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Saturday, August 27, 2011

भारतीय होने का गर्व -----------------


न्ना के आगे केन्द्र सरकार नतमस्तक हो गयी। एक दो को छोड़ संपूर्ण विपक्ष अन्ना के साथ हो लिया। पूरे देश की निगाहें आज संसद और रामलीला मैदान में गड़ गयी थी। हुआ वहीं, जो देश चाहता था। इस देश में कई आंदोलन हुए, एक आंदोलन गांधी ने किया था। दूसरा आंदोलन जयप्रकाश नारायण ने किया और तीसरा आंदोलन अन्ना हजारे का देखने को मिला। गांधी और गांधी के आंदोलन को मैंने नहीं देखा, जब जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन छेडा था, उस वक्त मेरी उम्र सात साल की थी, पर 1977 के लोकसभा चुनाव में, मैं दस साल का हो गया था, और उस वक्त एक छोटे से डंडे में चक्रबीच हल लिये किसान का झंडा लेकर, खूब इधर – उधर घूमा था। लोग बताते हैं कि उस वक्त भी भ्रष्टाचार ही मुद्दा था, जिसमें जयप्रकाश का ये आंदोलन सफल हुआ। उस वक्त से लेकर आज तक 37 साल हो गये। बहुत सारे आज के युवा तो न तो गांधी और न ही जयप्रकाश के आंदोलन को ही देखा हैं, ऐसे में जिन्होंने अन्ना के इस आंदोलन को देखा होगा। उन्हें अनुभुति हो गयी होगी कि सद्चरित्र, सत्याग्रह और अहिंसा में कितनी ताकत होती हैं।
दिल्ली का रामलीला मैदान जहां 4 जून को रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद करते है। केन्द्र सरकार, थोड़ी ढिलाई बरतती हैं, पर वे थोड़ा और उग्र होते हैं, पर जैसे ही केन्द्र उनको अपनी औकात दिखाती हैं तो वे दिल्ली के रामलीला मैदान से महिलाओं की पोशाक पहन कर भागते हैं। उसके बाद उनके बालकृष्ण और उनकी संस्थाओं पर क्या – क्या दाग लगते हैं, सभी को पता हैं। ठीक दुसरी ओर रामदेव की आंदोलन को हवा निकालनेवाली कांग्रेस, जब अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने की बात करती हैं, तो अन्ना बड़े ही शांत स्वभाव से चुनौती देते हैं कि बताओ उनमें कौन कौन सा दाग हैं, हालांकि कांग्रेस के नेता मणीष तिवारी और सुबोधकांत सहाय जैसे लोग घटिया स्तर की बात करने से नहीं चूकते। कांग्रेस से संबंध रखनेवाले तो इंटरनेट पर अन्ना हजारे के मान मर्दन करने से भी नहीं चूकते, पर जब उन्हें पता लगता है कि अन्ना के साथ जनता हैं तो वे धीरे – धीरे बैकफुट पर आते नजर आते हैं। बैकफूट भी ऐसा कि आज 27 जुलाई एक ऐतिहासिक दिन बन गया। केन्द्र ने संसद में लोकपाल विधेयक पारित करा दिये। प्रधानमंत्री का पत्र लेकर विलासराव देशमुख, दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचे और अन्ना ने अपना अनशन तोड़ने की घोषणा कर दी।
कमाल हैं कि पहला ऐसा आंदोलन देखने को मिला, जहां शांतिपूर्ण ढंग से जनता आंदोलित थी। कहीं कोई हिंसक घटनाएं नहीं। सभी अन्ना – अन्ना रट रहे हैं। एक नारा तो इस दौरान गजब लगा – मैं अन्ना हूं। सचमुच पूरे देश और विश्व ने इस दौरान देखा कि बिना किसी हिंसा और किसी शोर-शराबे के भी जीत दर्ज की जा सकती हैं।
सचमुच आज गांधी जीवित थे --------- अन्ना के आंदोलन के रुप में। जिन्होंने गांधी जी को नहीं देखा, वो शायद अन्ना को देख लें। मैं एक नहीं कई बार कहा हूं, कि जिसके पास चरित्र होता हैं, वहीं आंदोलन खड़ा करता हैं। इसमें एक बात और कि धन की चाहत रखनेवाला व्यक्ति कभी भी आंदोलन नहीं खड़ा कर सकता, ये अटल सत्य हैं, हमारे पुराण और स्मृतियां इसके प्रमाण हैं।
अन्ना के आंदोलन और उसकी जीत पर हर भारतीयों को गर्व हैं, एक प्रकार से संपूर्ण विश्व को एक संदेश की देखों भारत में कैसे सरकार एक सामान्य जनता के आगे झूक जाती हैं। ये संदेश नक्सलियों को भी कि तुम बार-बार हिंसा फैलाते हो, पर कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर सके और न व्यवस्था बदल सकें पर देखों की, एक सामान्य व्यक्ति ने कैसे अपनी जीत सुनिश्चित कर ली। वह भी बिना किसी हिंसा और शोर शराबे के।
एक सबक उन नेताओं को भी, कि जो बार-बार इस आंदोलन के पीछे आरएसएस और भाजपा का हाथ बताया करते थे, आज अपने ही इस बयान पर शर्मसार और अऩ्ना नाम केवलम् मंत्र का जप कर रहे थे।
क्या पूरे विश्व में आप कोई ऐसा देश का नाम बता सकते हैं कि जहां इस प्रकार से आंदोलन चला हो। जहां कोई हिंसा न हुआ हो। लोग 12 दिनों से एक रामलीला मैदान में जमकर, एक 74 व्यक्ति के साथ एकजूटता प्रदर्शित कर रहे हो। नहीं न। तो बस याद रखिये, अपने देश में ऐसा हुआ हैं। आज का दिन ऐतिहासिक हैं भारत की 121 करोड़ आबादी के लिए, क्योंकि उनके सामने एक अनोखी घटना घटी हैं। जो ऐतिहासिक, रोमांचित और पूरे विश्व में भारत के लोकतंत्र की विजयगाथा की कहानी गढ़ रही हैं। आज की घटना से हमें दृढ़ विश्वास हो चला हैं कि 21 वीं सदी भारत का हैं। बस यहां के युवाओं को इसी तरह भारत के आदर्शों पर चलने की सिर्फ जरुरत हैं।

