Thursday, May 28, 2015

लालू का दृढ़विश्वास और नेतागिरी के फायदे...........

रांची से प्रकाशित एक नीतीश भक्त अखबार के पिछले पृष्ठ पर एक समाचार पढ़ा, पढ़कर मन अति प्रसन्न हुआ। समाचार लालू प्रसाद से संबंधित था, जिसमें लालू का बयान जयललिता की तरह मैं भी होउंगा आरोपमुक्तछपा था। मेरा भी दृढ़ विश्वास हैं कि लालू आरोपमुक्त होंगे, क्योंकि भारत देश में नेता या उसका परिवार कभी अपराधी हो ही नहीं सकता।
उसका प्रमाण हैं कि जिस प्रकार आजादी के पूर्व किसी अंग्रेजों को उसके किये की सजा नहीं मिली, ठीक उसी प्रकार आजादी के बाद देश का कोई भी नेता आरोप सिद्ध होने पर जेल में अपने किये की सजा नहीं काटी। ऐसे भी हमारे देश में एक संत हुए नाम था – गोस्वामी तुलसीदास, जिन्होंने अपने कालजयी पुस्तक श्रीरामचरितमानस में लिखा है समरथ के नहिं दोषु गोसाईं अर्थात् सामर्थ्यवानों में दोष नहीं होते, इसलिए इन्हें सजा नहीं मिलती, तो सजा मिलती किसे है। स्पष्ट हैं कि, जो सामर्थ्यवान नहीं है। हमारे देश में आप गर नेता हैं तो आप कितना भी घोटाला या महाघोटाला कर लीजिये, कुछ दिन या वर्षों तक हंगामा होगा, जिस नेता पर आरोप होगा कुछ वर्षों के लिए जेल हो आयेगा, पर अंततः वह दोष मुक्त हो जायेगा, क्योंकि वह नेता है। उसे निचली अदालत गर सजा सुना भी दें, तो उपरि अदालत में वह निश्चित छूट जायेगा, क्योंकि वह नेता है।  उदाहरण अनेक है, पर एक उदाहरण ताजा – ताजा सुनाता हूं, एक अपराध में राजद और लालू के चहेते नेता पप्पू यादव को एक निचली अदालत ने दोषी ठहराते हुए सजा सुना दी और फिर कुछ ही महीनें बाद एक उपरि अदालत ने उन्हें दोष मुक्त कर दिया। इसी प्रकार सीबीआई की एक अदालत ने लालू यादव को दोषी ठहराते हुए सजा सुना दी, पर जरा देखिये वे आराम से कैसे राजनीति कर रहे हैं और अपने शरणागत आये जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के समस्त कष्टों को हरने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दिये हैं। जबकि ये वहीं नीतीश हैं जो लालू के खिलाफ खूब अनाप शनाप बयान देते थे। ये वहीं नीतीश हैं जो लालू को गद्दी से हटाकर सत्तासीन हुए। ये वहीं नीतीश हैं, जो लालू को चारा घोटाले में जेल में सड़ाने के लिए क्या नही किये। ये वहीं नीतीश हैं जो बिहार को जंगल राज से मुक्त करने के लिए बिहार की जनता को आह्वान किया और आज उसी नीतीश को लालू में खुदा का नूर नजर आ रहा हैं। मैं तो ये भी देख रहा हूं कि जो अखबार कल तक लालू का घोर विरोधी था, वह भी नीतीश की भक्ति में आसक्त होकर लालू की खूब वाहवाही कर रहा हैं, अर्थात् इसी को कहते हैं समय अथवा काल। शायद रहिमन ने ऐसे ही लोगों के बारे में ये पंक्तियां लिख डाली हो –रहिमन चुप हवे बैठिये, देखि दिनन के फेर, जब अच्छे दिन आइहे, बनत न लगिहे देर। क्या बात हैं लालू जी, समय आपका आ गया हैं कल का नीतीश आपके चरणों को चूम रहा हैं।  कल का आपका विरोधी अखबार और संपादक आपके यशोगान गा रहे हैं। इसका मतलब क्या हैं, जल्द ही आप ने जो सपना देखा हैं –पीएम बनने का, वो भी ख्वाब पूरे हो जायेंगे, क्योंकि आप असली यादव और उसमें भी विशुद्ध नेता है। मुलायम-शरद-लालू की जोड़ी जरुर गुल खिलायेगी। बस बिहार में गजब ढाने की तैयारी को चरम पर ले जाना है।
आपके इसी सोच पर लगता हैं कि भारत के कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने अपनी नौकरियां छोड़कर नेता बनने में ज्यादा रुचि दिखाई, क्योंकि उन्होंने अपने अनुभवों से पाया कि जो जितना बड़ा नेता, वो उतना बड़ा चोर अथवा घोटालेबाज और उसकी चोरी अथवा घोटाले को सिद्ध कर पाने में ताउम्र अधिकारी लगा दें, सिद्ध नहीं कर पायेंगे गर किसी ने सिद्ध कर भी दिया तो न्यायालय से वे बचकर निकल जायेंगे। ऐसे में आईएएस व आईपीएस की नौकरी गयी तेल लेने। नेता बनो, माल कमाओ। देश का विकास जाये भाड़ में, अपने खानदान के लिए आठ पुश्त तक ऐसा जुगाड़ कर लो कि कोई बाल बांका न कर सकें और ऐसा करने में कुछ हो भी गया तो क्या फर्क पड़ता हैं। थोड़े ही फांसी की सजा होगी या कुछ हो जायेगा, क्योंकि नेता तो नेता होता हैं, उसे अधिकार हैं, सब कुछ करने का, और नेता कभी गलत नहीं होता, नेता कभी दोषी नहीं होता, नेता तो प्रकृति का पैदा किया हुआ वो शूरमा हैं, जिसके बारे में स्वर्ग में बैठा भगवान भी उसके खिलाफ फैसला नहीं ले सकता। तभी तो मैं देख रहा हूं कि झारखंड में भी कई आईएएस और आईपीएस अधिकारी नेता बन गये। अखबार वाले भी नेता बन गये। गुंडे और अपराधी तो पहले से ही लाइन में हैं, क्योंकि वे नेता के असली आदर्शों को खूब समझते हैं। हां एक चीज जरुर देखने को मिल रही हैं कि अब समाज के कई चालाक लोगों ने नेता के इस अद्भुत गुणों को देख, अब खुद को भी नेतागिरी में फिट करने की जुगत लगा दी हैं।

