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Friday, April 22, 2016

चैत्र-वैशाखयोः वसन्तः

संस्कृत साहित्य में एक उक्ति है - चैत्र - वैशाखयोः वसन्तः। फिल्म पुकार में सुप्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन ने स्वयं गाया है - तू मैके मत जइयो, मत जइयो मेरी जान....मार्च - अप्रैल में बहार कुछ ऐसे झूम के आये...देख तेरा मलमल का कुर्ता जी मेरा ललचाये...मैके मत जइयो...
अब आप बताइये किसी ने सोचा होगा कि वसन्त में ग्रीष्म का एहसास हो...
किसी ने सोचा होगा कि बहार के मौसम में जब खाने बैठे तो पंखे से निकली हवा आपकी रोटी को ही ऐसा सूखा दें कि आप खा ही न पायें...
भला अभी तो चैत्र खत्म होने जा रहा है...वैशाख आनेवाला है...यानी भारतीय हिन्दी मासों के अनुसार अभी गर्मी आने में एक माह शेष है...पर गर्मी का धमाल जारी है...
वसन्त तो इस बार लोगों ने देखा ही नहीं...
वसन्त में हाहाकार है...कहीं पानी की, तो कही गर्मी से निजात पाने की...
ऐसी हाहाकार में हमें नहीं लगता कि किसी कवि ने इस माह में यह कहकर वसंत को दुलारा होगा कि...
हवा हूं हवा में बसंती हवा हूं
सूनो बात मेरी अनोखी हवा हूं
फिलहाल इस वसंत के महीने में सभी के प्राण पखेरु जवाब दे रहे हैं...मनुष्य तो मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी परेशान हैं...धरती अपने गर्भ में जल को सहेजने के चक्कर में इतनी दूर जल को ले गयी...कि मनुष्य का ये गुमान ही फेल हो गया कि हमारे यहां कुआं हैं, जो सूखती ही नहीं...
सब फेल...
कवि की कविता फेल...
सरकार की नीतियां फेल...
नक्षत्र फेल...
राशि फेल...
बादल तेरी सूरत फेल...
पानी के भंडार भी फेल...
बहारों के मौसम भी फेल...
जीवन के वसंत भी फेल...
सब फेल, सब फेल...
फेल होती इस जिंदगी में...
अब कोयल कह जाती है...
मैं क्या बोलूं मीठी राग में...
कंठ सूख अब जाती हैं...
ऐसा वसंत कभी न देखा...
चैत्र-वैशाख महीने में...
सूख गये ताल-तलैया जल्दी,
मानव के कुकर्मों से...
आओ चेते, बाग लगाएं...
ताल -तलैया रचते जाएं...
पृथ्वी को हरित करें और
जल संरक्षण को कदम बढ़ाएं...