अच्छे और सही लोगों की बात नहीं सुनना और कनफूंकवों मे रमे रहना।
24.  आरती उतारनेवाले पत्रकारों की जय-जय और राह दिखानेवाले पत्रकारों पर प्राथमिकी और उसे अपमानित करने का कार्य प्रारंभ।

Tuesday, May 23, 2017

कनफूंकवों के इशारे पर...........

कनफूंकवों के इशारे पर हुई प्राथमिकी.....
रांची से प्रकाशित कुछ राष्ट्रीय अखबारों ने मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कनफूंकवों को खुश करने के लिए हाथों में गजरा लगाकर ठुमरी गाया.....
भाजपा नेता ने ही रघुवर को राम बनाया और भाजपा नेता ने ही उस चित्र को मुझे भेजा और भाजपा नेता ने ही कनफूंकवों के इशारे पर मेरे खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दी, यानी ऐसे चल रहा है, रघुवर शासन और ऐसे चल रही है रघुवर के इशारे पर यहां की पत्रकारिता.....
जी हां, रांची में ऐसे ही पत्रकारिता हो रही है। हिन्दुस्तान अखबार को छोड़कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और प्रभात खबर ने मुझे पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया है, जबकि प्रभात खबर अच्छी तरह जानता है कि उसके अखबार में मेरे कई आलेख पत्रकार के रुप में प्रकाशित हो चुके है, उसके द्वारा संचालित पत्रकारिता संस्थान में, मैं कई बार सेवा भी दे चुका हूं, पटना के दानापुर अनुमंडल से प्रभात खबर को मैंने संवाददाता के रुप में सेवा भी दी है, पर आज उसे रतौंधी हो चुकी है, इस रतौंधी के कारण उसने हमें पत्रकार के रुप में पहचानने से इनकार कर दिया। ये वहीं प्रभात खबर है, जो भारत के कश्मीर को एक नहीं कई बार पाकिस्तान का अंग बता चुका है, राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता है, उसका गलत चित्र अपने अखबार में प्रकाशित करता है, पर उस प्रभात खबर के खिलाफ एक बार भी राष्ट्रद्रोह का मुकदमा न तो मुख्यमंत्री कराता है और न उसके आस-पास रहनेवाले कनफूंकवें, आखिर वे ऐसा क्यों नहीं करते, ये तो रघुवर और उनके कनफूंकवे ही बतायेंगे।
दैनिक जागरण, यहां भी मैंने मोतिहारी और धनबाद में कार्यालय प्रमुख के रुप में सेवा दी है, पर ये हमारे लिए शख्स का प्रयोग कर रहा है, ये ऐसा क्यों कर रहा है, वह मैं अच्छी तरह जानता हूं, यहां काम कर रहे एक शख्स को हमे देखते ही मिर्ची लग जाती है, इसलिए उसे एक छोटा सा मौका मिला, खूब जमकर अपनी भड़ास निकाल ली, ऐसे उसकी हिम्मत नहीं कि वो हमें दोषी ठहरा दें, पर अखबार में भड़ास अगर निकल जाता है, तो क्या गलत है?
दैनिक भास्कर तो नया – नया अखबार है, उसमें काम करनेवाले कई लोग हमारे फेसबुक फ्रेंड है, वहाटस ग्रुप में भी है, पर इसने भी मर्यादा को ताड़-ताड़ कर दिया, यानी इसके भी नजर में मैं पत्रकार नहीं हूं।
आखिर पत्रकार होता क्या है?
क्या जो मुख्यमंत्री के आगे नाचते हुए ठूमरी गाये, वो पत्रकार है।
क्या पत्रकार वो है, जो मुख्यमंत्री और उनके कनफूंकवों के आगे अपनी कलम बेच दे।
अरे पत्रकार तो वह होता है, जो अपनी जमीर किसी भी हालत में न बेचे।
इन अखबारों ने प्राथमिकी देखी और बस न्यूज लिख दिया, जबकि इन लोगों के पास हमारे मोबाइल नंबर है, पर इन लोगों ने पत्रकारिता की एथिक्स को ही मटियामेट कर दिया। यानी बेशर्मी की सारी हदें, पार कर दी, पर शायद इन्हें नहीं पता कि आज उनकी सारी हेकड़ी, सारी अकड़ सोशल साइट्स ने निकाल दी है।
इनकी वश चले तो ये हमें सूली पर चढ़ा दे, पर इन्हें नहीं पता कि मैं जब भी कुछ लिखता हूं तो उसका आधार होता है. और वह आधार मेरे पास है।
कौन ये चित्र बनाया,
किसने पेश किया,
किसने वायरल किया,
जवाब मैं दूंगा,
और जब मैं जवाब दूंगा तो सबकी फटेगी...
फटेगी उन कनफूंकवो की भी
और
फटेगी मुख्यमंत्री और कनफूंकवों के आगे ठूमरी गानेवाले उन तथाकथित अखबारों की भी।
और अब बात धार्मिक भावना की...
ये धार्मिक भावना तब नहीं भड़कती, जब मुख्यमंत्री खूलेआम श्रीरामचरितमानस की चौपाईयों से स्वयं को जोड़ता है...
ये धार्मिक भावना तब नहीं भड़कती, जब मुख्यमंत्री स्वयं को रघुकुल यानी भगवान राम के कुल से स्वयं को जोड़ता है...
ये धार्मिक भावना तब नहीं भड़कती, जब गोस्वामी तुलसीदास की रचना का इस्तेमाल एक मुख्यमंत्री स्वयं के लिए करता है, और संविधान के प्रस्तावना में उद्धृत धर्मनिरपेक्ष भावना का अनादर करता है।
सबूत आपके सामने है, जरा देखिये, पूरे रांची में कैसे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने श्रीरामचरितमानस की चौपाईयों और धर्मनिरपेक्षता की धज्जियां उड़ा दी...
आश्चर्य इस बात की है कि एक मुख्यमंत्री और उसका तबका खूलेआम धार्मिक भावना की धज्जियां उड़ा रहा है, पर उसके खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं होती, और एक व्यक्ति सत्य लिखता है, सत्य को प्रतिष्ठित करता है, तो ये मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कनफूंकवे तथा इनके इशारे पर ठूमरी गानेवाला कुछ अखबारों का समूह एक ईमानदार व्यक्ति को ही कठघरे में रख देता है।
अरे मैं चुनौती देता हूं कि इस पूरे मामले की जांच करो, पर तुम जांच नहीं करा पाओगे, क्योंकि फंसेगा और कोई नहीं, वहीं फंसेगा जो ज्यादा अभी काबिल बन रहा है, क्योंकि मेरे पास पक्के सबूत है कि किस भाजपा नेता ने रघुवर दास का राम के रुप में चित्र बनाया और किसने वायरल किया, और इस पर किसने, किससे क्या संवाद किया।
है हिम्मत तो मैं तूम्हे चुनौती देता हूं, इस चुनौती को स्वीकार करो।
और
धमकी किसे देते हो, मूर्खों,
मैं कोई बहुत बड़ा तोप थोड़े ही हूं,
अभी भी साधारण तरीके से एक किराये के घर में रहता हूं, आ जाओ, हमें खत्म करा दो।
तुम्हे किसने रोका है,
जागीर तुम्हारी,
शासन तुम्हारा
कनफूंकवे तुम्हारे
और ठुमरी गानेवाले अखबार तुम्हारा
फिर दिक्कत किस बात की....

