Thursday, July 22, 2010

नेता, मीडिया व हमारा बिहार

ऐसे तो देश के ज्यादातर नेताओं का चरित्र एक जैसा ही होता हैं। वे अपने लिए हर विकल्पों की तलाश कर लेते हैं, और जब इन पर सामूहिक तौर पर संकट आता हैं, तो वे उससे बचने के लिए एक होकर, एकता के सूत्र में बंध जाते हैं। जब इनकी चर्चा नहीं होती, तो ये तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं कि वे सूर्खियों में रहे, और इसके लिए सदन की गरिमा तक को ताक पर रख देते हैं। इसके लिए किसी एक पार्टी को दोष देना मूर्खता को सिद्ध करने के बराबर हैं, क्योंकि देश में कोई ऐसी पार्टी नहीं जो कह सकें कि वो सिद्धांत और जनसरोकार से संबंधित राजनीति कर रही हैं। हम यहां एक एक कर यथासंभव सभी राष्ट्रीय पार्टियों की चल रही राजनीति पर चर्चा करेंगे।
सर्वप्रथम – वामपंथी पार्टियों को ले लें. सांप्रदायिकता का विरोध करनेवाली पार्टी मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी जिसकी सरकार बंगाल में पच्चीस वर्षों से चल रही हैं, यहां जब कुछ मुट्ठीभर अल्पसंख्यकों ने तसलीमा नसरीन के खिलाफ सड़कों पर उतरने की कोशिश की, तब इसी पार्टी ने अल्पसंख्यकों के वोट बिदक जाने के भय से तसलीमा नसरीन को बंगाल से निर्वासित कर दिया, और जब सरस्वती, लक्ष्मी और हमारे देवी-देवताओं को नग्न चित्र मकबूल फिदा हुसैन ने बनाये तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मकबूल फिदा हुसैन के साथ ये सभी हो लिये। ये हैं वामपंथियों को चरित्र।
कांग्रेस के क्या कहने, सरकार बचाने के लिए हाल ही मे मनमोहन सिंह और उनकी मंडली ने क्या किया, पूरा देश देखा, जब सदन में नोटों की बंडल दिखाई पड़ी, जिसका विजूयल एक राष्ट्रीय चैनल के पास था, पर उसने पत्रकारिता धर्म का निर्वहन न कर किस धर्म का निर्वहण किया, ये वो खुद जाने, पर जैसे ही, आरोप प्रत्यारोप का दौर चला, उक्त राष्ट्रीय चैनल ने वे सारे दृश्य दिखाये पर तब तक देर हो चुका था, कांग्रेस अपना काम कर चुकी थी।
यहीं कांग्रेस नरसिंहराव के शासन में झामुमो के सांसदों को कैसे सरकार बचाने के लिए क्या सौदा की थी, उसके बारे में भी सारा देश जानता हैं।
हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा में जब समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने हिन्दी में शपथ लेनी चाही तब वहां महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विधायकों ने जिस प्रकार उक्त विधायक के साथ दुर्व्यवहार किया और इस मामले में मनसे के विधायकों का सदन से निलंबन हुआ, फिर उनकी निलंबन समाप्त कर दी गयी, इसमें कैसे मनसे और कांग्रेस के लोगों ने गुपचुप समझौते किये, इसके बारे में भी यहां की जनता जानती हैं।
इसलिए यहां के राजनीतिक दलों से मर्यादा, चरित्र और आदर्श की परिकल्पना संजोना, मूर्खता से कम नहीं हैं. ये सदन में मर्यादा, चरित्र और आदर्शवाद की स्थापना करने नहीं जाते, ये जाते हैं, सिर्फ और सिर्फ हठधर्मिता को स्थापित करने की, इस हठधर्मिता में देश व प्रांत का सम्मान चला जाये, उनकी बला से, उन्हें सम्मान से क्या मतलब।
झारखंड विधानसभा जहां के विधायक पूरे देश में सर्वाधिक वेतन उठाते हैं, उन्होंने हाल ही में बजट सत्र के दौरान अपना वेतन बढाने के लिए सरकार से इसी बजट सत्र में प्रस्ताव लाने की बात कहीं, इस मुद्दे को सदन में सभी विधायकों के सौजन्य (भाकपामाले छोड़) से राजद विधायक सुरेश पासवान ने उठाया ये अलग बात है कि सुरेश पासवान की आवाज पर सदन नें तत्काल मुहर नहीं लगायी और अब देश की लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों के वेतन पांच गुणा बढे, इसकी चर्चा जोरों पर हैं।
ऐसे तो अब पूरे देश के विभिन्न विधानसभाओं में मेजे पलटने, माइक तोड़ने, विधेयक की प्रतियां फाड़ने, राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान, राज्यपाल के उपर ही कागज के पन्ने फाड़ कर फेंकने की बात आम बात हो गयी हैं। अपने ही विधायक मित्रों के बांह मरोड़ने, उन पर गंदी गंदी छीटाकशीं करने, जान से मार देने की धमकी अब आम बात हो गयी हैं तथा पूरे विधानसभा को युद्धभूमि बना देने के दृश्य आम बात हो गये हैं, और इससे अब शायद ही कोई विधानसभा बचा रह गया हैं, हालांकि इसका प्रभाव अब लोकसभा पर भी पड़ने लगा हैं।
उत्तरप्रदेश, झारखंड, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार में ये दृश्य आम हो गये हैं, पर हमारे जनप्रतिनिधियों को शर्म नहीं। शर्म आयेगी कैसे शर्म तो एक गहना हैं, जिसे पहनकर ही शर्म आ सकती हैं, जब शर्म का गहना किसी ने पहना ही नहीं तो उसे शर्म कैसा। जरा देखिये, बिहार की -------------
20 जूलाई को विपक्षी दलों ने बिहार विधानसभा में मेजे पलट दी, कुर्सियां तोड़ दी, हाथापाई की, मारपीट की, और ठीक 21 जूलाई को विधानसभाध्यक्ष के उपर चप्पल फेंक दी, एक महिला विधायक तो इतनी आक्रोशित थी कि अपना गुस्सा वो गमले पर उतार रही थी, जो विधायक इस प्रकार की हरकतें कर रहे थे, क्या बता सकते हैं कि उनके इलाके की जनता उन्हें इसी प्रकार के आचरण करने के लिए विधानसभा भेजती हैं क्या। या किसके इशारे पर वे ऐसी हरकतें कर रहे थे। आश्चर्य इस बात की भी, जिन पार्टियों के विधायक ऐसी गंदी हरकते कर रहे थे, उन पार्टियों के नेता टीवी पर बयान दे रहे थे, कि उन्होंने अथवा उनकी पार्टियों के नेताओं व विधायकों ने ऐसा कुछ नहीं किया, जब कुछ नहीं किया तो क्या टीवी में उनके डूप्लीकेट काम कर रहे थे क्या।
इस घटना के बाद एक बात और सामने आयी हैं कि ऐसी हरकते विधायक इसलिए करते हैं कि वे टीवी के माध्यम से सभी जगह छा जाये, उनकी चर्चा हो, हो सकता हैं इसमें कुछ सच्चाई भी हो, क्योंकि जब से इलेक्ट्रानिक मीडिया ने अपनी जगह मजबूत बनायी हैं, ऐसी हरकते ज्यादा देखने को मिल रही हैं, क्योंकि इलेक्ट्रानिक मीडिया उन खबरों को नहीं दिखाती, जिससे जनसरोकार हो, वो तो ऐसी ही चीजे ढूंढती हैं, जिससे कुछ दिनों तक माहौल गरमाया रहे, लोग मीडिया से चिपके रहे, और बाकी सारी महत्वपूर्ण मुद्दे गौण हो जाये। इसके एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। सभी को मीडिया के अंदर छा जाने का एक फैशन चल पड़ा हैं विधायकों में मर्यादित आचरण कर नहीं, बल्कि अमर्यादित आचरण कर शोभा पाने की इच्छा बलवती होती जा रही हैं। जो शर्मनाक हैं।
कमाल हैं, भले ही जिन बातों को लेकर विपक्ष गर्म था, उसे शांतिपूर्वक बातों से सदन में ही, अपना विरोध वे दर्ज करा सकते थे, पर एक दूसरे को बाहुबल से देख लेने की क्षमता, ये कहां से आ रही हैं, इन विधायकों में। मुझे समझ में नहीं आ रहा। हमें लगता हैं कि शायद जनता जान रही हैं क्योंकि पांच साल पूरे होने को हैं, क्या सत्तापक्ष और विपक्ष सभी जनता की नजरों में नंगे हो चुके हैं, सभी अपने अपने चेहरे को चमकाने में लगे हैं, एक को नरेन्द्र मोदी के संग फोटो छप जाने पर अपना चेहरा गंदा नजर आने लगता हैं और वो अपना चेहरा चमकाने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ आग – बबूला होता हैं, और वो इसके लिए गुजरात की जनता की ओर से मिली हुई बाढ़पीड़ितों की सहयोग राशि लौटा देने से भी गुरेज नहीं करता, तो दूसरी ओर विपक्ष देखता हैं कि भाई उसे तो अपना चेहरा चमकाने का मौका ही नहीं मिला, इसलिए महालेखाकार की रिपोर्ट का ही आश्रय लेता हैं, कहता है कि घोटाला हुआ हैं और लगे हाथों विधानसभा की मर्यादा का चीरहरण करता हैं, आश्चर्य इस बात की हैं कि इस चीरहरण में मीडिया भी अपना हाथ सेंक रहा होता हैं, और ताली ठोकने से परहेज तक नहीं करता।
अंत में एक और बात ---
जिस दिन भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक हो रही थी, भाजपा के बड़े नेता जनता को संबोधित कर रहे थे, मैंने नौ बजे की रात, एक प्रादेशिक चैनल का प्राईम टाईम खोला कि देखूं कि आज का क्या – क्या महत्वपूर्ण समाचार हैं, मैने देखा कि आधे घंटे की बूलेटिन में नीतीश कुमार का भाषण ही बीस मिनट तक चलता रहा, जब मैंने उक्त चैनल के डेस्क पर बैठे लोगों से बातचीत की कि भाई आज के प्राईम न्यूज में केवल नीतीश ही दिखाई पड़ेंगे क्या, उनका कहना था कि भाई पेड न्यूज हैं, यानी न्यूज फारमेट में विज्ञापन चल रहा हैं, तो कम से कम इस नौ बजे के न्यूज में ज्यादा समय नीतीश ही दीखेंगे, और समाचारों के लिए आगे की बुलेटिन देखिये।
जरा सोचिये, जहां सभी चरित्र, संस्कार और आदर्श की श्रद्धांजलि दे दिये हो, वहां इस प्रकार की हरकतें होगी ही, तो फिर बिहार में ऐसा हुआ, फलां जैसा वहां हुआ, इस प्रकार का विधवा प्रलाप मीडिया क्यूं कर रहा हैं, इसके लिए तो सभी दोषी हैं, इस हमाम में सभी नंगे हैं, बस डूबकी लगाने भर की देर हैं।

