Sunday, June 21, 2015

नीतीश अर्थात् भस्मासुर................

बिहार में एक नेता पैदा हुआ - नीतीश, जिसे आप भस्मासुर भी कह सकते हैं, क्योंकि इस नेता को लालू के खिलाफ भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने खड़ा किया.........अब वहीं नेता भाजपा को खत्म करने की बात कर रहा हैं, पर उसे पता नहीं कि भस्मासुर तो भस्मासुर ही होता हैं, वो पैदा ही होता हैं भस्म हो जाने के लिए.....बस विधानसभा चुनाव का इंतजार कीजिये...बिहार की जनता ने तो संकल्प ले ही लिया हैं कि...............
जो लालू के संग जायेगा,
कभी सीएम न बन पायेगा.........
नीतीश का घमंड तोड़िये,
नया विकल्प चूनिये.........
बिहार का सम्मान बढाईये,
बेटे और पत्नी से प्यार करनेवाले नेता को साइड करिये...........
अबकी बार किसकी सरकार,
नीतीशविहीन बिहार सरकार.............
जो गंदगी फैलाये, वो नेता नहीं.
जो योग का विरोध करें, वो नेता हमें पसंद नहीं...........
जो बिहार से करें प्यार
वो नीतीश का घमंड तोड़ेगा इस बार............
पत्रकारों, अखबारों और चैनलों को, अपनी ओर करने की नीतीश ने की तैयारी,
रुपयो का बंडल लेकर जदयू नेता, मालिकों का मुंह बंद करने को हो रहे बेकरारी............
जिसने दलितों का किया अपमान
उस नीतीश को, न अब दें सम्मान.............

Saturday, June 20, 2015

चलनी दूसे सुप के जिन्हें बहत्तर छेद..............

बेचारे नीतीश आजकल नरेन्द्र मोदी का जंतर लेकर पटना से दिल्ली तक का सफर कर रहे हैं, ये वे जंतर लेकर जनता को बताते हैं कि नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान क्या वायदे किये थे पर नीतीश शायद भूल चुके है कि आज से ठीक पांच साल पहले उन्होंने भी बिहार की जनता को यह कहकर टोपी पहनाया था ( बिहार की जनता को जंतर पहनाया था) कि आनेवाले विधानसभा चुनाव में गर हमने बिहार के गांव- गांव तक बिजली नहीं पहुंचायी तो वे वोट मांगने बिहार की जनता के समक्ष नहीं आयेंगे.............
मैं पूछता हूं कि क्या बिहार के गांव - गांव में बिजली संकट समाप्त हो गयी, गर नहीं तो नीतीश को क्या अधिकार हैं नरेन्द्र मोदी पर ताना कसने की..............
क्या नीतीश बता सकते हैं कि जिस बिहार में अपने दुश्मन को उंचा पीढ़ा देने की रिवायत हैं, उस रिवायत को नीतीश ने कैसे धूल में मिला दिया, जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में आये भाजपा के वरिष्ठ नेताओं को खुद भोज पर आमंत्रित किया और खुद ही भोज देने से मना कर दिया क्या नीतीश बता सकते हैं कि इससे अपमान किसका हुआ, नीतीश का, बिहार का या भाजपा के नेताओं का............
क्या नीतीश भूल गये कि उन्होंने बिहार की लड़कियों से काला दुपट्टा कब और कैसे उतरवाने की कोशिश की थी...........
क्या नीतीश भूल गये कि उन्होंने कैसे लालू को चारा घोटाला में फंसाया और फिर लालू की गोद में बैठकर सत्ता की दुध-मलाई खाने में व्यस्त हो रहे हैं.............
कमाल हैं जिस भाजपा के साथ आठ वर्ष तक गलबहियां डाले घूम रहे थे, आज वो सांप्रदायिक हो गयी और जिस जातिवाद के खेल में प्रवीणता दिखाकर ये बिहार को घोर जातिवाद में धकेल रहे हैं, क्या बिहार को जातिवाद से खतरा नहीं.............
क्या नीतीश बता सकते हैं कि जब पूरा देश स्वच्छता अभियान में जूटा हैं तो वे झूठी अहंकार के लिए इस अभियान को भी चुनौती दे डाली हैं और पूरी राजधानी को नरक बनाने में सफलता प्राप्त कर ली ....नरक देखना हो तो बस पटना जंक्शन से बाहर आइये और करिये नीतीश के नरक का दर्शन.....
क्या नीतीश बता सकते हैं कि उन्हीं के एक पार्टी के नेता ने कहा था कि सीमा पर जवान मरने के लिए ही जाते हैं.............क्या एक नेता की ये भाषा हो सकती हैं, शर्म..शर्म...शर्म........
क्या नीतीश बता सकते हैं कि जिस नरेन्द्र मोदी ने बिहार के बाढ़ पीड़ितों के लिए गुजरात की जनता की ओर से सहयोग राशि भेजी थी, जिसे अपनी घमंड के चलते नीतीश ने लौटा दिया था, वे आज किस मुंह से नरेन्द्र मोदी से बिहार हित में सहयोग की बात करते हैं, केन्द्र से पैसे मांगते हैं, अरे नीतीश कुमार थोड़ा सा शर्म करो.....................नहीं तो लोग कहेंगे
चलनी दूसे सूप के, जिन्हें बहत्तर छेद.......
नीतीश का घमंड तोड़िये...........नया विकल्प चुनिये.........
बिहार हित में मतदान कीजिये.......
न लालू...न नीतीश.......
जनता बदलेगी बिहार की तकदीर.........
जनहित में जारी..............

