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Thursday, June 15, 2017

धन्य है बिहार के लालू..........

धन्य है बिहार के लालू...
धन्य है उनके नेता...
धन्य है बिहार के पत्रकार...
इन दिनों बिहार के दो यादव नेताओं का पूरे देश में धूम है। एक है राजद सुप्रीमो लालू यादव और दूसरे है राजद के ही विधायक नीरज यादव। दोनों की समानता यह है कि दोनों पत्रकारों से ही भीड़ गये है। लालू यादव रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों को उनकी औकात बता रहे है, वहीं नीरज यादव तो प्रभात खबर के पत्रकार को गालियों से नवाज दिया है।
अगर इनसे संबंधित समाचारों की बारीकियों को देखें तो रिपब्लिक टीवी के पत्रकार लालू के समक्ष शेर की तरह भिड़ते नजर आ रहे है, वहीं प्रभात खबर का पत्रकार नीरज यादव के समक्ष मिमियाता नजर आ रहा है, प्रभात खबर के पत्रकार का नीरज यादव के समक्ष मिमियाने से एक बात स्पष्ट हो रही है कि प्रभात खबर के पत्रकार ने कुछ गड़बड़ियां की है, नहीं तो वह उक्त नेता के आगे मिमिया नहीं रहा होता, पर दूसरी ओर रिपब्लिक टीवी के पत्रकार का निर्भीकता के साथ लालू से भिड़ना और उनसे उन्हीं की भाषा में बात करना, सब कुछ सिद्ध कर देता है कि अब पहलेवाली बात नहीं रही। न तो लालू 1990 वाले लालू है और न उनकी अब वैसी गरिमा है। वह भी इसलिए कि, 1990 के लालू पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं था, वह गरीबी से निकले थे, और बिहार का सत्ता संभाला था, वह भी अपने दम पर, लेकिन इधर के कुछ सालों में, तो वे भ्रष्टाचार के साक्षात प्रतिमूर्ति बन गये है, इधर भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी द्वारा लगातार किये जा रहे राजनीतिक हमले ने उन्हें बेचैन कर दिया है। स्थिति ऐसी है कि इनसे बचने के लिए इनके पुत्रों ने तंत्र-मंत्र का भी सहारा लेना शुरु कर दिया है, पर इनसे भी इनकी रक्षा होगी, कहां नहीं जा सकता।
नीतीश कुमार तो ऐसे भी, मस्ती में है, वे जानते है कि लालू पर जितना राजनीतिक हमला अथवा भ्रष्टाचार का शिकंजा कसेगा, उनकी कुर्सी उतनी ही सुरक्षित रहेगी, क्योंकि लालू का ज्यादातर ध्यान अपनी राजनीतिक छवि को सुधारने और भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्ति पाने पर केन्द्रित रहेगा और नीतीश बहुत ही आसानी से ये पंचवर्षीय पारी भी खेल जायेंगे और अपनी छवि भी बिहार और बिहार के बाहर बना लेंगे. यह कहकर कि लालू जैसे भ्रष्टों के संग रहकर भी, उन पर कोई दाग नहीं है, इसी को तो राजनीति कहते है, पर लालू और नीरज ने जिस प्रकार से बिहार के सम्मान पर दाग लगाया है, वह बताता है कि आनेवाले समय में बिहारियों का गिन्जन होना तय है, क्योंकि जैसे उनके नेता होंगे, बिहारियों की छवि बिहार के बाहर, तो वैसे ही बनेगी। ऐसे भी जहां मूर्ख ट़ॉप करते हो, जहां महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस खूलेआम बदतमीजी करता हो, सब कुछ बता रहा है कि बिहार की प्रतिष्ठा बाहर मे कैसी बन रही है और ले-देकर बिहार के कुछ पत्रकारों की मिमियानेवाली कला ने तो यहां के पत्रकारों के कुकृत्यों को भी सामने लाकर खड़ा कर दिया है. भाई नेताओं से लाभ भी लेंगे और उनकी धज्जियां भी उडायेंगे तो गाली सुनना ही पड़ेगा, भला इतनी बात कथित पत्रकारों को समझ नहीं आती।

Sunday, June 4, 2017

हमें भोर पसन्द है..........

भला भोर किसे पसन्द नहीं होगा। जब से दुनिया बनी, लोगों को अंधकार की जगह प्रकाश अर्थात् भोर ही ज्यादा भाया है। झारखण्ड में ऐसे तो कई अनुमंडलाधिकारी है, पर हमसे पूछा जाय तो, मैं कहूंगा कि एक ही अनुमंडलाधिकारी है, जिसका नाम भोर सिंह यादव है क्योंकि जो जनता की अपेक्षाओं पर खड़ा उतरे, वो अनुमंडलाधिकारी और जो जनता की बजाय नेताओं, देश के दुश्मनों के पिछलग्गू बने, वो खुद क्या है?  खुद ही बताये तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
फिलहाल रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव ने कई नेताओं, बिल्डरों, दो नंबर का काम करनेवाले अखबारों-पत्रकारों, मिलावटखोरी का धंधा करनेवाले कारोबारियों और दंगा में महारत हासिल करनेवाले दंगाइयों की हालत पस्त कर दी है, और जैसे ही इन लोगों के हालत पस्त होने शुरु हुए है, सभी ने मिलकर अब भोर सिंह यादव को हटाने के लिए हाथ मिला लिया है, जिसका परिणाम है आज रांची कोर्ट में भोर सिंह यादव के खिलाफ दायर मुकदमा। ऐसे तो इतिहास गवाह है कि जैसे ही आप अच्छा काम करना शुरु करेंगे, लोग आपको ऐसा केस में उलझायेंगे कि आपकी नानी-दादी याद आ जायेगी, पर क्या हम इन झूठे मुकदमों से डरकर, अच्छा काम करना बंद कर देंगे? उत्तर होगा – नहीं।
आप रांची की आम जनता से पूछिये, सभी ने भोर सिंह यादव को अपने दिल में स्थान दे रखा है, आखिर क्या कर दिया है भोर सिंह यादव ने, कि लोग उसके पीछे पागल हो गये है?  ये सवाल आज हर जगह चर्चा में है। मैं स्वयं पिछले 37 सालों से पत्रकारिता कर रहा हूं, पर आज तक मैंने ऐसा लोकप्रिय युवा एसडीओ नहीं देखा।
याद करिये, अभी कोई ज्यादा दिन नहीं हुआ है, घटना 20 अप्रैल की है, भोर सिंह यादव रांची की सड़कों पर अहले सुबह पहुंच गये, हेलमेट जांच करने हेतु, कुछ लोगों को उनका यह काम बहुत ही अच्छा लगा था, पर रांची से प्रकाशित प्रभात खबर को यह अच्छा काम, इतना बुरा लगा कि उसने दूसरे दिन 21 अप्रैल को पृष्ठ संख्या 2 में एसडीओ भोर सिंह यादव को ही कटघरे में खड़ा कर दिया, जिसकी हमने अपने फेसबुक में कड़ी आलोचना की थी और एसडीओ भोर सिंह यादव के इस सुंदर कार्य का समर्थन किया था। फेसबुक में मेरे द्वारा भोर सिंह यादव के इस कार्य का समर्थन का प्रभाव यह पड़ा कि प्रभात खबर को अंत में, बैकफूट पर जाना पड़ा तथा दूसरी ओर भोर सिंह यादव अपने कामों में बिना किसी लाग-लपेट के सेवा-भाव से लगे रहे।
इसी बीच कभी हेलमेट पहनने को प्रेरित करने का काम...
कभी मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई...
तो कभी बड़गाई बस्ती में उठी सांप्रदायिकता की आग को जड़ से उखाड़ फेकने के लिए सक्रिय होने का कार्य...
भोर सिंह यादव को और अधिक लोकप्रिय बना दिया...
स्थिति ऐसी हो गयी है कि रांची की आम जनता यह मानने को तैयार ही नहीं, कि रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव किसी से दस लाख रुपये की डिमांड कर सकते है, हालांकि ये पूरा मामला अब धीरे-धीरे क्लियर होता जा रहा है, कि भोर सिंह यादव द्वारा आखिर दस लाख रुपये की डिमांड का आरोप क्यों लगाया जा रहा है...
इधर भोर सिंह यादव द्वारा मिलावटखोरों के खिलाफ की गयी कार्रवाई के बाद कुछ व्यापारियों द्वारा अपने कारोबार को एक दिन के लिए बंद रखने का काम, रांची की जनता को रास नही आया है।
हालांकि सुनने में आया है कि गलत कार्य करनेवाले व्यापारियों और राजनीतिज्ञों का दल रघुवर सरकार पर दबाव बना रहा है कि भोर सिंह यादव की रांची से विदाई कर दी जाय, पर आम जनता के बीच लोकप्रिय भोर सिंह यादव की बिदाई इतना आसान नहीं, क्योंकि भोर सिंह यादव के लिए राजधानी रांची की जनता, रांची की सड़कों पर उतरने के लिए तैयार है, कुछ युवा शक्तियां तो अभी से आंदोलन के मूड में है...
इसलिए भोर सिंह यादव जी, बधाई आपको, रांची की जनता आपके साथ, तो फिर डर किस बात का...
लगे रहिये और असामाजिक तत्वों को उनकी औकात बताते रहिये...
हमारी ओर से ढेर सारी आपको शुभकामनाएं...

Tuesday, May 23, 2017

कनफूंकवों के इशारे पर...........