Saturday, April 29, 2017

क्या है अक्षय तृतीया...........

अमिता पिछले पन्द्रह दिनो से अपने पति राज से झगड़ रही है कि पिछले साल जिस प्रकार से राज ने अक्षय तृतीया के दिन धोखा दिया था, वह इस बार धोखा नहीं देगा। इस साल अक्षय तृतीया के दिन सोने के कंठहार वह लेकर रहेगी, क्योंकि पिछले दिनों एक पंडित जी ने कहा था कि अक्षय तृतीया के दिन सोने का कोई न कोई आभूषण अवश्य खरीदना चाहिए, क्योंकि सोना कभी क्षय नहीं होता, उससे लाभ ही लाभ होता है, घर में सुख-शांति आती है, समृद्धि आती है। बेचारा राज, उसे पिछले साल की तरह इस साल भी आमदनी में कुछ खास वृद्धि नहीं हुई, पर पत्नी ने ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया है कि उसके हालत पस्त है। अमिता और राज की तरह ऐसे कई घर और परिवार है, जो अक्षय तृतीया के नये मिजाज से अपने घर को तबाह करने में लग गये है।
उसका कारण है कि इन दिनों नये ढंग के पंडितों, नये ढंग के अखबारों-चैनलों और नये ढंग के व्यापारियों ने जन्म ले लिया हैं। इन तीनों ने मिलकर इस प्रकार से अक्षय तृतीया की ब्रांडिंग कर दी है, कि आम आदमी इस पर्व के चक्कर में अपनी खुशियां बड़े-बड़े धन्ना सेठों के यहां गिरवी रखने को मजबूर हैं।
पंडितों (पंडित का मतलब जाति नहीं समझ लीजियेगा, अगर आप इसे जाति से तौलेंगे तो धोखे में पड़ जायेंगे, आजकल हर जातियों में नये – नये पंडित जन्म ले लिये है, जो गांवों-शहरों में जन्मकुंडली देखने का दुकान खोल लिये है, मैं उनकी बात कर रहा हूं) को देखिये तो वे बेसिर-पैर की बातें वैदिक मंत्रों से जोड़कर आम-आदमी को मूर्ख बना रहे है, जबकि उन वैदिक मंत्रों का उससे कोई लेना – देना नहीं होता।
दूसरी ओर अखबार और चैनलवाले बड़े-बड़े व्यापारियों, जिनकी दुकानें, व्यापारिक प्रतिष्ठानें शहरों में चल रही है, उनसे विज्ञापन इस प्रकार वसूलते है, वह भी उनके गर्दन पर छुरी रखकर, कि अगर वे विज्ञापन नहीं देंगे तो वे आयकर विभाग से उसकी शिकायत करके, उसकी सारी दुकानदारी मटियामेट कर देंगे और इस प्रकार व्यापारियों और मीडिया के लोगों का मधुर संबंध बनता है, भर-भर पेज विज्ञापन मुक्त कंठ से ये व्यापारी वर्ग अखबारों को उपलब्ध कराते है और इस प्रकार झूठ का व्यापार जमकर एक दिन चलता है, जिसका नाम है – अक्षय तृतीया।
मैं पूछता हूं कि आम जनता पूछे, उन ढोंगी पंडितों, अखबारवालों और व्यापारियों से कि वे बतायें कि...
• किस सनातन-वैदिक ग्रंथों में लिखा है कि हमारे भगवान राम सीता के संग, भगवान शिव पार्वती के संग, भगवान विष्णु लक्ष्मी के संग या कोई भी देवता अपनी-अपनी पत्नी के संग, किसी व्यापारी के यहां जाकर अक्षय तृतीया के दिन स्वर्णाभूषण या अन्य वस्तूएं खरीदी थी?
• अक्षय का अर्थ क्या होता है?
• दुनिया में वह कौन ऐसा चीज है, जो अक्षय है, जिसकी प्राप्ति के बिना जीवन सफल नहीं हो सकता, आगे नहीं बढ़ सकता?
• अक्षय तृतीया के दिन किस चीज को प्राप्त करने से जीवन सुलभ हो जाता है?
• आखिर अक्षय तृतीया के दिन सोने-चांदी या अन्य सुख-सुविधाओं के सामान क्यों नहीं खरीदने चाहिए?
इन सारे प्रश्नों का उत्तर आपको कोई ढोंगी पंडित, कोई अखबार या कोई व्यापारियों का समूह नहीं देगा, क्योंकि ये सभी व्यापार के नाम पर यहां की जनता को बेवकूफ बना रहे है और अपना उल्लू सीधा करते है।
और
अब हम आपको सारे प्रश्नों का जवाब दे देते है...
• हमारे भगवान कभी भी विलासिता संबंधी वस्तुओं को खरीदने की सलाह नहीं देते, उनका केवल यहीं कहना होता है कि आप उन्हें स्मरण करें, जीवन सफल हो जायेगा।
• अक्षय का अर्थ होता है, जिसका कभी क्षय नहीं हो।
• दुनिया में जितनी वस्तूएं हैं, सभी क्षय होनेवाली है। उनका नाश तय है, इसलिए ये अक्षय हो ही नहीं सकती, इसलिए इन चीजों को खरीदना नहीं चाहिए, लेकिन दुनिया में एक चीज है, जिसका कभी क्षय नहीं होता, वह है प्रभुकृपा अथवा अपने से बड़ों का आशीर्वाद। यह ऐसी वस्तु है, जिसका कभी क्षय नहीं हो सकता, इसलिए हमें प्रभुकृपा और आशीर्वाद की ललक को जागृत करना चाहिए।
• जो भी व्यक्ति प्रभुकृपा और अपने से बडों का आशीर्वाद को त्याग कर भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए दिमाग लगाता है, वह उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे भौतिक वस्तूएँ।
और अंत में,
इन ढोंगियों से पूछिये कि बताओं, राम, कृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई, लक्ष्मीबाई, सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी महान विभूतियां किस साल अक्षय तृतीया के दिन भौतिक वस्तूओं की प्राप्ति के लिए, सुख-सुविधा की प्राप्ति के लिए अक्षय तृतीया तुम्हारे कथनानुसार मनाया था और जब उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो हमें आप ऐसा करने को प्रेरित क्यों कर रहे हो? आओ देश बनाएं, न कि स्वयं रसातल में चले जाये और ढोंगियों का बराबर शिकार बनते रहे।

