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Tuesday, June 19, 2012

दो सूटकेस बनाम 20 ट्रक...............

ज से ठीक पांच साल पहले, जब राष्ट्रपति के पद पर आसीन ए पी जे अब्दुल कलाम, राष्ट्रपति पद से विदा हो रहे थे, तब रांची से प्रकाशित प्रभात खबर में एक खबर छपी कि कलाम दो सूटकेस लेकर विदा होंगे, राष्ट्रपति भवन से। मैंने इस खबर को अपने दोनों बच्चों सुधांशु और हिमांशु को पढ़ाया। इस खबर से बच्चे इतने प्रभावित हुए कि, इन बच्चों ने उस खबर को प्रभात खबर से काटकर, नित्यदिन पठनीय दुर्गासप्तशती में संभालकर रख दिया। जब भी मैं या मेरे बच्चे दुर्गा सप्तशती पढ़ते अनायास अखबार का वो टुकड़ा मेरे और मेरे बच्चों के सामने से गुजर जाता.....। प्रेरणा देता कि जीने का मकसद क्या होना चाहिए.........। आज एक बार फिर वो पन्ना मेरे हाथों में हैं और बच्चों के साथ साथ, कलाम की वो सादगी हमें याद दिला गया कि जीने के मकसद क्या हैं......। एक कलाम हैं जो अपने साथ दो सूटकेस में ही जिंदगी को बांध कर एक बहुत सुंदर संदेश आम जनमानस को दे जाते हैं और एक राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी को देखिये..............।

खबर आयी हैं कि प्रतिभा पाटिल जी का सामान 20 ट्रकों में लादकर, महाराष्ट्र के तीन जगहों पर भेजा जायेगा और इस काम में राष्ट्रपति भवन के एक शीर्ष अधिकारी को लगाया गया हैं, जिसमें कुल 30 दिन लगेंगे। यहीं नहीं खबर ये भी हैं कि प्रतिभा पाटिल को पुणे के खड़की में सेना की जमीन पर बन रहे एक बंगले में रहना था, ये बंगला 2,61.00 वर्ग फुट जमीन पर बन रहा था, पर विवाद उठ जाने के कारण, अब वो वहां नहीं रहेंगी। नियमों के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति को 4500 वर्ग फुट का सरकारी बंगला या 2000 वर्ग फुट का सरकार द्वारा किराये पर लिया गया बंगला ही आवंटित किया जा सकता हैं।
कमाल देखिये -- कहां पूर्व राष्ट्रपति कलाम की सोच और कहां प्रतिभा पाटिल।
राष्ट्रपति पद पर रहते हुए एपीजे अब्दुल कलाम ने देशवासियों को संबोधन में तोहफे न लेने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि यह सांप को छूने और बदले में जहर हासिल करने के समान हैं। उन्होंने कहा था कि उपहार खतरनाक होते हैं और उनके पीछे कोई न कोई निहितार्थ होता हैं, पर मैं पूछता हूं कि आज के युग में ऐसी सोचवाले कितने लोग हैं, गर नहीं हैं, तो ऐसे व्यक्ति को पुनः राष्ट्रपति के पद पर बैठाने में सभी राजनीतिक दलों को क्या आपत्ति हैं।