Thursday, May 14, 2015

संघ और प्रभात खबर के बीच छिड़ी जंग.........


पिछले दिनों 9 मई को प्रभात खबर के पृष्ठ संख्या 2 में पढ़ने को मिला कि समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार, झारखंड द्वारा इस वर्ष से शुरु किये गये पं. दीनदयाल राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार के लिए प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक (झारखंड) अनुज कुमार सिन्हा को चयन किया है। श्री सिन्हा को ये पुरस्कार 12 मई को एटीआई सभागार में प्रदान किया जायेगा। पुरस्कार के लिए एक चयन समिति बनायी गयी। उस चयन समिति की बैठक में ये निर्णय लिया गया, कि इस पुरस्कार के लिए प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा ही योग्य है, दूसरा कोई नहीं.....!

मुझे जैसे ही ये समाचार पढ़ने को मिला, मेरा माथा ठनका। भला ये कैसे हो सकता हैं कि संघ प्रभात खबर में कार्यरत इतने बड़े अधिकारी को वह भी संपादकीय स्तर का, उसे सम्मानित कर दें, क्या संघ का हृदय परिवर्तन हो गया.....या कुछ दूसरी बात हैं......मैंने पता लगाने की कोशिश की और 12 मई तक इँतजार किया। जैसे ही 12 मई बीता, मुझे ये बात जानने में देर नहीं लगी कि संघ का हृदय परिवर्तन हुआ या कुछ दूसरी बात हैं।

संघ जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहा जाता है। अधिकांश लोगों का मानना हैं कि ये पूर्णतः चरित्र निर्माण करनेवाली एक राष्ट्रभक्त संगठन है। जिसे लेकर देश-विदेश के कई महापुरुषों ने अपने संभाषणों में इस संगठन के क्रियाकलापों पर सुंदर प्रतिक्रियाएं दी, जिसे कई अखबारों और चैनलों ने जगह भी दी। ये अलग बात हैं कि कुछ अखबार/चैनल पूर्व से ही अपने मन में संघ के प्रति नकारात्मक भाव रखते हुए अनाप-शनाप छापते/ दिखलाते रहते हैं।

इधर कुछ महीनों से प्रभात खबर ने संघ के प्रति छद्म नाम से बहुत कुछ छापे हैं, हम उस समाचार को न तो गलत ठहरा सकते हैं और न ही सही, सच्चाई क्या है, ये जांच का विषय हैं। हर समाचार में गलतियां और हर समाचार में सच्चाईयां नहीं होती। कुछ समाचार समय, काल और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अखबार व चैनल वाले छापते व दिखाते रहते हैं, इसमें उनका निहितस्वार्थ छुपा रहता हैं, जिसे वे निहितस्वार्थ न कहकर देश व समाज के प्रति अपना कर्तव्य का निर्वहण करने का ढोंग समाज के समक्ष रखते हैं।

सूत्र बताते हैं कि इधर संघ के खिलाफ प्रभात खबर का लगातार होता दुष्प्रचार से संघ ने एक नीति बनायी, कि वह न तो अखबार के खिलाफ आंदोलन चलायेगा और न ही न्यायालय का दरवाजा खटखटायेगा। हां इतना जरुर करेगा कि वह स्वयंसेवकों से अनुरोध करेगा कि वे प्रभात खबर का बहिष्कार करना शुरु करें। आज भी आप देख सकते हैं कि संघ के ऐसे बहुतेरे स्वयंसेवक हैं, जो संघ के लिए अपना जान छिरकते हैं, उन्होंने प्रभात खबर को अपने घर में आने पर प्रतिबंध लगा दिया हैं। निवारणपुर स्थित संघ मुख्यालय में तो आप प्रभात खबर कभी देख ही नहीं सकते और न ही इसकी आनुषांगिक संगठन के कार्यालयों में।

अब बात यहां आती हैं कि जब संघ मुख्यालय में प्रभात खबर नहीं आता तो फिर प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा को पुरस्कृत करने की बात कहां से आ गयी, वह भी संघ की अनुषांगिक संगठन, समाचार एजेंसी, हिन्दुस्थान समाचार की ओर से..........। ये बात किसी भी स्वयंसेवक को पच नहीं रही थी, सभी स्वयंसेवक इसका विरोध कर रहे थे। कुछ दबीं जुबां तो कुछ खुलकर विरोध कर रहे थे। आखिर ये कैसे हो गया। क्या राज्य में सचमुच पत्रकारों का अकाल पड़ गया हैं। क्या अब जब भी पुरस्कार की बात आयेगी तो प्रभात खबर से ही लोग आयेंगे, पुरस्कार लेने। यानी जितने स्वयंसेवक, उतनी ही बातें।