Tuesday, November 1, 2011

दरसन दीहिन अपान दीनानाथ, भेंट लीहिन हमार...............

कोई दस साल उस वक्त उम्र रही होगी। मां छठव्रत कर रही थी और गीत गाती जाती थी, साथ ही इशारों - इशारों में मुझे कुछ कह रही होती और मैं भी उन इशारों को समझ कर, दोनों हाथों को जोड़कर बैठ जाता, मां के गीतों के भाव सब कुछ कह देते कि वो भगवान भास्कर और छठि मईया से क्या चाहती हैं। मैं भी मां से पूछता कि मां ये छठि मईया कौन हैं, भगवान भास्कर को क्यों अर्घ्य देते हैं। मां बताती जाती, मेरा भी बालमन, एक प्रश्न का उतर जैसे ही खत्म होता कि दूसरा शुरु...। पर मां कभी गुस्साती ही नहीं। घर में छठ का होना बहुत ही अच्छा लगता, हमें पता हैं कि जिस घर में छठ होता, मुहल्ले के लोग छठव्रतियों और उऩके परिवार पर विशेष श्रद्धा लुटाते। नहाय खा के दिन तो मैं देखता कि जिसके घऱ में कद्दू फलता, वो बिना पैसे ही लिये कद्दू बांट देता, इसी तरह फलों की भी बारी होती, जिसके घर में घाघरा निंबू या केले के पेड़े होते गर उसके यहां उस कालखंड में फल प्राप्त हुए हैं तो वो स्वयं खाने के बजाय छठि मइया को भोग लगाना नहीं भूलता। पता नहीं क्यूं, मुझे आज भी याद हैं कि जब से होश आया -- तब से लेकर आज तक छठ व्रत के नहाय खा के दिन जो प्रसाद तैयार होता, उस प्रसाद के स्वाद को मैं, फिर सालों भर ढूंढने की कोशिश करता, प्राप्त ही नहीं होता, शायद छठि मइया और भगवान भास्कर के भाव का ही प्रताप हैं कि उस प्रसाद में, गजब के स्वाद मिल जाते हैं जो फिर दूसरे दिन के बाद से मिल ही नहीं पाते।
यहीं नहीं पूरा मुहल्ला दीपावली के समाप्त होते ही एक ही काम में लग जाता कि छठ व्रत को धूमधाम से कम, पर पवित्रता से अधिक मनाना हैं। सादगी खूब झलकती। साड़ी तो कम पर पीली धोती सूखाने का काम जरुर शुरु हो जाता। पीली धोती सुख रही हैं - मतलब इनके घर में छठ होना हैं। खरना के दिन कई घरों में भगवान सत्यनारायण की पूजा और शंख ध्वनि मन को और पवित्र बनाती। हमारे मुहल्ले में चूंकि किसानों के परिवार अधिक थे, इसलिए यहां सत्यनारायण की पूजा की समाप्ति के बाद झाल करतालों, ढोल के बीच - राजाराम जी की आरती, मन को और आह्लादित करती, और ठीक इसके बाद जिस दिन पहला अर्घ्य देना हैं, नवयुवकों की टोली, हाथों में झाडू लेकर सड़कों की ऐसी सफाई करती, जैसे लगता कि स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। हमारे बाबूजी भी हाथ में पानी भरा बाल्टी लेते और जहां तक हो पाता, वे सड़कों के धूलों को उड़ने न देने का विशेष प्रयास करते, पानी छिडकते, कुछ युवाओं को मैं देखता कि वे बाबूजी के पानी की बाल्टी लेने का प्रयास करते और कहते कि बाबा आप पानी मत छीटिये, हम हैं न, सब कर देंगे, आप आराम से बैठिये, आप केवल दिशा निर्देश दीजिये, पर बाबूजी हमारे कहां माननेवाले, वे कहते कि हमें भी भगवान के सेवाकार्यों में लग जाने दो। एक दिन हमने ये कहते और करते बाबूजी से पूछ ही डाला कि भगवान को आपने देखा हैं, बाबूजी कहते हां, देखा हैं, जब कोई प्रसन्नचित हो, समाज सेवा या राष्ट्रसेवा कर रहा होता हैं तो वो भगवान ही तो होता हैं। मैं बोलता तब तो हमारा सारा मुहल्ला सच्चे अर्थों में समाज सेवा में लगा हैं, तब तो सभी भगवान हैं. बाबूजी कहते कि हां ये व्रत ही स्वयं को मनुष्य और देवत्व की ओर ले जाने की प्रेरणा देता हैं, गर सभी इसी प्रकार का काम करें जैसा कि आज कर रहे हैं तो फिर इस मुहल्ले में कहीं कोई गंदगी नहीं रहेगी और न ही कोई दुखी रहेगा, क्योंकि देख रहे हो, जो कल तक एक दूसरे से लड़ते थे, वे भी आज पूछ रहे हैं कि तुम्हारे यहां जो छठव्रत हो रहा हैं, उसमें कहीं कोई दिक्कत तो नहीं, अरे वो देखों, वो तो छठ का दौरा ले जा रहा हैं, कौन हैं वो, पता चला कि अरे वो तो भिखारी भाई हैं, पर ये क्या, ये तो ऐसे व्यक्ति का दौरा माथे पर लिये हैं, जिनसे कभी उनकी पटी ही नहीं। धन्य हैं छठि मइया और भगवान भास्कर जो काम कोई नहीं कर सका, वो आपने कर दिखाया।