Thursday, June 4, 2015

हे प्रभु.........ये आप क्या कर रहे हैं.........


रेलवे की अच्छे दिनों की बात करनेवालों महानुभावों, रेल मंत्रियों और रेलवे के वरीय अधिकारियों क्या इस देश में राजधानी, शताब्दी, दूरंतो और गरीब रथ के रेलयात्रियों को ही इस देश में रेल यात्रा करने का अधिकार हैं......आखिर हम गरीब रेल यात्रियों पर आपका ध्यान कब जायेगा, जो मेल एक्सप्रेस या सुपरफास्ट ट्रेनों से यात्रा करते हैं। मुझे जब भी नई दिल्ली से रांची आने का मौका मिला तो पाया कि दिल्ली से आनेवाली झारखंड स्वर्ण जयंती सुपरफास्ट एक्सप्रेस कभी भी समय पर रांची नहीं पहुंची, जबकि दिल्ली से ही आनेवाली राजधानी व गरीब रथ हमेशा समय पर पहुंचती है.......आखिर क्या वजह है भाई ये तो रेलवे के अधिकारियों और रेलमंत्रियों को बताना ही चाहिए............
हमने तो सोचा कि यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार था, इसलिए ऐसा होता था पर एनडीए की सरकार ने कौन सा हमलोगों के लिए पहाड़ तोड़ दिया इन एक साल में कि हम उनकी आरती उतारें.............
जरा आज देखिये 12874 अनन्तविहार-रांची एक्सप्रेस की स्थिति। 3 जून को बताया गया कि ये गाड़ी अनन्तविहार से 11.30 बजे रात्रि में खुलेगी, फिर हुआ कि ये गाड़ी 4 जून को 1.30 बजे सुबह खुलेगी, यानी जिस गाड़ी को 3 जून को 7.45 सायं में खुलना था, वो गाड़ी दूसरे दिन 1.30 बजे सुबह खुल रही हैं। वाह रे रेलवे विभाग, हद तो तब हो गयी कि 4 जून की सुबह 6.15 बजे से लेकर अभी 9.15 तक ट्रेन का अपडेट ही रेलवे रनिंग स्टेटस में नहीं है। यानी गाड़ी कहां हैं, पता ही नहीं चल रहा हैं, ट्रेन जमीन पर हैं कि हवा में हैं या आकाश में हैं, पता ही नहीं लग रहा। इस गाड़ी से मैंने जब भी यात्रा की हैं, हमने पाया हैं कि ये गाड़ी चाहे समय पर अन्नतविहार से खुले या 6 घंटे देरी से खुले यह गाड़ी इलाहाबाद पहुंचते-पहुंचते 12 घंटे विलंब हो ही जाती हैं..........भाई इस ट्रेन को किस भूत ने पकड़ लिया हैं, जो कानपुर –इलाहाबाद तक छोड़ता ही नहीं, जबकि ये भूत अन्य गाड़ियों को नहीं पकड़ता। क्या देश में सामान्य नागरिक या गरीब होना अपराध हैं क्या.......गर अपराध हैं तो सारे गरीबों को जेल में क्यों नहीं बंद करा देते......ये कहकर कि तुमलोग राजधानी और शताब्दी में बैठने के लायक ही नहीं, इसलिए तुम्हें जीने का अधिकार ही नहीं.....।
आज देखिये इस ट्रेन को 3 जून को खुलना था, और 4 जून को खुली हैं, 4 जून को रांची पहुंचना था और 5 जून को भी रांची पहुंचेगी या नहीं, कुछ कहा नहीं जा सकता, सुना हैं कि इस ट्रेन को कानपुर के भूतों ने पकड़ लिया हैं क्या कोई ऐसा देश का नागरिक हैं जो कानपुर के भूतों से मुक्त कराकर, इलाहाबाद के रास्ते, इस ट्रेन को रांची पहुंचा दें, क्योंकि इस ट्रेन में फिलहाल यात्रा कर रहे लोग तो भूतों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं, भगवान सुरेश प्रभू को याद कर रहे हैं...............
शर्मनाक....शर्मनाक...शर्मनाक, अच्छे दिनों की बात करनेवालों, तुम्हें जनता कभी माफ नहीं करेगी, हमें क्या चाहिए तुमसे अरे कम से कम ट्रेन तो समय पर चलवाओ, और कुछ नहीं करों तो कम से कम ये तो बता दो कि ये ट्रेन कहां हैं....ट्रेन इन्कवायरी सिस्टम से, क्योंकि मैं तो पिछले तीन घंटों से यहीं देख रहा हूं कि ये ट्रेन रुरा के पास रुकी हैं....बेशर्मी की भी हद हो गयी....आम जनता तो लगता हैं कि इनके द्वारा शिलाखंडों से पीसने के लिए बनी हैं, पीसते चले जा रहे हैं....कल यूपीए ने पीसा और आज एनडीए की बारी है....

Monday, June 1, 2015

मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, बच्चे परिणाम चाहते हैं....