सूत्र बताते हैं कि जैसे ही पं. दीन दयाल राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार देने की बात झारखंड में आयी। हिन्दुस्थान समाचार के ब्यूरो चीफ ने हिन्दुस्तान समाचार पत्र के चंदन मिश्र और दैनिक जागरण के कमलेश रघुवंशी को बुलाकर एक बैठक की और आनन-फानन में प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा को पुरस्कार देने की घोषणा कर डाली। फिर अखबारों व चैनलों से इस बात की जानकारी जनता तक पहुंचा दी गयी। जिसे संघ, हिन्दुस्थान समाचार और विश्व संवाद केन्द्र के उच्चाधिकारियों को नागवार गुजरी और उसी वक्त तय हो गया कि किसी भी हालत में प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा को 12 मई को एटीआई में आयोजित कार्यक्रम में सम्मानित नहीं किया जायेगा, हालांकि पुरस्कार दिलवानेवालों ने भी कम एड़ी-चोटी एक नहीं की। नाना प्रकार के तिकड़म लगाये पर सफलता मिलती नहीं दिखी। खैर 12 मई समयानुसार आया, कार्यक्रम आयोजित हुए। संघ, विश्व संवाद केन्द्र, हिन्दुस्थान समाचार, भाजपा और संघ के कई आनुषांगिक संगठन के लोग पहुंचे पर उन्हें सम्मान नहीं मिला, जिन्हें सम्मान देने की घोषणा की गयी थी.......। इससे प्रतिष्ठा किसकी गयी.......? सम्मान लेनेवाले की, सम्मान दिलाने की घोषणा करनेवाले की या किसी और की। आप अपने ढंग से इसकी व्याख्या कर सकते हैं।

इधर आज 14 मई को हमने चयन समिति के सदस्य चंदन मिश्र से बात की, तब उनका कहना था कि सम्मान समारोह का कार्यक्रम अभी स्थगित हुआ हैं, पुरस्कार देने की घोषणा की तिथि बाद में की जायेगी, पर संघ के सूत्र बताते हैं कि ऐसा संभव नहीं। 12 मई को संपादकीय पृष्ठ पर सांप्रदायिकता के जहर से सावधान नामक संपादकीय और 13 मई को पवन के. वर्मा के आलेख भगवाकरण की घातक प्रक्रिया में संघ के आनुषांगिक संगठनों को लंपट समूह की संज्ञा देने पर भी संघ को आपत्ति है। संघ का कहना हैं कि प्रभात खबर आखिर ये सब लिख और पढ़ा कर क्या साबित करना चाहता हैं। ये समझ से परे हैं। संघ के स्वयंसेवकों का कहना हैं कि संघ पर वैचारिक हमले हो, उसका स्वागत हैं, पर गलत, मनगढंत, अपशब्दों का प्रयोग, अखबार के मानसिक दिवालियापन की ओर संकेत करता है।

दूसरी ओर संघ समर्थकों का कहना हैं कि जब संघ इतना गलत हैं तो फिर इसके आनुषांगिक संगठनों से खुद सम्मानित होने का भाव रखना, ये क्या न्यायोचित हैं? आखिर अपने संपादक के पुरस्कृत होनेवाली खबर प्रभात खबर ने क्यों छापे? उसे तो पुरस्कार यह कहकर ठुकरा देना चाहिए था कि आप तो सांप्रदायिक हो, और हम भगवा सोच वाले, सांप्रदायिक संगठनों अथवा उसके आनुषांगिक संगठनों से अनुप्राणित अथवा पुरस्कृत नहीं होते। यानी यहां तो दो प्रकार की बातें हो रही हैं, संघ को गाली भी दे रहे हो और संघ से पुरस्कृत होने का स्वार्थ भी रखते हो। प्रभात खबर को इस विषय पर अपनी सोच बदलनी होगी। क्योंकि दोनों चीजें, एक साथ नहीं चल सकती।

इधर जहां मैं रहता हूं, वहां प्रभात खबर समर्थकों की संख्या बहुत थी, पर अब उनका भी विचार बदल रहा है। एक सज्जन ने कहा कि प्रभात खबर पर्यावरण बचाओ मुहिम चला रहा हैं और लिखता हैं कि झारखंड से 38 पहाड़ गायब हो गये। भला झारखंड तो पठारी इलाका हैं, यहां पहाड़ी हो सकते हैं, पहाड़ कहां से आ गया भाई। बचपन में जब झारखंड, संयुक्त बिहार में था तब पढ़ने को यहां मिलता था कि बिहार की सबसे ऊंची पहाड़ी पारसनाथ की पहाड़ी है, जो अब झारखंड की सबसे उंची पहाड़ी है। ऐसे में जब यहां पहाड़ हैं नहीं, तो पहाड़ गायब कैसे हो गये।

दूसरी बात जो प्रत्येक दिन अखबार के चार पेज की लाइफ रांची देखने को मिलती हैं, उसके टाइम पास वाले पृष्ठ पर अर्धनग्न नायिकाओं के चित्र परोसे जाते हैं, वो किसलिए परोसे जाते हैं, उससे कौन सा समाज, प्रभात खबर तैयार कर रहा हैं, समझ में नहीं आ रहा।

इसलिए संघ, कैंपेन चलाये, अथवा न चलाये। ऐसे भी प्रभात खबर को लेकर जनता के विचार बदल रहे है, जनता के पास अब विकल्प बहुतेरे हैं, उन विकल्पों पर जनता गौर कर रही हैं, परिणाम जल्द ही आयेगा, कोई ज्यादा दिमाग नहीं लगाये...............

Sunday, May 10, 2015

काश, गब्बर झारखंड आता और यहां के 10 पत्रकारों को भी अगवा करता........