कनफूंकवों के इशारे पर हुई प्राथमिकी.....
रांची से प्रकाशित कुछ राष्ट्रीय अखबारों ने मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कनफूंकवों को खुश करने के लिए हाथों में गजरा लगाकर ठुमरी गाया.....
भाजपा नेता ने ही रघुवर को राम बनाया और भाजपा नेता ने ही उस चित्र को मुझे भेजा और भाजपा नेता ने ही कनफूंकवों के इशारे पर मेरे खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दी, यानी ऐसे चल रहा है, रघुवर शासन और ऐसे चल रही है रघुवर के इशारे पर यहां की पत्रकारिता.....
जी हां, रांची में ऐसे ही पत्रकारिता हो रही है। हिन्दुस्तान अखबार को छोड़कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और प्रभात खबर ने मुझे पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया है, जबकि प्रभात खबर अच्छी तरह जानता है कि उसके अखबार में मेरे कई आलेख पत्रकार के रुप में प्रकाशित हो चुके है, उसके द्वारा संचालित पत्रकारिता संस्थान में, मैं कई बार सेवा भी दे चुका हूं, पटना के दानापुर अनुमंडल से प्रभात खबर को मैंने संवाददाता के रुप में सेवा भी दी है, पर आज उसे रतौंधी हो चुकी है, इस रतौंधी के कारण उसने हमें पत्रकार के रुप में पहचानने से इनकार कर दिया। ये वहीं प्रभात खबर है, जो भारत के कश्मीर को एक नहीं कई बार पाकिस्तान का अंग बता चुका है, राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता है, उसका गलत चित्र अपने अखबार में प्रकाशित करता है, पर उस प्रभात खबर के खिलाफ एक बार भी राष्ट्रद्रोह का मुकदमा न तो मुख्यमंत्री कराता है और न उसके आस-पास रहनेवाले कनफूंकवें, आखिर वे ऐसा क्यों नहीं करते, ये तो रघुवर और उनके कनफूंकवे ही बतायेंगे।
दैनिक जागरण, यहां भी मैंने मोतिहारी और धनबाद में कार्यालय प्रमुख के रुप में सेवा दी है, पर ये हमारे लिए शख्स का प्रयोग कर रहा है, ये ऐसा क्यों कर रहा है, वह मैं अच्छी तरह जानता हूं, यहां काम कर रहे एक शख्स को हमे देखते ही मिर्ची लग जाती है, इसलिए उसे एक छोटा सा मौका मिला, खूब जमकर अपनी भड़ास निकाल ली, ऐसे उसकी हिम्मत नहीं कि वो हमें दोषी ठहरा दें, पर अखबार में भड़ास अगर निकल जाता है, तो क्या गलत है?
दैनिक भास्कर तो नया – नया अखबार है, उसमें काम करनेवाले कई लोग हमारे फेसबुक फ्रेंड है, वहाटस ग्रुप में भी है, पर इसने भी मर्यादा को ताड़-ताड़ कर दिया, यानी इसके भी नजर में मैं पत्रकार नहीं हूं।
आखिर पत्रकार होता क्या है?
क्या जो मुख्यमंत्री के आगे नाचते हुए ठूमरी गाये, वो पत्रकार है।
क्या पत्रकार वो है, जो मुख्यमंत्री और उनके कनफूंकवों के आगे अपनी कलम बेच दे।
अरे पत्रकार तो वह होता है, जो अपनी जमीर किसी भी हालत में न बेचे।
इन अखबारों ने प्राथमिकी देखी और बस न्यूज लिख दिया, जबकि इन लोगों के पास हमारे मोबाइल नंबर है, पर इन लोगों ने पत्रकारिता की एथिक्स को ही मटियामेट कर दिया। यानी बेशर्मी की सारी हदें, पार कर दी, पर शायद इन्हें नहीं पता कि आज उनकी सारी हेकड़ी, सारी अकड़ सोशल साइट्स ने निकाल दी है।
इनकी वश चले तो ये हमें सूली पर चढ़ा दे, पर इन्हें नहीं पता कि मैं जब भी कुछ लिखता हूं तो उसका आधार होता है. और वह आधार मेरे पास है।
कौन ये चित्र बनाया,
किसने पेश किया,
किसने वायरल किया,
जवाब मैं दूंगा,
और जब मैं जवाब दूंगा तो सबकी फटेगी...
फटेगी उन कनफूंकवो की भी
और
फटेगी मुख्यमंत्री और कनफूंकवों के आगे ठूमरी गानेवाले उन तथाकथित अखबारों की भी।
और अब बात धार्मिक भावना की...
ये धार्मिक भावना तब नहीं भड़कती, जब मुख्यमंत्री खूलेआम श्रीरामचरितमानस की चौपाईयों से स्वयं को जोड़ता है...
ये धार्मिक भावना तब नहीं भड़कती, जब मुख्यमंत्री स्वयं को रघुकुल यानी भगवान राम के कुल से स्वयं को जोड़ता है...
ये धार्मिक भावना तब नहीं भड़कती, जब गोस्वामी तुलसीदास की रचना का इस्तेमाल एक मुख्यमंत्री स्वयं के लिए करता है, और संविधान के प्रस्तावना में उद्धृत धर्मनिरपेक्ष भावना का अनादर करता है।
सबूत आपके सामने है, जरा देखिये, पूरे रांची में कैसे मुख्यमंत्री रघुवर दास ने श्रीरामचरितमानस की चौपाईयों और धर्मनिरपेक्षता की धज्जियां उड़ा दी...
आश्चर्य इस बात की है कि एक मुख्यमंत्री और उसका तबका खूलेआम धार्मिक भावना की धज्जियां उड़ा रहा है, पर उसके खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं होती, और एक व्यक्ति सत्य लिखता है, सत्य को प्रतिष्ठित करता है, तो ये मुख्यमंत्री रघुवर दास और उनके कनफूंकवे तथा इनके इशारे पर ठूमरी गानेवाला कुछ अखबारों का समूह एक ईमानदार व्यक्ति को ही कठघरे में रख देता है।
अरे मैं चुनौती देता हूं कि इस पूरे मामले की जांच करो, पर तुम जांच नहीं करा पाओगे, क्योंकि फंसेगा और कोई नहीं, वहीं फंसेगा जो ज्यादा अभी काबिल बन रहा है, क्योंकि मेरे पास पक्के सबूत है कि किस भाजपा नेता ने रघुवर दास का राम के रुप में चित्र बनाया और किसने वायरल किया, और इस पर किसने, किससे क्या संवाद किया।
है हिम्मत तो मैं तूम्हे चुनौती देता हूं, इस चुनौती को स्वीकार करो।
और
धमकी किसे देते हो, मूर्खों,
मैं कोई बहुत बड़ा तोप थोड़े ही हूं,
अभी भी साधारण तरीके से एक किराये के घर में रहता हूं, आ जाओ, हमें खत्म करा दो।
तुम्हे किसने रोका है,
जागीर तुम्हारी,
शासन तुम्हारा
कनफूंकवे तुम्हारे
और ठुमरी गानेवाले अखबार तुम्हारा
फिर दिक्कत किस बात की....

Saturday, May 13, 2017

जनता की नजरों में मुख्यमंत्री रघुवर दास............

झारखण्ड की जनता की नजर में मुख्यमंत्री रघुवर दास की कोई इज्जत नहीं। कल की ही बात है, मैं रांची मेन रोड स्थित सुप्रसिद्ध व्यवसायी एवं उद्योगपति एक जैन परिवार से मिला। पूरा परिवार भाजपा एवं संघ से जुड़ा हुआ और जब मैंने उनसे राज्य और सरकार के बारे में खुलकर बात की, तो मैं सुनकर हैरान रह गया। वे इस बात को लेकर दुखी थे कि मुख्यमंत्री रघुवर दास को बात करने की तमीज तक नहीं। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री रघुवर दास को कहा क्या बोलना है? कैसे बोलना है? कैसे अपनी बात रखनी है? इसका ज्ञान ही नहीं। ऐसे में यह राज्य उनके नेतृत्व में प्रगति करेगा, उन्हें ऐसा नहीं लगता। ढाई साल बीतने को आये, ढाई साल शेष है, जब आपने ढाई साल में कुछ काम नहीं किया तो मैं ये कैसे मान लूं कि आनेवाला ढाई साल ये कुछ अच्छा कर लेने में कामयाब हो जायेंगे। वे तो इतने दुखी थे कि वे ये भी कहने लगे कि यार काम करो या न करो, आपको बात करने में क्या परेशानी है? बात में रुखापन क्यों? आप किसी को इज्जत क्यों नहीं देते?
ठीक यहीं बात चर्च रोड स्थित एक व्यवसायी और गोस्सनर कॉलेज में पढ़ाई कर रहे एक युवा छात्र ने कहीं कि मुख्यमंत्री रघुवर दास के लक्षण कुछ ठीक नहीं दीख रहे, अगली बार जब भी कभी विधानसभा के चुनाव होंगे, इस सरकार के जाने की पूरी गारंटी है, पर पुनः आने की संभावना दूर – दूर तक नहीं दीखती।
चुटिया में भाजपा कार्यकर्ताओं की एक बड़ी टीम बताती है कि आनेवाले लोकसभा चुनाव में वे मोदी जी के लिए काम करेंगे पर विधानसभा चुनाव में वे इस राज्य सरकार को हटाने के लिए जोर लगायेंगे, क्योंकि जनता को जवाब मुख्यमंत्री को नहीं देना होता है, कार्यकर्ताओं को देना होता है, इस मुख्यमंत्री के व्यवहार ने उन कार्यकर्ताओं को कहीं का नहीं छोड़ा है, इनसे कहीं अच्छे मुख्यमंत्री के रुप में अर्जुन मुंडा थे, जिनका कार्यकर्ताओं पर ध्यान रहता था, पर ये तो किसी को सुनते ही नहीं, पता नहीं कौन कनफूंकवा इनकी कान फूंक देता है और उसी के फूंक पर ये दीवाने होकर वे काम कर रहे है, जिससे पार्टी जनता से दूर होती चली गयी।

Saturday, April 29, 2017

क्या है अक्षय तृतीया...........

अमिता पिछले पन्द्रह दिनो से अपने पति राज से झगड़ रही है कि पिछले साल जिस प्रकार से राज ने अक्षय तृतीया के दिन धोखा दिया था, वह इस बार धोखा नहीं देगा। इस साल अक्षय तृतीया के दिन सोने के कंठहार वह लेकर रहेगी, क्योंकि पिछले दिनों एक पंडित जी ने कहा था कि अक्षय तृतीया के दिन सोने का कोई न कोई आभूषण अवश्य खरीदना चाहिए, क्योंकि सोना कभी क्षय नहीं होता, उससे लाभ ही लाभ होता है, घर में सुख-शांति आती है, समृद्धि आती है। बेचारा राज, उसे पिछले साल की तरह इस साल भी आमदनी में कुछ खास वृद्धि नहीं हुई, पर पत्नी ने ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया है कि उसके हालत पस्त है। अमिता और राज की तरह ऐसे कई घर और परिवार है, जो अक्षय तृतीया के नये मिजाज से अपने घर को तबाह करने में लग गये है।
उसका कारण है कि इन दिनों नये ढंग के पंडितों, नये ढंग के अखबारों-चैनलों और नये ढंग के व्यापारियों ने जन्म ले लिया हैं। इन तीनों ने मिलकर इस प्रकार से अक्षय तृतीया की ब्रांडिंग कर दी है, कि आम आदमी इस पर्व के चक्कर में अपनी खुशियां बड़े-बड़े धन्ना सेठों के यहां गिरवी रखने को मजबूर हैं।
पंडितों (पंडित का मतलब जाति नहीं समझ लीजियेगा, अगर आप इसे जाति से तौलेंगे तो धोखे में पड़ जायेंगे, आजकल हर जातियों में नये – नये पंडित जन्म ले लिये है, जो गांवों-शहरों में जन्मकुंडली देखने का दुकान खोल लिये है, मैं उनकी बात कर रहा हूं) को देखिये तो वे बेसिर-पैर की बातें वैदिक मंत्रों से जोड़कर आम-आदमी को मूर्ख बना रहे है, जबकि उन वैदिक मंत्रों का उससे कोई लेना – देना नहीं होता।
दूसरी ओर अखबार और चैनलवाले बड़े-बड़े व्यापारियों, जिनकी दुकानें, व्यापारिक प्रतिष्ठानें शहरों में चल रही है, उनसे विज्ञापन इस प्रकार वसूलते है, वह भी उनके गर्दन पर छुरी रखकर, कि अगर वे विज्ञापन नहीं देंगे तो वे आयकर विभाग से उसकी शिकायत करके, उसकी सारी दुकानदारी मटियामेट कर देंगे और इस प्रकार व्यापारियों और मीडिया के लोगों का मधुर संबंध बनता है, भर-भर पेज विज्ञापन मुक्त कंठ से ये व्यापारी वर्ग अखबारों को उपलब्ध कराते है और इस प्रकार झूठ का व्यापार जमकर एक दिन चलता है, जिसका नाम है – अक्षय तृतीया।
मैं पूछता हूं कि आम जनता पूछे, उन ढोंगी पंडितों, अखबारवालों और व्यापारियों से कि वे बतायें कि...
• किस सनातन-वैदिक ग्रंथों में लिखा है कि हमारे भगवान राम सीता के संग, भगवान शिव पार्वती के संग, भगवान विष्णु लक्ष्मी के संग या कोई भी देवता अपनी-अपनी पत्नी के संग, किसी व्यापारी के यहां जाकर अक्षय तृतीया के दिन स्वर्णाभूषण या अन्य वस्तूएं खरीदी थी?
• अक्षय का अर्थ क्या होता है?
• दुनिया में वह कौन ऐसा चीज है, जो अक्षय है, जिसकी प्राप्ति के बिना जीवन सफल नहीं हो सकता, आगे नहीं बढ़ सकता?
• अक्षय तृतीया के दिन किस चीज को प्राप्त करने से जीवन सुलभ हो जाता है?
• आखिर अक्षय तृतीया के दिन सोने-चांदी या अन्य सुख-सुविधाओं के सामान क्यों नहीं खरीदने चाहिए?
इन सारे प्रश्नों का उत्तर आपको कोई ढोंगी पंडित, कोई अखबार या कोई व्यापारियों का समूह नहीं देगा, क्योंकि ये सभी व्यापार के नाम पर यहां की जनता को बेवकूफ बना रहे है और अपना उल्लू सीधा करते है।
और
अब हम आपको सारे प्रश्नों का जवाब दे देते है...
• हमारे भगवान कभी भी विलासिता संबंधी वस्तुओं को खरीदने की सलाह नहीं देते, उनका केवल यहीं कहना होता है कि आप उन्हें स्मरण करें, जीवन सफल हो जायेगा।
• अक्षय का अर्थ होता है, जिसका कभी क्षय नहीं हो।
• दुनिया में जितनी वस्तूएं हैं, सभी क्षय होनेवाली है। उनका नाश तय है, इसलिए ये अक्षय हो ही नहीं सकती, इसलिए इन चीजों को खरीदना नहीं चाहिए, लेकिन दुनिया में एक चीज है, जिसका कभी क्षय नहीं होता, वह है प्रभुकृपा अथवा अपने से बड़ों का आशीर्वाद। यह ऐसी वस्तु है, जिसका कभी क्षय नहीं हो सकता, इसलिए हमें प्रभुकृपा और आशीर्वाद की ललक को जागृत करना चाहिए।
• जो भी व्यक्ति प्रभुकृपा और अपने से बडों का आशीर्वाद को त्याग कर भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए दिमाग लगाता है, वह उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे भौतिक वस्तूएँ।
और अंत में,
इन ढोंगियों से पूछिये कि बताओं, राम, कृष्ण, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, कबीर, तुलसी, सूरदास, मीराबाई, लक्ष्मीबाई, सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी महान विभूतियां किस साल अक्षय तृतीया के दिन भौतिक वस्तूओं की प्राप्ति के लिए, सुख-सुविधा की प्राप्ति के लिए अक्षय तृतीया तुम्हारे कथनानुसार मनाया था और जब उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो हमें आप ऐसा करने को प्रेरित क्यों कर रहे हो? आओ देश बनाएं, न कि स्वयं रसातल में चले जाये और ढोंगियों का बराबर शिकार बनते रहे।

Friday, April 21, 2017

प्रभात खबर के कारनामे..............