रघुवर जी, आखिर आप ये तो बताएं कि इन बच्चों ने कौन सा पाप किया है कि आपके वरीय पुलिस अधिकारी इनकी बात नहीं सुनते या इनकी वेदना पर अट्टहास करने से बाज नहीं आते..................
हम जहां रहते हैं, वहां एक बहुत ही गरीब घर का बच्चा रहता है, नाम है – लखू। उसने कुछ सपने देखे है, अपने परिवार के लिए, उसे लगता हैं कि अब सपने पूरे होनेवाले है, वह भी तब जब जैप विज्ञापन संख्या – 02/2011 के बोर्ड नं. 1 का मेरिट लिस्ट निकलेगा। लखू जैसे एक नहीं कई लड़के होंगे, जिनकी हैसियत या औकात नहीं कि दिल्ली या और किसी महानगर में जाकर हराम के पैसे कमानेवाले परिवार के बच्चों की तरह आईएएस व आईपीएस की तैयारी कर सकें। हां मैं एक बात दावे के साथ कह सकता हूं कि गर इन्हें मौका मिले और सरकार मदद कर दें, इन बच्चों की, तो यकीन मानिये हराम की कमाई खानेवाले इन बापों के बेटे किसी जिंदगी में अपने बाप के सपनों को पूरा नहीं कर पायेंगे, क्योंकि तब इन सभी पर इन गरीब ईमानदार बापों के बेटों का कब्जा होगा, पर जरा देखिये इन बच्चों के साथ क्या हो रहा हैं। ये बच्चे प्रतिदिन कभी पुलिस उप महानिरीक्षक जैप, कभी प्रभारी पुलिस उप महानिरीक्षक(कार्मिक), कभी सुमन गुप्ता, पुलिस उप-महानिरीक्षक, जैप, कभी महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक का कार्यालय, कभी न्यायालय तो कभी मुख्यमंत्री जनता दरबार, यानी कौन ऐसी जगह हैं, जहां इन बच्चों ने अपने हक के लिए दरवाजा नहीं खटखटाया, पर क्या मजाल कि जिन्हें अपने कार्यों को गति देना हैं, उनके कान पर जूं तक रेंगे। भला इनके बच्चों से संबंधित मामला थोड़े ही हैं, ये तो उन बच्चों का भविष्य हैं, जो जहां जन्म लेते हैं, वहीं मर जाते हैं.....इसलिए ऐसे भी मरेंगे, वैसे भी मरेंगे। राज्य सरकार के वरीय पुलिस कर्मियों की बेशर्मी देखिये, जब ये बच्चे सूचना के अधिकार के तहत, सूचनाएं मांगते हैं, तो उनका जवाब होता हैं, प्रक्रिया जारी हैं, अरे भ्राई ये प्रक्रिया आखिर कब समाप्त होगा। इसकी कोई समय सीमा भी हैं या नहीं, या ढपोर शंखी हो गये तुम लोग। गर तुम किसी समय सीमा पर कोई परिणाम नही दे सकते तो फिर इस प्रकार का विज्ञापन क्यों निकालते हो, मत निकालो विज्ञापन और जैसा तुम हमेशा करते हो, बैक डोर से पैसे लेकर वो सारे कुकर्म कर डालों, जिसके लिए झारखंड जाना जाता है....। क्या इसके लिए इन बच्चों ने मना किया था क्या। हद तो तब हो जाती हैं, जब बच्चे किसी अखबार के संवाददाता के पास पहुंचते हैं, और वो संवाददाता भी पैसे की बात कर देता हैं और नहीं देने पर उलजूलूल छाप देता हैं।
आखिर जिन बच्चों ने जैप विज्ञापन संख्या 02/2011 का परीक्षा दिया था, जिसमें तीन बोर्ड बनाये गये थे, उसमे बोर्ड -1 एक परिणाम कब आयेगा, क्या सरकार बतायेगी, या परिणाम निकलवाकर उन बच्चों के सपनों को पूरा करेंगी, उनके भविष्य सुधारेंगी या उनके हाल पर छोड़ देंगी.......मुख्यमंत्री रघुवर दास जी, इन बच्चों को आप से उत्तर चाहिए और ये उत्तर केवल उन बच्चों को ही नहीं, मुझे भी चाहिए ताकि मैं जान सकूं कि ये सरकार कितनी संवेदनशील है..................

विजय ने ताल ठोंकी और शेखर मेयर बन गया............