काश, गब्बर झारखंड आता और यहां के 10 पत्रकारों को भी अगवा करता और अपना एक मैसेज पत्रकारों के लिए भी छोड़ देता......। पूरे देश में अक्षय कुमार की एक नई फिल्म गब्बर इज़ बैककी धूम है। फिल्म हैं भी सटीक और दिल पर राज करनेवाली, इसलिए फिल्म को देखने के लिए विभिन्न सिनेमा हॉलों व मल्टीप्लेक्सों में भीड़ जूट रही हैं। फिल्म के डायलॉग भी जानदार है। एक डायलॉग – इस कॉलेज में पुलिस एलाऊ (ALLOW) नहीं हैं, काश हमें ये डायलॉग भी सुनने को मिलता कि इस संस्थान में या इस घर में पत्रकारों का आना निषेध हैं। हमें लगता हैं कि आज नहीं तो कल ये सुनने को अवश्य मिलेगा। बस थोड़ा इंतजार कीजिये।
आखिर मैं पत्रकारों को अगवा करने की बात गब्बर से क्यों किया उसका मूल कारण हैं. सिर्फ ऐसा नहीं है जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है कि डॉक्टर और उनका मेडिकल संस्थान, पुलिसकर्मी व नेता या नगर निगमकर्मी, जिला का कलक्टर अथवा रियल ईस्टेट (REAL ESTATE) का मालिक ही भ्रष्ट होता है। हमें तो इनसें ज्यादा भ्रष्ट झारखंड के पत्रकार नजर आते हैं। जो जितने बड़े पद पर बैठा हैं, वो उतना ही बड़ा भ्रष्ट हैं।
जरा नजर डालिये............।  यहां के पत्रकारों/ अखबारों/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मालिक व संपादकों की टोली क्या कर रही हैं।
क.        इनका पहला काम मुख्यमंत्रियों अथवा वरीय प्रशासनिक अधिकारियों को ब्लैकमेल करना अथवा चाटुकारिता कर राज्य के खनिज संसाधनों पर कब्जा जमाना हैं।
ख.       विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा सरकार के मनोबल को तोड़ना और उनसे मुंहमांगी विज्ञापन प्राप्त करना है।
ग.         विभिन्न प्रकार के चिरकुट टाइप पंडे पुजारियों की नई पौध को सृजन करना और उनसे मुंहमांगी रकम वसूलना, साथ ही उन्हें अपने अखबारों में जगह देना/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा उन्हें अपने संस्थानों में पैसे लेकर एक स्लॉट बेचना और इनके द्वारा समस्त जनता को दिग्भ्रमित करना है।
घ.         साथ ही राज्यसभा के लिए खुद को प्रोजेक्ट करना-कराना, मुख्यमंत्री का प्रेस एडवाइजर बनना, राजनीतिक सलाहकार बनना, सूचना आयुक्त बनना, विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों को यत्र – तत्र, मालदार जगहों/विभागों में स्थानांतरण करना-कराना प्रमुख है।
ङ.           यहीं नहीं सरकारी एवार्ड/गैर सरकारी एवार्ड/कभी-कभी खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए खुद ही एवार्ड लेने के लिए कार्यक्रम आयोजित करना-कराना भी शामिल है।
च.         अपने परिवार के सदस्यों/बेटे-बेटियों को सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में नियोजित करने के लिए अनैतिक तरीका अपनाना और सरकार में शामिल मंत्रियों का अपने अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से यशोगान गाना भी प्रमुख है।
छ.        यहां के 90% पत्रकार हैलमेट नहीं पहनते और ना ही गाड़ियों के वैध कागजात लेकर चलते हैं। ये तो उलटे ही यातायात नियमों को तोड़कर यातायात पुलिस को देख लेने की बात करते है।
ज.        विजुयल लेने के लिए तोड़-फोड़ करना-कराना और फिर खुद को महिमामंडित कराने का काम भी यहां के पत्रकारों का अति पवित्र कार्य बना हुआ हैं।
झ.       विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन कराना और अनैतिक तरीके से पैसे इकट्ठे करना। उनलोगों से पैसे लेना, जिन्होंने राज्य की जनता से ठगी की और फिर उन ठगों का अखबारों और चैनलों में महिमामंडित करना.....
मतलब स्पष्ट हैं अक्षय भाई, झारखंड के इन पत्रकारों की कारगुजारियां आप तक नहीं पहुंची थी क्या.....या आप यहां के नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की तरह, यहां के पत्रकारों से डर गये। हालांकि हम जानते हैं, आपको सॉरी से नफरत हैं, जब सॉरी से नफरत हैं तो आप इनसे डरेंगे क्या? आप गब्बर बन गये। बहुत ही सुंदर रुप, गब्बर का लेकर आये हैं। शोले के अमजद खान वाले गब्बर का तो आपने वाट लगा दी और शैतान गब्बर को भगवान गब्बर बना दिया। ये चारित्रिक उत्थान का विषय है। आपने संवाद भी बोला हैं कि यहां से ठीक पचास-पचास कोस........ नहीं तो गब्बर आ जायेगालेकिन हमें नहीं लगता कि यहां आपका डर पत्रकारों में हैं। हां मजा तो तब आ जायेगा, जब यहां के 10 भ्रष्ट पत्रकारों की सूची में पहला नंबर किसका होगा....उसके नाम के लिए काश एक अधिसूचना आपकी ओर से जारी हो जाती..............। सचमुच गब्बर भाई आप कहां हो......। झारखंड में आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा............GABBAR IS BACK.

Monday, April 6, 2015

100 दिन रघुवर के..........................