Sunday, April 10, 2011

अन्ना, मीडिया और गांधी….!

जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी भी सदाचार अपनाया ही नहीं, उन्हें भ्रष्टाचार की चिंता सताती जा रही हैं। उन्हें देश में बढ़ते भ्रष्टाचार और उससे प्रभावित होते विकास की तीव्र चिंता हैं। ये वे लोग हैं जो लाखों-करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों – खरबों में खेलते हैं। जिनकी दिन की शुरुआत ही भ्रष्टाचार और दिन की समाप्ति भ्रष्टाचार पर ही खत्म हो जाती हैं। इन्होंने आजकल गांधी नाम जप शुरु कर दिया हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे देश के गांवों – मुहल्लों में हरे राम संकीर्तन चल रहा होता हैं। आज से ठीक पांच दिन पहले अन्ना हजारे ने एक प्लान के तहत दिल्ली में लोकपाल विधेयक और भ्रष्टाचार मुद्दे पर आमरण – अनशन क्या शुरु किया। पूरे देश में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोगों ने इनकी तुलना गांधी से कर दी। पूरे देश में गांधी और गांधीवाद तथा बाकी बचे तो अन्ना हजारे छाये रहे, लेकिन ये अन्ना खेतों और खलिहानों में नहीं, बल्कि सिर्फ अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही थे, इधर लगातार अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में छाये रहने के कारण केन्द्र सरकार सकते में आ गयी, अंततः आनन फानन में अन्ना की सारी बातें केन्द्र द्वारा मान ली गयी । हालांकि जानकार ये भी कहते हैं कि केन्द्र सरकार और उसके समर्थकों ने एक कूटनीति के तहत इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कराये और ठीक एकदिवसीय वर्ल्ड कप के बाद इसे शुरु कराया और आईपीएल शुरु होने के पूर्व ही इस कार्यक्रम को समाप्त करने की योजना को मुर्त रुप दे दिया, क्योंकि ये जानते थे कि मीडिया की भी अपनी मजबूरियां हैं, और इसे आईपीएल शुरु होने के बाद, बड़ा मुद्दा मीडिया नहीं बना सकती। इसलिए देश में बड़े घरानों के सौजन्य से चल रहे प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम कर रहे लाखों का मासिक वेतन उठानेवालों ने अन्ना हजारे के आमरण अनशन को हाईलाईट करना शुरु कर दिया और अन्ना हजारे की तुलना गांधी और उसके कार्यक्रमों की तुलना गांधीवाद से शुरु कर दी, साथ ही देश में एक तरह से ऐलान करा दिया कि अन्ना हजारे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ दूसरी क्रांति शुरु कर दी हैं, लोगों को इनका साथ देने के लिए बिना विज्ञापन राशि लिए, विज्ञापन शुरु कर दी कि लोग समर्थन करे, इस महापुरुष का। जो बूढ़ा होते हुए भी, युवाओं जैसा काम कर रहा है। ये हल्ला और प्रोपेगंडा करनेवाले वे तथाकथित देश के मूर्धन्य पत्रकार थे, जो अपने मुफ्स्सिल संवाददाताओं के अरमानों का गला घोंटकर, उन्हें औने पौने पैसे देकर, खुद लाखों का वेतन उठाते हैं, और ऐशो-आराम की जिंदगी जीते हैं। जो अपने अखबारों के प्रचार प्रसार में अरबों खर्च कर देते हैं ये कहकर कि अब घर में आपकी बीबी की नहीं, आपकी चलेगी मर्जी यानी नारी की स्वतंत्रता का हनन करने में भी, जिन्हें शर्म नहीं आती। वे लोग भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए संपादकीय तक लिख डाले थे। जो देश के तथाकथित मूर्धन्य पत्रकार इस