मैंने धनबाद को पत्रकारिता के दौरान दो-दो बार सेवाएं दी। एक जब दैनिक जागरण का ब्यूरो प्रमुख बना तब और दूसरी बार जब ईटीवी ने धनबाद की बागडोर सौंपी। नजदीक से देखा हूं, धनबाद को। यहां ए के राय जैसे महान वामपंथी विचारक व विजय झा जैसे देशभक्त लोग है तो  दूसरी ओर कई लंपटों का समूह भी हैं, जो येन-केन-प्रकारेण धनबाद को अपनी स्वार्थ के लिए बर्बाद करता रहता हैं और इसी को वो समाज सेवा के रुप में आमजन को प्रदर्शित भी करता हैं। आश्चर्य इसलिए भी कि जनता भी कभी-कभी उसके इस झांसे में आकर स्वयं को गौरवान्वित भी महसूस करती है। चलिए छोड़िये इन बातों को, अब हम बात करते हैं, इस बार हुए धनबाद के मेयर चुनाव की। इस बार मेयर के चुनाव में चंद्रशेखर अग्रवाल भारी मतों से विजयी हुए हैं। चंद्रशेखर अग्रवाल विशुद्ध रुप से भाजपाई हैं। मेयर चुनाव जीतने के बाद फिलहाल गणेश परिक्रमा करने के लिए रांची आये हुए हैं। गणेश परिक्रमा में ये सर्वप्रथम भाजपा कार्यालय जाकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और कार्यालय में वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मिल चुके हैं। तदुपरांत मुख्यमंत्री आवास जाकर मुख्यमंत्री रघुवर दास की परिक्रमा भी कर चुके हैं। सूत्रों की माने तो चंद्रशेखर अग्रवाल रघुवर गुट से आते हैं, जबकि मेरा मानना हैं कि राजनीति में कोई गुट नहीं होता, जब आप शक्तिशाली होते हैं तो सभी आपके गुट के होते हैं और जब दुर्बल होते है तो आपसे लोग कन्नी कटाते है। स्थिति ऐसी होती हैं कि वे दुर्बल व्यक्ति अथवा नेता के साथ फोटो खीचाना तो दूर, गर पुराना फोटो भी होता हैं तो उसे ऐसा दबा कर रख देते हैं कि कहीं कोई उस फोटो को फेसबुक वाल पर डालकर उसकी राजनीति की नैया न डूबा दें।
फिलहाल चंद्रशेखर अग्रवाल ने मेयर का चुनाव जीतकर धनबाद के सांसद पी एन सिंह और धनबाद के विधायक राज सिन्हा की औकात तो जरुर बता दी, क्योंकि इन दोनों नेताओं ने चंद्रशेखर अग्रवाल को हराने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दी थी। यहीं नहीं जिस चंद्रशेखर अग्रवाल को खुद को भाजपा नेता-कार्यकर्ता कहने में गर्व महसूस होता था। उस चंद्रशेखर अग्रवाल को दिन में तारे दिखाई पड़ने लगे थे, जब भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनसे दूरियां बनाकर, पीएन सिंह और राज सिन्हा समर्थक प्रत्याशी राज कुमार अग्रवाल को जीताने के लिए पील पड़े। बेचारे अब शेखर क्या करें। वस्तुतः सांसद पी एन सिंह और विधायक राज सिन्हा को चंद्रशेखर अग्रवाल से भविष्य में होनेवाले संकट को लेकर स्पष्ट खतरा महसूस हो रहा था। इन दोनों को लग रहा था कि गर चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीते तो कहीं ऐसा नहीं कि भाजपा आनेवाले दिनों में सांसद का टिकट अथवा विधायकी का टिकट चंद्रशेखर अग्रवाल के लिए सुरक्षित न कर दें, क्योंकि सांसद के रुप में पीएन सिंह का कार्य धनबाद की जनता के अनुरुप नहीं रहा हैं, और न ही संसद में इन्होंने कोई ऐसा कमाल दिखाया हैं, जिस पर धनबाद की जनता गर्व कर सकें। राज सिन्हा तो चूंकि पहली बार विधायक ही बने हैं, इसलिए अभी इन पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, पर इतना तो तय हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल की जीत, पी एन सिंह और राज सिन्हा की नींद हराम कर दी हैं। आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल को जीत कैसे मिली। उसका मूल कारण – विजय झा का शेखर अग्रवाल के लिए चाणक्य की भूमिका में प्रकट होना और पूरे चुनाव की जिम्मेदारी और उसका संचालन ही नहीं, बल्कि पूरी ईमानदारी से इसकी मानिटरिंग करना। चूंकि विजय झा, एक समय भाजपा जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं, साथ ही उनकी छवि निर्विवाद रही हैं, आज भी वे धनबाद में एक प्रतिष्ठित समाजसेवक के रुप में याद किये जाते है। पूर्व में मेयर के चुनाव में उनकी पत्नी शिवानी झा मुख्य प्रतिद्वंदी रही, इसलिए पूर्व का अनुभव भी विजय झा के साथ रहा। जिसका इस्तेमाल, उन्होंने इस चुनाव में किया और नतीजा सामने है। चंद्रशेखर अग्रवाल मेयर का चुनाव जीत गये। संभव हैं आनेवाले समय में वे सांसद और विधायकी पर भी दावा ठोंके पर ये तो भविष्य की बात हैं। हमें लगता हैं कि भाजपा को भी अब विचार करना होगा, क्या वो कांग्रेस की बी टीम होगी, या स्वयं को परिमार्जित करेगी, शुद्ध करेगी। उसे आत्ममंथन करना होगा कि  आखिर चंद्रशेखर अग्रवाल की जगह राज कुमार अग्रवाल भाजपाईयों की पसंद क्यूं बन गये। आखिर विजय झा जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति का भाजपा से मोहभंग क्यों हो गया। गर एक एक कर इसी तरह से योग्य व सम्मानित व्यक्ति अपमानित होकर, भाजपा से निकलते गये तो इसमें कोई दो मत नहीं कि आनेवाले समय में जो जितना बड़ा भ्रष्ट वो उतना बड़ा भाजपा का कैंडिडेट होगा, फिर भाजपा का आम नागरिकों के हृदय में क्या स्थान होगा। भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं को अभी से ही आत्ममंथन करना शुरु कर देना चाहिए। साथ हीं, हमें लगता हैं कि चंद्रशेखर अग्रवाल को भी समझ में आ गया होगा कि भाजपा क्या हैं, क्योंकि ये जीत उन्हें भाजपाईयों ने नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति ने दिलायी, एक ऐसे जनसमूह ने दिलायी, जिसका भाजपा से प्यार नहीं था, बल्कि प्यार था, सम्मान से, प्यार था प्रतिष्ठा से, प्यार था धनबाद के स्वाभिमान और विकास से। ये बातें चंद्रशेखर अग्रवाल को गांठ बांधकर रख लेना चाहिए, नहीं तो कालांतराल में क्या स्थिति होगी, वो समझ सकते हैं, क्योंकि जनता किसी की भी जागीर नहीं होती..........

Thursday, May 28, 2015

लालू का दृढ़विश्वास और नेतागिरी के फायदे...........