किसी भी सरकार के पहले 100 दिन ये बताने के लिए काफी हैं कि सरकार की नीयत और चरित्र क्या हैं  ?  वो प्रदेश को कहां ले जाना चाहता हैं, या ले जा पाने में समर्थ हैं भी या नहीं ?
इसलिए 100 दिन रघुवर सरकार के हो चुके हैं, इसलिए इसका आकलन करना अब जरुरी हो गया हैं................
जब से रघुवर दास मुख्यमंत्री बने हैं.....उनकी आरती उतारने में राज्य की सभी मीडिया ने एक दूसरे को पछाड़ने में एड़ी चोटी एक कर दी हैं.....अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर नजर डाले, तो जैसे लगता हैं कि राज्य में राम राज्य आ गया हैं.....बस श्रीरामचरितमानस की चौपाई ही सर्वत्र दीख रही हैं वो चौपाई के बोल हैं.........
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।
इसको आप ऐसे पढ़िये......
दैहिक दैविक भौतिक तापा। रघुवरराज नहिं काहुहि ब्यापा।।
मंत्री-अधिकारी परस्पर प्रीती। चलहिं अधर्म निरत कुनीती।।
अर्थात् दिमाग पर थोड़ा जोर डालिये....नीचे वाले स्वरचित चौपाई का अर्थ निकल जायेगा.............
ऐसा क्यों लिखना पड़ा.....इसे समझने की जरुरत हैं.....सर्वप्रथम जनता ने रघुवर को बहुमत दिया....फिर भी इन्हें जनता के बहुमत पर भरोसा नहीं था....इसलिए इन्होंने झाविमो के उन विधायकों को तोड़ने में सफलता पायी, जो सत्ता की मलाई खाने के लिए लालायित थे....यानी झाविमो के लालची विधायकों को अपने में मिला लिया और बता दिया कि रघुवर का चरित्र क्या हैं.........बेचारी मुस्लिम जनता, जिन्होंने भाजपा को सांप्रदायिक मानकर वोट नहीं दिया और झाविमो को गले लगाया, उन झाविमो विधायकों ने उन मुस्लिम मतदाताओं के जनभावनाओं को ठेंगा दिखाया..... भाजपाईयों के गोद में जाकर बैठ गये, ये हैं चरित्र झाविमो विधायकों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का, जो कहते हैं कि वे झारखंड को उचाई पर ले जायेंगे.................
दूसरी बात, कुछ दिन पहले ही पढ़ने को मिला कि हेमंत सोरेन के मुख्यमंत्री रहने तक हेमंत के प्रेस सलाहकार रह चुके हिमांशु को सुचना आयुक्त बनाया गया हैं....यानी झामुमो के नेताओं को, खासकर हेमंत को खुश करने की कोशिश.... क्या फर्क पड़ता हैं, चाहे हेमंत रहे मुख्यमंत्री या रघुवर रहे.....होगा वहीं जो सत्ता के दलाल चाहेंगे.....यानी चोर चोर मौसेरे भाई वाली कहावत चरितार्थ....जनता के बीच जाकर एक दूसरे की पोल खोलेंगे....और सत्ता में रहते एक दूसरे के लिए जान देंगे, वो सब करेंगे, जो करने की इजाजत ईमान और चरित्र नहीं देता......क्या रघुवर बता सकते हैं कि उनकी सरकार ने हिमांशु में क्या देखा कि सुचना आयुक्त बना दिया.....ये तो वहीं बात हुई जो मधु कोड़ा ने किया था.....मधु कोड़ा के भी प्रेस एडवाइजर को भी पूर्व में सुचना आयुक्त बनाने की कोशिश हुई थी, जिस पर प्रभात खबर के हरिवंश ने कड़ी प्रतिक्रिया अपने अखबार में छापी और सरकार को पीछे हटना पड़ा....इस बार क्या होगा........हम बताते हैं, होगा कुछ नहीं.....चूंकि सभी सत्ता के दलाल हैं.................
तीसरी बात सदन में मुख्यमंत्री रघुवर दास बयान देते हैं कि रांची की लड़की जिसका यौन शोषण हुआ, उस आरोपी वी एस तोमर को गिरफ्तार कर लाया जायेगा... और होता क्या हैं तोमर की गिरफ्तारी तो दूर, जिस पर आरोप लगा हैं, वो आरोपी ही यौन शोषण का आरोप अपने विरोधियों पर लगा देता हैं और मुख्यमंत्री की बात हवा हो जाती हैं.............
चौथी बात....गर मुख्यमंत्री की बयानों और सदन में दिये गये आश्वासनों की बात करें तो पता लग जायेगा कि ये मुख्यमंत्री कितने काबिल है....हरमू नदी के जीर्णोद्धार की बात करते हैं, शिलान्यास करवा देते हैं....रुपये भी मुहैया कराने की बात होती हैं....और बाद में पता चलता हैं कि अभी सर्वे होगा तब जाकर काम होगा....भाई जब सर्वे ही नहीं हुआ तो काम क्या होगा खाक.............
पांचवी बात....कुछ दिन पहले जमशेदपुर में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बयान दिया कि वे हनुमान की तरह काम करने की इच्छा रखते हैं.....अरे भाई कभी हनुमान चालीसा पढ़ा हैं...उसे पढ़ लीजिये...उसके बाद हनुमान के चरित्र को अपने जेहन में उतारिये तब काम आप खुद ही करने लगेंगे....ये इच्छा क्या होती हैं.....आज बोलने की नहीं करने की जरुरत हैं...जो दिखाई पड़ रहा हैं....वो तो निहायत शर्मनाक हैं.............
छठी बात.....इनके इस 100 दिन में रांची के ही तीन जगहों पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिश हुई, जिसे आम जनता के प्रयासों से रोक लिया गया....इसमें न तो सरकार और न ही पुलिस की कोई भूमिका थी........
