Wednesday, December 31, 2014

पीके के नाम पर.....................

म तो पीके का मतलब पहले रांची से प्रकाशित होनेवाला एक समाचार पत्र प्रभात खबर ही समझते थे, हमें क्या मालूम कि आगे चलकर इस पर फिल्म भी आ जायेगी, पर सच्चाई हैं, फिल्म तो आ गयी – कुछ लोग इसे बेहतरीन फिल्म मान रहे हैं, तो कुछ लोग विरोध कर रहे हैं। दोनों के अपने – अपने तर्क हैं और दोनों के तर्क को झूठलाया भी नहीं जा सकता, पर इन दोनों को नहीं मालूम कि तीसरे ने जो ये फिल्म बनायी हैं, या इस फिल्म में काम किया हैं, उनका मूल मकसद येन केन प्रकारेण पैसा बनाना हैं, इसके सिवा और कुछ करना नहीं, न तो ये धार्मिक हैं और न ही धर्म से लेना – देना या धर्म के रहस्यों को जाननेवाले। इधर समर्थन – विरोध के क्रम में ये फिल्म अब तक 200 करोड़ रुपये तक की बिजनेस कर चुकी हैं यानी पैसों के आधार पर देखे तो फिल्म हिट। याद रहें, पहले पैसे नहीं तय करती थी कि फिल्में हिट हुई या नहीं, पूर्व में कौन सी फिल्म किस या कितने हालों में ज्यादा महीनों या वर्षों तक टिकी रही – ये पैमाना होता था। पर सच पूछिये तो आजकल 200 करोड़ रुपये कमानेवाली फिल्म हो या पांच करोड़ की फिल्म, कोई अब इन्हें पूछता नहीं, एक बार देख लिया – और लिखो-फेंकों कलम की तरह अपने जेहन से उतार दिया। सामान्य व्यक्ति तो आजकल सिनेमा हाल में जाता ही नहीं, वो तो टीवी से ही चिपककर अपना मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन कर लेता हैं। खैर पूर्व में जब आज से पच्चीस साल पहले रांची से मेरा नाता जुड़ा तो मैं कभी प्रभात खबर का फैन हुआ करता था, पर अब मेरा सारा अनुराग उस अखबार के प्रति जो था, वो काफुर हो गया हैं। अब तो मैं अपने घर में ये अखबार आने ही नहीं देता, क्योंकि मुझे ऐसे आंदोलन की जरुरत नहीं, जो अखबार वाले लाते हो। और अब हम बात कर रहे हैं, फिल्म पीके की। जो विरोध कर रहे हैं, उनसे सवाल। क्या आपने फिल्म देखी हैं, गर फिल्म देखी हैं तो जरा ध्यान दीजिये, फिल्म शुरु होते ही, लालकृष्ण आडवाणी, प्रतिभा आडवाणी, अमिताभ बच्चन, राजस्थान पत्रिका, भाषा, आर्ट आफ लिविंग के रविशंकर के नाम आदि पढ़ने को मिलेंगे। मतलब समझिये, ऐसे एक नहीं अनेक लोगों के नाम आपको पढ़ने को मिलेंगे, जो या तो भाजपाई हैं या भाजपा का समर्थन करते हैं, इनकी केन्द्र बिन्दु या तो भाजपा हैं या संघ। जिससे ये ओतप्रोत रहते हैं। और जो विरोध कर रहे हैं मूलतः हिन्दूवादी संगठन हैं, जो किसी न किसी प्रकार से भाजपा से जूड़े होते हैं, मेरा सवाल हैं कि ये भाजपाई सीधे आडवाणी के घर जाकर, उनसे सीधे सवाल क्यों नहीं पूछ लेते कि भाई हम फिल्म का विरोध कर रहे हैं, आप समर्थन क्यों कर रहे हें। या यहीं सवाल श्री श्री रविशंकर से क्यूं नहीं पूछ लेते। यानी एक तरफ विरोध और दूसरी तरफ भाजपाईयों द्वारा ही इस फिल्म का समर्थन और प्रशंसा, कुछ बात हजम नहीं हो रही। फिल्मवालों ने भी गजब फिल्म बनायी हैं जरा देखिये एक डायलाग जिसमें आमिर खान बोलता हैं कि कुछ लोग बोलते हैं गाय की पूजा करो और कुछ लोग कहते हैं कि गाय का बलिदान कर दो और इसी फिल्म में एक सामान्य व्यक्ति से डायलाग बुलवाया जाता हैं, जिसमें कहता हैं कि गाय को खाना खिलाने से हमें नौकरी मिलेगी तो क्या गाय हमारी डिग्री लेकर संस्थानों में जायेगी और पता नहीं क्या – क्या। यानी बेसिरपैर के डायलाग बोलकर, जनता को भरमाने का काम जरुर किया गया, साथ ही हिंदू धर्म के अंदर व्याप्त अंधविश्वास और पाखंड की आलोचना की गयी। मेरा मानना हैं कि दुनिया का कौन ऐसा धर्म हैं, जो किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया गया और उसमें पाखंड नहीं। हमें आश्चर्य हो रहा हैं कि पूर्व में इन सब का विरोध वामपंथी किया करते थे, पर अब विरोध और समर्थन दोनों का काम भाजपाईयों ने उठा लिया हैं और रही बात अखबारों की तो उनकों पैसे फेंकिये और पूरा पेज ले लिजिये, दूसरे दिन देखिये आपकी फिल्म की तारीफ का कैसा पूल बांधते हैं, यानी हर्रे लगे, न फिटकरी और रंग चोखा। यानी फिल्म बनानेवालों ने हर प्रकार से खुद को बचाने का प्रबंध भी कर लिया, थोड़े पैसे के टूकड़े अखबार व चैनलों को फेकां और उन टूकड़ों पर अखबार और चैनलों के लोगों ने खुब मुंह मारीं, बदले में फिल्म का गुणगान किया, फिल्म हो गयी हिट, देश व समाज और धर्म जाये तेल लाने, इसे हमें क्या। हमको जिनको गरियाना था, गरिया दिया...............इसे ही तो फिल्म वालों की राजनीति कहते हैं।

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