रांची से प्रकाशित एक नीतीश भक्त अखबार के पिछले पृष्ठ पर एक समाचार पढ़ा, पढ़कर मन अति प्रसन्न हुआ। समाचार लालू प्रसाद से संबंधित था, जिसमें लालू का बयान “जयललिता की तरह मैं भी होउंगा आरोपमुक्त” छपा था। मेरा भी दृढ़ विश्वास हैं कि लालू आरोपमुक्त होंगे, क्योंकि भारत देश में नेता या उसका परिवार कभी अपराधी हो ही नहीं सकता।
उसका प्रमाण हैं कि जिस प्रकार आजादी के पूर्व किसी अंग्रेजों को उसके किये की सजा नहीं मिली, ठीक उसी प्रकार आजादी के बाद देश का कोई भी नेता आरोप सिद्ध होने पर जेल में अपने किये की सजा नहीं काटी। ऐसे भी हमारे देश में एक संत हुए नाम था – गोस्वामी तुलसीदास, जिन्होंने अपने कालजयी पुस्तक श्रीरामचरितमानस में लिखा है “समरथ के नहिं दोषु गोसाईं” अर्थात् सामर्थ्यवानों में दोष नहीं होते, इसलिए इन्हें सजा नहीं मिलती, तो सजा मिलती किसे है। स्पष्ट हैं कि, जो सामर्थ्यवान नहीं है। हमारे देश में आप गर नेता हैं तो आप कितना भी घोटाला या महाघोटाला कर लीजिये, कुछ दिन या वर्षों तक हंगामा होगा, जिस नेता पर आरोप होगा कुछ वर्षों के लिए जेल हो आयेगा, पर अंततः वह दोष मुक्त हो जायेगा, क्योंकि वह नेता है। उसे निचली अदालत गर सजा सुना भी दें, तो उपरि अदालत में वह निश्चित छूट जायेगा, क्योंकि वह नेता है।  उदाहरण अनेक है, पर एक उदाहरण ताजा – ताजा सुनाता हूं, एक अपराध में राजद और लालू के चहेते नेता पप्पू यादव को एक निचली अदालत ने दोषी ठहराते हुए सजा सुना दी और फिर कुछ ही महीनें बाद एक उपरि अदालत ने उन्हें दोष मुक्त कर दिया। इसी प्रकार सीबीआई की एक अदालत ने लालू यादव को दोषी ठहराते हुए सजा सुना दी, पर जरा देखिये वे आराम से कैसे राजनीति कर रहे हैं और अपने शरणागत आये जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश के समस्त कष्टों को हरने के लिए एड़ी-चोटी एक कर दिये हैं। जबकि ये वहीं नीतीश हैं जो लालू के खिलाफ खूब अनाप शनाप बयान देते थे। ये वहीं नीतीश हैं जो लालू को गद्दी से हटाकर सत्तासीन हुए। ये वहीं नीतीश हैं, जो लालू को चारा घोटाले में जेल में सड़ाने के लिए क्या नही किये। ये वहीं नीतीश हैं जो बिहार को जंगल राज से मुक्त करने के लिए बिहार की जनता को आह्वान किया और आज उसी नीतीश को लालू में खुदा का नूर नजर आ रहा हैं। मैं तो ये भी देख रहा हूं कि जो अखबार कल तक लालू का घोर विरोधी था, वह भी नीतीश की भक्ति में आसक्त होकर लालू की खूब वाहवाही कर रहा हैं, अर्थात् इसी को कहते हैं समय अथवा काल। शायद रहिमन ने ऐसे ही लोगों के बारे में ये पंक्तियां लिख डाली हो –“रहिमन चुप हवे बैठिये, देखि दिनन के फेर, जब अच्छे दिन आइहे, बनत न लगिहे देर”। क्या बात हैं लालू जी, समय आपका आ गया हैं कल का नीतीश आपके चरणों को चूम रहा हैं।  कल का आपका विरोधी अखबार और संपादक आपके यशोगान गा रहे हैं। इसका मतलब क्या हैं, जल्द ही आप ने जो सपना देखा हैं –पीएम बनने का, वो भी ख्वाब पूरे हो जायेंगे, क्योंकि आप असली यादव और उसमें भी विशुद्ध नेता है। मुलायम-शरद-लालू की जोड़ी जरुर गुल खिलायेगी। बस बिहार में गजब ढाने की तैयारी को चरम पर ले जाना है।
आपके इसी सोच पर लगता हैं कि भारत के कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने अपनी नौकरियां छोड़कर नेता बनने में ज्यादा रुचि दिखाई, क्योंकि उन्होंने अपने अनुभवों से पाया कि जो जितना बड़ा नेता, वो उतना बड़ा चोर अथवा घोटालेबाज और उसकी चोरी अथवा घोटाले को सिद्ध कर पाने में ताउम्र अधिकारी लगा दें, सिद्ध नहीं कर पायेंगे गर किसी ने सिद्ध कर भी दिया तो न्यायालय से वे बचकर निकल जायेंगे। ऐसे में आईएएस व आईपीएस की नौकरी गयी तेल लेने। नेता बनो, माल कमाओ। देश का विकास जाये भाड़ में, अपने खानदान के लिए आठ पुश्त तक ऐसा जुगाड़ कर लो कि कोई बाल बांका न कर सकें और ऐसा करने में कुछ हो भी गया तो क्या फर्क पड़ता हैं। थोड़े ही फांसी की सजा होगी या कुछ हो जायेगा, क्योंकि नेता तो नेता होता हैं, उसे अधिकार हैं, सब कुछ करने का, और नेता कभी गलत नहीं होता, नेता कभी दोषी नहीं होता, नेता तो प्रकृति का पैदा किया हुआ वो शूरमा हैं, जिसके बारे में स्वर्ग में बैठा भगवान भी उसके खिलाफ फैसला नहीं ले सकता। तभी तो मैं देख रहा हूं कि झारखंड में भी कई आईएएस और आईपीएस अधिकारी नेता बन गये। अखबार वाले भी नेता बन गये। गुंडे और अपराधी तो पहले से ही लाइन में हैं, क्योंकि वे नेता के असली आदर्शों को खूब समझते हैं। हां एक चीज जरुर देखने को मिल रही हैं कि अब समाज के कई चालाक लोगों ने नेता के इस अद्भुत गुणों को देख, अब खुद को भी नेतागिरी में फिट करने की जुगत लगा दी हैं।

Thursday, May 14, 2015

संघ और प्रभात खबर के बीच छिड़ी जंग.........