सातवीं बात.......इन 100 दिनों में ही ये सुनने को मिला कि राज्य के कई विकास कार्य रुक गये, केन्द्र ने राशि में कटौती कर दी, 1540 करोड़ रुपये नहीं मिले, पीएमजीएसवाई के लिए मांगे गये 300 करोड़ रुपये नहीं मिले........
आठवीं बात........जनता और जनसेवक जाये भाड़ में, पर अपना वेतन बढ़ाने में भी सरकार ज्यादा दिलचस्पी दिखाई....तथाकथित वामपंथी विधायक अरुप चटर्जी की अध्यक्षता में बनी समिति ने अनुंशसा की....मुख्यमंत्री-स्पीकर का वेतन 1.33 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.20 लाख, नेता प्रतिपक्ष-मंत्री का वेतन 1.17 लाख रुपये से 2.10 लाख, और विधायकों का वेतन 0.96 लाख से बढ़ाकर 1.75 लाख रुपये कर दिया जाय। ( हालांकि सरकार अभी अनुमोदन नहीं की हैं पर संभावना हैं कि जल्द ही अनुमोदन हो जायेगा) ये हैं 100 दिनों की सरकार के कामकाज का महत्वपूर्ण कारनामा..........
नौवीं बात...रघुवर के बयान पर गौर कीजिये, जो कब पूरे होंगे, कैसे होंगे, इसका जवाब आज तक जनता को नहीं मिला..........
क.        जमशेदपुर में दिया बयान – 4000 मेगावाट बिजली का  उत्पादन शुरु होगा, राज्य इलेक्ट्रिक हब बनेगा......
ख.      दस हजार सिपाहियों की होगी नियुक्ति........
ग.       चंडीगढ़ और रायपुर की तर्ज पर बनेगी नई राजधानी....
घ.       मोनो रेल चलेगा.............
ङ.        धनबाद रिंग रोड मामला, आदिवासियों का मुआवजा 11 करोड़ रुपये हड़पने का मामला, दोषियों पर होंगी कार्रवाई...
च.       38 हजार शिक्षकों की होगी बहाली.............
छ.       चालू सत्र के दौरान स्थानीय नीति को लेकर बुलाई जायेगी सर्वदलीय बैठक......जो नहीं बुलाई गयी.......दो माह में स्थानीय नीति घोषित करेंगे.......
ज.       गुड गवर्नेंस, शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकार का होगा ज्यादा जोर..........
झ.      भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेंगे, भ्रष्टाचारियों की संपत्ति जब्त होंगी........
ञ.        राज्य में बनेंगी डिफेंस यूनिवर्सिटी.........
ट.        राज्य में जल्द ही स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी खुलेगी...........
ठ.        आदिवासी जमीन लूट की जांच एसआईटी करेगी............
ड.        कोल इंडिया की कंपनियां 17 हजार विस्थापितों को नौकरी देगी............
दसवी बात.....गर उपर्युक्त बयानों पर गौर करें तो बयानवीर का खिताब के प्रबल दावेदार हैं.....रघुवर और उनका मंत्रिमंडल........ऐसे भी रघुवर की सरकार हो या हेमंत की सरकार या मधु कोड़ा की सरकार.....सभी सरकारों पर जो अब तक झारखंड बनने के बाद लगी हैं वो आरोप हैं – भ्रष्टाचार के....अभी तक इस घिनौने आरोप से कोई सरकार नहीं बच पायी हैं और न बच पाने की कोशिश की........ऱघुवर ने तो शुरुआत ही की, भ्रष्टाचार से बहुमत को सशक्त बनाने के चक्कर में झाविमो के लालची विधायकों को अपने पक्ष में करके...........
और इन सब से उपर जो 100 दिनों में जो सुनने को मिले, झारखंड में वो और घिनौना था..........जब US कांसुलेट जनरल हेलेन ने कहा की झारखंड में हर साल 33 हजार बालिकाओं की तस्करी होती हैं.......उससे भी ज्यादा शर्मनाक सुनने को मिला....कि कैदी को जेल में जाने के बजाय उसे रेल लाइट एरिया पहुंचाया गया.........राज्य में खासकर बड़े पैमाने पर लड़कियों की भ्रूण हत्या हो रही हैं....सर्वाधिक मामले रांची में दिखाई पड़े हैं....भ्रूण हत्या से संबंधित मामले थाने में भी जा रहे हैं पर पुलिस इस पर एक्शन नहीं लेती...एक महिला पुलिस अधिकारी को जब ये बात पहुंचायी जाती हैं तो वह इस मामले में प्रवचन देना ज्यादा पसंद करती हैं.....इधर जिस पार्टी का प्रधानमंत्री कहता हैं कि उसे बेटी भीख में दे दीजिए, उसकी सरकार का मुख्यमंत्री इन बातों पर ध्यान ही नहीं देता....... और हद हो गयी जब सदन में सुनने को मिला की राज्य से 1281 बच्चे गायब हो गये....ये सुनने को मिला की 11 माह में 130 बच्चे गायब हैं और प्राथमिकी सिर्फ 74 दर्ज हुई......सरकार के तीन महीने से ज्यादा हो गये...पर सरकार ने इनकी सुध नहीं ली.....जब सदन में ये मामला गूंजा तब जाकर सरकार की नींद खुली हैं....देखते हैं क्या होता हैं.........हमें क्या.....सत्ता किसी की आये या जाये.....मजा तो सत्ता में रहनेवाले, सत्ता के दलालों, उनके चाहनेवालों को ही मिलनेवाला हैं....हम जैसों (जनता) के लिए तो श्रीरामचरितमानस की वो चौपाई ही काफी हैं...............
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।