Friday, July 16, 2010

घर का जोगी जोगरा, बाहर का जोगी सिद्ध।

चपन में पढ़ा था, आज महसूस कर रहा हूं। बिहार में एक लोकोक्ति खूब चलती हैं। घर का जोगी जोगरा, बाहर का जोगी सिद्ध। आप भले ही काबिल हो, आप में किसी संस्थान अथवा समाज को नयी दिशा देने की ताकत हो, पर गर आप घर में हैं, तो प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी, ये अलग बात हैं कि बाहर जाकर आप अपना लोहा मनवा लें और फिर जब अपने प्रांत में पांव रखें तो ये ही जो आपको नापसंद करते थे, आपकी चापलूसी और चरणवंदना में सबसे आगे रहेंगे। हमें बड़ी खूशी होती हैं कि जब बिहार में कुछ नया होता हैं, चाहे वो राजनीति की विसात हो, अथवा सामाजिक सांस्कृतिक की बात। एक साल पहले किसी ने हमसे कहा कि एक बिहार का ही व्यक्ति पटना से एक चैनल ला रहा हैं, बड़ी खुशी हुई चलो अच्छी बात हैं एक नयी शुरुआत हो रही हैं, बिहार मीडिया के क्षेत्र में नया कदम बढ़ा रहा हैं, पर जैसे ही पता चला कि वहां महत्वपूर्ण पद पर एक बिहार के बाहर के व्यक्ति को बैठा दिया गया, हमें समझते देर नहीं लगी कि यहां वहीं कहावत चरितार्थ होने जा रहा हैं, घर का जोगी जोगरा बाहर को जोगी सिद्ध. और अब तो ये सोलह आने सच होता जा रहा हैं. जनाब बिहार के बारे में बिहार के लोग बेहतर जानेंगे या अन्य प्रदेश के लोग। बिहार की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व धरोहरों को बिहार के लोग बेहतर जान सकते हैं या अन्य प्रदेश के लोग। जाहिर सी बात हैं – बिहार के बारे में यहीं के लोग बेहतर जान सकते हैं, न कि दूसरे जगहों के। मैंने देखा हैं कि कैसे दक्षिण के हैदराबाद से संचालित एक चैनल ने बिहार से संबंधित चैनल खोलनी चाही तो उसने बिहार के ही एक व्यक्ति और इलेक्ट्रानिक मीडिया में महारत हासिल व्यक्ति गुंजन सिन्हा को उसकी प्रमुख जिम्मेदारी सौंप दी, नतीजा सामने आया, जब तक गुंजन सिन्हा उस चैनल में रहे, चैनल बिहार और झारखंड में एक नबंर पर रहा। आखिर क्या वजह रही कि दक्षिण से संचालित चैनल बिहार व झारखंड में समाचारों के लिए हर बिहारियों की जगह में दिल बना लिया। स्पष्ट हैं कि उस व्यक्ति ने बिहार की परंपरा और संस्कृति को जीवंत बनाने के लिए वो चीजें लाकर खड़ा कर दी, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। आज भी उस चैनल के बिहार गौरव गाथा जब उक्त चैनल पर चलती हैं तो हर बिहारी शान से कह उठता हैं -------
ये हैं मेरा बिहार, ये हैं मेरा बिहार
आखिर ये छोटी सी बात, हम बिहारियों को क्यूं समझ में नहीं आती, हम अपने लोगों को अपने ही घरों में इज्जत क्यों नहीं देते, आखिर कब तक हम अपनी ही घरों में गैरों को शान से बैठाकर अपनी ही छाती पर मूंग दलवायेंगे और अपनो को कहेंगे, कि आपका काम हो गया, बाहर का रास्ता देखे। क्या लोगों को फिल्म जुदाई का वो गाना याद नहीं कि
अपनो को जो ठुकरायेगा, गैरो की ठोकरे खायेगा।
एक पल की गलतफहमी के लिए, सारा जीवन पछतायेगा।
क्या कर्मफल का सिद्धात अथवा न्यूटन का तीसरा सिद्धांत भी लोगों को नहीं मालूम कि क्रिया तथा प्रतिक्रिया बराबर और विपरीत दिशा में होती हैं। क्या विद्यापति के गीत लोगों को नहीं मालूम, क्या उनके ये भाव भी लोगों को नहीं मालूम जो कहता हैं कि --------
देसी बयना सब जन मिट्ठा
गर ये सब नहीं मालूम तो जान लीजिए, रामचरितमानस की वो पंक्ति जो लंकाकांड से उद्धृत हैं वो एक न एक दिन सत्य होगा -------
याको फलु पावहिगो आगे। बानर भालु चपेटन्हि लागे।।
रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।।

Saturday, July 10, 2010

अथ भड़ास कथा...


भड़ास किसकी, भड़ास की आवश्यकता क्यों, भड़ास की आड़ में कौन अपनी उल्लू सीधे कर रहा है, क्या इस प्रकार की भडास से वे पत्रकार लाभावन्वित हो रहे है जो पत्रकारिता में मर्यादा स्थापित करने का काम कर रहे है या इस भड़ास से वे चालबाज़ पत्रकार अपने सपने को साकार कर रहे है जो नहीं चाहते की देश व समाज में वैल्यू वाली पत्रकारिता स्थापित हो. इन दिनों पत्रकारों में गर कोई पोर्टल ज्यादा लोकप्रिय है तो वो है www.bhadas4media.com पर एक सच्चाई ये भी है की इसमें सत्य का बड़ी ही बेदर्दी से खून हो रहा है, जो बता रहा है की वैल्यू वाली पत्रकारिता के लिए खासकर इसमें कोई स्थान नहीं. ये साबित करने के लिए हमारे पास कई प्रमाण है, पर यहाँ तीन प्रमाणों से ही मै सब कुछ कह देना चाहता हूँ.
. आज मैंने इसी पोर्टल में पढ़ा की, "संपादक से परेशान तीन पत्रकारों ने प्रभात खबर छोड़ा". सच्चाई क्या है इसी पोर्टल में सुशील झा ने स्वयम कमेंट्स देकर बता दिया और पोर्टल पर समाचार लिखनेवालो की धज्जियाँ उडा दी. साथ ही ख़ुशी की बात हमारे लिए ये है की प्रभात खबर के पटना संपादक स्वयं प्रकाश जी और यही कार्यरत सुशील झा को मै बहुत अच्छी तरह जानता हूँ. ये दोनों भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणाश्रोत है, इनसे गड़बड़ियों की आशा करना, बेमानी है. क्योकि ये दोनों विशुद्ध रूप से पत्रकार है और धनलोलुपता एवम मर्यादाविहीन इनमे से कोई नहीं है.
ख. इसी में रांची से एक सूचना थी की "ब्राह्मण संपादक ने क्षत्रिय पत्रकारों को भगाए". मै तो जानता था की पत्रकार, सिर्फ पत्रकार होता है वो ब्राह्मण, क्षत्रिय और दलित कैसे होता जा रहा है, हमारी समझ के बाहर है. यानी आप अपने ढंग से किसी को ब्राह्मण और क्षत्रिय अथवा दलित कह कर अपमानित करते रहे. यानि गर उसने इमानदारी से कभी पत्रकारिता की भी होगी तो क्षण भर में उसे जाति में तौल कर उसे नीचे गिरा दिया. खैर आपकी मर्जी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मानमर्दन करते रहिये.
ग. ---1 जुलाई को इसी पोर्टल में एक समाचार आया की "मौर्य टीवी से 6 महीने में 8 गए". पहली बात की इसमें संख्या ही गलत थी, जानेवालो की संख्या 8 से भी ज्यादा थी. जो समाचार लिखे है वो गर मुझसे संपर्क करते तो हम बताते.
दूसरी बात जब आप लिखते है की उन्हें हटाया गया, तो हटाये जानेवाले का पक्ष भी इमानदारी से देना चाहिए. गर आप उसका पक्ष नहीं देते तो ये भी साफ़ है की आप किसकी आरती उतार रहे है.
तीसरी बात जब आपने कमेंट्स मंगाई, और लोगों ने कमेंट्स खुलकर दिए, तो उन 13 कमेंट्स को 3 जुलाई को किसके कहने पर उडा दिया. आखिर जो कमेंट्स उस पर अच्छा हो या बुरा जा रहा है, तो उससे किसको तकलीफ हो रही थी. जनाबे आली को बताना चाहिए. इसका मतलब है कि भडास4मीडिया. कॉम या तो यूज कर रहा है या यूज हो रहा है.
एक तकलीफ इस पोर्टल से मुझे कुछ ज्यादा ही होती है, वो ये की ये पोर्टल होती तो मीडियावालो के लिए पर आलेखों और कमेंट्स में जो छद्म नामों से एक - दुसरे नापसंदों के लिए जो अपशब्दों के प्रयोग होते है, वो बताते है की हम कितने शालीन और एक-दुसरे को इज्ज़त करनेवाले है. जरूरत है स्वयम को सुधारने की, जब आप सुधरेंगे, धीरे धीरे लोग आपका अनुसरण करेंगे, नहीं तो क्या होगा, शायद आप कबीर की पंक्ति भूल रहे है ------------------
बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मीलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय
।।

Monday, July 5, 2010

और महंगाई डायन खाय जात है...

