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Sunday, December 2, 2012

ए गोपाल भैया, हमरा डर लागता, पहुंचा द...................................

ये उस वक्त की बात हैं, जब मेरी उम्र करीब छः - सात साल रही होगी। मां - बाबुजी प्रतिदिन रात के वक्त जब हम सोने जाते, तो एक से एक कहानियां सुनाते। वो कहानी निरंतर, मेरे लिए मार्गदर्शन का काम करती। आज भी, जब मैं एकांत में होता हूं, तो उनकी यादें अनायास, आती रहती हैं, साथ ही जीने का मार्ग प्रशस्त करती हैं। जीवन कैसा हो, किसके लिए हो, ये भी सहज भाव से बता जाया करती हैं। एक बार जब मुझे किसी बात को लेकर बहुत डर लगा, तो मेरी मां ने मुझे समझाया कि भगवान तो सभी जगह हैं, वो हमेशा हमारी सहायता को तत्पर रहते हैं, तो फिर डर किस बात का। बस करना सिर्फ इतना हैं, कि उस प्रभु को हमेशा याद रखना हैं। 
प्रभु को याद रखना हैं, ये कहते हुए, मेरी मां ने मुझे एक कहानी सुनाया जो आज भी मुझे प्रेरित करती हैं। चूंकि मां ग्रामीण परिवेश से थी, तो उसकी बातों में ग्रामीण भाषाओं और शब्दों के भाव स्पष्ट रुप से दिखाई पड़ते। मां कहानियां सुनाती और कहानी सुनने के क्रम में, मैं हुंकारी भरे जाता। इधर मां कहानी सुनाने के क्रम में बड़े ही सहज भाव से मेरे सर पर हाथ फिराया करती, तथा मेरे बालों में अपनी उँगलिया फिराया करती। मां का कहानी कहना और हाथों की जादूई स्पर्श, हमें स्वर्ग का आनन्द करा दिया करती। मैं भी उस वक्त रात की प्रतीक्षा करता और खुब ध्यान से मां के द्वारा कही गयी कहानियों को अपने हृदय में भरा करता। 
जाड़े की सर्द भरी रात, जमीन पर रखे धान के पुआल पर बिछे फटे चीटे खेंदरे, मां के जादूई स्पर्शवाले हाथों की थाप और मां के मुख से निकली कहानियों के बीच कब नींद आ जाती, हमें पता ही नहीं चलता। सुबह हुई, लीजिए, फटी - पुरानी धोती की गांथी बन गयी और उन गांथियों में ठंड महाराज, हमें हरा दें, ऐसा ठंड महराज का मजाल नहीं। भाई गांथी तो गांथी हैं। इसका जवाब कभी भी, आज के हजारों - लाखों रुपये के गर्म कपड़े नहीं दे सकते, ये तो गंवई पोशाक हैं, जो बिहार के आज भी सुदूरवर्ती इलाकों में, ठेठ गांव में देखने को मिल जायेगा।
लीजिए, हमारी यहीं सबसे बड़ी दिक्कत हैं, हम आपको चले थे कहानी सुनाने और लिख रहे हैं पोशाक वृतांत, ये तो बड़ा ही गड़बड़झाला हैं। तो लीजिए आप भी सुनिये, जो मैने अपनी मां से सुना, वो भी छः - सात साल की उम्र में, शायद आपको अच्छा लगे। मां ने कहना शुरु किया कि बहुत पहले, मेरे जैसा ही एक छोटा सा बालक, जिसका नाम श्याम था। वो अपनी मां के साथ रहा करता था। मां उसकी बहुत गरीब थी, पर उसका श्याम पढ़ लिखकर एक चरित्रवान