Thursday, April 2, 2015

लो कर लो बात अपना रघुवर हनुमान बनेगा......................

पिछले दिनों रामनवमी के दौरान झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास का जमशेदपुर में दिया गया बयान पढ़ने को मिला....उन्होंने बयान दिया कि वे हनुमान की तरह झारखंड की सेवा करने की इच्छा रखते हैं....कमाल हैं मां बाप ने उनका नाम रखा रघुवर और बेटा हनुमान बनने की इच्छा पाल लिया.....राम की तरह सेवा करने में त्रुटियां हो सकती है क्या.... क्यों लगे हाथों हनुमान बनने की सपना देखने लगे.... कहीं इसलिए तो नहीं कि जैसे हनुमान ने लंका दहन किया...अशोकवाटिका उजाड़ दी.....पहाड़ उखाड़ लिये.....गदा से अपने विरोधियों अभिमानियों का सीना चूर कर दिया.....अहिरावण की भुजा उखाड़ दी थी... भाई हर आदमी स्वतंत्र हैं, कि उसे क्या बनना हैं....पर जिसके माता पिता ने नाम रघुवर रखा....उसे तो कम से कम अपने नाम का ख्याल जरुर रखना चाहिए....क्योंकि हर व्यक्ति शिखर पर जाना पसंद करता हैं, शिखर से नीचे उतरना कोई नहीं...राम प्रजापालक और हनुमान राम के सेवक....इस राज्य को सचमुच में हनुमान नहीं, बल्कि राम की आवश्यकता हैं....पर वर्तमान में झारखंड में केवल नाम का राम यानी रघुवर, सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर हैं...राम ने जो प्रजापालन में दृढ़ इच्छा शक्ति दिखाई, उसे ज्यादा पढ़ने और गुनने की जरुरत हैं....पर ज्यादातर लोगों को हनुमान की उछल कूद ज्यादा पसंद हैं.......... मैं देख भी रहा हूं कि वर्तमान में इस राज्य में काम काज कम और हनुमान कूद ज्यादा दिखाई पड़ रहा हैं.....हनुमान कूद इसलिए कह रहा हूं कि सीएम ने अपने बयानों से बयानवीर का खिताब तो जरुर हासिल कर लिया हैं.....चाहे सदन में दिया गया बयान हो....चाहे सदन के बाहर सभी नकारा साबित हो रहे हैं....क्योंकि खुद और उनके मंत्री व अधिकारियों का दल ईमान से राज्य की सेवा करने में नहीं लगा हैं...बल्कि अपने परिवारों और रिश्तेदारों की भक्ति में लगा हैं....यानी परिवारों और रिश्तेदारों से जब मुक्ति मिलेगी तब थोड़ा जनता को भी नून तेल चटा देंगे....जनता को इससे ज्यादा की जरुरत भी नहीं.....जनता को क्या हैं उसे मुफ्त में अनाज चाहिए, मुफ्त में धोती साड़ी चाहिए.....ऐसा तो जब चाहे, जब हो सकता हैं........ कुल मिलाकर देखे तो सस्ती लोकप्रियता छोड़, इस सरकार ने कुछ भी नहीं किया....रही बात स्थानीयता नीति की... तो मान लीजिये...जिस दिन रघुवर ने स्थानीयता नीति लागू की....उस दिन ये रघुवर, रघुवर न बनकर हनुमान की भूमिका में होगा और झारखंड के लोग रामायण का सुंदरकांड पढ़ रहे होंगे....यानी लंकादहन.....ऐसे भी रघुवर ने खुद ही कह दिया हैं कि उसे हनुमान बनने की इच्छा हैं......यानी जिस दिन लंकादहन की तर्ज पर झारखंडदहन होगा तो लंका तो लंकादहन के बाद भी बच गयी थी....झारखंड का क्या होगा?

Friday, February 27, 2015

60 दिन बीत गये पर रघुवर को माहौल बनाने से फुर्सत नहीं.........................