"अभी अभी टीवी पर न्यूज़ देखने के दौरान एक गाना सुनने को मिला ----------------------संभवत: ये नई फिल्म का गाना है,
बोल है -------------
"सखी सैयां तो खूब ही कमात है,
और महंगाई डायन खाय जात है।"
इस गाने को सुनने के बाद मुझे मनोज कुमार कि वो फिल्म याद आ गयी ---- रोटी कपडा और मकान. जिसमे एक गाना महंगाई को लेकर था. गीत इतना प्रभावित करनेवाला था कि आज भी वो गीत सम सामयिक ही लगता है, पर उसका एक अन्तरा आज भी हमें झकझोड़ता है,
जिसके बोल है -----------
"हाय महंगाई, महंगाई महंगाई,
तू कहा से आयी,
तेरी मौत न आयी,
हाय महंगाई...................."
आज ५ जुलाई को भारत के इक्के दुक्के पार्टियों को छोड़ सम्पूर्ण विपक्ष ने महंगाई के खिलाफ भारत बंद बुलाया है, और इस भारत बंद को आप माने अथवा न माने जनता का समर्थन प्राप्त है, गर जनता का समर्थन न मिला होता तो भारत बंद का इतना व्यापक असर नहीं पड़ता. रही बात इस बंद का केंद्र सरकार पर असर पड़ता है या नहीं, ये अलग बात है, पर जनता ने अपनी राय जता दी है कि वो क्या चाहती है. पर इसके उलट एक- दो राष्ट्रीय चैनलों ने और कुछ पत्रकारों ने, इस जनसरोकार के मुद्दे पर भी, केंद्र व युपीए सरकार के पक्ष में समाचार दिखाते नज़र आये और इस जनसरोकार के मुद्दे पर आयोजित बंद को ही कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया. इन चैनलों को महंगाई से तड़पते लोगो के विजुअल नहीं दिखाई पड़ते, दिखाई क्या पड़ती है तो ऐसी खबरे जो इस महंगाई के नाम को ही गौण कर दे. और उन्होंने बड़े ही बेशर्मी से उन समाचारों को प्रमुखता दे दी जो महंगाई के खिलाफ बंद के सवाल पर प्रश्न चिन्ह लगा दे. खैर ये लाखों करोडो में खेलनेवाले चैनल और उनके पत्रकार क्या जाने कि चावल दाल और दो जून की रोटी कमाने में भारत की ७० प्रतिशत आबादी कैसे घुट घुट कर जीती है. मैंने तो महंगाई का प्रभाव देखा है आज भी झारखण्ड के उन गलियों और कस्बों में जाकर रिपोर्टिंग की है जहा लोगो से आज भी रोटी बहुत दूर है, पर उन्हें और उनके पत्रकारों को महंगाई का दंश नहीं दिखाई पड़ता. ईश्वर से प्रार्थना है की उन चैनलों को और उनके पत्रकारों को वो सदबुद्धि दे, ताकि महंगाई और भूख जैसे मुद्दे पर वे कम से कम पत्रकारिता धर्म का पालन कर सके. क्योकि मात्र दो सालों में महंगाई ने सुरसा की तरह ऐसा मुख खोला है की वो मुख बंद होने का नाम नहीं ले रहा है. जिसका प्रभाव ये है की इस महंगाई रूपी सुरसा अथवा डायन ने भारत की गरीब जनता को लीलने को तैयार है. सरकार और नेताओं को क्या है, वे अपने लिए सारी तैयारी कर ही लेते है, जैसे इस बार वे अपना पांच गुना वेतन बढ़ाने जा रहे है, ऐसे चैनलो और उनके पत्रकारों को भी नेताओं और सरकारों से मधुर सम्बन्ध होते है और समय समय पर ये इस कारण से उपकृत भी होते है, पर आप बताये कि भारत की गरीब जनता अपना वेतन कैसे पांच गुना बढ़ाये अथवा नेताओं से उपकृत हो. ऐसे हालत में तो बस उसके पास एक ही काम बच जाता है कि वो चौपाल पर बैठ जाये और झाल करताल ढोल लेकर शुरू हो जाये और उस फ़िल्मी गाने कि तरह गाने लगे ----
"सखी सैयां तो खूब ही कमात है,
और महंगाई डायन खाय जात है।"

Thursday, July 1, 2010

मौर्य चैनल में मेरे ५ महीने...!

मौर्य चैनल में मेरे ५ महीने...!
मौर्य चैनल से मुझे छुटकारा मिल गया. आज मै बहुत खुश हूँ, इस ख़ुशी का ठिकाना नहीं है. पर बहुत सारे ऐसे लोग है, जो जानना चाहते होंगे की आखिर क्या वजह हो गयी की मै इतनी जल्दी मौर्य से किनारा कर लिया. १४ जनवरी २०१० को मौर्य में आने से पहले मै हमेशा मौर्य चैंनेल जाया करता था, क्योकि धरमवीर जी इसी ऑफिस में बैठा करते और मौर्य को दिशा देते, उस वक्त उनसे मेरी गाढ़ी मित्रता थी, वो चाहते थे की मै मौर्य से जुडु. इसी दरम्यान गुंजन सिन्हा समाचार निदेशक के रूप में मौर्य से जुड़े. पटना में उनसे मुलाकात हुई, उनकी भी इच्छा थी की मै मौर्य से जुडु. गुंजन जी के इस भाव को देख मुझे ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, मुझे लगा की अब मुझे कुछ काम करने को मौका मिलेगा, पर पांच महीने बीत गए काम करने का मौका ही नहीं मिला, ज्यादा समय बेवजह की बातो में ही कटा. इस दरम्यान उन लोगों से हमारी कटुता हो गयी, जिनसे हमारे बहुत ही मधुर सम्बन्ध थे. इस कटुता को बढ़ाने में वे लोग भी ज्यादा सक्रिय दिखे. जिनकी दाल हमारी वजह से गल नहीं पा रही थी. पर ईश्वर की इच्छा वे आज कामयाब है.
हमें ये कहने में कोई गुरेज नहीं की, मौर्य रांची ऑफिस में शुरू से ही अनुशासन की कमी थी, सभी राम भरोसे काम किया करते, अमित राजा ने हमसे कहा था की यहाँ उन्होंने भी सुधार करने की कोशिश की पर वे सुधार तो नहीं कर सके, चूकि नौकरी करनी है, इसलिए खुद ही सुधर गए. मै चुकी इटीवी में काम करके वहा गया था, मै चाहता था की अनुशासन हो पर अफ़सोस अनुशासन न के बराबर यहाँ दिखा. जब मैंने कुछ करना चाहा, परिस्थितियां ऐसी बन जाती की मै किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता. ऑफिस में अनुशासन हो इसके लिए मैंने कुछ ठोस डिसीजन लिए, गुंजनजी को अपने इस्तीफे की पेशकश की, एक दो पत्र लिखे जिसमे यहाँ की स्थितियों का चित्रण था. इस पत्र से ऑफिस का भला हो सकता था, पर वो पत्र पटना में बैठे मेरे कट्टर विरोधियों ने पुन: रांची भिजवा दिया. और हुआ वही जिसका अंदेशा था. रांची में बैठे वे सारे लोग जो गलत कर रहे थे, मेरे खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से लडाईया लड़ी. गन्दी गन्दी गालिया दी, मुझे जान से मारने की धमकी दी गयी. इसकी जानकारी मैंने अपने ऊपर के अधिकारीयों को दी, पर ऊपर बैठे मुकेश कुमार डायरेक्टर और सुनील पाण्डे इनपुट हेड को मेरे खिलाफ हो रही ये घटना में दिलचस्पी नहीं थी. ये दोनों यहाँ के लोगों को बढ़ावा देने में लगे थे. मुझे समझ में नहीं आ रहा था की आखिर ये दोनों ऐसा क्यों कर रहे है.
हर बात में आदर्श की बात करनेवाले मुकेश कुमार इसी बीच २८ मई को रांची पहुचे, जमकर आदर्शवाद की दुहाई दी, कहा की उनके कान चुगली सुनने अथवा चापलूसी सुनने के लिए नहीं बने है पर जब मैंने प्रमाण के साथ २३ जून को उन्ही को संबोधित पत्र लिखा कि उनके कान चुगली और चापलूसी सुनने के लिए ही बने है, उनके हालत पस्त हो गए.
पत्र की प्रतिलिपि...
"सेवा में,
श्री मुकेश कुमार,
निदेशक,
मौर्य न्यूज़, पटना.
मैंने आपको कई बार फोन किया, पर आप मेरा फोन नहीं उठा रहे और न ही कोई जवाब दे रहे है, कारण क्या है आप जाने इसलिए मै आपको मेल कर रहा हूँ. ------- क्योकि जरूरी है, मुझे अपने कामों से १० दिनों की छुट्टी चाहिए थी आपने कन्फर्म नहीं किया, मैंने सोचा की आप १० दिन की छुट्टी देने में असमर्थ है, ३ दिनों की छुट्टी मांगी पर आपने कन्फर्म नहीं किया, फिर भी मुझे बहुत जरूरी है, मै २३ से २५ जून तक छुट्टी पर हूँ, और इसकी सूचना sms के द्वारा मैंने सबको दे दी है.
कुछ मै आपकी बातो को याद दिला दू, जो रांची में २८ मई को मीटिंग के दौरान आपने कही थी -------------
आपने कहा था की आपके कान चुगली सुनने के लिए नहीं बने, पत्रकारिता सम्बन्धी कार्यों के लिए बने है, पर आपने रांची और पटना में बैठे लोगों की चुगलियों के आधार पर जिसके कहने पर मेरे उपर एक्शन लिया, वो बताता है आपके कान चुगली सुनने के लिए ही बने है. नहीं तो आप एक आदर्श स्थापित कर सकते थे.
क्या आप जानते है की हमने रांची में कितनों की गालिया और किसके लिए सुनी है. जानने की आपने कोशिश की. आपको याद है जब मेरे खिलाफ ऑफिस के कंप्यूटर में गालिया लोड की गयी, आपसे मैंने न्याय माँगा, आपको जिन पर कारवाई करनी चाहिए थी उसे बचा लिया और मुझे ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. जिन्होंने मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ भद्दी भद्दी गालिया लिखी उन्हें आपने खुली छुट दे दी की जो चाहे वो करो, आज आपके ऑफिस में क्या हो रहा है. जरा खुद देखिये ----------------------
कमाल है मैंने आकाशवाणी, आर्यावर्त्त हिंदी दैनिक, हिन्दुस्तान हिंदी दैनिक, दैनिक जागरण और etv जैसे संस्थानों में काम किया वहाँ मेरे कामों और आदर्शों की इज्ज़त की गयी, पर आपके यहाँ, आदर्शों और काम की कोई मूल्य नहीं. आपके यहाँ झूठी चुगलियों का बोलबाला है. तभी तो मानसून की झूठी खबर भेजनेवालो को सम्मानित और मुझे अपमानित कर दिया गया, यही नहीं आपके लोगो के द्वारा एक सज्ज़न व्यक्ति पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी की धज्जियां उडा दी गयी. रांची में मौर्य की क्या इज्ज़त है, आप खुद पता लगा लीजिये, बस कुछ करने की जरूरत नहीं है, आप अपना बूम लेकर किसी भी कार्यक्रम में चले जाइए, आपके अगल बगल में बैठे पत्रकार क्या कहते है सुन लीजिये.
मेरे १६ साल के पत्रकारिता के जीवन में, मेरे ऊपर किसी ने सवाल नहीं उठाये है पर आपने उठाये है, वो भी चुगलियों के आधार पर.
हां आप कहते है की मुझे यानि आपको चापलूसी पसंद नहीं है, पर मेरे पास इसके भी पुख्ता प्रमाण है की आपको चापलूसी पसंद है, जैसे भड़ास ४ मीडिया. कॉम में आपके छपे interview में रांची के ही एक स्टाफ ने आपके गुणगान कमेंट्स में किये है और लिखा है on the behalf of all staffs of ranchi office क्या आपने उससे पूछा की जो उसने कमेंट्स लिखे है, वो उसके है या सभी staff के. आपने नहीं पूछा क्योकि गर आप पूछते तो भले ही नौकरी चले जाने की डर से सभी हां कर देते, पर मै विरोध करता क्योकि मै सच बोलता हु, मुझे नौकरी की नहीं अपने जीवन मूल्य की ज्यादा चिंता है.
आप किसी से मत पूछिये, आप अपनी अंतरात्मा से पूछिये की क्या किसी ऐसे व्यक्ति को जो दुसरे संस्थान में जमा हुआ हो, उसे बुलाकर, इतनी जल्दी बे-इज्ज़त कर कर के निकालना उचित है. गर आपको लगता है की यही उचित है देर क्यूँ कर रहे है निर्णय लीजिये. पर याद कर लीजिये. ईश्वर जो आपके ह्रदय में बैठा है, वो देख रहा है, आपको भविष्य में खुद पर लज्जित होना पड़ेगा.
अभी आप जो सुनील पाण्डे -- सुनील पाण्डे जप रहे है, वो क्या है, मै खूब जानता हूँ. उनके आदर्श क्या है, ये भी मै जानता हूँ, वो मुझसे क्या चाहते है, ये भी जानता हूँ, पर क्या करू, इस ४३ वर्ष में, जो माता-पिता ने मुझे संस्कार दिया है और जिस आदर्श के लिए जीना सिखाया है उसे मै झूठी शान के लिए, वो संस्कार बीस हज़ार की नौकरी के लिए कैसे बर्बाद कर दू.
अंत में,
महत्वपूर्ण ये नहीं, की मौर्य में कौन कितने दिन काम किया.
महत्वपूर्ण ये है, वो जितने दिन काम किया, कैसे किया.
मुझे गर्व है की -------------------
क. मैंने ट्रान्सफर-पोस्टिंग का सहारा लेकर कोई न्यूज़ नहीं भेजा, जो भी न्यूज़ भेजी, वो मेरा अपना था.
ख. मैंने मौर्य के लिए अपने ही संस्थानों के लोगों की गालियाँ सुनी पर मैंने किसी को गालियाँ नहीं दी.
ग. मैंने जो भी कदम उठाये या बाते रखी, वो खुद को प्रतिष्ठित करने के लिए नहीं, बल्कि अपने संस्थान को बेहतर करने के लिए, ये अलग बात है की आपको समझ में नहीं आया.
घ. मुझे सबसे बनती है, पर ऐसे लोगो से नहीं बनती जिनकी कथनी और करनी में अंतर हो, चाहे वो कोई भी हो.
आपसे प्रार्थना है की जैसे ही आपने २१ जून से मुझे काम करने पर रोक लगा दिया आपके ऑफिस से लेकर पुरे रांची में तथा पटना ऑफिस में बैठे हमारे कट्टर विरोधियों में जश्न का माहौल है. कुछ तो रांची ऑफिस में पार्टी भी दे चुके है, आशा है आप उनके दिलों पर कुठाराघात नहीं करेंगे, और जल्द से वो पत्र भी भेज देंगे, जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार है. आप समझ सकते है, मेरा इशारा किस ओर है...
भवदीय
कृष्ण बिहारी मिश्र
पत्रकार, रांची.
दिनांक -- २३. जून २०१०."
जिस दिन मौर्य लाँच हुआ था, हमें ऐसा लगा था की मौर्य की पुनरावृति हो रही है, एक और चाणक्य उदय ले रहा है, पर मै भूल गया की, उस वक़्त और आज के वक़्त में काफी अंतर आ चूका है, प्रदुषण बढ़ा है, चारित्रिक पतन हुआ है. पत्रकारिता के नाम पर लोग दूकान खोल रहे है. और दूकान में क्या होता है. सभी जानते है. रही बात मौर्य ने कृष्ण बिहारी मिश्र को हटाया अथवा मैंने मौर्य को छोड़ा, ये जनता अथवा आदर्श पत्रकारिता में विश्वास रखनेवाले लोग निर्णय करे तो अच्छा रहेगा.
कृष्ण बिहारी मिश्र
पत्रकार.रांची (झारखण्ड).

