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Friday, July 16, 2010

घर का जोगी जोगरा, बाहर का जोगी सिद्ध।

चपन में पढ़ा था, आज महसूस कर रहा हूं। बिहार में एक लोकोक्ति खूब चलती हैं। घर का जोगी जोगरा, बाहर का जोगी सिद्ध। आप भले ही काबिल हो, आप में किसी संस्थान अथवा समाज को नयी दिशा देने की ताकत हो, पर गर आप घर में हैं, तो प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी, ये अलग बात हैं कि बाहर जाकर आप अपना लोहा मनवा लें और फिर जब अपने प्रांत में पांव रखें तो ये ही जो आपको नापसंद करते थे, आपकी चापलूसी और चरणवंदना में सबसे आगे रहेंगे। हमें बड़ी खूशी होती हैं कि जब बिहार में कुछ नया होता हैं, चाहे वो राजनीति की विसात हो, अथवा सामाजिक सांस्कृतिक की बात। एक साल पहले किसी ने हमसे कहा कि एक बिहार का ही व्यक्ति पटना से एक चैनल ला रहा हैं, बड़ी खुशी हुई चलो अच्छी बात हैं एक नयी शुरुआत हो रही हैं, बिहार मीडिया के क्षेत्र में नया कदम बढ़ा रहा हैं, पर जैसे ही पता चला कि वहां महत्वपूर्ण पद पर एक बिहार के बाहर के व्यक्ति को बैठा दिया गया, हमें समझते देर नहीं लगी कि यहां वहीं कहावत चरितार्थ होने जा रहा हैं, घर का जोगी जोगरा बाहर को जोगी सिद्ध. और अब तो ये सोलह आने सच होता जा रहा हैं. जनाब बिहार के बारे में बिहार के लोग बेहतर जानेंगे या अन्य प्रदेश के लोग। बिहार की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व धरोहरों को बिहार के लोग बेहतर जान सकते हैं या अन्य प्रदेश के लोग। जाहिर सी बात हैं – बिहार के बारे में यहीं के लोग बेहतर जान सकते हैं, न कि दूसरे जगहों के। मैंने देखा हैं कि कैसे दक्षिण के हैदराबाद से संचालित एक चैनल ने बिहार से संबंधित चैनल खोलनी चाही तो उसने बिहार के ही एक व्यक्ति और इलेक्ट्रानिक मीडिया में महारत हासिल व्यक्ति गुंजन सिन्हा को उसकी प्रमुख जिम्मेदारी सौंप दी, नतीजा सामने आया, जब तक गुंजन सिन्हा उस चैनल में रहे, चैनल बिहार और झारखंड में एक नबंर पर रहा। आखिर क्या वजह रही कि दक्षिण से संचालित चैनल बिहार व झारखंड में समाचारों के लिए हर बिहारियों की जगह में दिल बना लिया। स्पष्ट हैं कि उस व्यक्ति ने बिहार की परंपरा और संस्कृति को जीवंत बनाने के लिए वो चीजें लाकर खड़ा कर दी, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। आज भी उस चैनल के बिहार गौरव गाथा जब उक्त चैनल पर चलती हैं तो हर बिहारी शान से कह उठता हैं -------
ये हैं मेरा बिहार, ये हैं मेरा बिहार
आखिर ये छोटी सी बात, हम बिहारियों को क्यूं समझ में नहीं आती, हम अपने लोगों को अपने ही घरों में इज्जत क्यों नहीं देते, आखिर कब तक हम अपनी ही घरों में गैरों को शान से बैठाकर अपनी ही छाती पर मूंग दलवायेंगे और अपनो को कहेंगे, कि आपका काम हो गया, बाहर का रास्ता देखे। क्या लोगों को फिल्म जुदाई का वो गाना याद नहीं कि
अपनो को जो ठुकरायेगा, गैरो की ठोकरे खायेगा।
एक पल की गलतफहमी के लिए, सारा जीवन पछतायेगा।
क्या कर्मफल का सिद्धात अथवा न्यूटन का तीसरा सिद्धांत भी लोगों को नहीं मालूम कि क्रिया तथा प्रतिक्रिया बराबर और विपरीत दिशा में होती हैं। क्या विद्यापति के गीत लोगों को नहीं मालूम, क्या उनके ये भाव भी लोगों को नहीं मालूम जो कहता हैं कि --------
देसी बयना सब जन मिट्ठा
गर ये सब नहीं मालूम तो जान लीजिए, रामचरितमानस की वो पंक्ति जो लंकाकांड से उद्धृत हैं वो एक न एक दिन सत्य होगा -------
याको फलु पावहिगो आगे। बानर भालु चपेटन्हि लागे।।
रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।।