नागरिक बने, ऐसा सोचा करती। एक दिन, उसने पास के ही एक गांव के स्कूल में श्याम का नाम लिखवा दिया, पर दिकक्त ये थी कि स्कूल जाने से लेकर आने तक में घने जंगल का रास्ता पार करना, श्याम के लिए खतरे से खाली नहीं था। एक दिन उसने अपनी मां से कहा कि मां, मुझे स्कूल जाने में डर लगता हैं। तभी उसकी मां ने कहां कि बेटा जहां भी डर लगे, तुम अपने बड़े भैया, गोपाल भैया को पुकारना। वो आयेंगे और तुम्हें घर से स्कूल और स्कूल से घर तक पहुंचा देंगे। फिर क्या था। श्याम की सारी परेशानी दूर होती दिखाई दी। जब वो घर से स्कूल जा रहा था, तभी जंगल के रास्ते में उसे डर सताने लगी, उसने बड़े ही दर्द भरी आवाज से गोपाल भैया को आवाज दी। श्याम ने कहा -- ऐ गोपाल भैया हमरा डर लागता पहुंचा द....। फिर क्या था गोपाल भैया आये और श्याम की छोटी सी अंगूली को पकड़, स्कूल तक पहुंचा दिया। जब स्कूल से वह घर लौटने लगा तब फिर उसने आवाज दी- ऐ गोपाल भइया हमरा डर लागता पहुंचा द....। पुनः गोपाल भैया आये और श्याम को स्कूल से घर तक पहुंचा दिया। इसी प्रकार से ये रोज का क्रम बन गया। श्याम की गोपाल भैया से दोस्ती हो गयी, गोपाल भैया रोज श्याम के साथ घुलमिलकर स्कूल और घर तक पहुंचाने का कार्य करने लगे। 
एक दिन स्कुल में जन्माष्टमी का त्यौहार मनाने का कार्यक्रम रखा गया। स्कूल के प्राचार्य ने सभी बच्चों को अपने अपने घर से दुध लाने का आदेश दिया। सभी बच्चे ने दुध लाने की हामी भरी। दुध से खीर बनाया जाना था, और फिर भगवान कृष्ण को भोग लगाया जाना था, क्योंकि भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव जो था। श्याम ने अपनी मां से दूध की मांग कर दी। बेचारी श्याम की गरीब मां, दुध कहां से लाती, उसके पास तो एक पैसे तक नहीं थे। वो क्या करती। उसने सहज भाव से कह दिया कि श्याम, तुम अपने गोपाल भैया से क्यों नहीं दूध मांग लेते। श्याम ने कहां - ठीक हैं मां ,मैं गोपाल भइया से ही दूध मांग लूंगा। इधर श्याम जैसे ही घर से स्कूल के लिए निकला। उसने गोपाल भैया से दूध की मांग कर दी। गोपाल भैया ने एक छोटी सी लुटिया में दूध की व्यवस्था कर दी। जब श्याम छोटी सी लुटिया में दूध लेकर पहुंचा तो देखा की सभी बच्चे बड़े बड़े पात्रों में दूध लेकर आये थे। स्कूल के शिक्षक, बड़े बड़े पात्रो में लाये गये दूध की अच्छी व्यवस्था कर रहे थे, ताकि वे सारे दूध जल्द से जल्द सुरक्षित रख लिये जाये, पर बेचारे श्याम के पास तो छोटी सी लुटिया हैं, उसकी ओर तो शिक्षक देख ही नहीं रहे। उसने बड़ी ही विनम्रता से शिक्षक से दूध लेने के लिए विनती की। फिर भी शिक्षक ने श्याम की बातों पर ध्यान देना जरुरी नहीं समझा। शायद उन्हें लगा हो कि छोटी सी लुटिया की दूध से कही अच्छा है कि बड़े पात्रों के दूध को जल्द से जल्द रख लिया जाय। शिक्षक द्वारा श्याम की बात को बार - बार अनसूनी कर देने तथा श्याम द्वारा बार - बार अनुरोध किये जाने पर, शिक्षक क्रुद्ध हो, झल्ला उठे। लाओ - अपनी लूटिया, देखते है कितना दूध हैं। शिक्षक ने लूटिया से अपने पात्र में दूध डालना शुरु किया।