Monday, June 14, 2010

ओछी राजनीति

विद्रोही
नोज कुमार की फिल्म – बेईमान
उसमें एक गाना था –
ना इज्जत की चिंता, न फिक्र कोई अपमान की, जय बोलो बेईमान की, जय बोलो..............................
ठीक इसी गाने के आधार पर झारखंड के नेता, अपने कुकृत्यों को, अंजाम दे रहे हैं, और ताल ठोक कर झारखंड के दामन को दागदार बना रहे हैं।
भारतीय साहित्यों में कहा गया हैं कि सज्जनों के लक्षण ये हैं कि वे मन, वचन और कर्म इन तीनों से एक होते हैं, पर दुर्जन ठीक इसके विपरीत, यानी मन, वचन और कर्म। इन तीनों से अलग-अलग।
ऐसे में यहां की जनता खुद विचार कर लें कि जिसे वे मत देकर जीताते हैं, जिसे गुरुजी कहते नहीं थकते, उनके चरित्र क्या हैं। वे सज्जन हैं या दुर्जन।
राज्यसभा के चुनाव की चर्चा छोड़ दें तो सबसे पहले शिबू सोरेन के भाषणों पर ध्यान दें।
. नक्सली हमारे भाई बंधु हैं, पर विधानसभा में लिखित तौर पर उन्हें राष्ट्रद्रोही कहने से नहीं चूकते।
. विधानसभा चुनाव के पहले कहा करते थे कि पूरा प्रदेश अकाल से जूझ रहा हैं, वे गर सत्ता में आये, तो वे पूरे प्रदेश को अकाल क्षेत्र घोषित करेंगे, पर पांच महीने के शासन में क्या किया, सभी जानते हैं।
. संसद में महंगाई पर कट मोशन होता हैं, प्रदेश में ये भाजपा के साथ होते हैं, पर संसद में कांग्रेस के पक्ष में वोट करते हैं, बाद में नितिन गडकरी के घर जाकर इस घटना के लिए माफी मांगते हैं कहते हैं कि गलती से ऐसा हो गया, मुझे माफ कर दिया जाये, पर दो महीने भी नहीं बीतते, पत्रकारों के समक्ष ये बयान देते हैं कि उन्होंने ये तो जानबूझ कर किया था, कोई गलती में कटमोशन के दौरान कांग्रेस के पक्ष में वोट नहीं बल्कि पूरे होशहवाश में वोट दिया।
. याद करिये बिहार जहां याज्ञवलक्य, मंडन मिश्र, गौतम बुद्ध, अशोक, चंद्रगुप्त मौर्य, राजेन्द्र बाबू, जय प्रकाश नारायण जैसे महानायकों ने जन्म लिया, वहां लालू प्रसाद जैसे लोगों ने भी जन्म लिया और अपने पन्द्रह वर्षों के शासनकाल में बिहार को कहां लाकर खड़ा कर दिया, बिहार की जनता भूली नहीं हैं, ठीक जिस झारखंड में बिरसामुंडा, सिद्धुकान्हु जैसे वीरों ने जन्म लिया, वहां आज शिबू जैसे लोग भी हैं, जिन्हे झारखंड के आंदोलनकारी होने का सौभाग्य भी मिला हैं, पर सच्चाई ये भी हैं कि इस आंदोलनकारी ने जैसा झारखंड का अहित किया, झारखंड का सम्मान गिरवी रखा, आजतक वैसा किसी ने नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में जब झारखंड का निर्माण हो रहा था तो मुख्यमंत्री बनने के लिए किस प्रकार ये भाजपा नेताओं का गणेश परिक्रमा कर रहे थे, ये किसी से छुपा नहीं हैं। नरसिंहाराव सरकार को बचाने के लिए इनके और इनके पार्टी के नेताओं का कृत्य जगजाहिर हैं। कितना इनका गुणगान करु, इस बार के पांच महीने के शासनकाल में अंतिम डेढ़ महीनों में अपना और झारखंड का केवल बयानबाजी को लेकर कितना बंटाधार किया हैं, वो किसी से छुपा नहीं और ले देकर, अब के डी सिंह को टिकट देने के प्रकरण ने, बची खुची सारी असर ही निकाल दी हैं।
शिबू को अपनी पार्टी के नाम पर पुनर्विचार करनी चाहिए, क्योंकि झारखंड अब बन चुका हैं, ये विकास करते नहीं, इसलिए इनकी पार्टी का बेहतर नाम झारखंड मुद्रामोचन मोर्चा हो जाना चाहिए ताकि देश के पूंजीपतियों और केवल धन के लिए ही जीनेवाले पूंजीपतियों को दूसरे पार्टी के पास जाने की जरुरत ही न पड़े, सीधे इन्हीं से संपर्क करें।
हमें तो संदेह होता हैं शिबू की आज की हरकतों को देखकर कि क्या ऐसा व्यक्ति झारखंड का आंदोलनकारी हो सकता हैं, क्योंकि जो अपने लोगों का दर्द देखेगा, क्या वो ऐसी हरकत करेगा।
क्या झारखंड में अच्छे लोगों की कमी हो गयी हैं, क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा में कार्यकर्ताओं और नेताओं का अभाव हो गया, कि झारखंड में अब नेता ही नहीं रहे, जो दूसरे प्रदेशों से नेताओँ का आयात करा रहे हैं। कम से कम शर्म तो आनी चाहिए, गर शर्म नहीं तो जनता के बीच जाये और पूछे कि वे जो कर रहे हैं, उस कुकृत्य से उन्हें कितना दुख हो रहा हैं, पर ये ऐसा करेंगे, हमें नहीं लगता।
अब कांग्रेस की बात, कांग्रेस भी बतायें कि वो कौन पूंजीपति था, जिसे महाराष्ट्र से बुलाकर यहां राज्यसभा का चुनाव लड़ने के लिए प्लानिंग की जा रही थी, कौन उस पूंजीपति को रांची बुलाया था, पर कांग्रेस भी ऐसे लोगों का पर्दाफाश करेगी और पार्टी से निकालेगी, इसकी संभावना कम दिखती हैं।
अरे नेताओं क्या आपने ये नहीं पढ़ा कि ------------
अधमा: धनम् इच्छन्ति
धनम् मानम् च मध्यमा:।
उतमा: मानम् इच्छन्ति
मानो हि महतां धनम्।।