यहीं हाल घाटों का होता, सभी एक दूसरे को सहयोग करते नजर आते, आगे या पीछे छठव्रती नजर आते, तो लोग उन्हें पहले जाने का रास्ता दिखाते, गर साष्टांग प्रणाम कर रही होती छठव्रती, तो उनके आगे शीष नवाना नहीं भूलते, उस वक्त लोग ये भूल जाते कि वो किस जाति की हैं, बस ख्याल यहीं हैं कि वो छठवती हैं। ये परिदृश्य आज भी हमारे मुहल्ले में देखने को मिलते हैं, कभी कभी सोचता हूं कि कितना अच्छा रहता कि ये छठव्रत प्रतिदिन हो जाता, पर सच्चाई ये हैं कि जो प्रतिदिन होता हैं, उसकी महत्ता घटते देर नहीं लगती, चलिए गर एक ही दिन स्वर्ग पृथ्वी पर आ जाये और हम बावले होकर, उसका आनन्द ले, तो क्या गलत हैं।
आज एक से एक लेटेस्ट टेक्नालाजी हमारे सामने हैं, सबके पास इयर फोन हैं पर उस वक्त ले देकर, एक रिकार्ड बजानेवाला ही यंत्र था और उसमें ले देकर दो ही छठ के गीत और उसी में पूरा छठ समाप्त। वो गीत थे -- जिसमें एक तरफ था -- उ जे केलवा जे फरेला घवद से, उपर सूग्गा मोर राय, उ जे खबरि जनइवो अदित से, आदित होखी न सहाय, और दूसरा गीत था -- दरसन दिहि न अपान दीनानाथ, भेंट लीहि न हमार। जिसमें ये भी संदेश होता कि हे ईश्वर गर बेटा देना तो सभा में बैठने लायक देना, नहीं तो संख्या बढ़ानेवाला नहीं देना, बेटी जरुर देना, क्योंकि बिना बेटी के घर का आंगन नहीं शोभता। जरा गीत के बोल देखिये - सभवा बैठन के बेटा मांगिल, गोरवा दबन के पूतोह, दीनानाथ, दरसन दीहि न अपान..... रुनकी झूनकी बेटी मांगिल, पढ़ल पंडितवा दमाद, दीनानाथ, दरसन दीहि न अपान.....। ये गीत के बोल स्पष्ट कह देते कि ये व्रत आनेवाले प्रारब्ध को ठीक करने का भी पर्व हैं। पर क्या आधुनिक समाज इस संबंध में कुछ सोच रहा हैं कि जैसे ये गीत विलुप्त हो गये, हमारे चरित्र भी विलुप्त हो गये, गर ये चरित्र, उन गीतों की तरह विलुप्त हो गये हैं तो जरुरत हैं, इस ओर ध्यान देने की, नहीं तो आनेवाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी।
किसी भी देश में पर्व व त्योहार, इसलिए नहीं बने कि आप केवल आनन्द मनाये, इसलिए भी बने है कि आनन्द के साथ - साथ उस पर्व की व्यावहारिकता को समझे। कल एक सज्जन हमसे मिले, उन्होंने कहा कि जनाब, इतनी महंगाई है कि आदमी क्या छठ करेगा। मैंने, उनसे साफ कहा कि क्या भगवान भास्कर और छठि मइया आपसे कुछ मांगे हैं क्या, और गर आपसे वो मांग भी ले तो क्या आप उनकी मांगों की पूर्ति करने के लायक हैं, गर नहीं तो फिर इस प्रकार के प्रलाप क्यों। मैंने तो देखा कि अपने मुहल्ले में कई ऐसे गरीब भी थे, जिनके पास फूंटी कौड़ी तक नहीं थी, पर वे भी छठव्रत करते, उनके उत्साह में अथवा जोश में किसी भी प्रकार की कमी नहीं दिखती। बस उपवास किया, चले गये मां गंगा के गोद में, जमकर नहाया, शरीर को रगड़ा और दोनो हाथ जोड़कर भगवान भास्कर के घ्यान में लग गये और जब अर्घ्य का वेला आया, उसी गंगा के गोद में बैठकर अथवा खड़े होकर, उसी के जल से अर्घ्य दे डाला, लीजिये व्रत संपल्न। छठि मईया खुश और भगवान भास्कर भी खुश।
कमाल की बात हैं कि जिस परम ज्ञान को आज की आधुनिक पीढ़ी विभिन्न विश्विविद्यालयों में पढ़कर नहीं प्राप्त कर सकी थी, उस परम ज्ञान को एक सामान्य, गरीब आदमी बिना कलम और किताब लिये प्राप्त कर लिया था. कि कार्तिक शुक्ल रवि षष्ठी व्रत के दिन ही आदिशक्ति का प्रादुर्भाव, भगवान भास्कर की रश्मियों में हो जाता हैं तो भला ऐसे में उन परम शक्तियों को प्राप्त क्यूं न करें। कम से कम ब्रह्मवैवर्तपुराण तो ये ही कहता हैं। शायद यहीं कारण रहा होगा कि अपने देश में एक से एक मणीषी हुए, जिन्होंने न तो कलम छूयी और न किताब पढ़ी, पर परमज्ञान को इस प्रकार पा लिया कि जिसकी परिकल्पना आज की पीढ़ी तो कम से कम नहीं ही कर सकती, क्योंकि आज की पीढ़ी तो सिर्फ ये देखती हैं कि उसे कितने का पैकेज मिलता हैं। भला छठव्रत करने से पैकेज मिलेंगे क्या, गर पैकेज मिलेंगे ही नहीं तो इससे अच्छा हैं कि वो काम करे, जिससे पैकेज यानी धन प्राप्त हो। जबकि भारत पैकेज अथवा धन प्राप्त करने का देश नहीं, बल्कि स्वयं को खोकर, दूसरे को आह्लादित व प्रसन्नचित करने वाले देश का नाम हैं। हमे लगता हैं कि छठव्रत और भगवान भास्कर का ये महापर्व यहीं संदेश सदियों से देता आ रहा हैं। धन्य हैं वो प्रांत, जहां से ये व्रत चलकर संपूर्ण विश्व में फैलता जा रहा हैं, इस परिदृश्य को देख तो मैं यहीं कह सकता हूं कि भारत जिसकी संस्कृति इतनी गहरी हैं, 21वीं सदी में अपना सशक्त व जागृत रुप अवश्य दिखायेगा।