हम 100 प्रतिशत आश्वस्त है कि कल रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव ने जरुर प्रभात खबर के किसी पत्रकार या वहां कार्यरत किसी खास व्यक्ति के दुखती रग पर हाथ रख दिया होगा, उसकी बात नहीं मानी होगी, जिसको लेकर प्रभात खबर ने अपना पृष्ठ संख्या 2, रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव के खिलाफ रंग दिया।
मामला क्या है? इसे जानिये...
रांची एसडीओ ने कल सुबह करीब पौने 6 बजे यातायात जांच अभियान प्रारंभ किया, जिसमें करीब 150 से ज्यादा लोग यातायात नियमों का उल्लंघन करते हुए पकड़े गये। प्रभात खबर के अनुसार और पकड़े गये लोगों के अनुसार इतनी सुबह यातायात जांच अभियान नहीं चलाना चाहिए। अरे भाई तो तुम्ही बताओ, कब चलाना चाहिए? और कैसे चलाना चाहिए? क्या रांची एसडीओ को यातायात नियम तोड़नेवालों से पूछकर यातायात जांच अभियान चलाना चाहिए कि आप कब घर से निकल रहे है? कब यातायात नियम तोड़ रहे होंगे? ताकि हम आपके इस नियम तोड़ने के क्रम में आपका बाधक नहीं बने।
प्रभात खबर ये बताये कि जो उसने “पीड़ा एक आम आदमी की” के नाम से जो कुछ भी लिखा है। उस आम आदमी का नाम क्यों नहीं लिखा? जबकि वह पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री और झारखण्ड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का ध्यान आकृष्ट करा रहा है। इसका मतलब क्या है? इतनी मूर्ख तो रांची की जनता नहीं।
क्या प्रभात खबर इन सवालों का जवाब दे सकता है?
• क्या दुर्घटना समय देखकर होती है?
• क्या वाहन चालकों को यातायात नियमों को तोड़ने के लिए एक खास समय प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराना चाहिए?
• गलत करनेवालों को तो गलत का परिणाम तो स्वयं ही भुगतना होगा, इसके लिए कोई विशेष सहायता देने का प्रावधान कानून में उल्लिखित है क्या?
ढाई घंटे के बाद जुर्माने की रसीद काटी गयी तो इसके लिए भी दोषी वे लोग है, जो यातायात नियमों का उल्लंघन करते है, ऐसी घटना गर होने लगे तो फिर कोई यातायात नियमों को तोड़ने के पूर्व दस बार सोचेगा कि इसके परिणाम क्या हो सकते है, कम से कम रांची एसडीओ ने किसी के साथ गलत तो नहीं किया। यहां पर ऐसे कोई भी अच्छा काम करिये, यहां तो बदनाम करनेवाले लोगों को एक मौका चाहिए, जैसा मौका प्रभात खबर को आज मिल गया।
बधाई, रांची के एसडीओ भोर सिंह यादव को, जिन्होंने अपने विवेकपूर्ण कार्यों से स्थिति पर नियंत्रण किया और लोगों को एक संदेश भी दिया कि उनका जीवन कितना महत्वपूर्ण है, उनके परिवारों के लिए...

मुख्यमंत्री की भाषा...................

अगर ये मुख्यमंत्री की भाषा है...
तो माफ करें, राज्य की हर जनता को ऐसी भाषा पर गहरी आपत्ति होनी चाहिए...
मुख्यमंत्री रघुवर दास जी अपनी भाषा को संयंमित रखिये, नहीं तो बाद में आपको ही बहुत दिक्कत हो जायेगी। अपने से बड़ों और विपक्ष का आदर करना आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि आप सत्ता के सर्वोच्च पायदान पर खड़े हैं। आपकी भाषा से ही राज्य की जनता का मान बढ़ेगा और मान घटेगा भी।
आपने कल शिकारीपाड़ा में जिस प्रकार से संबोधन के क्रम में झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन और विरोधी दल के नेता हेमंत सोरेन के खिलाफ आग उगला, वह सहीं नहीं हैं। आपका यह कहना कि कब तक ढोओगे शिबू सोरेन को, दर्शाता है कि लिट्टीपाड़ा की हार, आपको अंदर से बेचैन कर दी है, आप ठीक से कई दिनों तक सोये नहीं है, रह-रह कर लिट्टीपाड़ा की हार आपको टीस दे रही है। आप इससे उबरिये, क्योंकि आप मुख्यमंत्री है।
आप ये गांठ बांध लीजिये कि शिबू सोरेन झारखण्ड आंदोलन की उपज है, उन्हें दिशोम गुरु कहा जाता है, झारखण्ड के कई इलाकों में मैंने स्वयं देखा है कि उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है, और ये सब ऐसे ही नहीं है, उन्होंने झारखण्ड को दिया है, आज भी उनकी सादगी, हर झारखण्डी को भा जाता है। ये अलग बात है कि पुत्र-परिवार मोह में, वे भी स्वयं को उबार नहीं पाये। रही बात कि उन्होंने रिश्वत लेकर सरकार बचायी, पर आप ये क्यों भूल जाते है कि आपकी पार्टी में भी एक राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके एक व्यक्ति ने नोट गिने थे, जिसे पूरा देश टीवी पर देखा था। आज सच्चाई यह है कि कोई भी राजनेता दूध का धुला नहीं है।
आज जिस झारखण्ड के आप मुख्यमंत्री है, वह शिबू सोरेन का ही देन है, आपकी पार्टी तो वनांचल का सपना देख रही थी। आप ये भी नहीं भूले कि कभी आप उनके नेतृत्व में उप मुख्यमंत्री बन कर राज्य की जनता को सेवा दी है, अगर आप से यहीं कोई सवाल पूछे कि जो शिबू सोरेन के बारे में आपने कल बातें कहीं, आपका ये ज्ञान 2010 में कहां चला गया था? जब आप विधानसभा में उनके बगल में उपमुख्यमंत्री के रुप में बैठा करते थे, यानी साथ में है तो ठीक और विरोध में हो गये तो गलत। कड़वा-कड़वा थू-थू और मीठा-मीठा चप-चप।
दूसरी ओर नेता विरोधी दल हेमंत सोरेन को लूटेरा और डकैत कहना क्या सहीं है? आपने अपने विरोधियों को डकैत और लूटेरा कहना कब से सीख लिया? कौन सीखा रहा है आपको? अपने विरोधियों के लिए इस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करने के लिए, ये तो गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य है।  मैंने नेता विरोधी दल के रुप में संसद में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज को भी देखा है, साथ ही प्रधानमंत्री के रुप में अटल बिहारी वाजपेयी को भी देखा है, पर आज तक अपने विरोधियों के लिए आपत्तिजनक शब्द का प्रयोग करते, मैंने भाजपा के इन महान नेताओं को नहीं देखा।
आप ये न भूलें कि आप भाजपा जैसी पार्टी के नेता है, झारखण्ड जैसे राज्य के मुख्यमंत्री है, जहां की भाषा में मिठास है, जहां की बोली में मिसरी घुली हुई है, कृपया अपने इस प्रकार के वक्तव्य से स्वयं को छोटा न करें और भाजपा के खिलाफ एक बड़ी फौज खड़ी करने की कोशिश न करें, क्योंकि लोकतंत्र में जनता सभी नेताओं और पार्टियों को देख रही होती है, अगर शिबू सोरेन और उनके बेटे हेमंत ने गलत की है, तो आज उनकी स्थिति क्या है? वे सत्ता से बाहर है।
वक्त आने पर लोकतंत्र में जनता स्वयं ही निर्णय कर देती है, आप इसकी चिंता क्यों कर रहे है? आप चिंता करना छोड़िये। जिस प्रकार की भाषा आपने शिकारीपाड़ा में प्रयोग किया है, अगर ऐसी भाषा का प्रयोग आपने एकाध जगह और कर दिया, तो समझ लीजिये, आपने झामुमो को जीवनदान दे दिया। ऐसे भी आप जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग कर रहे है, आपके आस-पास रहनेवाले लोग भी उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करने लगे है। जो किसी भी प्रकार से सहीं नहीं है। सत्ता का दंभ बहुत को नीचे ले जाता है। ढाई साल पूरे होने को है, ढाई साल और खत्म होने में कितने समय लगेंगे। फिलहाल जो स्थिति है, उसे जानने की कोशिश करें। हेमंत धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहे है और आपकी स्थिति डगमगा रही है, शायद आपको नहीं पता।

Monday, April 10, 2017

मोदी और नीतीश से अपील..............

मोदी और नीतीश से अपील...
प्रभात खबर को साधुवाद...
सचमुच चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने के अवसर पर प्रभात खबर ने जो दो पृष्ठों का विशेष परिशिष्ट, वह भी मुख्य पृष्ठ पर दिया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। ऐसे अवसरों पर देश व राज्यों के बच्चों को यह बताना कि आज का दिन कितना महत्वपूर्ण है, इसकी जिम्मेवारी लेना बहुत बड़ी बात है। अच्छा होता कि देश व राज्य के सभी अखबार चंपारण सत्याग्रह के महत्व को समझते, पर ऐसा संभव नहीं हुआ है। हम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी अनुरोध करेंगे कि चूंकि चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का टर्निंग प्वाइंट है, इसलिए इसे सामान्य समझने का भूल न करें और इस समय का देशहित में सही फायदा उठाये, क्योंकि सच्चाई यह है कि चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे हो जाने के बाद भी नई पीढ़ी को यह पता ही नहीं कि चंपारण सत्याग्रह का स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका रही है? जबकि इतिहासकार और स्वतंत्रता सेनानियों का दल स्वीकार करता है कि गांधी को गांधी बनाने में चंपारण की भूमिका प्रमुख रही। यहीं कारण रहा कि सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रिचर्ड एटनबरो ने भी अपनी फिल्म गांधी में इसका खुबसुरती से चित्रण किया है।
अतः भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अनुरोध है कि वे अपने-अपने स्तर पर देश व राज्य के विभिन्न स्कूलों व कॉलेजों में चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने के अवसर पर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी अवश्य दिखाये, हो सके तो एक बार फिर दूरदर्शन पर इस फिल्म को पुनः दिखाया जाय, साथ ही गांधी के जीवनवृत्त, जिसमें चंपारण सत्याग्रह का विशेष जिक्र हो, इसकी एक लघु पत्रिका बनवाकर, जन-जन तक पहुंचाये जाये, ताकि लोग गांधी और चंपारण सत्याग्रह को आज के परिपेक्ष्य में कम से कम भूल न पायें...
यह समय की मांग भी है, क्योंकि वर्तमान में गांधी को भूलना, चंपारण को भूलना देश और बिहार दोनों के लिए आत्मघाती होगा।
#narendramodi #nitishkumar

Sunday, April 9, 2017

फैमिली की बात होती है............