अर्थात जो दूष्ट हैं वो सिर्फ धन चाहता हैं, जो मध्यमवर्गीय लोग हैं उन्हें धन और मान दोनों की जरुरत हैं, पर जो उच्च कोटि के लोग हैं, उन्हें धन नहीं, सिर्फ सम्मान की आवश्यकता हैं, क्योंकि उनके लिए मान ही सबसे बड़ा और सर्वश्रेष्ठ धन हैं।
पर ये बात झारखंड के बिकाउ विधायकों को समझ में आये तब न।

Wednesday, May 12, 2010

पत्रकारिता का सच ---- 2

विद्रोही

जनवरी 95, ये मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। इसी महीने हम आकाशवाणी पटना के युववाणी एकांश और पटना से प्रकाशित आर्यावर्त्त अखबार से भी जुड़े। पटना से करीब 12 किलोमीटर दूर है -- दानापुर। दानापुर अनुमंडल का भार मुझ पर था, आर्यावर्त्त से एक भी पैसा नहीं मिलता था, फिर भी इसके लिए बिना पैसे का काम करने का आनंद ही कुछ और था। शायद ये पत्रकारिता का जूनून था। इसी समय बिहार विधान सभा का चुनाव भी आ गया था। नेताओं का भाषण सुनना, उनके समाचार लिखना और फिर साइकिल चलाकर आर्यावर्त्त कार्यालय जाना, फिर दुसरे दिन अपनी ख़बरों को समाचार पत्र में देखना, छप गया तो खुश और नहीं छपा तो दिन भर की खुशियाँ काफूर। इन समाचारों के संकलन में प्रतिदिन 50-60 किलोमीटर साइकिल चलाना पड़ जाता। इसी बीच कई नेता हमारे साइकिल से समाचार संकलन करते देख द्रवित हुए और स्कूटर दिलाने की पेशकश की, पर जमीर बेचकर उनके स्कूटर पर चढने की लालसा कभी नहीं रही। क्योकि मेरी टूटी - फूटी साइकिल कुछ मुझे ज्यादा अच्छी लगती थी, इसी दौरान हमने देखा। कई जगह प्रेस कांफ्रेंस होते, पत्रकारों की खूब आवभगत होती । पत्रकार भी इस आवभगत का खूब मज़ा लेते। कई पत्रकारों को हमने देखा की वे नेताओं से, चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों से समाचार छपवाने के नाम पर पैसे भी वसूलते। कई पत्रकार मित्रों ने तो चुनाव में अच्छी आमदनी भी कर ली थी, और यही से शुरू हुई जमीर बेचने की आदत उन्हें कही की न रखी। जो नेता या प्रत्याशी उन्हें पैसे देते, उनकी नज़रे उन पर देखने लायक होती। आज भी जिनकी नेताओ से पैसे लेने की आदत है, उनके हालात पैसे रहने के बावजूद बदतर है। न तो वे सम्मान और न ही उनकी जिन्दगी ही बेहतर कही जा सकती है।

पत्रकारिता का सच ---- 1

विद्रोही
16 साल की पत्रकारिता में जो हमने देखा, महसूस किया, सोचा। उसे चाहता हूँ लिख डालूँ। बाल्यकाल में जो पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी और अन्य माध्यमों से जो पत्रकारों और पत्र-पत्रिकाओं या अन्य श्रवण-दृश्य माध्यमों को जाना है। उससे मुझे ज्यादातर निराशा हाथ लगीं, पर इन्हीं निराशाओं के बीच जब अच्छे एवम समर्पित पत्रकारों को देखता हूँ तो प्रसन्नता होती है। ये जानकर की मानवीय मूल्य अभी मरे नहीं है बल्कि जिन्दा है। इधर कुछ सालो में ब्लॉग लिखने की परम्परा शुरू हुई है। मुझे कुछ लिखने की आदत है। थोडा-बहुत लिख लेता हूँ, मेरे जो परम मित्र है, मेरी रचनाओं को पढ़कर, मेरा तारीफ कर दिया करते है। इसी लिखने की आदत ने मुझे आज ब्लॉग खोलने और उस पर लिखने को विवश कर दिया। चूँकि मुझे ब्लॉग खोलने नहीं आता, मेरे दो छोटे-छोटे बच्चो ने इसे खोलने में मेरी मदद कर दी। अब लिखूंगा। वो चीजे जिसे हमने नजदीक से देखी है। प्रारब्ध कहे या प्रार्थना अथवा प्रयास, पत्रकारिता का नशा कब चढ़ गया, मुझे पता ही नहीं चला।ये बातें है -- नवम्बर 1994 की, पटना में ये बाते जोर-शोर से चल रही थी की, पटना से प्रकाशित आर्यावर्त्त समाचारपत्र का पुन: प्रकाशन होने जा रहा है। इधर 26 जनवरी 1995 को आर्यावर्त्त का प्रकाशन प्रारंभ हो चूका था। इसी दिन दानापुर के प्रतिष्ठित पत्रकार और बी एस कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर लक्ष्मी नारायण प्रसाद श्रीश मुझे पत्रकारों की मीटिंग में, बलदेव उच्च विद्यालय ले गए, उस मीटिंग में ऐसे पत्रकार थे, जिनमे कुछ को पत्रकारिता से लेना-देना नहीं था, बस अपनी रोटी सेकना चाहते थे, या इसी की आड़ में धन कमा कर अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहते थे पर कुछ ऐसे भी थे जो समर्पण के भाव में थे। इनमे से कई तो नौकरी में चले गए, कई ने अच्छी आमदनी कर ली है तो कई जिन्दगी के थपेरों के बीच चलते जा रहे है, क्योकि हर नशे की तरह पत्रकारिता भी एक नशा है, जिन्हें ये लग गयी, समझ लीजिये या तो वे महान हो गए नहीं तो बर्बाद होना तय है, फिलहाल बर्बाद होनेवालो की संख्या में इधर ज्यादा इजाफा हुआ है।ऐसे मै ये बता देना चाहता हूँ की मुझे नशा के नाम पर सिर्फ पत्रकारिता ही है। चाहकर भी छोड़ नहीं सकता, कई बार छोड़ने की स्थिति आयी पर इसने हमें छोड़ा नहीं है, 15 साल से अब 16 वे में प्रवेश किया हूँ। श्रव्य से, प्रिंट और प्रिंट से इलेक्ट्रोनिक तक का सफ़र किया है, मुझे ख़ुशी है की इस दौरान हमने वो देखा जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