ये क्या -- प्रभु की कृपा। लुटिया की दूध तो समाप्त ही नहीं हो रही। सारे के सारे पात्र दूध से भर गये। शिक्षक हैरान, सारे बच्चे हैरान, ये कैसे हो सकता हैं। बात स्कूल के प्राचार्य तक पहुंच गयी। प्राचार्य ने श्याम को बुलाया कि श्याम ये छोटी सी अद्भुत दूध से भरी लुटिया किसने दी। श्याम ने बड़े ही आदर से प्राचार्य को कहा कि गुरुजी ये हमारे गोपाल भैया ने दिया हैं। प्राचार्य ने कहां कि तुम मुझे अपने गोपाल भैया से मिला सकते हो। श्याम ने कहां - क्यों नहीं गुरुजी, वो मेरे साथ हमेशा घर से स्कूल और स्कूल से घर आया जाया करते हैं। प्राचार्य ने कहा कि आज हम तुम्हारे साथ घर चलेंगे। श्याम ने कहा कि क्यों नहीं गुरुजी। आज आप जरुर चले। मेरे गोपाल भैया बहुत ही सुंदर और बहुत ही अच्छे हैं। श्याम ने जैसे ही कहा, प्राचार्य श्याम के साथ स्कूल से श्याम के घर की ओर निकल पड़े। श्याम जैसे ही स्कूल से निकला, उसने आवाज दी - ऐ गोपाल भैया, हमरा डर लागता पहुंचा द। गोपाल भैया ने कहा कि श्याम आज तो तुम्हारे स्कूल के प्राचार्य, तुम्हारे साथ साथ चल रहे हैं, फिर भी डर लग रहा हैं। श्याम ने कहा - भैया, आप हमारे साथ चलिये, हमे बहुत ही अच्छा लगता हैं। गोपाल भैया, श्याम के निश्चल भावयुक्त बातों को सुन प्रभावित हो गये, और श्याम के साथ चल पड़े। इधर स्कूल से घर तक श्याम, अपने प्राचार्य के साथ आ चुका था, पर ये क्या प्राचार्य को, जिनकी तलाश थी, वो तो उन्हें दीखे नहीं। प्राचार्य ने श्याम से शिकायत की, कहा - श्याम तुमने तो कहा था कि तुम गोपाल भैया से मिलाओगे, पर तुमने अपने गोपाल भैया से मिलाया नहीं। श्याम ने कहा कि प्राचार्य महोदय, आपने मेरे गोपाल भैया को देखा नहीं, ये क्या गोपाल भैया, मेरे साथ खड़े हैं, बहुत ही सुंदर, हाथ में मुरली लिए, कितनी इनकी सुंदर छवि हैं, मैं देख रहा हूं, आप नहीं.......।
भगवान मुस्कुराये, शायद, भगवान की मुस्कुराहट कुछ संदेश दे रही थी, कि जो सहज हैं, सरल हैं, सहृदय हैं, उसके लिए, भगवान को तो हर समय आना पड़ता हैं, इसलिए भय कैसा। 
मेरी मां ने कहां- भगवान, सर्वत्र हैं, कोई अनाथ नहीं हैं, सभी सनाथ हैं, इसलिए डर कैसा, उन्हें पुकारो, वो तु्म्हारे साथ हैं। आज भी हमें लगता हैं कि वो तो हमारे साथ हैं। कभी वो अलग, हमसे हुए ही नहीं।