हमारे यहां फैमिली में औरतें भी होती हैं, जिसे मां, मौसी, दीदी, बुआ, चाची, नानी, दादी आदि कहकर पुकारते हैं और जब फैमिली की बात होती हैं तो निःसंदेह हम फैमिली में रह रहे औरतों के विभिन्न रुप जैसे मां, मौसी, दीदी, बुआ, चाची, नानी, दादी यहां तक की पड़ोस की मां-बहनों की भी बातें करते है, साथ ही उन्हें हम उतनी ही इज्जत देते है, जिस सम्मान को पाकर वे अभिभूत हो जाती है, इसलिए विद्या बालन जी आपका ये संवाद कि फैमिली की बात होती है, बिजनेस की बात होती है, लेकिन औरतों की बात कम होती है, इसका हम कड़े शब्दों में प्रतिवाद करते है। प्राचीन इतिहास को उलटे तो हमारे यहां वेश्याओं को भी उतना ही सम्मान मिलता था, जितना एक सामान्य महिला को। आपने आम्रपाली का नाम जरुर सुना होगा, इस पर फिल्म भी बनी है, जरा देख लीजियेगा। पूर्व में एक फिल्म चित्रलेखा भी बनी थी, जरा देखियेगा। आपको समझ में आयेगा।
एक खास इलाके में अथवा एक परिवार में किसी ने महिला की बात नहीं सुनी, इसका मतलब ये नहीं कि पूरा समाज और देश को आप कटघरे में खड़ा कर दें। आश्चर्य है कि सूचना भवन के सभागार में आपने ये संवाद कहा है और आपका किसी ने प्रतिवाद भी नहीं किया होगा और न इस संबंध में किसी पत्रकार ने आपसे सवाल पूछे होंगे। पत्रकारों का सवाल नहीं पूछना और सूचना भवन में इस प्रकार के संवाद बोल जाना, ये भी बताता है कि आप महिलाओं को यहां कितना सम्मान मिलता है।
कल संयोग ही था रांची से प्रकाशित एक अखबार ने राज्य की कई महिलाओं को एक कार्यक्रम आयोजित कर सम्मानित किया, हालांकि मैं इस प्रकार के कार्यक्रम का कटु आलोचक हूं। सम्मान तो वह है, जैसे सुभाषचंद्र बोस और रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने मोहनदास गांधी को दिया था, जिसका प्रभाव ऐसा हुआ कि पूरी दुनिया गांधी को बापू और महात्मा कहकर संबोधित करती है। अखबार द्वारा या किसी संस्थान द्वारा दिया जानेवाला पीतल अथवा कागज का टूकड़ा सम्मान नहीं होता, बल्कि ये विशुद्ध रुप से व्यापार चलाने का अपने सामान की ब्रांडिंग करने का एक माध्यम है, पर अफसोस कि इसमें वे सारे लोग पहुंचते है, जिनसे समाज को आशाएं है, पर ये झूठी शान और सम्मान पाने के लिए इन कार्यक्रमों में पहुंचते है, तालियां बजवाते है, और फिर निकल लेते है। ये हमारे अपने विचार है, हो सकता है कि ये विचार किसी को अच्छे नहीं लगे।
विद्या बालन जी, आप झारखण्ड में हैं। इसी झारखण्ड में कुछ दिन पहले सरहुल मनाया गया, एक नेता अर्जुन मुंडा ने तो अपने घर में सरहुल मिलन समारोह आयोजित कराया और वहां देखा गया कि स्त्रियों और पुरुषों में कोई विभेद ही नहीं था, सभी एक दुसरे का सम्मान कर रहे हैं, नृत्य कर रहे है, संगीत से स्वयं को प्रकृति के साथ जोड़ रहे है। ऐसी जगह, इस प्रकार की छोटी बात, अच्छी नही लगती। यह बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं कि क्योंकि आपही का एक संवाद है, जो टीवी और रेडियों में खुब देखने और सुनने को मिलता है, जहां सोच वहां शौचालय, यानी सोच बदलिये...
मैं कहूंगा कि आप भी सोच बदल ही डालिये। महेश भट्ट के साथ रहकर महेश भट्ट के विचारों से ओतप्रोत न होकर, आप अपनी विचारों को पोषित करिये। राज्य सरकार का क्या है?  उसे तो कनफूंकवों ने अपने ग्रिप में ले लिया है। रघुवर दास को क्या पता कि महेश भट्ट का संघ और भाजपा के प्रति क्या दृष्टिकोण है? महेश भट्ट तो समय-समय पर भाजपा शासित राज्यों को औकात बताते रहते है, अभी हाल ही में टेलीग्राफ में छपे उस खबर को भी देख लीजिये, बस महेश भट्ट को मौका मिलना चाहिए, भाजपा शासित राज्यों को औकात बताने का, औकात बता देंगे।
हम अच्छी तरह जानते है कि बेगम जान जो फिल्म बनी है, वो देश और समाज को नई दिशा देने के लिए नहीं बनी है, ये बनी है विशुद्ध रुप से व्यवसाय के लिए, ये अलग बात है कि इसका फायदा किसको मिलेगा, पर सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने खुलकर आप पर राज्य सरकार का कोष लूटा दिया है। आपकी फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया, पर इसका फायदा जनता को मिलेगा क्या? जरा पूछिये रघुवर दास से, कि महेन्द्र सिंह धौनी पर बनी फिल्म भी टैक्स फ्री हुई थी, उसका कितना फायदा आम जनता को मिला। मैं तो स्वयं जब उक्त फिल्म देखने गया, तो मुझे उतने ही पैसे चुकाने पड़े, जितने हमेशा चुकाने पड़ते थे। ये है सरकार और उसकी ढपोरशंखी घोषणाओं का ज्वलंत उदाहरण।
एक बात और कल ही मैंने देखा, कि सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में कार्यरत अधिकारियों का दल इस प्रकार आपके साथ सेल्फी लेकर, फेसबुक पर पोस्ट कर रहा था, जैसे उसे लग रहा था कि उसे भगवान से भेंट हो गई हो, इस भाव से भी समझिये कि यहां औरतों की क्या इज्जत है? जरा आइपीआरडी में कार्यरत उन अधिकारियों से पूछिये तो वे यहीं कहेंगे कि उनका जीवन धन्य हो गया, साक्षात विद्या बालन से उनकी भेंट हो गई और परम सुख को प्राप्त किया, जिस सुख को पाने के लिए ईश्वर भी लालायित रहते है,  हांलाकि आजकल हमारे देश में ये जो सेल्फी लेनेवाली कल्चर इधर विकसित हुई है, इस कल्चर ने अधिकारियों-कर्मचारियों और आम जनता के सम्मान को इस प्रकार नष्ट किया है, कि सेल्फी लेनेवाले को पता ही नहीं चल रहा कि वह जो कार्य कर रहा है, उसकी मर्यादा के अनुरुप है भी या नहीं, पर सेल्फी लेना है तो लेना है, इज्जत तो बाजार में बिकता ही है, बाजार से रुपये किलो खरीद लेंगे।
अंततः आपकी फिल्म बेगम जान खुब चले, लोगों को फिल्म पसंद आये, झारखण्ड आगे बढ़े, देश आगे बढ़े, इन्हीं कामनाओं के साथ, सभी को मेरा प्रणाम...

Thursday, March 30, 2017

इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है.........

वह होली मनाता है...
वह दीपावली मनाता है...
वह रक्षाबंधन पर्व मनाता है...
वह दुर्गापूजा, रामनवमी, जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि का पर्व मनाता है...
वह भारत में स्थित तीर्थस्थानों का परिभ्रमण करता है...
वह गौ को पूजता है...
वह नदियों को पूजता है...
वह पहाड़ों को पूजता है...
वह पेड़ों को पूजता है...
इसलिए वह जाहिल है, हिन्दू है...
भारत में रह रहे ऐसे बहुसंख्यक हिन्दु समुदाय को – बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों का दल जाहिल और मूर्ख समझता है, इसलिए हिन्दू विरोधी आलेखों एवं समाचार प्रसारण ही इनका मुख्य केन्द्र बिन्दु बनता जा रहा है। ये लोग अन्य धर्मों में व्याप्त अँधविश्वास एवं रुढ़िवाद को अपने यहां चर्चा का केन्द्र बिन्दू नहीं बनाते। उसका मुख्य कारण है -  भारतीयों और हिन्दूओं को पूरे विश्व के सामने आले दर्जें का मूर्ख और जाहिल बताना... ...साथ ही वे ये भी जानते है कि अगर वे हिन्दूओं को छोड़कर अन्य धर्मों के खिलाफ कुछ लिखेंगे या चलायेंगे तो उनकी दुकान बंद होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी, चूंकि हिन्दू सहिष्णु होते है और हिन्दूओं के अंदर ही एक वर्ग ऐसा भी होता है, जो गाली देने से लेकर स्वयं गाली सुनने में भी आनन्द की प्राप्ति करता है, ये चैनल और अखबारवालों ने ऐसे लोगों के संरक्षण में अपना काम करना शुरु कर दिया है।
इन दिनों जब से भाजपा का देश में प्रादुर्भाव हुआ और विभिन्न राज्यों में भाजपा एक सशक्त दल के रुप में उभरी, तब से लेकर आज तक इनके पेट में दर्द इस प्रकार बढ़ा है कि पागलों की तरह ये अकबका रहे है, नाना प्रकार की झूठी-अतार्किक कार्टूनों-समाचारों-फिल्मों का निर्माण कर एक दूसरे के यहां छापने- दिखाने का दौर इनके यहां चल पड़ा है। आजकल तो ये इतने गुस्से में है कि वे भारतीय मतदाताओं को भी उलटा-सीधा बोल रहे है, उन्हें सांप्रदायिक बता रहे है...
भारतीय मतदाताओं को सांप्रदायिकता की तराजू में तौलनेवाले, पैसा और पद को ही एकमात्र अपना जीवन का अंग समझनेवाले इन मूर्खों का दल फिलहाल भारत के सम्मान के साथ खेल रहा है। ये लोग परिचर्चा का विषय कुछ अलग भी रखेंगे, फिर भी ये ले-देकर हिन्दू-भाजपा पर ही आ खड़ें होंगे। जिससे भारतीय जनता में इनके खिलाफ नाराजगी का बोध साफ दिखाई पड़ रहा है, शायद यहीं कारण है कि इनकी घटियास्तर की मनोवृत्ति से आजिज होकर भारत के मतदाता भी जोर-शोर से भाजपा के पक्ष में खड़े हो रहे हैं...
स्थिति ऐसी है कि अब तो जनता भी इनके खिलाफ लोहा ले रही है, पर बेशर्मों को शर्म नहीं। याद करिये नवरात्र का समय भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अमरीका दौरा। एक पत्रकार राजदीप सरदेसाई, अमेरिका में कैसे भारतीयों के खिलाफ अनाप-शनाप बक रहा था, जिससे गुस्से में आकर वहां के अमेरिकन भारतीय मूल के नागरिकों ने मिलकर उसे उसी समय छट्ठी रात का दूध याद दिला दिया। पत्रकारिता का मतलब या आपके पास अवैध ढंग से पैसे आ गये तो इसका मतलब ये नहीं कि आप भारतीयों को गाली दें, आप उन्हें नीच दिखाये, आप नैतिक मूल्यों को जीवन में प्रतिष्ठित करनेवाले भारत के गर्भ से निकली महाकाव्यों-ग्रंथों को गालियों से सीचें। एक बात जान लीजिये, ऐसे भी अब पहलेवाली बात नहीं रही, कि आप जो बोलेंगे और जनता आपके साथ हो लेगी, जनता आप सब को जवाब दे रही है, पर आप सुधरने का नाम नही ले रहे, वो कहते है न कि रस्सी जल गया पर बल नहीं गया...
आप अपना काम करते रहिये, भारतीयों का दल अपनी गति से चलेगा, भारत अपनी गति से चलेगा... क्योंकि भारतीय जानते है कि उन्हें करना क्या है? आपके विधवा प्रलाप का कोई असर इन भारतीयों पर पड़ने नहीं जा रहा...  अब आप स्वयं आकलन करिये कि जाहिल कौन है? जिन्हें आप जाहिल बता रहे है वे या स्वयं आप, समझे बीबीसी, एनडीटीवी, प्रभात खबर, वामपंथी बुद्धिजीवियों और वामपंथी पत्रकारों, साथ ही यहां धर्मांतरण का खेल कर रही ईसाई मिशनरियों...

Saturday, March 25, 2017

शरद यादव जी, आपकी पार्टी भी कोई दूध की धूली नहीं है...........