Tuesday, May 11, 2010

भुत पिशाच निकट नहीं आवे-----विद्रोही

भुत पिशाच निकट नहीं आवे-----विद्रोही

नक्सली कभी निकट नहीं आये, महावीर जब नाम सुनाये
एक फिल्म का सुपर हिट गीत है ------
जो तुमको, हो पसंद, वो ही बात करेंगे.
तुम दिन को कहो रात, तो हम रात कहेंगे.
ये गीत फिलहाल झारखण्ड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन पर फिट बैठता है. क्योकि जो -जो नक्सली कह रहे है, वे करते चले जा रहे है. उदार इतने है की वे नक्सलियों को अपना भाई-बंधू कहने से नहीं चुकते. ऑपरेशन ग्रीन हंट के सम्बन्ध में जब कोलकाता में मीटिंग होती है तब बीमारी का बहाना बनाकर अपोलो के बेड पर जाकर लेट जाते है. प्रखंड विकास पदाधिकारी का अपहरण होता है और वे इसे छोटो-मोटी घटना कहकर टाल जाते है. नक्सली जब उन्हें प्रेस कांफ्रेंस कहने को करते है तो वे प्रेस कांफ्रेंस तक कर डालते है. वाह देश के विभिन्न राज्यों में ऐसा सुंदर छवि और बुद्धिमान कोई मुख्यमंत्री है. इस सवाल का जवाब शिबू सोरेन ही दे तो अच्छा रहेगा.
झारखण्ड में धालभूमगढ़ के प्रखंड विकास पदाधिकारी का अपहरण, नक्सलियों के मांग के बाद पल पल में नक्सलियों के अनुरूप वरीय पुलिस पदाधिकारी रेजी डुंगडुंग का बदलता बयान, ऑपरेशन कोबरा पर लगी रोक और अंत में यहाँ के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का बयान साफ़ जाहिर करता है हमारा मुख्यमंत्री नक्सलियों के आगे कितना असहाय हो जाता है. देश में इस राज्य के मुख्यमंत्री ही है जो गुरूजी नाम से जाने जाते है. पर धालभूमगढ़ प्रकरण ने साफ़ कर दिया की यहाँ असली गुरु कौन है. यहा शासन किसकी चलती है.
इस प्रकरण ने बहुत सारे सवाल भी उठाये है. वरीय पुलिस पदाधिकारी रेजी डुंगडुंग का ये कहना की जियां और आस्ति गाव से पकडे गए लोग नक्सली नहीं थे, गर वे नक्सली नहीं थे फिर पुलिस ने उन्हें पकड़ा क्यों, ये तो और शर्मनाक है, आखिर झारखण्ड पुलिस किस ओर कदम बढ़ा रही है, ऐसे में नक्सलियों ने जो सहानुभूति उन ग्रामीणों से बटोरी, उसका लाभ किसे मिलेगा, पुलिस को या नक्सली को. यहाँ के DGP को खुद चिंतन करना चाहिए.
कमाल है सरकार के गठन हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए पर सरकार नक्सालियों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है या ये भी कह सकते है की नक्सलियों की गणेश-परिक्रमा कर रही है. आखिर ये सरकार काम कब करेगी. धालभूमगढ़ प्रकरण ने सिद्ध कर दिया की यहाँ सरकार नाम की कोई चीज नहीं है, इसलिए आम जनता शिबू के आगे न झुक कर नक्सलियों के आगे झुके तभी उनका कल्याण है अन्यथा नहीं. ये घटना यहाँ के प्रशासनिक अधिकारीयों को भी शायद अहसास करा दी है की उनकी सुरक्षा का भार किस पर है. इसलिए इनका जहाँ पदस्थापना होगा तो ये सरकार की कम और नक्सलियों की ज्यादा सुनेगे. ऐसे भी यहाँ के प्रशासनिक और पुलिसकर्मी अपने क्षेत्र में हनुमान चालीसा कुछ ज्यादा ही पढने लगे है. तुलसी की इस चालीसा में सिर्फ एक ही परिवर्तन हुआ है. भूत-प्रेत की जगह -- नक्सली जुट गया है. जैसे एक पंक्ति है ---- भूत-पिशाच निकट नहीं आये, महावीर जब नाम सुनाये. अब हो गया, नक्सली कभी निकट नहीं आये, महावीर जब नाम सुनाये।

भगवान बचाए ऐसे टीवी वाले बाबाओं से------- विद्रोही

भगवान बचाए ऐसे टीवी वाले बाबाओं से------- विद्रोही

मै पिछले तीन दिनों से सो नहीं पाया हूँ, इतना बेचैन हूँ की पूछिए मत. आखिर बेचैन क्यों हूँ, आप जानना चाहते होंगे. दरअसल बात ये है की दिल्ली से प्रसारित एक राष्ट्रिय चेंनेल ने १३ मार्च की सुबह एक बाबा को अपने स्टूडियों में बुलाया. बाबा स्वयं को सामान्य मनुष्य बता रहे थे, पर स्टूडियों में बैठा एंकर, उन्हें असामान्य बताने पर तुला था और नीचे चल रही पट्टी बाबा को महा मंडलेश्वर बता रही थी, जो अपने आप में विरोधाभास था. बाबा का दावा था की उन्होंने जो भी अब तक कुछ कहा है, इश्वर की कृपा से सच साबित हुई है, ये बाबा ज्यादातर इसी राष्ट्रिय चेंनेल पर आते है और स्वयम को महिमामंडित करने के लिए ऐसी हाव भाव प्रकट करते है, की प्रथमदृष्टया एक सामान्य व्यक्ति सम्मोहन वश इनकी बातो में आकर वो सब करने लगेगा जो ये, बाबा कहते है.
जरा देखिये, ये बाबा १३ मार्च को क्या कह दिया, १३ मार्च की सुबह -------- बाबा बता रहे थे की मार्गी मंगल अब चलेगा, जो मंगल को खुश कर दिया, शनि उससे खुश हो गए. इसी दरम्यान इस बाबा ने एक राशिफल में बताया की कर्क राशिवालों को ८ किलो उड़द की दाल पानी में बहा देना चाहिए. इससे ये राशिवाले आनंदित हो जायेंगे. पता नहीं ऐसा करनेवाले खुश होंगे या नहीं. पर गर ऐसा लोगों ने करना शुरू किया तो आप सोचिये क्या स्थिति होगी, देश की. ऐसे ही इस बार दलहन का उत्पादन देश में प्रभावित हुआ है जिससे दालों के दाम आकाश को छूने लगे. देश की सरकार इस महंगाई को देख दुसरे देशों से दाल का आयात करने लगी फिर भी दाल का दाम घटने का नाम नहीं ले रहा. आज भी लोगों के थालियों से दाल गायब है, ऐसे में देश के ये राष्ट्रिय चेंनेल ऐसे ऐसे बाबाओं के माध्यम से देश का मान बढ़ा रहे है, या भूखमरी को बढ़ावा देने का काम कर रहे है. क्या ऐसे लोगों के खिलाफ कानूनी करवाई नहीं करनी चाहिए जो अनाजों को भुखमरी और कुपोषण के शिकार लोगो को न देकर ये पानी में बहाने का सन्देश दे रहे है.
मै भी ब्रह्मण घर में जन्म लिया हूँ, ज्योतिषी का ज्ञान मुझे भी है. किस पुस्तक में लिखा है की, अकाल और सूखे से प्रभावित तथा गरीबी से जूझ रहे देश के लोगो को खाने-पिने की अनाजो को पानी में बहा देना चाहिए. क्या देश के किसानों के श्रम से पैदा किया गया अनाज पानी में बहाने के लिए है.
क्या इन बाबाओं और पत्रकारों को मालूम नहीं की अपने देश में एक मन्त्र है जो अनाजों के सम्मान को दर्शाता है ---- अन्नेति परम ब्रह्म. क्या इन बाबाओं और पत्रकारों को वो कहानी मालूम नहीं जब कृष्ण ने द्रौपदी को शाक के माध्यम से अन्न के महत्व को समझाया था. लानत है ऐसी सोच पर जो ८ किलो दाल को पानी में बहा देने की बात करते हो. ऐसे ही बाबाओं - पत्रकारों और चैंनलों ने लगता है की इन्होने देश का सत्यानाश करने के लिए ठेका ले रखा है. इनकी जितनी आलोचना की जाये कम है.
आजकल धर्म के मूल स्वरुप को ये चेंनेल बताने का प्रयास नहीं करते, ये वही बात करते है, जिनमे इनका फायदा दिखाई देता हो. इसके लिए देश में तबाही ही क्यों न हो जाये.
मै पूछता हु की ये बाबा और चेंनेल बता सकते है की इस देश में स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष हुए, जिन्होंने भारतीय धर्म का पताका विदेशो में फहराया. श्री स्वामी प्रभुपाद जिन्होंने हरे कृष्ण आन्दोलन से अपने देश के अध्यातम का लोहा मनवाया. इन्होने कितने किलो अनाज नदी में प्रवाहित करने का सन्देश दिया. गर ये सन्देश ऐसे दिए होते तो इस देश का मान विदेशों में बढ़ा होता. ये छोटी सी बात इन चैन्नेलों और पत्रकारों को क्यों समझ में नहीं आती.
ऐसी ही एक घोर आश्चर्य एक दक्षिण के चैनलों में प्रसारित कार्यक्रम में मैंने देखी. एक जयपुर की महिला ने एक बाबा से पूछा की उसकी बेटी आस्ट्रलिया में है, बड़ी संकट में है, बाबा कुछ उपाय बताये, बाबा ने क्या उत्तर दिया जरा सुनिए --- आप अपनी बेटी को कहे की शुद्ध घी के चार लड्डू बना आस्ट्रलिया के एक हथिनी को खिला दे. अब जरा बाबा को कौन बताये की आस्ट्रलिया में हाथी नहीं कंगारू ज्यादा मिलते है, वो भी न तो हाथी और न कंगारू, दोनों में किसी को लड्डू पसंद नहीं है. अरे जिन्हें लड्डू पसंद है उन्हें तुम लड्डू नहीं देते और जिन्हें पसंद नहीं उन्हें लड्डू जबरदस्ती खिलाते हो, ऐसे में तुम किसी जिन्दगी में ख़ुशी नहीं प्राप्त कर सकते, क्योकि असली इश्वर तो तुम्हारे अंदर बैठा है, उसे क्यों नहीं जानने की कोशिश करते. क्यों घटिया स्तर के बाबाओं और चैनलों के चक्कर में पड़कर अपनी जिन्दगी तबाह करने में लगे हो, अभी भी वक्त है संभल जाओ.

पढने का मतलब......!