पिछले दिनों 9 मई को प्रभात खबर के पृष्ठ संख्या 2 में पढ़ने को मिला कि समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार, झारखंड द्वारा इस वर्ष से शुरु किये गये पं. दीनदयाल राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार के लिए प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक (झारखंड) अनुज कुमार सिन्हा को चयन किया है। श्री सिन्हा को ये पुरस्कार 12 मई को एटीआई सभागार में प्रदान किया जायेगा। पुरस्कार के लिए एक चयन समिति बनायी गयी। उस चयन समिति की बैठक में ये निर्णय लिया गया, कि इस पुरस्कार के लिए प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा ही योग्य है, दूसरा कोई नहीं.....!

मुझे जैसे ही ये समाचार पढ़ने को मिला, मेरा माथा ठनका। भला ये कैसे हो सकता हैं कि संघ प्रभात खबर में कार्यरत इतने बड़े अधिकारी को वह भी संपादकीय स्तर का, उसे सम्मानित कर दें, क्या संघ का हृदय परिवर्तन हो गया.....या कुछ दूसरी बात हैं......मैंने पता लगाने की कोशिश की और 12 मई तक इँतजार किया। जैसे ही 12 मई बीता, मुझे ये बात जानने में देर नहीं लगी कि संघ का हृदय परिवर्तन हुआ या कुछ दूसरी बात हैं।

संघ जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कहा जाता है। अधिकांश लोगों का मानना हैं कि ये पूर्णतः चरित्र निर्माण करनेवाली एक राष्ट्रभक्त संगठन है। जिसे लेकर देश-विदेश के कई महापुरुषों ने अपने संभाषणों में इस संगठन के क्रियाकलापों पर सुंदर प्रतिक्रियाएं दी, जिसे कई अखबारों और चैनलों ने जगह भी दी। ये अलग बात हैं कि कुछ अखबार/चैनल पूर्व से ही अपने मन में संघ के प्रति नकारात्मक भाव रखते हुए अनाप-शनाप छापते/ दिखलाते रहते हैं।

इधर कुछ महीनों से प्रभात खबर ने संघ के प्रति छद्म नाम से बहुत कुछ छापे हैं, हम उस समाचार को न तो गलत ठहरा सकते हैं और न ही सही, सच्चाई क्या है, ये जांच का विषय हैं। हर समाचार में गलतियां और हर समाचार में सच्चाईयां नहीं होती। कुछ समाचार समय, काल और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अखबार व चैनल वाले छापते व दिखाते रहते हैं, इसमें उनका निहितस्वार्थ छुपा रहता हैं, जिसे वे निहितस्वार्थ न कहकर देश व समाज के प्रति अपना कर्तव्य का निर्वहण करने का ढोंग समाज के समक्ष रखते हैं।

सूत्र बताते हैं कि इधर संघ के खिलाफ प्रभात खबर का लगातार होता दुष्प्रचार से संघ ने एक नीति बनायी, कि वह न तो अखबार के खिलाफ आंदोलन चलायेगा और न ही न्यायालय का दरवाजा खटखटायेगा। हां इतना जरुर करेगा कि वह स्वयंसेवकों से अनुरोध करेगा कि वे प्रभात खबर का बहिष्कार करना शुरु करें। आज भी आप देख सकते हैं कि संघ के ऐसे बहुतेरे स्वयंसेवक हैं, जो संघ के लिए अपना जान छिरकते हैं, उन्होंने प्रभात खबर को अपने घर में आने पर प्रतिबंध लगा दिया हैं। निवारणपुर स्थित संघ मुख्यालय में तो आप प्रभात खबर कभी देख ही नहीं सकते और न ही इसकी आनुषांगिक संगठन के कार्यालयों में।

अब बात यहां आती हैं कि जब संघ मुख्यालय में प्रभात खबर नहीं आता तो फिर प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा को पुरस्कृत करने की बात कहां से आ गयी, वह भी संघ की अनुषांगिक संगठन, समाचार एजेंसी, हिन्दुस्थान समाचार की ओर से..........। ये बात किसी भी स्वयंसेवक को पच नहीं रही थी, सभी स्वयंसेवक इसका विरोध कर रहे थे। कुछ दबीं जुबां तो कुछ खुलकर विरोध कर रहे थे। आखिर ये कैसे हो गया। क्या राज्य में सचमुच पत्रकारों का अकाल पड़ गया हैं। क्या अब जब भी पुरस्कार की बात आयेगी तो प्रभात खबर से ही लोग आयेंगे, पुरस्कार लेने। यानी जितने स्वयंसेवक, उतनी ही बातें।