23 मार्च 2017
राज्यसभा, नई दिल्ली
जदयू सांसद शरद यादव गरज रहे है...
वे पत्रकारिता जगत में आयी गिरावट, कुरीतियों एवं अखबार-चैनल के मालिकों द्वारा की जा रही गंदी हरकतों और उससे शर्मसार होता लोकतंत्र पर केन्द्र सरकार का ध्यान आकृष्ट करा रहे हैं। विषय गंभीर है, पर राज्यसभा में गिने-चुने सदस्य ही मौजूद है, स्वयं जदयू के कई सांसद राज्यसभा से गायब है। सरकार के नुमाइंदों की संख्या भी कम है। ले-देकर एक केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ही मौजूद है, जो एक तरह से नमूने ही कहे जायेंगे।
जदयू सांसद शरद यादव, बहुत अच्छा बोलते है, इसमें कोई दो मत नहीं, कई बार मैंने उनके लोकसभा और राज्यसभा में वक्तव्यों को सुना है, पर क्या कारण है कि उनकी बात ठीक उसी प्रकार काफूर हो जाती है, जैसे विभिन्न कारखानों के चिमनियों अथवा घरों से निकलनेवाली धुओँ का हवा में विलीन हो जाना।
आखिर जदयू सांसद ने राज्यसभा में क्या कहा, स्वयं देखिये। उन्होंने कहा कि...
• अखबारों - चैनलों के मालिक-प्रबंधक, मजीठिया वेज बोर्ड द्वारा दी गई सुविधाओं से अपने यहां कार्यरत पत्रकारों को वंचित रखते है और अपने यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों को ठेके पर रखते है, जिससे यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों का जीवन प्रभावित हो गया है।
• अखबारों – चैनलों के मालिक-प्रबंधक अपने यहां कार्यरत संवाददाताओं-पत्रकारों को दोयम दर्जे का समझते है और उनके साथ न्याय नहीं करते।
• अखबारों – चैनलों के मालिक-प्रबंधक अपने संवाददाताओं-पत्रकारों से वे कार्य कराते है, जिसकी इजाजत इंसानियत भी नहीं देती, ये लोग पेड न्यूज चलाते है, जिससे लोकतंत्र खतरे में है, वे इसके लिए कई उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं।
• पूरे देश में पूंजीपतियों का बोलबाला हो गया है, जो अखबारों-चैनलों पर कब्जा कर रखे है, और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, इन चैनलों-अखबारों का इस्तेमाल करते है, ये करोड़ों की जमीन, प्रापर्टी इसके माध्यम से खड़े कर रहे है और इसमें सरकार भी इनका सहयोग करती है।
• यहीं नहीं ये अखबारों-चैनलों के मालिक-प्रबंधक-संपादक, पत्रकारिता का धौंस दिखाकर एमपी भी बन जा रहे है, इसलिए सरकार एक कानून बनाये ताकि पत्रकारिता में शामिल कोई भी पूंजीपति या मालिक एमपी न बन सकें या दूसरा उद्योग न खोल सकें।
मेरा मानना है कि...
जो बातें राज्यसभा में सांसद शरद यादव ने उठायी, उसे किसी भी प्रकार से गलत नहीं कहा जा सकता, पर सवाल स्वयं राज्यसभा में इस मुद्दे को उठानेवाले जदयू सांसद शरद यादव से...
आपकी पार्टी ने भी तो वहीं कुकर्म किये है, जिन कुकर्मों को लेकर आपने सदन का, सरकार का ध्यान आकृष्ट कराया...
जैसे...
प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को राज्यसभा में भेजना, क्या जदयू द्वारा प्रभात खबर को अपने ग्रिप में लेने का प्रयास नहीं था... क्या हरिवंश ने प्रधान संपादक की आड़ में नीतीश कुमार का महिमा मंडन अपने अखबार में नहीं किया... क्या आप बता सकते है या आपके पास कोई प्रमाण है कि प्रभात खबर ने आपके नेता नीतीश कुमार के खिलाफ एक भी खबर छापी...
क्या ये सही नहीं कि प्रभात खबर में कार्यरत, जिन लोगों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सुविधा प्राप्त करने के लिए, आंदोलन किया, उनके साथ दोयम दर्जें का व्यवहार किया गया, उनकी हालत बद से बदतर कर दी गयी और आप की पार्टी ने ऐसे लोगों को सम्मानित ही नहीं किया, बल्कि राज्यसभा का सदस्य बनवा दिया। वह आदमी आपके ही साथ, संसद में बैठता है, जरा पूछिये, उससे। क्या वह जवाब दे पायेगा।
उत्तर होगा – नहीं। आप ही के ये सांसद कभी अपनी सुविधानुसार पत्रकार तो कभी सांसद बनकर जनता के सामने उपस्थित होते है... ये दोहरा चरित्र क्या बताता है?
दूसरा उदाहरण कशिश टीवी के मालिक-बिल्डर सुनील चौधरी को जदयू का टिकट दिलवाना और उसे बिहार विधानसभा में भेजकर विधायक बनाने का प्रयास क्या बताता है?
कमाल है, शरद यादव जी, आप वहीं कुकर्म करें, तो आनन्द और दूसरा यहीं कुकर्म करें, तो उसे सदन में अपमानित और उसे गलत कहने की परिपाटी आपने कब से सीख लिया। पहले स्वयं में सुधार लाइये, फिर दूसरे पर अंगूली उठाइये। इससे आपके बात की वजन भी बढ़ेगी और आप हंसी के पात्र भी नहीं बनेंगे।
मैं जानता हूं कि भारत में छपनेवाले अखबार हो, या चलनेवाले चैनल। इसके मालिक और यहां काम करनेवाले, उनके इशारों पर चलनेवाले प्रबंधक या संपादक, सभी पेड न्यूज चलाते है और इसमें सरकार भी सहयोग करती है। ये सारे सभी पत्रकारों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते है, उन्हें ठेके पर रखते है और पत्रकार-संवाददाता भी ठेके पर रहने के लिए, गुलामी सहने के लिए व्याकुल रहते है, वे इसके लिए अपनी लज्जा और शर्म को अपने घर की खूंटी पर टांग कर आते है, क्योंकि उनके भी बच्चे है, बीवियां है, बेचारे उनका भरण-पोषण कैसे करेंगे?  इसी क्रम में वे अपना जमीर बेच देते है, घूंट-घूंट कर मरते है। आजकल तो स्थिति ऐसी हो गयी कि अब ये पत्रकार आत्महत्या भी करने लगे है, पर इन प्रबंधकों-मालिकों को शर्म नहीं आती, उन्हें तो सिर्फ अपने कल-कारखानों की ही चिंता होती है ताकि उनका करोड़ों-अरबों का व्यापार प्रभावित न हो, ये इसकी आड़ में करोड़ों-अरबों की जमीन लूट रहे है और इसमें सरकार भी इनकी मदद करती है...
ऐसे में, ये लोकतंत्र जीवित रहेगा, हमें शक लगता है...
चलिए, शरद यादव जी, आप भी दूध के धूले नहीं है, आपकी भी पार्टी इसी रंग में रंगी है, पर आपने इस मुद्दे को राज्यसभा में उठाया। अच्छा लगा। आप इसी तरह इन महत्वपूर्ण मामलों को उठाते रहिये, एक दिन ऐसा जरुर आयेगा कि कोई सरकार इस मामले पर गंभीरता से विचार करेगी और पत्रकारिता की गंगा की धारा जो गंदगियों के कारण अविरल नहीं बह रही, उसमें धार लाने का प्रयास करेगी...
बहुत-बहुत धन्यवाद।

Friday, January 13, 2017

ये “दंगल” बहुत कुछ कह रहा है..............

ये “दंगल” बहुत कुछ कह रहा है...
कह रहा है – अब अच्छी फिल्मों के दौर फिर से शुरु होंगे। “नदिया के पार”, “हम आपके है कौन” के बाद जो रिक्तिता आ गयी थी, वो अब खत्म होनेवाला है। हमारे देश में एक प्रकार का दौर चलता है। कोई फिल्म जो सुपरहिट होती है, उसके सुपर हिट होने के बाद, ठीक उसी प्रकार की फिल्म बननी शुरु हो जाती है, अगर ऐसा होता है तो देशहित व समाजहित में एक प्रकार से क्रांति संभव है। बहुत दिनों के बाद “दंगल” फिल्म देखने को मिली, जिसे देखने के लिए पूरा समाज विभिन्न मल्टीप्लेक्सों व छविगृहों के चक्कर लगा रहा है। फिल्म टैक्स फ्री नहीं है, फिर भी इसे देखनेवालों की भीड़ खूब यहां दिखाई पड़ रही है। हाल ही में क्रिकेटर धौनी को केन्द्र में रखकर एक और फिल्म बनी थी – “धौनी – ए अनटोल्डस स्टोरी” और अब एक और फिल्म जल्द ही देखने को मिलेगी जो सचिन तेंदुलकर के जीवन पर आधारित है। फिल्म का नाम है - “ए बिलियन ड्रीम्स”। सचमुच अगर ऐसी फिल्म बननी शुरु हुई तो समाज पर उसका असर पड़ना तय है, क्योंकि फिल्मों का हमारे जीवन पर असर खूब पड़ता है... और अब हम बात कर रहे है, फिल्म “दंगल” की। आखिर “दंगल” में क्या है? कुछ दिन पूर्व सायं समय जयपुर की वरिष्ठ पत्रकार मोनालिसा ने मेरे मोबाइल पर फोन किया। सर, आपकी बहुत याद आ रही है। मैंने पूछा – क्यों? तब उसने कहा कि सर मैंने अभी फिल्म दंगल देखी है। उस फिल्म में जैसे एक पिता ने अपनी दोनों बेटियों को बेहतर बनाने के लिए दुनिया से लड़ाइयां लड़ी, ठीक उसी प्रकार आप हमें बेहतर बनाने के लिए लोगों से लड़ जाया करते। मोनालिसा का ये कहना था कि मैंने सोचा कि मुझे यह फिल्म देखनी चाहिए, तभी मेरे बेटे सुधांशु ने नई दिल्ली से मेरे और अपनी मां के लिए ऑनलाइन टिकट बुक कर दी और मैं एक जनवरी को ग्लिट्ज में पिक्चर देखने के लिए पहुंचा। पूरी फिल्म देखने के बाद, हमारे मुख से वाह निकल गयी। क्या नहीं था – इस फिल्म में। इस फिल्म ने बताया है कि एक पिता को अपने सपनों को पूरा करने के लिए किस प्रकार की योजना बनानी चाहिए।
इस फिल्म ने बताया कि ईश्वर सबको मौका देता है, बस उस मौके को लाखों में कोई एक ही पहचान पाता है। इस फिल्म ने बताया है कि मिथक तोड़िये कि जो काम बेटे कर सकते है, वे बेटियां नहीं कर सकती। इस फिल्म ने बताया है कि एक बेहतरीन फिल्मों से भी अच्छी कमाई की जा सकती है। बशर्ते कि बेहतरीन फिल्म, समाज को सुदृढ़ करने, सशक्त करने, संदेश देने के लिए बनाये जाये। इस फिल्म ने बताया है कि राष्ट्रभक्ति क्या है? याद करिये, फिल्म समाप्त हो रहा है, फिल्म अभिनेता आमिर खान कमरे में बंद है, राष्ट्रीय धुन बज रहा है, कानों तक वह धुन पहुंची है, बड़ी शान से खड़ा होकर वे राष्ट्रीय धुन को सम्मान दे रहे है, और उन्हीं के साथ फिल्म देख रहे, सारे लोग उनके साथ खड़े हो जाते है, यहां सारी जातियां व धर्म दोनों समान रूप से राष्ट्रीय धुन के सम्मान में खड़े हो रहे है...
अगर फिल्में ऐसी बनेंगी तो देश बनेगा, समाज बनेगा... खुशी इस बात की है, अब ऐसी फिल्मों के बनने का दौर शुरु हो रहा है। जल्द ही सचिन की “ए बिलियन ड्रीम्स” आयेगी। लोग देखने जायेंगे। चरित्र और संस्कार का सुंदर समन्वय इन फिल्मों में देखने को मिलेगा। अपना देश मजबूत होगा... और क्या चाहिए हमें। आमिर खान और उनकी पूरी टीम, जिन्होंने “दंगल” बनायी, उनकी प्रशंसा होनी चाहिए। इस फिल्म के माध्यम से एक संदेश उन फिल्म निर्माताओं को भी मिला है, जो ये कहते है कि अब अच्छी फिल्में लोग देखना नहीं चाहते है। उनके लिए एक ही जवाब – गर फिल्म अच्छा बनाओगे तो लोग देखेंगे... उसका प्रचार आम जनता स्वयं करेगी... जरा देखो, आमिर खान ने अपनी बहुत सारी फिल्मों को खूब प्रचार – प्रसार किया है, पर “दंगल” का प्रचार तो आम जनता ने खुद ही शुरु कर दिया, जो भी देख रहा है, वो अपने लोगों को कह रहा है कि आप “दंगल” देखिये और अपनी बेटियों से प्यार करिये, साथ ही एक बेहतर पिता भी बनिये, ठीक “दंगल” वाले आमिर खान जैसा...