Monday, October 31, 2011

लोकपर्व छठ की हार्दिक शुभकामनायें.............

एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्तया गृहाण अर्घ्यं दिवाकर।।






ऊं आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।। (ऋग्वेद)

Friday, November 12, 2010

एहि सूर्य ..........

( छठ पर विशेष )
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्तया गृहाण अर्घ्यं दिवाकर।।

जब से सृष्टि बनी तभी से मनुष्य ने प्रकृति द्वारा प्रदत्त हर वस्तूओं को जानने की कोशिश की, और अपने अपने ढंग से परिभाषा गढ़नी शुरु की। जब जब कार्तिकशुक्ल रविषष्ठी व्रत आता हैं, जिसे सामान्य जन छठ व्रत कहते हैं, अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छठव्रत से संबंधित मनगढ़ंत बातें छपनी और दिखानी शुरु हो जाती हैं, ऐसी ऐसी बातें, जिनका छठ से कोई लेना देना नहीं होता, और इस कारण से आनेवाली नयी पीढ़ी, इस छठ के आध्यात्मिक पक्ष से विमुख होती जा रही हैं, लेकिन जब इन्हीं से संबंधित उन समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों से ये पूछे कि आखिर उनके पास जो वे लिख रहे हैं या दिखा रहे हैं, उसके क्या शास्त्रीय आधार है, तो वे तुरंत ये कहकर पल्ले झाड़ लेंगे कि इससे संपादक का कोई लेना देना नहीं, पर क्या संपादक को ये अधिकार हैं कि वे अपनी दकियानूसी विचारधाराओं और अविश्वसनीय आलेखों और प्रवचनों से आम लोगों की बुद्धि को प्रभावित कर दें। खैर, जो इन्हें करना था, कर चुके हैं, पर आम जनता को ये जानना अवश्य चाहिए कि आखिर ये छठ व्रत क्या हैं और इसके वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार क्या हैं.....
सर्वप्रथम वैज्ञानिक पक्ष.......
सूर्य क्या है........?