सूत्र बताते हैं कि जैसे ही पं. दीन दयाल राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार देने की बात झारखंड में आयी। हिन्दुस्थान समाचार के ब्यूरो चीफ ने हिन्दुस्तान समाचार पत्र के चंदन मिश्र और दैनिक जागरण के कमलेश रघुवंशी को बुलाकर एक बैठक की और आनन-फानन में प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा को पुरस्कार देने की घोषणा कर डाली। फिर अखबारों व चैनलों से इस बात की जानकारी जनता तक पहुंचा दी गयी। जिसे संघ, हिन्दुस्थान समाचार और विश्व संवाद केन्द्र के उच्चाधिकारियों को नागवार गुजरी और उसी वक्त तय हो गया कि किसी भी हालत में प्रभात खबर के अनुज कुमार सिन्हा को 12 मई को एटीआई में आयोजित कार्यक्रम में सम्मानित नहीं किया जायेगा, हालांकि पुरस्कार दिलवानेवालों ने भी कम एड़ी-चोटी एक नहीं की। नाना प्रकार के तिकड़म लगाये पर सफलता मिलती नहीं दिखी। खैर 12 मई समयानुसार आया, कार्यक्रम आयोजित हुए। संघ, विश्व संवाद केन्द्र, हिन्दुस्थान समाचार, भाजपा और संघ के कई आनुषांगिक संगठन के लोग पहुंचे पर उन्हें सम्मान नहीं मिला, जिन्हें सम्मान देने की घोषणा की गयी थी.......। इससे प्रतिष्ठा किसकी गयी.......? सम्मान लेनेवाले की, सम्मान दिलाने की घोषणा करनेवाले की या किसी और की। आप अपने ढंग से इसकी व्याख्या कर सकते हैं।

इधर आज 14 मई को हमने चयन समिति के सदस्य चंदन मिश्र से बात की, तब उनका कहना था कि सम्मान समारोह का कार्यक्रम अभी स्थगित हुआ हैं, पुरस्कार देने की घोषणा की तिथि बाद में की जायेगी, पर संघ के सूत्र बताते हैं कि ऐसा संभव नहीं। 12 मई को संपादकीय पृष्ठ पर “सांप्रदायिकता के जहर से सावधान” नामक संपादकीय और 13 मई को पवन के. वर्मा के आलेख “भगवाकरण की घातक प्रक्रिया” में संघ के आनुषांगिक संगठनों को लंपट समूह की संज्ञा देने पर भी संघ को आपत्ति है। संघ का कहना हैं कि प्रभात खबर आखिर ये सब लिख और पढ़ा कर क्या साबित करना चाहता हैं। ये समझ से परे हैं। संघ के स्वयंसेवकों का कहना हैं कि संघ पर वैचारिक हमले हो, उसका स्वागत हैं, पर गलत, मनगढंत, अपशब्दों का प्रयोग, अखबार के मानसिक दिवालियापन की ओर संकेत करता है।

दूसरी ओर संघ समर्थकों का कहना हैं कि जब संघ इतना गलत हैं तो फिर इसके आनुषांगिक संगठनों से खुद सम्मानित होने का भाव रखना, ये क्या न्यायोचित हैं? आखिर अपने संपादक के पुरस्कृत होनेवाली खबर प्रभात खबर ने क्यों छापे? उसे तो पुरस्कार यह कहकर ठुकरा देना चाहिए था कि आप तो सांप्रदायिक हो, और हम भगवा सोच वाले, सांप्रदायिक संगठनों अथवा उसके आनुषांगिक संगठनों से अनुप्राणित अथवा पुरस्कृत नहीं होते। यानी यहां तो दो प्रकार की बातें हो रही हैं, संघ को गाली भी दे रहे हो और संघ से पुरस्कृत होने का स्वार्थ भी रखते हो। प्रभात खबर को इस विषय पर अपनी सोच बदलनी होगी। क्योंकि दोनों चीजें, एक साथ नहीं चल सकती।

इधर जहां मैं रहता हूं, वहां प्रभात खबर समर्थकों की संख्या बहुत थी, पर अब उनका भी विचार बदल रहा है। एक सज्जन ने कहा कि प्रभात खबर पर्यावरण बचाओ मुहिम चला रहा हैं और लिखता हैं कि झारखंड से 38 पहाड़ गायब हो गये। भला झारखंड तो पठारी इलाका हैं, यहां पहाड़ी हो सकते हैं, पहाड़ कहां से आ गया भाई। बचपन में जब झारखंड, संयुक्त बिहार में था तब पढ़ने को यहां मिलता था कि बिहार की सबसे ऊंची पहाड़ी पारसनाथ की पहाड़ी है, जो अब झारखंड की सबसे उंची पहाड़ी है। ऐसे में जब यहां पहाड़ हैं नहीं, तो पहाड़ गायब कैसे हो गये।

दूसरी बात जो प्रत्येक दिन अखबार के चार पेज की लाइफ रांची देखने को मिलती हैं, उसके टाइम पास वाले पृष्ठ पर अर्धनग्न नायिकाओं के चित्र परोसे जाते हैं, वो किसलिए परोसे जाते हैं, उससे कौन सा समाज, प्रभात खबर तैयार कर रहा हैं, समझ में नहीं आ रहा।

इसलिए संघ, कैंपेन चलाये, अथवा न चलाये। ऐसे भी प्रभात खबर को लेकर जनता के विचार बदल रहे है, जनता के पास अब विकल्प बहुतेरे हैं, उन विकल्पों पर जनता गौर कर रही हैं, परिणाम जल्द ही आयेगा, कोई ज्यादा दिमाग नहीं लगाये...............

Sunday, May 10, 2015

काश, गब्बर झारखंड आता और यहां के 10 पत्रकारों को भी अगवा करता........