60 दिन बीत गये पर जनाब को माहौल बनाने से फुर्सत नहीं किसी भी व्यक्ति के लिए उसके शुरुआती दिन काफी मायने रखते हैं, इसी से सरकार की रुपरेखा और उसके काम करने के ढंग का पता चल जाता हैं, पर दो महीने बीत चुके, अभी तक ये पता नहीं चल पाया कि सरकार के मंसूबे क्या हैं, उसकी प्राथमिकता क्या हैं.........शुरुआती दिनों में मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों से वार्ता के दौरान ये बाते सुनने को मिली कि अभी सरकार विभागीय अधिकारियों से राय – मशविरा कर रही हैं, राय मशविरा होने के बाद राज्य के विकास के लिए एक रोडमैप बनाया जायेगा, और फिर राज्य के विकास में तेजी देखने को मिलेगा, पर किसी ने ये नहीं बताया कि वो रोडमैप कब तक बन कर तैयार हो जायेगा........फिलहाल हम भी आम जनता की तरह उस रोडमैप की इंतजारी में हैं............हालांकि कई अखबारों पर ध्यान दें तो उन अखबारों के पन्नों को उलटने पर सरकार काफी हरकतों में दीख रही हैं, एक्शन में भी दिख रही हैं पर आम जनता को कहीं से उस एक्शन की धार दिखाई नहीं दे रही हैं..............और जो दिखाई दे रही हैं, वो हमेशा से दिखाई देती रही हैं, कुछ नयापन नहीं दिख रहा.......................। नयापन दिखेगा भी कैसे, क्योंकि सरकार ने अभी तक नयापन दिखाई नहीं, वहीं पुरानी सरकारों की मुखिया की तरह चल दिये कंबल बांटने.....यानी कंबल लेनेवाली वहीं, देनेवाले वहीं, और इस लेनेदेने के चक्कर में कंबल का कमीशन खानेवाले भी वहीं........ सरकार ने भरोसा दिलाया था कि राज्य में गवर्नेंस पहली प्राथमिकता होगी, पर आम जनता से पूछे तो उन्हें कहीं गवर्नेंस की छाप नहीं दिखती............. राजधानी रांची में वहीं सड़क जाम की स्थिति, वहीं मैन्यूल तरीके से चलता यातायात का पहिया, वहीं बिना हैलमेट के चलते दूपहिये, वहीं जहां-तहां लगे टेम्पू और टैक्सियों का जमावड़ा, बड़े-बड़े अधिकारियों और मंत्रियों की लाल-पीली बत्तियों वाली चारपहियों का जहां-तहां रुकना और जाम लगाना.............. स्वास्थ्य विभाग से जूड़ी अस्पतालों में वहीं स्थिति यानी डाक्टर हैं तो दवा नहीं, दवा नहीं तो डाक्टर नहीं, खानाबदोश वाली स्थिति........... और पानी कहीं इतना की सड़कें धूल जाये और कहीं पानी इतना भी नहीं कि प्यास बूझ सकें, ये नमूने हैं, झारखंड की गवर्नेंस की, आखिर कब सुधरेगी यहां की स्थिति, कब अमल में आयेगा वो सब, जिसकी जरुरत आम जनता को हैं................ हमारे मुहल्ले के कई भाजपाई नेताओं व कार्यकर्ताओं के चेहरे कल तक खिले हुए थे, पर आज कुछ दिनों से गाल पचके और चेहरे मुरझाये हुए हैं, क्योंकि कल तक भाजपा कार्यकर्ताओं की सुध लेनेवाले मुख्यमंत्री ने उनकी भी क्लास ले ली हैं...कुछ बयान भाजपा कार्यकर्ताओं को सुहा नहीं रहे, ऐसे में कल कार्यकर्ता इनसे दूरियां बना लें तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी....यानी स्थिति वहीं जैसा पहले की, मुख्यमंत्री जायेंगे कार्यक्रम में, पर अधिकारी होंगे उनके नुमांइदे होंगे, बस नहीं होगी तो आम जनता और उनके कार्यकर्ता, जिसकी पीठ पर चढ़कर, जनाब आज शहंशाह बने हैं। आम जनता के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात, रोजगार, पेयजल और बिजली, ये ज्यादा मायने रखती हैं, पर इन्हें ठीक करने के लिए हमें नहीं लगता कि ज्यादा दिमाग लगाने की जरुरत हैं, बस उसे दिशा देने और प्रशासनिक अधिकारियों को टाइट करने की जरुरत हैं पर जिस प्रकार से काम चल रहे हैं, उससे नहीं लगता कि सरकार आम जनता को फिलहाल इन परिक्षेत्रों में राहत दिलाने को उत्सुक हैं, क्योंकि इनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों को नागरिक अभिनन्दन और अन्य व्यक्तिगत कार्यों से फूर्सत नहीं मिल पा रही.......... इधर दो महीने में खुशी का समाचार ये हैं कि मुख्यमंत्री रघुवर दास मुख्यमंत्री आवास पहुंच चुके हैं, तो आशा की जानी चाहिए कि मुख्यमंत्री आवास में पहुंचते ही, कुछ नई चीजे और काम की झलक जनता को देखने को मिलेगी, क्योंकि आशा पर ही जनता टिकी हैं.........हालांकि जिस प्रकार से पूर्व मुख्य सचिव सजल चक्रवर्ती और मुख्यमंत्री रघुवर दास के बीच एटीआई में तू तू – मे मे हुई और इस तू तू मे मे के दौरान सीएम रघुवर दास ने सजल चक्रवर्ती की मुख्य सचिव पद से छुट्टी करते हुए, उन्हें तीन दिनों के भीतर कारण बताओ नोटिस जारी किया और उनकी जगह पर राजीव गौवा को बिठा दिया, उससे नहीं लगता कि प्रशासनिक अधिकारियों और नई सरकार के बीच बेहतर तालमेल की स्थिति उत्पन्न होगी, क्योंकि उधर मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव पद पर बिहार के श्रम सचिव संजय कुमार को बुला लिया गया, जिसे लेकर राज्य की प्रमुख विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कड़ा प्रतिवाद किया हैं, झामुमो ने तो इस पर कड़ी प्रतिक्रिया भी दी, वो भी ये कहकर की सरकार को लगता हैं कि राज्य के अधिकारियों पर भरोसा नहीं, इसलिए वे झारखंड के प्रशासनिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ने और बाहर के अधिकारियों को बुलाकर उनकी आवभगत और झारखंड को अपने हिसाब से चलाने की सोच रहे हैं, जो गलत हैं। ऐसे आम तौर पर ये सीएम का निजी मामला हैं, पर इतना तो तय हैं कि आखिर कितने अधिकारी बाहर से बुलाये जायेंगे और कितने अधिकारी जो झारखंड में हैं, उन पर अविश्वास का तलवार लटकेगा, ऐसी स्थिति रही तो कमोबेश, आज नहीं तो कल परिस्थितियां विकट होगी और सरकार तथा अधिकारियों में मन मुटाव होना स्वभाविक हैं, ऐसे में आम तौर पर विकास कार्य प्रभावित होना तय हैं.......फिर भी अभी तो मात्र दो महीने बीते हैं, आगे – आगे देखिये होता हैं क्या, फिलहाल नये मुख्य सचिव और सीएम के प्रधान सचिव ने पद भार ग्रहण कर लिया हैं, देखते हैं आगे क्या सीन देखने को मिलता हैं, फिलहाल जैसे विपक्ष चुप्पी साधे हैं, आम जनता भी चुप्पी साधकर देख रही हैं कि ये माहौल बनाने का कार्यक्रम कब समाप्त होता हैं और सरकार सही मायनों में कब आम जनता के लिए ठोस प्रयास करती हुई दिखाई देती हैं..........