बार-बार मुस्लिम प्रेम की बात करनेवाले, मुस्लिमों के आरक्षण की बात करनेवाले, सच्चर कमिटी की बातों को अक्षरशः लागू करनेवाले घड़ियाली आंसू बहानेवाले राजनीतिक दलों को, एपीजे अब्दुल कलाम में मुस्लिम क्यों नहीं दीखता। बार -बार ब्राह्मणवाद और ब्राह्मण का विरोध करनेवाले लालू, मुलायम, शरद जैसे घटियास्तर के नेताओं को आज कलाम क्यों पसंद नहीं। आज कलाम के लिए ममता बनर्जी ही क्यों आगे आ रही हैं, ये अलग बात हैं कि ममता बनर्जी की राजनीति करने की सोच हमें भी पंसद नहीं, पर मुलायम जैसे घटियास्तर के नेताओं से पूछिये कि ममता के संग संयुक्त प्रेस कांफ्रेस करने के बाद, फिर कांग्रेस की गोद में बैठकर प्रणव मुखर्जी के पक्ष में बयान कैसे दे डाला। सच्चाई यहीं हैं कि समाजवाद के नाम पर सबसे ज्यादा समाज का गलाघोंटा इन्हीं घटियास्तर के नेताओं ने। एक और समाजवादी को ले लीजिए जो बिहार में सुशासन बाबू के नाम से जाना जाता हैं यानी नीतीश कुमार। उसका बयान मैने आज ही चैनलों पर देखा। उसका कहना था कि अभी राष्ट्रपति चुनाव को लेकर एनडीए में चर्चाएं चल रही हैं, इसलिए वे अभी इस मुद्दे पर वे सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कह सकते। गर वे ऐसा नहीं कह सकते तो फिर मेंढ़क की तरह दलबदल में उस्ताद, उन्हीं के पार्टी के शिवानंद तिवारी ने प्रणव के पक्ष में पार्टी की ओर से कैसे बयान दे डाला। जबकि कलाम और कलाम की सोच को बिहार में जगाने की बात सर्वाधिक कोई करता हैं तो ये जदयू के लोग ही हैं और कलाम को सर्वोच्च सम्मान देने की बात आती हैं तो यहीं रोड़ा अटकाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वो कहावत हैं न बेशर्मों को शर्म कहां.....। पर सज्जनवृंद को ये भी जान लेना चाहिए कि बेशर्मों की जब लिस्ट बनाये तो ऐसे - ऐसे बेशर्म कहीं छूट न जाये। इसका ध्यान अवश्य रखे।

आज मैंने अखबार पढ़ा हैं- जिसमें कलाम साहब ने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया हैं। उन्होंने एक तरह से ठीक ही किया। उनकी सोच, भले इस पर कुछ भी हो, पर हम जरुर कहेंगे कि देश में इन घटियास्तरों के सांसदों और विधायकों के मतों द्वारा सर्वोच्च स्थान पर जाना भी एक उपहार ही हैं, इसलिए कलाम साहब आपने अपनी ही बातों को अक्षरशः साबित कर दिया...........। मैं ईश्वर से प्रार्थना करुंगा कि भारत की माताएं आप ही जैसा लाल पैदा करें, जो देश व समाज के लिए गौरव हो.................।

Thursday, March 31, 2011

क्यों नहीं, क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाय..............!