Wednesday, June 29, 2011

काश! हमारे देश के नेता............

काश! हमारे देश के नेता गरीब होते,
वो दिन भर काम करने के बाद बीस रुपये कमा पाते,
उनके कम से कम एक बच्चे होते,
जिन्हें स्कूल भेजने का सपना होता,
वो कम से कम दिन में एक बार बाजार जाते,
बाजार जाकर, आटा, चावल, दाल और सब्जी लाते,
केवल आटा, चावल, दाल और सब्जी ही लाने में,
उनकी कमर टूट जाती,
तो फिर अखबारौं में हमें लगता हैं कि
आज जैसे विज्ञापन नहीं आते,
कि पाकिस्तान, नेपाल और बांगलादेश से भी कम रेट,
गैस सिलिंडरों के दाम भारत में हैं
मिट्टी तेल और डीजल के लिए आज भी अपनी सरकार सब्सिडी दे रही है,
कमाल ये भी हैं
कि भारत की जनता की कमाई अंकगणितीय ढंग से बढ़ती हैं
पर भारत के नेताओं की
कमाई ज्यामितीय प्रणाली सी बढ़ती हैं
एक नेता पांच साल में,
अपनी कमाई 200 से 1785 प्रतिशत तक बढ़ा लेता हैं,
पर हम आज तक ईमानदारी से,
दो जून रोटी भी ठीक से नहीं खा पाये,
ये कहते हैं कि अपने देश में लोकतंत्र हैं
पर ये लोकतंत्र सिर्फ,
इन्हीं के घरों में दिखता हैं,
इनकी बीवियां करोड़ों में नहाती हैं.
गरीबों की तो चिथड़ों में नजर आती हैं
पता नहीं बापू का लोकतंत्र कहां खो गया।
हम आज भी वहीं हैं,
नेता हमारा बहुत दूर निकल गया।
कोई ढूंढ कर ला दो,
मुझे वो गांधी,
जो लाठी लेकर चलता था,
चिथड़ों में दिखता था
अपना चेहरा उसमें नजर आता था,
हम खुश थे,
क्योंकि वो भी मेरे जैसा था,
पर आज तो अजब गजब हैं
जो नेता हैं,
खुद को गांधीवादी कहता हैं.
खूब टीप टॉप में रहता हैं
चम्मच कांटे से खाता हैं
पता नहीं क्या हैं य़े,
नेता का चक्कर की,
कुछ बनते ही,
बोलेरो से चलता हैं।
काश इस पर भी वे विज्ञापन लाते,
बताते कि उनके जीवन शैली का,
राज क्या हैं,
पर शायद ही ऐसा विज्ञापन दिखेगा,
ये नेता अपने ही लोगों को लहू पीयेगा,
झूठ बोलेगा,
अपने ही देशवासियों के धन से,
अपने परिवार को राजसुख देगा,
मरती रहे जनता अपनी बला से,
हम पैदा हुए हैं, राजभोगने को,
राज भोगेंगे।
दाम बढ़ायेंगे, महंगाई हमने थोड़ी बढाई
अमेरिकी ने कह दिया बढ़ा दी।
बाजार हमसे थोड़े ही नियंत्रित हैं,
इसका तो अंतर्राष्ट्रीय फंडा हैं,
केवल नामके हम मंत्री, प्रधानमंत्री हैं,
असली राजा तो विदेशों में बैठे हैं,
जिनके हम कठपुतली हैं।

Sunday, September 5, 2010

शिक्षक दिवस पर विशेष

गुरु क्या, ये तो शिक्षक के भी लायक नहीं...!

एक पत्रकार मित्र ने आज शिक्षक दिवस पर कुछ पंक्तियां मुझसे पूछी, संभवतः वे शिक्षक दिवस पर कुछ स्पेशल रिपोर्ट बनाना चाहते थे। गुरु और गोविंद में कौन बड़ा हैं, इससे संबंधित कुछ पंक्तियां वे मुझसे चाहते थे। शिक्षक दिवस के दौरान ऐसे भी भारत में ये पंक्तियां खूब चलती हैं --------
गुरु गोविंद दोउं खड़ें, काको लागू पायं।
बलिहारी गुरु आपनो, जो गोविंद दियो बतायं।।

और इस पंक्ति के बहाने आज के शिक्षक को गुरु बताकर, ईश्वर से भी, उन्हें श्रेष्ठ बताने की कोशिश की जाती हैं। जबकि आज के शिक्षक कभी गुरु हो ही नहीं सकते। क्योंकि कल के गुरु और आज के शिक्षक में आकाश जमीन का अंतर हैं। कल का गुरु शिक्षक नहीं था, वो मानव संसाधन के अंतर्गत न कभी काम किया था और न ही करने का कभी संकल्प किया था, पर आज का शिक्षक मानव संसाधन बन गया हैं, और एक संसाधन का क्या हश्र होता हैं, वो कल के गुरु का भान करनेवाला आज का शिक्षक खूब समझता हैं।
संस्कृत में एक श्लोक हैं -----------
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