सामान्य सा उत्तर हैं कि सूर्य ग्रह नहीं हैं, यह एक तारा हैं, जो सामान्य तारों की अपेक्षा पृथ्वी के नजदीक हैं और इसी से पृथ्वी प्रकाशित होती हैं और अन्य नौ ग्रह इसके चारों और चक्कर लगाते हैं।
कुछ इस प्रकार भी इसे परिभाषित कर सकते हैं कि सूर्य उच्च तापक्रम वाले अंसख्य पिंडों से बना हैं, इसमें मुख्यतः हाईड्रोजन होती हैं। सूर्य का व्यास पृथ्वी से 109 गुणा बड़ा है, और इसका भार पृथ्वी से 3,30,000 गुणा अधिक है। परंतु सूर्य का घनत्व पृथ्वी की तुलना में केवल एक चौथाई है। वैज्ञानिकों की माने तो करीब 10.5 अरब वर्ष पहले समस्त अंतरिक्ष में फैले गैस के बादल विभिन्न स्थानों पर निकट आये, धीरे-धीरे विभिन्न स्थानों पर वे पास आते गये। गैस के बादलों की ये गेंदे समय के साथ दबती गयीं। और जैसे जैसे उनका तापमान बढ़ता गया, उनमें से हरेक गेंद एक चमकीला सितारा बन गयी। इस प्रकार अंसख्य तारे बने, जिनमें से हमारा सूर्य भी एक था।
वैज्ञानिक ये भी कहते हैं कि करीब 15 अरब वर्ष पहले, एक उंचे तापमान और घनत्व के बड़े धमाके के कारण यह अंतरिक्ष बना, जहां हम आज है। जैसे-जैसे अंतरिक्ष फैला, वैसे-वैसे तापमान ठंडा होने लगा। विभिन्न प्रकार के पदार्थ और विकिरण उत्पन्न होने लगे। जैसे जैसे यह और बड़ा हुआ, गैस के दो प्रकार के बादल बने – एक में गैस का घनत्व अधिक था, दूसरे में गैस का घनत्व कम था। अंत में अतरिक्ष में तैरते गैसे के ये बादल और पदार्थ कुछ स्थानों पर पास आये और अनेक आकाशगंगाएं बनी। इनमें से एक आकाशगंगा में एक अकेला सितारा बहुत तेजी से चमकने लगा। ये चमकता तारा हमारा सूर्य बना और इसके चारों और मंडराते हुए गैस के बादलों ने ही निकट आकर अन्य ग्रहों और पृथ्वी को बनाया। इस प्रकार माना जाता हैं कि सूर्य आज से कोई 460 करोड़ वर्ष पहले बना हुआ होगा।
वैज्ञानिक ये भी मानते हैं कि वर्तमान सूर्य हाईड्रोजन गैस के जलने के कारण लगातार गर्मी और प्रकाश दे रहा है। सूर्य के क्रोड में हाईड्रोजन लगातार जलकर हीलियम में बदलती है। जैसे-जैसे हाईड्रोजन की मात्रा कम होती हैं, सूर्य लगातार कमजोर होता है। बाद में सूर्य में ही हीलियम गैसे जलने लगेगी और सूर्य फैलने लगेगा। सूर्य फैलकर इतना बड़ा हो जायेगा कि वह समीप के बुध और शुक्र जैसे ग्रहों को ही निगल सकता हैं। अंत में सूर्य तेजी से सिकुड़ने लगेगा और श्वेत वामन तारा बन जायेगा। फिर सूर्य अपनी जीवन यात्रा खत्म करेगा और अंतरिक्ष की धूल के रुप में शुन्य में विलीन हो जायेगा। और
अब आध्यात्मिक पक्ष......
भगवान सूर्य को धार्मिक शास्त्रों में विभिन्न नामों से जाना जाता है ----------
भास्कर, दिवाकर, प्रभाकर, रवि, भानु, अंशुमाली, मार्तंड, मरीची, आदित्य, सविता, पतंग, दिनकर, हंस आदि।
भगवान सूर्य के अर्चन के लिए विहित पत्र-पुष्प
भविष्य पुराण बताता हैं कि सूर्य भगवान को यदि एक आक का फूल अर्पन किया जाय, तो सोने की दस अशर्फियां चढ़ाने का फल प्राप्त हो जाता है। भगवान सूर्य को बेला, मालती, काश, माधवी, पाटला, कनेर, जपा, यावन्ति, कुब्जक, कर्णिकार, पीली कटसरैया, चंपा, रोलक, कुंद, काली कटसरैया, बर्बर मल्लिका, अशोक, तिलक, लोध, अरुपा, कमल, मौलसिरी, अगस्तय और पलाश के फूल तथा दूर्वा अतिप्रिय है। भगवान सूर्य को बेलपत्र, शमी का पत्ता, भँगरैया की पत्ती, तमाल का पत्र, तुलसी और काली तुलसी के पत्ते, कमल के पत्ते भी पसंद है। भगवान सूर्य को गुंजा, धतूरा, कांची, अपराजिता, भटकटैया, तगर और अमड़ा न चढ़ाये, क्योंकि वीरमित्रोदय इन वस्तूओं को सूर्य पर न चढ़ाने को कहा है।
धार्मिक पुस्तकों की माने तो भगवान सूर्य की माता का नाम अदिति और पिता का नाम कश्यप है। इसलिए इन्हें आदित्य और कश्यपनंदन के नाम से भी पुकारा जाता हैं। इनकी पत्नी दक्षकन्या रुपा थी। ये सप्तअश्व से युक्त रथ पर आरुढ़ होते हैं और इनके सारथि अरुण है। इनके एक हाथ में चक्र होता है। भविष्य पुराण की मानें तो दक्षकन्या जिनका नाम रुपा था, उनसे भगवान भास्कर का विवाह हुआ और उससे दो संताने हुई, जिनका नाम था यम और यमुना। किन्तु भगवान भास्कर के तेज को रुपा सहन नहीं कर सकी, और छाया के रुप में अपनी ही एक प्रतिमूर्ति बनाकर वह स्वयं तप करने चली गयी। इसी छाया से शनि और ताप्ती की उत्पत्ति हुई। यमुना और ताप्ती आज भी भूलोक में पृथ्वी पर पवित्र नदियों के रुप में प्रत्यक्ष है।