पढ़ने का मतलब – विद्रोही

हमारे बहुत सारे ऐसे मित्र हैं जिनकी मासिक आमदनी एक लाख से उपर हैं, वे खूब धन कमाना चाहते हैं, जिंदगी की हर खुशियों को पाना चाहते हैं, अपने बच्चों को वो बनाना चाहते हैं, जो वो नहीं बन सकें और इसी बनाने के चक्कर में खुद को नाना प्रकार के अवसादों में ढक ले रहे हैं, क्योंकि अंत में परिणाम वो आ रहा हैं, जिसकी परिकल्पना उन्होंने नहीं की थी।
मैं इन मित्रों में से कई को उदाहरण दिया हूं, वे सुनते हैं, समझते हैं, पर करते वहीं हैं, जो लक्ष्मी जी इनसे करा लेती हैं, क्योंकि ये नहीं समझते कि धन की तीन गतियां हैं – सर्वोच्च गति हैं – दान, मध्यम गति हैं – उपभोग और निकृष्ट गति जो आप चाहे या न चाहे हो ही जाती हैं – नाश।
जरा कोई हमारे मित्रों साथ ही वे लोग जो आज धनपशु बनने के चक्कर में चरित्र को श्रद्धांजलि दे, वे सब कुछ कर रहे हैं, जिससे समाज को खतरा उत्पन्न हो गया हैं, भ्रष्टाचार की सारी सीमाएँ लांघ गये हैं, हमारे कुछ सवालों का जवाब दे सकते हैं।
गांधी के माता – पिता अपने बच्चे का नाम रखा – मोहनदास, पर बेटे ने ऐसी राजनीतिक प्रबंधन की कि बेटा मोहनदास से महात्मा गांधी हो गया, यहीं नहीं जिसने उसे पैदा किया, उस़का भी बाप बन गया राष्ट्रपिता कहलाया। क्यॉ कोई बता सकता हैं कि महात्मा गांधी ने किस शिक्षण संस्थान से राजनीतिक प्रबंधन के गुर सीखे, जिसके कारण उन्होंने मरणोपरांत अपने जन्मदिन पर अतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस तक घोषित करा दिया।
कबीर, जिन्होंने कभी स्याही कलम पकड़ी नहीं और उन्होंने ऐसी साखी लिखी कि उनकी साखी पूरे दूनिया को सीख दे रही हैं। लोग कबीर की लिखी पंक्तियों पर सर्च नहीं रिसर्च कर रहे हैँ और डाक्टरेट की उपाधि ले जा रहे हैं, कमाल हैं आज तो सिर्फ ये रिसर्च कर रहे हैं, क्योंकि सर्च तो पहले ही कबीर कर चुके हैं –
ये कहकर कि –
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय
एकै आखर प्रेम का पढ़ैं सो पंडित होय
रवीन्द्र नाथ ठाकुर, जिन्होंने कभी स्कूल एवं कालेज का मुंह तक नहीं देखा, उनकी गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद धूम मचाती हैं, और वे नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर लेते हैं।
आधुनिक प्रमाण की ओर ध्यान दें –
महेन्द्र सिंह धौनी जो आज क्रिकेट जगत में धूम मचा रहे हैं, क्या उनके परिवार में कोई क्रिकेट का एबीसीडी भी जानता था, या आनेवाले समय में क्या खुद वे अपने ही संतान को उस उचाई तक ले जा सकते हैं, जिस उचाई पर वे आज हैं, अरे जब सुनील मनोहर गावस्कर अपने बेटे रोहन को उस उचाई तक नहीं ले जा सके तो और कोई क्या कर सकता हैं।
लालू यादव जो पन्द्रह सालों तक बिहार की कुर्सी से परोक्ष व अपरोक्ष रुप से चिपके रहे, जिन्होंने अँधाधूध पैसे कमाये, वो सब कुछ अपने बेटे बेटियों के लिए कर दिया, जो एक सामान्य मां – बाप कभी नहीं कर सकते, पर क्या लालू ही बताये, जो राजनीतिक उचाईयों उन्होंने छूई क्या उनके संतान भी ऐसी उंचाई छू सकते हैं।
उत्तर होगा -- नहीं
आर्थिक क्षेत्रों की ओर नजर डाले – जिस धीरु भाई अंबानी ने नया कार्यक्षेत्र का शुभारंभ किया, उनके बेटे उस क्षेत्र को नई दिशा जरुर दे रहे हैं, पर वे धीरु भाई अंबानी नहीं बन सकतें, क्योंकि खोज एक अलग चीज हें, और उसे आगे बढ़ाना दूसरी चीज।
परतंत्रता की बेड़ी में पड़े भारतवर्ष में टाटा आयरण एंड स्टील कंपनी को खोलनेवाले जमशेदजी टाटा ने जो करामात उस वक्त दिखाई क्या जमशेदजी टाटा के जैसा, उन्हीं के यहां कोई दूसरा जमशेदजी टाटा बन सका।
वर्तमान राजनीतिक क्षेत्र में देखे – मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी सभी सामान्य वर्ग से आते हैं, राजनीतिक बुलंदियों को छूआ हैं, ये आर्थिक और सामाजिक सम्मान में किसी से भी कम नहीं पर ये भी चाहे कि अपने परिवारवालों को वो चीजें दिला दें जो उन्होंने पाया। असंभव हैं।
क्योंकि वो चीजें पाने के लिए आपको भी औरों से हटकर कुछ विशेष काम करने होंगे और इनमें जो सबसे ज्यादा जरुरी हैं वो हैं – चरित्र, जिसकी सभी ने अब तिलांजलि एक तरह से दे दी हैं। सभी को लगता हैं कि धन कमाओं और इस धन से वे सारी चीजें खरीद लों, जिसकी वे चाहत रखते हैं, पर उन्हें ये मालूम नहीं कि धन से दवा खरीदी जा सकती हैं, पर दुआएं नहीं, धन से भोजन खऱीदा जा सकता हैं और पर भूख को शांत नहीं किया जा सकता, धन से सुख के सारे संसाधन खऱीदे जा सकते हैं, पर सुख नहीं। फिर भी धन कमाने की होड़, और इस होड़ में एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा हैं।
मैं, जिस गांव में पला बढ़ा हूं, उस गांव में दो धनाढ्य थे, जिनके पास धन और जमीन की कोई कमी नहीं थी, पर आज उन्हीं दो धनाढ्यों के बच्चों ने उन संपत्तियों को एक – एक कर बेचना शुरु कर दिया आज के डेट में उनके पास खाने तक को कुछ नहीं, ऐसे में इस प्रकार के धन कमाने से क्या फायदा।
हाल ही में पटना के एक अधिकारी, के यहां छापा पड़ा, जनाब छापे और पकड़ाने के भय से परिवार के साथ पर्व त्योहार भी नहीं मना सकें, बच्चे पापा को खोज रहे थे, पर पापा पता नहीं कहां थे।
समाज का कोई भी क्षेत्र हो गर आप उसमें भाग ले रहे हैं और उसमे सच्चरित्रता का समावेश कर लेते हैं तो आपका जीवन धन्य हो जाता हैं, पर जहां उसमें चारित्रिक पतन का समावेश करते हैं तो सिर्फ आप धनपशु कहलाते हैं, और इसके बाद जो पशु की जिंदगी होती हैं, वो आपकी जिंदगी हो जाती हैं, आखिर आप इस छोटी सी बात को क्यों नहीं समझते।
स्वतंत्रता के पूर्व भारत में शिक्षा का अभाव था पर चरित्रता व ज्ञान की वैशिष्टयता का अभाव नहीं था, पर आज क्या हैं, शिक्षा और संचार क्रांति में भारत जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हैं, ठीक वैसे – वैसे चरित्र और ज्ञान की वैशिष्ट्यता का अभाव भी तेजी से बढ़ता चला जा रहा हैं। आज स्कूलों – कालेजों में बच्चें सब कुछ बन रहे हैं, पर आदमी नहीं बन रहे. यहीं आदमी का नहीं बनना भारत जैसे देश के लिए काल बनता चला जा रहा हैं, जो आपस में ही इतनी दूरियां तय कर दे रहा हैं कि कल भाई ही भाई के खिलाफ तलवार निकालकर, भारतीयता को ही नष्ट कर देने को उतावला हो जाये तो इसे अतिश्योक्ति नहीं माना जाना चाहिए

भाजपा को शर्म आनी चाहिए.