हालांकि इस श्लोक का भी आज के शिक्षक अपने ढंग से भावार्थ बताते हैं, जबकि मेरे अनुसार, गुरु को ब्रह्मा के सदृश होना चाहिए, जो अपने शिष्य का निर्माण करें, गुरु को विष्णु होना चाहिए, जो उसके चरित्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाये, गुरु को शंकर होना चाहिए, जो उसके सभी बुराईयों को शमन कर दें, ऐसे गुरु ही साक्षात् परब्रह्म के समान होते हैं, जो ऐसे हैं, उन्हें नमस्कार हैं, पर ऐसे गुरु आज कितने हैं।
जरा कल के गुरु की एक कहानी सुनाता हूं
महर्षि धौम्य अपने शिष्य आरुणि को कहते हैं कि हे आरुणि। बारिश होनेवाली हैं, इसलिए तुम जाओ खेत में, वहां मेड़ बनाकर, खेत में जानेवाले पानी को रोकने का प्रयास करों ताकि खेत में लगी फसल बर्बाद न हो, महर्षि धौम्य के आदेश को सुनकर आरुणि खेत की ओर चल पड़ता हैं, भारी बारिश होती हैं, पर मिट्टी के मेड़ पानी में बह जा रहे हैं, अंतः में कोई विकल्प न देख आरुणि खुद को मेड़ बना कर लेट जाता है। रात बीत रही हैं, इधर महर्षि धौम्य अपने शिष्य आरुणि को आश्रम में न आया देख, विचलित हो रहे हैं, जैसे ही सुबह होती हैं, वे खेत की ओर अपने अन्य शिष्यों के साथ चल पड़ते हैं। देखते हैं कि आरुणि ने गुरु के वचन का पालन करने के लिए स्वयं को ही मेड़ बना डाला है,
आरुणि की इस दशा को देख, महर्षि धौम्य भाव विह्ववल हो रहे हैं, और अपने प्रिय शिष्य को उसी अवस्था में गले लगा लेते हैं, कहां हैं, ऐसे शिक्षक, जो इस आदर्श को अपना सकें, और उन्हें हम गुरु कह सकें।
जरा एक और कथा सुनिये --------------
रावण की सेना और उसके गुप्तचर भारत के सभी स्थानों को एक एक कर अपने गिरफ्त में ले रहे हैं। इधर गुरु विश्वामित्र को चिंता हो रही हैं, कि गर ऐसा ही चलता रहा तो भारत की दशा अत्यंत दयनीय हो जायेगी, अपने अंदर प्राप्त ज्ञान किसे दें, जिससे भारत की रक्षा हो सकें। वे अयोध्या का रुख करते हैं। अयोध्यापति दशरथ के पुत्र राम लक्ष्मण को अपनी विद्या के लिये योग्य मानकर उन्हें अपने साथ लेकर निकल पड़ते हैं, रास्ते में ही, राम लक्ष्मण की योग्यता की परीक्षा लेते हैं, जब ताड़का मार्ग में ही आ खड़ी होती हैं। दोनों परीक्षा में पास और फिर राम लक्ष्मण को उन्होंने सारी अपनी विद्याएं दे दी और राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया। बाद में गौतम नारी अहल्या का उद्धार कराया, राम का योग्य कन्या सीता के साथ विवाह भी संपन्न कराया और फिर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होकर नये भारत के निर्माण के लिए निकल पड़ें, और यहीं योग्य राम आगे चलकर क्या किया, आगे की कथा सभी जानते हैं, इसलिए यहां इससे अधिक बातें लिखना उचित नहीं। जरा अब बताईयें कि आज कितने शिक्षक ऐसे हैं जो विश्वामित्र और महर्षि धौम्य की सोच रखते हैं। जब ऐसी सोच इनकी हैं ही नहीं, तो फिर हम इन्हें गुरु क्यों कहें।
अरे ये तो शिक्षक हैं। इनका आज का चरित्र देखिये।
क. पैसे लेकर शिक्षा बांटते हैं। ये तो प्राईवेट फर्मों में पढ़ाते हैं, और आज कोई दूसरे फर्म, उन्हें ज्यादा पैसे देने की बात करें, तो बेस्ट आपर्चूयनिटी का बहाना बनाकर, आराम से अपने वर्तमान शिष्यों को श्रद्धांजलि देकर निकल पड़ते हैं, अपनी मस्ती और भौतिक आनन्द की खोज में।