कहा जाता है कि जड़ व चेतन की आत्मा, प्रत्यक्ष भागवत स्वरुप साकार ब्रह्म रुप हैं – भगवान सूर्यदेव।
वेद कहते हैं -----
ऊं आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।। (ऋग्वेद)
ऋग्वेद में तो भगवान भास्कर से संबंधित कई सूक्त आपको मिल जायेंगे। उस ऋग्वेद में जिसे गिनीज बुक ऑफ वलर्ड रिकार्डस नामक पुस्तक मानती हैं कि ये विश्व की सबसे प्राचीन पुस्तक हैं।
यहीं नहीं अथर्ववेद कहता हैं कि ---------------
सूर्यस्तवाधिपतिमृर्त्योरुदायच्छतु रश्मिभिः अर्थात भगवान भास्कर की रश्मियां जीवन प्रदाता, स्वास्थ्य प्रदाता हैं ये अमृततुल्य होती है। ओंकार सूर्य देव की नित्य उपासना व अर्घ्य, पुष्प अर्पण सर्वदा शुभ हैं।
कौन हैं छठि मईया..........?
छठि मईया और कोई नहीं वहीं आदिशक्ति हैं, जिनसे सारी सृष्टि उत्पन्न हुई हैं, वहीं प्रकृति की छठवीं अंश हैं, उन्हें आप षष्टम् कात्यायिनी कहें, अथवा और जो नाम डाल दे। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार देवसेना, जो ब्रह्मा की मानसपुत्री और कार्तिकेय की भार्या है, उन्हें भी षष्ठी देवी के नाम से पुकारते है, क्योंकि कहा गया हैं कि ये ही मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण षष्ठी देवी कहलायी हैं, इन्हीं के प्रसाद से पुत्रहीन व्यक्ति सुयोग्य पुत्र, प्रियाहीनजन प्रिया, दरिद्री धन तथा कर्मशील पुरुष कर्मों के उत्तम फल प्राप्त कर लेते है। ब्रह्मवैवर्तपुराण की मानें तो रविषष्ठी व्रत के दिन, भगवान भास्कर की रश्मियों में देवी षष्ठी का प्रार्दुभाव हो जाता हैं, और जो लोग इस दौरान भगवान भास्कर को अर्घ्य प्रदान कर रहे होते हैं, उन्हें भगवान भास्कर और छठि मईया दोनों की कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती है।
सर्वप्रथम इस व्रत को किसने किया ---------------
भविष्योत्तर पुराण कहता हैं कि इस व्रत को सर्वप्रथम नागकन्या की उपदेश सुनकर सुकन्या ने किया था। वो सुकन्या जो महराज शर्याति की पुत्री थी। कहा जाता हैं सतयुग में राजा शर्याति नामक एक राजा हुए। जब राजा शर्याति अपने सपरिवार और राजकीय लोगों को लेकर जंगल में शिकार करने के लिए निकले। तभी उस जंगल में सुकन्या फूल लाने के लिए निकली। सुकन्या वहां पहुंची, जहां महर्षि च्यवन तपस्यारत थे। महर्षि की तपस्या से ऐसी हालत हो गयी थी कि उनके शरीर में दीमक लग गया था। मुनि के शरीर में दीमक लगा देखकर सुकन्या चिन्तित होकर क्या देखती हैं कि दीमक लगे मिट्टी के टीले के मध्य में दो आंखे, जूगनू की तरह चमक रही हैं। आखिर ये चमकती चीजें क्या हैं, इसे जानने के लिए सुकन्या ने महर्षि के नेत्रों को फोड़ डाला। इससे महर्षि के नेत्रों से खून की धारा निकल पड़ी, महर्षि को असह्य पीड़ा होने लगी और इधर सुकन्या अपने स्थान पर लौट आयी। इधर महर्षि च्यवन के नेत्र, सुकन्या द्वारा फोड़ दिये जाने के कारण राजा शर्याति और उनके परिवार तथा राजकीय अधिकारियों के मलमूत्र बंद हो गये, तीन दिनों तक मल मूत्र बंद हो जाने से सभी व्याकुल हो गये। राजा शर्याति ने इसका कारण अपने पुरोहित से पूछा। पुरोहित ने योग बल के द्वारा राजा शर्याति को सारी कहानी बतायी कि सुकन्या के द्वारा क्या अपराध हुआ है। राजा शर्याति सारा माजरा समझ गये और अपनी पुत्री सुकन्या का विवाह महर्षि च्यवन से कर दिया। इधर सुकन्या अपने पति महर्षि च्यवन की खूब सेवा सुश्रुषा करने लगी। एक दिन जब कार्तिक शुक्ल रविषष्ठी तिथि आयी तब सुकन्या ने जल लेने के लिए एक छोटे तालाब के निकट आयी। वहां उसने देखा कि बहुत सारी नागकन्याएं भगवान भास्कर की पूजा कर रही है। सुकन्या उन नागकन्याओं से इस व्रत के विधान और महात्मय पूछे, उन नागकन्याओं ने सुकन्या को सारी विधान बता दी। जब पुनः कार्तिकशुक्ल रविषष्ठी तिथि आयी तो सुकन्या ने विधिवत् तरीके से भगवान सूर्य नारायण की पूजा अर्चना की और अपने पति च्यवन की नेत्र ज्योति पुनः प्राप्त कर ली। इसके बाद इस व्रत के महात्मय को महर्षि धौम्य के द्वारा द्रौपदी ने सुना और इस व्रत को की। इसी व्रत के प्रभाव से द्रौपदी अपना खोया सारा सुख प्राप्त कर ली। कहा जाता हैं कि आज भी जो इस व्रत को विधि पूर्वक करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल स्वतः प्राप्त हो जाता है।
ऊं नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे।
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरंचिनारायण शंकरात्मने।।