प्रकार की हरकतें कर रहे थे, उनकी सोच और उनकी गिरगिट की तरह रंग बदलने की प्रवृति देख, हमें पूर्व के आंदोलन और उसकी वर्तमान अवस्था पर शर्म महसूस हो रही थी। जरा देखिये, अन्ना के आंदोलन का, आज अऩ्ना ने अपना आंदोलन समाप्त कर दिया पर उसके बदले में क्या उसने पाया। सिविल सोसाईटी की ओर से खुद ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य बन गये हैं। जो ड्राफ्टिंग कमेटी बनी हैं, उसके अध्यक्ष शांति भूषण हैं तो बेटे प्रशांत भूषण सदस्य है। इस मुद्दे पर जब किसी ने अऩ्ना से सवाल किया तो अन्ना का कहना था कि दोनों ईमानदार थे, इसलिए उन्हें रखा गया। क्या देश में इन्हीं बाप बेटों में इनको सबसे ज्यादा ईमानदारी दिखी और देश के 121 करोंड़ों में कोई ईमानदार नहीं था। अरे जिसकी बुनियाद ही इतनी छिछोरी हो, तो वो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेगा। अरे गांधी के नाम को बेचकर अपनी दुकान चलानेवालो, जरा सोचों क्या गांधी ने अपने आंदोलन की कभी कीमत वसूली, जैसा कि अन्ना ने वसूला। खूद सदस्य बनकर। क्या गांधी ने कभी भी अपने जीवन में कोई पद पाया। गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के नाम पर इतना नौटंकी क्यों। जो लोग आंदोलन को मूर्तरुप दे रहे थे, जरा पूछिये कि उनकी पृष्ठभूमि क्या रही हैं, जो स्वामी अग्निवेश खुद नक्सलियों के साथ और उसके आंदोलन को प्रत्य़क्ष समर्थन देता हैं, क्या वो स्वामी हो सकता हैं। जो लोग कश्मीर के विघटनकारियों को समर्थन देने में अपनी शान समझते हैं, क्या वे भ्रष्टाचार के खिलाफ और गांधीवाद के समर्थन में कभी भी आगे आ सकते हैं गर नहीं तो फिर गांधी और गांधीवाद के साथ इतनी बड़ी सौदेबाजी क्यों। मैं उनलोगों से पूछना चाहता हूं जिन्होंने इस नौटंकी को गांधीवाद कह डाला। क्या वे बता सकते हैं कि जिस प्रकार गांधी ने भारत में अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंका, क्या इस प्रकार की नौटंकी से अब देश में भ्रष्टाचार का खात्मा हो गया या हो जायेगा। अरे जिस देश में पढ़ाई के नाम पर क्लर्क बनाने और पैसे कमाने की मशीन बनाने की ट्रेनिंग शुरु हो गयी हो, वहां अब भगत सिंह और चंद्रशेखर कहां से पैदा होंगे, और जब ये पैदा ही नहीं होंगे तो फिर भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगेगा। इतनी छोटी बात आंदोलनकरनेवाले लोगों को समझ में नहीं आती। गर नहीं समझ में आती तो वे जाने, पर यहां की जनता जानती हैं। इसीलिए देश के अन्य भागों में अन्ना के इस तथाकथित आंदोलन मे वे लोग शरीक हुए, जो किसी न किसी प्रकार से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, जिन्होंने मां भारती को पग-पग पर अपमानित करने का संकल्प कर रखा हैं। खेतों-खलिहानों अथवा विभिन्न कल कारखानों में काम करनेवाले या प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक मीडिया में ही काम करनेवाले उन पत्रकारों ने इस आंदोलन से अपनी दूरी बना ली थी, जो सच में बिना किसी शोर-शराबे के देश को नयी दिशा देने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं, जो देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए, कानून बनाने की बात नहीं, बल्कि खुद कानून बनने की कोशिश कर रहे हैं।