काश, गब्बर झारखंड आता और यहां के 10 पत्रकारों को भी अगवा करता और अपना एक मैसेज पत्रकारों के लिए भी छोड़ देता......। पूरे देश में अक्षय कुमार की एक नई फिल्म “गब्बर इज़ बैक” की धूम है। फिल्म हैं भी सटीक और दिल पर राज करनेवाली, इसलिए फिल्म को देखने के लिए विभिन्न सिनेमा हॉलों व मल्टीप्लेक्सों में भीड़ जूट रही हैं। फिल्म के डायलॉग भी जानदार है। एक डायलॉग – “इस कॉलेज में पुलिस एलाऊ (ALLOW) नहीं हैं”, काश हमें ये डायलॉग भी सुनने को मिलता कि इस संस्थान में या इस घर में पत्रकारों का आना निषेध हैं। हमें लगता हैं कि आज नहीं तो कल ये सुनने को अवश्य मिलेगा। बस थोड़ा इंतजार कीजिये।
आखिर मैं पत्रकारों को अगवा करने की बात गब्बर से क्यों किया उसका मूल कारण हैं. सिर्फ ऐसा नहीं है जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है कि डॉक्टर और उनका मेडिकल संस्थान, पुलिसकर्मी व नेता या नगर निगमकर्मी, जिला का कलक्टर अथवा रियल ईस्टेट (REAL ESTATE) का मालिक ही भ्रष्ट होता है। हमें तो इनसें ज्यादा भ्रष्ट झारखंड के पत्रकार नजर आते हैं। जो जितने बड़े पद पर बैठा हैं, वो उतना ही बड़ा भ्रष्ट हैं।
जरा नजर डालिये............।  यहां के पत्रकारों/ अखबारों/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मालिक व संपादकों की टोली क्या कर रही हैं।
क.        इनका पहला काम मुख्यमंत्रियों अथवा वरीय प्रशासनिक अधिकारियों को ब्लैकमेल करना अथवा चाटुकारिता कर राज्य के खनिज संसाधनों पर कब्जा जमाना हैं।
ख.       विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा सरकार के मनोबल को तोड़ना और उनसे मुंहमांगी विज्ञापन प्राप्त करना है।
ग.         विभिन्न प्रकार के चिरकुट टाइप पंडे पुजारियों की नई पौध को सृजन करना और उनसे मुंहमांगी रकम वसूलना, साथ ही उन्हें अपने अखबारों में जगह देना/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा उन्हें अपने संस्थानों में पैसे लेकर एक स्लॉट बेचना और इनके द्वारा समस्त जनता को दिग्भ्रमित करना है।
घ.         साथ ही राज्यसभा के लिए खुद को प्रोजेक्ट करना-कराना, मुख्यमंत्री का प्रेस एडवाइजर बनना, राजनीतिक सलाहकार बनना, सूचना आयुक्त बनना, विभिन्न प्रकार के प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों को यत्र – तत्र, मालदार जगहों/विभागों में स्थानांतरण करना-कराना प्रमुख है।
ङ.           यहीं नहीं सरकारी एवार्ड/गैर सरकारी एवार्ड/कभी-कभी खुद को प्रोजेक्ट करने के लिए खुद ही एवार्ड लेने के लिए कार्यक्रम आयोजित करना-कराना भी शामिल है।
च.         अपने परिवार के सदस्यों/बेटे-बेटियों को सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों में नियोजित करने के लिए अनैतिक तरीका अपनाना और सरकार में शामिल मंत्रियों का अपने अखबारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से यशोगान गाना भी प्रमुख है।
छ.        यहां के 90% पत्रकार हैलमेट नहीं पहनते और ना ही गाड़ियों के वैध कागजात लेकर चलते हैं। ये तो उलटे ही यातायात नियमों को तोड़कर यातायात पुलिस को देख लेने की बात करते है।
ज.        विजुयल लेने के लिए तोड़-फोड़ करना-कराना और फिर खुद को महिमामंडित कराने का काम भी यहां के पत्रकारों का अति पवित्र कार्य बना हुआ हैं।
झ.       विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन कराना और अनैतिक तरीके से पैसे इकट्ठे करना। उनलोगों से पैसे लेना, जिन्होंने राज्य की जनता से ठगी की और फिर उन ठगों का अखबारों और चैनलों में महिमामंडित करना.....
मतलब स्पष्ट हैं अक्षय भाई, झारखंड के इन पत्रकारों की कारगुजारियां आप तक नहीं पहुंची थी क्या.....या आप यहां के नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों की तरह, यहां के पत्रकारों से डर गये। हालांकि हम जानते हैं, आपको सॉरी से नफरत हैं, जब सॉरी से नफरत हैं तो आप इनसे डरेंगे क्या? आप गब्बर बन गये। बहुत ही सुंदर रुप, गब्बर का लेकर आये हैं। शोले के अमजद खान वाले गब्बर का तो आपने वाट लगा दी और शैतान गब्बर को भगवान गब्बर बना दिया। ये चारित्रिक उत्थान का विषय है। आपने संवाद भी बोला हैं कि “यहां से ठीक पचास-पचास कोस........ नहीं तो गब्बर आ जायेगा” लेकिन हमें नहीं लगता कि यहां आपका डर पत्रकारों में हैं। हां मजा तो तब आ जायेगा, जब यहां के 10 भ्रष्ट पत्रकारों की सूची में पहला नंबर किसका होगा....उसके नाम के लिए काश एक अधिसूचना आपकी ओर से जारी हो जाती..............। सचमुच गब्बर भाई आप कहां हो......। झारखंड में आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा............GABBAR IS BACK.