अर्थात् समस्त चराचर के एकमात्र नेत्रस्वरुप, जगत के उत्पति, पालन, नाश के कारणभूत, सत्व, रज, तमरुप, ( ब्रह्मा, विष्णु और महेश ) त्रिगुणात्मस्वरुपवाले सूर्य नारायण को नमस्कार है।
व्रत कैसे करें -------
गर भगवान ने आपको सबकुछ दिया हैं तो कृपया कंजूसी न करें और गर कुछ नहीं दिया तो फिर आपसे उन्हें कुछ नहीं चाहिए, केवल अंजूली भर जल लेकर अर्घ्य दे दें तो आपको सारी मनोवांछित वस्तूएं प्राप्त हो जायेगी। फिर भी चार दिनों के इस व्रत में कुछ लोकाचार हैं. प्रथम दिन यानी कार्तिक शुक्ल रवि चतुर्थी तिथि को आप अपने शरीर को शुद्ध करने का प्रथम प्रयास करें। लहसुनप्याज रहित, सामान्य मौसमी सब्जी बनाये, कद्दु और चने दाल की मिश्रित दाल बनाये, अरवा चावल की भात बना लें और पूर्वाह्न के आसपास, भगवान भास्कर को ये सारी वस्तुएं भोग लगाकर भोजन करें और अन्य को भी प्रसाद स्वरुप दें। दूसरे दिन पंचमी तिथि को सायं काल में मिट्टी की चुल्हें पर आम की लकड़ी से बनी गुड़ मिश्रित अरवाचावल और दूध की बनी खीर बनाये और उसे रोटी के साथ भगवान भास्कर को भोग लगाकर ग्रहण करें और दूसरे को भी प्रसाद स्वरुप बांटे। तीसरे दिन यानी षष्ठी तिथि को किसी तालाब, नदी अथवा कूएं पर अपने सपरिवार सहित अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को सूप में विभिन्न मौसमी फलों नारियल, गुड़ और आटे की बनी ठेकूआ, नैवेद्य स्वरुप अर्घ्य प्रदान करें और फिर यहीं प्रक्रिया चौथे दिन यानी सप्तमी तिथि को उद्याचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देते समय अपनायें और इसी के साथ आपकी पूजा – तपस्या संपन्न हो जाती है।
हालांकि ये बिहार में सर्वाधिक प्रतिष्ठित है। खासकर पटना के गंगा किनारे इस व्रत करने का एक अपना अलग ही आनन्द हैं। छठ व्रत के गीतों में गंगा बार बार आयी है। इस व्रत को डाला छठ या बूढी छठ कहते है। वो इसलिये कि इस व्रत को ज्यादातर पूर्व में बुढ़ी पुरनिया ही किया करती थी, मान्यता ये थी कि वो अपने सारी दायित्वों की पूर्ति कर लेने के बाद, भगवान भास्कर से अपना इहलोक और परलोक सुधारने और अपने परिवार के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नियम धर्म से व्रत रखती थी, पर वर्तमान में ऐसा दौर चला हैं कि अब ये ठेक ही पूरी तरह से मिट गया हैं। हर उम्र के लोग, इस व्रत को कर रहे हैं। ऐसे भी व्रत करनी चाहिए, क्योंकि व्रत करने से आप अंदर से शुद्ध होते हैं, आपके विचार पुष्ट होते हैं, और इसके बाद जो आप काम करते हैं, उससे आपका परिवार, समाज और राष्ट्र सभी उपकृत होते हैं।
जय छठी मईया................................................।