भारत ने पाकिस्तान को एक बार फिर मोहाली में 29 रनों से हरा दिया। सचमुच एक बार फिर ये बात सिद्ध हो गयी कि पाकिस्तान भारत से खासकर वर्ल्ड कप में हमेशा से हारता रहा हैं और इस बार भी हारेगा। कुछ संयोग भी था कि कुछ कौतुक मोहाली में देखने को मिले, सचिन तेंदुलकर बार- बार आउट होते हुए बचे और उन्होंने 85 रनों का व्यक्तिगत स्कोर खड़ा कर लिया। ये घटनाएं भी बहुत कुछ बता रही थी कि मैच भारत के पक्ष में हैं। खैर ये मेरा विषय भी नहीं हैं, आज के समाचार पत्रों और बीती रात से विभिन्न इलेक्ट्रानिक मीडिया ने धौनी सेना की गुणगान करनी शुरु कर दी हैं और साथ ही ये भी राग अलाप दिया कि भारत ही वर्ल्ड कप जीतेगा, मैं भी भारतीय हूं चाहता हूं कि कप भारत में ही रहे। पर केवल क्रिकेट के ही क्यूं और अन्य खेलों के लिए भी ऐसी भावना क्यूं नहीं। खासकर, हॉकी के लिए, जो कि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हैं। यहीं बात पाकिस्तान के लिए भी क्योंकि हॉकी वहां का भी राष्ट्रीय खेल हैं, पर सच्चाई क्या हैं। सभी को मालूम हैं, दोनों देशों में हॉकी हाशिये पर चला गया हैं। न तो सरकार, न ही अधिकारी, न ही बड़े बड़े पूंजीपति-खेल के आयोजक ही इस खेल में रुचि लेते हैं। पूरे देश में जिस प्रकार से क्रिकेट का जूनून हैं। गांव – शहर, कस्बा मुहल्ला सभी जगह छोटे से लेकर बड़े विकेट और बल्ले की ही बात कर रहे हैं, ऐसे में हमारा अभिमत हैं कि क्यूं नहीं क्रिकेट को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाय, क्यूं हम बेवजह उसे राष्ट्रीय खेल मानने को तैयार हैं- जिसपर हम बात करने को अपना समय देने को तैयार नहीं हैं। आखिर हम ऐसा क्यूं कह रहे हैं। उसके पुख्ता प्रमाण हैं। आप उन देशों को लीजिये जहां का राष्ट्रीय खेल फुटबॉल हैं, जरा उन देशों और वहां के निवासियों को देखिये कि वे फुटबॉल को किस प्रकार लेते हैं, पर हमारे देश में राष्ट्रीय खेल हॉकी के प्रति किस प्रकार अनादर का भाव हैं। वो हॉकी खेलनेवाले खिलाड़ियों की मनोदशा देखकर ही पता लग जाता हैं।
जबकि क्रिकेट की बात हो तो पूछिये मत, गांव – महल्ला, नगर –शहर तो दूर हमारे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक इस पर चर्चा करने लगते हैं। दूसरे मित्र व पड़ोसी देश को क्रिकेट का आन्नद लेने के लिए निमंत्रण तक दे देते हैं। क्रिकेट को लेकर भारत और पाकिस्तान में जैसे मारामारी दीख रही होती हैं, वैसी मारामारी अन्य देशों के खिलाफ होनेवाले क्रिकेट मैचों में नहीं होती। आखिर ऐसा जुनून क्यूं हैं, क्यों हमें पाकिस्तान को हराने में परमानन्द की प्राप्ति होती हैं, जबकि ऐसा ही आनन्द फाइनल में जीतने पर देखने को नहीं मिलता। हमें लगता हैं कि ये शोध का विषय हैं, पर जो सामान्य लोग हैं, वे जानते हैं कि आखिर इसका आनन्द का कारण क्या हैं। किस प्रकार हमारे भारत और पाकिस्तान के राजनीतिज्ञों ने अपने-अपने पड़ोसी देशों को लेकर, हमारे मन में विषवमन पैदा किया हैं, जिसका परिणाम भारत और पाकिस्तान के साथ होनेवाले सिर्फ क्रिकेट में दिखायी पड़ता हैं, न कि इन दोनों देशों के साथ होनेवाले किसी अन्य मैचों में।
कमाल हैं, जैसे ही क्वार्टरफाइनल में ये श्योर हो गया कि भारत और पाकिस्तान सेमीफाईनल में भिड़नेवाले हैं, हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी और वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को भारत मैच का आनन्द लेने के लिए आमंत्रित कर दिया। उधर से भी वहीं प्रतिक्रिया हुई, जिसका अंदेशा कि हम आ रहे हैं। क्या बात हैं जो काम और कोई नहीं कर सकता, क्रिकेट ने कर दिया। दोनों देश क्रिकेट देखने ही नहीं, बल्कि बातचीत को भी तैयार हो गये। जनाब गिलानी पाकिस्तान से आये, खाये-पीये, मैच का मजा लिया और गये। ऐसा लगा कि भारत और पाकिस्तान कभी लड़े ही नहीं थे और न ही कभी लड़ेंगे। यानी भारत और पाकिस्तान अब शांति की डगर पर चल पड़े हैं। इधर सोनिया गांधी और और राहुल गांधी भी मैच देखने के मोहाली पहुंचे और बाकी बचे तो अन्य नेता, व फिल्मी अभिनेता- अभिनेत्री व पूंजीपतियों का बड़ा समूह मोहाली पहुंच गया था। क्रिकेट मैच का आनन्द लेने के लिए। उस क्रिकेट का मजा लेने के लिए जो हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं हैं, और जिनके पास अपने राष्ट्रीय खेल देखने के लिए समय नहीं होता। जरा पूछिये, अपने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, यूपीए की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से और उन अन्य नेताओं, अभिनेताओं व पूंजीपतियों से कि क्या ऐसी ही कशिश उनके दिलों में राष्ट्रीय़ खेल के प्रति होती हैं। उत्तर होगा – नहीं। जिस देश में सत्ता के सर्वोच्च सिंहासन पर बैठनेवालों के दिलों में अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी के प्रति दर्द नहीं उभरता, उस देश में राष्ट्रीय खेल की क्या स्थिति होगी, वो जो हम देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, हमसे बेहतर कौन समझ सकता।
हम झारखंड में हैं, जहां हॉकी जन-जन में रचा बसा हैं, जहां कई पुरुष और महिला खिलाड़ी हॉकी के द्वारा अपने देश का मान बढाया हैं। इस प्रांत में भी एक क्रिकेट के धौनी ने, उन हॉकी खिलाड़ियों की चमक थोड़ी फीकी कर दी हैं जिन्होंने हॉकी में अपना ही नहीं बल्कि इस राज्य और देश का मान बढ़ाया पर आज उनकी क्या स्थिति हैं, झारखंड की जनता से बेहतर और कौन जान सकता हैं। धौनी का तो कहना ही नहीं, उसके पास तो इतने धन आ चुके हैं कि पूछिय़े मत, पर इसी राज्य में हॉकी के बल पर देश व राज्य का मान बढ़ानेवाले लोगों की हालत पस्त हैं, उस पर न तो केन्द्र और न ही राज्य सरकार का ध्यान हैं। ले – देकर बेचारे अपने हालत पर आंसू बहा रहे हैं, पर क्रिकेट के पक्षधरों और उसके झंडाबरदारों ने उनकी सूध तक नहीं ली। वो भी उस राज्य में उस देश में जहां हॉकी राष्ट्रीय खेल हैं।
कल मैंने ये भी देखा कि जैसे ही भारत ने पाकिस्तान पर जीत दर्ज की, सोनिया गांधी और मनमोहन के चेहरे पर खुशी का ठिकाना नहीं था, वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी के चेहरे पर हार का गम साफ दिखाई पड़ रहा था। पूरे देश की तो बात ही अलग थी। क्या दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता और मुंबई की बात करे, सभी खुश, देश ने पाक पर फतह कर लिया। ऐसी खुशी, जिसको अभिव्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे, जब पूरे देश में ऐसा माहौल हो, तो फिर हम तो ये ही कहेंगे कि हे महान देश के महान राजनीतिज्ञों ( दोनों देशों ) आप जल्द ही ये घोषणा कर दो कि हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी नहीं, क्रिकेट हैं। क्योंकि तुम घोषणा करों या न करों, आम जनता तो हॉकी को भूलाकर क्रिकेट के रंग में रंग ही चुकी हैं और क्रिकेट को राष्ट्रीयता से जोड़ दी हैं। साथ ही सचिन-धौनी इऩके सरताज हो चुके हैं। तो फिर देर कैसी।