ख. जिन सरकारी स्कूलों में ये पढ़ाते हैं, उन सरकारी स्कूलों में खूद अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते क्योंकि वे जानते हैं कि सरकारी स्कूलों की क्या स्थिति हैं, इसलिए वे इन्हीं सरकारी स्कूलों से खुद तो बंपर स्केल उठाते हैं, पर अपनी संतानों को इन स्कूलों से दूर रखते हैं, क्योंकि वे खुद कर्तव्यनिष्ठ होकर नहीं पढ़ाते, ये अलग बात हैं कि इन सरकारी स्कूलों में जैसे तैसे पढ़ रहे वंचितों के बच्चे अपनी तकदीर खुद संवार लेते हैं।
ग. आज का शिक्षक खुद को कांट्रेक्ट में बांध दिया हैं, ठेके पर नियुक्त होता हैं, पारा टीचर बनकर गौरवान्वित महसूस करता हैं, खुद कहता हैं कि वो पारा टीचर हैं, और जब उन्हें खुद की मानदेय कम लगती हैं तो सड़कों पर उतर जाता हैं, यहीं नहीं वो कहता हैं कि उसका नियमितिकरण कर दिया जाय, यानी जिन स्कूलों में शिक्षक नियुक्त हुए, जिन प्रक्रियाओँ के द्वारा। भले ही उन प्रक्रियाओं से, ये पारा टीचर की नियुक्ति न हुआ हो, पर सारा सुख, उन्हीं की तरह लेने की बात करता हैं, यानी शार्ट कट फार्मूला, से बंपर स्केल पाना चाहता हैं।
घ. चाहे बंपर स्केल पाने वाले नियमित शिक्षक हो या पारा टीचर। सहीं बात तो ये हैं कि ये कभी भी दिल लगाकर अपने कर्तव्य पथ पर नहीं हैं, गर ये आज कर्तव्यपथ पर होते, तो फिर ये नये – नये निजी विद्यालय खुलते ही नहीं, गर खुलते भी तो इनके आगे टिकते ही नहीं। हमें याद हैं कि एक समय था, जब जिला स्कूलों में नामांकन कराने के लिए बड़े बड़े लोगों की पैरवी होती थी, आज तो इन जिला स्कूलों में कोई अपने बच्चों को पढ़ाना ही नहीं चाहता, खुद वे टीचर भी नहीं पढ़ाना चाहते, जो यहां नियुक्त हैं। ऐसे में ये मानव संसाधन बन गये शिक्षक, देश व समाज का कितना भला कर रहे हैं, ये तो खुद ही वे जाने।
ड. यहीं नहीं इतनी गिरी हुई व्यवस्था में, इन्हीं शिक्षक बने गुरुओं को शिक्षा जगत का उच्च सम्मान सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का मेडल भी मिल जाता हैं, ये मेडल अथवा पदक कैसे और क्यूं मिलते हैं, इसकी भी गर जांच हो जाये, तो एक पदक घोटाला भी सामने आ जायेगा। जिन शिक्षकों को इस प्रकार के पदक मिलते हैं, जरा उनसे पूछिये कि आपने अपने जीवन में कितने राम, लक्ष्मण, कितने आरुणि, कितने भगत सिंह, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, लोकनायक जयप्रकाश नारायण आदि महापुरुष पैदा किये, तो पता लग जायेगा कि स्थिति क्या हैं। पर एक परंपरा हैं, पदक देनी हैं, इसलिए सभी प्रांतों में बैठे राज्य व केन्द्र के शिक्षाधिकारियों की टीम से मंगवा लिया जाता हैं कि किस शिक्षक को पदक देनी हैं, इसलिए ये शिक्षाधिकारी अपने ठकुरसोहाती विधा को अपनाते हुए, ऐसे ऐसे शिक्षकों का नाम भेज देते हैं, पदक के लिए, कि हमे हंसी आती हैं।
अंततः हमे याद हैं कि राजश्री प्रोडक्शनंस प्राईवेट लिमिटेड वालों ने बहुत पहले एक दोस्ती पिक्चर बनायी थी, जिसमें शिक्षक के कर्तव्य बोध का सफल चित्रण हुआ था। केन्द्र व राज्य सरकार और शिक्षक दिवस पर नाना प्रकार के कार्यक्रमों को आयोजित करनेवाले महानुभावों को चाहिए कि वो फिल्म दोस्ती की एक – एक सीडी इन शिक्षकों को उपलब्ध करायें, और ये शिक्षक उस फिल्म को आद्योपांत देखे, और सोचे कि क्या उनका वो चरित्र हैं जो दोस्ती फिल्म में शिक्षक, प्राचार्य और लिपिक का हैं। गर नहीं तो धिक्कार हैं, क्योंकि शिक्षक महोदय, आपका कुछ नहीं जा रहा हैं, देश मिट्टी में मिल रहा हैं, क्योंकि आप राष्ट्र निर्माता हो, गर राष्ट्र निर्माता ही अपने कर्तव्य बोध से भटक जायेगा तो देश गर्त में जायेगा ही, इसलिए वक्त हैं, देश को गर्त में जाने से बचा लो।