Tuesday, December 13, 2016

नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार...

जी हां, नोटबंदी से पत्रकारिता जगत में हाहाकार है। संपादक से लेकर पत्रकारिता जगत में चपरासी तक कार्य करनेवालों का जीना मुहाल हो गया है। अपने आकाओं, राजनीतिज्ञों, आइएएस, आइपीएस, थानेदारों, सरकारी जन वितरण प्रणाली दुकानों से कमीशन लेनेवालों के घर में कमीशन के पैसे नहीं पहुंच रहे है। जिसके कारण इनके चेहरों से लाली समाप्त हो गयी, चूंकि डायरेक्ट प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपने अखबारों के माध्यम से ये गाली नहीं दे सकते, इसलिए इन्होंने इनडायरेक्ट माध्यम को चूना है। वे अपने विशेष पृष्ठों पर ऐसे-ऐसे लोगों को दिखा रहे है, जिनका इस नोटबंदी से कोई लेना – देना नहीं और न ही उनके कारोबार पर कोई असर ही पड़ रहा है, क्योंकि मैं भी भारत के रांची में ही रहता हूं और कोई टाटा-बिड़ला या अडानी-अंबानी के परिवार का सदस्य नहीं हूं, जैसे सामान्य लोग जीते है, उसी तरह मैं भी जीता हूं। मेन रोड स्थित फुटपाथ की दुकान हो या अपर बाजार की कपड़े की दुकान या पंडितजी से पतरा दिखाना हो, या नाई से बाल ही क्यूं न कटवाना हो, या जूता-पालिस ही क्यूं न कराना हो। एक वाक्य में कहें तो जूता सिलाई से लेकर चंडी पाठ तक इसी मेन रोड में होता है, कहीं हाहाकार नहीं हैं, लेकिन कुछ लोगों यानी पत्रकारों को पेट में भयंकर दर्द हो रहा है कि भाई नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी करके उनके पेट पर लात मारा है, क्योंकि कमीशन बंद हो चुकी है, जो इन्हें कमीशन देते थे, रुपयों में, जब उनकी सिट्ठी-पिट्ठी गुम हो गयी है, तो बेचारे को प्रतिदिन का पांच सौ और एक हजरियां कौन देगा...
जब इनके विशेष पृष्ठों से नरेन्द्र मोदी को गरियाने का काम समाप्त हो जाता है, तो वे फेसबुक का सहारा लेते हैं, और जी-भरकर नरेन्द्र मोदी को गरियाते है, तरह-तरह के नरेन्द्र पाठ करते है। एक सज्जन जो एनजीओ भी चलाते है, कभी संपादक भी रहा करते थे, वे नरेन्द्र मोदी को गरियाते – गरियाते अलीबाबा और चालीस चोर की कहानी सुनाने लगते है। एक तो अखबार नहीं आंदोलन – पंचायती वाले बाबा दांत निपोरते हुए फोटो प्रोफाइल रखे हुए है, वे तो सुबह उठते और रात में सोने के पहले जब तक फेसबुक पर नरेन्द्र मोदी को गरिया नहीं ले, उनका खाना ही नहीं पचता। इसी अखबार में युवा पत्रकारों की भी टोली है, जो नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी अभियान को समर्थन करनेवालों को भक्त कहकर गरियाते है, जबकि वे स्वयं चिरकुटानंद के सहोदर भाई है।
हम भी अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से अनुरोध करेंगे कि इन कमीशन खानेवाले पत्रकारों और उन्हें गरियानेवाले इन पत्रकाररूपी बहुरूपियों पर वे थोड़ी कृपा करें, ताकि उनका कमीशन का धंधा बेरोकटोक चलता रहे, लेकिन फिर बात यहीं आती है कि नरेन्द्र मोदी रहे धाकड़ बैट्समैन हमें नहीं लगता कि उन्होंने जो नोटबंदी का शतक बनाने का जो बीड़ा उठाया है, उससे वे पीछे हटेंगे।
इसलिए कमीशन खानेवाले पत्रकारों और एनजीओ चलानेवाले महानुभावों से सादर अनुरोध है कि वे फिलहाल बाजार और आम जनता की ऐसी छवि प्रस्तुत न करें, बल्कि अपना चेहरा जो कमीशन के नहीं मिलने कारण बर्बाद होता दीख रहा है, उसे दिखाने की कोशिश करें, ताकि लोगों को पता चलें कि इस कमीशन के धंधे में कितने संपादक और कितने पत्रकार अब तक मालामाल हो गये...

Saturday, December 10, 2016

“लेकिन जो पापी न हो वो, पहला पत्थर मारे”

हमें हंसी आती है, जब चोर और डाकू ये कहें कि चोरी करना बहुत बुरी बात है, डकैती करने से देश और समाज का नुकसान होता है...
हमें हंसी आती है, जब चरित्रहीन लोग, सभी से आह्वान करते है कि सभी को चरित्रवान होना चाहिए...
ये मैं इसलिए लिख रहा हूं कि आजकल पत्रकारिता की आड़ में, स्वयं को समाज में गलत ढंग से प्रतिष्ठित करनेवाले और जनता की पैसों से ऐश करनेवाले आज देश को आह्वान कर रहे है कि सूचना के अधिकार के दायरे में लाया जाये राजनीतिक दलों को...
मैं कहता हूं कि ऐसा आह्वान करनेवाले पहले स्वयं चरित्रवान बनकर, स्वयं को प्रतिष्ठित करें और उसके बाद ऐसा आह्वान करें तो उसका असर भी दिखेगा, नहीं तो वे जनता को जो मूर्ख समझने की कोशिश कर रहे है, वे भूल कर रहे है... हां इस प्रकार के आयोजन कर खुद को तसल्ली देने और बड़ा बनने का ऐहसास कराने का ढोंग करना हो तो चल सकता है...
आजकल मैं देख रहा हूं कि कुछ लोग एनजीओ खोलकर, अपनी चालाकी को महिमामंडित करने की कोशिश कर रहे है...
यानी सेमिनार-संगोष्ठियों के नाम पर होटल बुक करो-कराओ, एनजीओ के नाम पर फंडिग करो, अखबार और चैनल में न्यूज छपवाओ और प्रसारित करवाओ और जिनको कोई काम नहीं है, उनको ऐसे कामों से जोड़कर बतकुचन और झलकुटन कराओ...
और लो काम हो गया...
अरे कौन नहीं जानता कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा की कृपा पाकर कौन व्यक्ति सूचना आयुक्त बना...
अरे कौन नहीं जानता कि पूर्व मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की कृपा पाकर आज कौन व्यक्ति सूचना आयुक्त बना है...
अरे कौन नहीं जानता कि पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के शासन काल में कौन उनका सलाहकार सूचना आयुक्त बनने जा रहा था, जिसकी बैंड प्रभात खबर के तत्कालीन प्रधान संपादक एवं वर्तमान मे जदयू के वरिष्ठ नेता और सांसद हरिवंश ने बहुत अच्छी तरह बजा दी थी, हालांकि सांसद हरिवंश महोदय ने भी अखबारों में खुब चरित्र की बातें कर, बाद में नीतीश भक्ति में ऐसे लीन हुए कि नीतीश भक्ति में लीन होने के कारण, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें प्रसाद के रूप में राज्यसभा का सीट प्रदान किया...
कमाल है, खूब दिये जा रहे है, राजनीतिक दलों पर अंगूलियां उठा रहे है...
अरे सबसे पहले स्वयं सुधरो तब दूसरे को सुधारो...
वो फिल्म “रोटी” के गाने का वो अंतरा नहीं सुना क्या...
“पहले अपना मन साफ करो रे, फिर औरों का इंसाफ करो”
“लेकिन जो पापी न हो वो, पहला पत्थर मारे”

Friday, December 2, 2016

पत्रकारिता की आड़ में इज्जत लूटना गर सीखना हो, तो कोई इनसे सीखें..........

आजकल हमारे समाज में, ये फैशन और प्रचलन हो गया है कि...
अगर कोई पुलिस है, तो उसे गुंडा मान लिया जाता है...
ये मान लिया जाता है कि वो गलती करें या न करें पर उसकी गलती जरूर होगी...
अगर पत्रकारों को पुलिस से संबंधित एक मामूली सी भी गलती मिल गयी तो लीजिये, ये देखिये उस खबर को कैसे मसालेदार बनाकर अखबारों में स्थान देते है...
पर यह भी ध्यान रखे...
ये आइपीएस अथवा वरीय पुलिसकर्मियों जिनकी धाक कुछ ज्यादा ही चलती है, जो रोबीले है, उनके खिलाफ लिखने या छापने में सबकी नानी और दादी एक साथ याद आती है, पर एक सामान्य पुलिसकर्मी, जिसकी गलती नहीं भी हो तो उससे संबंधित खबर को उसके खिलाफ कैसे समाचार पत्रों में स्थान मिलती है? उसकी एक बानगी है कल रांची के डोरंडा के एजी मोड़ पर घटी घटना, जिसको रांची से प्रकाशित सभी प्रमुख अखबारों ने प्रथम पृष्ठ और अंदर की पृष्ठों में स्थान देकर राई का पहाड़ बना दिया और एएसआई दिनेश ठाकुर की इज्जत का कबाड़ा बना दिया।
घटना क्या है?
तो घटना भी जान लीजिये...
रांची के एजी मोड़ पर तैनात ट्रैफिक एएसआई दिनेश ठाकुर ने बिना हेलमेट पहने वासुदेव को पकड़ा और 100 रुपये का चालान काटा। फिर क्या था? वासुदेव घर गया, अपनी पत्नी पम्मी को इस बात की जानकारी दी, पम्मी अपने साथ 30-40 लोगों का हुजूम लेकर आयी और चप्पल से एएसआई दिनेश ठाकुर की पिटाई कर दी। आश्चर्य इस बात कि भी वहां एएसआई अनिल कुमार टोप्पो, हवलदार अशोक राणा और आरक्षी उमेश उरांव मौजूद है, किसी ने भी एएसआई दिनेश ठाकुर के सम्मान की रक्षा करने की कोशिश नहीं की, बल्कि इस घटना को वहां खड़ा होकर देखते रहे...
यहीं घटना आज रांची के कई अखबारों की सुर्खियां बन गयी...खूब तेल-मसाला लगाकर सभी अखबारों ने इस समाचार को प्रमुखता से छापा है और एएसआई दिनेश ठाकुर की इज्जत की धज्जियां उड़ा दी...
और अब इसी प्रकार का सवाल प्रभात खबर, हिन्दुस्तान और दैनिक भास्कर अखबारों से कल इसी प्रकार की घटना, उन्हीं के यहां काम करनेवाले पत्रकारों के साथ घट जाये तो क्या इसी प्रकार से वे समाचार छापेंगे...
दूसरी बात...
क्या ये सत्य नहीं कि आज भी इन अखबारों में काम करनेवाले ज्यादातर लोग कानून की धज्जियां उड़ाकर, वह भी दादागिरी के साथ बिना हेलमेट के दुपहिये वाहन चलाते है और पुलिस इनकी इस दादागिरी को नजरंदाज कर देती है, नहीं तो इनके ज्यादातर पत्रकारों के दुपहिये वाहन पुलिस थाना की शोभा बढ़ा रहे होते...
तीसरी बात...
एएसआई दिनेश ठाकुर कि सिर्फ यहीं गलती है न, कि उसने बिना हेलमेट के वाहन चला रहे वासुदेव की चालान काट दी, क्या चालान काटना अपराध है?
जब वह वासुदेव का चालान काटा था, तब उसकी पत्नी तो वहां नहीं थी, वासुदेव का घर जाकर पत्नी और अपने 30-40 लोगों को बुलाकर घटनास्थल पर लाना, ये क्या बताता है?
खुद को अखबार नहीं आंदोलन बतानेवाला अखबार प्रभात खबर तो एएसआई दिनेश ठाकुर की इज्जत लूटने में सभी अखबारों से आगे निकल गया, उसने तो दिनेश ठाकुर पर छेड़खानी करने का आरोप लगा दिया, जबकि किसी अन्य अखबार ने ऐसी बातें नहीं लिखी है...सच्चाई क्या है? ये जांच का विषय है।
कल की घटना और आज अखबारों में छपी समाचार से तो यही पता चलता है कि अब शायद ही कोई पुलिसकर्मी, किसी बिना हेलमेट के वाहन चलानेवाले का चालान काटेगा, क्योंकि फिर कोई बिना हेलमेट के वाहन चलानेवाला, चालान कटने के बाद, अपनी पत्नी के साथ हुजूम लायेगा, और चालान काटनेवाले पुलिसकर्मी को अपनी पत्नी से पिटवायेगा और प्रभात खबर के रिपोर्टर को जो बोलेगा, वो रिपोर्टर छापेगा और लीजिये उक्त पुलिसकर्मी की इज्जत की दही हो गयी...
एक ओर मुख्यमंत्री रघुवर दास राज्य में बिना हेलमेट के दुपहियेवाहन चलाने पर प्रतिबंध लगाना चाह रहे है, वे विशेष अभियान चलाने की बात करते है, और लोगों की जान की हिफाजत करना चाह रहे है, पर यहां के लोग क्या कर रहे है? यहां की मीडिया क्या कर रही है? आपके सामने है...
क्या ऐसे में हेलमेट अभियान सफल हो पायेगा...
क्या मीडिया की जिम्मेवारी नहीं बनती...
क्या बात का बतंगड़ बनाना और किसी की इज्जत से खेलना ही पत्रकारिता है...
गर ऐसा है तो मीडिया स्वयं अपनी इज्जत का दही क्यों नहीं बनाती? क्योंकि सर्वाधिक ट्रेफिक कानून की धज्जियां तो ये मीडियावाले ही उड़ाते है...
पता नहीं, यहां के पुलिसकर्मियों को ये दिव्य ज्ञान कब आयेगा?
मैं तो कहता हूं कि जिस दिन राज्य के पुलिसकर्मी मीडियाकर्मियों की सुध लेना शुरु कर दें, उस दिन से किसी की हिम्मत नहीं कि कोई मीडिया हाउस ये कनीय पुलिसकर्मियों की इज्जत से खेल लें...
और एक बात...
ये पत्रकारिता नहीं...
ये सिर्फ और सिर्फ गुंडागर्दी है...