Wednesday, November 10, 2010

तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय, न तुम हारे, न हम हारे....!

संदर्भ अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा 2010...

अमरीकी राष्ट्रपति की जब कभी भारत यात्रा हुई है, तो ये यात्रा शुरु से लेकर आखिरी तक नयी नयी विवादों में घिरी होती है। जो लोग चाहते हैं कि अमरीका से हमारे संबंध मजबूत हो, उन्हें अमरीकी राष्ट्रपति का प्रत्येक संवाद मन को जीत लेनेवाला लगता हैं, जबकि इसके घुर विरोधी को हर बातों में कुछ न कुछ घालमेल दिखाई देते हैं, खासकर चीन और रुस के कटटर समर्थक भारतीय वामपंथियों को अमरीका और अमरीकन राष्ट्रपति एकदम नहीं सुहाते। आखिर क्यों, इस पचड़े में हम पड़ना नहीं चाहते, सभी लोग जानते है।
आज की स्थिति और परिस्थिति में भारत की नयी पीढ़ी अमरीका से बेहतर संबंध बनाने में विश्वास रखता है, क्योंकि वो जानता हैं कि बिना बेहतर संबंध के न तो भारत को वो स्थान मिल सकता हैं, जिसकी उसे जरुरत है और न ही आगे बढ़ने का रास्ता। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा छठे राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने भारत की यात्रा में दिलचस्पी दिखायी और अपने हाव भाव और विचारों से भारतीयों के दिल जीतने में कामयाब रहे। खासकर मुबंई में दीवाली फेस्टिवल मनाने के क्रम में भारतीय बच्चों के साथ नृत्य करने का मामला हो अथवा दिल्ली के हुमायूं के मकबरे पर नन्हे – मुन्ने बच्चों के साथ मिलने का तरीका। सभी में वे बीस साबित हुए। रही बात मुंबई में भारतीय उद्योगपतियों से बातचीत और दिल्ली में संसद में उनके दिये गये भाषण बताने के लिए काफी थे कि उनकी आज की सोच क्या हैं। इसमे कोई दो मत नहीं कि जो आज पूरे विश्व की स्थिति है, उसने अमरीका के सोच में काफी बदलाव लाया है और भारत को ऐसे समय में नजरंदाज करना, अमरीका को मुश्किल सा लग रहा हैं। याद करिये जब पूर्व में हमारे देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति का अमरीका दौरा होता था तो क्या होता था, अमरीकन राजनीतिज्ञ उन्हें कितना भाव देते थे, यहीं नहीं वहां के समाचार पत्रों की क्या भूमिका होती थी और आज के वहां के राजनीतिज्ञों और समाचार पत्रों की क्या भूमिका है। आज तो वहां के अखबार भारत-अमरीका के इस दौरे और उसके नतीजों और सम्पादकीय से पटे हैं। ये है – बदलाव। और ये बदलाव। भारत के राजनीतिज्ञों के क्रियाकलापों से नही हुए, बल्कि उन सैकड़ों, हजारों, लाखों गुमनाम भारतीयों के उनकी मेहनत और उनसे निकले परिणामों का नतीजा हैं कि आज भारत ऐसे मोड़ पर खड़ा हैं कि अमरीकन राष्ट्रपति बराक ओबामा को कहना पड़ गया कि भारत एक विकसित राष्ट्र हैं, भारत को सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए और जब कभी सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या बढाने को हुई तो अमरीका भारत के इस पक्ष का समर्थन करेगा। आज अमरीकन राष्ट्रपति भारतीय उद्योगपतियों से सहयोग मांग रहे हैं, वे भारत के साथ व्यापारिक समझौते करना चाह रहे हैं, क्यों चाह रहे हैं, इसका भी खुलासा करीब – करीब देश व विदेश के समाचार पत्रों ने कर दी है।
एक बहुत ही मशहूर पंक्ति में यहां उद्धृत करना चाहता हूं.......
किसी ने ठीक ही कहा हैं...