भाजपा को शर्म आनी चाहिए। --- विद्रोही

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक राजनीतिक इकाई, पं. दीन दयाल उपाध्याय, डा.श्यामा प्रसाद मुख्रर्जी जैसे महान शख्सियतों की पार्टी, देश में पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री का खिताब पाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की पार्टी, तीन प्रदेशों की जन्मदाता, मूल्यों और सिद्धांतों की बात करनेवाली भाजपा आज झारखंड में क्या कर रही हैं। झामुमो के साथ सत्ता की लालच में चूहे – बिल्ली का खेल, खेल रही हैं।
कथनी और करनी में एक समानता की बात करनेवाली पार्टी अब कथनी और करनी में अंतर रखने का रिकार्ड अपने नाम करने जा रही हैं। जरा देखिये, इस भाजपा को जिसने मूल्यों और सिद्धांतों की झारखंड में कैसे धज्जियां उड़ा रही हैं।
लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पर जब वोटिंग की बात आयी, तब सीबीआई के भय और आनेवाले समय में भविष्य को लेकर सशंकित, कांग्रेस के साथ जाने के लिए मन बना चुकी झामुमो ने कांग्रेस के पक्ष में वोटिंग कर दी। कांग्रेस के पक्ष में वोटिंग करना भाजपा को इतना नागवार गूजरा कि उसने झारखंड के शिबू सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी, राज्यपाल से मिलकर समर्थन वापसी का पत्र देने का समय तक मांग डाला, पर जैसे ही झामुमो ने माफी और भाजपा को ही सरकार बनाने का अनुरोध पत्र दे डाला, समर्थन वापसी की बात इस भाजपा ने हवा-हवाई कर दी। भाजपा को लगा, बस अब झारखंड में उसका मुख्यमंत्री होना सुनिश्चित हैं, पर वो भूल गयी कि झामुमो एक ऐसे पार्टी का नाम हैं, जो कब क्या बोलेगा और क्या करेगा, खुद उसके सुप्रीमो तक को पता नहीं होता, जिस पार्टी की सभा और विधायक दल की बैठक कब शुरु होती है और कब खत्म होती हैं, खुद उस पार्टी तक को पता नहीं होता, ये पार्टी कब झूमर और कब सोहर गा दे, खुद झारखंड की जनता को मालूम नहीं होता। तो भला भाजपा की क्या औकात की, झामुमो के अंदर की बात जान लें।
हुआ भी ऐसा ही, एक झामुमो के मंत्री ने हमसे ऑफ दि रिकार्ड बात कही थी, कि विद्रोही जी, आप जान लीजिये, भाजपा को हम इस मुद्दे पर ऐसा नाच नचायेंगे कि वो लोग जानेंगे, भाजपा वाले समझते हैं कि हम महतो-मांझी की पार्टी हैं, राज चलाना क्या जाने, पर हम वो सब जान गये हैं, जिसे लेकर सत्ता चलती हैं, अरे जब बड़े लोग मूल्यों और सिद्धांतों को तिलांजलि देने में एक मिनट तक नहीं देते तो हम भला मूल्यों और सिद्धांतों पर क्यूं चले, क्यूं हमने ही सिर्फ मूल्यों और सिद्धांतों पर चलने का ठेका ले रखा हैं। ये बात तो झारखंड के सभी पार्टियों को सोचना चाहिए। ये बात हैं उस वक्त की जब पहले राउँड की बात कर दिल्ली से झामुमो के नेता विजयी मुद्रा में लौटे थे।
झामुमो जहां इसकी पकड़ हैं, वहां दूसरे नंबर पर भाजपा हैं, कांग्रेस तीसरे नंबर पर हैं, ऐसे में अपने दूसरे नंबर के शत्रू पर विजय पताका फहराते हुए शासन करना झामुमो के लिए कितनी आनन्द देने की बात हैं, इसे समझा जा सकता हैं, क्योंकि झामुमो का मानना हैं कि जितना भाजपा को उसकी औकात बता कर शासन करेंगे, झामुमो प्रदेश में उतना ही मजबूत होगा, पर केन्द्र और प्रदेश में बैठे इन भाजपा नेताओं को ये छोटी सी बात समझ में नहीं आ रही और वे सत्ता की लालच में इतने अंधे हो गये कि उन्हे पता नहीं चल रहा हैं कि राज्य की राजनीतिक अनिश्चितता के इस दौर ने प्रदेश को कहां लाकर खड़ा कर दिया।
दिल्ली और रांची में बैठकों का दौर जारी हैं, एक छोटी सी पार्टी झामुमो ने भाजपा के नीति सिद्धांतों की चूलें हिला दी, पर केन्द के भाजपा नेताओं को इसका भान नहीं हो रहा. भान हो भी तो कैसे, उन्हें पता हैं कि जब भाजपा की सरकार थी, तो उन्हें कितना मजा लिया हैं, झारखंड में शासन नहीं रहने पर उन्हें कितना नुकसान हुआ हैं, ऐसे में कुछ ले – देकर बात बन जाये तो क्या फर्क पड़ता हैं। ऐसे भी झारखंड की जनता ने जो जनादेश दिया था, उसका हश्र तो यहीं होना हैं, इसलिए जो चाहे जो करों अपनी बला से। हमें तो सत्ता चाहिए, चाहे अट्ठाईस महीने की हो या छह महीने की। गर छह महीने की हुई तो उसे पूरे साढ़े चार साल तक करने के लिए फिर राजनीतिक गोटी फिट करेंगे, नहीं तो जितनी की अवधि हैं, उतना तो अपना वारा-न्यारा हैं ही।
कुछ नेता व विधायक कहते हैं कि यहां सीटों की संख्या कम हैं, इसलिए यहां ऐसा हो रहा हैं, गर सीटों की संख्या बढ़ जाये, तो ऐसी स्थिति नहीं रहेंगी, यानी नाच न जाने अंगना टेढ़ा, चरित्र नहीं हैं और सीटे कम होने का बहाना ढूंढने लगे, अरे इसकी कौन सी गारंटी होगी कि सीटे बढ़ जाने पर त्रिशंकु विधानसभा नहीं होगी. यहां सीट से मतलब थोड़े ही हैं, यहां तो नेताओं के चरित्र का संकट हैं, सभी का लक्ष्य एकमात्र कुर्सी पाना और सत्ता पाना हैं, सेवा भाव ही जब हृदय से खत्म हो गया तो फिर पार्टी और सीट का मतलब क्या, राज्य की राजनीतिक हालात देख तो हमारे हृदय से इन भ्रष्ट नेताओं के प्रति कुछ ऐसी ही पंक्तियां निकल रही हैं ------------------
नेता आओं, सत्ता पाओ,
पार्टी का मतभेद भूलाओं,
एकमेव तुम कुर्सी पाओं
पत्नी और पुत्र को लाओ
जनता से जयकार कराओं
और उन्ही की छाती पर,
मूंग दराओं,
नीति विवेक के गहने उतारकर,
सप्त जन्म तुम सफल कराओं
नेता आओ, सत्ता पाओ ----------------------------------

Monday, May 10, 2010

दो किस्म के नेता होते है....!

विद्रोही,
याद करिये – मनोज कुमार की फिल्म – यादगार उसमें एक गाना हैं –
दो किस्म के नेता होते हैं एक देता हैं, एक पाता हैं
एक देश को लूट के खाता हैं एक देश पे जान गंवाता हैं
एक जिंदा रहकर मरता हैं एक मरकर जीवन पाता हैं
एक मरा तो नामों निशां ही नहीं एक यादगार बन जाता हैं
भगवान करें,
मेरे देश के सब नेता ही बन जाये ऐसे,थोड़े से लाल बहादुर हो,थोड़े से हो नेहरु जैसे
राम न करें, मेरे देश को कोई भी ऐसा नेता मिले जो आप भी डूबे, देश भी डूबे, जनता को भी ले डूबे.......
वोट लिया और खिसक गया, जब कुर्सी से चिपक गया, तो फिर उसके बाद !
एकतारा बोले तुन तुन तुन तुन ---------------------------------------
"ये गाना झारखंड के राजनीतिज्ञों पर फिट बैठती हैं। कुछ महीने पहले संसद में गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने ठीक ही कहा था कि झारखंडी राजनीतिज्ञों को राज चलाना सीखना चाहिए, क्योंकि इन राजनीतिज्ञों ने जो आज झारखंड के हालात कर दिये हैं, वो शर्मनाक ही नहीं बल्कि असहनीय हैं। ये कैसा चरित्र हैं कि राज्य में भाजपा के साथ और केन्द्र में कांग्रेस के आगे नतमस्तक होना, क्या इससे पता नहीं चलता कि झारखंड में राजनीतिज्ञों की कौन सी पौध शासन कर रही हैं, जिसके पास चरित्र नाम की कोई चीज ही नहीं। क्या पुत्र मोह, राज्य की जन सेवा से भी बड़ी चीज हैं, कि एक मुख्यमंत्री जिसे झारखंड की जनता गुरु जी का विशेषण देती हैं, वह गुरु गुरु न बन कर सामान्य पिता की श्रेणी में आ खड़ा हुआ हैं, ऐसे में मैने कभी इन्हें गुरुजी कहकर पुकारा नहीं, इन्हें शिबू जी कहने में ही मुझे आनन्द आता हैं, क्योंकि शिबू से उपर ये उठ भी नहीं पायेंगे । जरा इनका चरित्र देखिये ----विधानसभा चुनाव के पहले, ये आम सभा में कहा करते थे, कि प्रदेश़ में सूखा नहीं, अकाल पड़ा हैं, वो गर सत्ता में आये, तो वे पूरे प्रदेश को अकालग्रस्त क्षेत्र घोषित करायेंगे, पर इन्होंने सत्ता मिलने के बाद क्या किया, सारी जनता के सामने हैं, अकाल तो दूर सूखाग्रस्त क्षेत्र भी घोषित नहीं करा पाये। यहीं नहीं, सदन के बाहर, ये कहते हैं कि नक्सली हमारे भाई – बंधु हैं, पर सदन के अंदर कहते हैं कि नक्सली राष्ट्रद्रोही हैं, कमाल हैं ये विधानसभा चुनाव जीतने की हिम्मत नहीं जूटा पाते, एक खास जगह-इलाके में ही जीत का दावा करते हैं, पर पूरे प्रदेश की जनता पर पकड़ रखने की बात करते हैं, पुत्र मोह में इतने व्याकुल हो जाते हैं कि हेमंत उनका बेटा, उनके ही सामने उनकी ही बनायी पार्टी को हाईजैक कर लेता हैं, और वे कुछ नहीं कर पाते, क्या ऐसा शख्त झारखंड का मुख्यमंत्री बनने या भाग्य विधाता बनने के लायक हैं। विधानसभा चुनाव संपन्न हो जाने के बाद, ऐसा लगा कि समय ने जिस प्रकार से शिबू को मुख्यमंत्री पद पर लाकर खड़ा किया, ये कुछ करेंगे, पर इन चार महीनों में क्या किया, यहां की जनता के साथ साथ, शिबू को भी मालूम होना चाहिए । अब भाजपा ने इन्हें सत्ता से बाहर खड़ा कर दिया हैं, हो सकता हैं कि कांग्रेस इन्हें फिर सत्ता में ले आये, क्योंकि कांग्रेस का वर्तमान चरित्र व नरसिंहाराव सरकार बचाने में, शिबू और उनके सहयोगियों का चरित्र किसी से छूपा नहीं हैं सभी ने झारखंड का सत्यानाश करने का जैसे संकल्प ले लिया हैं, इसी ओर इनका काम चल रहा हैं, ऐसे में झारखंड की जनता के सपनों का चीरहरण कर रहे, इन राजनीतिज्ञों को कब शर्म आयेगी, समझ में नहीं आ रहा। भगवान से अब प्रार्थना हैं कि झारखंड में जन्मे इन राजनीतिज्ञों को थोड़ी सदबुद्धि दे ताकि ये जनसेवा का भाव लेकर, कुछ झारखंड का भला करें, नहीं तो भूख और गरीबी से जूझ रहे, इस प्रदेश की जनता बर्बाद हो जायेगी, क्योंकि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य बनता हैं, फिलहाल वर्तमान कैसा है, सबको मालूम हैं, और झाऱखंड बनने के बाद का अतीत भी हमारे सामने हैं, कोई ज्यादा समय नहीं बीता हैं । कुछ सवाल कांग्रेसियों और झाविमो के नेताओं व विधायकों से, भाजपा ने शिबू से समर्थन वापस ले लिया हैं, इस पर आप जरुर खुश होंगे, संभव हैं, आपके हाथों तक सत्ता का हस्तांतरण भी हो जाये, पर क्या आप ऐसी स्थिति में झारखंड को दिशा दें पायेंगे, गर नहीं तो फिर बेमेल समझौते, चरित्रहीन राजनीति को और आगे बढ़ाने पर आमदा क्यों हैं, प्लीज थोड़ा सा शर्म करिये, राजनीतिक परिपक्वता दिखाये, जनहित में, झारखंड हित में कुछ फैसला लीजिये। अच्छा करिये, अपने परिवार, पत्नी और बेटे तक मत सिमटिये, सबके लिये सोचिये, पर आप ऐसा करेंगे, हमें फिलहाल दिखाई नहीं देता, क्योंकि आपके चेहरे भी काफी दागदार हैं।