Monday, November 7, 2016

अल कर, बल कर, छठ पर आर्टिकल, लिख चल..........

अल कर,
बल कर,
छठ पर आर्टिकल, लिख चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर, अलबल बोल चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर रिपोर्टिंग कर चल,
टीवी पर अनाप-शनाप बक चल...
पिछले एक सप्ताह से हमारे आंख-कान दोनों पक गये...
अखबारों और टीवी चैनलों तथा गुगुल पुराणों ने छठ महापर्व की धज्जियां उड़ा दी है...
जितने अखबार, उतनी बुद्धि, जितने टीवी उतनी बक-बक
और सभी ने अपने ज्ञान से छठ की ऐसी-तैसी कर दी...
जिनको छठ के बारे में एबीसीडी नहीं मालूम
वे महाज्ञानी और महापंडित बनकर उपदेश देते नजर आये
और
जो छठ के सर्वज्ञानी है, वे अपने कमरों में बंद होकर पागलों जैसा बुदबुदाते नजर आये...
मैं पिछले एक सप्ताह से देख रहा हूं कि अखबारों और टीवी चैनलों में नये- नये चिरकुटानन्दों की फौज ने धमाल मचा रखा है...
बंदरों जैसी हरकते, गधों जैसी सोच रखे, रिपोर्टरों और अखबार व चैनल के संपादकों ने छठव्रतियों और उनके परिवारों का कीमा बना दिया है...
सच पूछिये, अगर जो नये ढंग से छठ से जुड़ना चाहते है, तो उनके लिए इन महाचिरकुटानंदों ने हर प्रकार के कुसंग से छठ का नाता जोड़ दिया है...
जबकि पूर्व में ऐसा नहीं था...
बच्चे अपनी मां और दादी से छठ की आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को जान लेते...
कल की ही बात है...
एक अखबार और उसके बाद चैनल पर हमारी नजर गयी...
जनाब एक सज्जन, छठि मइया को भगवान भास्कर का पत्नी बता दिये...
एक ने बहन बना दिया
और एक ने क्या कह दिया, उसे खुद पता नहीं...
यहीं नहीं
आजकल वामपंथियों की एक नई फौज जो धर्म को अफीम मानती है, वह भी छठ में साम्यवाद ढुंढती नजर आयी, उन वामपंथियों को छठ के ठेकुएं और केले में कैसे साम्यवाद नजर आ गया, हमारी समझ से परे है...
चोरी से, चीटिंग से मैट्रिक, इंटर, बीए, एमए कर किसी तरह से प्रोफेसर और रीडर बने लंपटों का समूह भी छठ पर आर्टिकल लिख रहा था और उसे अखबार वाले इस कदर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे थे, जैसे लग रहा हो, कि वह महाज्ञानी हो...पर जो लोग छठ के बारे में विस्तृत जानकारी रखते है, उन्हें ये पता लगते देर नहीं लगी कि ये ढोंगी प्रोफेसर चोरी से डिग्री लेकर यहां तक पहुंचा है, जो सारी दुनियां को भरमा रहा है, और इसके माध्यम से संपादकों का समूह अपनी उल्लू सीधी कर रहा है...
यहीं हाल सारे चैनलों के रिपोर्टरों का था...
चूंकि छठ के बारे में नॉलेज तो है नहीं तो बस घिसी पिटी सवाल से फिल्मों में काम करनेवाले असरानी, जगदीप, राजेंद्रनाथ और धूमल जैसे हास्य कलाकारों का रोल अदा कर रहे थे और यहीं हाल टीवी के एंकरों का था...
इन सारी हरकतों को देख, हमें ये जानते देर नहीं लगी कि आनेवाला समय महामूर्खों चिरकूटानंदों का है...यानी जो जितना मूर्ख वो उतना ज्ञानी...जितना अल बल लिखो, उतना बड़ा साहित्यकार और पत्रकार...
पर इसके परे,
एक परिवार को भी देखा...
बुढ़ी माता...छठ कर रही थी...
उनके संग, बहुत सारी औरते थीं, जो बुढ़ी माता को सहयोग कर रही थी...
बच्चे बुढ़ी माता को आजी कहकर पुकार रहे थे...
तभी मैं रह नहीं पाया...
पूछ डाला कि आजी आप अखबार पढ़ती है, टीवी देखती है...
आजी ने कहा – ए बचवा, आग लागे अइसन पढ़ाई के

आउर आग लागे अइसन टीवी दिखाई के
अरे जब भावे नइखे, तो पूजा करके का होई...
हमरा कोई सीखवले बा...
अरे हम अपना घर में बुढ़ परनिया के देखनी और सीख गइनी...
इ तो अखबरवन और टीवीवालन सब बर्बाद करके धर देले बारन सब...
हम तो सोचतानी कि अइसने चलत रही...
त आगे चलके
भीड़ त दीखी पर छठि मइया ना दिखाई दीहे...

Sunday, October 23, 2016

प्रभात खबर के लिए बाबू लाल हीरो और रघुवर खलनायक........

रांची से प्रकाशित अखबार प्रभात खबर ने आज बाबू लाल मरांडी को हीरो और रघुवर को विलेन बनाकर जनता के सामने पेश किया है। इसका मूल कारण प्रभात खबर के प्रधान संपादक रह चुके हरिवंश है, जो फिलहाल जनता दल यू से राज्यसभा सांसद है, हालांकि कहनेवाले ये भी कहते है कि हरिवंश प्रभात खबर छोड़ चुके है, पर हमारे पास पुख्ता प्रमाण है कि वे प्रभात खबर छोड़े नहीं है, आज भी वे प्रभात खबर को कस कर पकड़े हुए है। चूंकि नीतीश कुमार ने झारखण्ड मामले में अपनी नीति स्पष्ट कर दी है कि बाबू लाल मरांडी झारखण्ड के नायक है, वे ही उनकी ओर से झारखण्ड के मुख्यमंत्री उम्मीदवार है। तभी से हरिवंश ने उनकी राह आसान बनाने के लिए कमर कस ली है और जब भी मौका मिलता है, वे बाबू लाल के प्रति वफादार बन कर पत्रकारिता को अपने इशारों पर नचा रहे है। जैसे कल ही की बात को ले लीजिये। रांची में कल आदिवासी आक्रोश रैली थी। इस रैली में 42 आदिवासी संगठनों के लोग थे, पर प्रभात खबर ने इस पूरे प्रकरण का हीरो बाबू लाल मरांडी को बना दिया, जबकि उस रैली में कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू, गीताश्री उरांव, झामुमो के पौलुस सुरीन और अन्य नेता भी मंच पर मौजूद थे। यहीं नहीं अपने अखबार में प्रथम पृष्ठ पर इस प्रकार की हेडिंग दे दी कि अगर सामान्य व्यक्ति उस समाचार को पढ़े तो पता लग जायेगा कि यहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास सचमुच में खलनायक है, जबकि सच्चाई कुछ और ही है।
प्रभात खबर के अनुसार, कल की रैली को रोकने के लिए राज्य सरकार ने कमर कस लिया था, और इसी क्रम में खूंटी में फायरिंग हुई और एक व्यक्ति की मौत हो गयी, जबकि सच्चाई कुछ और ही है। इस सच्चाई को जानने के लिए आपको दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आजाद सिपाही, राष्ट्रीय सागर तथा अन्य अखबारों का रूख करना पड़ेगा।
दैनिक भास्कर ने अपने प्रथम पृष्ठ पर फोटो देते हुए हेडलाइन्स दिया – रांची में रैली, खूंटी में नाकेबंदी से आक्रोश। एएसपी-थानेदार को ढाई घंटे रस्से से बांधकर पीटा, फिर पुलिस फायरिंग में किसान की मौत, लेकिन प्रभात खबर ने इसी घटना को पृष्ठ संख्या 11 पर लिखा – खूंटी में प्रशासन ने एक हजार ग्रामीणों को रोका और पुलिस के साथ होनेवाली हादसे और सेंदरे की बात अपनी ओर से छुपा ली, साथ ही इस घटना को सामान्य दिखाते हुए पुलिस के मुख से लिखवाया, जैसे लगता है कि वहां कोई ऐसी घटना घटी ही नहीं। जबकि सच्चाई यह है कि अगर पुलिस आत्मरक्षार्थ गोली नहीं चलाती तो आज कितने पुलिसकर्मियों के घरों में लाशों के ढेर नजर आते क्योंकि इस रैली में नक्सलियों ने अपनी भूमिका तय कर रखी थी। इस घटना को दैनिक जागरण ने प्रथम पृष्ठ पर हेडिंग्स देते हुए लिखा – खूंटी में उग्र भीड़ पर फायरिंग, एक मरा, पुलिस ने आत्मरक्षार्थ चलाई गोलियां, 8 ग्रामीण घायल और इस हेडिंग्स के माध्यम से दैनिक जागरण ने पत्रकारिता धर्म की रक्षा की, साथ ही आक्रोश रैली को भी प्रमुखता से उठाया, जो उठाना भी चाहिए।
चूंकि हिन्दुस्तान अखबार ने तो परसो से ही ताल ठोक दिया था कि उसे आदिवासी आक्रोश रैली को बेहतर ढंग से पेश करना है और रघुवर दास की सरकार को कील ठोकना है, तो उसने अपने उक्त निर्णयों पर आगे बढ़ते हुए, आज भी वहीं किया। इसलिए हिन्दुस्तान अखबार पर क्या कहना।
अब अपनी बात – ये जो अखबार वाले है न। कोई धर्म या समाज हित में पत्रकारिता के लिए अपना दुकान नहीं खोले है। प्रभात खबर का मालिक प्रभात खबर की आड़ में कहा-कहां माइन्स चला रहा है, क्या किसी को नहीं मालूम। हिन्दुस्तान अखबार के लोग अर्जुन मुंडा के शासन काल में कहा पर गोल्डमाइन्स लिये थे। हमको नहीं मालूम है क्या? यानी ये अखबार वाले अपना धंधा चलाने के लिए आदिवासियों की जमीन लूटे तो सही और दूसरा कोई लूटे तो गलत। अरे गलत है तो सब गलत है, एक गलत और दूसरा सहीं...और दूसरा गलत तो पहला सही कैसे भाई। सच्चाई यह है कि यहां झारखण्ड का हर नेता और हर पत्रकार अपने – अपने ढंग से राज्य की जनता को बरगला रहा है, और भोली-भाली जनता इनके बहकावे में आ रही है। नेताओं और पत्रकारों को तो कुछ नहीं होता, पर जनता हर प्रकार से मारी जाती है। अखबार के मालिकों और संपादकों को क्या है? वे तो पेड न्यूज की आड़ में अपनी गोटी सेंक चुके होते है और उनके प्यादे यानी रिपोर्टर्स उनके इशारे पर वो न्यूज बनाते है, जो उनके आकाओं को पसंद आती है। आज का अखबार देखने से तो यहीं लगता है।
... और अब एक सलाह राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास को, आप कृपा कर किसी भी अखबार के कार्यक्रम में जाये, तो प्लीज ये न कहें कि पत्रकारिता हो तो फंलाने अखबार जैसी। हमारे पास प्रमाण है एक अखबार बार-बार आपका वक्तव्य छापता है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास ने प्रभात खबर की प्रशंसा की। हमें हंसी आती है, जो अखबार हमारे परमवीर चक्र विजेता अलबर्ट एक्का के परिवार के साथ धोखा करता है। अमर शहीद की मिट्टी पर राजनीति करता है, उसे आप कैसे कह सकते है कि बहुत ही अच्छा है। प्लीज माफ करें। झारखण्ड की जनता के साथ इँसाफ करें। ये अखबारवाले किसी के नहीं है, न तो देश के और न ही देश के जवानों के। ये तो वीर जवानों के शहीदों का भी व्यवसायीकरण कर देते है। शर्मनाक...