खुद ही कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है।
क्या पहले के भारतीय प्रधानमंत्री की ये हैसियत थी कि किसी अमरीकन राष्ट्रपति के साथ संवाददाता सम्मेलन में भारतीय पक्ष को इतनी मजबूती से रख सके, जैसा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस बार कह कर जता दिया कि भारत अमरीका की नौकरी चूरा नहीं रहा और हमारी भागीदारी, समान मूल्यों और हितों विश्व के प्रति समान दृष्टिकोण और हमारी जनता की गहरी मैत्री पर आधारित है।
आखिर क्या वजह हुई कि अमरीकन राष्ट्रपति आज जय हिंद तक बोलने पर मजबूर हैं, पाकिस्तान में आतंकी ठिकाने उन्हें मंजूर नहीं और 26 नवम्बर के हमलावरों को पाकिस्तान सजा दे, ये बोलने से नहीं चूके। इसका सीधा सा अर्थ हैं कि अमरीका फिलहाल आर्थिक मंदी से उबर नहीं पाया हैं और वह धीरे धीरे नीचे की ओर खिसकता जा रहा हैं। वहां बेरोजगारी बढ़ी हैं, और इसका परिणाम खुद अमरीकन राष्ट्रपति झेल रहे हैं, जबकि इसके विपरीत भारत में वैसी स्थिति नहीं हैं, जैसी अमरीका की हैं, और भारत ने जिस प्रकार आर्थिक मंदी को झेला और उबरा, ऐसी कूबत शायद किसी देश में नहीं और इसी का फायदा, अमरीका उठाना चाहता है। सचमुच आज हमें खुशी हैं कि महाशक्ति खुद को माननेवाला अमरीका और उसके राष्ट्रपति बराक ओबामा, भारत की ताकत का लोहा माना हैं और कहा कि भारत एक बड़ी ताकत बन चुका हैं, पर हमें इससे ज्यादा खुश होने की जरुरत नहीं क्योंकि इनके ये बोल, कितने सत्य हैं, ये आनेवाला समय बतायेगा, पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारी एक बहुत बड़ी आबादी भूख और गरीबी से लड़ रही हैं। जिनके पास खाने पीने पहनने ओढ़ने और रहने को तक को नहीं हैं, हमे उनके लिए कुछ करना हैं, ताकि हम सचमुच भारत को विकसित राष्ट्र बना सकें। भारत विकसित राष्ट्र, झूठ और भ्रष्टाचार में लिप्त राजनीतिज्ञों से नहीं बनेगा, बल्कि उन करोड़ों युवाओं से होगा, जिसके बारे में आज कहा जा रहा हैं कि भारत में युवाओं की एक बहुत बड़ी फौज हैं, गर ये युवा सही मायनों में अपनी शक्ति को पहचान लेंगे तो समझ लीजिए, आनेवाला समय सही मायनों में हमारा हैं, 21वीं सदी भारत का है।