Wednesday, October 19, 2016

प्रभात खबर यानी हम नहीं सुधरेंगे.........

नीतीश भक्ति में सराबोर और जदयू के मुख पत्र के नाम से जनता में लोकप्रिय हो चुका प्रभात खबर सुधरने का नाम नहीं ले रहा, इसने एक बार फिर हम नहीं सुधरेंगे की पंक्ति को सर माथे बिठा, वो सारी हरकतें कर डाला है, जिससे यहां की नई पीढ़ी पूर्णतः बर्बाद हो जाये अथवा सर्वदा के लिए कन्फ्यूज्ड होकर अपनी जिंदगी बिताएं...
जरा एक बार फिर आज का रांची से प्रकाशित प्रभात खबर का पृष्ठ संख्या 3 का पहला कॉलम में प्रकाशित आज का पंचाग देखिये। जिसमें उसने लिखा है कि आज तृतीया तिथि है, जो रात्रि के 3.09 मिनट तक है, उसके बाद चतुर्थी तिथि है। मैं पूछता हूं कि जब आज तृतीया तिथि है, तो लोग आज करवा चौथ कैसे मना रहे है, ये प्रभात खबर बताये। कमाल है इसी में आगे पढ़िये तो प्रभात खबर के अनुसार आज बुधवार नहीं, बल्कि मंगलवार है और सबसे नीचे पर्व त्यौहार की पंक्ति पढ़े तो उसने लिख डाला है कि आज कोई व्रत-त्यौहार नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि आज चतुर्थी तिथि है, जो रात्रि के 12.48 तक है, दिन बुधवार है और आज महिलाओं के लिए बहुत ही खास पर्व है – करवा चौथ है।
मेरा स्पष्ट मानना है कि जब आपको पंचाग के बारे में जानकारी ही नहीं, तो तुम पंचाग क्यों छापते हो? इसकी आवश्यकता ही क्या है? अगर तुम्हें जानकारी नहीं तो फिर क्या इस आधार पर गलत छापोगे और सबको कन्फ्यूज्ड करते रहोगे। यह कहकर कि हमें कुछ भी बेवजह छापने का अधिकार है और सभी को कन्फ्यूज्ड और उनके पर्व-त्यौहारों में मानसिक खलल डालने का अधिकार है। हम आपको बता दें कि ऐसी हरकत प्रभात खबर पहली बार नहीं किया, ये ऐसी हरकते बार-बार करता है, और सुधरने का नाम नहीं ले रहा।
मेरा इस आलेख लिखने का अभिप्राय यह है कि आम जनता जान लें कि अखबार में लिखी सारी बातें सच्ची नहीं होती, ज्यादातर झूठ के पुलिंदे होते है, जो मूर्खों के द्वारा लिखित व प्रकाशित होते है, इसलिए जनता इनकी बातों में न आये और अपने विवेकानुसार पंचाग को देखे, समझे, तब व्रत व त्यौहार का निर्णय लें, नहीं तो आप समझ लें कि इन्होंने आपको धोखे देने का मन सदा के लिए बना लिया है, और ये बराबर धोखे देते रहेंगे, ये कहकर कि हम अखबार नहीं आंदोलन है.......

Tuesday, September 27, 2016

कमाल है........................

रांची में नकली शक्तिवर्द्धक दवा के करोड़ों के कारोबार से संबंधित समाचार आजकल अखबारों में सुर्खियां बटोर रहे है। प्रतिदिन समाचार आ रहे है कि रांची के चुटिया, लालपुर, सुखदेवनगर आदि इलाकों में औषधि नियंत्रण निदेशालय की ओर से इन दवाओं के कारोबार में लिप्त लोगों पर शिकंजा कसा जा रहा है, इनके खिलाफ छापेमारी भी की जा रही है। छापेमारी के दौरान बड़ी मात्रा में औषधि निर्माण के उपकरण, एलोपैथिक दवाएं, इंप्टी हार्ड जेनेटिक कैप्सूल सेल, लिंग वर्द्धक यंत्र, स्तन वर्द्धक यंत्र आदि बरामद हो रहे है। इस धंधे में लिप्त छह लोगों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज करायी गयी है। औषधि निदेशालय इस धंधे में सलिप्त किसी अलख देव सिंह की तलाशी कर रहा है, पर औषधि निदेशालय उन अखबारों पर शिकंजा नहीं कस रहा, जो इस धंधे को संजीवनी दे रहे है, या इससे सीधा मुनाफा उठा रहे है। हाल ही में जब औषधि निदेशालय ने इन कारोबारियों पर जब अपना शिकंजा कसना शुरू किया तो एक दिव्य ज्ञान प्रदान करनेवाले एक अखबार ने लिखा कि इस धंधे में पोस्टआफिस के लोग शामिल है, पर उसने यह नहीं लिखा कि इस धंधे में अखबार के लोग भी शामिल है, जो विज्ञापन के नाम पर इन कारोबारियों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाते है और स्वयं भी लाभान्वित होते है, साथ ही सामान्य जनता को दिग्भ्रमित भी करते है।
सच्चाई यह है कि ये सारे के सारे कारोबारी बिना अखबार को अपने तरफ मिलाए इतने बड़े कारोबार को अंजाम नहीं दे सकते। इसमें अखबार की सबसे बड़ी भूमिका होती है, वे इन कारोबारियों द्वारा मिले विज्ञापन को जमकर छापते है, रांची में कमोबेश सभी बड़े अखबार इस धंधे में लिप्त है और इसके द्वारा अपनी आर्थिक समृद्धि में लगे है। आज भी देख लीजिये – कौन ऐसा अखबार है जो इस धंधे में लिप्त नहीं है। एक अखबार तो अपना वर्गीकृत इसी धंधे को समर्पित कर दिया है। अगर उसके वर्गीकृत विज्ञापन को देखिये तो पता लग जायेगा कि इस धंधे में उसका जोर भी नहीं है, पर बेशर्मी इतनी कि उसे बेशर्म शब्द की परिभाषा से कोई लेना – देना भी नहीं।
आश्चर्य है कि इस धंधे में कौन-कौन लोग है, सभी को पता है, पर क्या मजाल कि इन अखबारों पर कोई भौं भी टेढ़ा कर दें, क्योंकि जैसे ही इन अखबारों पर शिकंजा कसेगा, सत्ता और विपक्ष में बैठे एवं छपास की बीमारी से पीड़ित नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और सम्मान के लालचियों का समूह इन अखबारों के पक्ष में बयानबाजी शुरू करेगा और नकली डायलॉग बोलेगा कि यहां अखबारों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है, लोकतंत्र खतरे में पड़ गया आदि-आदि। यानी कुल मिलाकर, जो इस धंधे में लिप्त है, उनके उपर शनि की वक्र दृष्टि और जो इस धंधेबाजों से अपनी आर्थिक समृद्धि कर रहे है उनके उपर शुक्र की महादृष्टि मजे लीजिये और क्या?

Monday, September 26, 2016

प्रभात खबर दूसरों के लिए अखबार नहीं आंदोलन और जब अपने पर आये तो.............

प्रभात खबर दूसरों के लिए अखबार नहीं आंदोलन और जब अपने पर आये तो आंदोलन घूस गया भीतरअअअअअअअ....................
कल यानी 25 सितम्बर को रांची से प्रकाशित सभी प्रमुख अखबारों (प्रभात खबर को छोड़कर) ने एक खबर प्रमुखता से प्रकाशित किया। खबर था ऊषा मार्टिन के कार्यालयों पर सीबीआइ छापा, पर प्रभात खबर में ये खबर ढूंढने पर कहीं नहीं मिली। आखिर क्यों नहीं मिली भाई, आप तो अखबार नहीं आंदोलन हो। आप तो खोजी पत्रकारिता के मिसाल हो, यह खबर आपकी नजरों से कैसे फिसल गयी। आप तो रिम्स के चंद्रमणि की झूठी खबरों के आधार पर, उसका जीना मुहाल कर देते हो। पूरे राज्य को बदनाम कर देते हो और जब अपने पर आयी तो उलटे पांव दौड़ते हुए अपने घरों में छुप जाते हो। तुम्हें तो जवाब देना ही होगा, जनता को, क्योंकि कई मुद्दों पर तुम खुब फोन मंगवाते हो, पत्र मंगवाते हो, इ-मेल से पाठकों के मंतव्य मंगवाते हो, पर सीबीआइ के छापे पर मौन व्रत तुमने क्यों धारण कर लिया।
दोस्तों मैं बताता हूं कि इस अखबार ने मौन व्रत क्यों धारण कर लिया। वह इसलिए धारण कर लिया क्योंकि यह अखबार ऊषा मार्टिंन का ही है, चूंकि अपनी इज्जत बची रहे, इसलिए उसने इस समाचार को अपने पृष्ठों पर जगह ही नहीं दी, पर खबर आपको मालूम होना चाहिए।
खबर यह है कि 24 सितम्बर को ऊषा मार्टिन के दो दफ्तरों पर सीबीआइ की दिल्ली स्थित आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा की टीम ने छापा मारा। सूत्र बताते है कि यह छापा उस पर अपने प्लांट के लिए आवंटित आयरन ओर का इस्तेमाल स्वयं न कर बाजार मूल्य पर बेचने के आरोप के मद्देनजर पड़ा है। सीबीआइ ने शनिवार को ऊषा मार्टिन के बड़ाजामदा और कोलकाता स्थित दफ्तरों पर छापा मार कर दस्तावेजों की जांच भी की। हम आपको बता दें कि ऊषा मार्टिन को एमएमडीआर एक्ट के तहत बड़ाजामदा लौह अयस्क खदान कैप्टिव प्लांट के लिए आवंटित किया गया था। कैप्टिव प्लांट के लिए आवंटित माइंस की शर्त यह है कि वह केवल अपने प्लांट के लिए ही अयस्क का प्रयोग कर सकता है, लेकिन इस कंपनी ने अन्य कंपनियों को बाजार मूल्य पर लौह अयस्क मुहैया कराया। इस मामले में जस्टिस शाह की अध्यक्षता में गठित कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में पश्चिम सिंहभूम में हो रहे अवैध खनन का मामला उठाया था। शाह कमीशन ने स्थल जांच कर रिपोर्ट दी थी कि सभी आयरन ओर कंपनियां मानकों का उल्लंघन कर सीमा क्षेत्र से अधिक उत्खनन कर रही है।
मतलब समझ गये न भैया – ये है अखबार नहीं आंदोलन का दोहरा मापदंड..........................